ज़रूरत है एक पांडे पार्क और मिश्रा मयखाने की....

9 comments:

sanjaygrover said...

samajh nahiN na aaya babu...!

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

पांडे पार्क और मिश्रा मयखाने से जुड़ी कोई पोस्ट पहले दी हो तो उसका लिंक देते। आपकी तरह समझदार नहीं हैं।

amrit said...

जातियां समाज बन गईं!
मैं भी सोच रहा हूं एक ताड़ी का बागिचा लगाऊं..जहां पर सिर्फ बाभन समाज के लोग आकर ताड़ी पीए...पासी समाज में जाके ताड़ी पीकर बेदीन थोड़े होना है।

amlendu asthana said...

jati to humsab ki jaden hain per ek-dusre ki jati ko laker jo jahar hamare man mein hain wo galat hai. Mai to jati ki jad mein vot ki rajniti aur bahubal, varchasw ki ladai ko ghatiya manta hoon. sab ek-dusre ka sammam karen aur shanti se jyen. mai khud jhati aur dharm vihin samaj ki asthapna karna chahta hoon.
Ravishzee apne achchha vyang likha hai. Thanks

JC said...

५० के दशक में पहली बार हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' पढने को मिली थी...फिर साठ के दशक में किसी एक कवी सम्मलेन में वही सारगर्भित पंक्तियाँ खुद उनके मुंह से सुनी, जो कुछ ऐसे हैं: #१ "मंदिर मस्जिद बैर बढाते/ मेल कराती मधुशाला."...

#२ "एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला/ एक बार ही लगती बाज़ी/ जलती दीपो की माला/ किन्तु दुनिया वालो मधुशाला में आ कर देखो/ दिन में होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला."...

Aadarsh Rathore said...

ये तो वैशाली का फोटोग्राफ लग रहा है,
लेकिन समझ नहीं पाया कि इसका उद्देश्य क्या है...
रवीश जी कृपया बताएं...

ravish kumar said...

इसका उद्देश्य बस इतना ही है कि अपने आप पास आ रहे बदलाव को नोटिस किया जाए। इसी के बगल में एक पार्क मां काली के नाम रिजर्व हो चुका है। हर पार्क अपनी अलग पहचान लिये हैं। और पहचान की ख्वाहिश अलग अलग पार्कों को ढूंढ रही है

राहुल said...

ha ha ha, aakhir pakad liya aapne chitrgut maharaaj ko, ganimat hai ki sirf blog pe diya...nahi to chitrgupt ke vanshaj bawaal kar dete aur mishra aur paande me than jaati.....majedaar foto aur usse bhi majedaar caption

Aadarsh Rathore said...

जी
धन्यवाद :)