आंदोलन चालू आहे

क्या आप भी अण्णा के आंदोलन का समर्थन करते-करते कई तरह के सवाल करने लगते हैं, या विरोध करते-करते तमाम सवालों की खोज करने लगते हैं। अगर ऐसा है तो आप उन लोगों में से हैं जिनकी बौद्धिकता को इस आंदोलन ने हिला कर रख दिया है। पांच अप्रैल को जबसे अण्णा का अनशन शुरू हुआ है तब से इस आंदोलन के तमाम पक्षों पर लगातार लिखा और बोला जा रहा है। देश की समस्याओं से जुड़े तमाम सवाल इस आंदोलन में ठेले जा रहे हैं जो कि चिन्ता के कई स्तरों पर जायज़ भी हैं। संभावनाओं की खोज करने वाली तमाम दलीलों को देखें तो आप उत्साहित हो जायेंगे। अकेले दैनिक भास्कर में ही अण्णा के आंदोलन पर छपे तमाम लेखों की एक किताब छाप दी जाए तो कई सौ पन्नों की हो जाएगी।


मेरी नज़र में अण्णा के आंदोलन का यह सबसे बड़ा योगदान है। लोग हर सवाल पर बहस कर रहे हैं।मेरे टीवी शो में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कह दिया कि इस आंदोलन में दलित नहीं हैं। सवर्णवादी आंदोलन है। प्राइम टाइम से बाहर आते ही तमाम दलित अफसरों के फोन आने लगे और कहने लगे कि चंद्रभान हमें मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्रभान अपनी बात पर डटे रहे। मशहूर विद्वान आशीष नंदी ने तड़ से कहा कि मध्यमवर्ग का चरित्र बदल गया है। यह वो सत्तर के दशक वाला मध्यमवर्ग नहीं है जिसमें नब्बे फीसदी सवर्ण थे। आज के मध्यमवर्ग में पचास फीसदी दूसरी जाति समाज के भी लोग हैं। फिर यह सवाल उठा कि इसमें मुसलमान नहीं हैं। रविवार को जब दिल्ली के सीलमपुर और शाहदरा इलाके से गुज़र रहा था तब एक-एक गाड़ी में कई मुस्लिम युवा भरे हुए थे और हाथों में तिरंगा लेकर रामलीला की तरफ रवाना हो रहे थे। आयोजकों से बात की कि क्या आपके यहां दलित और मुस्लिम युवा सक्रिय नहीं हैं तो उन्होंने कई लोगों को सामने कर दिया। संतोष एक दलित लड़की थी जो छत्रसाल स्टेडियम में टीम अण्णा की तरफ से मोर्चा संभाले हुए थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि दलित की पहचान कर सवाल किया गया। उसने कहा कि कई दलित युवा इस आंदोलन में शामिल हैं। फिर भी चंद्रभान के इस सवाल के साहस को मानना होगा जिसने इस आंदोलन को संविधान बदलने या लिखने की कोशिश में देखा और दलित राजनीति से जुड़े सवालों के संदर्भ में।

लेकिन क्या यह बेचैनी इसलिए भी नहीं कि इसके मंच पर दलित या मुस्लिम राजनीति के नेतृत्व के जाने-पहचाने चेहरे नहीं हैं। नेताओं के वो जाने-पहचाने समर्थक नहीं हैं जो उनके एक इशारे पर भारत की धार्मिक विभिन्नता का प्रदर्शन करते हुए मंच पर आ जाते थे। जैसे ही इस सवाल से गुज़र रहा था तो अंग्रेजी के अख़बार के एक ख़बर पर नज़र गई कि आधी रात के बाद रामलीला मैदान में आरक्षण विरोधी नारे भी लग रहे थे। संघ के समर्थन की ख़बरें छप रही हैं। जबकि अण्णा कह रहे हैं कि एक पार्टी जायेगी तो जो दूसरी आएगी वो भी भ्रष्टाचार में पीएचडी होगी। इसके बाद भी ऐसे तत्वों का आंदोलन में घुसना पुराने सवालों की गुज़ाइश की जगह बना ही देता है। वैसे आप देश भर से आ रही तस्वीरों को देखें तो उसमें काफी विविधता है। शायद इसीलिए हमें इस आंदोलन पर तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तमाम सवालों और संभावनाओं के साथ लगातार नज़र रखनी चाहिए।

मध्यमवर्ग की बुनावट पर बहस होते होते इसके गांधीवादी चरित्र पर बात पहुंचती है तो आज़ादी के आंदोलन से जुड़े बहुत सारे किस्से और आख्यान मुख्यधारा की मीडिया से होते हुए जनमानस में पहुंचने लगते हैं। गांधी टोपी कैसे अण्णा टोपी का रूप धर कर यह बता रही है कि आज के समय में गांधी के प्रतीकों का नवीनीकरण भी हो सकता है। कुछ साल पहले आई जब फिल्म मुन्ना भाई आई तो उसके आस-पास के समय में मुन्ना भाई की गांधीगीरी को लोगों ने अपना लिया था। अब वे अण्णा की गांधीगीरी अपना रहे हैं। गांधी अब सिर्फ खादी वालों की बपौती नहीं हैं। रैली में आए लाखों लोगों ने अहिंसक तरीका अपना कर साबित कर दिया। लेकिन इस अहिंसा में अनशन की ज़िद पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। आजकल के अखबारों में आप देखिये। अनशन की ज़िद पर खूब लेख मिलेंगे। ये लोग तब नहीं लिख रहे थे जब सरकार नौ अप्रैल के बाद बनी ड्राफ्ट कमेटी की बैठकों में इस टीम की साख को कमतर करने में जुटी थी। जब सत्ता अपने अहंकार में टीम अण्णा को पांच लोगों की टीम समझ रही थी। कहां तो सरकार इस पूरे मामलों को लोकतांत्रिक बनाती और विपक्ष सहित अरुणा रॉय के लोकपाल ड्राफ्ट को भी केंद्र में ले आती। लेकिन उनकी टीम के सदस्य निखिल डे ने बताया कि ड्राफ्ट कमेटी को लिखने के बाद भी बुलावा नहीं आया। तब सरकार को सहनशीलता के पाठ पढ़ाने वाले लेख नहीं लिखे जा रहे थे। फिर भी यह सवाल वाजिब है कि इस तरह की ज़िद पर अड़ा आंदोलन आगे आने वाले समय में किस तरह की राजनीति की बुनियाद रखने वाला है।

इसमें एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसमें बड़ी संख्या में सरकारी अफसरों को उद्वेलित कर दिया है। वो भी भ्रष्टाचार के सवाल से टकरा रहे हैं। नेताओं की ही नहीं अफसरों की भी साख दांव पर हैं। ऐसा माहौल बना है जिसमें उन्हें वाकई सार्वजनिक या पारिवारिक जीवन में जाने पर सवालों का सामना करना पड़ता होगा। कई अफसर एसएमएस कर रहे हैं कि उस भ्रष्टाचार का क्या होगा जो पैंतीस करोड़ की कोठियों में रहता है मगर एक्साईज़ से लेकर इंकम टैक्स नहीं देता। क्या हम सभी चोर हैं? इसीलिए लगता है कि यह आंदोलन सामाजिक जीवन में भी भ्रष्ट लोगों के प्रति सहनशीलता को काफी कम करेगा। दीर्घकालिक रूप से न सही मगर अस्थायी कमी भी एक सकारात्मक माहौल तो पैदा करेगे ही। वर्ना मैंने भी देखा है कि मिडिल क्लास के लोग आराम से भ्रष्ट अफसर रिश्तेदारों की महंगी शादियों में शिरकत करते हैं।

जिस समाज को हम उदारीकरण के जश्न भरे माहौल में व्यक्तिवादी का तमगा पहनाकर लानतें भेज चुके थें, वो अचानक कैसे सामूहिक हो गई है। उसे क्यों यह सपना आ रहा है कि भारत को कैसा होना चाहिए। जो उदारीकरण की संताने भारत महान के झंडे को लेकर विदेशों में गईं हैं वो भी भारत महान की इस सबसे बड़ी बीमारी के खिलाफ सड़कों पर उतरी है। वही लोग जो कल तक यह कहा करते थे कि मीडिया में नकारात्मक ख़बरें दिखाने से विदेशों में भारत की छवि ख़राब होती है,आज वही लोग विदेशों में अण्णा के समर्थन में झंडा लेकर निकले हैं।

हम किसी आंदोलन को मिडिल क्लास बताकर खारिज नहीं कर सकते। हाल के दिनों में मुख्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता कार्यकर्ता ढूंढ रहे थे। नए कार्यकर्ताओं की खोज में उनका लंबा वक्त भी गुज़रा है। आखिर ये कौन लोग हैं जो बिना किसी एक राजनीतिक नेतृत्व के इतने बड़े आंदोलन को संचालित कर रहे हैं। जब भी मिडिल क्लास का जनउभार सामने आया है यही कहा गया है कि यह भीड़ आज आई है, कल खो जाएगी। मुंबई धमाके के बाद लाखों लोगों की भीड़ आतंक के खिलाफ उमड़ पड़ी थी। वो गुम हो गई। उससे पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर ऐसी ही कई भीड़ आकर चली गई। मगर यह समझना चाहिए कि ये वो भीड़ है जो बार-बार आ रही है। अप्रैल में भी आई थी और अगस्त में भी आ रही है। सिर्फ इस बात से निश्चिंत होने की ज़रूरत नहीं कि ये लोग जल्दी लौट कर गुम हो जाएंगे। तब क्या करेंगे जब फिर आ जाएंगे।
(इसका संपादित अंश आज दैनिक भास्कर में छपा है, भास्कर से साभार)

19 comments:

ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay) said...

रवीश जी अच्छा लिखा है, आपका रवैया बिलकुल ठीक और संतुलित है. आन्दोलन को कमजोर करने की कोशिशें वो लोग कर रहे हैं जिनको इससे नुकसान की आशंका है. यह आन्दोलन हमारे समाज में तर्क के लिए जगह बढ़ा सकता है. मैंने इस पर अपने ब्लॉग पर लिखा भी है. जरूर देखिये
http://gyanghar.blogspot.com/

यादें said...

इस "आंदोलन" की सफलता के लिए हम सब को हम सब की शुभकामनायें !

अनुपम दीक्षित said...

http://duniyan.blogspot.com/2011/08/blog-post_19.html पढ़ें मेरे लेख को

rajanikant mishra said...

१. फुर्सत के क्षणों में भ्रष्टाचार पर चिंता ज़ाहिर कर इतिश्री कर लेने वाली शहरी मध्यमवर्गीय ज़नता भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने को सड़क पर उतरी... क्या देश के लोकशाही के लिए यह अच्छा लक्षण नहीं है ?

२. अभी तक देश और समाज के प्रति निरपेक्ष बने रहने के कारण उचित ही आलोचना का पात्र रहा शिक्षित युवा डिस्को,पब,इंटरनेट - मोबाईल चैट से परे सामाजिक और अनिवार्यतः शासन के मुद्दे पर अपनी राय बना रहा है.. बहस कर रहा है...प्रदर्शन कर रहा है.. देश की जनतांत्रिक प्रणाली के लिए क्या यह शुभ संकेत नहीं ?

३. चुनाव के चुनाव प्रतिनिधियों का चेहरा देखने वाली जनता आज अपने सांसद से सवाल कर रही है.. अपनी बात समझा रही है.. अपनी मांगे रख रही है.. केवल निजी फायदे के लिए एम्.पी, एम्.एल.ए. से पास जाने वाला आम आदमी से लेकर कभी भी उनके पास न जाने वाले बुद्धिजीवी तबका अपने सांसद से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा और प्रभावी कानून मांग रहा है. विधायिका सदस्यों से कार्यपालिका के कामों जैसे की सड़क या हैण्ड पम्प की मांग से परे कानून बनाने को जिम्मेदार लोगों से कानून की मांग करना क्या संसदीय लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचायक नहीं है ?

४. आपको याद है पिछली बार कब कोई आन्दोलन बिना बस के सीसे चकनाचूर किए संचालित हुआ था ? स्व संयम और अहिंसा का जो पाठ यह देश इस आन्दोलन में पढ़ रहा है, क्या वह भावी किसी भी आन्दोलन का आदर्श नहीं होना चाहिए ? जब सब मान बैठे हों कि बहरी सरकारें केवल तोड़ फोड़, आगजनी या बम्ब बारूद कि भाषा समझती हों तब एक आन्दोलन निष्ठां, मेहनत सांगठनिक कौशल और आहिंसा के रास्ते सरकार को पानी पिला देता है. अन्य आवश्यक मुद्दों पर संघर्ष करने वाले समूहों और व्यक्तिओं के लिए क्या यह नज़ीर नहीं है ? यह आन्दोलन क्या अपनी प्रबंधकीय क्षमता और आदर्शों के अद्भुत मेल के लिए अकादमिक संसथानों में पढाये जाने योग्य नहीं है?

५. भ्रष्टाचार के खिलाफ और लोकपाल के समर्थन में चलने वाले आन्दोलन को मिला जन समर्थन दलितों , आदिवासियों और अन्य वंचितों को लेकर चलने वाले आन्दोलनों को कमज़ोर तो नहीं करता..बल्कि उनकी सफलता का भी दरवाज़ा खोलने की कोसिस ही करता है.. क्या यह महज़ इर्ष्या है या कई सम्माननीय लोग सतासीन दल के हांथो में खेल रहे है?

५. यह सही है की केवल कानून कुछ नहीं कर सकता है.. समाज जैसा होता है सरकार वैसी ही होती है.. पर व्यवस्था में सुधार संभव है या देश के हर नागरिक को पूर्ण रूप से नैतिक बना देना. और क्या समाज के पूरी तरह से नैतिक होने के इंतज़ार में हम बैठे रह सकते हैं ? और क्या यह नैतिक समाज का यूटोपिया राज्य की 'आधुनिक' व्यवस्था को खारिज नहीं कर देगा ?

६. राष्ट्रीय अस्मिता के चिन्हों को समाज को पुनः लौटा रहा है यह आन्दोलन.. गांधीवादी कहा जाना गाली नहीं है .. बंदेमातरम को दक्क्षिणपंथीओं के हाथ से तो इन्कलाब जिंदाबाद को वामपंथीओं से वापस ले राष्ट्र को सौंप रहा है यह आन्दोलन... क्या अपने राष्ट्र प्रतीकों को वापस क्लेम करना आन्दोलन कि प्रतिगामिता है ?

मुझे लगता नहीं है की सरकारी लोकपाल बिल का खोखलापन किसी से छिपा है.. न ही इस बात को रेखांकित करने की ज़रूरत है की असाधारण समय असाधारण प्रयासों और विकल्पों की मांग करता है......

dalit mat said...

मैं इस लेख को अपनी वेबसाइट www.dalitmat.com पर साभार प्रकाशित कर रहा हूं.

अनुपम दीक्षित said...

आज अभूतपूर्व दिन है। अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हजारों लोग वंदेमातरम के नारे लगते हुये तिहाड़ जेल से मायापुरी चौराहे तक गए। इनके हाथों में बैनर तो थे लेकिन उस से ज्यादा तादाद में तिरंगे थे। लबों पर गलियाँ नहीं देशभक्ति के तराने थे, मुट्ठियाँ तनीं थीं लेकिन संकल्प से। आज से पहले वन्देमातरम विवादों का केंद्र था, आज से पहले देशभक्ति के तराने रस्मी हो चले थे और आज से पहले लोग धर्म, भाषा, प्रांत, जाति, वंश, वर्ग को भुला कर एक ही जगह इकट्ठे होते थे - क्रिकेट का स्टेडियम। आज से पहले लोग गांधी जी को मजबूरी का नाम बताते थे, स्कूलों में शिक्षक निबंध लिखवाते थे क्या गांधी जी 21वी सदी में प्रासंगिक हैं। आज से पहले हम निराश और हताश थे लेकिन आज कुछ बदल गया था। आज आशा की लहरें ज़ोर पकड़ रहीं थीं। आज लोग खुद ब खुद अन्ना के समर्थन में जुड़ रहे थे और देशभक्ति के तराने गा रहे थे, तिरंगे फहरा रहे थे। ये लोग किसी प्री-पेड रैली का हिस्सा नहीं थे। इन्हें गाड़ियों में ढो कर नहीं लाया गया था। यह वोट बैंक नहीं थे। ये लोग आज़ाद देश के इतिहास में दूसरी बार इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित हुये और दुनियाँ ने भी देखा और सराहा कि चार दिनों से हजारों लोग पूर्ण शांति से आंदोलन में शामिल है। अन्ना के मतवालों ने अचानक गांधी को प्रासंगिक बना दिया और तथाकथित गांधी परिवार को अप्रासंगिक। वर्षों से बिसर चुके रघुपति राघव राजा राम कि गूंज फिर सुनाई दी। देश के लिए जज़्बा फिर दिखाई दिया। अन्ना का आंदोलन सरकार को याद दिला गया कि इतिहास खुद को इसलिए दुहराता है क्यूंकी लोग इससे शिक्षा नहीं लेते। कपिल सिब्बल, कमलनाथ और चिदम्बरम ने हरवर्ड, स्टीफेंसन और ऑक्सफोर्ड में तो पढे हैं लेकिन जनता को पड़ना यहाँ नहीं सिखाया जाता। इसे सीखने के लिए तो गांधी जी ग्रामीण भारत की ओर गए थे तो अन्न स्वयं वहीं से आते हैं। कपिल सिब्बल चुनाव तो जीत सकते हैं पर जनता का दिल तो अन्ना ने ही जीता है। सरकार ने ठीक वही रणनीतिअपनाई जो अक्सर दमनकारी सारकरें अपनातीं है तो अन्ना ने भी गांधी जी के सबसे खतरनाक औज़ार को अपनाया - सविनय अवज्ञा। यह एक ऐसा हथियार है जो दमनकारी को हाशिये पर पहुंचा देता है. सरकार के दमनकारी कदम ने निश्चित ही अन्ना के आंदोलन का दायरा बढ़ा दिया और यह देश व्यापी हो गया।
यद्यपि अभी भी इस आंदोलन के स्वरूप और पहुँच व सरोकारों पर बहस हो सकती है कि यह आंदोलन क्या केवल शहरी माध्यम वर्ग का आंदोलन है,या फिर इसे जनांदोलन कहने कि बजाय मात्र भद्र समाज का आंदोलन कहा जाए या जैसे कि यह आंदोलन मात्र उच्च जाति आंदोलन है और दलित वर्ग इसमें अपना हिस्सा नहीं देखता और बड़ा प्रश्न मुस्लिम वर्ग की अनुपस्थिती का भी है लेकिन फिर भी हम यह कह सकते हैं कि अपनी समस्त सीमाओं में यह आंदोलन निश्चित ही ऐसी घटना है जिससे भारत और भारतीयता मजबूत होगी और सांप्रदायिक ताक़तें कमजोर होंगी और जातिवाद पर आघात होगा। मिससे एक फायदा मुझे और भी दिख रहा है और वह यह कि यह भारतीय राजनीति के स्वरूप और दिशा पर गहरा असर डालेगा। जनता को जागरूकता की जिस घुट्टी और ट्रेनिंग की जरूरत थी वह इस आंदोलन ने उसे दी है। बेशक यह आंदोलन हो सकता है कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाए लेकिंग जो आग दिलों भड़क चुकी है वह इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं और यदि सरकार ने जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए तो जनता अब दावानल बन कर लील जाएगी।
एक अन्य अहम प्रश्न इस आंदोलन के मुद्दे को ले कर भी है अर्थात जन लोकपाल। बेशक जन लोकपाल आज हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है और एक प्रभावी लोकपाल व्यवस्था में पारदर्शिता के अभाव को दूर कर सकेगा परंतु आवश्यकता इस बात कि भी है कि हम ऐसी व्यवस्था बना सकें कि लोकपाल एक सुपर पावार ना बन जाए। जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। बेशक न्यायपालिका को आप बाहर रखिए पर यह एक विडम्बना ही है कि अन्ना के आंदोलन के बीच आज़ादी के बाद दूसरी बार एक न्यायाधीश को महाभियोग के द्वारा हटाया गया। इसलिए इस बात की भी आवश्यकता है कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक प्रभावी न्यायिक आयोग का बिल भी साथ ही साथ लाया जाए। लोकपाल को सांसदों और नौकरशाहों के विरुद्ध अधिक प्रभावशाली होना ही पड़ेगा। सरकार के पास मौका था जब वह अन्ना के सहयोगियों से बात कर रहे थे। उस मौके को अब गंवा दिया गया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब अन्ना आर पार कि लड़ाई लड़ रहे हैं। अन्ना को समझना होगा कि जनांदोलनों की एक सीमा होती है। कोई भी आंदोलन अनंत काल तक उतना ही स्फूर्त नहीं रह सकता जितना कि वह आरंभ में था। अतः अन्ना को इन्हीं 15 दिनों के अंदर ऐसा रास्ता निकालना होगा जो सरकार को भी मौका दे और जनता को भी। स्वयं गांधी जी ने भी यही रणनीति अपनाई थी संघर्ष-विराम-संघर्ष अन्यथा सरकार इस आंदोलन को भी टीवी आंदोलन प्रचारित कर पाने में सफल हो जाएगी और क्रांति फिर अधूरी रह जाएगी।

Ratan Singh Shekhawat said...

चंद्रभान जैसे दलित नेता और बुखारी जैसे धार्मिक नेता किसी भी मामले में अपना फायदा देखते है |
अन्ना के आंदोलन में यदि एक भी दलित नहीं होता पर यदि चंद्रभान को मंच पर बुला लिया होता तब ये दलित भागीदारी मानी जाती|

इस तरह के नेता सिर्फ अपनी राजनैतिक संभावनाएं देखते है उन्हें दलितों से कोई लेना देना नहीं|

brij ka aam aadmi said...

vartamaan bhartiya raajniti ka sankraman kaal hai......badlaav ki bayaar bahi hai, kuch ummiden hain.....dekhte jayiye

प्रवीण पाण्डेय said...

कभी कभी विविधता की यही हानि होती है कि ऊर्जा और प्रयास को बाँट दिया जाता है।

JC said...

राम लीला 'राम लीला' न होती
यदि उस के पहले केकई लीला न होती :)
तब भारत में लिखित संविधान नहीं होता था
रघुकुल रीति चलती थी -
"प्राण जायें पर वचन न जाई"...
बोलो सिया पति राम चन्द्र की जय !

anshumala said...

काफी समय पहले आप की ही एक रिपोर्ट में आप को आम आदमी बना देखा था रविश की रिपोर्ट बंद हुई तो लगा की आम आदमी की आवाज भी बंद हो जाएगी देख कर ख़ुशी हुई की सूट टाई लगा कर भी आप खास लोगों के बीच आम आदमी की आवाज बने रहे उसके मन की बात सामने लाते रहे |
बार बार कहा जा रहा है ये आन्दोलन मीडिया की देन है तो मीडिया को धन्यवाद देती हूं और उम्मीद करती हूं की वो आगे भी इसी तरह हर पांच साल बाद ऐसे ही आन्दोलन खड़े करते रहे ताकि जनता और नेता दोनों सोये नहीं और जागते रहे साथ ही शिकायत भी है की जब आप लोग ये कर सकते थे तो आज तक इस तरह का कोई आन्दोलन क्यों नहीं खड़ा कर दिया ?
साथ ही उन लोगों से कहियेगा की हमें भीड़ कहना बंद करे हम नेताओ की रैली में पैसे दे कर ट्रक भर कर लाये लोग नहीं है जिन्हें भीड़ कहा जा रहा है हम जनता है और नागरिक है जो वोट देता है, बेचता नहीं और ये अपनी ताकत उन्हें कल दिखा देगी =सरकार अकड़ रही है क्योकि अभी चुनाव दूर है पर भूले नहीं दूर ही सही पर चुनाव तो है ही ना आप की ये कारस्तानी कुछ भूल सकते है सब नहीं |
आज तक समझ नहीं पाई की देश में आज भी ६४ साल बाद भी दलित और मुस्लिम भारतीय क्यों नहीं बन पाये आज भी वो दलित और मुस्लिम ही क्यों है तो जवाब चंद्रभान और बुखारी जैसे लोगों के बयान से पता चल जाता है जो बस और बस अपने समुदाय की भलाई की जगह सिर्फ प्रतिनिधि की ही बात करते है हद हो जाती है जब वो बच्चो में भी अम्बेडकर को खोजने लगते है और इस पर भी आपत्ति करने लगते है की कोई बच्चा आम्बेडकर क्यों नहीं बना | अगर इनका रवैया यही रहा तो ६४०० सालो तक दलित और मुस्लिम दलित और मुस्लिम ही रहेंगे कभी भारतीय नहीं बन पाएंगे |
जरा एक चक्कर हिंदी ब्लॉग जगत का लगाइए यहाँ वो भी मिल जायेंगे जो कहते है कि ये सब आन्दोलन कांग्रेस का खड़ा किया है जो अन्य मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए खासकर रामदेव के आन्दोलन ???? को दबाने के और राहुल की ताजपोशी के लिए ये सब ड्रामा करा रहा है ???

anshumala said...

और हा चंद्रभान जी ने एक जगह इंटरव्यू में कहा कि मुझे लाखो दलितों के एस एम एस आ रहे है कि "भगवान का शुक्र है की हम सब अन्ना नहीं है |"

अनुपम दीक्षित said...

रवीश जी आपके पिछले दो प्राइम टाइम बहुत अच्छे थे जिन्हें आपने लोकपाल पर केन्द्रित किया। क्या एक प्राइम टाइम कुछ संविधान विशेषज्ञों के साथ इस पर नहीं हो सकता की जो सरकार कह रही है वह गलत है। संसदीय प्रक्रिया में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं।

Gunjan said...

रवीश जी कौन किस जाति में पैदा होगा ये संजोग का परिणाम होता है.
लेकिन जितना मैंने जितना चंद्रभान जी को पढ़ा है और मायावती जी को जाना है उससे ये तो सत्य ही है अगर ये दोनों सवर्ण परिवार में जन्मे होते तो इनसे बड़ा सामंतवादी और कोई नहीं होता.
बुखारी जी के दामाद जी चुनाव लड़ने वाले है.उनका अन्ना के आन्दोलन से चिंतित होना स्वाभाविक है.पापी पेट का सवाल जो है.
जहा तक बात सरकारी अधिकारियो के चिंता की है तो उन्हें चाहिए की वो अपने कर्तव्यो का पालन करे और ऐसे अमीरों को पकडे जो टैक्स नहीं चुकाते.आखिर सरकार उन्हें इसी का तो पैसा देती है.
अंत में अन्ना के लिए "बन्दे में है दाम, बंदेमातरम "

Gunjan said...

Ravees jee maine aako facebook pe bahut dino se friend request bheji hai plz accept kare....gunjan_23march@yahoo.co.in se.

akash mehra said...

andolan ahinsak tha,yahi baat isme achi thi ,varna log to loktantantra ko bheedtantra banane par tule huye the

अनुपम दीक्षित said...

आखिर आंदोलन खत्म हुआ और सबने चैन की साँस ली। बेशक यह जनता का आंदोलन था और सफल आंदोलन था। लेकिन हमने इस आंदोलन की बहस के दौरान ऐसे विचार भी सुने जिन पर आगे चर्चा जरूरी है। संसद की सर्वोच्चता का एक सुर के राग में मुझे वही ध्वनि सुनाई दी जो लुई 14वें के आई एम द स्टेट में थी। सांसदों के बयानों से लगा जैसे वे कह रहे हों संसद ही राज्य है और king can do no wrong की तर्ज़ पर जैसे संसद कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकती। सवाल है की जब लोकतान्त्रिक संस्थाएं राजतंत्र की भांति व्यवहार करने लगें तो लोकतन्त्र को कैसे बचाया जाए। जब भारत की विविधता के विविध प्रतिनिधि एक नए वर्ग में बदल कर व्यवहार करने लगें तो क्या हमें लोकतन्त्र को बचना जरूरी नहीं लगता? यह हालत पैदा ही क्यूँ हुये थे इस पर भी तो गौर करना जरूरी है। जब जनाकांक्षाएँ अनसुनी रह जायेंगी तो आंदोलन होंगे ही।

akash mehra said...

yeh,galat parampara ki suraat ho rahi hai...babari masjid bhi isi tarah ki bheed ne girai thi....wahan par bhi log truckon aur buson me bharkar nahi laye gaye the.....wahan par bhi log apne aap pahunche the.....aage yadi naksalwadi ,atankwadi,kattarwadi sammoh yadi is tarah ki bheed juta letein hai..aur use galat disa de detein hain...to loktantantra to bheedtantra ban hi jayega...

RAJESH KUMAR said...

LOKTANTRA VASTAV ME BHEED TANTRA HI HOTA HAI.YE ALAG BAAT HAI KI KUCH LOG ANNA KE SAMARTHAKO KI BHEED ME "CASTE,CREED AUR COMMUNITY KHOJ RAHE THE TAKI ANDOLAN KO KAMJOR KIYA JA SAKE.
YE SOCIAL DISCOVERER KAL YE BHI PUCHEGE KI WORLD CUP JITANE WALE DHONI KE TEAM ME KITANE SC/ST/OBC/GEN/MUSLIM THE.PAR YE KATAI NAHI PUCHEGE KI A RAJA NE JIN TELECOM COMPANIES KO LICENCE DIYA UNAKE MALIK KIS CASTE YA COMMUNITY KE THE KYUKI YEHA MAMLA "NA BABU NA BHAIYA,SABSE BADA RUPAIYA KA HAI"
JAI HO.............