दर्शक की यादों में सिनेमा

(दोस्तों, जब मैं यह लेख लिख रहा था तो झपकी आ रही थी। तभी फोन की एक घंटी बजी कि अहमदाबाद में धमाका हुआ है। जल्दी में पोस्ट किया और अगले मिनट एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गया। इसीलिए कई त्रुटियां और बातें रह गईं थी जिन्हें अब जोड़ा जा चुका है। तीसरी मंज़िल की जगह तीसरी कसम आ गई है और बहुत सारे नये प्रसंग भी। एक बार फिर से पढ़ सकते

जो ठीक ठीक याद है उसके मुताबिक पहली बार सिनेमा बाबूजी के साथ ही देखा था। स्कूटर पर आगे खड़ा होकर गया था। पीछे मां बैठी थी। फिल्म का नाम था दंगल। उसके बाद दो कलियां देखी। पटना के पर्ल सिनेमा से लौटते वक्त भारी बारिश हो रही थी। हम सब रिक्शे से लौट रहे थे। तब बारिश में भींगने से कोई घबराता नहीं था। हम सब भींगते जा रहे थे। मां को लगता था कि बारिश में भींगने से घमौरियां ठीक हो जाती हैं। तो वो खुश थीं। हम सब खुश थे। बीस रुपये से भी कम में चार लोग सिनेमा देख कर लौट रहे थे। ये वो दौर था जब सिनेमा हाल में आने वाली फिल्मों के ट्रेलर के लिए तस्वीरों का इस्तमाल होता था। चार पांच किस्म की तस्वीरों को देख देख कर दर्शक कहानी का अंदाज़ा लगाता था। इतना ही अगली शो के लिए इंतज़ार करने वाले कई दर्शक दरवाज़े पर कान लगाकर हॉल से बाहर धमकती आवाज़ सुना करते थे। अपने भीतर सिनेमा का पूरा माहौल बन जाता था।

इन सब के बीच सिनेमा देखने का अनुभव बिहार कॉपरेटिव सोसायटी में दिखाई जाने वाली फिल्मों से भी हुआ। प्रोजेक्टर पर राजेंद्र कुमार की फिल्म गंवार पच्चीसों बार देखी। प्राण का लेग पीस खाने के अंदाज़ से ही प्रभावित हो कर चिकन खाते वक्त लेग पीस का मुरीद हो गया। खाते वक्त अजीब सी ताकत का एहसास होता था। लगता था कि मुर्गे के इसी हिस्से में सब कुछ है। उल्टी टांग को चबाते जाओ और उल्टा टांग कर सामने वाले की मरम्मत करते जाओ। हिंदी सिनेमा के कई हिस्सों ने खाने के अंदाज़ को काफी प्रभावित किया है। फिल्में न होती तो मां के हाथ का बना खाना इतना बड़ा सार्वजनिक प्रसंग न बनता। उसका रोमांटिकरण नहीं होता। आइसक्रीम खाने का रोमांटिकरण भी फिल्मों से समाज में आया है। नहीं तो किसी विष्णुपुराण में कहां लिखा है कि इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाने जाना है। हमारी उम्र इतनी ही थी कि फर्क करना मुश्किल होता था कि कौन सुपरस्टार है और कौन नहीं। धीरे धीरे पता चलता गया कि दूरदर्शन पर दिखाई गई अजनबी फिल्म के राजेश खन्ना नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन स्टार हैं। नाई भी मेरे बाल कुछ बच्चन मार्का काट दिया करता था। कान पर जब भी कुछ बाल छोड़ता ताकि कान बच्चन की तरह ढंके रहे, एक बार वसीम मियां से झगड़ा हो ही जाता था। वसीम स्मार्ट हेयर कट नाम था उनकी दुकान का। दिन भर अपने दोनों बेटों को गरियाते रहते थे कि काम नहीं करता, फिल्में देखता रहता है लेकिन मेरे कान पर बाल इसलिए छोड़ देते थे कि बच्चन के भी कान ढंके होते थे।

हमारे परिवार के एक सदस्य सिनेमची थे। वो एक कॉपी में देखी गई फिल्मों को क्रमवार लिखते थे। उनके हाथ में आया एक एक पैसा बॉलीवु़ड के कई स्टारों की आर्थिक समृद्धि के लिए समर्पित हो गया। इतना ही नहीं वे कॉपी के दूसरे हिस्से में आने वाली फिल्मों के नाम भी लिखा करते थे। इसके लिए वे सार्वजनिक प्रताड़ित भी किये जाते थे कि फिल्म ही देखते हैं, पढ़ते लिखते नहीं। मेरे मोहल्ले में शिवा नाम का एक लड़का था। वो जब भी सिनेमा देख कर आता तो बकायदा अभिनय कर कहानी सुनाता। हम सब नहीं देखने वाले दर्शक पूरे रोमांच के साथ शिवा से फिल्म की कहानी सुना करते थे। शिवा कहता..जानते हो..हेमा को प्राण हेलिकॉप्टर से बांध देता है। म्यूज़िक चलता है..ढैन ढैन...ढन....ढन। तभी धर्मेंद आ जाता है...शिवा की आंखे घूमने लगतीं, मुंह बिदक चुके होते और दांत खिसक चुके होते थे। पूरी कोशिश होती कि पर्दे की कहानी को साक्षात अपने चेहरे पर उतार कर वंचित दर्शकों के सीने में उतार दें। शिवा के भीतर एक प्रोजेक्टर चलने लगता था। फिल्मों के बारे में जानने का एक जरिया मायापुरी नाम की प्रतीका भी था। मायापुरी के स्ट्रीप हों या बेकार से लेख, इसके बावजूद इस पत्रिका ने बॉलीवुड को घर घऱ में पहुंचाया। मायापुरी ही तो थी जो सफर में बॉलीवुड को लेकर चलती थी। ट्रेन में बैठे हों और मायापुरी पढ़ रहे हों। राजेश खन्ना और डिम्पल की प्रेम कहानी और हेमा का जलना। अमिताभ और रेखा के बीच धधकते शोले और जया का जलना। ट्रेन गाती हुई चली जाती थी। हिंदी फिल्मों के गाने।

लेकिन शिवा हमारे लिए असली ट्रेलर का काम करता। जानी दुश्मन की कहानी उसने इस अंदाज़ में बताई कि डर से देखने भी नहीं गया। यह वो दौर था जब इंदिरा गांधी की हत्या होनी थी और अमिताभ बच्चन का जादू अभी और चलना था। कूली की शूंटिग में घायल होने के बाद अमिताभ वापस आ चुके थे। दर्शकों की प्रार्थना स्वीकार हो चुकी थी। निर्देशक ने भी पुनीत इस्सर के उस घूंसे को पर्दे पर फ्रीज़ कर दिया जिसके कारण अमिताभ को चोट लगी थी। आंखें फाड़ कर देखता रह गया। एक घूंसा और मेरा सुपर स्टार। उफ।

मगर इससे पहले एक शौक पूरा करना था। मुकद्दर का सिंकदर का प्रचार करना था। ऑटो में बैठकर बोलने का शौक। भाइयों और बहनों..अररर...अर...आ गया आ गया..मुकद्दर का सिंकदर। पटना में पहली बार...राजधानी का गौरव...अशोक सिनेमा...पूरे परिवार के साथ देखना न भूलें...रोजाना चार शो। बहुत मजा आया था इस शौक को पूरा कर। किसी को पता भी नहीं चला और काम भी हो गया। किसी दोपहर को जब फिल्मों की प्रचार गाड़ी दनदनाती गुज़रती तो लाउडस्पीकर की आवाज़ बहुत देर तक गूंजती रहती। क्रांति जब मोना सिनेमा में लगी थी तब खबर आई थी हॉल में धमाका हो गया है। दो रंगदार टिकट न मिलने पर मारा पीटी कर बैठे थे।

पीवीआर से पहले के दौर में बालीबुड ने सिनेमा के दर्शकों में एक विशिष्ठ वर्ग पैदा किया था। प्रथम दिन पहला शो देखने वाले दर्शकों का वर्ग। लाठी खाकर रातों को जागर टिकट ले लेना। कई लोग इसलिए भी करते थे ताकि पहला शो देखने का रिकार्ड बना रहे और न देख पायें तो सिनेमा ही नहीं देखते थे। इगो में। चार बजे सुबह उठ कर चला गया था अग्निपथ का टिकट लेने। लाइन में लगे रहे। अचानक लाठी चल गई। एक लाठी लगी भी। चप्पल कहीं छूट गया। कमीज़ का बटन टूट गया। लेकिन जिस अमीर दोस्त को पकड़ लाया था टिकट के पैसे देने वो लाठी खाने के बाद भी डटा रहा। पहले दिन पहला शो का टिकट लेने के लिए। टिकट मिला भी। मज़ा आया था। अग्निपथ अग्निपथ..।

एशियाड के बाद से सिनेमा की सार्वजनिक दुनिया में बंटवारा होने लगा। रंगीन टीवी ने बहुत कुछ बदला। रविवार को सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था। सारे पड़ोसी घर में जमा हो जाते थे। उस दौर में देवानद की बनारसी बाबू, राजेश खन्ना की अजनबी दिखाई जाती थी। आरजू तो टीवी पर काफी देखी गई थी। बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है। नवरंग फिल्म डीडी पर आ रही थी। मोहल्ले की पच्चीस तीस लड़के-लड़कियां टीवी देख रही थीं। सब के सब रो रही थीं। अब रोती हैं या नहीं मालूम नहीं लेकिन सिनेमा एक मौका देता ही है आपके भीतर की कहानी को पर्दे की कहानी से जोड़कर बाहर लाने का। हम सब फिल्मों से जुड़ रहे थे। बालीवुड का देशव्यापी प्रसार अभियान सफल हो रहा था। नरसिंहा राव के आने से पहले और बाबरी मस्जिद के गिरने से पहले तक सिनेमा एक रोमांचकारी अनुभव हुआ करता था। कयामत से कयामत तक हो या अजनबी कौन हो तुम या फिर नदिया के पार जैसी फिल्मों का दौर अभी बाकी था। लव स्टोरी,रॉकी और बेताब आकर चली गई थी। स्टार पुत्रों की कहानी उस दौर में भी लिखी गई। आज के पत्रकार भी लिखते हैं। स्टार पोतों की कहानी।

उसी दौर में एक छठ पूजा में कर्ज का वो गाना रात भर गूंजता रहा। आज भी याद है मेरे मोहल्ले का लाउडस्पीकर बंद होता तो कहीं दूर से आवाज़ आने लगती थी..ओम शांति ओम। हे तुमने कभी किसी को दिल दिया है...। इसी वक्त एक डिस्को शर्ट का चलन भी आ गया था। डिस्को शर्ट काफी चमकता था। पीले रंग का काफी पोपुलर हुआ था। हीरो में जैकी श्राफ के पीले शर्ट के पोपुलर होने से पहले। हीरो के बाद से तो न जाने कितने लोगों ने काली पैंट और पीली शर्ट बनवाई थी। दर्ज़ियों के होर्डिंग बदल गए थे। जैकी की तस्वीर आ गई थी।

यह तमाम बातें अस्सी के शुरूआती साल से लेकर १९९० तक की हैं। शायद समय का क्रम ठीक नहीं है। लेकिन बेतरतीब ही सही सिनेमा को याद करने पर बहुत कुछ निकलने लगता है। जब भी बंदिनी का वो गाना दूरदर्शन पर देखता..ओरे मांझी..गाने में हाजीपुर का पहलेजा घाट दिख जाता। हम भी मोतिहारी से हाजीपुर आते फिर हाजीपुर के पहलेजा घाट में पानी के जहाज पर सवार होकर पटना आते थे। स्टीमर पटना के दूजरा में उतरता था। कोई बच्चा बाबू थे जिनका स्टीमर चलता था। पहली बार इसी स्टीमर पर देखा था कि अगले हिस्से में कारें हैं और पीछले हिस्से में लोग। बाबूजी के साथ ऑमलेट और उस पर गोलमिर्च छिड़क कर खाने का अनुभव यहीं हुआ था। बहरहाल मैं सिनेमा को याद कर रहा हूं।

एक फिल्म और आई थी। जिसे मैं नहीं देख सका। गर्भ ज्ञान। पटना में जब यह फिल्म लगी तो काफी चर्चा हुई थी। तब पता नहीं चल पाया था कि यह वयस्कों के लिए है या ज्ञान के प्रसार के लिए। केवल वयस्कों के लिए का लेबल तो आज भी होता होगा। तीसरी कसम ने तो एक अलग पहचान बना दी थी। रेणु की कहानी थी और बिहार। तब नहीं पता था कि बिहार एक अतिपिछड़ा राज्य है। राज्य से बाहर लोग बिहारी के रूप में पहचाने जाते हैं। दूसरे राज्यों से भगाये जाते हैं। यह सब नहीं मालूम था। शायद राजकपूर ने बहुत ध्यान से देखा होगा बंबई में काम के लिए आने वाले बिहारी मज़दूरों को। उनकी सादगी राजकपूर को तीसरी कसम में ईश कहने के लिए मजबूर करती होगी...ईश..लगता था कि वाह इस हिंदुस्तान के हम भी हिस्सा हैं। बिहार की पृष्ठभूमि पर भले ही कम फिल्में बनी हों लेकिन एक तरह की मासूमियत हुआ करती थी। शूल और गंगा जल ने बिहार को वो चेहरा दिखाया जो बाद में राजनीतिक परिवर्तन का हिस्सा बना। तब तक बिहार भी तो बहुत बदल गया था। बाकी की यादें बाद में।

23 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

वाह! मैं तो देखकर हतप्रभ रह गया की आपने कितने रोचक और आकर्षक ढंग से लेख लिखा है. आपकी कलम को सलाम और सलाम आपकी भावना को.

Rajesh Kamal said...

मैंने पहली फ़िल्म जो सिनेमा हॉल में देखी थी, वो शायद भाभी थी। उसका गाना "चल उड़ जा रे पंछी" आज भी उतना ही रोमांचित करता है। तब मैं बहुत छोटा हुआ करता था। फिर "मुकद्दर का सिकंदर" की याद है। पूरी फ़िल्म जो याद है, वो थी "गाँधी"! स्कूल की तरफ़ से गाँधी-जयंती के दिन हमें हॉल में ले जाया गया था।

घर में सिनेमा की मनाही थी। बोर्ड की परीक्षा के बाद दोस्तों के कहने पर पिताजी से फ़िल्म देखने जाने की इजाजत मांगी। डर रहा था, पर डर खोखला निकला। इजाजत मिल गयी। फिर फ़िल्म देखी "संगम"।
आपने पुरानी बातें याद दिला दी।

sushant jha said...

रवीश जी, शायद दिल्ली की लड़की की धारावाहिक किस्त और जनसत्ता से प्रेम के बाद ये आपका लिखा ऐसा पोस्ट है जो मुझे काफी पसंद आया। बाद बाकी, तो आपने कई बार हमें आश्रम चौक पर ही फंसा दिया था! बधाई स्वीकार करें। आपने बेदर्दी बालमा तुझे मेरा मन...की याद आपने फिर से दिला दी। मैनें ये फिल्म मैने तब देखी थी जब वो काठमांडू से हरेक शनिवार को प्रसारित होती थी। दरभंगा का टॉवर कमजोर था और पटना पकड़ता नहीं था। मेरी देखी हुई पहली फिल्म सौतन थी जिसका गाना..मैं तेरी छोटी बहना हूं..मेरा ऑल टाईम फेवरेट है। बाद में प्रेमगीत टीवी पर देखा और उसके अमर गीत को होंठो से छूता रहा। मैं जवान होने को था तो सलमान खान पहली वार पर्दे पर आया..और मैं अगले २-३ साल तक भाग्यश्री का दीवाना रहा जब तक हाईस्कूल न चला गया। बहरहाल, ये पोस्ट आपका ब्लॉकबस्टर है।

anil said...
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राजीव कुमार said...

पहली फ़िल्म लव स्टोरी थी...पटना का ही कोई हॉल रहा होगा....ठीक से याद नहीं है। उन दिनों फ़िल्मों को परखने की कसौटी संवाद, अभिनय, निर्देशन नहीं होता था......फिल्म में "मार" (हिंसा) है कि नहीं यहीं फिल्मों का पैमाना हुआ करता था। हाँ, इंटरवल में कोका कोला का लोभ भी फ़िल्म देखने को प्रेरित करता था। बाकी बहुत बढ़िया लिखा गया है...समाज से फिल्मों का वास्तविक सरोकार और नज़दीक से जानने को मिला। हाँ, स्कूल से "भागकर" पहली बार नाकाबंदी देखने गया था...चाचाजी ने देख लिया। घर पहुंचने पर मेरी भी नाकाबंदी कर दी गई थी।

anil said...

तीसरी मंजिल की जगह तीसरी कसम होना चाहिए....................

anil said...

मैं भी लखनऊ में कई बार स्कूल गोल कर दोस्तों के साथ फिल्म और कई बार सिर्फ सिनेमा हाल में फिल्मों के पोस्टर ही देखने पहुँच गया ....एक बार स्कूल गोल कर राम लखन देखी थी जिसकी कीमत घर लौट कर चुकानी पड़ी थी ....
....अब तक की बेहतरीन पोस्ट....
ये चाटुकारिता नही दिल की बात है...........

Rajesh Roshan said...

शिवा जैसे लोग हर जगह रहते थे क्या.... हमारे यहाँ का "शिवा" तो हम से ५० पैसे लेता भी था....:) तब कहानी सुनाता..... मेरे पिताजी ने हीना के बाद फ़िल्म देखनी छोड़ दी, कहते हैं राज कपूर रहा नही फ़िल्म कौन बनाएगा...?

Rajesh Roshan said...

so finaly u have lifted the comment approval....
बंदिशे पसंद नही हैं मुझे.... ना देना... ना लेना

Aadarsh Rathore said...

बिहार की परिस्थिति कैसी भी रही हो या जैसी भी है , सिनेमा के लिहाज से से दशा अच्छी ही थी. हिमाचल जहाँ से मैं सम्बनध रखता हू, कुल मिलकर १० के करीब थियेटर होंगे. उनमें भी ४-५ पर ही नयी फिल्में दिखती हैं. मेरी उमरा आज है २० वर्ष और आज से १० साल पहले तकरीबन मैने फिल्म देखी थी "करीब". मेरे कस्बे जोगिंदर नगर से २६० किलो मीटर दूर शिमला में. तब मैंन पहले बार पर्दे पर बड़े बड़े नायक नायिकाओं को देखता रह गया, और फिल्म देखने के बजाय मेरा ध्यान पीछे से आती रोशनी की धाराओं पर था जो बार बार खुद पर ही लिपट लिपट कर पर्दे पर गिर रही थी.
फिल्म देखने के बाद मैं खुश था लेकिन पिता जी( जो अपने कॉलेग के समय में शिमला में अक्सर फिल्म देखते रहे होंगे) ने कहा की फिल्म बेकार है. मैं अचंभित था कि कैसे वो इस फिल्म को नापसंद कर रहे हैं. लेकिन वो मेरा उत्साह महज पहली बार देखने कि वजह से था. उसके बाद जब ३ साल पहले दिल्ली पढ़ने आया तभी से फिल्मों को निश्चित अंतराल के बाद देख पा रहा हू

Pawan Nara said...

ravish ji
pitaji ke sath kabhi "tejab" dekhi thi. "eak ,do ,teen" gana bachpan mae bahut gaya . phir na jane ghar mae kaisa mahol bana ki film dekhna khasker cinema hall me mano apradh ho. 10vi ke baad pahli film dekhi"gadar". ghar bina batai gaya tha, socha ki chupa lunga. lakin bade screen ka asar kaise chupta. raat ko sapnae mae chila raha tha "sunney deol train par chad gaya hai, utrana nahi chaiye". . vo sapane mae hi nahi asal mae bi bhut tej chila raha tha.aur meri pol khul gayi, aaj aap nae filmo ki baat ki to socha mai bhi batau aap ko.

कुमार आलोक said...

इतने शानदार अंदाज में आपने बयां किया है अफसाने का जबाब नही ..दंगल का आपने जिक्र किया बाबूजी के साथ गये थे देखने आप .. दंगल का वो गाना याद होगा आरा हिले छपरा हिले बलिया हिले ला ....और सर इस फिल्म के संगीतकार थे नदीम श्रवण । इसी फिल्म से अपने करियर का आगाज करने वाली ये जोडी बाद में हिट बनकर उभरी । पूरा पोस्ट पढते हुए बार बार गुदगुदी हो रही थी दिमाग में ..मैनें पहले भी कहा था कि आप इलमची के साथ साथ बहुत बडे फिल्मची भी है । पोस्टर और सिनेमा हाल में आलमीरा टाइप जालीदार बक्से में आनेवाली फिल्मों के ट्रेलर होते थे ..काला पत्थर फिल्म के पोस्टर में अमिताभ का मुंह फाडे वाला दृश्य बहुत दिन तक डराता रहता था जब फिल्म देखी तब जाकर डर शांत हुआ।

ग़ुस्ताख़ said...

रवीश जी सुशांत ने सही लिखा है ये पोस्ट ब्लॉक बस्टर है। लेकिन हां, तीसरी मंज़िल में संभवतः शम्मी कपूर हीरो थे, जबकि राज कपूर वाली फिल्म जिसे शैलेंद्र ने बनाया था, और रेणु जी की कहानी था, वो तीसरी क़सम थी। यह फिल्म रेणुजी की कहानी तीसरी क़सम उर्फ मारे गए गुलफाम पर आधारित है। हासांकि मैंने इस फिल्म को बाद में बीडियों के ज़रिए देखा लेकिन लाली लाली डोलिया में लाली रे दुलहिनयां और सजन रे झूठ मत बोलो के साथ बिहाीर मिट्टी की गंध ने सिनेमा के साथ अपनापन जोडा़। बहरहाल, बेहतरीव पोस्ट के लिए बधाइ स्वीकार करें।

Kaushal Kishore / Kharbhaia / Patna said...

Ravishji
Kissa kahna koi aapse sikhe.jitni dakshta se aap apne anubhawon ko jindgi aur apne Daur ke vishal phalak se jod dete hain ki lekhani aapki aur baaten hum sub ki ho jaati hain.Sahitya men kahte hain ki ras ka mahatwapurn sthan hai. aap ki lekhni aur lekh ras men bharpur bheenge hue hain.
Aap ki lekhni isi tarh ras ,rang men sarabor, jamane ke afsaane aur gamon ko sabdwadh karta rah.
aapka ek purana darshak aur naya pathak.

राकेश said...

बहुत ख़ूब. दिलचस्‍प संस्मरण. बेहतरीन विश्‍लेषण. बिहार की पृष्ठभूमि में नब्बे के बाद बनी फिल्म शूल और गंगाजल के बाद एक और फिल्म जिसका नाम आपसे छूट गया वो है 'अपहरण'. वहां कि बदलती राजनीति को अपहरण में भी देखा जा सकता है.
रविश बस जानकारी के लिए पूछ रहा हूं, क्या आपकी स्मृति में भोजपुरी फिल्में क्यों नहीं आ पायीं? क्योंकि बिहार भोजपुरी फिल्मों के निर्माण और ख़पत का एक बड़ा केन्द्र तो रहा है? मध्‍य अस्सी के दशक में जब मैं हाई स्कूल में था तब मुज़फ़्फ़रपुर के कुछ सिनेमा हॉलों में तो लगभग सालो भर कोई न कोई भोजपुरी फिल्म चल रही होती थी. 'चित्रा' और 'मिनी जवाहर' तो भोजपुरी फिल्में ही चला करती थीं. आसपास के गांवों से झूंड में नौजवान और तीज-त्यौहार के मौक़ों पर महिलाएं विशेष तौर पर 'चित्रा' (बाद में जिसका नाम 'विशाल' हो गया था) में भोजपुरी फिल्म देखने आती थीं.
संभव हो तो इस बारे में भी कुछ लिखिए. बहुत बढिया. आपकी इजाजत से आपकी इस पोस्ट को deewan@sarai.net पर डाल रहा हूं.

अभिषेक ओझा said...

मैंने सिनेमा हाल में पहली फ़िल्म देखी थी 'हम आपके हैं कौन' तो गैप का अंदाजा आप लगा ही सकते हैं. पर हाँ इन बातों को हमने खूब सुना है, हमारे घर में भी लिस्ट बनाने वाले लोग थे.

sanjay patel said...

रवीश भाई मध्यवर्गीय भारत के हमारे - आप जैसे परिवारों को हिन्दी चित्रपट ने जो किफ़ायती (सस्ता नहीं कहूँगा..सस्ता तो अब हो गया है सौ रूपये की टिकिट के बाद भी)मनोरंजन दिया है वह जैसे महीने दो तीन महीने के लिये ज़िन्दगी में जोश भर देता था.बुरा मत मानियेगा लेकिन टीवी के उदभव ने मनुष्य के सामाजिक सरोकार की धज्जी उड़ा कर रख दी. सिनेमा जाना यानी एक तरह से समाज के साथ जीवंत राब्ता बनाना होता था. फ़िल्म शुरू होने के पहले और इंटरवल में लोगों से मिलने - मिलाने के सिलसिले और उसमें होते वे ठहाके जैसे १.६० पैसे की टिकिट का पूरा ’पैसा वसूल’तामझाम रच जाता था. माता-पिता और परिवार के साथ फ़िल्म जाना पारिवारिक सौहार्द में इज़ाफ़ा करने का साज़ोसामान जुटाता था. आज पीवीआरों और एडलैब्श के ए.सी.मल्टीप्लैक्सेज़ में वह बेतक़ल्लुफ़ आत्मीयता खारिज हो गई . हम सिनेमा को स्टेटस सिंबल बना बैठे हैं . सोचिये तो पीवीआर की चार सौ वाली सीट में एक परिवार के चार चलें जाएँ तो १६०० तो टिकिट में पूरे और इंटरवल में दो चार सौ का स्वल्पाहार यानी दो हज़ार पूरे.इस सब के बाद भी वह अपनापन कहाँ जो लाइन में लगकर टिकिट ख़रीदने में आता था. टिकिट खिड़की के जगलें में ऐसे क़ैद हो जाते थे जैसे जंगल से ही छूट कर आए हैं ...टिकिट ख़रीदना भी एक पहलवानी का शऊर मांगता था.

बीच में फ़िल्म्स डिवीज़न की भेंट...ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जेम्स कैलेहन की भारत यात्रा..पालम पर प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा स्वागत,दिल्ली की सड़को पर हाथ हिलाते जाते ब्रितानी वज़ीरे-आज़म..सूखा ..बिहार में फ़िर सूखा....बंगाल में बाढ़....फ़िल्म फ़ेयर में नमूदार होते अभिनेता,अभिनेत्रियाँ....
रवीश भाई...रूकता हूँ....क्या क्या याद कर आँख भीग रही है....पी.सी.का मॉनीटर नहीं दिख रहा...फ़िर कभी.अल्ला हाफ़िज़.

Priya Manu said...

Hi Ravish Ji,
This particular comment is not specifically for any particular post but is aimed at conveying you how I feel about your news items at NDTV . To enlist a few, i must congratulate you on your coverage on Nuclear Deal- around 6-8 months back , then there was your comment at some award function- regarding grabbing of TRP by channels devoted to sensationalism - then recently after Ahmedabad blasts - how could i ignore the way you said "i have selected this solitary corner for reporting because what I am about to say will severely hurt the morale of the injured and common people around", so very true. i know sir, things are tough - and other means and ways appear tempting and inviting but please- stay the way you are - and keep on reporting the way you have since so many days .Bestof luck for your bright future- because i can see a meaningful journalist in you.Thanks

MUKHIYA JEE said...

एक बेहतरीन प्रस्तुति ! पटना में हमारे "डेरा" के बगल में ही वैशाली सिनेमा हॉल हुआ करता था ! वहां हमने बेदर्दी बलमा .............और फिर टी वी पर जंगली इत्यादी देखी थी ! परीक्षा के समय में सिर्फ़ चित्रहार के समय ही टी वी देखने का परमिशन था !

Sarvesh said...

रविशजी,
आपने तो सारे पाठको को बचपन कि तरफ झांकने पर मजबुर कर दिया है. याद नही है कि कौन सिनेम पहले देखा "मै तुलसी तेरे आंगन की या उपकार" जो कि सबके तरह बाबुजी हि लेकर गये थे. डालमियानगर के डिलाइट मे सिनेमा देखने मे मुझे बहुत आनंद आता था. बाद मे आर आई टी के नाम पर बिना टिकट कटाये हिरो कि तरह हाल मे घुस कर सिनेमा देखना और गाने को रिवाइंड करा के देखना बहुत मजा आता था (भाई पैसा दे देते थे हमलोग क्योंकि टिकट सिट पर लाकर देता था). अब क्या बताया जाये, महंगे मल्टिप्लेक्स के चक्कर मे डि वि डि पर सिनेमा देखने मे वो आनंद नहीं है.
बहुत बढिया विषय चुना आपने.
-सर्वेश

प्रभाकर पाण्डेय said...

घर के किसी संबंधी के साथ कभी कोईफिल्म नहीं देखी पर हाँ बाद में पढ़ने के लिए मिलनेवाले पैसों से बहुत सारी फिल्में देखी।

रोचक शैली में लिखा गया सामाजिक, सुंदर और सटीक लेख। पहली बार आपको पढ़ा बहुत ही अच्छा लगा।

chavanni chap said...

kya is lekh ko chavanni par dala ja sakta hai?aap ki anumati chahiye.chavanni par hindi talkies series aarambh hua hai.wahan ise bhi hona chahiye.

shourya said...

ravish ji , aap ki kalm ko salam . jansatta, fir belmund jyotish aur aab yeh wah sahab wah