पुरानी जीन्स और हथियार...

क्या आपको नीले रंग वाली जीन्स पतलून से डर लगता है? क्या जीन्स को लेकर आप भी आधुनिकता को गंदा या भद्दा समझते हैं? क्या जीन्स को लेकर आपने भी कभी न कभी सोचा है कि यह लड़कियों के लिए नहीं है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो ज़रूरी नहीं कि आप बिल्कुल खाप मानसिकता के ही है लेकिन यह ज़रूर है कि आप एक ऐसे कपड़े का विरोध कर रहे हैं जिसे पहनने के बाद लड़कियों की आज़ादी खास रूप से नज़र आने लगती है जो आपको खाप में बदल देती है। पहनावा एक ऐसा आखिरी मुकाम है जिसपर आप प्रतिबंध के नाम पर आधुनिकता को यानी लड़कियों को काबू में रखना चाहते हैं। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो कुछ भी ग़लत नहीं क्योंकि आपको किसी ने बताया ही नहीं कि आपकी सोच में बुनियादी गड़बड़ी है। हमारे देश में कपड़ों का रिश्ता जाति,त्योहार से लेकर इलाका और मौसम सबसे रहा है। ऐसे में जीन्स एक ऐसा कपड़ा है जो इन सब सीमाओं या खांचे को पार करता हुआ हर तबके के पहनावे के रूप में कायम हो जाता है। जीन्स सिर्फ एक आधुनिक कपड़ा नहीं बल्कि असामनता को विशेष रूप से उभारने वाले इस आधुनिक दौर में बराबरी का एक ऐसा रूपक है जो अमीर से लेकर ग़रीब सबके बदन पर है। यही नहीं यह एक ऐसा कपड़ा है जिसका कोई जेंडर यानी लिंग नहीं है।

जीन्स का उदय अमरीका में हुआ। उन्नीसवीं सदी के मध्य में यह पहनावे के रूप में प्रचलित होने लगी। १८५० के आस पास कैलिफोर्निया में सोने की खदाने मिलने से वहां एक किस्म की भगदड़ सी मची । जिसे गोल्ड रश के नाम से जाना जाता है। यहां के खान मज़दूरों को विशेष कपड़े की ज़रूरत थी। इसी दौरान एक जर्मन नौजवान वहां पहुंचता है और कैनवस के कपड़ों से पतलून बनाने लगता है। १८७३ में लेवी स्त्रास ने अपनी डेनिम जीन्स का पेटेंट करा लिया और कंपनी कायम कर दी। १३९ साल के सफर में डेनिम जीन्स ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। १९५० के दशक में अमरीका के स्कूलों में भी जीन्स पहनने पर रोक लगी थी। वहां भी जीन्स का विरोध हो रहा था। लेकिन १९६० तक आते आते यह विरोध धीमा पड़ने लगा। उसी दौरान एक फिल्म रिबेल विदाउट काज़ आती है और जीन्स फैशन में आ जाता है। मज़दूरों का कपड़ा पर्दे के नायक का कपड़ा बन जाता है। हमारे हिन्दुस्तान में जीन्स का आगमन यहां के उन कुलीनों के ज़रिये होता है जो महानगरों के खास इलाकों तक ही सिमटे रहे। अमेरिका में जीन्स मज़दूरों से मालिकों और युवाओं तक पहुंची। हिन्दुस्तान में जीन्स मालिकों से मज़दूरों तक पहुंची। इसमें दिल्ली के मोहनसिंह प्लेस और करोलबाग का बड़ा योगदान रहा है। कनाट प्लेस स्थित मोहनसिंह प्लेस सस्ती जीन्स का खदान बन गया। वहीं से उन लोगों ने जीन्स पहनने का तज़ुर्बा किया जो ब्रांड वाली महंगी जीन्स नहीं खरीद सकते थे। बदलते शहर,काम की प्रकृति के कारण हिन्दुस्तान भर से आए प्रवासी छात्रों और मज़दूरों को जीन्स की शरण लेनी पड़ी। जीन्स उनके आधुनिक होने की पहचान बन गई।

लेकिन क्या हमारे समाज में जीन्स का विरोध हुआ ही नहीं। ऐसा नहीं है। जीन्स को लेकर हमेशा से तकरार होती रही है। हमारे ही मित्र जीन्स अपने मां बाप से छिप कर पहनते थे। नब्बे के दशक में जब हम बिहार से दिल्ली आ रहे थे तब कई छात्रों के माता पिता ने कहा था कि जीन्स मत पहनना। लोफर पहनते हैं। शायद जिप्सियों पर बनी हरे रामा हरे रामा जैसी फिल्मों ने जीन्स की छवि ऐसे लोगों में बिगाड़ दी होगी। ऐसी चेतावनी मुझे भी मिली थी। लड़कियों को भी जीन्स पहनने पर ऐसी टिका टिप्पणी सुननी पड़ी है। आप चाहें तो जीन्स पहनने के अपने निजी प्रसंगों को इस लेख के साथ याद कर सकते हैं। यह एक छिटपुट विरोध भर था। हमारे देश एक तबके में जीन्स बागी प्रवृत्ति वाले नौजवाने से कम, बिगड़ैल प्रवृत्ति के युवाओं से जोड़ कर देखा गया है। बाद में यह आसानी से स्वीकृत भी होता गया। आज के सभी हीरो जीन्स ही पहनते हैं। अमिताभ,जीतेंद्र,मिथुन के दौर में पतलून का चलन था। इसलिए हर दर्जी उनकी पतलून की कापी करता था। पतलून की जेब से लेकर मोहरी तक फैशन बन जाया करती थी। बेल बाटम्स से लेकर पतली मोहरी का चलन हो जाता था। जीन्स में कापी करने के लिए कुछ नहीं है। आप सलाम नमस्ते या काकटेल देखने के बाद चाहें तो जीन्स का कोई भी ब्रांड खरीद ले। इतनी भयंकर समानता किसी और प्रकार के कपड़े में नहीं है। इसीलिए जीन्स का ब्रांड महत्वपूर्ण होता है। जीन्स ब्रांड के नाम से ही अलग दिखती है।

जीन्स के कपड़े की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी भी प्रकार के अंतर को समाप्त कर देती है। हुआ यह है कि गांव गांव से महानगरों में पहुंचे मज़दूरों ने बड़ी संख्या में दर्ज़ी की बनाई पतलून या फैक्ट्री की सिली हुई पतलून को त्याग दिया है। अब आप ईद या होली के मौके पर दर्ज़ियों के पास जाकर देखें। पतलून की सिलाई कितनी कम हो गई है। ज्यादातर टेलर लेडीज टेलर होकर रह गए हैं। इन मज़दूरों के साथ गांव गांव में जीन्स पहुंचा है। सस्ती और टिकाऊ होने के कारण मर्द ही इन्हें अपने इलाके में लेकर गए हैं। गांवों में लड़कियों तक जीन्स मर्दों के ज़रिये पहुंचा है। इसी चस्के ने जीन्स का देसी बाज़ार तैयार किया और नकली ब्रांड वाले जीन्स मेले से लेकर ठेले तक पर बिकने लगी। इस कपड़े ने गांवों की सीमा के भीतर लड़के और लड़कियों के बीच पहनावे के अंतर को समाप्त कर दिया है। यह कैसे हो सकता है कि वो हर चीज़ों में लड़के लड़कियों के बीच अंतर करें और पहनावे का भेद इतनी आसानी से मिट जाए।

जिस तरह से जीन्स शहरों में वक्त,परिवहन के संसाधन, पानी की उपलब्धता आदि कारणों से सुलभ हुई,गांवों में भी इन्हीं कारणों से प्रचलित हो रही है। हमारे समाज में लड़कियों को मारा जा रहा है तो दूसरी तरफ लड़कियां लड़कों से कई मामलों में तेज़ी से बदल भी रही है। उनकी गतिशीलता से गांव के बुजुर्ग या लड़के परेशान होने लगे हैं। वो अब बहाने ढूंढ रहे हैं। मोबाइल और जीन्स नए बहाने हैं जिनके ज़रिये लड़कियों पर नियंत्रण की कोशिश हो रही है। जीन्स उन्हें चुनोती दे रही है। जीन्स का विरोध और बुर्के पहनने पर ज़ोर एक ही मानसिकता की देन है। जिस्म का कोई हिस्सा न दिखें। इस बात पर कोई ज़ोर नहीं कि देखने का वैसा नज़रिया कपड़े की सिलाई से आता है या दिमाग़ की किसी बुनावट से। तभी तो सिर्फ लड़कियों के जीन्स पहनने पर रोक लगी। लड़कों पर नहीं।

इसलिए आसान है कि जीन्स को जला दें। मुज़फ्फरनगर के दूधाहेड़ी गांव में जीन्स की होली जलाई गई। गांव की सरपंच की पोतियां ही कहती मिलीं कि हम तय करेंगी कि क्या पहने। लेकिन वहां पुरुषों का दबाव इतना कि सारी लड़कियों को जीन्स देनी पड़ी होलिका दहन के लिए। लेकिन उन्होंने अपनी आज़ादी नहीं सौंपी है। वो कह रही हैं कि नौकरी की ज़रूरत के मुताबिक हम कपड़े पहनेंगे। बंगलौर या दिल्ली जायेंगे तो ये हमें बतायेंगे कि क्या पहनें। ज़रूरी है कि हम कपड़े की मानसिकता को भी पहने। जीन्स जल गई लेकिन आज़ादी और बराबरी की चाहत बाकी है जो जगह बदलने या वक्त गुज़रने के साथ पूरी कर ली जाएगी। यानी जीन्स की संभावना अब भी गांवों के लिए बची है।

लेकिन हैरानी हुई कि हमारा आधुनिक समाज जो पश्चिम की आधुनिकता को बेशर्मी से जीता है उसके विरोध के नाम पर अभी भी ढोंग करता है। स्वदेशी आंदोलन के वक्त विदेशी कपड़े जलाए गए थे। वो सिर्फ कपड़े का विरोध नहीं था बल्कि उस मानसिकता का विरोध था जो हमें उस सत्ता का उपनिवेश बनाती थी जिसकी गुलामी हम पहनकर चल रहे थे। गांधी ने हमें उस मानसिकता से आज़ाद कर दिया था। लेकिन क्या अब जीन्स को उस नज़र से देखा जा सकता है। क्या यह विदेशी कपड़ा है? नहीं है। यह देसी कपड़ा भी है। इसके पहनने से कोई अच्छा बुरा नहीं होता। खादी का क्या करेंगे। खादी पहनने वाले कई लोग लाखों करोड़ों का घोटाला कर जाते हैं। क्या अब खादी की भी होली जलेगी इस देश में? जीन्स एक शानदार और बराबरी का पहनावा है। आपके पास कोई पुरानी जीन्स हो तो निकालें और पहनें।
(शुक्रवार को यह लेख राजस्थान पत्रिका में छपा था)

27 comments:

spectrum said...

bahut hi badiya lekh...jins sirf pahnava hi nahi ek suvidha bhi he..thnx ravish ji jins ke bare me kuch nayi jankari dene ke liye.

astha said...

exactly, it's all in our head..right-wrong..you know basically the male chauvinism always comes into play, the insecurity of women starting to expect, or women starting to choose..men want the control in their hands..while on the other hand, if we see the scenario has always been the same..men have opposed anything done for women similarly women had been the enemy of themselves..it's like men sided with men+women sided with men= nobody sided with women..

Arun Pandey said...

Thanks for publishing on blogs. It's exactly correct things.
Arun Pandey

amar said...

main toh jeans aur khadi ki shirt dono ek sath pehanta hoon...jeans samanata ka bhav deti hai aur khadi alag hone ka...

suchak said...

sir ji , wt abt Levis ki jeans pahenata shaher ? #Ahmedabad

Nagendra Shukla said...

Ravish, pehle to mera maanana yeh hai ki Bharatiya sanskriti mein mahilaon ka sthaan purushon se oopar hai. Hum unko barabar laane ki koshish kar rahe hain jo mujhe galat lagta hai.Humari upasana mein Sita-Ram, Radhey-Shyam isi ka soochak hai, aur yahan tak ki srashti ke paalankarta ko bhi Lakshmipati kehte hain.
Parantu yeh baat bhi sahi hai ki kuchh paristhiti-janya karanoo (mughal and angreezon ka aatank)se bharatiya samaj ne mahilayoon ke daayare ko samaet diya. Isiliye hum mahilaon ko barabari ka sthaan dilane ka dhoong naa karein..woh tab bhi oopar thi...abb bhi oopar hain..lekin raavanon ke liye na tab oopar thi..na abb hain. zaroorat yeh nahi hai ki mahilaaon ko barabari ka darja dilane ka prayas karein...bakli ussase bahut jyada zaroori hai ki ravanon ko pehchaan kar dandit karein.
Burai jeans pehanane mein nahi hai...chahe wo mahila ho ya purush..samay ki maang hai...aur suvidha ke anusaar kapde pehnane ka haq sabhi ko hai. kapdon se vyaktitva to juda hai par..khaadi pehanane se koi vichaarvaan nahi ban jaata..na jeans se koi aadhunik. Dukh to tab hota hai jab jeans ki brand ke saath underwear ki brand bhi jag jahir hoti hai..aur jeans pehanane ke baad jab jabaan mein bhi jeans ki kadak aa jaati hai...resham ki lachak chali jaati hai. Iss vajah se yeh sochna jaroori ho jaata hai ki aakhir hum barabari kar kis cheez ki rahe hain.

प्रवीण पाण्डेय said...

हमारा क्या होगा, हम तो जीन्स ही पहनते हैं...

Manjit Thakur said...

जीन्स पहनना, धोना मेंटेन करना आसान है। हमने अपने हॉस्टल के दिनों में इसे धारण करना शुरु किया और आजतक सिर्फ शर्ट का रंग बदलता गया है, जींस का रंग बहुत-थोड़े फेरबदल के साथ वही है। अपने काम के लिहाज से भी बहुत मुफीद है। पहले हमारी कमर जींस के हिसाब से कमरिया हुआ करती थी, लोग मजाक भी बनाते थे, लेकिन मर्द होने की वजह से बैन नहीं लगा कभी। लड़कियों को जींस पहनना बुरी नजर से देखा जरूर जाता था लेकिन हमारे झारखंड का पुराना शहर इस मामले में उदारमना है। लड़कियां भी पहनती हैं और कोई श्रीराम सेना या ठेकेदार नहीं है। हां, स्कूलों में यूनिफॉर्म का चलन है, मुस्लिम स्कूलों में भी...। इसलिए जींस पहन कर कोई स्कूल नहीं जाता। वैसे जींस के साथ खासियत यह भी है कि छह महीने तक लगातर पहनने और इसे पानी से दूर रखने पर इसकी खूबसूरती में निखार आता है। जय जींस।

Manjit Thakur said...

जीन्स पहनना, धोना मेंटेन करना आसान है। हमने अपने हॉस्टल के दिनों में इसे धारण करना शुरु किया और आजतक सिर्फ शर्ट का रंग बदलता गया है, जींस का रंग बहुत-थोड़े फेरबदल के साथ वही है। अपने काम के लिहाज से भी बहुत मुफीद है। पहले हमारी कमर जींस के हिसाब से कमरिया हुआ करती थी, लोग मजाक भी बनाते थे, लेकिन मर्द होने की वजह से बैन नहीं लगा कभी। लड़कियों को जींस पहनना बुरी नजर से देखा जरूर जाता था लेकिन हमारे झारखंड का पुराना शहर इस मामले में उदारमना है। लड़कियां भी पहनती हैं और कोई श्रीराम सेना या ठेकेदार नहीं है। हां, स्कूलों में यूनिफॉर्म का चलन है, मुस्लिम स्कूलों में भी...। इसलिए जींस पहन कर कोई स्कूल नहीं जाता। वैसे जींस के साथ खासियत यह भी है कि छह महीने तक लगातर पहनने और इसे पानी से दूर रखने पर इसकी खूबसूरती में निखार आता है। जय जींस।

nptHeer said...

Gns par PT bhi hua tha:)rahul gandhi aur soniagandhi ke Gns ke baare main kahte hue satyavrat chaturvedi unke Gns show off kar rahe the! oh ok ok aap history ke student ho to majdoor,kapda aisi betuki chijen hi yaad karoge-Gns?:) anyways i like this cloath by the way-almost comfertable,always smart but simple and sobber still fationable:)rahul gandhi ne UP election main kounse Gns use kiye the by the way?tabhi---see question is mine-answer is yours--did i answered?:)fir?

MUKESH said...

http://merasaman.blogspot.com/

ise padhkar dekhiye sir...gazab hai



mukesh bhati
cartoonist, india tv
9311898191

SHAHBAZ HAIDER said...

dimag main bhawnae jab aati jab hum kuch dekhte hain apne kaha jeens or bhurkhe main farq nahi logo ki soch main farq hain soch badalni chaiyye. apke hisab se ladki ager bina kapde ke bhi ghume to koai pareshani nahi honi chaiyye is desh ko kiyo ke bina kapde ki ladki ko dekh ker jo dimag main khyal aye usme ladki ke badan ke hisso ki galti nahi hain usme apke dimag main aye khyal ki galti hain .jeens ho ya koai bhi aisa pahnawa jo apke badan ke hisso ko alag alag ubhar raha ho apke jism se chipak raha ho to farq hi kiya rah gaya ek nude main or chipke hue kapde pahan ker ladki main.badan se chipka hua kapda ladki ke liye galat hain wo jeens ho ya koai or
apne aap ko modern banane ke liye hume sexy hone ki jarrorat nahi hain. aaj kal hamari soch sirf ye hi hain ke hum jab tak modren nahi ho sakte jab tak hum khule sex nahi kar sakte . hum ye sochte hain ke europe country isliye tarkki per hain kiyo ke wo sex free hain to hum bhi yahi funda aazmana chaiyye .
masla jeens ka nahi hain saaf saaf wordo main hum ye kiyo nahi kahte ke hume sex khule aam karna chaiyye ya nahi. lakin hum is topic ko nahi kahte or kabhi kapdo ka bahana leker kabhi mobile ka kabhi kisi or cheez ka
sawal ye hain ke hume azadi khayalato ki nahi sex ki chahiyye isse pane ke liye modern hona hatiyar bana rahe hain.
dimag main galat khayal aate hain dekhker naki bina dekhe ager bina dekhe aate to aaz sab film ki kahan likhte
mere kahne ka jo saar hain sirf ye hain ke hamara nazerya peda kiyo ho raha hain aisa hum aesi azadi kiyo chaha rahe hain jisme sirf or sirf sex ho

my soulsoup said...

Ravish ji they are the chauvinist who thinks their girls as well as the other girls only live according to their wishes.

my soulsoup said...

Ravish ji this chauvinists want every one live as their ways like some dictator.

Dev Gupta said...

जींस तो जींस है...... पुरानी जींस और भी नसीब की है ......पहनते जाओ पहनते जाओ नही फटती ......रखी रहती है...... होली के लिए .... आज के परिवेस में होली पर तो फटेगी ही ...फिर भी नही फटती.......फिर रखी जाती है आलमारी में .......हमारे काम की नही पुरानी जो हो गई है....लेकिन पसंद है तो फिर सहेज कर रखते है .... शायद फिर किसी के कम आ जाये ....आती है काम किसी के जब कोई दिखता है कोई बेसहारा बिन कपड़ो के ...तो वही जींस आती है उसके भी काम ....नेक इन्सान जब देता है उस बेसहारे को उसे अपनी पुरानी जींस तो.....तो वह बेसहारा भुत खुश होता है जैसे उसे अनमोल चीज मिल गई हो.......और धन्य होती है वो जींस भी फिर से किसी के काम आकर ....कितनी मजबूत और कितनी अदभुत है ये जींस.....

Arya said...

jeans ki shuruat america mein hui thi??

my soulsoup said...

Yeh bas kehna hi jaante hai. Ya phir bakwas karna.

कौशल किशोर मिश्र said...

jo aap ki pahuch main ho aur aaram dayak ho aap pahane ...





सरकार के उपर जब तक हम और आप भारत देश की जनता जब तक यह आन्दोलन की सुरुआत नहीं करने की इच्छा अपने मन से बाहर नहीं निकालेंगे तब तक ये बांग्लादेसी भारत छोड़ो का आन्दोलन सुरु नहीं हो सकता बांग्लादेसी भारत छोड़ो .....क्या आप दुश्मनी पाले दुसमन को अपने घर मैं पनाह दे सकते है ........
.......बांग्लादेसी भारत छोड़ो.....

जय बाबा बनारस।.......

Narendra Mourya said...

भाई रवीश आप कमाल के पत्रकार है। दो टूक कहते हैं और उन मुद्दों पर कहते हैं जिन्हें लोग हाशिए पर ढकेल देते हैं। जींस पर भी आपका विश्लेषण तारीफ ए काबिल है। टीवी पर आपका कमाल देखते-सुनते रहे हैं। कुछ समय से कस्बा पर भी नजर है। अलबत्ता टिप्पणी पहली बार दे रहे हैं। आपको ढेर सी शुभकामनाएं और हां अगर वक्त निकाल सके तो जरा http://sumarnee.blogspot.in/ में झांक लें। वहां आपके लिए कुछ खास है। आभार।

Paresh Singh said...

very good. Nice article. But please telecast a show on massacre of Hindus in Assam by Muslim intruders from Bangladesh, because I am fade up with your show about poor conditions of Muslims in India. Please give us the information about poor conditions of Hindus in Pakistan or in Kashmir and I know that you are a so called SOLD CORRESPONDENT and taken huge money from Saudi Arab to conduct anti national propaganda from your channel. Your channel must be ban in India and you are not secular but you are an anti Hindu and a Muslim terrorist supporter.

3mikindia said...

Your blog is good.I want to place AD for my website 3mik.com on your blog . I am unable to see the contact form.So i am dropping the message in comment. Please send me your ad rate at sanjeev@3mik.com

Shekhar Suman said...

रवीश सर... मुझे तो जींस से बेहतर पहनावा कोई लगता ही नहीं है... हर तरह से एकदम यूजर फ्रेंडली टाईप.... और अगर लड़कियां पहन रही हैं तो भला इसमें क्या बुराई है... अगर पुरुषों ने अपने पारंपरिक पहनावे धोती या शेरवानी को छोड़कर जींस को अपनाया है तो भला महिलाएं क्यूँ नहीं....

amarjit said...

sir g is blog k liye sukriya, sari baat to aapne bata di to kya kahe par sayad agar ham isko padh k kuch soche to wo jarur kaam aayega...

amarjit said...

sir g is blog k liye sukriya, sari baat to aapne bata di to kya kahe par sayad agar ham isko padh k kuch soche to wo jarur kaam aayega...

Luthra Yogesh said...

khuch bhi adang bdang likhne ka talent hain tum mein or publish karne ki himat bhi

good hain :)

Jasbir Singh Chawla said...

जींस पहन कर उच्च वर्ग भी ग़रीबी रेखा के नीचे आ सकता है़़।थेगले के प्रिंट वाली,आगे पीछे सफेद चूना लगे डिजाइन वाली,फंटे - पांयचो से निकलते धागों वाली जींस- शारटस पहन कर अमीर ग़रीब की बराबरी कर सकता है ?
- जसबीर चावला

Deepak Tak said...

Shukriya sir,bahut badhiya post ahe,hume pehnaava nahi maansikta badlane ki zarurat hae.