दुष्चक्र के भंवर में भोजपुरी

हम रउवा सब के भावना समझतानी। तमिल भाषी और उच्च स्तरीय अंग्रेज़ी बोलने वाले गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भोजपुरी की इस एक पंक्ति को बोलने के लिए कितना अभ्यास किया होगा । चिदंबरम ने हिन्दी के लिए कभी अभ्यास नहीं किया। चिदंबरम की छवि या सियासी मंशा की विवेचना हो चुकी है। संसद में भोजपुरी बोलने वाले कितने सांसद हैं लेकिन किसी ने भोजपुरी में कभी भाषण दिया होगा इसका इल्म मुझे नहीं हैं। मैं अपने प्राइम टाइम शो में भोजपुरी के वाक्य बोल देता हूं। पंद्रह साल पहले नहीं बोल पाता। अब शायद इसलिए कि सदियों से विस्थापित होकर अपने श्रम से दाल रोटी कमाने वाला भोजपुरी समाज कहीं न कहीं बराबरी की स्थिति में आता जा रहा है। यह ठीक है कि भोजपुरी का साहित्य मराठी या बांग्ला की तुलना में कुछ भी नहीं है लेकिन भोजपुरी पहचान बनने की भाषा बनने लगी है। श्रम की भाषा तो हमेशा से रही है। देश के पहले राष्ट्रपति देशरत्न राजेंद्र प्रसाद भोजपुरी बोलते थे। उनके ही प्रयास और प्रेरणा से भोजपुरी की पहली फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो बनी थी। आज भोजपुरी फिल्मों का अपना बाज़ार है। दिल्ली में लाखों लोग भोजपुरी बोलते मिल जायेंगे। दौर ही कुछ ऐसा है। बाज़ार मिल जाता है तो सरकार पाने की चाहत होने लगती है।
 भोजपुरी भाषी राजनीतिक समाज जातिगत पहचान का सर्वोच्च मानता रहा है। अब कहीं न कहीं वो भोजपुरी को भी इस पहचान में जोड़ना चाहता है। हिन्दी के समानांतर पहचान की चाहत नज़र आने लगी है। अब जब वो महानगरों में अपनी आर्थिक घुसपैठ से राजनीतिक घुसपैठ की दिशा में बढ़ने लगा है उसकी मांगे कुलीन होने लगी हैं। भाषा को आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की मांग कुलीन मांग है। इससे भाषा समाज को व्यापक फायदा नहीं होता लेकिन राजनीतिक पूंजी ज़रूर बन जाती है। पी चिदंबरम उसी राजनीतिक पूंजी को हासिल करने के लिए भोजपुरी प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे।
 भोजपुरी भाषी भी तो यही चाहते हैं। दिल्ली से लेकर मुंबई तक में उनकी भाषा की ताकत स्वीकार की जाए। जिन इलाकों में भोजपुरी बोली जाती है वहीं भोजपुरी की क्या हालत है? कांवेंट स्कूलों की चाहत क्या भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में डालने से कम हो जाएगी? क्या भोजपुरी के गानों में जो अश्लीलता और लंपट तत्वों की भरमार है, वो दूर हो पाएगी? भोजपूरी के पास क्लासिकल संगीत का खजाना है। उसे हिन्दी और अंग्रेजी का कुलीन तबका पाल रहा है। क्या हम चौपाई,ठुमरी और कजरी को भोजपुरी में फिर से स्थापित कर पायेंगे? सरकार या प्रवेश परीक्षा में भाषा को शामिल कराकर उछलने से पहले सोचना होगा कि जब हिन्दी ही अंग्रेजी होते इस समाज सरकार में सरकती जा रही है तो भोजपुरी कैसे टिकेगी।
 मेरा मतलब भाषा के वजूद के मिटने से नहीं है। मेरा सवाल है कि क्या आठवीं अनुसूची में किसी भाषा को शामिल करने से यथार्थ की चुनौतियां मिट जाती हैं? क्या यह सिर्फ भोजपुरी समाज के भीतर पैदा हुए कुलीन तबके की चाह नहीं है, जिसे वो महफिलों में शान से बता सके कि हमारी भोजपुरी भी कम नहीं है। महफिलों में भोजपुरी बोलने से कौन रोक रहा है। मुंबई की फिल्मों में हमारी शारदा सिन्हा जी उच्च स्तरीय भोजपुरी गीत गाकर चली आती हैं। अश्लील गाने से मना कर देती हैं। भोजपुरी के सम्मान के लिए जो लोग इस तरह से संघर्ष कर रहे हैं उन्हें आठवीं अनुसूची के सहारे की ज़रूरत नहीं है। देखना होगा कि भोजपुरी जातिगत वोट बैंक का दूसरा नाम तो नहीं है। अगर ऐसा है तो हासिल कुछ नहीं होने वाला। ये और बात है कि चिदंबरम को भोजपुरी बोलते सुना तो मैं भी उछलने लगा । कौन नहीं चाहेगा कि उसकी बोली उसकी भाषा सत्ता और समाज की हर देहरी और शिखर पर बोली जाए।
लेकिन यह मौका भोजपुरी को संकीर्णता के दायरे में धकेलने का नहीं है। हिन्दी का साम्राज्य बढ़ेगा तो दरकेगा भी। कोई भी साम्राज्य जब बहुत फैल जाता है तब टूटन होने लगती है। मैथिली और भोजपुरी की मांग उसी दिशा में देखा जाना चाहिए। फिर भी हिन्दी का वर्चस्व रहेगा। आज सत्ता प्रतिष्ठान अंग्रेज़ीमुखी चुके हैं। मध्यप्रदेश में उद्योगपतियों ने मांग की है कि अधिकारियों को अंग्रेजी आनी चाहिए तभी वो निवेश कर सकेंगे। इस हालत में जब हिन्दी के लिए लड़ने वाला नहीं है तो भोजपुरी के लिए कौन लड़ेगा। जैसे जैसे हम हिन्दी और बोलियों को अलग करेंगे, हम हर लड़ाई हारेंगे। छोटी लड़ाई की जीत, बड़े युद्ध में मिली हार से कभी बेहतर नहीं हो सकती।
 हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम भाषा को सांकेतिक महत्व ही देते हैं। बाज़ार और समाज के दम पर हमारी बोलियां और भाषाएं टिकी रही हैं। हो सकता है मैं संविधान के आठवें अनुसूचि के क्रांतिकारी प्रभाव से अवगत नहीं हूं लेकिन सतर्क ज़रूर रहना चाहता हूं। चंद संस्थाओं के बनने और फंड के लूट खसोट से कुछ नहीं होता। भोजपुरी भाषी लोग श्रम और जीने के बेहतर अवसर के अभिलाषी हैं। उनमें चाह होगी तो वो भाषा को खुद बचा लेंगे। जैसे उन्होंने मोबाइल फोन में भोजपुरी गानों को अपलोड कर बचा लिया है। ये और बात है कि वो भोजपुरी अश्लीलता से इतनी घिरी हुई है कि आप उसे आठवीं अनुसूची के बाद भी महफिलों में प्रदर्शित नहीं कर पायेंगे। पेज थ्री कभी नहीं हो पायेंगे। लोक गीत तो रहे ही नहीं अब।
(मंगलवार को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

23 comments:

Rangnath Singh said...

बहुत सुन्दर लेख...

Vaibhav said...

प्रगति की होड़ में कई बोलियाँ पिछड़ती गयीं...
शायद इसका एक कारण है की ये सभी बोलियाँ हिंदी में समा जाती है. इनका अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है.
जिस बंगला और मराठी से आपने इसकी तुलना उन्हें लोग अलग भाषा मानते हैं शायद इसीलिए उन्हें अधिक प्रोत्साहित किया जाता है...
भोजपुरी में अश्लील ही सही पर कम से कम गाने दीखते तो है.... अवधी तो अब दिखनी ही बंद हो गयी है.....

Dr.Vimala said...

प्रिय रवीश ,
बहुत सही नब्ज़ पकड़ी है आपने ! कहा जाता है --- " जो दिखता है सो बिकता है " भोजपुरी को अश्लीलता से बचा लें तभी दिखेगी और तभी ज़्यादा से ज़्यादा बिकेगी .

प्रवीण पाण्डेय said...

शाखाओं से वृक्ष अधिक भरा हुआ लगता है।

प्रमोद सिंह said...

आरा छपरा छोड़ दीहीं, कुच्‍छो कहींयो हीलता जी? श्री पी ची के केहु लुंगीये उड़ा लीहित?
गनवा सब कइसे मेहरा गइल लेकिन? भउजी अउर तहार जवानी सुन-सुनके कान में फोड़ी कइसे ना भइल अब ले, आं?
अउर बैसाली में भोजपुरी के केतना एमपी थ्री फाइल सोगहग सुरच्छित बा, पहिले ई बतावल जाव..

nptHeer said...

Waah lekhak mahashay,10 may ke baad sidha 23 may aur vo bhi chhapa chhapaya?:)maulik to hai hi.lekin iska link dekar thoda aur maulik post bhi kar sakte the:)cheating achhchha kar lete ho:)
Vaise yah shirshak samajh main nahin aaya-i mean-chakradhar vishnu ka naam kya hai?:) 8vi anusuchi nahi padhi hai-honestly speaking:)will read but.-ek baat kahni thi-sardar patel bhasha ke anusaar bharat main rajyon ko bananeke virodhi rahe hai shayad,yah bhasha ke bhoot ki bhent shayad jawaharlal naheru ki hai.chidambaram ab HM hai sardar patel tab HM hai:)tab bhi congress thi ab bhi congress hi hai-bas tab ki cong khud chalti thi abki remote se:) baakito kya tamil kya telugu kya gujrati aur kya bhojpuri?ek hi political thaali ke chatni chaval shondesh(chatte batte) hai:)

nptHeer said...

Waah lekhak mahashay,10 may ke baad sidha 23 may aur vo bhi chhapa chhapaya?:)maulik to hai hi.lekin iska link dekar thoda aur maulik post bhi kar sakte the:)cheating achhchha kar lete ho:)
Vaise yah shirshak samajh main nahin aaya-i mean-chakradhar vishnu ka naam kya hai?:) 8vi anusuchi nahi padhi hai-honestly speaking:)will read but.-ek baat kahni thi-sardar patel bhasha ke anusaar bharat main rajyon ko bananeke virodhi rahe hai shayad,yah bhasha ke bhoot ki bhent shayad jawaharlal naheru ki hai.chidambaram ab HM hai sardar patel tab HM hai:)tab bhi congress thi ab bhi congress hi hai-bas tab ki cong khud chalti thi abki remote se:) baakito kya tamil kya telugu kya gujrati aur kya bhojpuri?ek hi political thaali ke chatni chaval shondesh(chatte batte) hai:)

Anand Rathore said...

AB KA KAHE KE RAH GAYIL , SAB TA RAURA KAHIYE DENI ...

tushar said...

are sahab aap likhte aur bolte dono badiya hai. mai yeh janna chahta hu ki aaj kal prabhu prime time se kaha gayab hai ?? mehraj, kadambari ya nidhi , aapki barabari na kar paynge.

Pramod said...

समाजवाद लुकाइल बा आज औरिआनि त...

धिक् अ मत तातल भात लेखा ....

ढहल घर नौ तल्ला कईला ...

भोजपुरी की अलग-अलग कवियों की ये कविता पंक्तिया हैं . भाषा की शक्ति की परिचायक . लोहा सिंह , कुञ्ज बिहारी कुंजन , मोती बी ए , चंद्रशेखर मिश्र , कन्हैया लाल पंडित , रामजी सिंह मुखिया ....यानि आज के भोजपुरी कवि -कार्यकर्ताओं से काफी पहले कवीर और तुलसी की कविताओं में भोजपुरी की मिठास और कड़क देखी जा सकती है .
भिखारी ठाकुर की रचनायें कहा किसी से काम हैं ?

आलोक said...

संसद का आगामी मानसून सत्र हमारी राजभाषा हिन्दी के लिए सुनामी का कहर बनकर आएगा और उसे चन्द मिनटों मे टुकड़े-टुकड़े करके छिन्न-भिन्न कर देगा। चन्द मिनटों में इसलिए कह रहा हूं क्योंकि गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने विगत 17 मई 2012 को लोक सभा के सांसदों को आश्वासन दे रखा है कि इसी सत्र में भोजपुरी सहित हिन्दी की कई बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने वाला बिल संसद में पेश होगा। यदि हमने समय रहते इस बिल के पीछे छिपी साम्राज्यवाद और उसके दलालों की साजिश का पर्दाफाश नहीं किया तो हमें उम्मीद है कि यह बिल बिना किसी बहस के कुछ मिनटों में ही पारित हो जाएगा और हिन्दी टुकड़े-टुकड़े होकर विखर जाएगी। इस देश के गृहमंत्री की जबान से इस देश की राजभाषा हिन्दी के शब्द सुनने के लिए जो कान तरसते रह गए उसी गृहमंत्री ने हम रउआ सबके भावना समझतानीं जैसा भोजपुरी का वाक्य बोलकर भोजपुरी भाषियों का दिल जीत लिया। सच है भोजपुरी भाषी आज भी दिल से ही काम लेते हैं, दिमाग से नहीं, वर्ना, अपनी अप्रतिम ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक समृद्धि, श्रम की क्षमता, उर्वर भूमि और गंगा यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों के रहते हुए यह हिन्दी भाषी क्षेत्र आज भी सबसे पिछड़ा क्यों रहता ? यहाँ के लोगों को तो अपने हित- अनहित की भी समझ नहीं है। वैश्वीकरण के इस युग में जहां दुनिया के देशों की सरहदें टूट रही हैं, टुकड़े टुकड़े होकर विखरना हिन्दी भाषियों की नियति बन चुकी है।

आलोक said...

अस्मिताओं की राजनीति आज के युग का एक प्रमुख साम्राज्यवादी एजेंडा है। साम्राज्यवाद यही सिखाता है कि थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली । जब संविधान बना तो मात्र 13 भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल थीं। फिर 14, 18 और अब 22 हो चुकी हैं। अकारण नहीं है कि जहाँ एक ओर दुनिया ग्लोबल हो रही है तो दूसरी ओर हमारी भाषाएं यानी अस्मिताएं टूट रही हैं और इसे अस्मिताओं के उभार के रूप में देखा जा रहा है। हमारी दृष्टि में ही दोष है। इस दुनिया को कुछ दिन पहले जिस प्रायोजित विचारधारा के लोगों द्वारा गलोबल विलेज कहा गया था उसी विचारधारा के लोगों द्वारा हमारी भाषाओं और जातीयताओं को टुकड़ो-टुकड़ो में बांट करके कमजोर किया जा रहा है।

आलोक said...

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग समय-समय पर संसद में होती रही है। श्री प्रभुनाथ सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह, संजय निरूपम, अली अनवर अंसारी, योगी आदित्य नाथ जैसे सांसदों ने समय-समय पर यह मुद्दा उठाया है। मामला सिर्फ भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने का नहीं है। मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ ने 28 नवंबर 2007 को अपने राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी घोषित किया और विधान सभा में प्रस्ताव पारित करके उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग की। यही स्थिति राजस्थानी की भी है। हकीकत यह है कि जिस राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग जोरों से की जा रही है उस नाम की कोई भाषा वजूद में है ही नहीं। राजस्थान की 74 में से सिर्फ 9 ( ब्रजी, हाड़ौती, बागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी) बोलियों को राजस्थानी नाम देकर संवैधानिक दर्जा देने की मांग की जा रही है। बाकी बोलियों पर चुप्पी क्यों ? इसी तरह छत्तीसगढ़ में 94 बोलियां हैं जिनमें सरगुजिया और हालवी जैसी समृद्ध बोलियां भी है। छत्तीसगढ़ी को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ने वालों को इन छोटी-छोटी उप बोलियां बोलने वालों के अधिकारों की चिन्ता क्यों नहीं है ? पिछले दिनों केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री नवीन जिंदल ने लोक सभा में एक चर्चा को दौरान कुमांयूनी-गढ़वाली को संवैधानिक दर्जा देने का आश्वासन दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि यदि हरियाणा सरकार हरियाणवी के लिए कोई संस्तुति भेजती है तो उसपर भी विचार किया जाएगा। मैथिली तो पहले ही शामिल हो चुकी है। फिर अवधी और ब्रजी ने कौन सा अपराध किया है कि उन्हें आठवीं अनुसूची में जगह न दी जाय जबकि उनके पास रामचरितमानस और पद्मावत जैसे ग्रंथ है ? हिन्दी साहित्य के इतिहास का पूरा मध्य काल तो ब्रज भाषा में ही लिखा गया। इसी के भीतर वह कालखण्ड भी है जिसे हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग ( भक्ति काल ) कहते हैं।

आलोक said...

भागलपुर विश्वविद्यालय में अंगिका में भी एम.ए. की पढ़ाई होती है। मैने वहाँ के एक शिक्षक से पूछा कि अंगिका में एम.ए. की पढ़ाई करने वालों का भविष्य क्या है ? उन्होंने बताया कि उन्हें सिर्फ डिग्री से मतलब होता है विषय से नहीं। एम.ए. की डिग्री मिल जाने से एल.टी. ग्रेड के शिक्षक को पी.जी. (प्रवक्ता) का वेतनमान मिलने लगता है। वैसे नियमित कक्षाएं कम ही चलती हैं। जिन्हें डिग्री की लालसा होती है वे ही प्रवेश लेते हैं और अमूमन सिर्फ परीक्षा देने आते हैं। जिस शिक्षक से मैने प्रश्न किया उनका भी एक उपन्यास कोर्स में लगा है जिसे इसी उद्देश्य से उन्होंने अंगिका में लिखा है मगर हैं वे हिन्दी के प्रोफेसर। वे रोटी तो हिन्दी की खाते हैं किन्तु अंगिका को संवैधानिक दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसके पीछे उनका यही स्वार्थ है। अंगिका के लोग अपने पड़ोसी मैथिली वालों पर आरोप लगाते हैं कि उन लोगों ने जिस साहित्य को अपना बताकर पेश किया है और संवैधानिक दर्जा हासिल किया है उसका बहुत सा हिस्सा वस्तुत: अंगिका का है। इस तरह पड़ोस की मैथिली ने उनके साथ धोखा किया है। यानी, बोलियों के आपसी अंतर्विरोध। अस्मिताओं की वकालत करने वालों के पास इसका क्या जवाब है ?

आलोक said...

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हिन्दुस्तान की कौन सी भाषा है जिसमें बोलियां नहीं हैं ? गुजराती में सौराष्ट्री, गामड़िया, खाकी, आदि, असमिया में क्षखा, मयांग आदि, ओड़िया में संभलपुरी, मुघलबंक्षी आदि, बंगला में बारिक, भटियारी, चिरमार, मलपहाड़िया, सामरिया, सराकी, सिरिपुरिया आदि, मराठी में गवड़ी, कसारगोड़, कोस्ती, नागपुरी, कुड़ाली आदि। इनमें तो कहीं भी अलग होने का आन्दोलन सुनायी नहीं दे रहा है। बंगला तक में नहीं, जहां अलग देश है। मैं बंगला में लिखना पढ़ना जानता हूं किन्तु ढाका की बंगला समझने में बड़ी असुविधा होती है।

आलोक said...

अस्मिताओं की राजनीति करने वाले कौन लोग हैं ? कुछ गिने –चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार। नेता जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए। उन्हें पता होता है कि किस तरह अपनी भाषा और संस्कृति की भावनाओं में बहाकर गाँव की सीधी-सादी जनता का मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है।

आलोक said...

इसी तरह भोजपुरी का अभिनेता रवि किसन यदि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संसद के सामने धरना देने की धमकी देता है तो उसका निहितार्थ समझ में आता है क्योकि, एक बार मान्यता मिल जाने के बाद उन जैसे कलाकारों और उनकी फिल्मों को सरकारी खजाने से भरपूर धन मिलने लगेगा। शत्रुघ्न सिन्हा ने लोकसभा में यह मांग उठाते हुए दलील दिया था कि इससे भोजपुरी फिल्मों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और वैधानिक दर्जा दिलाने में काफी मदद मिलेगी।
बोलियों को संवैधानिक मान्यता दिलाने में वे साहित्यकार सबसे आगे हैं जिन्हें हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा में पुरस्कृत और सम्मानित होने की उम्मीद टूट चुकी है। हमारे कुछ मित्र तो इन्हीं के बलपर हर साल दुनिया की सैर करते हैं और करोड़ो का वारा- न्यारा करते है। स्मरणीय है कि नागार्जुन को साहित्य अकादमी पुरस्कार उनकी मैथिनी कृति पर मिला था किसी हिन्दी कृति पर नहीं। बुनियादी सवाल यह है कि आम जनता को इससे क्या लाभ होगा ?

आलोक said...

एक ओर सैम पित्रोदा द्वारा प्रस्तावित ज्ञान आयोग की रिपोर्ट जिसमें इस देश के ऊपर के उच्च मध्य वर्ग को अंग्रेज बनाने की योजना है और दूसरी ओर गरीब गँवार जनता को उसी तरह कूप मंडूक बनाए रखने की साजिश। इस साजिश में कारपोरेट दुनिया की क्या और कितनी भूमिका है –यह शोध का विषय है। मुझे उम्मीद है कि निष्कर्ष चौंकाने वाले होंगे।
वस्तुत: साम्राज्यवाद की साजिश हिन्दी की शक्ति को खण्ड-खण्ड करने की है क्योकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिन्दी, दुनिया की सबसे बड़ी दूसरे नंबर की भाषा है। इस देश में अंग्रेजी के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिन्दी ही है। इसलिए हिन्दी को कमजोर करके इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता को, इस देश की रीढ़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है। अस्मिताओं की राजनीति के पीछे साम्राज्यवाद की यही साजिश है।
जो लोग बोलियो की वकालत करते हुए अस्मिताओं के उभार को जायज ठहरा रहे हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, खुद व्यवस्था से साँठ-गाँठ करके उसकी मलाई खा रहे हैं और अपने आस-पास की जनता को जाहिल और गंवार बनाए रखना चाहते हैं ताकि भविष्य में भी उनपर अपना वर्चस्व कायम रहे। जिस देश में खुद राजभाषा हिन्दी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो वहाँ भोजपुरी, राजस्थानी, और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देकर वे उन्हें क्या बनाना चाहते है ? जिस भोजपुरी, राजस्थानी या छत्तीसगढ़ी का कोई मानक रूप तक तय नहीं है, जिसके पास गद्य तक विकसित नहीं हो सका है उस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराकर उसमें मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई की उम्मीद करने के पीछे की धूर्त मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है।

आलोक said...

अगर बोलियों और उसके साहित्य को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उसके साहित्य को पाठ्यक्रमों में शामिल कीजिए, उनमें फिल्में बनाइए, उनका मानकीकरण कीजिए। उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिन्दी से अलग कर देना और उसके समानान्तर खड़ा कर देना तो उसे और हिन्दी, दोनो को कमजोर बनाना है और उन्हें आपस में लड़ाना है।

आलोक said...

अपने पड़ोसी नेपाल में सन् 2001 में जनगणना हुई थी। उसकी रिपोर्ट के अनुसार वहाँ अवधी बोलने वाले 2.47 प्रतिशत, थारू बोलने वाले 5.83 प्रतिशत, भोजपुरी बोलने वाले 7.53 प्रतिशत और सबसे अधिक मैथिली बोलने वाले 12.30 प्रतिशत हैं। वहाँ हिन्दी बोलने वालों की संख्या सिर्फ 1 लाख 5 हजार है। यानी, बाकी लोग हिन्दी जानते ही नहीं। मैने कई बार नेपाल की यात्रा की है। काठमांडू में भी सिर्फ हिन्दी जानने से काम चल जाएगा। नेपाल में एक करोड़ से अधिक सिर्फ मधेसी मूल के हैं। भारत से बाहर दक्षिण एशिया में सबसे अधिक हिन्दी फिल्में यदि कहीं देखी जाती हैं तो वह नेपाल है। ऐसी दशा में वहाँ हिन्दी भाषियों की संख्या को एक लाख पाँच हजार बताने से बढ़कर बेईमानी और क्या हो सकती है ? हिन्दी को टुकड़ो-टुकड़ों में बाँटकर जनगणना करायी गई और फिर अपने अनुकूल निष्कर्ष निकाल लिया गया।

आलोक said...

ठीक यही साजिश भारत में भी चल रही है। हिन्दी की सबसे बड़ी ताकत उसकी संख्या है। इस देश की आधी से अधिक आबादी हिन्दी बोलती है और यह संख्या बल बोलियों के नाते है। बोलियों की संख्या मिलकर ही हिन्दी की संख्या बनती है। यदि बोलियां आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं तो आने वाली जनगणना में मैथिली की तरह भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी आदि को अपनी मातृभाषा बताने वाले हिन्दी भाषी नहीं गिने जाएंगे और तब हिन्दी तो मातृ-भाषा बताने वाले गिनती के रह जाएंगे, हिन्दी की संख्या बल की ताकत स्वत: खत्म हो जाएगी और तब अंग्रेजी को भारत की राजभाषा बनाने के पक्षधर उठ खड़े होंगे और उनके पास उसके लिए अकाट्य वस्तुगत तर्क होंगे। ( अब तो हमारे देश के अनेक काले अंग्रेज बेशर्मी के साथ अंग्रेजी को भारतीय भाषा कहने भी लगे हैं।) उल्लेखनीय है कि सिर्फ संख्या-बल की ताकत पर ही हिन्दी, भारत की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है।

ritesh sinha said...

apka lekh hai vichitra
samajh na paye apka charitra
apki bhavna hai pavitra
par aap hain sabke mitra

samjhe vichitra charitra wale pavitra mitra.....kya kahen ab.

Dewnashu said...

Ravish Ji - Bahut badhiya vichaar hain aapke. Baat sahi hi to hai - chahe jis marji us suchi me shaamil kar len bhojpuri bhasha ko - kya jo fuharpan wali bhojpuri ki filme or gaane hain unke level me improvement aayega? Lagta to nahi - bhojpuri samaj ko jo log publicly represent karte hain (basically politicians and bhojpuri film actors) kya woh log apne level ko aur uncha utha payenge taki hum sabhi garv se kahe ki hum bhojpuria samaj se belong karten hain...

Just wish this happens sometime sooner or later:-)