टैक्स पेयर के पैसे का सांप्रदायिकरण

इसी साल फरवरी के महीने में सहारनपुर के देवबंद में तमाम उलेमा जुटे थे। आतंकवाद की निंदा करने। जो मुसलमान आतंकवाद की वकालत करता है वो इस्लाम का दुश्मन है। इससे मिलते जुलते हर नारे पर तालियां बज रही थीं। तब दो सवाल मुझे परेशान कर रहे थे। कहीं यह सबूत देने के लिए तो नहीं कि मुसलमान आतंकवादी नहीं है। अगर ऐसा है तो यह किसी भी देश के लिए यह शर्मनाक स्थिति है। इससे पहले भी पंजाब में आतंकवाद के दौर में सिखों को सबूत देना पड़ता था। लेकिन आतंकवाद के खात्मे और मुख्यधारा में खुले दिल से स्वागत करने का नतीजा यह है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मनमोहन सिंह बैठे हैं। किसी को शक नहीं होता बल्कि गर्व होता। यही सोचते सोचते ख्याल आया कि एक दिन तो ऐसा आएगा जब मुसलमानों को भी नहीं कहना पड़ेगा कि हम आतंकवाद का समर्थन नहीं करते हैं। विश्वास का माहौल दोनों तरफ से बनता है।

फर्क सिर्फ इतना है कि सिखों के साथ वक्त कम लगा लेकिन मुसलमानों के साथ इंतज़ार लंबा होता जा रहा है। दिल्ली में सिखों को हिंदुओं(दूसरी पार्टी के हिंदू) ने घरों से निकाल निकाल कर मारा,तो एक राजनीति कांग्रेस के खिलाफ सामने आई। उसने कांग्रेस को घेरा लेकिन हिंदुओं की इस असहिष्णुता पर सवाल खड़े नहीं किये। आज इसी कौम की एक राजनीतिक धारा के लोग( बजरंग दल) उड़ीसा और कर्नाटक में मार रहे हैं। हिंसा से मुसलमान और हिंदू दोनों जूझ रहे हैं। लेकिन बदनाम सिर्फ मुसलमान है।

बहरहाल, देवबंद की उस सुबह जो दूसरा सवाल परेशान कर रहा था, वो यह कि उलेमा कहीं इस बात से तो परेशान नहीं कि आतंकवाद उनके बीच पहुंच चुका है। कहीं वो उस निराश मानसिकता को झकझोर तो नहीं रहे थे कि बाबरी और गुजरात के बाद भी यकीन के हज़ारों तार अब भी कायम है। अब भी आतंकवाद का रास्ता मुनासिब नहीं है। तब एक मौलाना ने कहा कि उलेमा इसलिए जमा हुए हैं ताकि समाज में यह संदेश जाए कि मज़हबी नेता आतंकवाद के खिलाफ है और दूसरों को कहने का मौका न मिले कि इस्लाम आतंकवाद का समर्थन करता है।

उसके ठीक एक महीने बाद गुजरात के चुनावों के दौरान अहमदाबाद की एक मस्जिद। मौलाना जुम्मे की नमाज़ से पहले तकरीर कर रहे थे। बोल रहे थे कि बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाओ। जब तक वो पढेंगे नहीं हालात नहीं बदलेंगे। खुतबा पढ़ने वाले मौलवी साहब ने अपने बच्चे को मदरसे से हटाकर पब्लिक स्कूल में डाल दिया था। उसी से ठीक पच्चीस किमी दूर एक मौलवी ने मस्जिद का काम छोड़ दिया। अरुणाचल से आया यह मौलवी अपनी बेटी को बीए कराना चाहता था। आस पास के लोग ताने देने लगे थे कि मौलवी हो कर अंग्रेजी तालीम दिला रहा है। बेटी बेपर्दा हो जाएगी। इस कहानी ने मुझे देवबंद के उस जुलूस की याद दिला दी।

इन दोनों घटनाओं के बीच जुलाई २००७ का वो हादसा गुज़र चुका था। लंदन के ग्लासगो धमाके में मोहम्म कफील, मोहम्मद सबील का नाम आया था। सबील ने बंगलूरु में अपने पिता को ई मेल किया था कि ग्लोबल वार्मिंग पर काम कर रहा हूं। बाद में आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे रिश्ते के एक और भाई मोहम्मद हनीफ को भी गिरफ्तार कर लिया गया। हनीफ अब सभी आरोपों से मुक्त है। यह घटना बता रही थी कि आतंकवाद अब अनपढ़ों की बस्ती में नहीं पनप सकता। कंप्यूटर से लेकर सर्किट बनाना अनपढ़ों के बस की बात नहीं रही।

लेकिन हम सब भूल गए कि आतंकवाद ने रास्ता बना लिया है। पाकिस्तान में बैठे आकाओं के झांसे में पढ़े लिखे नौजवान आ गए हैं। देवबंद के उलेमा इसलिए एलान कर रहे थे कि कोई मौलवी को आतंकवादी या आतंकवाद का समर्थक न समझे। उन्हें भी अंदाज़ा नहीं होगा कि आतंकवाद ने मस्जिदों की आड़ लेना बंद कर दिया है। वो उन्हें ढूंढ रहा है जिन्हें बताया जा सके कि बाबरी मस्जिद या फिर गुजरात दंगों के बाद किस तरह की नाइंसाफी हुई। किसी को सज़ा नहीं मिली। गोधरा का ज़िक्र कर बाकी मुसलमानों को मारने का लाइसेंस दे दिया गया। राजनीति दोनों तरह की हिंसा के खिलाफ खड़ी हो सकती थी लेकिन एक को छोड़ दूसरे का साथ देने में उसका अपना फायदा था। इसलिए राजनीति ने अपना फायदा सोचा। मासूम ज़िंदगी और मुल्क के मुस्तकबिल का फायदा नहीं।

बाबरी मस्जिद की घटना और गुजरात के दंगों ने मुस्लिम समाज को दो बार बदला। बाबरी की घटना के बाद वे राष्ट्रीय राजनीति की धारा ( कांग्रेस) को छोड़ क्षेत्रिय दलों के साथ हो लिये। राजनीति में उनकी राष्ट्रीय पहचान खत्म हो गई। वोट बैंक बन गए। गुजरात के दंगों ने मुसलमानों को तालीम की तरफ धकेला। बड़ी संख्या में मुस्लिम इलाकों में पब्लिक स्कूल खुले। हैदराबाद के अखबार सियासत ने मुस्लिम लड़कियों और लड़कों को साफ्टवेयर की ट्रेनिंग देनी शुरु कर दी। आईटी क्षेत्र में मुस्लिम नौजवानों की संख्या धीरे धीरे बढ़ने लगी। मुसलमान मुख्यधारा से जुड़ रहा था। वो सच्चर कमेटी का इंतज़ार नहीं कर रहा था।

दिल्ली धमाकों ने मुस्लिम समाज के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। पढ़ाई के ज़रिये आगे बढ़ने की उनकी कोशिशों पर आतंकवाद की नज़र लग गई। एक बार फिर मुस्लिम समाज का भविष्य दांव पर लग गया है। शायद इसीलिए वो दिल्ली के जामियानगर के एक मकान में मारे गए आतंकवादी और उसके बाद पकड़े गए लड़कों को लेकर परेशान है। यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि जिस पढ़ाई को मुस्तबिल बनाया वो आतंक के रास्ते पर कैसे चला गया।


लेकिन इस बार भी मुसलमानों के इस प्रारंभिक अविश्वास का गलत इस्तमाल किया जा रहा है। एक बार फिर से उनकी चिंता को आतंकवाद के समर्थन में देखने की नापाक कोशिश की जा रही है। आस्ट्रेलिया में मोहम्मद हनीफ भी तो बेकसूर छूट गया। उसे भी तो पहले आतंकवादी बताया गया था। तो क्या किसी को इतना भी हक नहीं कि वो इस शक को जगह दे सके। क्या पता इतनी बड़ी संख्या में पकड़े गए लड़कों में से कोई एक मोहम्मद हनीफ की तरह बेकसूर भी हो सकता है। लेकिन इतनी सी बात को ऐसे पेश किया जा रहा है कि पूरा मुस्लिम समाज आतंकवाक का समर्थन कर रहा है। दिल्ली पुलिस दावा कर रही है कि इस बार उसने सही लोगों को मारा है और पकड़ा है। अगर पुलिस को इतना यकीन है तो यह उसके लिए भी अच्छा मौका है। अपनी साख हासिल करने का कि इस बार सही लोग पकड़े गए हैं। जब ऐसी बात है तो फिर किसी को इसमें क्या एतराज़ कि सैफ के लिए वकील होना चाहिए या नहीं। सैफ के वकील भी देख लेंगे। लेकिन अदालत में जिरह से पहले वकील करने वाले पर शक बता रहा है कि हम सबने फैसला कर लिया है।

कुछ दलील यह दी जा रही है कि मोहन चंद शर्मा की शहादत न होती तो एनकाउंटर को फर्ज़ी बता दिया जाता। यह एक बकवास तर्क है। क्या अब तक हुए एनकाउंटरों को इसी आधार पर फर्ज़ी करार दिया जाता रहा है। आखिर ऐसा कैसे हो गया कि एनकाउंटर करने वाले( मोहन चंद शर्मा को छोड़ कर) राजबीर से लेकर मुंबई पुलिस के सुपर कॉप( नाम याद नहीं आ रहा) तक या तो आपसी रंजिश में मार दिये गए या फिर सस्पेंड कर दिये गए। मोहन चंद शर्मा अपवाद हो सकते हैं। क्या राजबीर सिंह भी अपवाद थे? अपवाद थे तो क्यों पुलिस के अफसर उनकी चिता पर आग देने नहीं गए। ज़ाहिर है एनकाउंटर करने वाली टीम में सारे दूघ के धुले अफसर नहीं होते। जिस दिल्ली पुलिस का इतना हाई प्रोफाइल अफसर राजबीर सिंह प्रोपर्टी डीलर के ठेके पर मार दिया जाए उस पुलिस के किसी काम पर सवाल ही उठा दिया गया तो क्या बवाल। अतीत में पुलिस की यही करतूत रही है। सवाल पर परेशानी इसलिए है कि हम आतंकवाद के मुद्दे का सांप्रदायिकरण कर रहे हैं। मोहन चंद शर्मा की शहादत( मैं सवाल नहीं उठा रहा) सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ ही नहीं, उस पुलिस और पोलिटिकल सिस्टम के खिलाफ भी समझी जानी चाहिए जिसकी करनी की प्रतिक्रिया में आतंकवाद फैलता है।


एक और दलील दी जा रही है। टैक्स पेयर के पैसे से जामिया या दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग वकील कैसे कर सकते हैं? इनके फैसले से एतराज़ हो सकता है लेकिन टैक्स पेयर को लेकर सवाल? क्या टैक्स पेयर सिर्फ हिंदू है? जेटली अपनी इस दलील से क्या यह कहना चाहते हैं कि टैक्स पेयर हिंदू है। पहली बार टैक्स पेयर का सांप्रदायिकरण हो रहा है। यह बेतुकी दलील और आगे बढ़ती है। अदालत आरोपियों को वकील देती है। तो क्या इस वकील का खर्चा टैक्स पेयर के पैसे से नहीं आएगा?


बात दोषी या निर्दोष का नहीं...बात है सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को ऐसी दलीलों से मांजने की। तराशने की। तथाकथित पुलिस और तथाकथित चश्मदीद के दावे सच की तरह पेश किये जा रहे हैं। यह समस्या है। दोनों के बीच के ग्रे एरिया की बात करें तो सांप्रदायिक राजनीति मोहन चंद शर्मा को आगे कर अपना काम करने लगती है।


तब भी जिनके बच्चे पकड़े गए हैं उन्होनें पुलिस मुर्दाबाद के नारे नहीं लगाए। जामियानगर के कुछ लोगों ने लगाए। मुंबई में तौकीर की मां और आज़मगढ़ में सैफ के पिता ने साफ साफ कहा है कि अगर मेरा बेटा दोषी है तो गोली मार दी जाए। देवबंद के उलेमा और इन मां बाप की आवाज़ एक ही है। अफसोस इतना कि राजनीति की आवाज़ अलग अलग है।

30 comments:

रंजन said...

हर बात का राजनितिकरण करना जैसी हमारी आदत हो गई है.

जो पकडे़ गये वो आंतकवादी थे, जो मारे गये वो आंतकी थे. मरने वाले और पकड़ने वाले कानुन के लोग थे.. हम क्यों हर जगह धर्म खोजते है..

कुछ दिनों पहले दिल्ली के मालविय नगर में मोहन चंद शर्मा जी के पोस्टर लगे थे.. उसकी भाषा इस प्रकार थी जैसे कोई हिन्दु धर्म की रक्षा के लिये शहीद हुआ देश के लिये नहीं..

सत्याजीतप्रकाश said...

कोई शक नहीं कि मुसलमान हर बार यह कोशिश करता रहा है कि उसे कोई आतंकवाद का समर्थक नहीं समझे. वह हरबार खुद को बदलने की कोशिश करता रहा. ये कहना भी गलत है कि बहुसंख्यक हिंदु समुदाय उन्हें आतंकवादी समझता है, अगर ऐसा होता को एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति नहीं होते और अजीम प्रेमजी सॉफ्टवेयर सौदागर.
विरोध महज उन सेक्युलरों का है जो पूरे मुसलमान कौम को आतंकवादी करार देने पर जुटे हैं. आतंकवाद के खिलाफ कानून बनेगा तो मुसलमान को क्या क्षति होगी. अगर कानून का कोई दुरूपयोग करता है तो उसके साथ भी सख्ती से निपटो. कानून का दुरूपयोग होगा इसलिए कानून नहीं बनाना कितनी बड़ी मुर्खता है. अपने देश में पुलिस, न्यायपालिका, संसद विधानसभा सबका दुरूपयोग होता, तो क्या इस आधार पर सबको भंग कर दिया जाए.

anil yadav said...

सच है कैफी आजमी ,जावेद अख्तर , जहीर खान, शाहरूख खान आतंकवादी नही हैं....लेकिन क्या करें कैसे समझाएं अपने आपको कि आरिफ ,आतिफ,नागौरी, मुसलमान नही सिर्फ आतंकवादी हैं....उन मदरसों का क्या जो सिर्फ आतंक की फसल ही उगा रहे हैं....आतंकवादियों के समर्थक के आरोप से अपने आप को मुक्त करने की कुंजी भी मुसलमानों के ही पास है....उनकों समय रहते ही बताना होगा कि आतिफ और आरिफ उनके यहां ही किराये का मकान लेकर रह रहे हैं अगर ऐसे दो चार उदाहरण भी सामने आ गयें तो देश के इतने बड़े बड़े धुरन्धर पत्रकारों को अपना कीमती वक्त उनकी पैरवी में न लगाना पड़ेगा....आमीन....

dr. ashok priyaranjan said...

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए,
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए ।

परिंदों में फिरकापरस्ती क्यों नहीं होती,
कभी मंदिर पे जा बैठे,कभी मसजिद पे जा बैठे ।

COMMON MAN said...

bahut behtar ho ki kuchh dharm-nirpekshi arab deshon men bhi bheje jaayen- kya wahan inki jaroorat nahin hai, hinduon ko hi dharm-nirpekshta ka paath kyon padhaya jaata hai, us kaum ko jisne dharm- nirpekshta ko paida kiya. bewakoofi hai dharm-nirpekshta, dharm- nirpekshta dekhni hai to australlia, japan, england, canada men dekhiye

santoshsahi said...

रवीश जी कई सारे सवाल एक साथ उठाए है ।जहां तक हनीफ का सवाल है ये बताता है कि यदि कोई गुनागार नहीं है तो उसे बे मतलब सज़ा नहीं होगी।पर पुछताछ करना पुलिसिया जांच पड़ताल की प्रक्रिया ।दूसरा सवाल यह उठता है खास कर के आपके चैनल पर कि गुजरात दंगे के बाद आतंक फैला है क्यों कि यहां पर मुस्लमानों के साथ अत्याचर हुए हैं ।पर आतंकी तो उत्तरप्रदेश में ज्यादा पैदा होते है जहां तुष्टीकरण अधिक हुए है ।गुजरात के आतंकी तो सुना भी नहीं ।तीसरा सवाल राजबीर सिंह की हत्या इस लिए की गई थी की हत्या करने वाले उनके पैसे लौटाने में असमर्थ थे ।जहां तक पुलिस के कहर की बात है तो पुलिस जांच के दौरान कई लोगों को प्रताड़ित करते है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की आप बैदूक उठा ले ।यदि एसा हो तो पूरा विश्व आतंकी हो जाए एक बर्दी में दूसरा बिना बर्दी के ।सवाल उठा की टैक्स से वकील की, तो जनाब सरकार आतंकीयों की पैरवी करने के लिए वकील उपलब्ध कराती है तो फिर अलग से करने की क्या जरुरत ।क्या पुलिस के बाद सरकार से भी भरोसा उठ गया ।अब आप कहो सरकार भी जुर्म कर रही है बंदूक उठा लो ।पुलिस के कुछ सुपर काप की हत्या या सस्पेंड पर आपने पुलिस की पुरी जगत को लपेट लिया ।महोदय ओसामा बिन लादेन और प्लेन से कंधार जाने वाला मुस्लमान ही तो है ।क्या पूरी कौम की जिंम्मेदारी ले सकता है ।
इस विचार का सबब सिर्फ इतना है कि रवीश जी के सवाल का जवाब देना था ।


वैसे मै तो चहता हूं की एक एसी सरकार हो जो न हिन्दु का न मुस्लमान की हो केवल भारत की हो ।चाहे बजरंगी हो या सिमी हो एक ही डंडा से सीधा करे।

Rajesh Roshan said...

महात्‍मा गांधी के कार्यो या उनसे जुड़े कोई लेख को पढ़ना नहीं छोड़ता. पूरा गांधी वाड्मय पढ़ना चाहता हूं. गांधी के विचारों को करीब से समझने की कोशिश करता हूं. लेकिन बावजूद इसके मैं यह मानता हूं कि गांधी जी में भी कोई त्रूटि जरूर होगी और निश्‍िचत होगी. हर इंसान, हर संस्‍थान में होती है. कांग्रेस में भी होगी और भगवा और लाल में भी. लेकिन लोग किसी एक समूह, संस्‍थान, पार्टी के अनन्‍य भक्‍त बन जाते हैं. गलती भी होती है तो उसे गलती मानने से इंकार करते हैं.

इसी गलती को समझना होगा. जहां जिसने जो गलती कि उसे गलत कहना होगा. मैं तो यह बात अपने पिता और माता के लिए भी कह रहा हूं. कई लोगों के लिए उनके मां‍-पिता गलत नहीं कर सकते. एक भ्रम की स्थिति है.

मुसलमान, हिंदू, पारसी, ईसाई, सिख, ना जाने कितने धर्म हैं. सभी में अच्‍छे लोग हैं और बुरे भी. धर्म को नहीं इंसान को बुरा कहना सीखना होगा.

रही बात भारतीय राजनीति की तो कुछ अपवादों को छोड़कर सब के सब सफेदपोश चोर हैं.

JC said...

"Hari anant, Hari katha anant..." kah gaye gyani...Krishna bhi 'natkhat nandlal', 'makhan chor' adi kahlaye gaye...Unhone nadi kinare se yadi sariyan churayi to Draupadi ki sari bhi anant kardi - kauravon ko mat dedi!

Koi 'patrakar', athva bekar, khojega phir se usi amrit Krishna ko - pralaya se pehle?

BS said...

आप कि बात सही है कि पकड़े गये युवक जब तक साबित न हो जाये, मुजरिम नहीं मुलजिम है और उनको कानूना सहायता देकर हसन साहब सही काम कर रहे हैं।

लेकिन ये बात तो फिर हर उस आरोपी पर लागु होगी, जो कि किसी भी अपराध में शामिल रहा हो, चाहे अपराध कोई भी हो, अब आप के हिसाब से किसी भी विश्वविद्यालय का कोई भी छात्र किसी भी अपराध में शामिल हो, अगर पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है तो उसे वहां के कुलपति द्वारा कानूनी सहायता देनी चाहिये।

और साथ ही क्यों सरकार सबकी माईबाप और अभिभावक होती तो क्यों न सभी अपराधियों को भी सरकार के खर्चे पर कानूनी सहायता दी जानी चाहिये।

मुझे उम्मीद है आप सहमत होंगे ।

BS said...

आप कि बात सही है कि पकड़े गये युवक जब तक साबित न हो जाये, मुजरिम नहीं मुलजिम है और उनको कानूना सहायता देकर हसन साहब सही काम कर रहे हैं।

लेकिन ये बात तो फिर हर उस आरोपी पर लागु होगी, जो कि किसी भी अपराध में शामिल रहा हो, चाहे अपराध कोई भी हो, अब आप के हिसाब से किसी भी विश्वविद्यालय का कोई भी छात्र किसी भी अपराध में शामिल हो, अगर पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है तो उसे वहां के कुलपति द्वारा कानूनी सहायता देनी चाहिये।

और साथ ही क्यों सरकार सबकी माईबाप और अभिभावक होती तो क्यों न सभी अपराधियों को भी सरकार के खर्चे पर कानूनी सहायता दी जानी चाहिये।

मुझे उम्मीद है आप सहमत होंगे ।

vipin said...

रवीश जी,
हिंदूस्तान में रहनेवाले हर मुसलमान पर शक करना..मौत के बारूद के फटने के बाद..
उसे आतंकवादी...सोचना या मानना.. गुनाह है...मुसलमानों को अपने देशप्रेमी होने का..भारतीय होने का कोई सबूत देने की जरूरत ना हो पहले थी..ना अब है..देश सबका है..किसी को माथे पर देशप्रेमी होने की चिट लगाकर घूमने की जरूरत नहीं है...लेकिन मैं इतना जरूर जानना चाहूंगा कि ऐसे क्यों हो रहा है कि जितने भी लोग आतंकवादी होने के आरोप में पकड़े जाते हैं..उनमें से ज्यादातर..अकसर कागजों में मुसलमान होते हैं...वो सभी आरोपी होते हैं या नहीं..इसका फैसला तो अदालत करे..गुजरात में जो हुआ वो सच है..बाबरी मस्जिद का शर्मसार सच भी सच है..लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब सलमान खान को चिंकारा मामने में सजा हुयी ..तो वो एक शॉट के लिये ही सही..गोल टोपी पहने हुए नजर आये..ऐसा क्यों हैं कि ज्यादातर मेरे ज्यादातर मुसलमान भाई एक जगह..तंगी गलियों में एक साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं..क्यों वो सभी जगह..सभी मोहल्लों में..सभी गलियों में सबके साथ..नजर नहीं आते...ये मुल्क सबका है..तो क्यों दिलों और गलियों में इतनी दूरियां हैं..क्यों देर रात के वक्त...कई बार एक-दूसरों की गलियों से अंधेरे में अकेले गुजरते हुए..शरीर में सिरहन से होती है..क्यों दिन और रात में अंतर दिखायी पड़ता है..क्या दिन में हम सभी झूठ का मुखौटा लगाकर रखते हैं..कि हम सभी हम वतन हैं..एक दूसरे से मोहब्बत करते हैं...मेरी जानकारी कम है..समझ में नहीं आता कि क्यों अब भी कई बार बहुत से मुसलमान हमवतन..किसी और मुल्क की टीम की जीत के लिये चोरी से दुआ मांगते हैं..क्या सिर्फ इसलिये कि मजहब का मामला है...या वास्तव में खेल भावना से बेहतर टीम की जीत का मामला..पता नहीं,रवीश जी...दिलों का असली स फासला कब कम होगा..कब गलत को गलत...सही को सही कहने का दौर चलेगा..दिन की तरह..रात में भी भरोसे की रोशनी जलेगी...
लेकिन,आप जितना अच्छा बोलते हैं..उतना ही अच्छा लिखते भी हैं..
विपिन देव त्यागी

ravish kumar said...

विपिन
सवालों और जवाबों की कमी नहीं। जिन सवालों के जवाब नहीं हैं तो इसका मतलब यह नहीं उन्हें सत्य ही मान लें।

सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं। आतिफ, आसिफ वगैरह वगरैह। चौरासी के पहले सारे आतंकवादी सिख हुआ करते थे। सिखों को मारने वाले हिंदू हुए। बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले हिंदू थे।
गांधी को मारने वाला नाथूराम हिंदू था। इससे बड़ा आतंकवादी या राजनीतिक हमला कभी नहीं हुआ। तब आतंकवादी कहने का चलन नहीं था। वरना गोडसे आतंकवादी कहा जाता। आज आतंकवाद एक विचारधारा है। कट्टर सोच का नतीजा। निकलता और पनपता है खास किस्म की राजनीतिक साजिश की गोद से। बहरहाल आप आसिफ या आरिफ को क्यों लेकर परेशान हैं। जल्दी ही नक्सलवाद को भी आतंकवादी बताया जाने लगेगा। दोनों की मंशा अलग हो सकती है लेकिन हिंसा तो एक ही है न।
इसकी वजह यह है कि हम ईमानदारी से कारणों में नहीं जाना चाहते। हम अपने पूर्वाग्रहों को बचाते हुए तर्क कर रहे हैं। उन्हें तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

रही बात मुसलमान एक ही जगह क्यों रहता है। गांवों में ब्राह्मणों, दलितों और राजपूतों की टोली अलग अलग क्यों होती है? हमारे देश की बसावट में जातिगत पूर्वाग्रह और हिंसा को रोल था उसके बाद यही धर्म के मामले में बन गया।

बहुत से कारण हैं। बहुत से मुस्लिम मुस्लिम इलाके के बाहर भी रहते हैं। अहमदाबाद में क्या हुआ। जब दंगा हुआ तो उन सोसायटी के मुसलमानों को मार दिया गया जो हिंदुओं के बीच एक या दो की संख्या में रह रहे थे। इसी तरह से दूसरे हिस्से में हिंदुओं के साथ हुआ होगा। एक किस्म की असुरक्षा आपको भीड़ में ले जाती है। और भीड़ की एक ही भाषा बनने लगती है। जो इस वक्त ब्लाग पर हो रहा है।

JC said...

Gyani ke drishtokone se, "Birds of the same feather flock together," 'Ramleela' ka satya samajh, adi kal mein hi, a gaya tha:-)

Jab thand lagti hai to aadmi garam jagah ki khoj mein chal pardta hai (Siberian cranes ki tarah)...

Kuch naya kaha ya samjhaya ja sakta hai kya?

JC said...

Dosh hai to yeh hamari shiksha pranali ka hai ki hamein school se hi barde barde essay likhne ko sikhaya jata hai - lardke jitna jyada likhein utne hi jyadah number! Sikhaya jata hai, "The Dog is a faithful animal. It has two ears, one mouth, one tongue, but unlike cows it doesn't have horns, but it is different from an ass who also doesn;t have horns, nor does it eat grass like the cow as well as teh ass...etc."

Hamara English Teacher 'shaitan' tha (Krishna saman), usne chhote bhai ki class mein essay de diya 'My Shoe' per!

Bhai ne ague baithe lardke ko likhte dekha, "My shoe is a faithful animal"!

Usne ghar aker poochha ki kya 'Shoe' bhi janwar hota hai?

Maine utter diya ki ek dristikone se itna to pakka hai ki wo kisi wafadar janwar ke chamarde se jaroor bana hota hai. Aur, uska 'mouth', 'tongue', eyes', 'heel', 'toe' adi bhi hote hain! Per yeh likhne per number nahin milengue!

मिहिरभोज said...

आज इसी कौम की एक राजनीतिक धारा के लोग( बजरंग दल) उड़ीसा और कर्नाटक में मार रहे हैं.....ये सब वोलते लिखते हुए हम लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या और गोधरा कांड का जिक्र भी नहीं करते है ...हम जो लोग इतना सोचते विचारते हैं और लिखते हैं वो ही इतना तटस्थ नहीं हो सकते है तो बाकियों कि तो क्या कही जाये

कुमार आलोक said...

९० के दशक में कश्मिर में आतंकी घटनाएं अपने चरम पर थी ...सेना आतंकियों को मार गिरा रही थी ...जंगजूओं के मारे जाने के बाद अलगववादी संग‌न के लोग सेना पर बेबजह निर्दोष लोगों को मार गिराने का आरोप लगा रहे थे ...एक डिप्लोमेट कम पोलिटिसियन ने पूछा सरकार से कि ऐसा क्यूं ? नरसिंह राव की सरकार का जबाब था कि जो लोग भी सेना की गोलियों के शिकार हुए है वो राष्ट्र विरोधी तत्व थे ....१९९२ में बाबरी मस्जिद को मिसमार कर दिया गया .. ...सेना चुपचाप देखती रही ... नरसिंह राव सरकार ने कहा कि मस्जिद तोडने वाले राष्ट्रविरोध तत्व थे विभिन्न तंजिमों के लोगों ने पूछा सेना कश्मिर में तो राष्ट्रविरोधियों की पहचान तुरंत कर लेती है ..लेकिन उत्तर प्रदेश में क्या उसने आंखों में पट्टी बांध रखा था । इंदिरा गांधी की हत्या एक सिरफिरे शक्श ने की उसका खामियाजा पूरी सिक्ख कम्युनिटी को उठाना पडा ...महात्मा गांधी की हत्या एक ब्राह्ण के हाथों हुइ ...क्या उसका खामियाजा उस दौर में ब्राह्ण समाज को उठाना पडा था ?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मिहिरभोज जी ने कहा है; आज इसी कौम की एक राजनीतिक धारा के लोग(बजरंग दल) उड़ीसा और कर्नाटक में मार रहे हैं.....ये सब वोलते लिखते हुए हम लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या और गोधरा कांड का जिक्र भी नहीं करते है ...हम जो लोग इतना सोचते विचारते हैं और लिखते हैं वो ही इतना तटस्थ नहीं हो सकते है तो बाकियों कि तो क्या कही जाये।


मिहिर जी, तटस्‍थता की परिभाषा बहुत मुश्किल है। आप तटस्‍थ किसे मानते हैं। क्‍या जो आपके मन माफिक कहे, वह। हॉं, ज्‍यादातर लोगों के अनुसार वहीं तटस्‍थ है। जहॉं तक लक्ष्‍मणानंद सरस्‍वती की बात है, किसी ने यह जानने की कोशिश की, कि वे कौन थे, किस पृष्‍ठभूमि के थे, उन्‍हें क्‍यों मारा गया। न तो पुलिस ने और न ही किसी पत्रकार बंधु ने यह जरूरी समझा। बिना इस बारे में जाने कोई नतीजा निकालना उचित नहीं होगा।
और जहॉं तक गोधरा की बात है, स्‍वयं वहॉं के फोरेंसिक विभाग ने जांच के बाद यह पाया था कि आग डिब्‍बे के अंदर से ही फैली थी। लेकिन बात वही कि हमें जो सुनना होता है, हम वहीं सुनते हैं, मानते हैं, भले ही हमारे सामने कितने ही सुबूत क्‍यों न रख दिये जाएं।


रवीश जी, आपने एक गम्‍भीर मसले पर ईमानदारी के साथ जो सवाल उठाए हैं, वे आश्‍वस्‍त करते हैं कि अभी भी हमारा समाज पूरी तरह से मतिभ्रष्‍ठ नहीं हुआ है। आप ये अलग जगाए रखिए, आपकी आवाज बहुत दूर तक जा रही है।

रूपाली मिश्रा said...

रविश जी आपको पढ़ के अच्छा लगा.
यहाँ स्वामी लक्षणा नन्द जी की हत्या की भी बात की गई है. उडीसा की सरकार ने जब उनकी हत्या के पीछे नक्सालियों की
बात की तो उसे खारिज कर दिया बजरंगियों ने क्योंकि ये उनके लिए फिट नही था
मुशीरुल साहब को पूरा देश जानता है अगर उन्होंने उन लोगो को कानूनी सहायता की बात की तो इसमे इतना बिफरने की कोई जरुरत नही थी. मुशीरुल साहब ने किसी को दोषमुक्त नही कह दिया.
बल्कि अब जब कोर्ट में कार्यवाही होगी तो लोगो को भरोसा होगा की दोनों पक्षों को सही सुना गया और फैसला सही है

मिहिरभोज said...

रूपाली जी पिछले 25-30 साल मैं उस इलाके की 25 प्रतिशत जनसंख्या को ईसाई बना दिया गया है ईसाई मिशनरियों द्वारा ...उनके रास्ते का एकमात्र रोङा बने हुए थे ......ये लक्ष्माणानंद सरस्वती पर 9 वां हमला था..यदि आप अखवार पढते हों तो पिछले साल भी इन पर जानलेवा हमला हुआ था..और तब स्पष्ट रूप से वे ही लोग लिप्त थे जिन्होने उनकी हत्या कर दी

JC said...

Ravishji ka lekh bahut bardhiya hai - 100 mein se 90 number pane yogya.

Mera prashna 'We The People' ke sandarbha mein Barkha Datt se bhi tha varshon poorva kisi ek Teacher's Day per: ki pareeksha is sansar mein kahin bhi, kisi bhi class ki ho, to ek class ke chhatra lagbhag 0% se 100% tak number kyun lete dikhte hein? Ek hi teacher, ek hi kitab, ityadi sabne pardhi hoti hai, to phir sabko eksa pratishat prapta kyun nahin hota? (Barkha se kewal ek email mili thi ki mein WTP dekhta rahoon! Kal bhi dekha unhein charcha karte safed chamardi per - shayad bomb se dukhi ho!)...

Kshama prarthi hoon Ravishji, yadyapi aap kanni kat jate hein, ek aur prashna apse hai ki kisi bhi vishaya, mamuli se vishnaya per bhi, ki janata sarvada 3 bhag mein kyun bat jati hai? Kuch vishaya ke samarthak hote hein, kuch ardanga lagate hein, to kuch kisi bhi pale mein nahin jate (sikke ke teen chehre jaise - sir (head), poonch (tail), aur nirguna mutapa (blank side that gives it the thickness, or/ in fact physical existence!)...

Sabse barda 'Terrorist' Vishnu (Visha + Anu, yani poisonous atom) hai - usey Nirakar Nadbindu bhi kuch log kahte hain...Brahmand ki rachna usike dwara mani gayi hai, jo pralay ke samay phir usi mein sama jati hai...

सुबोध said...

रवीश जी काफी पहले लखनऊ यूनिवर्सिटी में एक सेमिनार हुई थी..जिसमें राम पुनियानी जी आए थे..सेमिनार का टॉपिक था आप भारतीय मुसलमानों के बारे में क्या सोचते हैं...इस सेमिनार में सभी छात्र आमंत्रित थे...अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग भी वहां पहुंचे..जब तक मुसलमानों को कटघरे में खड़ा किया जाता रहा तब तक तो उनका जमावड़ा रहा...लेकिन जब बात मुसलमानों के बारे में पूर्वाग्रहों को दूर करने की आईं तो एबीवीपी के लोगों ने बॉयकॉट कर दिया...दरअसल समस्या यही है...हम अपनी सुविधा के हिसाब से चीजों को होता या देखना चाहते हैं...तर्क वितर्क करने का साहस ना तो मुस्लिम कट्टरपंथियों में है और ना हिन्दु कट्टरपंथियों में...तभी जब कहीं बम धमाके होते हैं...तो कट्टरपंथियों की जमात एक दूसरे को कोसने में जुट जाती है...मुस्लिम कट्टरपंथी खुद को दबाए जाने की दुहाई देने लगते हैं और हिन्दू चरमपंथी मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करते दिखाई देते हैं...इस बात पर बहस करने को कोई सामने नहीं आता कि अगर दुनिया में मुसलमान सताए जा रहे हैं तो खुद इसके लिए वो कौन सी लड़ाई लड़ रहे हैं... और तोगड़ियाछाप लोगों को याद नहीं आता कि गुजरात में उनकी हरकतों का खामियाजा देश को दुनिया के पटल पर उठाना पड़ता है...

JC said...

Observation sahi hai, kintu prashna uthna saral hai aur 'sarkar' per uska uttar chhord diya jata hai (Wo sarkar hamne hi chuni hoti hai - 'gyani' pratinidhi ke pratik samajh vote dekar swatantrata prapti ke paschat)...

Ek pracheen kahavat mein iska saar chhipa hai, "Saas bahu ko hukma deti hai/ Bahu kutte ko/ Aur kutta poonch hila deta hai!"

सुप्रतिम बनर्जी said...

ज़ाकिर अली 'रजनीश' जी ने जो कुछ कहा है उसके बारे में अपनी बात रखना चाहता हूं। आपका ये कहना कि मिहिरभोज को पता नहीं कि लक्ष्मणानंद सरस्वती कैसे इंसान थे? ऐसा लगता है जैसे किसी ग़लत (कौन तय करेगा? कानून या कोई और?) इंसान को मौत के घाट उतारने का लाइसेंस दंगाइयों को ही दे दिया जाना चाहिए। जहां तक गोधरा की बात है, तो आप जिस फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला दे रहे हैं, उसी रिपोर्ट के हवाले से आपको बता दूं कि बोगी में आग बेशक अंदर से लगी, लेकिन ये आग कार सेवकों ने खुद नहीं, बल्कि बाहर से आए कुछ दंगाइयों ने लगाई। दो बोगियों के बीच बने ज्वाइंट्स के रास्ते। वैसे भी इतने लोग एक साथ सामूहिक खुदकुशी नहीं कर सकते। और ये खुदकुशी या महज़ कोई हादसा नहीं था, ये बात पहले ही साफ़ हो चुकी है।
रही बात दहशतगर्दी की, तो मेरा ये मानना है कि इसे किसी कौम के चश्मे से देखना ही ग़लत है।

zeashan zaidi said...

रविश जी. बिल्कुल सटीक आर्टिकिल लिखा है आपने. दरअसल आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम आतंकवाद की ब्रांडिंग हो गई है. हालांकि आतंकवाद तो वह भी है जो अमेरिका तेल के लिए इराक में कर रहा है. या इजराइल के ज़ुल्म जो फिलिस्तीन पर हो रहे हैं. या उडीसा में जो कुछ हो रहा है. सबसे पहले तो आतंकवाद को ही परिभाषित होना चाहिए.

vipin dev tyagi said...

रवीश जी,
आपने मेरे मन चल रहे सवालों के जो जवाब दिये ..उससे काफी राहत महसूस हुयी..दुविधा दूर हुयी..देश पर..अपनी सोच पर विश्वास फिर से मजबूत.और ज्यादा मजबूत हुआ..कि भले ही कुछ लोग नफरत की फसल बोने में लगे हों...आप और दूसरे बहुत से लोगों ने कई एकड़ में प्यार..आपसी-भाईचारे..और भरोसे की मक्का बो रखी है..मक्का इसलिये क्योंकि मक्के की रोटी..सरोसो का साग बेहद पसंद है..गांव में खूब खाता हूं..यहां मिलता नहीं..फाइव स्टार में मिलता है..सुना है..फाइव स्टार को अंदर से अभी देखा नहीं है...बहरहाल मामला दूसरा था..सर..आज मोहल्ला में ही स्टार न्यूज के पत्रकार ने एक लेख पोस्ट किया..शायद आपने भी पड़ा हो..कि मुश्ताक नाम के शख्स को मुलसमान होने के चलते नौकरी से फिलहाल हटा दिया गया..वो घर चला गया..लोगों ने अपनी-अपनी राय भी दी हैं..आप मेरी बात का बिल्कुल जवाब मत दीजियेगा...आपका समय कीमती है..लेकिन क्या ऐसा हो सकता है..कि एक मल्टीनेशनल कंपनी मजहब के नाम पर नौकरी से निकाल दे..मुल्क में हालत ऐसे कैसे हो सकते हैं..क्या ब्लॉग..झूठ और मेरी सुनो..मै बुद्धिमान हूं..ज्ञानवान हूं के वाइरस की चपेट में आता जा रहा है.कुछ भी लिख दो..ऐसा होने लगा है तो रवीश जी ये तो खुली हार है..सरकार की ..सिस्टम की..पुलिस की..व्यवस्था की..कि एक शख्स को सिर्फ मुसलमान होने की वजह से नौकरी से निकालने का फरमान सुना दिया गया हो..हो सकता है..नवीन कुमार जी..जिन्होंने ब्लॉग लिखा है..ने सुनने में गलती कर दी हो..मुश्ताक कुछ और कहना चा रहा हो.।उन्होंने गलत समझ लियो हो..रेलवे स्टेशन पर शोर होता है..शब्द..शोर शराबे की मैली चादर में लिपट गये हों..हो सकता है मुश्ताक कुछ और समझाना चा रहा हो..नवीनजी ने कुछ और समझ लिया हो..हो सकता है...आपने मोहल्ला में इसे पढ़कर पहले ही खारिज कर दिया हो..औऱ कमेंट करने की जरूरत ना समझी हो..लेकिन पता नहीं क्यों ये बात मैं आपसे कह रहा हूं..डिस्टर्ब किया..सॉरी सर
विपिन देव त्यागी

Pawan Nara said...

M-sl-m
h-nd-
we need U and I to make our nation peacefull. lets pick the common letters and make this complex issue a little bit simple.
समस्या हमारे हिन्दू समाज मे है कि हम मुस्लमानो को अपनाने मे नाकामयाब रहे।
"अपना बना कर बेगाना कर दिया।
गले तो लगा लिया, दिल से न लगाया।

JC said...

Pawanji, U & I ke alawa 'He' bhi ata hai manav samaj ke ban-ne/ banane mein...jo aaj bhula diya gaya lagta hai...

Sochne ki baat hai: Dosh ismein Uska hai ya tumhara aur mera?

sandeep gupta said...

Ravishji aapne yeh logic to khoob acha diya ki court me lowyer khadakarne ka kharcha kya tax payer ki jeb se nahi aayega. per mera ye a
sawal hai ki central government ,central university ko fund is liye deti hai ki university un paiso se
case lade kanooni dav pech khele ya un paiso ka istamal student ke education me use kare.Janha tak case ladna ka sawal hai uske liye aapne hi bataya ki court vakil available karati hai.maeri samajh me court ko apna kaam karne dena chahiy our university ko apna kaam karna chahiye.is tarah tax payer ke paiso ko university court case me swaha naho kar sakti.dhnyawad.

prerna said...

Main sirf ek bat kehna chahunga k hindustan k alwa duniya k andar 67 countries hain jo ki islamic rashter haiun knhi or bhi suna hai k isam galt ahia ya fir knhi or dekha hia ki uslim piche hain ya padhe likhe nahi ahin iran jaise contry america k sath ladti bhi hain or wnha womens ne bhi bahut tarqqi ki ahin shayad india mian itni na ki ho or ye batao k america kyu taliban ko in direct piasa deta hai or pakistan ko help kyu krta hai kyu ?????? aaap sahayd abhi in chizo se bahut door ho plz abhi in tak phunchna apka kam bnahi ahi aap pane kam se kam rakho muslman har chiz mian aage hain or rahenge main bhi hindu hoo apr islam kabool krne wala hu kyunki agr ap islam ko apdh kr mano ge to shayad apko pta lag jayega k islam hai kioay

prerna said...

Main sirf ek bat kehna chahunga k hindustan k alwa duniya k andar 67 countries hain jo ki islamic rashter haiun knhi or bhi suna hai k isam galt ahia ya fir knhi or dekha hia ki uslim piche hain ya padhe likhe nahi ahin iran jaise contry america k sath ladti bhi hain or wnha womens ne bhi bahut tarqqi ki ahin shayad india mian itni na ki ho or ye batao k america kyu taliban ko in direct piasa deta hai or pakistan ko help kyu krta hai kyu ?????? aaap sahayd abhi in chizo se bahut door ho plz abhi in tak phunchna apka kam bnahi ahi aap pane kam se kam rakho muslman har chiz mian aage hain or rahenge main bhi hindu hoo apr islam kabool krne wala hu kyunki agr ap islam ko apdh kr mano ge to shayad apko pta lag jayega k islam hai kioay