दर्शक की याद में सिनेमा-२

सिनेमा ने नौजवानों को नैतिक नहीं बने रहने के लिए कई तरह से मजबूर किया। इस देश में लाखों नौजवान होंगे जिन्होंने फिल्म देखने के लिए झूठ बोला। अपने बड़े भाई से, पिता से, प्रिंसिपल से और पड़ोसी से। देख के आए फिल्म और बताने लगे कि लाइब्रेरी में प्रेमचंद पढ़ रहे थे। नब्बे के दशक तक शहरों की बड़ी आबादी स्थायी होती थी। अभी की तरह नहीं कि दस साल पटना में, बीस साल दिल्ली में और बाकी के साल मुंबई में। स्थायी आबादी होने के कारण मोहल्ले की पहचान मज़बूत हुई। रिश्तेदारों की नज़र मज़बूत होती थी। नतीजा...अरे आज पप्पू को देखे अप्सरा सिनेमा में। पढ़ता लिखता नहीं है का। बस जैसे ही चाय पीकर जासूस रिश्तेदार विदा हुए अंदर फिल्मी अंदाज़ में लात घूंसे चलने लगते।

सिनेमा हॉल की तरफ कदम बढ़ाने में पांव थरथराते थे। कहीं कोई देख न ले।चाचा या पड़ोस की आंटी। कहीं बड़े भाई भी दोस्तों के साथ न पहुंच गए हों सिनेमा देखने। याद कीजिएगा तो ऐसे ढेरो प्रसंग मिलेंगे इस तरह के टकराव के। सिर्फ पकड़े ही नहीं जाते थे बल्कि पहली बार घर वालों को पता चलता था कि इनके कौन कौन दोस्त हैं।आवारा लोफर यही सब इनाम मिलता था सिनेमा देखकर लौटने पर। अब तो घर के ही लोग कहते हैं फिल्म देख आओ। शुरू में ऐसा नहीं था।

हमारे परिवार के उसी सदस्य ने,जो सिनेमची थी,एक सत्य कथा बताई थी। पटना के मिलर स्कूल से भाग जाते थे फिल्म देखने। ज़्यादा फिल्में पर्ल और राजधानी का गौरव अशोक सिनेमा हॉल में ही देखी क्योंकि ये दोनों सिनेमा घर मिलर स्कूल के नज़दीक थे। जब प्रिंसिपल को शक हुआ तो कहा कि पिता को बुला कर लाओ। अब उनमें इतनी हिम्मत तो नहीं थी कि पिता को बुलाते। लिहाजा एक चाय वाले को चाचा बना कर ले गए। इसके आगे की बात याद नहीं लेकिन इन्ही की सुनाई एक और कहानी है। इनके कुछ दोस्त सिनेमा देख रहे थे। सिगरेट पीने के लिए(तब शायद लोग हॉल में भी पीते होंगे)पीछे बैठे दर्शक से दियासलाई मांग बैठे। पीछे वाले अपनी बीड़ी जलाई और जलती तीली आगे बढ़ाई तो हल्की रौशनी में अपने ही सपूत का चेहरा दिख गया। बस लगे वहीं लात जूते से उन्हें मारने। भगदड़ मच गई।


लड़कियों के लिए फिल्म देखना बहुत मुश्किल होता था। हमारे मोहल्ले में गीता दीदी थीं। उन्हें फिल्म देखने का बहुत शौक था। गीता दीदी साधारण सी महिला। इस बात की आशंका में डूबी रहने वाली लड़की कि कहीं कोई छेड़ न दे। बगल से तेज़ स्कूटर गुज़र जाए तो बिना देखे कि कौन चला रहा है वो चिल्लाने लगती थीं। दस बारह साल की उम्र में मैं गीता दीदी के साथ मर्द बन कर फिल्म देखने जाता था। उन्हें लगता था कि ये रहेगा तो कोई छेड़ेगा नहीं और मुझे लगता था कि मुफ्त में फिल्म देख रहा हूं। मोहल्ले की तमाम लड़कियों के लिए सिनेमा देखना तभी साकार होता था जब कोई बब्लू,पप्पू या मुन्ना उनके साथ फिल्म देखने को तैयार होता। तभी मांओं को भरोसा हो जाता था कि कोई लड़का साथ में है तो कुछ नहीं होगा।

क्योंकि यह वो समय था जब लड़कियां घरों से बाहर सिनेमा हाल में ही दिखती थीं। लड़कों और लड़कियों के बीच एक अजीब किस्म का अभद्र सार्वजनिक टकराव होता था। सिटियां बजती थीं। फब्तियां चलती थीं। तो बेताब फिल्म भी इसी तरह देखी मैंने। आठ दस लड़कियों के साथ। चार पांच रिक्शे पर लादी गईं और मैं उनका पहरेदार मर्द उन्हीं में से एक किसी दीदी की गोद में बैठ कर बेताब देखने गया था। आखिरी ऐसी फिल्म मैने प्यार किया देखी।


नब्बे का पहला साल था और मैं दिल्ली आ गया। इस बीच लालू प्रसाद के राज में पिछड़ों और अगड़ों के बीच तनाव के कारण सत्ता पाए पिछड़े उदंड हो गए तो अगड़े लड़के दिल्ली के लिए रवाना हो गए। अगड़ा समाज स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि दूध वाले ग्वाला लोग अब सरकार चला रहे हैं। ऐसा ही झगड़ा मैंने दो परिवारों के बीच देखा था। यादव जी थे और दूसरे ठाकुर साहब। ठाकुर परिवार के अंकल आंटी अक्सर उन पर फब्तियां कस देते कि अहिर लोग के राज में बौरा गए हैं। इस तरह की सार्वजनिक हिकारत ने भी लालू के समर्थकों को उदंड किया और लालू को लापरवाह नेता बनाया।

ख़ैर इसका नतीजा कानून व्यवस्था पर पड़ा। मेरे दिल्ली आने के बाद मोहल्ले की लड़कियों का इस तरह रिक्शे पर लदा कर जाना बद हो गया। मेरा पटना लौटना कम हो गया और उनकी समस्या का सामाजिक समाधान निकाला जाने लगा। शादी हो गई सब की। तब से उनमें से शायद किसी से नहीं मिला हूं। क्योंकि उन लड़कियों को सिनेमा दिखाने वाला जीवन साथी मिल चुका था। बब्लू,पप्पू और मुन्ना बेकार हो चुके थे बल्कि ये भी अब खराब हो चुके ज़माने में भरोसे के लायक नहीं रहे थे।

पटना में सिनेमा हॉल की हालत खस्ता होने लगी। अशोक अब राजधानी का गौरव नहीं लगता है। राजधानी का गौरव इसलिए था कि इस सिनेमा हॉल में सीटी बजाने पर सख्ती थी। दर्शकों की इसी आदत के कारण कई सिनेमा घरों ने हट्ठे कट्ठे पहलवान पाले थे। जो पहले दरवाज़े पर बेताब दर्शकों को ठेलते,उन्हें नियंत्रित कर एक एक कर भीतर जाने देते और फिर हॉल के अंदर पान की पीक थूकने या सीटी बजाने पर धुनाई करते। देश भर में कई सिनेमा घरों ने इन्ही पहलवानों के दम पर पारिवारिक होने की ख्याति पाई। नौ से बारह का शो काफी बदनाम शो माना जाता था। हॉस्टल के लड़के या रात की बस पकड़ने वाले लोग ही इस तरह से शो ज़्यादा देखा करते। रिक्शा वालों की भीड़ होती। फिल्म के साथ पंखा कूलर का भी मज़ा मिलता था। तभी तो हर हॉल पर शान से लिखा गया...एयरकूल। वातानुकूलित। असंख्य भारतीयों को एयरकंडीशन का सार्वजनिक अनुभव कराने का गौरव सिर्फ और सिर्फ हमारे सिनेमा हॉल को हासिल है।

दूसरी तरफ सिनेमा देखने में मास्टर लोग भी पैदा हुए। जो टिकट लेने में माहिर होते, लाइन के बाहर से आकर अपना हाथ खिड़की की छेद में घुसेड़ देते और कॉलर ऊंचा कर चल देते। एक खास किस्म का आत्मविश्वासी युवा दर्शक पैदा हुआ जो टिकट लेकर सीढ़ियों पर दनदनाते हुए चढ़ता और दरवाजे पर धमक जाता। इनसबके कारण भी कई शरीफ लोगों के लिए सिनेमा देखना किसी युद्ध से लौटने जैसा होता था। कुछ शरीफ सिनेमा देखने के क्रम में ही शराफत से मुक्ति पाते थे। ऐसी ही किसी दुपहरी मैं और मेरा दोस्त पर्ल में श्री ४२० देखने चले गए। पहली बार बिना बताए और मोहल्ले की लड़कियों के बगैर। तीन से छह का शो था। अचानक बाहर बारिश होने लगी और अंदर भी। राजकूपर तो नर्गिस के साथ छतरी में हो लिए लेकिन मैं और अभय डर गए। अगर बारिश होती रही तो घर कैसे पहुंचेंगे। भींग कर जायेंगे तो पकड़े जायेंगे। बस बीच सिनेमा से ही भाग लिये। यह भी तो देखना था कि छह बजे के बाद पहुंचने पर कोई न पकड़ ले कि सिनेमा देख कर आया है। उसके बाद से कभी झूठ बोल कर सिनेमा देखने नहीं गया। लेकिन मालूम चला कि जो लोग झूठ बोलकर सिनेमा देखते थे वो आखिरी सीन पर एक्ज़िट पर पहुंच जाते ताकि फिल्म खत्म होने पर बत्ती के जलने से वहां मौजूद कोई रिश्तेदार न देख ले। इसलिए वो सबसे पहले निकलते और जल्दी घर पहुंचने की कोशिश करते। बाकी यादें बाद में।

18 comments:

अभिषेक ओझा said...

वाह क्या यादें है वो माचिस माँगने वाला किस्सा मस्त रहा !

Rajesh Roshan said...

किस्सा ऐ फ़िल्म चालू आहे.... वो गुलाम में आमिर का जीभ से जलती तीली को बुझाना, वो सौदागर का इलू इलू और मोहरा का मस्त मस्त.... लिखने के लिए कई चीजे दे गया फ़िल्म... समाज को बदला और समाज ने फ़िल्म को.... आज भी माल में आमिर के गजिनी का हेयर स्टाइल निकल पड़ा है... और शुरुआती दौर के सुनील शेट्टी का गोल चश्मा....

भारत में फ़िल्म, क्रिकेट और राजनीति का किस्सा गणित के infinite की तरह है.... :)

sushant jha said...

अरे सर...बदनाम शो में मैं भी एकवार फंसा था...वीणा सिनेमा में पता चला कि सामने वाली कतार में मेरे गांव के ही एक रिश्ते में चाचा लेकिन उम्र में भैया के बराबर के सज्जन बैठे थे। उन्होने भी मुझे देख लिया और मैनें भी..लेकिन एक अलिखित करार हो गया कि बोलना नहीं है।दूसरे एक सिनेमची ऐसे थे जो पहला शो देखने की चक्कर में गांव से 205 किलोमीटर दूर पटना चले गए थे हम आपके हैं कौन देखने के चक्कर में ।तब जय माता दी का सर्विस पटना से लौकहा शुरु ही हुआ था। और जब सिनेमा देखकर आए तो उनके चेहरे पर जंग जीत लेने जैसे खुशी थी...और लोग भी बड़े गौर से उनको सुनते भी थे। सबसे बड़ी बात की लोग फिल्मों का डॉयलॉग भी बड़े वीरता के साथ सुनाते थे।

Priyanka said...

aapka yeh post bhi bahut achha tha.. Jaisa aksar hota hai... per smaamjh nahi aa ya... 1 para jo iss tarah se shuru hota hai : "नब्बे का पहला साल था और मैं दिल्ली आ गया। ...." ... Is para ka yahan kya matlab hai?

MUKHIYA JEE said...

शकुन हुआ की आज भी पटना आपके दिलो दिमाग में कब्ज़ा किये हुए हैं - वर्ना लम्बी गाडी और बड़ा वेतन में पटना कहीं खो न गया हो ! मन करता है आपके द्वारा बनाये हुए कोई विशेष रिपोर्ट "बिहार" पर हो ! हम सब को बिहार खोज रहा है ! आपके स्कूल का वोह कमरा - पटना मार्केट में बेच रहा "टोपी वाला" ! गाँधी मैदान में कान से जूं निकालने वाला ! आपके मोहल्ला का वोह "फोकचा" वाला ! सभी आप और हम के इन्तेज़ार में हैं ! कभी तो सपूत आएगा और मेरी तकदीर बनाएगा !

anil said...

इस तरह की सार्वजनिक हिकारत ने भी लालू के समर्थकों को उदंड किया .....
कृपया एक बार अपने सर नेम का उल्लेख करें ....अभी कुछ दिनों पहले भी मैने आपका एक पोस्ट पढा था जिसमें आपने मुलायम और समाजवादी पार्टी के प्रति आपने अपना पूर्वाग्रह जाहिर किया था और यहाँ आपने फिर पूरी कौम को ही उद्दण्ड घोषित कर दिया........ये पूर्वाग्रह क्यों क्या इस कौम के किसी उद्दण्ड से कभी पाला पड़ गया था ..........

सुशील राघव said...

रविश जी नमस्कार

मैंने न स्कूल और न ही कभी कोलेज से भाग कर कोई फ़िल्म देखी। और ना ही कभी मोहल्ले के दोस्तों के साथ ही फ़िल्म देखने गया। लेकिन आज आपका यह लेख पढ़ कर लग रहा है की मैंने अपने जीवन में काफी कुछ खोया है। आपके अनुभव पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.

CNEB said...

रविश जी,
संस्मरण वाकइ रोचक रहा।पढ कर बचपन की तस्वीरें
आंखो के सामने आ गयी।मैं बचपन मे फिल्म देखने गया मगर बड़ी योजनाबद्ध तरीके से हमेशा अपने माता पिता के साथ या चाचा मामा।योजनाबद्ध शब्द प्रयोग करने का कारण ये हैं कि माता पिता का बड़ा आज्ञाकारी होने के कारण जह वो कहते तब ही जाता।फिल्म को लेकर कभी कोई दिक्कत नही आई।लेकिन मुझे याद है वीडियों का वो दौर जब एक रात मे जग जग कर तीन-2 चार-2 फिल्मे देखा करते थे।बड़ा मजा आता था।हम तोग भी यही करते थे।फिल्म देखने के अगले दिन का माहौल बड़ा खतरनाक होता था।पिता जी अगले दिन वीडियो वाले से यह जरूर कहते थे कि एक दो ऐर फिल्मे देख लो,ये पिता जी का बड़ा टान्ट होता था।अब ये सब सोच कर बड़ा मजा आता हैं।

सुबोध said...

रवीश जी बड़े साझा अनुभव हैं... बहुत सी यादें ताजा हो गईं...ग्यारहवीं में पहली बार जब छुप कर अपने दोस्त के साथ सिनेमा देखा...फिल्म खत्म होने के बाद जब तक स्टैण्ड से साइकिल निकाल नहीं ली तब तक डरता रहा कि कोई देख ना ले...एक बार तो ट्यूशन का बहाना करके सिनेमा देखने जा पहुंचा...ट्यूशन अक्सर साइकिल से जाता था....लेकिन उस दिन सिनेमा देखने जाना था...इसलिए साइकिल लेकर नहीं गया...जब लौटकर आया तो घर के सामने मोहल्ले वालों की भीड़ लगी थी...देखते ही डर गया...लगा आज पकड़ लिया गया हूं...और सार्वजनिक बेइज्जती होने वाली है...बाद में पता चला मेरी साइकिल चोरी हो गई है...और घर वाले मुझे हर जगह खोज चुके है..वहां भी जहां मैं ट्यूशन पढने जाता था...खैर साइकिल जाने के गम में आंखे भर आईं...इसलिए डांट से बच गया...लेकिन खुद से ज्यादा गुस्सा अक्षय कुमार पर आया ...कम्बख्त ना जाता तो कम से कम साइकिल तो ना चोरी होती...

कुमार आलोक said...

फिल्मों ने लोगों को नैतिक ना बने रहने पर मजबूर किया सच्चाइ है ..फिल्मों ने लोगों को अंधविश्वास की गर्त में धकेलने का काम किया ...जय संतोषी मां एक फिल्म आइ थी ..फिल्म सुपरहीट हो गइ ..घरों में संतोषी मां की पूजा अर्चना होने लगी ..मां ओर बहन हमें खास हिदायत देती थी बेटा शुक्रवार है ..खट्टा चीज ना खाना ..क्यूंकि फिल्म में इस दिन को एक भक्त ने खट्टा खाया उसका पूरा परिवार कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया ...राखी बंधवाने का स्टाइल भी हमारे समाज में फिल्मों की देन है ..वर्ना पहले पुरोहित जी इस दिन आकर सबको धागा बांधा करते थे ..और इसमें भी कोइ दो राय नही है कि फिल्मों ने हमारे समाज की प्रगति में भी मुख्य भूमिका निभाइ है ....आप का ये कहना भी विल्कुल सही है इ आम आदमी एयरकंडिशन और एयरकूल का सुख अगर उस दौर में ले पाया था तो उसका क्रेडिट भी सिनेमाघरों को जाता है । पर्ल सिनेमा खटमलों के काटने के लिये मशहूर था तो मोना , एलिफिन्सटन और रिजेन्ट में अगर टिकट ना मिलें तो बीएन कालेज छात्रावास में जाकर भाइ लोगों से कान्टैक्ट किजीये ..और वैशाली सिनेमा का वजूद तो राजेन्द्र नगर ओवरब्रीज ने खत्म कर दिया ...खैर एक और रोचक पोस्ट के लिये आपको बधाइ ।

Seetu said...

apke bunking ke romanch se hi romanchit ho liye.dukh hota ki school se,ya phir ghar mai bina bataye film kyo nai dekhi.sharafat k naam par jindagi k asal mazo se mahroom rah jate hai

prashant said...

Rabish sare pichhre udand nahi hue the.nahee pichhrabadya yadabbad LALOOJEE ke sath aya,darasal iskee suruat ram lakhan singh yadaw&Ram awdhesh singh ne kee thee.Bahut sare SANSKARBAN pichhre mere dost hain sayad aapke bhee honge.

hemant said...

u r a good reporter and good writer also.

Hemant Golani
Reporter, ETV Gujarati
Ahmedabad

golani_hemant@yahoo.co.in

Chiranjiv said...

भाई हमे तो कोइ escort के लिये नहीं बुलाया. बहुत बढिया लिखा है आपने. हमारे भोजपुरी मे एक कहावत है "आपन छाव ना छोडे खेसारी". मतलब कि खेसारी अपना असली रुप नहीं छोडता है. आपने इतना मजेदार बातों के बिच मे अपना पसंदिदा टापिक जाती को लाना नहीं भुला.

amit said...

मज़ेदार हैं आपकी यादें....मेरी यादों में ज़्यादातर टीवी की फ़िल्में ही हैं। हम लोगों ने शहर में कम वक़्त गुज़ारा...एक कस्बे में रहते थे, वहां सिनेमाहाल नहीं था। दो-तीन वीडियो हॉल थे जिनमें जाकर ज़्यादातर बच्चे चोरी-चोरी फिल्में देखते थे। लेकिन, वीडियो में फ़िल्में देखने वाले लोफर कहलाते थे। इसी डर से वहां नहीं गया। घरवालों के साथ-साथ मोहल्ले के लोगों के बीच शराफत का चोला जो ओढ़ रखा था। लेकिन, टीवी में आने वाली फ़िल्मों का बड़ा नशेड़ी था। हर शुक्रवार-शनिवार रात में जब दूरदर्शन में फ़िल्म आती, तो रात दो बजे तक जागकर देखता। घर में सभी सो जाते..लेकिन नींद की क्या मजाल जो फ़िल्म वाले दिन मुझे आ जाए। बाकी दिन जब पढ़ना होता तो भले ही नौ-दस बजे से ही ऊंघने लगता। इसीलिए कई बार घर के लोग ताने भी मारते थे। अमिताभ या राजकपूर की फ़िल्म होती तो फिर ख़ुशी का ठिकाना न रहता। सोमवार-मंगलवार से जैसे ही हफ़्ते की फ़िल्म के टीजर्स टीवी पर दिखाए जाते, दोस्तों के बीच चर्चा का विषय बन जाता कि इस शुक्रवार अमुक फ़िल्म आने वाली है। फ़िल्म के कॉन्टेंट के विषय में पहले से ही कई कयास लगाए जाते....दोस्तों में लंबी बातचीत होती। फिल्म देखने के बाद अगले कुछ दिनों तक सभी क्रिटिक्स मिलते और फ़िल्म के अलग-अलग दृश्यों पर तर्क-वितर्क करते जो कई बार लड़ाई के क़रीब पहुंच जाता। सिनेमाहॉल में तो पहली बार पिताजी के साथ ही गया था...नगीना देखने, लेकिन छोटा था उस वक़्त नाग-नागिन की लड़ाई देखकर डर गया और आंख बंद कर ली। थोड़ी ही देर में सो गया। कॉलेज के दिनों मे ज़रूर कई फ़िल्में देखीं..कई फ़िल्मी किरदारों ने ज़िंदगी पर कहीं न कहीं असर भी डाला। लेकिन अब पिछले कुछ दिनों से फिर फ़िल्में नहीं देख पा रहा।

Inner Vision said...

It was harsh on the part of India Today to give a title like this. Very well written post. Keep up the good work.

Sandeep Gupta said...

aapke cinema anubhav padh kar achha laga khaskar wo jisme aap kahte hai ki aap das barah saal ki umra me mard ki tarah ladkiyo ke sath jaate the .aur woh machiswala kissa.

Hitesh Vanecha said...

I think your blog is best.