जिसकी पार्टी उसकी टोपी

राहुल गांधी की पार्टी है तो टोपी उनकी क्यों न हों। सेवा दल की गांधी टोपी को हटा कर पी कैप को मान्यता दे दी है। पी टोपी यानी वो टोपी जो क्रिकेट खिलाड़ी या फिर शहर के कुछ आवारा या स्टाइलिश लड़के पहना करते हैं। गांधी टोपी वैसी भी क्यों बची रहे जब गांधी ही नहीं बचे रहे। कम से कम इन राजनीतिक दलों में। कांग्रेस के बड़े नेताओं की सेवा करने वाले इस संगठन सेवा दल में गांधी टोपी लगा कर खुशामदगीरी करना ठीक नहीं। गांधी की टोपी तो गांधीगीरी के लिए होनी चाहिए। सेवा दल के लोग गांधीगीरी कहां करते हैं?वो तो चमचागीरी करते हैं।

इस लिहाज़ से राहुल गांधी ने अच्छा काम किया है। गांधी की टोपी पहन कर खुशामदगीरी ठीक नहीं लगती। राहुल गांधी ने बापू का सम्मान किया है। सेवा दल के महेंद्र मिश्र ने कहा कि सेवा दल के लोगों को आपदा प्रबंधन करने में इस टोपी से सुविधा होगा।महेंद्र मिश्र को प्लीज़ बेवकूप मत कहियेगा। गांधी ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के सर पर खादी की टोपी रखी तो वो जी जान से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जुट गए। जिन लोगों ने गांधी टोपी को एक बार सर पर रखा तो उस टोपी के लिए जान तक दे दी। इस कदर जुट गए कि अंग्रेजी हुकूमत को आपदा प्रबंधन की नौबत आ गई। अभी तक तो यही पता था कि गांधी के विचार,वस्त्र और अंदाज़ से बड़े से बड़े सार्वजनिक सेवा के काम हो जाया करते हैं।बल्कि सेवा करते वक्त लोग खुद को गांधी के समकक्ष ही समझने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वे गांधी की तरह सेवा कर रहे हैं। मगर सेवा दल को लगता है कि युवाओं को आकर्षित करने के लिए कुछ बदलाव ज़रूरी है। नई टोपी हो और नई बंडी। युवाओं का एक टेंशन तो रहता ही है कि उनका हुलिया आकर्षक हो। इसमें भी सारे युवा शामिल नहीं है। खाते पीते घरों के युवा ही स्टाइल का टेंशन लेते हैं। बाकी तो विविध भारती ट्यून करते हुए,रिक्शा चलाते हुए और कपड़ा बेचते हुए रोज़गार गारंटी योजना में खप जाते हैं। ज़ाहिर है इस युवा को आकर्षित करने के लिए राहुल बाबा ने टोपी नहीं बदली होगी।

क्या इस देश का युवा इतना रद्दी और बेवकूफ है? या फिर राजनीतिक दल मूर्खतापूर्ण हो गए हैं? उन्हें क्यों लगता है कि बंडी, झंडी के बदल देने से युवा किसी पार्टी में आ जाएगा। हमारे देश का युवा चारों तरफ से खींचा जा रहा है। बाज़ार वाले उसे जूता खरीदने के लिए खींच रहे हैं,घर वाले उसे नौकरी करने या पढ़ाने करने के लिए खींच रहे हैं,मीडिया वाले उन्हें अपनी ओर खींच रहे हैं कि वे पढ़े, वो क्या पढ़े इसके लिए अलग से अखबार निकाले जा रहे हैं आदि आदि। हमारे देश का युवा बरमुडा त्रिकोण में फंस गया है। वो कई प्रकार की चुंबकीय शक्तियों के द्वारा खींचा जा रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि सभी दिशाओं से आने वाली चुंबकीय शक्तियां एक दूसरे के प्रभाव को निरस्त कर रही हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि युवा किसी की तरफ खींचा नहीं पा रहा। वो झूल रहा है या भटक रहा है। राहुल गांधी गांधी की टोपी बदल कर उन्हें ढूंढने निकले हैं।

युवाओं से मेरी एक अपील है। वे किसी रास्ते पर न जाएं। भटकें। आवारा बनें। ज़िंदगी का मज़ा लें। कुछ नया खोजते रहे। पहले से पड़ी बेकार हो चुकी चीज़ों की तरफ ने खींचे। टोपीवाला आएगा,टोपी पहनाएगा मगर तुम टोपी पहनना नहीं। शिकारी आएगा..जाल बिछाएगा मगर जाल में फंसना नहीं। मैं भी एक गलत काम कर रहा हूं। तोतो को रटना सीखा रहा हूं।

8 comments:

रंजन said...

टोपी सेवादल वालों को भी
टोपी जनता को भी
पहले वाली "टोपी" से जनता सचेत होने लगी,
अब सबको "पहनायेगें नई टोपी"

अपने सर बचाना जनाब...

S K Kulshrestha said...

I am visiting your site for the first time after reading your column in Hindi Hindustan.
Well written piece. I enjoyed the subtle humour and strong message behind it.
Keep it up Ravish Kumar.
S K Kulshrestha
Dehradun

अभय तिवारी said...

क्या बात है..! क्या खूब नज़रिया है..!

जितेन्द़ भगत said...

सही आकलन !

Shambhu kumar said...

क्या दादा+भइया खुद लाखों लूट रहे हैं, और हम लोगों को भटकने के लिए कह रहे हैं। दादा भाभी जी की तरफ से, भइया बिहार और आईआईएमसी की तरफ से। राहुल बाबा की तो बात ही छोड़ दीजिए। पहले सोचता था कि जो गरीबी में नहीं पला बढ़ा, जिसने कभी लाइन वाले देश में लाइन नहीं लगा, वो क्या जाने देश का हाल, वो क्या जाने देश वासियों का दर्द, विश्वास मत के दिन पप्पू भइया के पंजाबी बीवी का तर्क सुना तो सदबुद्धि आ गई... रंजीता भाभी ने कहा की गरीब ही गरीब का नहीं होता। देखिए लालू, मुलायम, रामविलास ने क्या किया। वहीं राजा के बेटा महात्मा बुद्ध को देखिए, राजकाज छोड़कर कैसे जीवन मरण से उपर चले गए। वहीं कर रहे हैं अपने राहुल बाबा, इसलिए वो चाहे तो टोपी क्या देश का प्रधानमंत्री बिना वोट डाले बदल सकते हैं। क्या किस्मत पाई है राहुल बाबा ने। और युवाओं को क्या समझा रहें हैं। जिस देश में पुलिस पुलिस का काम नहीं करती, नेता नेता वाला काम नहीं करता, और सबसे उपर पत्रकार पत्रकार वाला काम नहीं करता वहां तो दलाल और चोर ही अच्छे, कम से कम खुलेआम अपना काम तो करते हैं। राह दिखान ही है तो चलिए मेधा और संदीप जी जैसे लोगों के साथ या फिर आपही के चैनल पर आरटीआई के अरविंद केजरीवाल भाई साहब के साथ। खाली झूठ मूठ के अहमदाबद जाकर माइक पकर कर सेखी बघारते रहते हैं। ज्यादा कीजिए गा त नौकरी नहीं दीजिएगा और क्या.... बस ब्लॉग लिखना मत छोड़िएगा... कस्बा का चसका लगा है...

Rajesh Roshan said...

अन्तिम वाक्य में जान है

Pawan Nara said...

ravish ji,
bhataknae ki jo baat kahi, vo mainae rakhti hai. bhatke gae nahi to nai manzil kaise paige. agar hum sub ki suntae jaye gae to lakir ke fakir hi kah layi gae.akhir waqt humara hai, kyo sunae hum kisi ki. ha "bhatk nae" shab ka matlab nazarie par nirbhar karta hai

Pawan Nara said...
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