क्या पतंगों को काइट कहते हैं?

रविवार को पतंगों की दुकान में पहुंचा था। बेटी को पतंग चाहिए। वो उड़ाना चाहती थी। वैशाली के आस पास की दुकानों में पतंग बेचने वालों से पूछा कि फलां पतंग का नाम क्या है तो जवाब नहीं दे पाया। बहुत पूछा तो जवाब मिला कि काइट कहते हैं। मेरी बेटी ने भी कहा कि काइट ही कहते हैं पापा। मैं बोलने लगा कि नहीं हर पतंग का अपना एक नाम होता है। वो और हैरान हुई लेकिन तब भी दुकानदार ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। मैं अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहने लगा कि ये रूमाली है,घईली है,इसको टोपी कहते होंगे। मेरी बेटी काफी खुश हो गई कि सबके अपने अपने नाम होते हैं। बोली कि पतंग आदमी होता है क्या। मैंने कहा कि आदमी तो नहीं होता लेकिन आदमी का दोस्त होता है। हम अपने दोस्तों को अपनी पसंद के नाम से बुलाते हैं। इसीलिए पतंगों के पुकार के नाम होते हैं।

सोचने लगा कि ऐसा क्यों हुआ? दुकानदार ने दिलचस्पी क्यों नहीं हुई जानने में? गांवों से शहरों की ओर तेजी से माइग्रेशन हो रहा है। लोग नए नए पेशे अपना रहे हैं। अब वो बात नहीं रही कि मोहल्ले का एक दुकानदार पिछले पचीस साल से पतंगें बेच रहा है। उसे मंझे से लेकर लटाई तक की बारीक जानकारी है। एक पेशे में कई लोग आए तो उसका विस्तार हुआ मगर ये दुखद है कि उसकी बारीक जानकारियां लुप्त होने लगी हैं। ठीक है कि हम पतंग नहीं उड़ाते हैं लेकिन जो लोग उड़ाते हैं उनके बीच इन नामों का संचार तो होना ही चाहिए। पतंग उड़ाने के उत्साह के साथ साथ पुकार के नाम से एक रिश्ता बनता है।

दिल्ली जो एक शहर है। महेश्वर दयाल की यह किताब पढ़ने लायक है। दिल्ली को किस्सों की नज़र से कम देखते हैं। सारी बातें पराठों और इमारतों के आस पास आकर खत्म हो जाती हैं। इसमें पतंगबाज़ी पर एक पूरा चैप्टर है।

एक कहानी मैं कहूं, सुन ले मेरे पूत
बिना परों के उड़ गया बांध गले में सूत

जब किसी ने पहले बुझाई तो बच्चे चिल्लाने लगे- पतंग, पतंग। पुरवैया के बहते ही पतंग आसमान का रूख़ कर लेते हैं। पतंगों के अजीब नाम हुआ करते थे। अलफ़न,बगला,परी या परियल,दो-पलका,दो-बाज़,गुलज़मा,कलेजा-जली,मांगदार,
कुंदेखली,कलचिड़ा,भेड़िया,चांदतारा,अद्धा,अधेल,पूनिया,सांप,अंगारा,शकरपारा,नागदार और न जाने क्या क्या। सैंकड़ों तरह की पतंगें उड़ाईं जाती थीं। ऐसी भी पतंगे होती थीं, जिन पर बारीक कागज़ पर लिखे हुए इश्क-मुहब्बत के शेर लेई से चिपका देते थे। यह शेर उन दिनों आम देखने में आता था-

लड़ चुकीं आंखें अब उस क़ातिल से लड़ता है पतंग
डोर की फ़रमाइशें हैं यह भी सब पर डोर है।

महेश्वर जी ने पतंगबाज़ी के दौरान के शब्दों को भी खूब पकड़ा है। लिखते हैं कि यह काटा वह काटा सुनाई देता था। कोई इच्चम या खिच्चम से और कोई ढिल्लम से पेंच लड़ा रहा है या उसकी कोशिश कर रहा है।

शाहआलम के पड़पोते मिर्ज़ा चपाती मशहूर पतंगबाज़ थे। नवाबों के यहां पतंगबाज़ रखे जाते थे। महेश्वर जी की इस किताब से पता चलता है कि पतंगबाज़ी का दूसरा केंद्र लखनऊ था। वहां के उत्साद दिल्ली आकर दिल्ली के उस्तादों से पेंच लड़ाते थे। मीर कनकुइया लखनऊ के वाजिदअली शाह के पतंगबाज़ थे। पुरानी ईदगाह के मैदान में पतंगबाज़ी की प्रतियोगिता हुआ करती थी। दिल्ली में सलीमगढ़, नूरगढ़ में पतंगबाजी हुआ करती थी। जमना के किनारे की रेत पर पतंगबाज़ों का मेला लगता था।

पतंग को फारसी में काग़ज़-ए बाद (हवा) कहते थे। मांझा करने के अपने अपने गुर होते थे। इन्हें गुप्त रखा जाता था। तस्वीरों में कृष्ण को भी पतंग उड़ाते दिखाया जाता है। महेश्वर दयाल की यह किताब पढ़नी चाहिए। पतंगों के लिए भी और उस शहर के लिए भी जो शहर जैसा लगता है। फ्लाईओवर वाला शहर नहीं।

31 comments:

विनीत कुमार said...

घइली पतंग की याद शायद मुझे जीवन भर रहे। इसे हमलोग घईली तिलंगी कहा करते। पतंग का एक नाम अपने तरफ तिलंगी भी है। बरसात का मौसम। दीवारें गिली। तभी घईली तिलंगी उंची दीवार पर लगे लोहे की रड में फंस जाता है। मैं बांस की सीढ़ी से निकालने की कोशिश करती है। नीचे खड़ी मेरी मां बार-बार मना करती है,मत निकालो जाने दो,गिर जाओगे। मैं नहीं माना। जिस इंट को पकड़कर खड़ा था,वो ईंट दीवार से अलग हो गयी और मैं नीचे उतर गया।...इतना भर याद है मुझे।

उसके बाद जब मैंने आंखे खोली तो दायां पैर भारी-भारी सा महसूस हुआ। उस पर तीन किलो से भी ज्यादा वजन के प्लास्टर चढ़ चुके थे। जब वो उतरा,तब तक पतंग का मौसम और उड़ाने का नशा दोनो खत्म हो गए।

मधुकर राजपूत said...

किताब तो अब पढ़नी ही पड़ेगी। नामों की फेहरिस्त एक दो और शुमार किए देता हूं जो मेरे यहां प्रचलित थे। बरेली से पतंग मांझा आता था। पतंगे होती थीं, लम्पुचड़ा, बोतल, तैरनी, पंडाकचा और भी कुछ थे। अब याद नहीं रहे, क्योंकि पतंग उड़ाना सीखने के चक्कर में चर्खी पर पल्लेदारी करते रहे और कालांतर में पतंगबाज़ी से दिल हट गया। रस्किन बॉन्ड की काइट मेकर याद आती है। बनियान ट्री के नीचे महमूद का फटा बनियान और लड़कों का पतंगबाज़ी से हटता दिल। शोहदों का काम बन चला था पतंगबाज़ी। आज भी बरेली में बड़े पैमाने पर पतंग मांझा बनता है, लेकिन उतनी तादाद में आसमान में तैरती दिखाई नहीं देतीं। पतंगों के नाम मर गए लेकिन आप हम थोड़ा-थोड़ा योगदान देकर दोबारा ज़िंदा कर सकते हैं, अगर पतंगबाज़ी ही मर गई तो। डस बांधने की गुप्त कला और उसे बैलेंस देकर हवा में छोड़ने का तरीका ही मर गया तो अफसोस की बात होगी।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

किताब जरूर पढना चाहेंगे। आखिर अपने जमाने में इसे बनाने से ले कर लड़ाने तक की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। आह! वे सुनहरे दिन।

AlbelaKhatri.com said...

patang udaaye hue koi bees saal ho chuke, lrekin mujhe bhi aaj tak ye naam yaad hain ...
jab hum kisi mitra k dwara patang mangaate the toh use ye nahin kahte the ki patang le aa,k ye kahte the ki itnii ye waali, itnii ye waali aur utni voh waali le aa........

waah ...khoob yaad dilaai
badhaai !

गिरीन्द्र नाथ झा said...

हां पढ़ रहा हूं...

JC said...

अपने दिमाग की पतंग को ढील दें तो शायद पायेंगे की अंग्रेजों ने जिसे - पक्षी समान आकाश में विचरण करते देख - काईट (kite) नाम दिया, उसी को उससे अधिक उडान देते हुए, दीये की लौ की ओर खींचे चले आते पतंगे पर आधारित, सूरज को छू लेने जैसे, मुग़लों ने 'पतंग' नाम दिया हो सकता है...

यूनानी मान्यता के अनुसार भी किसी शक्तिशाली पुरुष ने भी (शायद हनुमान से प्रभावित हो, जिसने सूर्य को मीठा फल समझ अपने मुहँ में रख लिया था) सूरज को छूने का असफल प्रयास किया था...

बचपन में मैंने एक 'उस्ताद' की पतंग को काट डाला था, और कुछ दिन तक मैं अपने दोस्तों का हीरो बन गया था :)

मुनीश ( munish ) said...

क्या पतंग -फतंग लगा रखी है रवीश भाई ',कन्कव्वे' कहो जनाब 'कन्कव्वे' ! प्रेमचंद की कहानी है 'बड़े भाई साहब' उसे पढो .!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

महेश्वर जी की किताब हम भी पढना चाहेंगें.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आह! वे सुनहरे दिन।

sushant jha said...

हम भी पतंग उड़ाते थे, लेकिन खरीद के नहीं ला पाते थे। गांव में रहते थे सो खुद ही बना लेते थे। डांट भी पड़ती थी कि लड़का बिगड़ गया है। पढ़ाई लिखाई नहीं करता। उस समय मन भी बहुत लगता था। पतंग कई बार पेड़ अटक जाए या टूट जाए तो फिर से बनाते थे। चावल या आटे की लेई से कागज पर कमानी बांधते थे। ये शायद 18-20 साल पहले की बात होगी। गांव में नया-2 टीवी आया था। बीआर चोपड़ा के महाभारत के वक्त ही हम पतंगवाजी को विराम देते थे। क्या वक्त था...उस वक्त गांव में अघोड़ी भी आते थे...और गोरखपंथी साधू भी। नटों और बंजारों का झुंड भी दिखता था। गांवों में धीरे-2 तांत्रिकों और भगतों का असर मद्धिम पड़ने लगा था। ये शायद उदारीकरण के शुरुआत के आसपास की बात है। कहां चला गया सबकुछ....सिर्फ वो पतंग गायब नहीं हुआ...बहुत कुछ गायब हो गया।

Vishal Mishra said...

apne mujhe kafi kuch yaad dila diya.. maine bhi patange udai hain aur kafi lambe pench ladaye hain.. do tarike hote hain pench ladane ke ek to dheel dekar dusra kheenchkar.... lucknoe me jamghat ka ek din hota hai... mere jile lakhimpur-kheri me to basant aur makar sakaranti wale din patango se aasman cha jata hai... us din lagbhag har ghar ka insaan patangbazi ka budget rakhta tha.... is lekh se aapne mera bachpan yaad dila diya dhanyawaad.

sanjaygrover said...

ओहो ! पतंग उड़ाने में मैं कामचलाऊ था। अपने आस-पास के ‘मास्टर’ पतंगबाज़ दोस्तों की तरह नहीं था। शाम को जब दो चचेरे भाई मेरे अगल-बगल बैठ अपनी ‘‘ये काटी, वो लूटी’’ चर्चा करते तो मैं बीच में बैठा भुनभुनाता रहता। जब सारे दोस्त मिलकर पतंग उड़ाते होते तो ‘चरखी’ या ‘हुचका’ पकड़ने के अलावा कोई चारा न रहता। यह फ्रस्ट्रेशन भी मेरे भीतर दूसरी फ्रस्ट्रेशन्स के साथ जा मिली थी। इसी के तहत एक बार मैंने दोनों चचेरे भाईयों के हुचके बारी-बारी से चुराकर एक-दो दिन के लिए उन्हें आपस में लड़वा दिया था। एक बार मैंने एक तरकीब और निकाली। पड़ोसी की पतंग पर ऊपरला पेच लेकर डोर हाथ से एकदम छोड़ देता। वो समझता कि मेरी कट गयी है और तुरंत ढील रोकता और उसकी ‘ये जा और वो जा’। डोर मैं पहले ही अपनी लंबी छत पर खोलकर, फैलाकर रखता। जब उसकी छः कट गयीं तो उसे मेरी तरकीब समझ में आयी। लगा गालियां बकने।
खैर साहब, पतंगबाज़ी के नाम से फिल्म ‘भाभी’ के गाने ‘चली-चली रे पतंग मेरी चली रे’ का अल्हड़-प्रसंग भी याद आ जाता है।
-संजय ग्रोवर

अंशुमाली रस्तोगी said...

रवीश भाई, यह पतंगबाजी है ही ऐसी चीज कि आदत अब तक नहीं छुटती। मेरे शहर बरेली में पतंगबाजी का अपना ही लुत्फ है। पतंगबाजी से जुड़े बचपन के वे दिन आज भी स्मृतियों में शेष हैं।
अपना बरेली तो गढ़ है पतंग और पतंगबाजी का।

amlendu asthana said...

Ravish zee bachpan mein jab patang udane aur gulel chlane ke lye hum ghar se chpuchap nikal jaya kerte the aur sham ko ma ki daant padti thi. wo mithi yaad apne taja ki. sukriya. Hume apna Darbhanga bahut yaad aa raha hai.
Amlendu chandigarh

डॉ .अनुराग said...

पतंगों का भी मौसम होता है साहब ...हमारे शहर में बसंत पंचमी अब भी धूम धाम से मनाई जाती है .ओर गुजरात में उत्तरायण करके बड़ा त्यौहार ...इसका ट्रेंड आज भी है .बल्कि कई स्टाइलिश पतंगे मार्केट में है ....हाँ इतना जरूर है बढती बिल्डिंगो से अब हर घर में नहीं उड़ती है .वैसे भी अब जबकि खेल के मैदानों में बच्चे नहीं दीखते तो पतंग उडाते कहाँ दिखेगे ?वैसे बसंत वाले दिन हम भी हाथ आजमा लेते है....

महामंत्री - तस्लीम said...

Apne bachpan ke din yaad aa gaye.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

anil yadav said...

साहब क्रिकेट के बाद पतंग ही थी जिसकी वजह से घर में बहुत मार खानी पड़ी....न जाने सद्दी और मांझे की कितनी चरखियां चूल्हे की भेंट चढ़ गई....लेकिन तमाम मुश्किलों से जूझते हुए भी हमने इस नवाबी शौक को अपने से अलग न होने दिया....स्कूल से आने के बाद बैग फैंक कर तुरंत ही चर्खी और पतंग लेकर छत पर चढ़ जाना अपनी दिनचर्या का हिस्सा रहा ....सुबह से शाम तक मांगदार.लट्ठेदार और तौखा कनकउव्वों पर अपनी निगाह अर्जुन से भी ज्यादा एकाग्रता के साथ टिकी रहती थी....और आप सबकी दुआ से बंदा दो चार मुहल्लों के सबसे शानदार पतंगबाजों में शामिल था....लेकिन लखनऊ की गलियों से जुदा होने के बाद अब तो जिंदगी खुद ही पतंग हो गई है....और मीडिया की नौकरी में तो हर कोई हत्थे से ही पतंग काटने पर पिला हुआ है....

creativekona said...

भाई रवीश जी ,
ग्रेजुएशन की पढाई तक तो पतंगबाजी मैनें भी बहुत की है लेकिन जितनी विस्तृत जानकारी पतंगों की अIपने दी है उतनी मुझे नहीं थी .बहुत रोचक लगा लेख.एक बात तो पूरी तरह सच है की टी वी ,कंप्यूटर ,वीडियो गेम --जैसी ढेरों चीजें हमें और हमारे साथ ही बच्चों को भी हमारी संस्कृति ,पारंपरिक खेलों आदि से दूर करते जा रहे हैं.बताइए अब आपको कहीं कोई लड़की चिबद्दक,गुड्डे गुडिया का खेल या कोई लड़का गुल्ली टेना ,सीसो पाती खेलते दिखता है ....तो ऐसे में पतंग को तो वो सिर्फ काईट ही कहेगा .
हेमंत कुमार

khushboo said...

pad ke acha laga , ladkiyan to patang kam hi urati hain, me bhi choti thi to bhai ke sath chat pe jati aur charkhi pakarne ka kaam hota tha , vese use pakar bhi ek art hai ....kab dheel do kab lapeto... ab to patangbajee dikhti hi nahi, bacche bhi ab cricket aur TV me hi khush ho jate hai....umeed hai 15 august pe log thora zada patang urate mile......

Anil Pusadkar said...

खुब पतंग उड़ाई है हमने भी।तिरंगा,चौरंगा,दुपट्टा,अद्धा,नागिन,पुछंडी,चांद-तारा,तब आगरा,बिकानेर और जयपुर की पतंगे भी खूब बिका करती थी।शहर मे एक रज्जाक हुआ करते थे।उनकी पतंग एकदम बैलेंस हुआ करती थी,न गोल घूमे और न एक तरफ़ भागे।मार भी बहुत खाई है पतंग उड़ाने के नाम पर्।मंजा खुद ही सूतते/बनाते थे।अब तो आसमान पर इठालाती पतंगो को देखने के लिये आंखे तरस जाती है।बचपन की याद ताज़ा करने ले लिये आभार आपका।

prabhat gopal said...

patangbaji to lagbhag hamare yaha khatm hi ho gayi. badlaw saaf dikhta hai

Shambhu kumar said...

रवीश सर यादों पर से शहरी धूल हटाने के लिए धन्यवाद... लिटोरे के पेड़ पर चढ़ कर आप ने भी जरूर गोंद के लिए उसकी फलियां तोड़ें होंगे... आखिर हमें आटे की लेई और डिब्बा बंद गोंद कहा नसीब होता था... उसके बाद फरका(ताड़ के पेड़ के पत्ते की कमानी)से कमानी निकालकर जो ठीक नारियल के पत्ते से निकाली गई कमानी(जिसका आजकल झाड़ू बनता है) की तरह होता है... से हम लोग पतंग बनाते थे... शायद पटना, मिथिला और पूरे उत्तर बिहार में पतंग को पतंग कम गुड्डी के नाम से ज्यादा जाना जाता है... वैसाख की दोपहरी में बीच चौर में जाकर आम के पेड़ के नीचे से उड़ाते होंगे... अगर आप पटना में रहे है तो छत से उड़ाते होंगे... बिटिया रानी को जरूर बताइएगा... की बिहार के गांवों में पतंग को गुड्डी भी कहते हैं... दिल्ली आकर अब शायद उस गुड्डी की याद ज्यादा आती है...

JC said...

गुड्डी-गुड्डे से याद आया कि चालीस के दशक तक नई दिल्ली में गुड्डी एक आने की और गुड्डा दो आने का आता था. हम बच्चों को हर दिन के जेब-खर्च के लिए एक आना मिलता था. उसी से हम किसी तरह बचा-बचा कर मांजा, पतंग आदि खरीद लेते थे...और आज मेरा ८ वर्ष का धोता अपनी माँ से १०० रुपये मांगता है - कहता है कि डी. पी. एस. के और बच्चों को भी उनके माँ-बाप इतना ही देते हैं! हमारे समय में भी हम आश्चर्यचकित हो जाते थे जब कुछ बड़े लोग लखनऊ से लोहे के संदूक में बड़े-बड़े गुड्डे ले कर दिल्ली आते थे और हमारे कालोनी के उस्ताद से पेंच लडाते थे. पहली बार उन्हें लगा कि हमारे उस्ताद बेईमानी करते थे क्यूंकि वे खींच से लडाते थे जब कि लखनऊ वाले ढील से, और उनकी अधिक पतंगें कट गयीं...अगले वर्ष वे भी पूरी तय्यारी कर के आये और मैच लगभग बराबर रहा...

शशांक शुक्ला said...

भाई मेरी पसंद तो तिरंगा पतंगा थी जिसको 26 जनवरी में उड़ाता था या बसंती जो जो बसंत के मौसम मे उड़ाता था

उसका सच said...

पतंग को तिलंगी भी कहते हैं जनाब..और उसमे पूंछ लगा दे तो पूंछ वाली तिलंगी कहते हैं. जब तिलंगी गोल-गोल घूमती है तो उसमे हम पूंछ लगा दिया करते थे..और कभी-कभी तो किसका कितना बड़ा पूंछ है..इसकी भी होड़ लगी रहती थी.

Ashish Kedia said...

ravish ji, pranam.

sach meinmaja aa jata hai kisibhi vishaya par aapki dhaar daar battien sun kar......lage rahiye...bitiya ko patang udana sikha chuke ho to fir aur likhiye ga......agli post ka intejar rahege... raam-raam

Dipti said...

आज के वक़्त में बहुत कुछ बदल रहा है लेकिन, इसमें इतनी चिंता की ज़रूरत नहीं। आज के बच्चे अपने हिसाब से खेल गढ़ने में उस्ताद है। मेरे मकान मालिक के दोनों बेटों के लिए मेरे रूम के ऊपर बनी छोटी-सी छत ही खेलने की जगह है और वो वही हर खेल खेल लेते है। वो दो दीवारों के बीच झूला बांधना हो या फिर टंकी पर चढ़कर पतंग उड़ाना। उनके भी अपने कोडवर्ड है पतंगों के लिए। ज़माना बदल रहा है और साथ ही नाम भी। साथ ही साथ बात ये भी है कि हर अंचल में भाषा और बोली के साथ वस्तुओं के नाम बदल जाते हैं। पता किया जा सकता है कि दिल्ली में पतंगों को कौन-कौन से नामों से पुकारा जाता था।

sanjaygrover said...

दीप्ति जी ने मेरे दिल की बात कही।

Neelendu Sharan said...

Ravish Ji,
U have oncegain expressed your connection with the soil of our land. Our culture is so diversified that u can smell it in every walk of our life. And to keep it afresh shows your great intimacy with it.
Thank U.
With regards,
Neelendu

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

पुरानी दिल्ली सब्जी मण्डी में आज भी भाई मुंशी पतंगसाज़ और राम सहाय पतंगसाज़ की मशहूर दुकानें है फ़िल्मीस्तान सिनेंमा के सामनें वाली ईस्ट पार्क रोड़ पर भाई ललित पतंग वाले कि दुकान आज भी पतंगबाजी के उस अंदाज़ को बचाए हुए है।
पतंगों के कुछ और नाम मैं भी जोड़ दूं, चिड़ा, गिलासियर,परियल,लिप्पो अद्दा,पोना,छज्ज़ा।

परेश टोकेकर 'कबीरा' said...

रवीश भाई पतंगबाजी पर लेख लिखकर आपने तो हमें "हाथ पे से हेच दिया"।
जानकारी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।