अहमदाबाद का जातिवाद

पहले ख़बर इंडियन एक्सप्रेस में छपी। अहमदाबाद में कोई जाति दूसरी जाति के साथ नहीं रहता। पढ़कर सोचा कि फिर शहर में रहता कौन है? और किसके साथ रहता है? हमने गुजरात जाने वाले कई पत्रकारों से पूछा कि ऐसा होता है क्या? जवाब मिला कि पुरानी बात है। होता है। कई बार स्टोरी भी हुई है। मैंने कहा कि एक बार अपन भी करना चाहते हैं। देखना चाहता हूं कि कैसे इस शहर में दलितों के मोहल्ले में कोई पटेल नहीं रहता। कैसे पटेल के मोहल्ले में कोई दलित नहीं रहता।

आम सांप्रदायिक समझ बताती रहती है कि सिर्फ मुसलमान घेरेबंदी में रहते हैं। एक ही जगह रहते हैं और दूसरे समाजों से मिलजुल कर नहीं रहते। ऐसी बसावट को अक्सर सांप्रदायिक पहचान से जोड़ा गया। मगर जब हिंदू मत के लोग अलग अलग जातियों में रहें तो क्या कहेंगे? क्या हम वाकई एक ही धर्म जाति के लोगों के साथ ही रहना पसंद करते हैं?

अहमदाबाद में ऐसा ही है। स्पेशल रिपोर्ट करते वक्त मैं हैरान रह गया। मेरे लिए यह जानना पहली बार था कि इस शहर में दलितों के शानदार बंगलों बन रहे हैं मगर उनकी कालोनी में कोई अदलित या सवर्ण नहीं रहता। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अगर कोई दलित पहचान छुपा कर किसी पटेल या ब्राह्मण बनिया के अपार्टमेंट या कालोनी में मकान खरीद भी ले तो पता चलने पर सवर्ण कौड़ी के मोल अपने फ्लैट बेच देते हैं। धीरे धीरे पटेलों का अपार्टमेंट दलितों का अपार्टमेंट बन जाता है। एक दूसरे के छाये से दूर रहने की ऐसी सनक खतरनाक है। पूरे शहर की बसावट ऐसी है। गुजरात का कोई पाठक इस लेख को पढ़ेगा तो सुझाव ज़रूर दे। क्या मैंने जो देखा वो ग़लत है?

चांदखेड़ा अहमदाबाद का नया उपनगर है। यहां बेहतरीन बंगलो बन रहे हैं। आठ सौ के करीब बने हैं। इसके ठेकेदार जयंतीभाई जाधव दलित हैं। सारे बंगलों इन्होंने बनाए हैं। मगर इसमें पैसा लगाया पटेल कारोबारी ने। करोड़ों रु का निवेश। मगर पटेल कारोबारी ने कभी इस दलित पार्टनर को घर नहीं बुलाया। दोनों ने कभी मेज़ पर बैठ कर हिसाब किताब नहीं किया। जयंतीभाई कहते हैं कि पटेल खुद बनाकर दलितों को मकान बेचेगा तो उसकी अपने समाज में नाक कट जाएगी। इसलिए बिना पैसे लगाए मैं इस धंधे में आधे का साझीदार हूं। यहां रहने वाले लोगों के भी यही अनुभव हैं। सवर्ण और दलित में भेदभाव हर स्तर पर है। कोई कालोनी दलितों की ही हो या पटेल की तो वहां पलने बढ़ने वाले बच्चों की पहचान कैसी होगी?

हैरानी की बात है कि अहमदाबाद में कोई इस तरह के बसावट के खिलाफ नहीं है। सब कहते हैं मालूम है। नया क्या है? होता है। एक पटेल से पूछा कि क्यों किसी दलित के साथ नहीं रहते तो जवाब था कि दलित मांस खाते हैं औरगंदा रहते हैं। मैंने कहा चांदखेड़ा के बंगलों शानदार हैं। और आप तेईस जून यानी शुक्रवार को साढ़े दस बजे खुद स्पेशल रिपोर्ट में देख सकते हैं। वाकई दलितों के लिए बने बंगलों शानदार है। तो मैंने पटेल साहब को मुफ्त में देने की पेशकश की। उन्होंने थूका तो नहीं मगर कहा कि नहीं लूंगा। न अपनी सोसायटी में किसी दलित को रहने दूंगा।

यह है हमारी आधुनिकता और आर्थिक तरक्की। बहुत से लोग रिजर्वेशन का विरोध करते समय इस तरक्की का हवाला देते हैं और कहते हैं सबके लिए समान अवसर हैं तो फिर रिजर्वेशन कैसा? मेरा सवाल है बाज़ार सबको समान अवसर नहीं देता। होता तो एक पैसे वाला दलित किसी सवर्णों के मोहल्ले में मकान खरीद लेता और लोग दे देते। मगर पटेल कहते हैं कि वो मकान बेचने से पहले जात पूछते हैं। गुजरात देश के अमीर राज्यों में से एक है। ऊपर से लगता है कि यहां धंधे के अलावा कोई और धंधा नहीं। मगर यहां आकर लगता है सबका एक ही धंधा है। जात पात का।

इस तरह से मैंने बिहार उत्तर प्रदेश में भी नहीं देखा। कई जगहों पर दलित सवर्ण साथ रहते हैं। ऐसा कम हुआ होगा कि किसी अपार्टमेंट में जात पूछ कर मकान दिए जाते हों। लेकिन गुजरात में ऐसा हो रहा है। इतने ज़माने से हो रहाहै कि लोगों ने कहा कि स्पेशल रिपोर्ट क्यों? मेरा तर्क था कि सिर्फ जानना कितना खतरनाक हो सकता है। आप भी स्पेशल रिपोर्ट देखियेगा। शुक्रवार को साढ़े दस बजे औऱ शनिवार को साढ़े बारह बजे। ज़रूर बताइये कि वाकई यह पुराना टापिक है।

17 comments:

अभिनव said...

रवीश भाईसाहब, यदि ऐसा है तो यह तो बड़ी चिन्ताजनक बात है। क्या इंटरनेट पर स्पेशल रिपोर्ट देखी जा सकती है, यदि हाँ तो कृपया बताइएगा। एक बड़ी पुरानी कविता याद आ गई आपका आलेख पढ़कर। हमारे समाज में जात-पात बहुत गहरे पैठी हुई है। वैसे गीता में जाति का विभाजन गुण और कर्म के आधार पर कहा गया है, पर शायद वह अब बस थ्योरी की बातें रह गई हैं। प्रेक्टिकल तो हमें अपने आस पास दिख ही रहा है,

श्रेष्ठ रक्त के मृदु झूलों में झूला हूँ मैं,
अंदर अंदर जाति गर्व से फूला हूँ मैं,
समता की बैसाखी धर कर,
बोल रहा हूँ ऊपर ऊपर,
मुझमें तुझमें फर्क नहीं है,
किसका बेड़ा गर्क नहीं है,
अनगिन साधन संपर्कों के हैं,
लेकिन संपर्क नहीं है।

आशीष श्रीवास्तव said...

२१ वी सदी मे !

यदि ये सच है ये तो काफी चिन्ताजनक है

काकेश said...

पढ़ कर आश्चर्य हुआ.ऎसा तो कभी देखा सुना नहीं.इस पर किसी गुजरात में रहने वालों के विचार जानना चाहुंगा.रपट का इंतजार है ..आप ने बताया नहीं सुबह या शाम.

masijeevi said...

सुना था पर लगा कि बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे होंगे, कोई छुटपुट मामला होगा पर जब आप स्‍पेशल रिपोर्ट करके आए हैं तब तो मामला गंभीर है...
:
:
इसे सामने लाने के लिए आभार। रपट जरूर देखेंगे

avinash said...

यही सब गंडगोल बतियाइए आप! अऊर कवनो अच्‍छा बात बोलेक नै है, जी? इस्‍पेसल रिपोट किये हैं. अरे, काहे ला किये हैं जी?

अनामदास said...

रवीश
आपकी बात सोलह आने सच है, मैं दो बार गया हूँ. एक बार भूकंप के बाद और एक बार दंगे के बाद, दोनों बार साफ़ दिखा है अलगाव. यह सब इतना खुला है कि लोग बोर्ड टाँगने में भी नहीं शर्माते 'कच्छीलेवा पटेल सोसाइटी' केवल पटेल होने से नहीं चलेगा, कच्छी पटेल होना चाहिए. हमारी ट्रेनिंग का हिस्सा है बातें पता करना, समझना, जितना समझ में आया वह यही है कि गुजरात पूरी तरह से बँटा हुआ समाज है. बिहार, उत्तर प्रदेश से कहीं ज्यादा, इस मामले. आर्थिक विकास का तर्क भ्रूण हत्या के मामले में पंजाब हरियाणा में कहाँ काम करता है?
बिहार और उत्तर प्रदेश आर्थिक तौर पर पिछड़े हैं इसलिए वे उसके कारण खोजते हैं, उन्हें लगता है कि कहीं ऐसा हमारे जातिवादी होने की वजह से तो नहीं? लेकिन सफलता हमेशा आँखों पर पर्दे डाल देती है, आर्थिक तौर पर सफल गुजरात के लोगों को शायद लगता है कि उनका हर तौर-तरीक़ा अनुकरणीय है.

अभय तिवारी said...

भाई.. मैंने सुना कि अहमदाबाद को मेट्रो का दरजा मिलने वाला है.. ये तो मेट्रो संस्कृति नहीं कही जा सकती.. या फिर मेट्रो संस्कृति को पुनः परिभाषित करना होगा..

Sanjeet Tripathi said...

आश्चर्य!!
अफ़सोस!!
यह वही राज्य है न जिसके मुखिया अपने राज्य की तरक्की के ही गुण गाते और मीडिया को कोसते रहते हैं।

ling_bhedi_astra said...
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Rajesh Roshan said...

मामला बहुत गम्भीर है । शायद देखने के बाद कुछ और कहा जा सकता है । वैसे रवीश जी अभिनव जी कि बातो का निदान हो जाये तो बात बने । अब तो NDTV .com भी video दिखाने लगा है लेकिन आपका स्पेशल रिपोर्ट नही दिखता है । मैंने एक मेल फीडबैक को भेज दिया है । शायद आप प्रबंधन को समझा पाये

arun said...

arun said
ravish bhai aapki bat padhkar mai sochne par majbur ke gujrat ka vikash. esse yah bhe bat sajh me aati hai ke dhni hone ke bovjud yah jaruri nhi aapka mansik vikas bhi. aab age report dekhne ke bad.

yunus said...

ये तो अत्‍यंत गंभीर मामला है । मुझे तो भयंकर आश्‍चर्य हो रहा है । भला इक्‍कीसवीं सदी में इतना बंधा बंधा सा शहर । कैसे कैसे कैसे

ravish said...

आज का स्पेशल रिपोर्ट रद्द हो गया है। सुनीता की वापसी के कारण। अगले हफ्ते आएगा।

मगर यह बात ठीक है। अहमदाबाद में कई मोहल्ले ऐसे हैं जो देखने में एक ही तरह के हैं। अच्छे मकान,साफ सुथरी सड़कें। लेकिन लोग भी एक ही जाति के। शायद यह भी एक वजह होगी कि मुसलमान अपने मोहल्ले में रहना पसंद करता होगा। पटेल अपने मोहल्ले में। और दलित अपने मोहल्ले में।
खतरनाक बात यह है कि कोई इसके खिलाफ नहीं है। सब ने इसे हकीकत मान लिया है। कोई इसे तोड़ने की पहल नहीं करना चाहता। एक पूरा शहर इस अघोषित डिज़ाइन पर बसा

रंजन said...

यही दुनिया है तो ये दुनिया क्यों है..?

शुक्रिया, सच सामने लाने का. हर रिपोर्ट कि तरह आपकी इस रिपोर्ट का इन्तजार रहेगा.

Raag said...

आपकी कई सारी पोस्ट एक साथ पढ़ रहा था। बैरकपुर वाली पोस्ट में आपने बताया कि लोग छुप छुप कर प्यार करते हैं और यहाँ खुल कर नफरत। बढ़िया देश है हमारा।

ratan said...

paisa ho jane se aadami ki sonch nahi badalti. desh ki janata ko samajhana padega ki jativaad aur sampradayvad ek hi sikke ke do pahlu hain.

suchak said...

sir, it's nothing new but here I want to tell interesting one :-

There is clear cut difference in Ahmedabd and other cities but Capital city Gandhinagar is differennt ...

House in Gandhinagar-80% plot given by Govt , so, all have to live togather but after some years officers from lower caste change Name plate surname to sell house on higher price