बिजली नहीं ये बैटरी क्रांति है

बरेली से तीस किमी दूर एक गाँव से एक दर्शक मित्र का फ़ोन आया था । पहली बार बात कर काफी उत्साहित हो गए तो मुझे लगा कि नार्मल करने के लिए उनकी बात को किसी और दिशा में मोड़ दूँ । गाँव में मोबाइल की दुकान है उनकी । बताने लगे कि बारह वोल्ट की बैटरी से हम टीवी चला कर प्राइम टाइम देखते हैं क्योंकि गाँव में बिजली नहीं आती । जब मैंने पूछा कि ये कैसे करते हैं तो अतुल जी बताने लगे कि हमने डिश टीवी के सेट टाप बाक्स में पचास रुपये में अलग से एक प्लेट जुड़वा ली है । इसको हम बारह वोल्ट की बैटरी से जोड़ देते हैं तो यह बैटरी के डीसी को एसी में बदल कर सेट टाप बाक्स को आन कर देता है । एक बारह वोल्ट की बैटरी से ब्लैक एंड व्हाइट टीवी चल जाता है । सिर्फ टाटा स्काई के सेट टाप बाक्स में यह नहीं हो पाता है । यह प्रसंग अपनी तारीफ़ के लिए नहीं लिख रहा हूँ । जानने के लिए कि लोग गाँव में टीवी कैसे देख रहे हैं । अतुल जी ने बताया कि छह सौ रुपये में आल्टो कार की बैटरी के आधे आकार की बैटरी लोकल बन जाती है । इसमें कानपुर के बने प्लेट डलवा लीजिये जो अच्छे माने जाते हैं । अब आगे आगे पढ़िये ।

लोकल बैटरी का बिज़नेस खूब चल रहा है । बारह वोल्ट की बैटरी तो गाँवों में लाइफ़ लाइन है । ज़्यादातर लोगों के पास ये बैटरी है । रोज़ सुबह गाँव के लोग पाँच पाँच रुपये देकर जनरेटर से चार्ज करा लेते हैं । फिर उसके ज़रिये रात को एक बल्ब, मोबाइल फ़ोन और लैप टाप चला रहे हैं । इन सब चीज़ों की ज्यादा समझ नहीं है इसलिए जो बातचीत हुई उसे जल्दी जल्दी लिख रहा हूँ । वो बता रहे थे कि एक चाइनीज़ कनवर्टर चार्जर आ रहा है जो  बैटरी के डायरेक्ट करेंट एसी में बदल कर मोबाइल चार्ज कर देता है । 

फिर फ़ोन का क्या करते हैं अतुल जी । उस पर फ़िल्म देखते हैं रवीश जी । गाँव के ज़्यादातर लोगों के पास दो से तीन हज़ार वाले चाइनीज़ फ़ोन हैं । सबके पास दो जीबी के चिप हैं । चार या आठ जीबी के चाप चाइनीज़ फ़ोन में सक्सेस नहीं है जी । दो जीबी के चिप में बीस फ़िल्में आ जाती हैं । एक फ़िल्म डेढ़ सौ एमबी में आ जाती है । अतुल जी पढ़ें लिखे नहीं है । ( अन्यथा न लें यह एक सूचना भर है ) लेकिन उनकी बातों को ध्यान से सुनिये । कहने लगे कि तीस रुपये में बीस फ़िल्म डाउनलोड करा लाते हैं सब । बुलेट राजा शुक्रवार को रिलीज़ हुई और शनिवार को इंटरनेट पर इसका हाई डेफिनेशन वीडियो आ गया । अब कोई गाँव का दुकानदार बरेली जाकर वीडियो कनवर्टर के ज़रिये अपने चिप पर डाउन लोड करा लाया । पचास रुपये में । उस चिप से उसमें हज़ारों मोबाइल में दो दो रुपये में डाउन लोड कर दिया । पचास रुपये लगाकर उसने हज़ार दो हज़ार कमा लिये । बारह वोल्ट की बैटरी से मोबाइल चार्ज किया और रात भर में बुलेट राजा फिल्म देख डाली । डीवीडी प्लेयर तो बेकार है जी । बिजली होती नहीं है न । सब मोबाइल चार्ज कर फ़िल्म देख रहे हैं ।

अच्छा ये बताइये इंटरनेट का इस्तमाल करते हैं सब । मेरे इस सवाल पर अतुल जी उछल पड़े । कहने लगे कि हर लड़के के मोबाइल में इंटरनेट कनेक्शन है । अठारह रुपये से लेकर दो सौ तक में अनलिमिटेड प्लान आता है । सबने न जी रट लिया है । जैसे इम्तहान में रट कर पास होते हैं न । अंग्रेज़ी तो आती नहीं । अब गूगल में राम लीला ग़लत भी लिखेंगे तो सही कर देता । उनको पता है जैसे मेरे को भी मालूम है कि सर्च में लिखने से आ जाता है । लड़के उसमें ज़्यादातर पोर्न देख रहे हैं । गंदी फ़िल्में देखते हैं । थ्री जी यहाँ नहीं है । टू जी कनेक्शन सस्ता भी है । डाउनलोड करके धीरे धीरे देख ही लेते हैं । फ़िल्म और ट्रिपल एक्स फ़िल्में देख रहे हैं । मोबाइल में अलग से भी डाउनलोड करा कर रखते हैं । चाइनीज़ मोबाइल का स्क्रीन भी बड़ा होता है । 

अतुल जी एक और बात बताने लगे कि अखिलेश ने जो लैंप टाप बाँटे हैं उससे कोई इंटरनेट नहीं चला रहा । सब फिल्म और पोर्न देख रहे हैं । इंटरनेट तो फ़ोन में है । लैपटॉप बिक तो रहा ही है लेकिन एक और धंधा चल पड़ा है । उनसे विंडो करप्ट हो जाता है । विंडो को ठीक करने के लिए दुकानदार तीन तीन सौ कमा रहे हैं । मामूली प्राब्लम भी आती है तो दुकानदार कह देता है कि विंडो करप्ट हो गया है । 

अतुल जी बातों बातों में नई जानकारियों के दरवाज़े खोलते रहे । ग्रामीण भारत ने बिजली का इंतज़ार छोड़ बारह वोल्ट की बैटरी को अपना लिया है । लालटेन ग़ायब है । इस बैटरी से आँगन में चाइनीज़ डिजीटल लाइट भी जल रही है । लोग न्यूज़ कम देख रहे हैं क्योंकि टाटा स्काई के सेट टाप बाक्स को डीसी में बदल कर टीवी चलाने का आइडिया कम लोगों में हैं  । मगर मोबाइल फ़ोन अब बात करने का माध्यम कम रह गया है । यह टीवी का विकल्प हो चुका है । गाँव का गाँव मोबाइल में वीडियो देख रहा है ।  अतुल जी बात कर ख़ुश हो गए । कहा कि आज इस खुशी में बढ़ती रोटी खाऊँगा यानी एक रोटी ज्यादा । शुक्रिया अतुल जी मुझे नई जानकारी देने के लिए । एक रोटी ज्यादा मैं भी खाऊँगा । 


51 comments:

Friends of Bihar said...

वाह बहोत बढ़िया तरकीब है गावं के लोग भी अब हाइटेक होते जा रहें। बिजली नहीं तो बैटरी ही सही।

Rahul Thakur said...

bilkul satik aur sahi jaankaari di hai atul ji ne..

Akhil Raj said...

क्या आपको नहीं लगता भारत का युवा अब उधमी हो रहा है
भारत की तुलना अब चाइना से नहीं जापान से करनी चाहिए
ख़ुशी होती है ऐसा सुन के अब लोग सरकार के भरोसे नहीं बैठते अपना जुगाड़ खुद कर लेते हैं और भारत में रहने का टैक्स के रूप में 5 साल में मत दान कर देते हैं

abhineet raj said...

Mujhe hairani hai ki apko ye sab baate ab pata chala.

रंजन said...

ब्लॉग पढ़ते पढ़ते ...विंडो करप्ट हो गया ... :P

निरंजन कुमार मिश्रा said...

शायद इसीलिए कहा गया है, Incredible India मुलभुत सुविधाओ से वंचित गांव का एक आदमी अपनी 'सोंचन क्षमता' के बल पर 'शहरी छोरे' को भी पीछे छोड़ रहा है| उस आदमी का खिल्ली उड़ाने कि बजाय यह सोचने की बात है कि,
''कुछ ऐसे फूल भी हैं जिन्हे मिला नही माहौल,
महक रहे हैं लेकिन जंगलो में रहते हैं|''

Kuldeep Katiyar said...

रवीश जी, समय के साथ - साथ सिर्फ शहरों ने ही तरक्की नहीं की, बल्कि गाँव में भी बहुत बदलाव आये है, ये अलग बात है की कुछ अच्छे कुछ बुरे | विडियो पायरेसी तो जैसे गाँव के लिए वरदान साबित हो रही है, वैसे भी प्रकृति का नियम है जिसका कोई तरीका नहीं होता वो राम भरोसे ही आगे बढ़ता रहता है | पर बदलाव तोह आता ही है, बस यही अटल सत्य है..,

Vibs said...

यह भी एक उभरते हुए भारत की तस्वीर है

Vibs said...

यह भी एक उभरते हुए भारत की तस्वीर है

काजल कुमार Kajal Kumar said...

1984-86 के बीच रायबरेली के पास एक गांव ऊंचाहर में था मैं. तब वहां भी बि‍जली रात को ही आती थी और वह भी कब चली जाए पता नहीं. दि‍न में आ जाए तो कि‍न्‍नरों का बधाई मॉंगना बनता था. केल्‍ट्राॅन का ब्‍लैक/व्‍हाइट पेार्टेबल टी.वी. लि‍या था जो 12 वोल्‍ट की कार-बैट्री से चलता था. टी.वी. के लि‍ए दूरदर्शन प्रसरण शाम को शुरू होकर रात 11 बजे समाप्‍त हो जाता था. तब तक केबल टीवी का ज़माना न आया था. 15 दि‍न के करीब एक चार्ज पर चल जाती थी बैटरी. फि‍र 2-1 दि‍न चार्ज करवाने में लग जाते थे.


30 साल में भी ऊपी में अभी भी कुछ नहीं बदला. कि‍तने पक्‍के परंपरावादी हैं हम लोग. I love my India.

suchak patel said...

शुक्रिया अतुल and sir जी मुझे नई जानकारी देने के लिए

Yeh padh kar accha laga kee China based instrumebnts se gaon me kuch to achcha ho raha hai...Trade deficit aur chidambaram jee ka jo hona ho woh ho...gaon ke log khush ho rahe hai to achcha hee hai :)

Anurag Shukla said...

सर मैं आपका बड़ा फैन हूँ खाफई अच्छा लगा व्लाग पढ़ के एक तो भारत के ग्रामिण इलाकों के युवाओं का फोन यूज पता चला जो शहरी युवाओं से कम नही है यानी आदमी चाहे गांव को या शहर का इंटरनेट की दुनिया में कोई पीछे नही है। आपसे एक सवाल था जिस देश में नारियों को देवा तुल्य मानने की बात कही जाती है क्या वहीं उसी देश में नारियों का वैश्याबृत्ती जैसे गलत काम में होना सही है और क्या भारत सरकार द्वारा इसे लीगल करना सही है जबकी हम नारीयें को देवी के तुल्य मानते है ?

K A.SWARUP said...

बाकी सब तो ठीक है,पर सूचना क्रांति के इस युग में पोर्न फिल्में कही यौन हिंसा और अपराध को तो नहीं बढ़ा रहे हैं ये विचारणीय है ।

Vivekanand Singh said...

रविश सर ये जुगाड़ तकनीक तो गाँव के जीवन की सच्चाई है,अतुल भाई ने आपको जो कुछ बताया उसका शाब्दिक चित्रण हमेशा की तरह लाजबाव है। बांकि आपके शब्दों में जो है सो हईये है।

sachin said...

मज़ा आ गया ये पोस्ट पढ़कर । नई और रोचक जानकारियाँ मिलीं। "जुगाड़" कहकर इनकी उद्यमता को कमतर नहीं करूँगा। ("जुगाड़" शब्द और उसके अविवेकी इस्तमाल से कुछ परहेज़ है मुझे , खैर वो कभी और ) ये विंडो करप्ट वाला नाटक बहुत पहले से कंप्यूटर वालों को करते देखा है। रेफोर्मेट करने में दिमाग और समय दोनों नहीं लगता। पाइरेटेड कॉपी का बेतलब अच्छा ख़ासा दाम ले लेते हैं । आपका डाटा गया सो अलग ! (ये आख़िरी टिपण्णी वक्तिगत कोफ़्त निकलने भर के लिए थी। घर में जब भी कंप्यूटर ख़राब होता है, तो "टेक्नीशन" आकर धलल्ढ़े से फॉर्मेट कर जाता है। दुष्ट )

Chandra Bhushan said...

sabbhe jagah e mobile kranti aa gaya hai.

Deepak said...

रवीश जी, प्राइम टाइम पर आपको एस एम एस भेजने का क्या तरीका है? हमउ भेजना चाहते हैं.

Anshuman Srivastava said...

करते हैं न आप चाहे जो कुछ भी पढ़ ले या चाहे जहाँ पढ़ ले लेकिन जो कौशल एंव गुण भारतीय होने मे हैं वैसा शायद ही किसी और मुल्क के लोगो मे होगा यह सिर्फ एक गाँव की कहानी नही हैं मेरा गाँव सिवान शहर से 6 किलोमीटर दूर टिकरी हैं जो किसी भी टाउन से कम नही हैं वहाँ पर बिजली की समस्या का बेहतरीन उपाय निकाला हैं जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता हैं

AKSHAY SHARMA said...

साहेब.. माफ़ी मांगने का भी अपना अलग मज़ा है तो लीजिये अंग्रेज़ी वाला एक्सक्यूज़-मी|
एक्सक्यूज़-मी, भारत आत्मनिर्भर हो गया है| स्वाभिमान की बात है, हम कब तक इन नेता लोग के बंगलों पर चिट्ठी, चप्पल(आजकल जूते)घिसते रहेंगे|
जनता-नेता ने एक-दूसरे को खुद के हाल पर छोड़ दिया है | ना आये बिजली, बैटरी है| कम आये एम्प्लीफायर/स्टेबलायज़र है| पानी के लिए जज़्बा है, केन्ट प्योरीफायर है|

राजस्थान से हूँ, जयपुर में बिजली आती है| कोटा, आइआइटी कोचिंग में जनरेटर है, पास ही थर्मलपावर स्टेशन है लोग संतुष्ट हैं| कटौती होनी होती है तो टाइम अखबार में छापा हुआ आता है|

24 घंटे बिजली का वादा फ़ैशन की डिमांड है और फ़ैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ना बाबा ना| हमारे गांवों में 12 वोल्ट की बैटरी नहीं है, इन्वर्टर है| सचिन वाला नहीं, लोकल मेड|
बड़ी बैटरी है डिस्टिल्ड वाटर डालने वाली पर हम बारिश के पानी का एक उपयोग यहाँ भी पाते हैं| बालिका-वधू और दिया-बाती की तरह सब उजला-उजला तो नहीं ही है पर ठीक है मैनेज हो जाता है| यू-ट्यूब, फ़ेसबुक इतने पॉपुलर नहीं है| जातिवाद और आरक्षण(प्रकाश झा वाला नहीं कर्नल बैंसला वाला)बच्चे-बच्चे को पता है| तकनीक अभी पीछे है मोदी आगे हैं|

प्रवीण पाण्डेय said...

जय हो भारत देश की, अपने मन के मन से उपाय निकाल लेते हैं।

Rahul Singh said...

हम सब के लिए एक रोटी अधिक वाली सूचना. खासकर ''एक फ़िल्म डेढ़ सौ एमबी में''

Pralhad Giri said...

वाह रविश भाई वाह । क्या दोस्ती निभाया है । फेसबुक में दोस्त थे अब आप ने सीधे अनाफ्रेण्ड कर सिर्फ हमें फालोअर के लिए नामित किया है । पहले फेसबुक पर कामेन्ट किया जा सकता था पर आप ने उससे भी वंचित किया है । क्या कहने, वाह । मोतिहारी का बबुआ सचमुच बहुत जानकार हो गया है । आज ही सुबह सोशल मिडिया के ऊपर आप का भाषण भी सुनने को मिला । पर हकीकत वैसा नहीं है जो आप कह रहे थे । बहुत बढिया कइलह । बाधाई बा ।

ritesh kumar said...

छत्‍तीसगढ मे तो हमारे गांव से दुर्ग ४० किमी दूर है फिर भी पांच छह साल से २४ धण्‍टे बिजलीा हां कभी कभी मौसम के चलते गुल हो जाता हैा

sanjay kumar Jha said...

रवीश जी, बिहार के गाँव में आपने बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था देखि हि होगी. जेनेरटर से पुरे गाँव में बिजली के आपूर्ति की जाती है, कम से कम चार घंटे के लिए. रेट भी कम है, प्रति बल्ब १०० रुपैया या फिर कुछ लीटर किरासन तेल. ये एक तरह की क्रांति हि हो गयी है. गेन में भी अब लालटेन और डिबिया दरवाजे पर कम हि दीखता है. अच्छा लगता है. लेकिन इससे न तो टीवी चलता है और ना मोबाइल चार्ज होता है. हाँ रौशनी में पढाई कर बच्चे अपने को शहरी बच्चे के आस पास बराबर जरूर मानने लगते है. ये जो उद्यमी है, मेहनत भी बहुत करते है, अच्छी खासी कमाई भी हो जाती है.

Yogesh Vats said...

बिलकुल सही जानकारी दी है अतुल जी ने । रविश जी वैसे मोबाइल का यूज़ तो हर जगह इसी लिए हो रहा है चाहे गाँव हो या शहर ।

Yogesh Vats said...

बिलकुल सही जानकारी दी है अतुल जी ने । रविश जी वैसे मोबाइल का यूज़ तो हर जगह इसी लिए हो रहा है चाहे गाँव हो या शहर ।

Himanshu Dwivedi said...

रवीश जी मध्‍यप्रदेश में बुंदेलखण्‍ड अंचल में भी बिजली के कोई बहुत अच्‍छे हालात नहीं हैं . हां फिलहाल चुनावी साल है सो भरपूर बिजली मिल रही है . खैर बताना यह था कि हमारे यहां मोबाईल पर वीडियो देखने से एक कदम आगे जाकर टी.व्‍ही. भी देखा जा रहा है . जब मैच के दौरान बत्‍ती गुल हेाती है तो यही चाइना मोबाईल भीड का केंद्र होता है . पर एक बात आपने गौर की होगी कि यदि तुलनात्‍मक रूप से देखें तो हमारे ग्रामीण या युवा अपने हमउम्र शहरी-नगरीय-महानगरीय युवा की अपेक्षा कहीं अधिक प्रयोगधर्मी या सही मायने में कहें तों जुगाडू हैं , और विण्‍डो करप्‍ट वाली बात तो सर जी भारत में कम्‍प्‍यूटर का अखिल-भारतीय रोग है, साथ ही इसका भारतीय उपचार काश्‍मीर से कन्‍या-कुमारी तक लगभग एक ही crack key वाला pirated version . अतुलनीय भारत.

Khachar Janak said...

Hamare gujrat me asa nahi he, hamare yha 24 ghante bijli hoti he.

Sharad Agarwal said...

तब तो हमें सरकार से कहना चाहिए कि जो राजीव गांधी ग्रामीण विधुतीकरण योजना वो करोडो के बजट में चला रही है उसे बदलकर ग्रामीण बैटरीकरण योजना कर दे कुछ पैसे तो बच जायेंगे ही उसके… साथ ही जो मोबाइल योजना वो लायी थी उसे चाइनीज मोबाइल योजना बनाकर जल्दी लागू कर देना चाहिए फिर टीवी जैसी बड़ी चीजे नहीं आयत करना पड़ेंगी न…सही कहा न रवीश जी.…

prithviraj said...

वह क्या शैली है भाई.......कमाल यथार्थ का चित्रण इतना सटीक की दृश्य आँखों के सामने नाचने लगता है......बिलकुल सहज भाषा का प्रयोग है.....अधिक से अधिक जन को अपील करेगा....लगे रहिये....खूब आगे जायेंगे.....

रजनीश जे जैन said...

शाइनिंग इंडिया , बुलंद भारत , सिर्फ नारे है। तस्वीर का यह पहलु किसी (मोदी ,राहुल ) को क्यों नहीं दीखता ?

CA MANOJ JAIN said...

Ravish ji....Bahut accha laga padkar....aap ne jo baat likhi hai....aur uske sahare jo aap batana chahte hain... bahut difference hai dono mein

आशु said...

ye sab to sahi hai lekin aap ye batao ki Twitter pe aap mujhe follower kyon nahi accept kar rahe ho

gautam jha said...

chunav prachar ke samay yehi partiyan bijli aur vikas jaise mudde par raajneeti karti hai lekin aasliyat yahi hai jo aapne likha hai.....padh k bahut accha laga ravish ji...

nptHeer said...

Israel की एक घोषणा याद आ गई
उन्हों ने कहा था वे उनके त्रासवादीयों को torch से ढूंढेंगे...
बैटरी अगर त्रासवादी को भी ढूंढ़ सकती है तो tv/movies क्या चीज़ है:)

nonconventional energy source की और
लोकल gov का ध्यान खींचना चाहिए और लोगों को भी सजग होना चाहिए-वर्ना कल बिजली मिलेगी और महँगी होगी तो यही निर्दोष नागरिक अपनी आदतों से मजबूर crime को अंजाम देंगे

Ranjit Kumar said...

ये तो यूरेका मोमेम्ट रहा - आपके लिए भी, हमारे लिए भी ।

nptHeer said...

कल का कुरुक्षेत्र मज़ेदार वानगी था-elections में रोज़ आएगा क्या? बढ़ती रोटी:) you see!

fahad said...

Sir Ji , Maza aa Gaya ye Ghana sun kar. Aur aapka andaaz -e- bayan ke Kya kehne.

Kamal Samonia said...

Good news

Abhishek Singh said...

ये भारत है यंहा सब कुछ जुगाड़ से चलता है और सबसे जादा तो गाँव में देखने को मिलता है

http://goo.gl/vjH5wr

Rajneesh Dhakray said...

बड़ी ही विचित्र बात है सूचनाओं के सागर में रहने वाले हम हजारों Km दूर दूसरे देश की बातों को जानते हैं और उनके बारे में बहुत ही सहज भी होते हैं लेकिन अपने पड़ोस के गाँव में गोबर से आँगन लीपती हुयी बुधिया को देखकर सैफ अली खान style में wow करते हैं,

वास्तव में हम अपने देश के बारे में अपने लोगों के बारे में कितना कम जानते हैं, नरेंद्र मोदी 24 घण्टे बिजली देने की बात करते हैं लेकिन अभी भी ऐसी न जाने कितनी जगहें हैं और कई तो मेरी खुद की देखी हुयी जगहें हैं जहां पर पहुँचने को पक्का तो छोड़ो proper रास्ता नहीं है बंदरों की तरह उछल कूद करते हुये पगडंडियों पर चल कर लोग अपने अपने गंतव्य को जाते हैं, बिजली तो दूर बिजली के लट्ठे तक नहीं हैं,
NaMo को सब मर्जों की दवा बताने वाले भक्तो कोई "साहब" को जाकर बताता क्यो नहीं की उनके "मित्रो" (मित्रों नहीं :P) का क्या हाल है।

बाकी चाइना के फोन का तो यही इस्तेमाल हो रहा है, पॉर्न और गाने, जिसे अखिलेश लैपटाप मिला तो वह बड़ी स्क्रीन पर देख रहा है। मेरे पड़ोस में एक लड़की को मिला जब वह उसे मेरे पास लायी सीखने के लिए तो उसका पहला सवाल था कि "भैया इसमे गाने हैं क्या?"
2 दिन उसने बस यही सीखा कि गाने कैसे चलाते हैं, फिल्म कैसे चलाते हैं और ये सब लैपटाप में "भरे" (store) कैसे जाते हैं, मुझसे भी डिमांड उसकी यही थी कि भैया मेरे लैपटाप में गाने और पिच्चर भर दो।

खैर हर बात पर नकारात्मक सोच सोच कर कहीं बीमार न पड़ जाऊन इसीलिए मान लिया है कि ये भी किसी अच्छे के लिए ही हो रहा होगा
(हाँ माँ को थोड़ी तकलीफ है कि अब जिसे देखो उसके हाथ में लैपटाप है जिससे उनके लैपटाप वाली होने का रसूख घट गया है :)

Mahendra Singh said...

Jaroorat hi Innovation ya research ka main karan hota hai aur yeh agar sahi direction me ho to sone per suhaga.

satya mitra said...

jugadu bharat ke rojbetee...........

satya mitra said...

jugadu bharat ke rojbetee...........

satya mitra said...

jugadu bharat ke rojbetee...........

deep chand said...

रबीश जी आपके इस पोस्ट से मुझे उत्तराखंड के सीमान्त जिले पिथौरागढ़ की नेपाल सीमा से लगे गांवों में बिजली के अभाव में गोबर तथा नमक के मिश्रण को एक निशिचत अनुपात में मिलाकर प्लस-माइनस टर्मिनलों से एलर्इडी बल्व जलाने के जुगाड़ की याद आ गयी। बिना किसी खर्चे के रातों में उजाला करने का यह अदभुत तरीका शायद ही किसी ने कही सुना और पढ़ा हो।

deep chand said...

रबीश जी आपके इस पोस्ट से मुझे उत्तराखंड के सीमान्त जिले पिथौरागढ़ की नेपाल सीमा से लगे गांवों में बिजली के अभाव में गोबर तथा नमक के मिश्रण को एक निशिचत अनुपात में मिलाकर प्लस-माइनस टर्मिनलों से एलर्इडी बल्व जलाने के जुगाड़ की याद आ गयी। बिना किसी खर्चे के रातों में उजाला करने का यह अदभुत तरीका शायद ही किसी ने कही सुना और पढ़ा हो।

PD said...

सन दो हजार में हम भी विंडोज और विभिन्न साफ्टवेयर इंस्टाल करके पॉकेट मणि बनाते थे. पूरे पटना में उसका एक ही रेट था उन दिनों. 750 रूपया.
पता नहीं था की अभी भी ये धंधा चल रहा है. :)

R K Singh said...

This is the Ravish Kumar, which I was trying to find at twitter :-)

Dhananjay said...

Jabardast story sir................:)

Nitesh Singh said...

Ravish Ji...apki ye story kafi intresting lagi...gaon me to aaj bhi light nhi hai log kuch na kuch jugad karke apne manoranjan ka sadhan dhoondh hi lete hai...serkar ko to park, laptop aur midday meal hi bantna hai...moolbhoot suvidhaye kya hoti hai unhe kya pata...azadi 66 sal gujar gaye per kahi kahi aaj bhi azadi wali condition hai...Arvind Kejriwal ne in logo k khilaf hi awaj uthai hai..bas jarurat hai ek imandar koshis ki..janta janardan ka sath bahut jaruri hai bas datre raho INDIA....Jai Hind.