प्रेम-पत्र वाले मुंशी जी का ख़त























(प्रकाश पब्लिकेशन, गली नंबर १३, कैलाश नगर दिल्ली की इस हस्त पुस्तिका के पहले पन्ने पर लिखा है प्रेम-पत्र रोमांटिक लव लेटर। लेखक हैं अवधेश कुमार उर्फ मुंशी जी।)

मुंशी जी सही मायने में प्रेमचंद हैं। प्रेम के तमाम एंगल पर ख़त लिखने का हुनर किसी साहित्य अकादमी वालों की नज़र से नहीं गुजरता। देश की गलियों में पलते हुए बुढ़ा रही तमाम प्रतिभाओं के सम्मान में कस्बा में बिना मुंशीजी से पूछे उनकी एक महान रचना को इंटरनेट पर पेश किया जा रहा है। मुंशी जी की दुनिया में आज भी ख़त पत्र है।

शीर्षक- अनजाने प्रेमी का पत्र

जाने सनम,

जब से मैंने आपके सौंदर्य को एक नज़र निहारा है तब से दिल बेकरार है। अब आप को बग़ैर जाने पहिचाने ही कैसे किसी पर मोहित होकर प्यार जताने का अधिकार है। सवाल ठीक है परन्तु दिल जब आ जाता है तो किसी से रोके नहीं रुकता। अब सवाल यह उठता है कि प्यार अनजाने क्यों किया?मेरी जान,प्यार करने से नहीं बल्कि हो ही जाता है चाहे किसी से भी हो जाए तभी तो जब से आपको देखा है तब से पहलू में दिल बेचैन है,मैं स्वयं भी समझने में असमर्थ हूं क्योंकि-

दिल आ गया तुम पर, दिल ही तो है।
तड़पे क्यों न, बिसमिल ही तो है।।

मैं क्या बताऊं कि मुझे क्या हो गया। हर समय दिल काबू से बाहर हो गया। माइन्ड पर कंट्रोल नहीं रहा है। मेरे दिल की मलिका, मैंने आपको जब से सुभाष पार्क में गांधी जयंती में अपने परिवार के साथ टहलते देखा तब से ही ह्रदय में एक हलचल पैदा हो गई जिसे मैं रोकने में असमर्थ हूं और बहुत देर से न्योछावर करता हूं। यूं तो आज तक लाखों हसीना मेरी आंखों के आगे गुज़रे होंगे परन्तु ईश्वर ने आपकी अदा ही निराली बक्शी है। जिसने मुझे दीवाना बना दिया।

देखा जो हुश्न आपका, तबियत मचल गई।
आँखों का था कसूर, छुरी दिल में चल गई।।

प्रिय जाने मन और गुलबदन तुम क्या जानो कि आपको वियोग में हमारे दिल पर क्या क्या गुजर रही है। दिन पर दिन दहशत बढ़ती जा रही है। ख्याल बदलते जाते हैं। आखिर दिल बेचैन हो कर यही कहता है-

तुझे क्या खबर वे मुर्ब्बत किसी की।
हुई तेरे गम में क्या, हालत किसी की।।

इतना ही नहीं इश्क के सिद्धांत यहां तक बढ़ गई कि पागलों की तरह मारा मारा आपकी कोठरी के इर्द-गिर्द फिरता हूं। इस ख्याल में कि एक बार वो चांद सा मुखड़ा देखने का अवसर मिल जाए ताकि ये तड़पता हुआ दिल किसी तरह तस्कीन पाए।

रात दिन सोचते हुए समय व्यतीत कर दिया, फैसला हो न सका। आखिर आत्मघात कर लेने का विचार किया परन्तु आपका प्रेम और दर्शन की आशा ने मुझे मरने भी नहीं दिया।आपको कालिज पहुंचाने को आपका ड्राइवर कार लाया और आपको बुलाने ज्यों ही अंदर गया बस मेरी आत्मा प्रफुल्लित हो गई। मैंने शीघ्र ही यह प्रेम पत्र जान बूझकर सुन्दर लिफाफे में बन्द करके आपकी सीट पर डाल दिया। अब इंतजार पत्र के उत्तर पाने को है। अब आप चाहे जो कहें मगर मैं तो यही कहूंगा-

जवानी दीवानी गजब ढा रही है।
मोहब्बत के पहलू में लहरा रही है।।
किया खत का मजमून खतम चुपके चुपके।।
रुकी अब कलम यहीं पर चुपके चुपके।

अधिक क्या लिखूं रंग लाने को ही बहुत है।
आपका अनजाना प्रेमी सतीश

18 comments:

रंजन said...

रवीश जी,
कहां कहां से ढुढ लाते है आप.. बहुत मजेदार खत है.. एसे ही शायरी की किताब भी आती है, जो खत में लिखी जाती है.. :शिशी भरी गुलाब की, पत्थर से तोड़ दू....."

फ़िरदौस ख़ान said...

किया खत का मजमून खतम चुपके चुपके।।
रुकी अब कलम यहीं पर चुपके चुपके।


बेहतरीन तहरीर है...

अपने से बाहर... said...

रवीश दा, वैसे तो आप कह सकते हैं कि आम खाएँ, पेड़ ना गिनें, लेकिन इस अद्भुत लभ-लेटर के इतिहास-भूगोल बारे में थोड़ा स्पष्ट कर देते तो और तृप्ति होती। अवधेश कुमार उर्फ़ मुंशीजी सतीश में कैसे परिणत हो गए? फिर ये वृहद् प्रेम पत्र अगर वृहद् है तो क्या इस भंडार में और भी रत्न हैं? और ये पाई कहाँ जाती है,छपाई और फोटो से तो सड़क छाप लगती है? वैसे आम अत्यंत स्वादिष्ट निकला। हम तो मुंशी जी की पुण्यतिथि के धोखे में टेस्ट कर बैठे।

ALOK PURANIK said...

क्या केने क्या केने।

ravishndtv said...

अपने से बाहर जी

यह पांच रुपये की एक पुस्तिका है। प्रेम पत्र कैसे लिखें जैसे गंभीर विषय का सस्ता समाधान। इस पुस्तिका में लिखे गए तमाम तरह के प्रेम पत्रों में से एक का मैने आप पाठकों के लिए इंटरनेटकरण किया है। मज़ा लीजिए। आगे और भी किसिम किसिम के प्रेम पत्र छापूंगा। अवधेश की रचना को जगप्रसिद्ध बनऊंगा।

Rohit Tripathi said...

Bahut hi mazedaar.. Raveesh ji Delhi ki ladkiyon pe thoda aur likhiye na.. aap unpe kuch naya nahi likhte aur hum hai ki purane bhag padhne mein hi lage rahte hai.. bahut bahut sundar likhe hai sare post.. bas kabhi kabhi to mann karta hia ki itna kam kyon likhte hai kyon nahi ek baar mein 100-*200 post likh dete hai aur bas unhe padhte rahe.. shabdo mein jaan hai aapke.. bahaav hai ek.. aise shabd hai jinhe hum mehsoos sa kar sakte hai.. Ravish ji pls delhi ki ladkiyon pe aur likhiyega.. dher sara likhiyega ;-)

Rohit Tripathi

अपने से बाहर... said...

दादा,
लग रहा था कि अभी ख़ज़ाने का केवल ताला भर खुला है, अभी हीरे-मोती बरसने बाक़ी हैं!वाह,गुदड़ियों में छिपे लाल की तलाश के इस महाकार्य के लिए अनगिनत धन्यवाद, और हाँ अवधेश बाबू का अमरीकरण करते-करते, लगले हाथ,उनसे भी मिलवा दीजिए किसी दिन, अमिताभ घोष तो हैं नहीं कि वाके द टॉक में आएँगे। बस आपके क़स्बे में टंडइलि करने आए एक पाठक की एक और फ़रमाइश समझिए।

ANIL YADAV said...

खांटी साहित्य। जिससे जिंदगी बदलती है।

एस. बी. सिंह said...

वाह भईया, कई शेर याद आ गए-
लिखता हूँ ख़त ये खून से स्याही न समझना
मरता हूँ तेरी याद में जिंदा न समझना।

और

शीशी भरी गुलाब की पत्थर पे तोड़ दूँ,
तेरी गली न छोडूं दुनिया मैं छोड़ दूँ।

वगैरह वगैरह...... बहुत खूबसूरत धन्यवाद

Irshad said...

एक होता है घटिया बातों को हवा देना और एक होता है उन्हे प्रोत्साहित करके चलन में ले आना आप दोनो में से क्या करे है मित्र। आपके इस पोस्ट पर टिप्पणी कम चाटुकारिता संदेश अधिक दिखाई दे रहे है। इस तरह की किताबों को पीला साहित्य कहा जाता है जिसकी कीमत आप पाँच रूपये बता रहे है वो १०० से १५० रूपये सैकड़ा में मिलती है श्रीमान जी। घटिया सैक्स के तरीके या दूसरी इसी तरह की किताबें इन्ही गली मौहल्लों के प्रकाशनों की देन है। और जिन्हे आप मुंशी जी कह रहे है क्या आप उन्हें जानते है। ऐसे न जाने कितने मुंशी मस्तराम के नाम से लिखते है और नई नस्लों को जिनकी पहुंच में इसी तरह का साहित्य आता है, बिगाड़ रहें है। और आप इनकी वकालत किये जा रहे है ( आगे और भी किसिम किसिम के प्रेम पत्र छापूंगा। अवधेश की रचना को जगप्रसिद्ध बनऊंगा।) इसका मतलब ये हुआ अगर आपकी नजर किसी तुच्छ चीज पर भी पड़े तो आप उसकी जांच पड़ताल किये बिना हीरा बनाने पर तुल जायेगें। क्योकी वो आपका नजरिया है। आपने उस चीज को इस तरह से देखा। इसलिये वह सही है। आपके इस तरह के लेख पर मेरा ऐसा मानना है मैं नही जानता आप क्या सोचते है। बराहहाल अगर कुछ तल्ख कह दिया हो तो माफ करना।

राजीव कुमार said...

एक कॉपी VPP से भेजने का कष्ट करें। सुननें में आया है कि पाँच से अधिक कॉपी मंगवाने पर आप डाक ख़र्च नहीं लेते हैं। अच्छा किया, हालिया दिनों में कस्बा बोझिल हो चला था। दिल्ली की लड़की, घर में फ्रिज़ के बाद आप मुंशी जी को प्लेटफार्म मुहैया कराने के लिए ही जाने जाएंगे।

JC said...

'Bharat', that is, India mein 'Democracy' her vyakti ko kuchh bhi kahne ka adhikar samajha jata hai...

Aadmi ek samajik prani hai aur sab yeh nahin samajh pate hein ki achchhe aur bure mein ek maheen rekha bher hi hoti hai...

Is dharati per, jo gyani hue hein wo kah gaye ki dosh rasna (jivha, yani jeebh) ka hota hai...agyani khate waqt ya bolte samay doorgami parinamon ko nahin sochta (athva her koi kisi seema tak hi soch pata hai)...Gita mein is liye gyani likh gaye ki sab galatiyon ka mukhya karan agyan hai...

Krishna kah gaye ki unhein her kal ke ant mein janma lena hota hai isi karan...drama phir se arambh karvane ke liye...Satyga se Kaliyuga tak!

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब भाई...

KAUSHAL KISHORE / Kharbhaia / Patna said...

रवीशजी
इरशाद भाई की टिपण्णी नज़र अंदाज करने के काबिल है . क्या सौन्दर्य और गुदगुदाने वाली हर बात अश्लीलता की श्रेणी में आती है.सतही तौर पर समानताएँ तो बहुत साड़ी चीजों में ढूंढी जा सकती हैं.
रही बात तारीफ़ की तो सहृदय लोग जिसे तारीफ़ कहेंगे कोई उसको चाटुकारिता भी कह सकता है.हर का अपना मन ,मिजाज और रूझान है.आपके लेखन ,शैली , विषय वस्तु, विम्ब योजना आदि में कुछ ऐसी बात हो सकती जो की किसी को बहुत बढ़िया लगे. तो भाई प्रशंसा में लिखे गए चंद अल्फाज चाटुकारिता हो ऐसा जरूरी नहीं है. और आप किसी कारपोरेट के मालिक या मुख्य कार्यकारी अधिकारी तो नहीं हैं की आप की निर्लज्ज चाटुकारिता किसी के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन जाए. हाँ ऐसा कह कर मैं आपकी प्रसिद्धी और रसूख को कम कर नहीं आंक रहा हूँ .
खैर पाठकों के उदगार को जो जिस रूप में लेना और समझना चाहें , लें और समझें
रवीशजी
मैं रोहित त्रिपाठी जी की बात से पूरे तौर पर सहमत हूँ. हम सब लोग जो जबानी की दहलीज पर पैर रखते ही दिल्ली आए थे , दिल्ली की तमाम सारी खूबसूरत , दिलचस्प और अनोखी चीजों को देखते हुए पढ़े और बढे या बढे और पढ़े .कहने की जरूरत नहीं है की सारे नौजवानों की भावनाएं एक जैसी हीं होती हैं.मुझे पूरा विस्वास है उस प्रक्रिया से आप भी अछूते नहीं रहे होंगे.
आप का जैसा दिल चाहें लिखें.अपने मान , प्रतिष्ठा , हैसियत का ख्याल करते हुए. पर त्रिपाठीजी का
आग्रह कबीले गौर जरूर है. आप उस विषय पर भी जैसा भी लिखेंगे न्याय हीं करेंगें . हाँ उस विषय पर लिखने के उनके आग्रह में निसनदेह मैं हीं नहीं आपके अन्य मित्र और प्रसंशक भी शामिल होंगें
सादर

कुमार आलोक said...

बडे ही दार्शनिक अंदाज में इरशाद भाइ ने अपनी भडास निकाली है ..माना कि मुँशी जी की किताब की किमत पांच रुपये है ...ऐसे खत का इँपोर्टेंस है ..गांवें में आज भी अनपढ लोगों की चिठ्ठीयां लिखवाइ जाती है ..आपने वेलकम टू सज्जनपुर देखा होगा ..श्याम बेनेगल से ज्यादा बुद्धीजीवि तो आप नही होंगे। और हां अगर हरिशंकर परसाइ को आपने पढा होगा तो उनकी एक मशहूर व्यंग्य रचना है जो इसी विषय पर आधारित है कि कैसे परसाइजी अपने दोस्त को प्रेमपत्र लिखने में मदद करते है । मशहूर रंगकर्मी सफदर हाशमी का एक नाटक है ..चिठ्ठी आइ है ...जिसमें पोस्टमैन के पास गमकउवा चिठ्ठी होता है ( प्रेमिका ने अपने प्रेमी की चिठ्ठी में इतर डाला हुआ था ) ..और कैसे अनपढ व्यक्ति अपनी पत्नी की चिठ्ठी लिखवाता है ..और अपने आप में जलील होने का सा महसूस करता है । मुंशी जी की भी रचना भी आम लोगों की भावनाओं के ओतप्रोत है ।

saleem akhter siddiqui said...

raveesh ji
aapka blog dekha. hindustan ke talluq se aapko jantoo hoon. kuch muddeon par aapke aarticle lajawab hain.

Hari Joshi said...

शहरों और महानगरों में तो ये किताबे अजायबघर की चीजें हो गईं हैं।..... शहर आगे बढ़ गए हैं। अब न खत लिखने का समय है और न पढ़ने का। प्‍यार के इजहार में या प्रपोज करने में कभी एक उम्र बीत जाया करती थी। कैसे इजहार करें, ये समझ नहीं आता था किशोरों और युवाओं को। तब मुंशी जी जैसे लेखक ही आत्‍मसंबल हुआ करते थे युवाओं का। आज भी बिकती हैं ये किताबे यानी जमाना और दस्‍तूर अभी पूरी तरह नहीं बदले।

sachin said...

रविश जी खत मजेदार रहा।मुंशी जी का ये खत उनकी
लेखनी की ताकत को बताता है।विचारो को व्यक्त करने की प्रतिभा है,हां लेकिन जरूरत है मुशीं जी जैसे लोगों को ढुढंने हो ।अगर ऐसे ही ढुढते रहे कोई न कोई उद्देश्यपरक लेखक भी कही किसी कुहास मे पड़े होंगे।
लगे रहिए सफलता मिलेगी।