लघु प्रेम कथा-लप्रेक (फेसबुक फिक्शन)

फेसबुक के सीमित स्पेस और दिल्ली के असीमित स्पेस में प्रेम कथाओं का मतलब कई मोहल्लों से होकर गुज़रना है। हर दिन फैल जाने वाली दिल्ली में प्रेम का एक कोना कोई न कोई प्रेमी जोड़ा अपने लिए रच ही लेता है। ये वो कहानियां हैं जो काल्पनिक पात्रों के सहारे वास्तविक स्पेस में घटित हो रही हैं। हो चुकी होंगी। होने वाली होंगी। मालूम नहीं। यही सोचते-सोचते फेसबुक पर लघु प्रेम कथा लिखने लगा। जिसका संक्षिप्त नाम लप्रेक है। जैसा कि मेरी हर रचना के साथ है। एक ही शर्त होती है। ये सभी कालजयी नहीं हैं। महान नहीं हैं। फालतू वक्त की बेचैनियों को संभालने में साथी रही हैं। आप कस्बा या फेसबुक कहीं पर इसे पढ़ सकते हैं। सिर्फ प्रेमियों के मन में घुस कर शांत नहीं रह जाइयेगा। दिल्ली भी घूमिएगा। कथाकार यही चाहता है। फेसबुक का स्टेटस हमारा मानस मोहल्ला है। हम यहीं पर आकर कुछ भी बक देते हैं। दिल की बात से लेकर दिल्ली की परेशानी तक। वहीं से प्रजनित यह प्रेम कथा यहां पर लाई गई है। व्यापक वितरण के लिए।

(1)
बहुत देर से जाम में फंसा वो तेज़ी से रन लेने की ख्वाहिशों से भर गया। हर रन जान की बाज़ी लगाकर बनाने लगा। स्टेडियम से आ रही तालियों की आवाज़ में एक आवाज़ ताली वाली की भी थी। गाड़ियां वहीं की वहीं खड़ी रह गईं। मास्टर के गुस्से से पसीना आने लगा था। प्रेम पत्र को एक कार्ड कंपनी ने छाप कर बेचने का एलान कर दिया। फिर भी भागा जा रहा था। जाम में फंसने के बाद भी भागने के अहसास से भागा जा रहा था।
(2)
रेडियो की आवाज़ आने लगी थी। उसकी कार धौलाकुआं से मुड़ कर एम्स की तरफ दौड़ने लगी थी। लौटने के फैसले का साहस नहीं जुटा सकी। न ही वो मोतीबाग से यू टर्न लेकर उसके पीछे आया। एक दूसरे के आने और मनाने के इंतज़ार में दोनों बहुत दूर चले गए। गाज़ीपुर पहुंच कर सामने गाज़ियाबाद था। शिवमूर्ति के बाद गुड़गांव आ चुका था। शहरों की प्रेम कहानियां ऐसी ही होती हैं। ट्रैफिक में शुरू होती है और ट्रैफिक में गुम हो जाती है।(लघु प्रेम कथा)
(3)
मोबाइल के इनबॉक्स में सेव मैसेज को वो आधी रात ही भेज देना चाहती थी। पता नहीं इस वक्त फोन उसके सिरहाने होगा या नहीं। क्या पता कोई और पढ़ ले और डिलीट कर दे। क्या पता वो पढ़ ले लेकिन किसी और को फारवर्ड कर दे। इसी उधेड़बुन में पंद्रह दिनों बाद इनबॉक्स में सेव मैसेज अपने आप उड़ गए। बाद में उसे याद ही नहीं आया कि कहना क्या चाहती थी। बहुत दिनों से उसका इनबॉक्स खाली है। न उसने लिखा न उसका आया। (लघु प्रेम कथा)
(4)
मायापुरी से मेट्रो में चढ़ते ही वो सीपी के सेंट्रल पार्क में होने के ख़्यालों से भर गया। अलकनंदा से चलते वक्त उसने हर दुकान के शीशे में खुद को देख लिया था। दोनों के साथ पूरी दिल्ली मिल रही थी। सेंट्रल पार्क में पहुंचते ही पहले से तय खंभे पर कोई और जोड़ा एक दूसरे को छूने की कोशिश कर रहा था। वक्त पर आ कर भी दोनों लेट हो चुके थे। दोनों ने फैसला किया। कल फिर मिलेंगे। यहीं मगर इस जोड़े से पहले।(लघु प्रेम कथा)
(5)
खानपुर से बदरपुर की बस में ढूंसी भीड़ ने दोनों को ऐसे शहर में पहुंचा दिया जहां उनके अलावा सब अजनबी थे। हर स्टॉप पर चढ़ने वाली भीड़ के धक्के से दोनों और करीब होते जा रहे थे। बस भाग तो रही थी सीधी मगर उन्हें हर बार लगा कि किसी मोड़ पर तेज़ी से मुड़ रही है और गिरने से बचाने के लिए एक दूसरे को थामना ज़रूरी है। शहर में प्रेम के ऐसे कोने अपने आप बन जाया करते हैं। भीड़ में घूरे जाने के बाद भी (लघु प्रेम कथा)
(6)
अक्सर साउथ एक्स पहुंच कर कुछ हो जाता था। मज़ा आने लगता था कि हर बस को छोड़ने में। सेल की भीड़ में खो जाने का लुत्फ। सस्ते सामानों से खुद को और मुनिरका के घर को सजाने का सपना, हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता। पूरा करने के लिए अगले दिन दोनों यही करते। हर बस को छोड़ने लगते।(लघु प्रेम कथा)
(7)
कार में रेडियो शोर करने लगा। मुनाफ़ आखिरी गेंद के लिए दौड़ चला था। दोनों भीतर से खामोश हो गए। कमेंटेटर की उत्तेजना के बीच दोनों ने खुद को संभालने का नाटक कर लिया था। आंखें मूंद कर बाहों में भर लिया एक दूसरे को। जैसे गेंद कार के शीशे पर आ लगने वाली हो। दोनों एक दूसरे से जकड़े ही रह गए। जामिया के बाहर लोग नाच रहे थे। मैच टाई हो चुका था।(लघु प्रेम कथा)
(8)
उस रोज़ के बाद वो अक्सर मुखर्जी नगर में भटकती दिख जाती। उससे नोट्स हड़पने के बाद उसने अपना फ्लैट बदल लिया था। वो आदत से मजबूर हो चुकी थी। मुखर्जी नगर का हर कमरा अंधेरा लगता जिसमें वो अपने प्रेम के उजाले से झांका करती। लेकिन वो अब हकीकतनगर के एक कमरे में उसके ही लिखे नोट्स को रट रहा था। तय कर लिया था। पीटी के टाइम में प्रेमी नहीं होना है। दीवार पर हसीना की तस्वीर नहीं थी। टाइम टेबल था। उसके बाप का सपना था। (लप्रेक)
(9)
बुराड़ी से वो पैदल ही चल निकला,आईएसबीटी की तरफ। खान मार्केट की एनडीएमसी कालोनी से वो पुराना किला की तरफ भागी, ऑटो के लिए। इसी आपाधापी में उसका फोन पुराना किला के पास गिर गया। वहां से निकलते एक जोड़े ने फोन में आए मैसेज पढ़ लिए। चलो हम भी इनके पीछे भाग जाते हैं। दिल्ली को खाप बनने के लिए छोड़ जाते हैं। (लप्रेक)
(10)
सराय जुलैना की हसीना थी वो। एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती दिल के मरीज़ भी झांका करते, कैथ लैब की खिड़की से। छत पर आते ही उसके लोटस टेंपल तक हंगामा हो जाता था। चिराग दिल्ली का राजकुमार भिड़ गया मसीहगढ़ के प्रेमी से। होली फैमिली में दोनों भर्ती हो गए। तय नहीं हो सका कि वो किसकी है। नवभारत टाइम्स ने इस ख़बर को बॉटम में छाप कर खूब चटकारे लिए। पंजाब केसरी पीछे रह गया। (लप्रेक)
(11)
खिड़की के पीछे रखी चाबी से ताला खोल वो अंदर आ गई। किसी जासूस निगाह से कमरे को देखने लगी। उसके बक्से में वो तमाम ख़त मिले। जो आदमी इतने संबंधों में एक भी नहीं संभाल पाया वो उनके ख़तों को क्यों सहेजे हुए हैं। इसी उधेड़बुन में उसने एक खत लिखकर बक्से को बंद कर दिया। मैं जा रही हूं। हो सके तो मेरे ख़त को भी संभाल कर रखना। तुम्हें पता होगा पहले की तमाम प्रेमिकाएं मुझसे बेहतर लिखती हैं। मैंने जानबूझ कर कमतर लिखा है।(लप्रेक)
(12)
दक्षिण दिल्ली के महारानी बाग के पास का तैमूर नगर किस तैमूर की याद में बना है।पूछते ही वो भड़क गई। इतिहास के चक्कर में रहोगे तो प्रोफेसर बना कर सेमिनारों में गाड़ दिए जाओगे।चलो यहां से।किलोकरी गांव के पीछे से निकल कर यमुना के किनारे चलते हैं।अब बारी उसकी थी। वहां क्या करोगी।ओखला वालों ने नदी में मकान बना लिये हैं।अतिक्रमण सिर्फ प्रेम का नहीं मकानों,नदियों और हवाओं तक का हो चुका है। चैट करना सीख लो।(लप्रेक)
(13)
लाश बन कर वो बेवजन उसके बैग में घूमते हुए जाने किस सफर में स्टेशन पर छूट गई। किसके लिए बच गया था उसके बदन का गोदना। इस शहर में जिसे चाहना होता है,उसी के हाथों कटना होता है। टुकड़ों-टुकड़ों में बंटते हुए वो लड़की किन ख्यालों में खोई रही होगी और वो लड़का किसके ख्यालों से भाग रहा होगा। इश्क़ क़ातिल बना दे अच्छा, महबूब का क़त्ल हो जाए तो क्या अच्छा। प्रेमियों के बैग में क्या क्या होता है।(लप्रेक)
(14)
माइनस मुद्रिका में पीछे की किनारे वाली सीट मिल गई।उसने उसके कंधे पर सर टिका दिया।कब नींद आ गई और कब सरायकाले खां,आश्रम,धौलाकुआं,और वज़ीराबाद होते हुए जुबली हास्टल आ गया पता ही नहीं चला।वो खोई रही या सोई रही यह भी जान नहीं सका। वो तो बस उसकी तरफ आती हर निगाह से टकराने में भिड़ा रहा। उतरते वक्त उसने ठीक कहा,तुम मेरी कम दुनिया की फिक्र ज्यादा करते हो।कम से कम बैग के नीचे मेरा हाथ तो थामे रह सकते थे।बुज़दिल।(लप्रेक)
(15)
पहली बार दोनों अग्रवाल स्वीट्स में मिले। इसलिए वो उसे कभी डोडा तो कभी गुलाब जामुन बुलाने लगी। लाल रंग के इस बोर्ड को दोनों ने अपने इश्क का नेमप्लेट बना लिया। खाप वालों ने शहर के तमाम अग्रवाल स्वीट्स पर पहरा बिठा दिया। दोनों सुंदर नगर के नत्थू स्वीट्स कार्नर में मिलने लगे। उसने मिठाइयों के नाम से बुलाना छोड़ दिया। पूछने पर बस यही कहा,वो जगह अपनी थी। ये जगह अजनबी है। अब तुम्हारा नाम ही भरोसा है।(लप्रेक)
(16)
अच्छा है न। मल्टीप्लेक्स ने मार्निंग शो का मतलब बदल दिया। वर्ना तो आना और निकलना ही मुश्किल था। देखो अब मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं। अक्षय कुमार को जी भर कूदने दो। इस वक्त हॉल में हमीं हैं। हमारे जैसे कुछ और जोड़े। बस। खाली कुर्सियों का शुक्रिया। तुम हमेशा अंधेरे में मुझे क्यों खोजते हो? इस एक सवाल ने सिनेमा हॉल को थाने में बदल दिया। वो कॉफी लाने चला गया।(लप्रेक)
(17)
बिस्तर के नीचे चुरा कर रखे गए नोट्स को उसने देख लिया। एक-एक पन्ने की तरह करवटें बदलने लगी। इम्तहान के करीब वाले महीने में उनका प्यार फोटोकॉपी मशीन से निकले नोट्स के पन्ने पर कालिख की तरह धुंधला हो गया। वो भी असली नोट्स बक्से में रखता और किसी दूसरे के नोट्स पर अपना नाम लिख कर उसकी फोटोकॉपी बिस्तर के नीचे। इम्तहानों के मौसम में प्रेम कहानियों के एंगल बदल जाया करते हैं। इश्क आईने में नज़र नहीं आता।(लप्रेक)
(18)
त्यागराज नगर से साउथ एक्स होते हुए दोनों पैदल ही दौड़ पड़े दिल्ली हाट की तरफ। दूर से ही बांसुरी, ढोलक की आवाज़ आने लगी। कश्मीरी व्यंजनों की महक सांसों से पेट में उतरने लगी। अंदर आते ही उसकी निगाह मणिपुरी शॉल पर टिक गई। वो खादी की सदरी में खो गया। दोनों शॉल और सदरी में ख़ुद को देखने लगे। एक दूसरे को देखना भूल गए।(लप्रेक)
(19)
मार्च के महीने में हवाएं गरम होने लगी थीं। दोनों की ज़िद कि ऑटोवाला दोनों तरफ का पर्दा गिरा दे। ऑटो के शोर में भी भीतर गज़ब की खामोशी छा गई। चालक की एक आंख बैक मिरर पर टिक गई। दोनों बैक मिरर से बचने के लिए एक दूसरे में छिपने लगे। चालक ने मीटर का हिसाब छोड़ दिया। ऑटो तेज़ी से शंकर रोड की तरफ दौड़ने लगा।(लप्रेक)
(20)
वेंकटेश्वर कॉलेज। क्लास की बेंच पर वो उसका नाम लिखने लगी। रेनॉल्ड पेन की निब घिस-घिस कर। महीने भर में सारे बेंच पर एक नाम उकेर कर रख दिया। तमाम तरह की गालियों और फूलों के बीच बेंच पर नीले रंग से लिखे उस एक नाम पर किसी की नज़र नहीं गई। कोई समझा क्यों नहीं कि इतिहास की पढ़ाई ऐसे ही होती है। दस्तावेज़ों में नाम उकेर कर।वो दीवारों,लकड़ियों,पन्नों को अपना साक्षी बनाने लगी।(लप्रेक)
(21)
मगध एक्सप्रेस,बोगी नंबर एस वन।दिल्ली से पटना लौटते वक्त उसके हाथों में बर्नार्ड शॉ देखकर वहां से कट लिया।लगा कि इंग्लिश झाड़ेगी। दूसरी बोगियों में घूम-घूम कर प्रेमचंद पढ़ने वाली ढूंढने लगा।पटना से आते वक्त तो कई लड़कियों के हाथ में गृहशोभा तक दिखा था।सोचते-सोचते बेचारा कर्नल रंजीत पढ़ने लगा। लफुआ लोगों का लैंग्वेज प्रॉब्लम अलग होता है(लप्रेक)
(22)
गोला देने गया होगा। दोस्तों की खीझ को छोड़ वो रोज़ 4 बजे पी जी वूमेन्स हॉस्टल की तरफ चल देता। हॉस्टल के बाहर जीवन,ज़मीन और जानम के विमर्श में मार्क्सवाद ठेलता रहता। कभी खुद को गंगा पार का ज़मींदार बताता तो कभी ग़रीब। दिल्ली की लड़कियों में सुनने का धीरज न होता तो बिहार यूपी से आए प्रवासी बांकुरे गोलाबाज़ न हो पाते। 5 बजते ही वो हर बार यही कहती।बहुत कंफ्यूजिंग है बट इंटरेस्टिंग हैं। वो खुश हो कर लौट आता।(लप्रेक)
(23)
आर्ची समझ गया। बेज़ुबान प्रेमियों को एक कार्ड की ज़रूरत थी। पर यह भी समझ आ गया कि नाकाम प्रेमियों के भाई-बहन में बदल जाने पर कार्ड की ज़रूरत पड़ेगी। बहनों को दिये जाने वाले कार्ड आकार और दाम में गर्लफ्रैंड वाले कार्ड जैसे ही होते। साउथ एक्स के आर्ची कार्नर में न जाने कितने रिश्ते इधर से उधर होते रहे। राखी के दिन आर्ची की दुकानें खाली तो रह जातीं मगर साल भर इन कार्डों की बिक्री कम नहीं होती।(लप्रेक)
(24)
पैदल चलने वाले जोड़े अक्सर कार में बैठे जोड़े से जला करते। खालसा कॉलेज से निकलती कारों की ढिन चिकवा म्यूज़िक और सामने की सीट पर बैठी बाला। माल रोड तक चलते-चलते वो अमीरी के साइड इफेक्ट पर थीसीस रच देता। आर्थिक विषमता प्रेम के मायने बदल देती है। ग़रीबी रेखा से नीचे वालों का प्यार खालसा से निकलती कार वाले क्या जानेंगे। कमलानगर जाकर चाचा के यहां आइसक्रीम खा लेना ही इश्क का इम्तहान नहीं है।(लप्रेक)

32 comments:

सुशीला पुरी said...

बहुत खूब !!!

विजय गौड़ said...

kuchh laghukathain tou wakai maarak hain.

विनीत कुमार said...

व्यापक वितरण तो ऐसा लिखा है आपने कि लोगों को धोखा न हो जाए कि रवीश की लप्रेक जनवितरण प्रणाली की दूकान पर भी मिलेगी।.

Sumit said...

Behad samwedansheel drishti! Best hai Magadh ki kahani.

Rahul Singh said...

लप्रेक के 24 मोहक फ्रीज शॉट.

azdak said...

वेरीये एनचांटिंग.

अनामदास said...

दू दर्जन लप्रेक, कइसे दर्जन दिया जी? ऐं?

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही अच्छा।

Satish Chandra Satyarthi said...

मसालेदार है और झागवाला भी... :)
उपन्यासकार समीर लाल 'समीर' को पढ़ने के बाद

Riya Sharma said...

:))..hmmm enjoying there too

अपराजित said...

सुंदर प्रयोग है. रचनात्मकता कथ्य को ही नही बलिक माध्यम को भी तराशती चलती है.

vaibhav said...

jabradast !

Kunal Verma said...

wah

Unknown said...

aaj bhut dino ke bad yha apke qsbe mai aana huwa ,hsptal mai rehne ke bad abhi opratopn ke ghav bhrne mai time lgega so aaj thora relex hone ke liye socha dimag fresh kiya jaye dekha jaye ki ravishji ke qusbe mai dekhe kya chl rha hai.acha lga sroryoes shrt dekh ke .ravishji vijya ngr mukhrgi ngr ke flats mai thore paise wale rehte hai inki khaniya bhi mac d mai shuru ho ke coffee dAY MAI KHTM BHI HO JATI HAI .MGR GANDHI VIHAR JO IIT KA HUB MANA JATA HAI GRIB VIDAYARTHYO KI APNI DUNIA HAI JHA 5VI MNZIL KE NEECHE CHAY KE DUKAN KIRYANE KI DUKAN GH RGHR MAI TIFFIN SERVICE GHR BETHI AURTE AWAJE DE KE BULATI HUI KISI KO KMRA CAHIYE KYA AAM HAI WHA SB .SB JINDA HAI BHAGTE DORTE KBHI KBHI LDKIYO KI TRF DEKH KE ANKHE SEKNA SHGUL HAI KYOKI YHA PYAR KE KOI MAYNE NHI SHARING MAI JO SATH RHE WHI JINDGI KI SCHAI HAI.OK RVISHJI THK GYI AB .UMA SHARMA SHALIMAR BAGH

archit pandit said...

sir bahut accha hai join me
www.architpandit.blogspot.com

संतोष कुमार said...

मस्त पोस्ट है, अबतक की सारी लप्रेक एक साथ पढने को मिल गयी, दिल को छु जाने वाला.
प्रेम का हर कोण आपने दिखा दिया,

इसी तरह लगे रहिये, लोगो को तो वर्ल्ड कप का बुखार है, आप हमें लप्रेक का खुमार देते रहिये.

Susmita panda said...

delhi ka har prani isse apne ap ko relate karega...bahut khub...

prashant said...

kuchh bhi likh dena hai ?

चन्दन कुमार said...

is laghu prem kataha se muttasir hokar mera bhi dil kar raha ki khalis ravishiya andaz me prem kataho ka zikra karu.......

cartoonist ABHISHEK said...
This comment has been removed by the author.
cartoonist ABHISHEK said...

लप्रेक नम्बर(3)...प्रभावित करती है...
आगे की लप्रेक अभी पढ़ी नहीं है...

photographer said...

bhai kuch to baat hai ki apke blog ka chaska lag chuka hai, soach nai haiisliye padne mai maza aata hai

smshindi By Sonu said...

sir ji wah

Pratik Maheshwari said...

बहुत ही सटीक और बहुत ही अस्पष्ट कहानियों का संकलन..
पर अच्छा लगा..

आभार
चलती दुनिया पर आपके विचार का इंतज़ार

Gaurav said...

my best five ..
1st no. 21
2nd no. 11
3rd no. 03
4th no. 14
5ht no. 05

others are also very good
plz tell yours

दिपाली "आब" said...

pls dun mind.. Central park mein khambe kahan hain? Aur ye koi zaruri nahi ki wahan sab jode ek doosre ko chhune ki koshish krne hi jate hon..wahan families bhi jati hain..
Abhi baki padhna baki hai..

दिपाली "आब" said...

22 aur 11 mast hain.. :)

Sristi Shree said...

आदरणीय अंकल,
आपके लेखन में गजब का जादू है। आपके ब्लॉग का हर पोस्ट मनोरंजक और बेहतरीन है। इस आलेख के हर पात्र हमारे आसपास के हीं महसूस होते हैं। न्यूज़ चैनल पर आपकी साप्ताहिक रिपोर्टिंग भी गम्भीर मुद्दों और समस्याओं पर प्रभावशाली प्रश्न छोड़ जाती है। आपसे प्रभावित होकर मैंने भी कुछ- कुछ लिखना सीख लिया। अवलोकन करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं-
sristishree.blogspot.com

Unknown said...

great sir ji...maine pahli baar aapko padha..aapki report dekhta rahta hoon..facebook par aapko dhhondha...lekin frnd reqest bhej nahi paya..kyuki option block tha... abhishek ki profile se aapke blog ka pata mila..yahan aya..ek ajeeb se khamosi pasri hui thi .. ek ek part ko padhkar dil romanchit ho uthta ..dil karta hai mai bhi likhoon..lekin meri laghkathaye itni bhi laghu nahi hongi... aapko dil se apna guru maan chuka hoon..bas aise hi dil ko sukoon pahuchate rahiyega... http://www.facebook.com/realfighar mera facebook pata.. fursat mile to kabhi mere blog pe najar daaliyega..mai aapke lie blog disign karn achhata hoon..ek pyara sa muhalla.. http://jeewaneksangharsh.blogspot.com/ yah mera blog hai..bas baaki guru ji kripa banaye rakhiyega..ek baar aapke saamne aane ka irada hai..lekin usse pahle aapki pichhli pankti me baithne ki aukaat paa loon.. abhi b.com final year hai ..ek agancy me sub-editor ke taur pe join kiyan hoon.. dua deejiyega.. aage chalkar shravan ki report dekhne aur sunne ka mauka mile desh ko.. isi ke saath viraam..aabhar

Sachin Agarwal said...

सिर्फ एक शब्द कह सकता हूँ - वन्डरफुल.

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

बहुत अच्छी कहानियां हैं, एक बार फिर दिल्ली से परिचय करा दिया है

AMIT MISHRA said...

रविश जी लप्रेक के माध्यम से आपने प्रेम के प्रत्येक कोण को बखूबी दर्शा दिया। पढ़ते-पढ़ते मुझे भी अपने पुराने दिन याद आ गए। उन दिनों के लिए धन्यवाद