खोया खोया चांद

प्रेमी चांद पर बहुत भरोसा करते हैं। कभी चांद को महबूब तो कभी महबूब को चांद बना देते हैं। पता नहीं यह रिश्ता कब से बनता चला आ रहा है। इस दुनिया में प्रेमियों ने अपनी अभिव्यक्तियों की लंबी विरासत छोड़ी है। जिसमें चांद स्थायी भाव से मौजूद है। कोई बात नहीं कर रहा हो तो हाल-ए- दिल सुनने सुनाने के लिए चांद है। वो कल्पना भी अजब की रही होगी की महबूब चांद को देख महबूबा को याद किया करते होंगे। पता नहीं दुनिया के किस पहले प्रेमी ने सबसे पहले चांद में अपनी महबूबा का दीदार किया। किसने सबसे पहले देखा कि चांद देख रहा है उसके प्रेम परिणय को।

बालीवुड का एक गाना बहुत दिनों से कान में बज रहा है। मैंने पूछा चांद से कि देखा है कहीं..मेरे प्यार सा हसीं..चांद ने कहा नहीं..नहीं। यानी चांद गवाह भी है। वो सभी प्रेमियों को देख रहा है। तुलना कर रहा है कि किसकी महबूबा अच्छी है। और किसकी सबसे अच्छी। पता नहीं इस प्रेम प्रसंग में चांद मामा कैसे बन जाता है। जब इनके बच्चे यह गाने लगते हैं कि चंदा मामा से प्यारा...मेरा...। क्या चांद महबूबा का भाई है? क्या प्रेमी महबूबा के भाई से हाल-ए-दिल कहते हैं? पता नहीं लेकिन चांद का भाव स्थायी है। अनंत है।

सूरज में कितनी ऊर्जा है। मगर वो प्रेम का प्रतीक नहीं है। क्या प्रेम में ऊर्जा नहीं चाहिए? चांदनी की शीतलता प्रेम को किस मुकाम पर ले जाती है? तमाम कवियों ने चांद को ही लेकर क्यों लिखा? कुछ गीतकारों ने जाड़े की धूप में प्रेम को बेहतर माना है लेकिन सूरज से रिश्ता जोड़ना भूल गए। धूप के साथ छांव का भी ज़िक्र कर देते हैं। यानी प्रेम में सूरज अस्थायी है। चांदनी का कोई विकल्प नहीं। कई कवियों की कल्पना में प्रेमी चांदनी रात में नहाने भी लगते हैं। पानी से नहीं, चांदनी से। अजीब है चांद।हद तो तब हो जाती है जब प्रेमी चांद से ही नाराज़ हो जाते हैं कि वह खोया खोया क्यों हैं? क्यों नहीं उनकी तरफ देख रहा है? प्रेमी अपने एकांत में चांद को भी स्थायी मान लेते हैं। चांद है तभी एकांत है। चांद पर इतना भरोसा कैसे बना, कृपया मुझे बताइये। कोई शोध कीजिए। कोई किताब लाइये। मुझे चांद चाहिए।

3 comments:

राजीव कुमार said...

भरोसे का कारण है चांद का मामा होना। मुझे ऐसा लगता है। और प्यार में उर्जा से ज़्यादा शीतलता की ज़रूरत होती है।

saharsh said...

qasba me aate hi yah pata chal jata hai ki chand ke mohpash se aap bhi achhute nahi hain. Fir chand aur chandni par itnee uljhan kyon. Chand to raat ka raja hai. Jab sari duniya so rahi hoti hai aur premi yugal jaag rahe hote hain, tab ek Chand hi to apni chandni se unhe sarabor kar raha hota hai. So, premiyon ka chand se anayas hi rishtaa judnaa swabhavik hai. Cinema aur Sahitya jagat ne yun hi chand ko hathon-hath nahi liya, iskaa asar gahraa hai. Chand sabka dulara hai. Chand prem ka pratik hai aur Prem par hi to duniya tiki hai. Suraj srishti ki es maya ka sutradhar hai, bina uske Chand ka kya wajood. Suraj chand ka poorak hai.

Santosh Joshi said...

Saharsh में आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ. आपने जिस तरह से इस अन्तेर्विरोध को समझाया है अच्छा लगा .