जाने तू जाने ना

दिल चाहता है की याद आती रही इस फिल्म में। कभी कयामत से कयामत तक की झलक भी दिखी। पटना के मोना सिनेमा हॉल में पहले दिन से लेकर सत्रह दिनों तक लगातार कयामत से कयामत तक देखता रहा। रोज़ दोस्तों से शर्त लगाता कि यह फिल्म सुपर हिट होगी। पहले हफ्ते में फ्लाप होने के बाद कयामत से कयामत तक हिट हो गई थी। आमिर स्टार बन चुके थे। दिल चाहता है में आमिर जवान होकर चंद दोस्तों के साथ नौजवानों की दुनिया में लौटते हैं।सब के सब परिपक्व हैं। मस्तीखोर हैं। लेकिन जाने तू की फिल्म पता नहीं क्यों आज के समाज में ले चलती है। कयामत से कयामत तक की तरह किसी ठाकुर की शान आड़े नहीं आ रही थी। दिल चाहता है कि तरह कोई पैसे के दम पर ज़िंदगी में ऐश नहीं कर रहा था। लेकिन यहां जैसा था, जो भी था के आधार पर किरदार कहानी को बड़ा कर रहे थे।

एयरहोस्टेस लड़की की मैचिंग एक ढीले ढाले नॉन स्मार्ट से गुजराती युवक से हो सकती थी। लड़का और उसके दोस्तों का आत्मविश्वास एक ऐसी कहानी को बुनता है कि हैरान होते होते वो लड़की यकीन करने लगती है। यकीन करते करते गुजराती युवक से प्यार करने लगती है। जाने तू की पृष्टभूमि में भी मां बाप हैं, पुलिस हैं, दोस्तों की हैसियत में फर्क नहीं है। राजस्थानी राजपूती शान मौजूद है लेकिन बचे खुचे अवशेष के रुप में जो अब मज़ाक के पात्र है। आमिर साब का भांजा उसी तरह तरोताज़ा लगता है जैसा कभी मामू लगा करते थे। अब तो आमिर के सर से विषुवत रेखा गुजर रही है या कर्क रेखा कोई भूगोल का मास्टर ही जानता होगा। हां तो कह रहा था कि इस कहानी में पृष्ठभूमि हावी नहीं है। बस चार दोस्तों के बीच भावनात्मक उतार चढ़ाव का खेल चलता रहता है। रिश्तों का बनना और टूटना बहुत सामान्य तरीके से घट रहा है। जैसा कि अब होने लगा है। ब्रेक अप अब एक स्वीकार्य परंपरा है। इसके लिए मारपीट या अदालत का चक्कर नहीं लगता बल्कि भाजेजान की नई महबूबा आराम से उन्हें विदा कर देती है ताकि वे अपनी पुरानी दोस्त के महबूब बन सकें। एक विधवा मां कुर्सी पर टांग पसारे सौंदर्य शास्त्र पर लिखी किताब पढ़ रही है। विधवा मां की ज़िंदगी रूदन की नहीं है। बल्कि वो भी नियति के फैसले को सामान्य रुप से स्वीकार कर ज़िंदगी को जी रही है। भांजेजान अपनी ग़रीबी या सामान्य परिवार की कुंठाओं से नहीं दबे हैं। वो अपनी अमीर दोस्त के घर आराम से आता जाता है। शराब पीता है और उसकी गाड़ी से अपने घर आ जाता है। यह कहानी उस तबके की है जहां आर्थिक अंतर कम हुआ है। मध्यम वर्ग और कुलीन वर्ग का फासला कम हुआ है।

जाने तू की कहानी अपनी जवानी की लगती है। चंद दोस्तों के बीच रिश्तों को पहचानने की कहानी है। बिल्कुल सामान्य तरीके से। मिलने के लिए कोई मां बाप से झूठ नहीं बोलता, पार्टी के खिलाफ कोई मां बाप फऱमान जारी नहीं करता। भांजेजान की मां रत्ना शाह पाठक इंतज़ार करती हैं कि कब उनका बेटा स्वीकार करेगा कि वो अपनी दोस्त को चाहता है। प्यार करता है। मां का रोल भी बदल गया है। बहुत कुछ कहती है यह फिल्म बदलते समाज के बारे में। फर्क सिर्फ इतना है कि जाने तूं या ना जाने ना।

28 comments:

anil said...

बहुत सही आपने मेरे मन की बात कह दी ....यही तो मैं कहने वाला था....हा हा...हा ..हा

अबरार अहमद said...

रवीश भाई आपको पढने के बाद इस फिल्म को देखने का मन करने लगा है। जाने क्यूं।

Rajesh Kamal said...

I have not seen this film. Actually not seen any film since long! too busy.... huh! U seem to have liked this one... will try to see if my taste matches with yours!

सतीश पंचम said...

आमिर के सर से विषुवत रेखा गुजर रही है या कर्क रेखा कोई भूगोल का मास्टर ही जानता होगा- अच्छा लगा, वैसे ईसे ठेठ देहाती में फरूई कट कहते हैं .....फरसे से फर/फरकाने के कारण.....कहा है न पुराने फैशन अक्सर लौट आते है।

abhijeet said...

भाई लोग रविश जी के साथ तो हो लिए अब जरा मेरे साथ भी आ जाओ ।

अभिजीत

मेरा पता है - www.mediadesh.blogspot.com

सजीव सारथी said...

movie is goos i agree

कुमार आलोक said...

९० के बाद बहुत कम फिल्में देखी है ..कयामत से कयामत तक १३ बार तो नही लेकिन तीन बार मोना ७० एमएम के रुपहले परदे पर मैनें भी देखा था ..कालेज में नया नया गया था ..फिल्म देखकर रोमांचित हो गया लगा मैं भी आमीर की तरह जूही की साडी को लटकाकर अपनी प्रेमिका के साथ भाग जाउं ..लेकिन ये ख्याल सिनेमा हाल तक ही चस्पा रहा घर आकर बाबूजी को देखकर प्रेम का बुखार यूं ही उतर गया ..चलिये आपने जाने तू के बारे में पोसिटिव रिस्पांस दिया ..मैं चला जाने तू देखने ....

अभिषेक ओझा said...

फ़िल्म तो हमने भी देख डाली और सहमत हूँ आपसे.

अंगूठा छाप said...

पहले फिल्मों का असर पांच या दस बरस बाद समाज पर देखने को मिलता था। आज हालात ये है कि सिनेमा से बाहर निकला दर्शक फिल्म में सराबोर निकलता है...

Pragati Mehta said...

Bahut khub likha hai aapne. Is Film men chuhia ka prem bhi dikhta hai to Aids ka dar bhi. sabse jabardast to jail men unsabon ki mulakat hai. waise RAVISH Bhai apne aaj AmarUjala men jo likha hai wo bhi mast hai....Bechara Pappu....

Pragati Mehta said...

Bahut khub likha hai aapne. Is Film men chuhia ka prem bhi dikhta hai to Aids ka dar bhi. sabse jabardast to jail men unsabon ki mulakat hai. waise RAVISH Bhai apne aaj AmarUjala men jo likha hai wo bhi mast hai....Bechara Pappu....

अंगूठा छाप said...

एक मजेदार वीडियो देखने के लिए इधर आएं - http://anguthachhapkidiary.blogspot.com/

अंगूठा छाप said...

अब तो रवीश का फोटू ‘पासपोर्ट साइज’ नहीं रहा भइया!

अब शीर्षक होना चाहिए ...‘हाफ साइज’!

मधुकर राजपूत said...

फिल्म समीक्षक बनने की ख्वाहिश हिलोरे मार रही है,,और एक बात नए फोटो में नए और फैशन के अनुकूल लग रहे हो।

shekhar said...

wow, it's the first time you don't pretend to be intelligent, true to the spirit of qasba.
While I didn't like the movie, I agree with the things you said. Nothing is wrong with it does not necessarily mean it is good.

उमाशंकर सिंह said...

रवीश की कही बातों में इक बात जोड़ रहा हूं... रगों में जवान खून दौड़ने के बाद भी हीरो का अंहिसा के प्रति आग्रह। पिता और काली पोशाक वाला सपना बेशक उसे तंग करता हो लेकिन मां का असर कायम रहता है. वो हाथ उठाता है तो अपनी मर्दानगी का सबूत देने के लिए नहीं बल्कि अबला समझ कर महिला पर हाथ उठा देने वाले अमीर शख़्स को ये बताने के लिए कि वो कुछ भी कर बेफिक्र नहीं रह सकता।
शुक्रिया

डा० अमर कुमार said...

अब तो रवीश का फोटू ‘पासपोर्ट साइज’ नहीं रहा भइया!

अब शीर्षक होना चाहिए ...‘हाफ साइज’!




मैं भी अंगूठा छाप के साथ ही हूँ
जिनके लिये देश के सारे नेता हलाकान हैं

राजीव कुमार said...

रवीश जी...जाने तू, तो अभी तक नहीं देखी है, लेकिन मोना सिनेमा में स्कूल से गच्चा देकर कितनी ही फ़िल्मों को देखा है। मोना, एलिफिस्टन, रिजेन्ट, उमा, चाणक्य, अप्सरा, अशोक....से कई खट्टी-मीठी यादें जुड़ी है। आज भी पटना जाता हूं तो इन हॉलों को देखकर फिर से कॉलेज में पढ़ने को जी करने लगता है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अच्छी जानकारी.
अजित जी के ब्लॉग से
आपके परिचित हुआ.
===================
डा.चन्द्रकुमार जैन

prashant said...

kya likh rahe ho yaar itne bade patrkaar hokar.ham to aapko rajnaitik &samajik jankarion ke lie padhte hain.

सुशील राघव said...

green room me aapka photo achchha lag raha hai.

गुलजारबाग said...

एक फिल्म को कितने तलों से देखा जा सकता है या उसके कितने आयामों के बारे में लिखा जा सकता है, यह बात आपसे सीखी जानी चाहिए। Žलॉग और अखबार के दोनों लेखों में एक ही फिल्म के दो अलग आयामों पर चर्चा की गई है। बदलते सामाजिक परिवेश के दो चेहरे। संभ्रात और गैर संभ्रात नामों की कश्मकश। स्वीकार्य भाव की सहजता। निश्चित तौर पर आप बधाई के पात्र है। क्योंकि आप दोनों को देख पाएं और उसे व्यक्त भी कर पाएं।
आमतौर पर हम ऐसा नहीं कर पाते। बहरहाल फिल्मों को देखने और समझने का अंदाजा बेहद संजीदा और तारीफ-ए-काबिल है। समग्रता के सामाजिक चश्मे से फिल्म देखने पर जो राय उभर का सामने आई है वह बेहद सौय है। चौंका देने वाली भी है। फिल्म देखते वक्त भी मैं इन बातों पर गौर नहीं कर सका था। जाने तू या जाने ना जैसी फिल्म पर आपकी राय जानने के बाद यही लगा कि आप दूसरी फिल्मों के बारे में भी लिखें तो हमारे जैसे लोगों को लिए बेहतर रहेगा।
दरअसल मैं आपको राय नहीं दे रहा हूं, देने की स्थिति में हूं भी नहीं, बस एक गुजारिश है। क्योंकि इसी बहाने हमें भी फिल्म को नए और बेहतर तल से जानने और समझने का मौका मिल सकता है। और हां ...ई...पप्पू कांट डांस जैसे लेख...कहना तो नहीं चाहिए पर थोड़ा दमदार और होता तो मजा आ जाता भइया।

शुक्रिया

गुलजारबाग said...
This comment has been removed by the author.
SUNIL DOGRA जालि‍म said...

आज ब्लॉग पर नहीं आप पर टिप्पणी करूँगा, सचमुच आपको एंकरिंग करते हुए देखा तो लगा की आप सचमुच कमाल हैं, सचमुच सारा समय आपकी तारीफ में गुजरा, अगर मिडिया अवार्ड निष्पक्ष होते होंगे तो इस साल के बेस्ट एंकर आप ही होंगे...

Pawan Nara said...

ravish ji rishte badl rahae hai, ish baat ka to dar hai . HUM par
MAI havi honae laga hai. tabhi to film mae baap ki himat nahi hoti ki vo bate ke kamre mae ja kar dekh sake ki waha kaya ho raha hai. aur ishi layae hum maa baap sae door hotae ja rahe hai.shyad girlfriend hi eak bahana rah gaya hai apas mae baat karne ka........... shyad ishi bahane bate sae baat ho jaye

SUDHIR KUMAR SINGH said...

वाह रवीशजी, दलित और राजनीति से जुड़े लेखों की कड़ी में ये फिल्मी समीक्षा...बेहद अच्छा लगा पढ़कर। वो जो आपने आमिर के सिर से गुज़रनेवाली रेखा के बारे में लिखा है, भूगोल के मास्टर का तो पता नहीं, बाक़ी लोग उन्हें मांग वाला गंजा कह सकते हैं। शुक्रिया

ashu said...

रवीश जी इन तमाम चूतियों और चाटुकारों में माननीय उमाशंकर जी ही एकमात्र ऐसे शख्स हैं जिन्होने इस फिल्म की कहानी को बखूबी समझा है....फिल्म देखने का ये मतलब नहीं कि उसे बिना किसी बात के किसी पगलाए विद्वान की तरह बेजा कमेंट दें...अरे मेहनत से बनाई फिल्म की कुछ इज्जत देते हुए इसे सिनेमाघर में ही छोड़ एं तो कितना अच्छा हो...बहस करने के लिए काफी कुछ और है हमारे पास...और रवीश जी ब्लॉग पर इन तुच्ची फिल्मो का जिक्र ना ही करें तो अच्छा हो....शुभचिंतक

कुलवंत हैप्पी said...

कस्बा को पढ़ने के तमन्ना बड़े समय से थी, लेकिन मौका मिल गया, और पता चल गया कि आखिर ब्लॉग की दुनिया में भी कस्बा क्यों छाया है है, भारत की जान जैसे कस्बे हैं, वैसे ही ब्लॉग दुनिया की जान है क्स्बा..