गांधी परिवार का मीडिया परिवार

जब से प्रियंका गांधी वाड्रा उतरीं हैं मैदान में,तब से लग रहा है कि यूपी में बाकी नेता प्रचार ही नहीं कर रहे हैं। वैसे प्रियंका ने सिर्फ रायबरेली और अमेठी का जिम्मा संभाला है फिर भी ऐसे बताया जा रहा है जैसे वो पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचार कर रही हैं। दिन भर कैमरे पीछा करते है,लाइव दिखाते हैं,फोकस में प्रियंका ही रहती हैं। एक भी कैमरा पैन होकर,लेफ्ट-राइट होकर अमेठी या रायबरेली नहीं दिखाता। उनकी हर बात बल्कि वही बात बार बार दिखाई जा रही है। अब प्रियंका गांधी ने तो नहीं कहा होगा कि आइये हमारे पीछे-पीछे चलिये। मीडिया खुद ही दरी बिछाकर लेटने के लिए तैयार है तो क्या किया जा सकता है। प्रियंका की राजनीतिक अहमियत तो समझ आती है मगर रॉबर्ट वाड्रा को भी कवरेज की कमी महसूस नहीं हुई होगी। राबर्ट वाड्रा पर मीडिया टूट और टूटा पड़ा रहा।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच प्रियंका गांधी एक ख़बर ज़रूर हैं। लेकिन जब यह ज़रूरत निष्ठा में घुलने मिलने लगती है तब समस्या होती है। समस्या उन चिरकुट पत्रकारों को ही होती है जो सत्ता के साथ चुपचाप तालमेल बिठाकर नहीं रहना जानते। अगर आप टीवी पर कवरेज का प्रतिशत निकालें तो प्रियंका के आने के बाद से यह संतुलन गांधी परिवार के पक्ष में ही बैठता है। जितना राहुल को दिखाया जाता है उतना अखिलेश या मायावती को नहीं। मुलायम तो शायद ही कभी-कभी। अजित सिंह भी नज़र नहीं आते। अब इसके लिए गांधी परिवार को क्यों दोष दें? उन्होंने कोई सर्कुलर तो जारी नहीं किया होगा कि अरे भाई आओ,हमीं को दिखाओ। मीडिया सचमुच इस परिवार की सत्ता को सह्रदय स्वीकार करता है। इसलिए नहीं कि बाइट या इंटरव्यू मिलेगा। वो भी किसी को नहीं मिला है। एक्सक्लूसिव तो किसी को नहीं मिला। प्रियंका ने तो झुंड के बीच एकाध बाइट दे भी दिये हैं मगर राहुल गांधी तो हमेशा लांग शाट में ही नज़र आते हैं। इन दोनों में राबर्ट वाड्रा ही मीडिया चतुर निकले। कैमरे और माइक के बीच सहज नज़र आए। आराम से बात करते रहे। उन्हें राजनीति का यह रूट शायद पसंद हो। मगर राहुल गांधी तो बिल्कुल कैमरे वाला रूट पसंद नहीं करते। उन्हें मालूम है कि ये पीछे पीछे आयेंगे ही तो क्यों बुलायें। राहुल बुलाते भी हैं तो एक कमरे में मीडिया को बिठाकर बात करते हैं। खुलकर बात करते हैं। मगर यह भी कह देते हैं कि आपके लिए है,रिपोर्ट करने के लिए नहीं। वहां कैमरे और रिकार्डर नहीं होते हैं। यह अपने आप में मीडिया पर गंभीर टिप्पणी है। राहुल को भरोसा नहीं कि इस तरह की बातचीत को भाई लोग ज़रूरत से अधिक निष्ठा में कुछ का कुछ न बना कर परोस दें। बहुत अजीब लगता है कि जब किसी तिराहे पर ओबी वैन लगे हों और मीडिया प्रियंका के आने का इंतज़ार कर रही हो। वो वहां पांच सौ हज़ार लोगों से मिलकर चली जाती हैं। कैमरा दूसरे लोकेशन पर पहुंचने के लिए सामान समेटने लगता है।

मीडिया के लिए राहुल या प्रियंका को फॉलो करना ग़लत नहीं है। राजनीति के विद्यार्थी और पत्रकार के नाते मैं भी यही करता। लेकिन क्या सारा कैमरा इन पर ही रहेगा? जबकि खुद प्रियंका कह रही हैं कि रायबरेली और अमेठी का चुने हुए विधायकों ने विकास नहीं किया। तब भी कैमरे और रिपोर्टर इसे स्टोरी नहीं समझते। वो एक सस्ता काम करते हैं। दावे के साथ कह सकता हूं एक राजनेता के तौर पर राहुल गांधी जितनी मेहनत करते हैं वो खुद समझ जाते होंगे ऐसी मीडिया को देखकर। सवाल राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी के कवरेज में संतुलन का है। बाकी नेताओं के साथ ग़ैर गांधी परिवार या ग़ैर करिश्माई व्यवहार नहीं होना चाहिए। ऐसा करने वाले पत्रकार राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कम चाटुकारिता की तलाश वाले ज्यादा लगते हैं।


एक दिन यही राहुल गांधी कह देंगे कि मीडिया अपना काम ठीक से नहीं करता। उसे नेता की नहीं जनता की रिपोर्टिंग करनी चाहिए। देश की हालत दिखानी चाहिए। मीडिया नहीं दिखाता इसलिए उन्हें लोगों के घरों में जाना पड़ता है। क्यों नहीं मीडिया को अखिलेश,मायावती,अजित सिंह में करिश्मा नज़र आता है? क्या ये तीनों बिना करिश्मा के ही राजनीति में डटे हुए हैं? पत्रकारों से समझदार तो राहुल गांधी निकले जो मायावती और कांशीराम की तारीफ कर दी। शायद राहुल गांधी ने कांशीराम से ही सीखा हो कि गंभीर राजनीति करनी है तो ऐसी हल्की और बेपेंदी की मीडिया के भरोसे मत रहो। ज़मीन पर जाओ। धक्के खाओ। इंटरव्यू के चक्कर में मत पड़ो। चार संपादकों के चक्कर में पड़े रहने से अच्छा राहुल को लगता होगा कि बनारस के किसी रेस्त्रां या चाय की दुकान में चाय पी ली जाए। कम से कम उसके आस पास के लोग बात तो करेंगे कि यहां नेता जी आए थे। रही बात मीडिया की तो उन्हें मोबाइल में रिकार्ड कर फुटेज दे दो। एक्सक्लूसिव बनाकर दिखा देंगे। इतना वक्त और संसाधन लगाने के बाद भी एक भी जगह पर राहुल या प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति की बारीकियों को समझाने वाली रिपोर्ट नहीं दिखी। वो भी शाम को टीवी खोल कर बंद कर देते होंगे कि इतना घूमा मगर ये भाई लोग सिर्फ हमारे आकर्षण में ही खोए रहे।

इसीलिए टीवी के ज़रिये आपको चुनावों की समझ कभी नहीं मिलेगी। आपको कई चैनल और अखबार ढूंढने होंगे तब जाकर पांच से दस प्रतिशत की ही जानकारी मिलेगी। बाकी जो हो रहा है वो कैमरों के बाहर हो रहा है। प्रधानमंत्री कब बनेंगे और राजनीति में कब आयेंगे, पूछने के लिए यही दो सवाल हैं इनके पास। हद है। क्या प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में नहीं है? नहीं होतीं तो वो पिछले कई बार से चुनाव प्रचार का काम क्यों संभाल रही होतीं? क्या राहुल गांधी बता देंगे कि जी मैं परसों प्रधानमंत्री बनूंगा? वो लालू यादव नहीं हैं कि यह कह दें कि मैं बनना चाहता हूं। अफसोस यही है कि ये सारे चाटुकारिता करके भी राहुल गांधी के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। हर नेता चाहता है कि पत्रकार उसकी राजनीति को गंभीरता से ले। मीडिया के लिए राहुल गांधी बाइट प्रवक्ता बन कर रह गए हैं। रिपोर्टिंग की लाश पड़ी है। हम सब कुचल कर चले जा रहे हैं।

22 comments:

gulshan said...

bilkul aaj kal sab se jiyada gandhi family hee dikhti hai tv per.baki bechare to aise lagte hai chunav parchar mein hai hee nahi.aaj rahul ne dalit ke ghar khana khaya.priyanka mein indira gandhi dikhti hai.jo famous hai woh hee bikta hai sab usko dekhna chahte hai.

Garg L K said...

रविश भाई
गाँधी परिवार को सिर्फ गाँधी नहीं, नेहरु गाँधी कहियेगा तो सही होगा..
मीडिया को भी स्टार प्रचारक कवर नहीं करने है उन्हें तो टी आर पी की खातिर स्टार को कवर करना हे ..... मुलायम, मायावती, अजित सिंह इत्यादि को स्टार तो नहीं, विलेन जरूर कह सकते हैं. राहुल चुनाव रैली में कम , बल्कि परदे के ऊपर सवांद बोलते जरूर प्रतीत होते हैं..

डॉ .अनुराग said...

यू पी में लोगो के पास विकल्पहीनता की स्थति आ गयी है . महत्वपूर्ण ओर आवश्यक मुद्दे जैसे विकास ,बिजली ,सड़के ,भर्ष्टाचार ओर स्वास्थ्य पीछे चले गए है ओर सभी राजनैतिक दल इतने अधिक असहनशील हो गए है के जनता का विरोध भी बर्दाश्त नहीं कर प् रहे है तभी सपा के एक नेता विरोध करने वाले पर हाथ उठा देते है . राहुल गांधी की सभा में काले झंडे उठाने वाले पिटते है ,गिराफ्तार होते है . क्या लोकतंत्र में असहमतिया बिलकुल ख़त्म हो गयी है . ? कोई राजनैतिक पार्टी गंभीर नहीं है . सभी यू पी की जनता को जाति ओर धर्म के उसी दलदल में घसीट कर चीजों को ओर जटिल बना रहे है . मीडिया के पास भी गांधी परिवार से पूछने वाले प्रशन निहायत ही फूहड़ ओर गैर जरूरी होते है . लोकपाल, टू जी या बिजली पर प्रशन नहीं होते प्रियंका ज्वाइन करेगी या नहीं उस पर होते है .

Abhay said...

गौतम को तथाकथित गांधियों ने, महात्मा के शान्ति के घूंट से भारत के जन मानस को अपना पिट्ठू बनाया हुआ है. मेरे कथन कडवे हो सकते हैं आप के शालीन जेहन को कड़वा कर सकते हैं..आप मेरे इस बयां को हटा भी सकते हैं लेकिन...लेकिन ये सच है कि...भारत १०० जनतांत्रिक गणतंत्र नहीं है...राजा-महाराजाओं और रसूखदारों के सांथ-साथ तथाकतिथ पिछड़े, बहुजन और समाजवादी नेताओं ने भी अपने बक्से भरे हैं और सिर्फ राजनीती कि है न कि लोकनीति.

६२ साल में भी अगर आप के पैर लड़खड़ाते रहते हैं तो मानिये और समझिये कि, आप चलाना नहीं सिख रहे हैं बल्कि, अपाहिज हुए जा रहे हैं, "आपहिज हुए जाना" मतलब गलतियाँ तो करना मगर सीखना कुछ नहीं...याद रखिये किसी ने कहा है कि "एक पूरी जिंदगी, सारी गलतियाँ करने के लिए भी कम है, इसलिए दुसरे कि गलतियों से भी सीखो और जीवन में सफल बनो".

मीडिया को टी आर पी पसंद है, और किसी भी भी कीमत पर ख़बरों कि जंग है....जंग...ओह ... शायद अब ज्यादातर मीडिया में भी बुद्दिजीवियों कि जगहं व्यापारियों ने ले ली है.

लेकिन भूलता नहीं मैं और मेरी आत्मा जयादा दिन गुलाम नहीं रह सकती...आजादी सोच कि...आनी है!!

कृपया इस टिप्पड़ी को हतैयेगा नहीं बाकि आपका विशेषाधिकार...इसी प्रार्थना के सांथ.....इति समर्पयामि.

lokendra singh rajput said...

रवीस सर, कहा तो यह भी जाता है कि कांग्रेस खासकर सानिया गांधी ने मीडिया को मैनेज करने के लिए अच्छा खासा पैसा निवेश किया है। हो सकता है इसीलिए मीडिया गांधी परिवार को ही फोकस करती है। यह तो सच है उत्तर प्रदेश के चुनावों मेें गांधी परिवार को जितना फोकस किया जा रहा है उतना किसी भी विपक्षी दल को नहीं।

waliasaab said...

aap twiter pe se kyo gayab ho gye

nptHeer said...

Jaise aapko 'follower' nahi jachta vaise hi mujhe yah 'comment' nahi jachta.lagta hai jaise kaabeliyat ki tohin karne jama hue hai sab,aur daya dikhake taarif kar rahe hai sab.i mean-achhchha nahi lagta 'laaykaat' na hone par bhi 'layak' pe 'comment' deneki laaykaat.ab yahan TRP ka bahana nahi hai:)

nptHeer said...

Jaise aapko 'follower' nahi jachta vaise hi mujhe yah 'comment' nahi jachta.lagta hai jaise kaabeliyat ki tohin karne jama hue hai sab,aur daya dikhake taarif kar rahe hai sab.i mean-achhchha nahi lagta 'laaykaat' na hone par bhi 'layak' pe 'comment' deneki laaykaat.ab yahan TRP ka bahana nahi hai:)

JC said...

मीडिया में कौन हैं??? क्या वो सब हमारे समान, आभासी दुनिया में विचरने वाले अनंत व्यक्तियों में से ही, 'आम आदमी' नहीं हैं??? जो ख़ास दिखने का नाटक कर रहे हैं - ख़ास दिखने वालों के पिछलग्गू बन???
पतंग उतनी ही ऊंची उड़ेगी जितना धागा पास में हो और मांजा भी तेज़ हो - औरों के मांजे से बेहतर... और पेच लड़ाने का भी उत्तम अभ्यास हो...

ankit said...

log hi pagal hai jo unhe(gandhi)sir per bithai hai. raibaraily or amethi ko is parivar ne bahut bavkuf banaya hai. apna gora rang dikha ke.chunav me logo ke sath media wale bhi bavkuf bante hai. pr wo unke fayede me hota hai..

Ojaswi Kaushal said...

Hi I really liked your blog.

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Kofta said...

Stithti mein sudhaar lagtee hai ya lagtaa hai , Ravish ji?
wrt to the Primetime anchoring tonight.

nptHeer said...

I read all blogs from 28jan upto today.again.thought.somthn missin.actualy i have two opposite political fevours in my home since my childhood.my nanaji strictly followed gandhiji.nd dadaji jansangh.i saw 'aatish baazi' nd 'bharat milap'after each nd every discussion of them.today both of them not among us.but what i observed is i never like 'neeti' of congress,and i never like 'out spoken style' of sangh.nd 'kora samajvaad' i dont think is a solution ever for my country,bharat.i dont know who is that'yuvraj:)' of 'bharat mata' who can remove this 'kumbhipaak'of bharat maata.atleast i dont see that yuvraj/yuvragni in rahul-priyanka-varun gandhi.thats why my hope becomes very powerful.actualy i am waiting for 'Harishen' wisest 'mantri' of vaishali.bcz any indian should not see hind raajniti:) without pakistan...yaaa:)

Sid_vardhan said...

Siddhant aur vyavhar....aur iss peshe ki majburiyan/swaarth sidhi/ vyaktigat aakanshayen. Humse behtar aap jaante hn.

nptHeer said...

Ravishji,jo mahan ho jaate hai unka boot(jute nahi.hasna mat)banta hai.boot banke khud mahan nahi hua karte...vaju kotak ka ek lekh yaad aa gaya-"jungle k in pedon ko dekh kar mera insan hona yaad aa gaya.sab ped dharti k niche apne mool ki jaali banaye dur nadi kinare se poshan pa rahe hai.upar sab patte sakhen bhi ek jaalidar rachna banake suraj ko pravesh ka nishedh kiye hue hai.lekin jub maine badhai dene gaya to sab akele the apne apne thal se.bilkul saamaajik."aapki sadhna meri samjh se bahar hai.aur usmain contribution bhi.fir bhi.all the best:) (vaise itni hi fi hindi yahanpe padhni padti:) hai ki mujhe unpahon sa feel hota hai.ek line main char bar dictionary dekhi hai:( haha:)

nptHeer said...

Vaise saddam husain,gaddafi,bush,stalin,zendeng k boot itne handsome the kya?log apni mahanta unhe arpan kar rahe the.yaaaaa i know u dont know:) i should ask K khan,isn't it?:)

kahani said...

कभी पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने कहा था कि मीडिया क्या दिखा रहा है और क्या लिख रहा है..और कारण क्या है लिखने का ये शायद समझ से परे है...उनके लिए भी जो लिखते हैं और उनके लिए भी जो पढ़ते या देखते हैं...बात सोनिया , प्रियंका या राहुल का नहीं...और ना ही टीआरपी का ...जनता को रविश की रिपोर्ट देखनी है या सास बहु साजिश ये उनके जनाधार की बात है...रोज खुलते और बंद होती मीडिया की दुकान में एक्के दुक्के लोगों के अलावा कुछ बचा भी नहीं है...हेडअॉफिस में कोढ़ी काया को कैंसरयुक्त बनाने से अच्छा है...राहुल और प्रियंका के पीछे हो लिया जाए...वैसे वरिष्ठतम पत्रकारों ने तो सवाल पूछने से ज्यादा सलाहकार बनना ज्यादा पसंद किया है....उदाहरण के लिए यहां नाम देना उचित नहीं है...भईया जी आप मान क्यूं नहीं लेते कि हमारे संपादक कोई पत्रकारिता या राजनिति के डिग्रीधारी नहीं बल्कि सरकार है...क्यूंकि बिहार में तो सत्ताधारी ही हेडलाइन तय करते हैं..और ये सच्चाई आपसे भी छुपी नहीं है...

Mahendra Singh said...

Dr. Anurag se puri sahmati hai. Kuch kahni ko bacha nahi hai. Sab ka Sab"Pipli Live".

VINAY BHARAT said...

मैं रवीश जी से सहमत हूँ. गाँधी परिवार के प्रति मीडिया का अति - आकर्षण ठीक नहीं.पर ये समस्या क्यों है? इस प्रशन का उत्तर जरा कठिन है.मैं एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ..शायद मीडिया और मीडिया के मार्फ़त इस देश को अभी भी एक देनेस्टी कि तलाश है..
और फिर भारतीय राजनीति में वंशवाद नया नहीं है . 1928 में स्व. पंडित मोती लाल नेहरु ने आईएनसी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इसका बिगुल फूंका था. भारतीय राजनीति में युवा भागीदारी को बढ़ावा देने के नाम पर अपने पुत्र पंडित जवाहरलाल नेहरु को कांग्रेस का अध्यक्ष पद दिलाने के लिए 1929 में पुरजोर लॉबींग की थी. तब से लेकर आज तक कांग्रेस नेहरु परिवार के साये से बहार नहीं निकल पाई है. आज भी हम कभी राहुल तो कभी प्रियंका पर नेतृत्व थोपने की कोशिश करते हैं. पहले इंदिरा और फिर राजीव की शहादत को लेकर कांग्रेस राहुल और प्रियंका को लेकर भावुक है. पर इस भावुकता की आंच में कई ओजस्वी युवा नेत...ा (जिनके पास न ही राजनीतिक विरसत है और न ही राजनीतिक कद बड़ा है ) आगे आने से पहले ही कुम्हला जा रहे हैं. इस वंशवाद और परिवारवाद को जिन्दा रखने में जनता भी कम जिम्मेदार नहीं है. जनता जनार्दन है, पर आजादी के बाद भी हम राजे-रजवाडों का सरमाया ढूंढते हैं. सच तो यह है की भारत की अधिकांश आबादी खास कर मैदानी हिस्सा आज भी, सामंतशाही में यकीं रखता है. यहाँ के गरीब किसानों का भी मनोविज्ञान यह है कि वे भी अपने बेटे को वैज्ञानिक , शिक्षाविद आदि बनाने का बजाए लाल बत्ती वाला नौकरशाह बनाने कि चाहत रखते हैं. ये रथ पर सवार होने कि चाहत, रथवाले के प्रति हमारी अनकही भक्ति और श्रद्धा को दिखाती है. आधुनिक प्रजातंत्र का राजदरबार संसद है और इसमें बैठनेवाले सांसद हमारे सामंती सोच के प्रतिनिधि हैं. इतिहास गवाह है, हमारे जिन प्रतिनिधियों ने शाही अंदाज को छोड़ आम जन कि तरह जीने कि कोशिश की, उनका परिवार आज इतिहास के हाशिए पर भी नहीं टिकता.आज डॉ. राजेंद्र प्रसाद लाल बहादुर शास्त्री (अनिल शास्त्री तक तो कुछ ज्ञात भी है), डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे दिग्गज नेताओं कि पीढ़ियों कि जानकारी हमारे पास नहीं है. यहाँ तक कि बापू , जिन्होंने वंशवाद और परिवारवाद को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया, उनके परिवार में एक-दो शख्शियातों को छोड़, बाकी सब गुमनाम ज़िंदगी जी रहे हैं. युवा नेतृत्व के नाम पर आज हम उन सांसदों और मंत्री-पुत्रों से बाहर झाँकने कि कोशिश तक नहीं कर रहे. पार्टियां फैमिली ब्रांड नेम कि पैकेजिंग कर रही हैं और टिकट बाँट रहीं हैं. आम कार्यकर्ता के पास न तो बाहुबल है और न ही पहुँच. राहुल के हरिजन परिवार में एक रात बिताने कि खबर को वित्तीय संकट में डूब रहे सेंसेक्स से ज्यादा तरजीह दी जाती है. यदि कोई दूसरा नेता,भले वो मनमोहन ही क्यों न हों, अगर किसी हरिजन बस्ती का दौरा करें, तो वो चुनावी स्टंट है और अगर राहुल करें तो हम राजीव के रूह को तलाशने कि सूफियाना कोशिश करते हैं. सच तो यह है कि नेहरु सिंड्रोम आज पूरे भारतीय राजनीति में मास हिस्टीरिया का शक्ल अख्तियार कर रहा है.

JC said...

JC said...
@ VINAY BHARAT ने अच्छा प्रयास किया है - नाक को सीधे न पकड़, हाथ को गर्दन के पीछे मोड़, पकड़ने के प्रयास में... अर्थात कृष्ण को अर्जुन के रथ चालक समान परम सत्य निराकार योगेश्वर चतुर्भुज विष्णु और साकार शिव (पृथ्वी का सार 'तीसरे नेत्र' पर) और उनके परिवार के अन्य सदस्य, माता पार्वती (मस्तक पर चन्द्रमा का सार), भौतिक विकास के लिए उनके ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय (पार्वती के 'स्कंध', अर्थात राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य, यानी शुक्र ग्रह, जिसका सार गले/ गर्दन में है, अर्थात हाथों के बीच),,, और उनके आध्यात्मिक विकास के लिए छोटे बेटे, पशु जगत में अपनी सर्वश्रेष्ठ स्मरण शक्ति वाले, हाथी के समान सर वाले गणेश (मंगल ग्रह, जिसका सार मूलाधार में अवस्थित है, यानी टांगों के बीच में)...
जय माता की!

February 9, 2012 11:20 AM

Amita said...

ahhh...finally i got a way out to go through the writing pieces of my favourite anchor,journalist and what not.Gone through the long way and finally searched the best blogs in india, on net and here i got a chance to connect with one and only Ravish sir...i'm sorry that i'm writing this personal comment to you and that to not a formal one...but this is just an excitement of getting connected with you and adding myself in your fan list AND MAKING YOU KNOW THAT I love all your works and soon i will be going through all posts on this blog as this is my first visit and ya lots of wishes for doing such a job like "Ravish ki REPORT"...I LOVE IT A LOT...and i'm on cloud nine right now as i went to NDTV'S office(delhi) few weeks before (with a hope that may be i can meet you there but all in vain).....but finally this "one" search on google...i got what i wanted.....sir you are marvellous and awesome.I hope you will definitely read this comment in the same way as you go through the other comments on your blog...i would have expressed a lot in this comment but i think i should spare this "small space" from my long comment..just awaiting when this mail will peep from your mailbox and you will take a bit of pain to read it....

Amita
(http://amita-sia.blogspot.com)