पहचान का स्थायी पता

पहचाने जाने के डर से मैंने एक पहचान बना ली
बालों को छोटा कर लिया और दाढ़ी कटवा ली
जिन्स पहनकर अपने कानों में लटका ली बाली
इस नई पहचान से मैं तमाम नौजवानों सा हो गया
हुलिया बदल कर नए ज़माने का मुसलमान हो गया
नहीं बदली तो आदत पांच वक्त नमाज़ पढ़ने की
रोज़े के तीस दिन भूखे रहने और ईद मनाने की
कहने वालों ने तब भी कहा कट्टर होता है मुसलमान
बदल कर भी नहीं बदलता, रह जाता है मुसलमान

ऐसा क्यों होता है कि शहर बदल जाने के बाद भी
हर फार्म में स्थायी पता का नंबर पहले आता है
होली में हम चाहे कितना भी लगा लें रंग गुलाल
झटका खाने वाले हमको कहते हैं हलाल मुसलमान
बदल कर भी नहीं बदलता, रह जाता है मुसलमान
हमारी इबादत की हर आदत पर रंज हैं उनको
एक सांस में जल उठाकर दौड़ने की आदत जिनको
उनकी भक्ति का रंग हमने भी देखा है कई बार
भोले की भक्ति हो या फिर नौ दिन माता का त्योहार
हमने कभी नहीं कहा तुम बदल दो अपनी पहचान
क्यों करते हो साल के बारहों महीने पूजा भगवान की
क्यों नहीं बदल देते हो अपने हिंदू होने के पहचान की
बदल कर भी नहीं बदलता, रह जाता है मुसलमान
ये सियासत वाले हैं जो मुल्क को बदलने निकले हैं
मुल्क बहाना है, हिंदू मुसलमान को बदलने निकले हैं

24 comments:

सतीश पंचम said...

रोचक और विचारणीय पोस्ट।

Shambhu kumar said...

इस सोच को सलाम! इन शब्दों की बानगी को सलाम! फूर्सत के क्षणों में देश की व्यवस्था पर लिखकर थकावट की चादर ओढ़ने की इस कला को सलाम !

dr. ashok priyaranjan said...

prakhar abhivyakti-

ये सियासत वाले हैं जो मुल्क को बदलने निकले हैं
मुल्क बहाना है, हिंदू मुसलमान को बदलने निकले हैं

http://ashokvichar.blogspot.com

Nitish Raj said...

सच कहा रवीश जी कि मुल्क तो सिर्फ बहाना है मुल्क बहाना है, हिंदू मुसलमान को बदलने निकले हैं। खूब बढ़िया।

JC said...

Dosh shabda, yani nam ka hai kya?

'Musalman' mein musal chhipa hai!
Aur Musa bhi!
Aur Ganesh ka vahan bhi!

Kahna hoga, Jai Mata Kalratri ki?

Shekhawat said...

रोचक और विचारणीय

JC said...

Kya asthayi jeev ka
sthayi pata ho sakta hai?

"Kya socha hai kabhi?"...
Kya ye hai waqt ka ishara?

रज़िया "राज़" said...

आज रवीशजी के साथ इस पोस्ट पर कोमेन्ट लिखनेवाले सभी को मेरा लाखों सलाम।
झंझोडकर रख दिया है रवीशजी आपकी इस पोस्ट ने।
एक रिपोर्टर के साथ एक मंजे हुए कवि/लेखक का बख़ुबी धर्म निभाते चले आ रहे हैं।
वेलडन।

KAUSHAL KISHORE / Kharbhaia / Patna said...

रविशजी
जिस प्रतिबध्हत्ता के साथ आप इस मुद्दे पर लगातार लिख रहें हैं वो कबीले तारीफ़ है
कभी कभी यह सोच कर डर लग जाता है की अगर ये तथाकथित हिन्दुत्व वादियों के नेतृतव में अगर स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृतव होता तो आज के उनके हिंदुस्तान का क्या हाल होता.
हकीकत यह है की हिंदू धर्म के मूल मर्म या यह कहें की भारत भूमि पर फलने फूलने वाली हर संस्कृति का मूल भाव यह रहा है की घट घट में राम हैं. यह राम जड़ चेतन सबका मालिक है .सारी सृष्टि उसी अगोचर की अभिव्यक्ति है. जो कोई भी इस मूल मर्म को आत्म सात करेगा वो फिर गैर हिन्दुओं से घृणा की बात तो दूर फिरकापरस्ती की बात भी बात भी सोच नहीं सकता.आप ने इस मर्म को आत्मसात किया है इस लिए आप को मुसलमान महज गैर धर्माब्लाम्बी होने के कारण घृणा और नफरत के योग्य नहीं दीखते हैं.आप सत्य का दामन थामे रहने और अपनी संस्कृति के मूल तत्त्व को आत्मसात कराने के चलते इनकी सारी छालोंऔर षड्यंत्रों को समझ लेते हैं.
रही इस कुत्सित प्रयास के राजनैंतिक नियामकों की और इस गिरोह के संचालकों की तो इस पर फिर और कभी.
आप पूरी सम्बेदना और सामर्थ्य से इस मुद्दे पर गौर करतें रहें क्योंकि भारतीय सोच और समाज का लोकतान्त्रिक करण एक दीर्घकालिक परियोजना है.
सादर

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सही।
साधुवाद!

सबकी कहानी said...

sara problem hamare secular netaon ka khada kiya hua hai...jo hindu aur musalmano ke beech ek badi deewar hamesha khada karke rakhna chahte ahin....apne siyasi faydon ke liye

अनुनाद सिंह said...

" हमने कभी नहीं कहा तुम बदल दो अपनी पहचान "

गुरू के बेटों को इतना जल्दी भूल गए जिन्हें दीवार में चुनवा दिया गया था ? इतनी 'अच्छी कविता' लिखने के पहले एक नजर विश्व के मुसलमानों के सेक्युलर कर्मों पर दौडा लेते तो ये नौबत नहीं आती.

Mohd. Muzzammil Shah said...

I'm glad to see this blog

निखिल आनन्द गिरि said...

आप कविताओं में क्यूँ हाथ आजमाते हैं.....आलेख ही लिखें, जिसमें आपका कोई सानी नही....
सादर,
निखिल

anil yadav said...

पहचाने जाने के डर से मैंने एक पहचान बना ली
बालों को छोटा कर लिया और दाढ़ी कटवा ली
जिन्स पहनकर अपने कानों में लटका ली बाली
इस नई पहचान से मैं तमाम नौजवानों सा हो गया
हुलिया बदल कर नए ज़माने का मुसलमान हो गया
नहीं बदली तो आदत ....बेगुनाहों की जान लेने की जब तब बम फोड़ने की....दुनिया की शांति खत्म करने की....ट्रेनों को जलाने की ....खायी हुई थाली में छेद करने की....

असल में रवीश जी भी यही लिखना चाहते थें लेकिन वो टिकट के चक्कर में सही बात नही लिख पायें....कोई बात नही रवीश जी टिकट की रेस में आप आगे निकल रहे हैं....

parth pratim said...

"इन्द्रधनुष" से रंग चुराने की कोशिश यदि कामयाब हो गई, तो सब बदरंग हो जाएगा. सभी रंगों को उनके मूल स्वरुप में रहने देने की कोशिश इन "रंगों" को ही करना होगा...

कुमार आलोक said...

रविश सर,
मेरा एक दोस्त कतर में रहता है ...अभी अपने घर आया है ..उसके बहन की शादी है ...हमसे तो वो दस साल का छोटा है ..हमने फाकामस्ती के दिनों में साथ साथ बेरोजगारी के दंश और दुख को झेला था ..बाद में हमने साफ्टवेयर सेंटर खोल लिया ..चल निकला ..अब हम कमाने लगे और शाम को साथ साथ मयखाने में भी वक्त गुजारने लगे ..हम दोनों दो जिस्म एक जान थे ..मेरा पूरा परिवार हम दोनों की दोस्ती से परेशान था ..कभी वो मेरे घर आता ..मां चाय बनाती तो उसके लिये एक प्याला अलग से रिर्जव था ..मां कहती कि ये कप तुम्हारे लिये और वो दूसरा कप उस मुसलमान के लिये ..मां से तो मैं कहता था कि ऐसा ही करुंगा ..लेकिन वहां जाकर मैं कप बदल देता था ..मां को एक दिन पता चला तो मुझे उसने खरी खोटी सुनाइ और बोली सारिकवा का आज से चाय बंद ..खैर मैं एक मांदिर में जाता था जो टूटा फूटा था ..जहां शायद ही कोइ जाता हो ..मैं पूजा करता और वो भी नारियल चढाता और हवन करता ..धीरे धीरे ये बात कस्बे में फैल गइ ..खासकर जो मुसलमान थे उसने सारिक के घर जाकर कह दिया ..कि आलोक तो खुद अपने धर्म का पालन कर रहा है और धूसरी तरफ आपके बेटे का धर्म भ्रष्ट कर रहा है ...सारिक पर इतना दबाब पडा कि वो धीरे धीरे नमाजी हो गया ..पांचो वक्त नमाज पढना और वेशभूषा भी उसने मौलवियों वाली बना ली ..कुछ दिन ऐसा चला ..और फिर हमलोग पुराने ढर्रे पर लौट आये ....
इतनी भूमिका देने की आवश्यकता शायद नही थी ..लेकिन मजबूरी थी मेरी ..शारिक की बहन की शादी ११ अक्तूबर को है ..उसने कहा कि आलोक सर शादी के लिये दो दिन की खातिर अपनी कार मुझे दे दिजीये ..अपनी दीदी को बता दिजीये मैं ले लूंगा ..मैने कहा इसमें भी पूछने की बात है ...मैने आज अपनी बहन को फोन किया और गाडी वाली बात बतायी । बहन का जबाब सुनकर मैं हतप्रभ रह गया ..बहन बोली अरे मुसलमानों को नही जानते हो गाडी ले जाएगा ..कहीं विस्फोटक बगैरह लेकर इधर से उधर पहुंचाया तो हमारे साथ तुम भी पिस जाओगे ..मेरी बहन बहुत अच्छी है ..पूरे घर के लोग सेक्यूलर मानसिकता के है ..चाहे पढे लिखे हो या अनपढ ...और उसमें भी सारिक मेरे बचपन का दोस्त ..मेरी बहन का जबाब मुझे झिंझोड गया ..कि कैसे सियासतदानों ने घर घर में एक खास कौम के प्रति दुराग्रह के दाने डाल दिये है ..आपकी कविता या आपका प्रयास अंतीम नही होनी चाहिये ..हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि इस दुराग्रह को तोडने का प्रयास हर स्तर से करना चाहिये ....आपके व्लाग के माध्यम से इस दिशा में और विचारोत्तेजक लेख और कविताओं को साया करने की आवश्यकता है ।

अनूप भार्गव said...

सुन्दर कविता के लिये बधाई स्वीकारें ।

राही मासूम रज़ा साहब की एक नज़्म याद आ गई जो मुझ बहुत पसन्द है :
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मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
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मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो ।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो ।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव ! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा , गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है ।
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santoshsahi said...

रवीश आपकी कलम कहानी, कविता पर बराबर चलती है ।पढ़कर अच्छा लगा । पर बेतुका ।अच्छा इस मायने में कि कविता को सलीके से लिखा गया ।बेतुका इस अर्थ में कि ग़लत सोच के साथ लिखा गया। इस समाज का एक अंग मै भी हूं ,जो अपने नजरिए से समाज को देखता हूं। किसने कहा आपको की मुस्लामानों को धर्म से बदले की जरुरत है ।चलिए आपकी बात को आपके ही शब्दों में कह देते हैं ।उम्मीद है आपको इतिहास पता होगा ।चंगेज खां ,बाबर .औरंगजेब,हलाकू ये सब इतिहास के कैरेक्टर हैं।इतिहास तो वामपंथियों ने लिखा है, बीजेपी की इतिहास तो चली नहीं ।यदि मोदी के गुजरात में कुछ निर्दोंष मुस्लमानों की मौत को मुस्लमान याद रख सकते है ,तो हिन्दुओ को भी ये अधिकार है । पिछले कुछ समय से पत्रकार बिरादरी पर जज बनने का भूत सवार हो चुका है ।जामिया में मुठभेड़ न हुआ की बबाल हो गया। दरअसल हमारी समस्या यही है कि की बड़े बनने के चक्कर में आने वाली पीढ़ी को तथाकथित मुस्लिम हीरो,और हिन्दु हीरो को याद करा देते हैं। इस देश में न हिन्दु को बदलने की जरुरत है न मुस्लमानों को ।बदल सकते है तो अपनी विचारधारा को बदल ले। कौन हिन्दु ,कौन मुस्लमान ।बहुत लोगों की मां-बहन ने मुस्लमानों के साथ खाने पर विरोध किया ।मेरी मां ने तो कभी विरोध नहीं किया ।मै आज भी मुस्लमानों के साथ खाता –पीता उठता बैठता हूं । और हां बात सियासत दां की हो रही है तो रवीश जी वो भी हम और आप तय करते है । कब तक इस मुद्दे पर रसनोई खर्च करेंगें ।हिन्दु के पक्ष में लिखेंगे तो मुस्लमाने नाराज़ और मुस्लमान के पक्ष में लिखेंगें को हिन्दु नाराज । फिर दोनों लड़ेंगें ।पढ़े लिखे कलम से। गवार तलवार से ।पढे लिखे हिन्दु अपनी जमात को गाली देकर ,अनपढ़ हिन्दु तलवार से ।यही कहानी उधर भी दुहराई जाएगी । कलम से व्यवस्था को बदल सकते है तो बदलिए ।

JC said...

Isi vichar ko hamare poorvajon ne jana aur kaha, "Hari anant/ Hari katha anant...", ya, "As many mouths/ So many thoughts..."

Shabda mein shakti to Nadbindu ki hi thi jisne sampoorna anant brahmand ki rachna ek shabda, "OM", se kardi!

Is anant rachna ke uddeshya per koi likhe to baat hai!!!

Videshiyon ka 'sone ki chirdiya', 'Bharat' ke prati akarshan to itihas darshata hi hai...Bharat bhoomi aur iski jalvayu ka prabhav is udaharan se bhi dekha ja sakta hai ki paschim ke ek vishwa-prasiddha vaigyanik ne bharat bhoomi per padarpan ker, hal hi mein, kaha ki wo Bhagwan ke mastishk ke ander ghusna chahega!

usha said...

bahut acccha

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

सही कहा आपने। पहचान के बहाने यह बांटने की साजिश है।

कृष्णमुरारी स्वामी said...

RESPETED RAVISH JEE,
ravish jee commuenist vichardhara se kab nikaliyega. mualamann daari katawa liya, jeans pahan liya tab bahut saara badalab aa gaya! lekin hindu jo shadiyo se badalab me hi jeeta aaya, usapar aap log jaise patrakaro ko likhane ka mauka mil jata hai. likhane se nahi chutate. hindu brihi chore kar dhoti uske baad dhoti aur ab jeans aur caprarie se leke low waist jeans pahanane laga hai. aavaysakata hai chasma utar kar dekhane ki. vaise aap ki rachana main tukbandi achhi hai

Sunil Singh said...

RAVISH JI,
PICHLE DINO BURHANPUR ME THA...DANGO KI REPORTING KARNE GAYA THA...JO HUA WO TO THEEK.....LEKIN IS BAR EK BAT NE MUZHE HILA KAR RAKH DIYA ...2 RATE ALALG ALAG MOHALLE ME BITAI ...BURHANPUR SANKARI GALIYO KA SHAHAR HAI..MIX POPULATION..HAR GALI ME JABARDAST NAKEBANDI..RET KE BORE,TEEN KI CHADDRE LAGA KAR RASTE BAND...RAT BHAR JAG JAG KAR YUAON KI PAHREDARI...HAR THODI DER ME SANESH KA AADAN-PRADAN...WO DEKHO LAGTA HAI UDHAR SE KUCH LOG AA RAHE HAI TAIYAR HO JAO..HINDU MUSLIM DONO KI GALIYO ME AISE HI NAKEBANDI..DANGO NKI REPORTING KA YE PAHLA MAUKA NAHI THA...LEKIN IS BAR JITNA AVISHWAS DEKA,EK DUSRE KE PRATI GHRINA DEKHI WO KABHI NAHI DEKHA...SACH KAHU TO PAHLI BAR DANGO KI REPORTING KARTE SAMAY AISA BHAV UTHA KI...MANO PARTISION (1947)KE SAMAY SHAYAD YAHI HALAT RAHE HONGE..AISE HI AFWAHO KA DAUR US MOHALLE ME 2 HINDU MAHILAO KA APHARAN HO GAYa...2 KO KAT DIYA...MUSALMANO KE MOHALLE ME V YAHI SUB KUCH ...ITWARIYA KI TARAF SE MAT JANA...POLICE KI GADI ME HINDU AAYE THE 4 LADKO KO LE GAYE..KAT KAR FENK DIYA...RAVISH JI BACHPAN SE HIDU-MUSLIM EKTA KA PADHTE AAYE THE..KYA AB WO IN SIYASATDANO KI SAJISHO KE CHALTE BEASAR HONE LAGA HAI...MASOOM DIMAGO ME V ITNI NAFRAT...ITNA AVISHWAS..?KAYA HAMARI BIRADARI IN SIYASATDANO KE AAGE HAR JAYEFI...DIL GHABRATA HAI KI MULK BADALNE KE NAM PAR KYA HINDU MUSALMANO KO ITNA BADAL DIYA JAYEGA KI PARTISION KE YE BURHANPURI HALAT DES BHAR ME KADWI HAKIKAT BANNE LANGENGE....KUCH KAHIYE NA DOSTO ...MUZHE DILASE KI JARURAT HAI(SUNIL SINGH BAGHEL,SANJHALOKSWAMI INDORE)