कॉरपोरेट पूंजी से फैलता अंधविश्वास

बिल गेट्स का एक लेख दैनिक भास्कर में छपा था। बिल गेट्स ने कंपनियों से अपील की है कि वे सृजनात्मक पूंजीवाद को अपनायें। कुल मिलाकर उस लेख से यही समझा कि बिल गेट्स यह कह रहे हैं कि ठेले वाले,दिहाड़ी मज़दूर के अंटी में भी दस पांच रुपया रहता है। इनके लिए ज़रूरतें पैदा करों और फिर माल बना कर दस पांच पैसे को भी बटोर लो। बिल गेट्स उपभोक्तावाद को वहां तक ले जाना चाहते हैं जिसके पास उपभोग के नाम पर संतोष ही बचा है। इसी लेख में बिल गेट्स उन कंपनियों का भी ज़िक्र करते हैं जो अच्छा काम करती हैं। और लोगों से अपील करते हैं कि चूंकि ये कंपनियां अच्छा काम करती हैं तो इनका माल खरीद कर हौसला बढ़ाना चाहिए।

तालियां। वाह वाह। तो क्या बिल गेट्स की इस दलील को हिंदुस्तान की कंपनियों पर लागू कर दें। नोकिया,पैराशूट नारियल, सैमसन मोबाइल,अमूल दूघ और न जाने क्या क्या। ये किस नीयत से अपना विज्ञापन उन कार्यक्रमों में दे रही हैं जो अंधविश्वास को बढ़ावा दे रही हैं। अच्छा काम नहीं कर रही हैं। तो क्या उस बाज़ार से पूछा नहीं जाना चाहिए कि तुमने किस हक से ऐसे कार्यक्रमों का स्पांसर बनना तय किया जहां यह बताया जाता है कि एक ग्रह आपके पीछे पड़ा है। आपको कर सकता है बर्बाद। लेकिन बचने के हैं रास्ते। एक रत्न है ऐसा। तो कहीं यह बताया जा रहा था कि राखी के दिन कौन से कपड़े पहले। शाकाल से लगते बेलमुंड ज्योतिषियों को अगर कोई समर्थन दे रहा है तो वो है हिंदुस्तान के कॉरपोरेट जगत। इनकी सामाजिक ज़िम्मेदारी तय करने का वक्त आ गया है। मैं चाहूंगा कि ब्लॉगर अब ऐसी कंपनियों के नाम की सूची अपने ब्लॉग पर डाले जो भूत प्रेत या वहीशपन वाले कार्यक्रम को आर्थिक समर्थन देते हैं। इन कंपनियों के ब्रांड मैनेजर को ईमेल करें कि महोदय आप क्यों ऐसे कार्यक्रमों में अपना विज्ञापन देते हैं। बस टीआरपी की आड़ में चल रहे इस खेल का भंडाफोड़ हो जाएगा।


आखिर इन कंपनियों के ब्रांड मैनेजर सिर्फ टीआरपी का आंकड़ा ही क्यों देखते हैं। तो फिर ये करते क्या है। पढ़े लिखे घरों के ये लड़के लड़कियां आईआईएम अहमदाबाद जैसे संस्थानों से पास होते हैं। लाखों की नौकरी लेते हैं और करोड़ों का विज्ञापन देने के लिए सिर्फ पांच पन्ने की टीआरपी के आंकड़े देखते हैं। मुझे लगता है कि इनकी लापरवाही की वजह से ही समाज में मीडिया से ज़रिये गंध फैल रहा है। मार्केटिंग के एक व्यक्ति से बात हो रही थी। उन्होंने कहा कि विज्ञापन दाताओं के दफ्तर के लोग टीवी नहीं देखते। वे सिर्फ आंकड़े देखते हैं। जो हमारे आपके ईमेल पर उपलब्ध होता है। उसी के आधार से विज्ञापन दे देते हैं। उनके कमरे में न तो टीवी होता है न ही टीवी देखने का वक्त। यह एक तरह का आर्थिक घपला है।
यानी अरबों रुपये के विज्ञापन उद्योग में लापरवाह लोग भरे हुए हैं। जिन्हें नहीं मालूम कि उनका विज्ञापन कहां जा रहा है। वो सिर्फ इतना जानते हैं कि उनका विज्ञापन नंबर वन चैनल में जा रहा है। क्या विज्ञापन देने का कोई ज़िम्मेदार पैमाना नहीं होना चाहिए।

हमारा उद्योग जगत पूंजीवाद में यकीन रखते हुए आज़ादी की लड़ाई से भी जुड़ा रहा। बहुत सारे सामाजिक सरोकार के काम भी किये जाते हैं। मित्तल ट्रस्ट ने अभिनव बिंद्रा का खर्चा उठाया। ट्रेनिंग दिलवाई। क्या किसी टीवी चैनल की तरह अभिनव की टीआरपी देखकर ऐसा किया? अभिनव ने तो तब ओलिंपिक का पदक भी नहीं जीता था। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जो नाम या क्या पता पैशन के लिए सामाजिक सरोकार से जुड़ी रहती हैं। लेकिन इन्हीं कंपनियों के विज्ञापन उन कार्यक्रमों में कैसे चले जाते हैं जो अंधविश्वास फैला रहे हैं। बिल गेट्स के सृजनात्मक पूंजीवाद की अवधारणा पर बहस फिर कभी लेकिन यह अब सोचा जाना चाहिए कि कंपनियां विज्ञापन के पैसे को कहां कहां खर्च कर रही हैं। अमेरिका में बहुत सी कंपिनयां अपने उत्पाद पर लिखती हैं कि वे अफरमेटिंग एक्शन में यकीन रखती हैं। फिर इनका माल खरीदने में वो लोग ज़रूर प्राथमिकता देते हैं जिनका इसमें यकीन होता है। तो क्या भारत में भी कंपनियों को अपने उत्पाद पर नहीं लिखना चाहिए कि उनके उत्पाद का इस्तमाल अंधविश्वास या पत्रकारिता के स्तर को गिराने वाले कार्यक्रमों के विज्ञापन में नहीं होता है। वर्ना तो लोग आसमान में एलियन की चपेट में आई गाय और न जाने क्या क्या दिखाते रहेंगे। सुना है किसी ने हवा में हनुमान की आकृति को भी दिखा दिया।

अब आलोचना बदलने का वक्त आ गया है। चैनलकर्ताओं ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया है कि टीआरपी के आगे कुछ नहीं कर सकते। इसी के आंकड़ों पर टिकी होती है चैनल और उसमें काम करने वाले हज़ारों लोगों की ज़िंदगी। इसके अलावा उनके पास जवाब देने के लिए कुछ नहीं है। तो क्यों न अब उन कंपनियों पूछा जाए कि भई आप क्यों देते हैं ऐसे कार्यक्रमों को समर्थन। क्या हिंदुस्तान लीवर किसी ज्योतिष या ग्रह रत्न के कार्यक्रमों का प्रायोजक बनना चाहेगा या क्या उसे मालूम है कि वह किस तरह के कार्यक्रमों या चैनलों का प्रायोजक बन रहा है।

( लेख में जिन कंपनियों का नाम दिया गया है वो सिर्फ संदर्भ की पुष्टि के लिए हैं। आने वाले दिनों में पूरे शोध के साथ उनकी सूची दी जाएगी जो भूत प्रते, तंत्र मंत्र और तारे वारे जैसे कार्यक्रमों को प्रायोजित करते हैं।)

24 comments:

Rajesh Roshan said...

सात पैराग्राफ का यह लेख पढ़ा तो लगा कि क्या आप और हम एक पक्षीय बात करते हैं.. आपके लेख से ऐसा ही लगता है.. मानो हम और आप जो कह रहे हों, वही परम सत्य का रास्ता है बाकि सब भूल भूलैया..।

मुझे नहीं पता कि आप राजनीति के विचारधारा को मानते हैं और उसके पीछे क्या तर्क देते हैं लेकिन आपको यह कैसे लग सकता है कि आपकी सोच उम्दा और बकियों की सोच एक माइंड ब्लाकेज है..।

मैं ना ही ग्रह को मानता हूं और ना ही नक्षत्र को.. मैं मानता और जानता हूं कि मैं इन्हीं सातों दिनों में से किसी एक दिन मरूंगा। ना तो मुझे सोमवार के शंकर जी बचा लेगें और ना ही शुक्रवार के अल्लाह पीर। लेकिन बावजूद इसके मैं यह भी जानता हूं कि कई लोगों का इसमें असीम विश्वास है। ऐसे कई लोगों को मैं जानता हूं जो बात कम बोलते हैं श्लोक पढ़कर उदाहरण देना ज्यादा जानते हैं। क्या करेंगे उनका। हमारे आपके लिए कल का चंद्रगहण केवल एक आकाशीय गतिविधि होगी लेकिन कईयों के लिए यह पूजनीय है। बाजार इन्हीं सब चीजों को भूनाता है।

एक बात और मार्केटिंग के किस बंदे ने आपको कह दिया कि वे लोग टीवी या अखबार नहीं पढ़ते.. हमसे और आपसे ज्यादा देखते हैं वह..। उनको पता है कि कार्टून नेटवर्क पर हारलिक्स और कैडबरीस का एड ज्यादा चलेगा ना कि रात आठ बजे के खबरदार में। मर्सीडीज बेंज का विज्ञापन इकोनोमिक टाइम्स या बिजनेस स्टैंडर्ड में छपेगा ना कि विश्व में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार दैनिक जागरण या अमर उजाला में।

बाजार का एक नियम है, वह उसी के मुताबिक चलेगी.. खुद में गलतियां हों उसे खत्म करना चाहिए ना कि कंपनियों को दोष देना चाहिए जो प्रोग्राम को स्पोनार्स कर रहे हैं। एडिटोरियल पर बाजार का अतिक्रमण जरूर हो रहा है लेकिन इतना भी नहीं है कि हम उसे रोक ही ना पाएं। हां, यह बात अलग है कि हम चाहते हीं नहीं हैं या फिर हममें इच्छाशक्ति की कमी है।

Lovely kumari said...

log sanp,bhut -paret aur dakiyanusi visayon ke karykram dekhne ke liye mare ja rahen hain.aur bajar in sab ki mansikta ka faida utha raha hai,isse jyada koi bat nahi hai jo bikega we wahi bechenge.galti hamari bhi hai.

ravishndtv said...

राजेश रोशन जी
मुझे जो लगता है वही लिखता हूं। अब यह जो लगना है वह कई चीज़ों पर आधारित हो सकती है।
तथ्य से लेकर भावना तक। आपकी प्रतिक्रिया से ही ज़ाहिर होता है कि बाज़ार वाले किसी अवधारणा पर काम करते हैं। मर्सीडीज का तो नहीं कह सकता लेकिन टाटा सफारी और पजेरो हिंदी बोलने वाले कई ठेकेदारों के पास होगा। जो पढ़ते होंगे दैनिक जागरण ही लेकिन बाज़ार वाले दैनिक जागऱण को विज्ञापन नहीं देंगे। कार्टून नेटवर्क पर जो आता है वो सब बच्चों के लिए होता है इसलिए वहां बच्चों के विज्ञापन होते होंगे कोलकाता में हारलिक्स सबसे अधिक बिकता है। कुल बिक्री का पैंतीस फीसदी। इसीलिए वहां के दुर्गा पूजा पंडालों में हार्लिक्स के विज्ञापनों से भरे रहते हैं।

फिर खबरदार में अमूल का विज्ञापन क्यों आता है? इकोनोमिक्स टाइम्स में विज्ञापन देने का आधार क्या है? अवधारणा? क्या इसके सभी पाठकों की औकात मर्सीडीज़ खरीदने की ही होती है? पूजा पाठ हो सकता है लोगों के जीवन का आधार हो। है भी। लेकिन पूजा पाठ और अंधविश्वास में फर्क किया गया है। भक्ति और अंधभक्ति में फर्क है। बुनियादी भले न हो लेकिन शायद इसलिए किया गया हो ताकि भक्ति या आस्था के बाद भी कुछ जगह तर्क शक्ति के लिए बची रहे।

आखिर कोई भी कंपनी भूत प्रेत या अंधविश्वास के कार्यक्रमों की स्पांसर कैसे बन सकती है? मीडिया की खामियों के बारे में बहुत बात हो चुकी ह

anil yadav said...

....इसलिए कि वे अंधविश्वास, जादूटोना, जो लह जाए उससे लाभ उठा लो में यकीन करते हैं। करोड़ों की पूंजी, आइआइएम के पढे वाले का दिमाग भी तार्किक, वैज्ञानिक होगा, यह आशा पालना खालिस गदेलापन है। जो जितना पढ़ालिखा, उतना ढपोरशंखी. जातिवादी और मुरहा है यह सदियों का तजुरबा है। लोहिया और गांधी दोनों कह गए है।

एक छोटी सी फिल्म अक्सर दिमाग में चलती है। प्रोडक्ट बेचने की सारी तिकड़में फेल हो गई हैं क्योंकि बाजार सैचुरेट हो चुका है। भयभीत, परेशान बोर्ड की मीटिंग चल रही है। तभी गोरखपुर या सीवान एक सोखा आता है, गालियां बकता हुआ तेरी कुक्कुर कारपोरेट की, कालसर्प योग से गरलंगोट (टाई) बांधकर और बिसलेरी पीकर लड़ेगा। अरे चौदहमंजिला पर चील उड़ेगी। सारा बोर्ड उसके चरणों पर।
सोखा चीं
टी के दूध में गोबर सान कर सीईओ के सिर पर लेपने के बाद, एक मंत्रसिद्द नींबू काटकर निचोड़ता है। सारा बोर्ड, इंपोर्टे़ड ब्रीफ के ऊपर लपेटी बिना सिली डिजाइनर धोती में साष्टांग है। अगले दिन खबर आती है कि कंपनी का शेयर थोड़ा सुधरा है और सोखा को कंपनी का पैट्रन घोषित कर दिया जाता है और दूसरी कंपनियां उससे तोड़ने की तिकड़म में लग जाती है। मीडिया पूर्ववत उसका गुणानुवाद कर रहा है। अब सोखा जी हैं और कंपनी है। चाहे जिस ओर विज्ञापन पेलें आपसे क्या। लेने के लिए जो बहेलिए अभिव्यक्ति की आजादी का जाल बिछाते हैं वे कौन हैं। उनका क्या?
यह बहेलिया भी तो वैसी ही कंपनी चलाता है बस विज्ञापन देता नहीं लेता है। यही फर्क तो है।

Pawan Nara said...

ravish ji
yae samaysha bani rahgi jab tak viewer "content" ke liye paisa pay nahi karta. jis din viewer paisa dane lagega, wo apnae aap quality mangae ga. aur yae baat bhi saach hai ki hindustan mae " free" milnae wal vastuo ki koi kadar nahi karta.
agar aaj hi sub news channels ko pay channels kar diya to sabhi ko apni aukat pata chal jayege. likin shruwat kaun kare." billi ke gale mae ghanti kaun bandhae."
aur jaha tak company ko dosh dane ka sawal hai, wo galat hai. akhar call to channel malik ki hi hai ki usae kaya dikhana hai.
yahe har saman ki market hai, aap kaya bache na chahtae hai ye aap ko chun na hai.
good content ya glamourize crime

"content is king"
plz reply

Pawan Nara said...

aur sub sae badi baat yae ki aaj
"news channel ka 60% spend channel ko market karnae mae lagta hai" yani jis area mae TRP meters lagae hai , wahan kae cable operator ko 50000 salana tak pay kartae hai, taki wo logo ko dikh sake. is sae buri halat kaya hogi news media ki.

aur gadbad to wahi ho chuki thi jub 2 sal pahle clear market leader "aaj tak" nae pay channel honae sae mana kar diya.jub jungle kae sher mae hi himmat nahi to hiran(naye naye channel) ki kaya aukat "TRP" sae panga lanae ki

Nitish Raj said...

मेरी एक सहयोगी आपकी बड़ी ही फैन है और हमेशा कहती रहती है कि जब आप लिखते हो तो उनको पढ़ा भी करो। बहरहाल जैसे लवली जी ने गलती मानी है वैसे ही पवन जी को बता दूं कि आजतक पे चैनल ही है। अब बताएं वो क्या कहना चाहेंगे। जैसे उन्होंने कहा वैसे ही कहता हूं कि प्लीज रिप्लाई।

Nitish Raj said...

इस का रिप्लाई मैंने पवन से मांगा है रवीश जी आपसे नहीं। गलतफहमी ना हो इसलिए फिर से डाल रहा हूं।

cartoonist ABHISHEK said...

bhai ANIL YADAV ki
baat me dam hai.."यह बहेलिया भी तो वैसी ही कंपनी चलाता है बस विज्ञापन देता नहीं लेता है। यही फर्क तो है।"

Pawan Nara said...

nitish raj ji,
jahan tak mujhae pata hai , "aaj tak sirf " DTH platform par pay chanel hai,cable network par aaj bhi free hai. aur baki trp ke bare mae to aap mere sae aap jayda jantae hai. 30 lakh dth connections kul connections ka kitna percentage hota hai, app ko pata hai.

Pawan Nara said...

nitish ji
galti(not absolute) ke kiye mafi chata hu. aap nae jawab diya, acha laga. thx a lot

rajesh said...

Ravish Ji, Aapne Sahi Farmaya hai. samshya hai ki bhartiya punjiwad ka vikash bhartiya samantwad ke garbh se hi hua hai. isilie unlongo ko mansikta bhi waisi hi hai. Jabki Punjiwad ka kam samantwadi masikata ko khatma karne ka hota hai.
isile yaha ke byapari ke pas jab paisa hoga to wah ya to Bhagwati Jagran karwaega ya fir MUSICAL CONCERT. YAHA PER fORD MOTER jaisi company nahi hai ho Arbo Rupaye ki Scholarship deti ho.
BILL GATES ki soch kalyankari hai tabhi to BILL Gates Foundation Jaise Sangthan Arbo Rupya Education mr Kharch Karte hai. Yaha pe hai koi MAI KA LAL????????
DR.RAJESH PASWAN

रज़िया "राज़" said...

मैं चाहूंगा कि ब्लॉगर अब ऐसी कंपनियों के नाम की सूची अपने ब्लॉग पर डाले जो भूत प्रेत या वहीशपन वाले कार्यक्रम को आर्थिक समर्थन देते हैं। इन कंपनियों के ब्रांड मैनेजर को ईमेल करें कि महोदय आप क्यों ऐसे कार्यक्रमों में अपना विज्ञापन देते हैं। बस टीआरपी की आड़ में चल रहे इस खेल का भंडाफोड़ हो जाएगा।
बिल्कुल सही लिखते हैं आप। ये तो देश को 21वीँ सदी से 19वीँ सदी में ले जाने की बात हो रही है।


















\

ग़ुस्ताख़ said...

सबसे पहले राजेश रोशन से कहना चाहूंगा कि "मुझे नहीं पता कि आप राजनीति के विचारधारा को मानते हैं और उसके पीछे क्या तर्क देते हैं लेकिन आपको यह कैसे लग सकता है कि आपकी सोच उम्दा और बकियों की सोच एक माइंड ब्लाकेज है.." राजेश जी आपके इस बयान पर मुझे आपत्ति है। अगर आप नियमित ब्लागर हैं तो ापको पता होना चाहिए कि ब्लाग निजी अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसमें रवीश चाहे जैसे अपनी बात रख सकते हैं।
बहरहाल, जहां तक मेरी समझ है टाइम स्लाट की बिक्री होता है। कार्यक्रम का नाम भी बिकता है, लेकिन असल कीमत तो टाइम स्लॉट की होती है। ऐसे में दोपहर के कार्यक्रमों में अलग किस्म का एड होता है और रात प्राइम टाइम में अलग। वैसे बाज़ार की बात करें तों दर्शक वर्ग भी तय करता है कि आपकी दुकान में कौन सी चीज़ बेची जाएगी। चैनी खैनी या मर्सिडीज़..।
-

पंकज said...

दैनिक भाष्कर नहीं दैनिक भास्कर

S K Kulshrestha said...

rajesh roshan ji ki baat se mai bhi ittefaq nahin karta. ravish ne ek jwalant mudda uthaya hai. yeh to manana hi padega ki vigyapan dene wale darshako ki sensibilities ke prati bilkul bhi sensitive nahin hain. aap nahi soch sakate ki bhoot, pret aur andhvishwas failane wale karyakram adolescents aur bachcho ka kitna nuksaan kar rahe hai. mai ravish ki baat ka samarthan karta hun.

Rajesh Kamal said...

It is all about selling products. if a person is from IIM or any other reputed institute, it does not imply that he has high moral values.

B-Schools teach us to sell things, that's all! They teach us to identify our targetted customers and tingle their taste buds. This is how products are sold.

Companies do not bother about programme content. They only think of improving their revenues!
channels as well as their sponsers have the same motive, but we have the remote! why don't we shut down the TV?

Its the golden rule of business - ROI (return on investment) is always calculated and break-even level targets are short-termed.

Most important of all - Democracy allows everyone to speak!

baghel said...

dear ravish ji,channel par bhoot pret ko lekar itna bawal mach raha hai mai kahta hu ki parpakwita ki manjil abhi bahut door hai...abhi to bas shruat hai...hum jab news channels ki trp ke liye chal rahi andhi daud ki bat karte hai hai to yah v to yad rakhe ki bhale hi news channels ki badh aa rahi hai par hai to sab abhi apripakwa hi...hum kyo umeed karte hai ki news channel, jis samaj se wah upja hai uske prabhav se achuta rahega....KOI NEWS CHANNEL DOOSRO PAHLE BADA HO GAYA (JAISE NDTV),KUCH ME(jaise AAJ TAK) "BADDAPAN "KI RAH SANGAT KA ASAR SE (INDIA TV)'"BACHPAN" KI TARAF MUD GAI TO KUCH ME SHURUAT SE HI KUCH PARIPAKWATA KA BAGHAR NAJAR(VOI) AA RAHA HAI...AUR PHIR HUM YEH V KYO BHULTE HAI KI JIS DES ME HAR 10-15 KM PAR "GRAM DEVTA"BADALTE HO...HAR TOOLE,MOHALLE KE APNE DEVTA HO...HAR GHAR KE,KHANDAN KE APNE KULDEV HO ...HAR BUJURG..HAR YUA KE PAS ANDHVISWAS SE JUDI KOI NA KOI KAHANI ...WO KAHANI JISKE JIMMEDAR NEWS CHANNEL NAHI HAI...WO TO WAH JANAMGHUTTI KE SATH HI PITA RAHA HAI...YADI YE SAB VISHAY NEWS KA HISSA BAN RAHE HAI TO ITNI HI TOUBA MACHANE KI JARURAT KYA HAI...AUR AB TO SABKE PAS OPTION HAI ...REMOTE HAI ...BADAL DALIYE CHANNEL...CHANNEL BADALNE KE KHWAB KYON DEKH RAHE HAI....SAMAY PAR CHOD DIJIYE NA ...YADI YE NAHI BADLE TO PHIR DARSHAK SABAK SIKHANA JANTA HAI...AB SANSANI NAHI CHALTI SRIMAN...KAL KO DHRTI V NAHI FATEGI...KOI DEK RAHA HAI AISA V NAHI HOGA ...SAI BABA KI ANKH SE ANSU V NAHI NIKLENGE AUR NA HI SHANI MAHARAJ HAMARI NIJI JINDAGI ME DAKHAL DENGE....

baghel said...

dear ravish ji,channel par bhoot pret ko lekar itna bawal mach raha hai mai kahta hu ki parpakwita ki manjil abhi bahut door hai...abhi to bas shruat hai...hum jab news channels ki trp ke liye chal rahi andhi daud ki bat karte hai hai to yah v to yad rakhe ki bhale hi news channels ki badh aa rahi hai par hai to sab abhi apripakwa hi...hum kyo umeed karte hai ki news channel, jis samaj se wah upja hai uske prabhav se achuta rahega....KOI NEWS CHANNEL DOOSRO PAHLE BADA HO GAYA (JAISE NDTV),KUCH ME(jaise AAJ TAK) "BADDAPAN "KI RAH SANGAT KA ASAR SE (INDIA TV)'"BACHPAN" KI TARAF MUD GAI TO KUCH ME SHURUAT SE HI KUCH PARIPAKWATA KA BAGHAR NAJAR(VOI) AA RAHA HAI...AUR PHIR HUM YEH V KYO BHULTE HAI KI JIS DES ME HAR 10-15 KM PAR "GRAM DEVTA"BADALTE HO...HAR TOOLE,MOHALLE KE APNE DEVTA HO...HAR GHAR KE,KHANDAN KE APNE KULDEV HO ...HAR BUJURG..HAR YUA KE PAS ANDHVISWAS SE JUDI KOI NA KOI KAHANI ...WO KAHANI JISKE JIMMEDAR NEWS CHANNEL NAHI HAI...WO TO WAH JANAMGHUTTI KE SATH HI PITA RAHA HAI...YADI YE SAB VISHAY NEWS KA HISSA BAN RAHE HAI TO ITNI HI TOUBA MACHANE KI JARURAT KYA HAI...AUR AB TO SABKE PAS OPTION HAI ...REMOTE HAI ...BADAL DALIYE CHANNEL...CHANNEL BADALNE KE KHWAB KYON DEKH RAHE HAI....SAMAY PAR CHOD DIJIYE NA ...YADI YE NAHI BADLE TO PHIR DARSHAK SABAK SIKHANA JANTA HAI...AB SANSANI NAHI CHALTI SRIMAN...KAL KO DHRTI V NAHI FATEGI...KOI DEK RAHA HAI AISA V NAHI HOGA ...SAI BABA KI ANKH SE ANSU V NAHI NIKLENGE AUR NA HI SHANI MAHARAJ HAMARI NIJI JINDAGI ME DAKHAL DENGE....

भवेश झा said...

bahot khub sir..

par hamari hindustani mansikta kabhi बिल गेट्स ki mansikta ko apna nai sakti...

neway bahot badhiya hamesa ki tarah apka yah post bhi kafi achha laga.....

thnx

plz apne qasba me

garamagaram.blogspot ko add kar lijiye..plz

anil said...

हंसिया के ब्याह में खुरपी का गीत गा रहा हूँ ....लेकिन कोई बात नही....

अभी - अभी एनडीटीवी पर मुक्के के नये मक्का भीवानी के बाक्सरों पर आपका प्रोग्राम देखा.... और उसके बाद ये कमेंट लिखने से अपने आपको रोक नही सका .....यकीन मानिये पूरे कार्यक्रम के दौरान टी वी के सामने से हिल नही सका ....स्क्रिप्टिंग में आपने कलम तोड़ कर ऱख दी....क्रिकेट से इतर खेल के लिए इतने बढिया तरीके से आवाज उठाने पर.............साधुवाद

सतीश पंचम said...

कुछ दिनों पहले ईसी मुद्दे पर अपने सफेद घर में एक पोस्ट लिखी थी - काली गाय कहां से ढूंढू , तब शायद नहीं सोचा था कि ईस ज्वलंत समस्या के बारे में और भी लोग सोच रहे हैं, बहरहाल आपकी ये पोस्ट काफी अच्छी रही।
ईन बेलमुंड बाबा लोगों के बारे में इतना ही कहूंगा कि- यदि बेवकूफ बनाने के सौ तरीके हों तो 99 इन्हीं लोगों के पास मिल जाएंगे, और जो 1 आखरी सौवां बचेगा, उसे ये अपना बताएंगे।

Priyanka said...

Achha tarika hai, logo mein aise programs ke khilaaf jaagrukta laane ka. Please share list of all those brands. we are ready to boycott them.

rohit said...

ravis ji mai aap ki bat se puri tarah sahmat hnu.magar kuch jimedari channel valo ko bhi uthani hogi,akhir news channel sirf paissa kamane ke liye nahi hai.sarkar ko bhi eske liye laksman rekha khichni hogi.