लोकसभा टीवी का लोकरूप

लोकसभा टीवी को देखना ऐसा लगता है जैसे अचानक शहरी भीड़-भाड़ से निकल कर किसी जैविक फार्म हाउस में आ गया हूं। जहां कुछ भी खाना स्वास्थ्यवर्धक लगने लगता है। वैसा ही कुछ लोकसभा टीवी को देखते हुए लगता है। बिना किसी चिकमिक-चिकचिक और बेवजह के ढूंसे गए ऊर्जा वितरक स्टिंग और वाइप के कार्यक्रम चलते रहते हैं। निजी न्यूज़ चैनलों में बातचीत चल रही हो तो बीच-बीच में थ्री डी एनिमेशन की तरह स्टिंग और वाइप आते जाते रहते हैं। हुर्र.ज़ू...भ्रू...श्रू करते हुए। इनका मकसद यह बताया जाता है कि इससे ऊर्जा आती है। किसी ज्ञात सर्वे और शोध के आधार पर कहना मुश्किल है कि दर्शक इन्हीं सब टिटिमाओं की वजह से ही किसी कार्यक्रम में टिकता है। लोकसभा टीवी आपके घर का वो ड्राइंग रूम हैं जहां आप जीवन की व्यस्तताओं के कारण उठना-बैठना भूल जाते हैं। वक्त मिले तो देखा कीजिए।

बाज़ार के दबाव और केबल वितरण के खर्चे में डूबे निजी चैनलों का संकट बढ़ा दिया है। मार्केटिंग के गुरुओं की तरफ से कम से कम यही बताया जाता है। वो अब कंटेंट की कतरन ही पेश कर सकेंगे। इस भयानक आर्थिक स्थिति के अलावा तथाकथित अच्छे पत्रकारों के रचनात्मक आलस्य ने भी निजी चैनलों की रचनात्मकता को मार दिया है। जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब कंटेंट और फार्मेट को लेकर काफी सराहनीय प्रयोग हुए। टेलीविज़न की क्षमताओं का पता चलने लगा। बाद में बाज़ार के दबाव और उद्देश्य से भटक जाने के कारण निजी चैनलों के कंटेंट और फार्मेट एक जैसे होते चले गए। निजी चैनलों से लोक गायब होते चले गए और स्टुडियों में एंकरों के स्टारडम के भरोसे कंटेंट को रंग-रूप दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में लोकसभा टीवी के टिके रहने के आर्थिक पक्ष को समझा जा सकता है। शायद लोकसभा टीवी के सामने बाज़ार का दबाव नहीं है। सरकार आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाती है। सरकारी विज्ञापन आते हैं,ब्रेक भी है मगर हुड़दंग नहीं है। वहां वितरण का खर्चा नहीं है। सरकार का चैनल है तो केबल वालों को दिखाना ही होगा। केबल वालों ने चैनलों को चूस लिया है। बिना वजह टिकर नहीं हैं। स्क्रीन बड़ा और शांत दिखता है।

लेकिन क्या संतुष्ठ होने के लिए यही दलील काफी है? अगर निजी चैनलों में पैसा ही लग रहा है तो अच्छे कार्यक्रम क्यों नहीं बन रहे। क्यों वहां अब सब कुछ स्टुडियों से रचा जा रहा है। ऐसी बात नहीं कि निजी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम नहीं हैं। वी द पिपुल,आप की अदालत,ज़िंदगी लाइव,टोटल रिकॉल,ज़ायका इंडिया जैसे कई कार्यक्रम हैं जो आते ही स्क्रीन को दर्शनीय बना जाते हैं। लेकिन बाकी कार्यक्रमों को देखें तो लगता है कि ज़्यादा देर तक देखा तो आंख ही फोड़ देंगे। अब तो लोग ख़बरों की रफ्तार की तुलना बम,बंदूक और बुलेट से भी करने लगे हैं। जल्दी ही आप राजा भैया न्यूज़,शहाबुद्दीन खबर और दाऊट काउंटडाउन जैसे कार्यक्रम देखेंगे। जब ख़बरों की भाषा अपराध के सामान जैसी हो जाएगी तो एक दिन अपराधी भी ख़बर पढ़ने लग जाएंगे। बहरहाल इन सब आलोचनाओं का कोई मतलब नहीं है। कोई यही बता दे कि ऐसे कार्यक्रमों और भाषा से उनकी कमाई में कितना सुधार हो गया है।

हालांकि दूरदर्शन अभी भी पुराने ढर्र पर ही चल रहा है। उसकी गुणवत्ता वहीं ठहरी हुई है। लोकसभा टीवी तो पहले भी था। लेकिन पिछले एक साल से इसकी गुणवत्ता में गज़ब का सुधार है। साल भर पहले मैंने लोकसभा टीवी पर मराठी फिल्म सियासत देखी थी। बिना किसी ब्रेक के। राजनीति फिल्म के दौरान अपने स्टुडियो में प्रकाश झा के सामने सियासत का ज़िक्र कर दिया और कहा कि आपकी फिल्म नहीं देखी है मगर सियासत जैसी नहीं हो सकती है। लोकसभा टीवी अपने हिसाब से बदलता रहता है। फिल्म के वक्त फिल्म। न्यूज़ भी और उस पर चर्चा भी। होली के दिन किराये के कोख जैसे जटिल विषय पर शानदार चर्चा देखी थी। इतनी अच्छी चर्चा निजी चैनलों पर हो ही नहीं सकती। सबको बोलने दिया गया और सबको समझाने दिया गया। पहली बार इस विषय की जटिलताओं को गहराई से समझने में मदद मिली। लोकसभा टीवी के विषय भी अलग होते हैं।

जब भी टीवी के सामने होता हूं,लोकसभा टीवी भी देखता हूं। कुछ न कुछ आ ही रहा होता है जहां थोड़ी देर तक टिक जाता हूं और कई बार देर तक देखने लगता हूं। आज दूरदर्शन के पुराने चेहरे सुनीत टंडन का एक शो देखा- कंवर्शेशन। शांत सुनीत उतावले नहीं लगते। सवाल हैं तो हैं। जवाब महत्वपूर्ण हैं। बोलने देते हैं। दुनिया के मशहूर कलाकार सुबोध गुप्ता से उनकी बातचीत बेजोड़ रही। संत स्टीफेंस की अंग्रेजीयत वाले इस देश में सुनीत सुबोध गुप्ता की लिट्टी चोखा इंग्लिश के प्रति सहज दिखते हैं। जहां इज़ इझ है और पिपल पीपुल्स हैं। व्याकरण ठेंगे पे। काम की कामयाबी के सामने भाषा की संगतराशी कुछ भी नहीं है। संवाद और विचार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सुनीत पूरे सम्मान और आदर से सुबोध को अपने शब्द और वाक्य तलाशने के लिए छूट देते हैं। एक अच्छी बातचीत निकलकर आती है। मेरे जैसा बेचैन तबीयत वाला दर्शक भी ठहर कर सुनने लगता है।सुबोध की अंग्रेजी मेरे जैसी है। हिन्दी को इंग्लिश में बोलते हैं। इंग्लिश को इंग्लिश में नहीं। इसी वजह से सुबोध के जवाबों में एक किस्म की भारतीयता, देसीपन झलकता है। सुनीत एक कुलीन इंग्लिश वक्ता खानदान से आते हैं। मुस्कुराते हैं और अपने सवालों को धीरे से सुबोध के सामने रखते चलते हैं।

ऐसी बातचीत आज के समय में सिर्फ लोकसभा टीवी में ही दिख सकती है। लोकसभा टीवी में ही शंकर अय्यर से नताशा झा और एक और एंकर इंग्लिश हिन्दी में सवाल पूछ सकते हैं। नताशा के अंग्रेजी के सवालों के जवाब में पत्रकार शंकर अय्यर इंग्लिश में और दूसरी एंकर नेहा के हिन्दी के सवालों के जवाब हिन्दी में देते हैं। इस तरह का आइडिया आप निजी चैनलों में लेकर जायें तो लोग कपार फोड़ देंगे। मैं पर्सपेक्टिव कार्यक्रम की बात कर रहा हूं। वैसे यह उतना अच्छा नहीं लगा। सवाल है प्रयोग का। निजी चैनलों में प्रयोग बंद हो चुका है। प्रॉणजॉय गुहा ठाकुर्ता का हेड स्टार्ट भी अच्छा कार्यक्रम है। सरकार के भीतर काम कर रहे कई अनुभवी लोगों को भी सुनने समझने का मौका मिलता है।

लोकसभा टीवी में लोक है या नहीं,उनकी टीआरपी कितनी है नहीं मालूम। मगर अच्छा है। और अच्छा हो सकता है। सृजन की अपार संभावना रहती है। कुछ कार्यक्रम बोझिल भी हैं। लेकिन लोकसभा टीवी आज के समय में एक विकल्प तो है ही। टीवी के आलोचक भी बाज़ारू हो गए हैं। वो अच्छे कार्यक्रमों को नहीं ढूंढते। वो भी बेकार कार्यक्रमों पर ही बार-बार लिखते रहते हैं। शायद हम गरियाने में ज्यादा साधक लगते हैं,सराहना करने में कम। कई लाइफस्टाइल चैनलों में अच्छे कार्यक्रम आने लगे हैं।

लोकसभा टीवी के कई कार्यक्रम इस धारणा को तोड़ते हैं कि आप उनके स्टुडियो में बैठकर सरकार या नौकरशाही की आलोचना नहीं कर सकते। सुनीत के जवाब में सुबोध गुप्ता खुलकर ललित कला अकादमियों की फिज़ूल की नौकरशाही पर हमले करते हैं। इसे दिखाया भी जाता है। सुबोध कहते हैं कि भारत में लोग कला की बात नहीं करते हैं। कितने की बिकी यही पूछते रहते हैं। हद है। सुनीत मुस्कुराते रहते हैं। उनके जवाब को स्वीकार करते हैं। निजी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम एंकर के परफार्मेंस के लिए होता है। वो जवाब सुनने के लिए नहीं बल्कि परफार्म करने के लिए बैठा रहता है। सुनीत इस तरह के दबावों मुक्त हैं। वो बस हैं अपने सवालों के साथ। उनके लिए सुबोध गुप्ता महत्वपूर्ण हैं न कि वे खुद। सुनीत के एक सवाल के जवाब में सुबोघ गुप्ता ने कहा उन्हें नया नया आइडिया उत्साहित और प्रेरित करता है। निजी चैनलों को प्रेरणा कहां से मिलती है? एक दूसरे के कार्यक्रम से चुराने से। लोकसभा टीवी के सामने भी कम चुनौती नहीं है। उनके पास एक मौका है। वहां काम कर रहे पत्रकार,संपादक जब तक मौका मिले अच्छी रचना करें। नए प्रयोग करें। अपनी आज़ादी का बेहतर इस्तमाल करें। आलस्य न करें। आप अच्छे हैं सिर्फ इसी दलील से कोई नहीं देखेगा। आपको अच्छा होने का सबूत भी देना होगा। रोल मॉडल बन कर।

27 comments:

sanjeev dubey said...

lovely observation ravish ji..there is a fresh breeze in your analysis.thanks for a lovely post

सतीश पंचम said...

मेरे यहां कभी कभार दिख जाता है लोकसभा टीवी....वरना तो दूरदर्शन वाले कार्यक्रम भी बहुत रोचक होते हैं...आज सुबह प्रो. यशपाल बता रहे थे कि गाने के समय कुछ गायक अपनी एक हथेली कान के पास क्यों रखते हैं ( ध्यान दिजिए तीसरी कसम फिल्म के चलत मुसाफिर मोहि लियो रे गाने में एक कैरेक्टर ऐसे ही कान के पास हाथ रख गाता है )

इस तरह के रोचक बातें पता चलती रहती हैं।

बढ़िया पोस्ट।

प्रवीण पाण्डेय said...

लोकसभा का चैनल देख सच में लगता है कि बयार बह रही है।

mukti said...

सच में फास्ट फ़ूड के ज़माने में लोकसभा चैनल का स्वाद देसी दाल-भात जैसा है. पिछले साल तक तो हमलोग ये चैनल नियम से देखते थे, जबसे सिविल की तैयारी छूटी तो सारे न्यूज़ चैनल देखने बंद कर दिए. अब तो कभी-कभार देख लेती हूँ आपका कार्यक्रम 'रवीश की रिपोर्ट' 'विनोद दुआ लाइव' और जायका'. दो-चार दिन में एक बार लोकसभा चैनल भी. एक सुकून सा मिलता है.

गिरधारी खंकरियाल said...

इस तरह के शांत और अच्छे कार्यकर्म लोग देखना पसंद नहीं करतें है यहाँ तो टी वी के रिमोटपर लोग कब्ज़ा कर देते है धडाधड चैनेल बदलते रहते है पता नहीं क्यों ?

Kajal Kumar said...

हमारा केबल वाला यह चैनल नहीं देता.

Manisha said...

रवीश जी,

मैं भी ये बात बहुत पहले अपने ब्लॉग पर कह चुकी हूं जिसे आप http://www.hindi-blog.com/2007/09/loksabha-tv-quality-channel.html पर देख सकते हैं।

Praful Bhat said...

एलीट लोगो के बीच खड़ा एक आम आदमी की तरह लगता है लोकसभा टीवी!

Satish Chandra Satyarthi said...

फ़िल्में बड़ी चुनिन्दा आती हैं लोकसभा पर

Vivek Rastogi said...

पिछले कुछ अरसे से केवल यही चैनल हमारा मनपसंदीदा है ।

Anand Rathore said...

ravish ji... bazar ka azaar channels ko lag chuka hai.. aur ho halla ka atyachar ab sabko mahsoos hona band ho gaya hai...iska koi to ilaaz hoga..sabki apni majburi hai...kisi ke paas kuch hai to kisi ke paas kuch nahi..

सम्वेदना के स्वर said...

टीवी समाचार चैनलों को हम समाचार मनोरंजन चैनल नाम से ही सम्बोधित करते रहे हैं.

बहरहाल, आज हमारे देश का टेलिविज़न मीडिया, साबुन-तेल-शैम्पू के विज्ञापनों के बीच, पागलों की तरह चीखता चिल्लाता एक ऐसा मूर्ख बन्दर है, जिसे किसी ने मदिरा पिला दी है और फिर उसे किसी बिच्छू ने काट खाया है. तत्पश्चात उसकी उछल कूद से प्रभावित होकर पीपल के पेड़ से उतर कर एक भूत इसके सर पर चढ़ बैठ गया है.
अपनी इस बात का जब हमने अपने एक संजीदा पत्रकार मित्र से ज़िक्र किया, तो उन्होने तपाक से अपनी टिप्पणी दे डाली, “सच! टेलिविज़न मीडिया एक मूर्ख बन्दर है, जो अपनी विश्वस्नीयता खो चुका है. इस मूर्ख बन्दर ने विज्ञापनों के अंगूरी पैसों से बनी मदिरा पी रखी है, “सर्वशक्तिमान होने के अहंकार” के बिच्छू ने इसे डँस लिया है और अब हालात इतने खतरनाक हो चुके हैं, कि “भ्रष्ट नेताओं तथा उद्योगपतियों” का भूत इसकी सवारी कर रहा है.” पहले तो हम दोनों ख़ूब हँसे, फिर अपने इस मज़ाक का इतना यथार्तपरक चित्रण सुनकर हम सहम भी गये. पत्रकार मित्र ने हमारी स्थिति भाँपकर आगे कहा, “जानते हो इस बुद्धू बक्से में एक बुद्ध भी है ? कभी लोकसभा चैनल देखा है ? नहीं देखा है तो 1-2 हफ्ते देखो, फिर मेरी बात का मतलब समझ आयेगा.”

सम्वेदना के स्वर said...

अब हाल ये है कि हम लोकसभा चैनल के मुरीद हो चुके हैं.

लोकसभा चैनल एक ऐसा मंच है जहाँ भारत, इंडिया से बेझिझक होकर सवाल पूंछता है. न विज्ञापनों का झूठा तिलिस्म है, न समाचार से भी बड़े “एंकर जी”, न चीख-चिल्लाहट, न प्रायोजित मुर्गा-लड़ाई, न प्रलय की उद्घघोषणा, न बाबाओं का पर्दाफाश और न भविष्य बांचती कोई जादूगरनी.
लोक सभा चैनल एक आदर्श समाचार चैनल है.

सम्वेदना के स्वर said...

इसके कुछ प्रमुख कार्यक्रमों की एक झलक आपके लिएः
1. आप की आवाज़: एक अनूठा कार्यक्रम, जिसमे एंकर दिखता ही नहीं है. माइक्रोफोन और कैमरे का काम आम जनता के बीच घूमते हुए, जनता से जुड़े विषयों पर, जनता की आवाज़ को रिकार्ड भर करना है.

2. बातों बातों में: मृणाल पाण्डे द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम में हर हफ्ते एक मशहूर हस्ती से मुलाकात करवायी जाती है. विदुषी मृणाल पाण्डे का शालीन अन्दाज़ आमंत्रित अतिथि को, कब स्टूडियो से आपकी बैठक में ले आता है पता ही नहीं चलता.(फिलहाल नये एपिसोड नहीं आ रहे

3. लोक मंच: सम-सामयिक विषयों के अलावा, संसद मे रखे गये महत्वपूर्ण बिलों पर बिना किसी चीख चिल्लाहट के गहन चर्चा- हिन्दी में और अंग्रेज़ी कार्यक्रम में भी.

4. ए पेज फ्रोम हिस्ट्री: यह एक गम्भीर कार्यक्रम है, जिसमें इतिहास का कोई एक पन्ना खोलकर, उस एतिहासिक घटना का, आमंत्रित बुद्धिजीवियों द्वारा आकलन प्रस्तुत किया जाता है.

सम्वेदना के स्वर said...

5. एकला चलो: उन संसद सदस्यों से बातचीत, जो छोटी पार्टियों से आते हैं. उनकी राजनीति और विकास की अवधारणओं से रुबरु कराता, एक अच्छा कार्यक्रम. जिसका मूलमंत्र है “लोकतन्त्र बहुमत की तानाशाही नही है.”

6. साहित्य संसार: ज्ञानेन्द्र पाण्डे द्वारा साहित्यकारों से साक्षात्कार, पुस्तक मेलों तथा साहित्य-गोष्ठियों की रिपोर्ट, कवि-सम्मेलनों की झलकियाँ आदि. साहित्यिक गतिविधियों का ऐसा नियमित कार्यक्रम किसी चैनल पर देखा नहीं जा सकता.

7. अस्मिता: मूलत: स्त्रीयों के विषय उठाता यह कार्यक्रम इतने सहज फार्मेट में प्रस्तुत किया जाता है जैसे अपनी मित्र मंडली ही मिल बैठ कर बतिया रहें हों.

8. वीकेंड-क्लासिक: मिर्ज़ा ग़ालिब, पोथेर पांचाली, शतरंज के खिलाड़ी जैसी दुर्लभ फिल्में जब भी लोक सभा चैनल के इस कार्यक्रम पर देखने को मिलती हैं, हम अपने प्रियजनों को फोन खटका कर बताते रह्ते हैं.

सम्वेदना के स्वर said...

और अंत में लोक सभा चैनल की The Hindu- Business line समाचार पत्र द्वारा की गई समीक्षाः

Guess which channel is slowly but surely going up the TRP ladder – our very own Lok Sabha TV (LSTV).In Delhi, LSTV recently equalled the television ratings (TVR) of prominent news channels such as CNBC 18, Headlines Today and CNN-IBN, according to TAM India rating agency.With a TRP of .01, LSTV's viewership was higher than several international channels such as BBC and CNN. Similar ratings were recorded in Mumbai, where LSTV matched popular news channel NDTV 24X7. Going by the ratings, people are warming up to LSTV, which is said to be the world's only channel to be owned and operated by a House of Parliament.Publicity campaigns in 2009-10 fetched Rs.4.6 crore, whereas the total capital expenditure for the same period was a meagre Rs. 1.5 crore. It is currently run from the Parliament Library Building and boasts of a modern Production Control room with 10 robotic cameras. But the channel is not all about the Lok Sabha sessions. It has an array of value-added programmes which are aired after the House sessions and when the Lok Sabha is not meeting. These programmes cover areas relating to democracy, governance, people's issues, gender discourse, constitutional aspects and economy.Paranjoy Guha Thakurta said: “It is highly unfortunate that it has been without a Head since the past few months and that it could be due to plain bureaucratic lethargy.”With the recent optimistic TVR levels, industry watchers feel that LSTV must aim to achieve higher figures and resolve the current bureaucratic issues plaguing the channel. While some analysts believe attractive feature stories on entertainment and sports can result in a huge boost in TRPs, others say the channel should continue to build on its USP of a serious news channel.

सम्वेदना के स्वर said...

उपरोक्त हमारी मई 2010 की पोस्ट से है :
http://samvedanakeswar.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html

रवीश जी लोकसभा चैनल एक मात्र ऐसा चैनल है जिसे हम टेलीविज़न चैनल मानते हैं जहां समाचार मनोरंजन नहीं है। जहां भारत और इंडिया दोनों को प्रतिनिधित्त्व मिलता है। आपने शायद कुछ समय से ही इसे देखा है और वो भी बाकी चैनलों से ऊबकर।

कभी एक्दम ताजा मन से देखियेगा इसे और अपने “धन-दे” के लोगों को भी इससे देखने और सीख्नने को कहियेगा।

Satish Chandra Satyarthi said...

जिनके केबल पर नहीं आता वे यहाँ भी देख सकते हैं लोकसभा टीवी, बिलकुल मुफ्त..
http://loksabha.nic.in/ls/audio/lslive.htm

विजय प्रकाश सिंह said...

अच्छी समीक्षा की है आपने | वैसे रवीश की रिपोर्ट सबसे बेहतरीन कार्यक्रमों में से एक है, उसका जिक्र शायद आपने झिझक की वजह से नहीं किया |

ज्यादा तर चैनल अपने को मनोहर कहानियां या फ़िल्मी कियां बना कर संतुष्ट हैं |

Kisalaya said...

Namaskar Sir, ye jaankar achha laga ki aap jaisa vyast patrakar bhi LokSabha Tv dekhta hai. Itne dhyan se dekhta hai ki uski cheer-phaad bhi kar sake. Dhanywaad.
Haan kuch bojhil prog.per aapki agli post me charcha chahoonga. Shyad kuch sudhaar aa sake.
" Nindak Niyere Rakhiye".
Aap ke sujhavoon & aalochnao ki prateeksha hai.

Kisalaya said...

Namaskar Sir, ye jaankar achha laga ki aap jaisa vyast patrakar bhi LokSabha Tv dekhta hai. Itne dhyan se dekhta hai ki uski cheer-phaad bhi kar sake. Dhanywaad.
Haan kuch bojhil prog.per aapki agli post me charcha chahoonga. Shyad kuch sudhaar aa sake.
" Nindak Niyere Rakhiye".
Aap ke sujhavoon & aalochnao ki prateeksha hai.

Sundip Kumar Singh said...

रविश जी ठीक कहा आपने बदलाव जरूरी है. लेकिन आज प्राइवेट चैनल जिस तरह क्रिकेट महिमा और राखी सावंत-वीणा मालिक महिमा गान और सिरिअलों की कहानी जपने में लगे हैं ये बहुत निराश करने वाली चीज है.

Sundip Kumar Singh said...

रविश जी ठीक कहा आपने बदलाव जरूरी है. लेकिन आज प्राइवेट चैनल जिस तरह क्रिकेट महिमा और राखी सावंत-वीणा मालिक महिमा गान और सिरिअलों की कहानी जपने में लगे हैं ये बहुत निराश करने वाली चीज है.

Shuchita Vatsal said...

Beautifully scripted.. Sir, all doesn't enjoy simplicity.But few who does, always create milestones in Human history! Good,if we could have more viewers who relish great News n Discussions like those on Lok-Sabha channel!Scenario of Indian democracy would change once a general citizen would learn to enjoy n contribute to such News.Its satisfying that few are still there.. away from glitters n glamours of the Idiot box. Regards.

pradeep said...

loksabha tv is the best channel..

asmita said...

raveesh ji apka shukriya asmita vaqai ek koshish hai dekhna jaari rakhiyega har thrusday 10pm.
sameena

Rais Siddiqui said...

no doubt, lok sabha tv is the most elegant channel in hindi/english in every respect.
rais siddiqui