ये ग्लोबल स्कूल क्या होता है?



"इनको क्या वैल्यू सीखायें, इन्हें तो पैसे की ही वैल्यू नहीं है। हमारे मां-बाप ने जो वैल्यू सीखाई वो उन्हीं मूल्यों के आस-पास थी कि सब कुछ पैसा नहीं है मगर पैसे का अपना हिसाब-किताब रखा जाना चाहिए। इसे न बहाओ न इसके पीछे भागो। मगर प्रॉब्लम ये है कि हम टीचर तो हैं मध्यमवर्गीय परिवारों से और हमारे स्टुडेंट ऐसे परिवारों से हैं जिन्हें देख कर लगता ही नहीं कि ये हिन्दुस्तान की फैमिली है।"



"इनके सामने हमें ही छोटा महसूस होता है। कभी-कभी घुटन सी होती है। बहुत प्यारे बच्चे हैं। मगर इतने पैसे के बीच पल-बढ़ रहे हैं कि अभी से इनकी ऊंची हैसियत बनी हुई है कि हम इन्हीं खुलकर डांट भी नहीं सकते। एक क्लास को मैंने प्रोजेक्ट दिया। कहा कि आपमें से ज्यादातर बिजनेस परिवारों के हैं, तो बताइये कि आप जब बिजनेस संभालेंगे तो क्या करेंगे जिससे उसका विस्तार हो। सातवीं आठवीं के बच्चे थे। सबने जो प्रोजेक्ट बनाया वो बीस से लेकर चालीस करोड़ रुपये तक था। दस पांच रुपये का ख्याल तो आता ही नहीं। एक छात्र ने कहा कि ज़रूरी नहीं है कि हम अपने मां-बाप का ही बिजनेस संभालें। हम इंडिया के बाहर भी तो बिजनेस कर सकते हैं।"





"मेरी इच्छा थी कि आप इस दुनिया को भी देखें। अच्छा है कि आप हिन्दुस्तान की हकीकत दिखाते हैं रवीश की रिपोर्ट में। लेकिन ये भी एक हकीकत है। जहां मां-बाप अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए बीस हज़ार रुपये फीस देते हैं। बाकी खर्चा अलग से। स्कूल की सफाई,व्यवस्था सब फाइव स्टार के बराबर है। लेकिन हम इस सवाल से रोज़ टकराते हैं कि इनके लिए शिक्षा का मतलब क्या है? हम जिस तरह के माहौल में पढ़ें वहां तो शिक्षा के लिए एक मतलब था। इस स्कूल की हर सुविधा हमें रोज़ हैरान करती है। हमारे भीतर एक संघर्ष चलता रहता है। इन्हें तो मालूम ही नहीं कि इंडिया क्या है। वो पढ़ कर निकलेंगे तो इसी सोच के साथ कि पूरा इंडिया फाइव स्टार होटल है। ग्लोबल है।"



दोस्तों, पिछले कई महीनों से दिल्ली और आस-पास के कई इंटरनेशनल स्कूलों में जाने का मौका मिला। वहां विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले मध्यमवर्गी कर्मचारियों की आवाज़ें बहुत दिनों से कानों में गूंज रही थीं। कई बार ऐसे स्कूलों की इमारतों में घुसते ही मेरे भीतर की हैरत ग्रंथी में हड़कंप मच जाया करती थी। दिमाग़ के भीतर बने तमाम जंजालों में संदेश चला जाता था कि देखो गांव गली में घूमने वाला हिन्दी वाला एक फाइव स्टार स्कूल में आ गया है। सूक्ष्म धमनियों में जो हलचल मच रही थी, वो चेहरे पर भी झलक रही थी। बाथरूम से लेकर अत्याधुनिक क्लास रूम, अजीबो-ग़रीब कुर्सियां। सुविधाएं ऐसी कि वाकई में सरकारी स्कूल तरस जायें। फर्श पर बिछी कालीन पर भी एबीसीडी की डिज़ाइन, खेलते वक्त पांव के संपर्क में आते ही अक्षर अपलोड होकर दिमाग़ के अक्षरकोष में पहुंच जायें।

मैं एलियन की भांति घूम रहा था। पूरा एयरकंडीशन। स्कूल के कर्मचारी ने कहा कि अब एसी को लेकर क्यों हैरान होते हैं। एसी तो पुरानी बात हो चुकी है। ये हॉल देखिये। यहीं पर कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान नेट बॉल्स हुए थे। फर्श पूरा वुडेन है। पूरी दिल्ली में इतना बड़ा और भव्य हॉल नहीं होगा। हॉल की भव्यता बता रही थी कि स्कूल में कई हज़ार बच्चे पढ़ते होंगे। स्कूल अभी नया ही खुला है। ढाई सौ बच्चे हैं। मालूम नहीं कि भावी संख्या क्या होगी लेकिन लगा कि जितनी भी होगी उसके लिए यह हॉल काफी बड़ा है। एक आवाज़ ने कहा कि सुविधाओं में कोई कंजूसी नहीं की गई है। पूरी कोशिश होती है कि सब कुछ इतना हो कि कोई रोना न रोए। बस ऊंचे लक्ष्य की सोचे। आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी भव्यता से चढ़े।







इस हैरत भ्रमण से अंदाज़ा हो रहा था कि स्कूली शिक्षा एक प्रोडक्ट है जिसे लोग अलग-अलग दामों में खरीद रहे हैं। ब्लैक बोर्ड तो कब का सफेद हो चुका है। क्लास रूम में प्रोजेक्टर लगे हैं। हॉस्टल के कमरे भी देख लीजिए। गंदगी का नामोनिशान नहीं। होटल जैसे माहौल में बच्चे उस शिक्षा को हासिल कर रहे हैं जिसके लिए सरकार मौलिक अधिकार टाइप कानून बना चुकी है। ये शिक्षा तो पूरी तरह से वर्ग विशेष के विशेषाधिकार का मामला लगता है। सरकार जितना सार्वभौम बनाने की कोशिश करती है,शिक्षा उतनी ही वर्गीय हो जाती है। क्लासी। एक तस्वीर कॉमनरूम की भी है। स्कूल में जो स्विमिंग पूल है वो भी काफी बड़ा है। पूरी दिल्ली में शायद एकाध ही होंगे। तीस एकड़ के एरिया में फैला है यह ग्लोबल स्कूल। उम्मीद की जानी चाहिए कि यहां के बच्चे जब पढ़ कर निकलेंगे तो भारत की जीडीपी को बत्तीस कर देंगे। मनमोहन सिंह के श्रीमुख से आठ या नौ फीसदी सुनकर मुझे भी खराब लगता है। वैसे ही जैसे टीआरपी की दुनिया में आठ और नौ खराब अंक हैं। इन बच्चों के मां-बाप ने वाकई कुछ तो सोचा होगा जिसे हिन्दी टाइप के क्रंदनीय लोग कभी समझ ही नहीं सकते।




स्कूल की लॉबी से लेकर गलियारे तक सब उस भारत के आत्मविश्वास की कहानी कह रहे हैं जिसकी प्रैक्टिस शहरी भारत हर दिन अपने भाषणों और लेखों में करता है। बताता है कि भारत महाशक्ति बन रहा है। ऐसी इमारतों और विशाल भकोसू उपभोक्ता समूह के दम पर तमाम तरह के फटीचर लेखों में अपना भारत महाशक्ति टाइप बताया जाता है। यह स्कूल खुद को ग्लोबल कहलाता है ताकि इसके बच्चे बाहरी दुनिया में जायें तो इन्हें न लगे कि ऐसा इंडिया में नहीं है। न्यू यार्क और नोएडा में रहने का अनुभव एक हो।


मैं नकारात्मक सोच से स्कूल को नहीं देख रहा था। मुझे नहीं मिला तो क्या किसी को न मिले। बिल्कुल मिलना चाहिए। आखिर शिक्षक के वेतन भी अच्छे होने चाहिएं। उनकी सुविधा का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। ये क्या संविधान में लिखा है कि हमारा टीचर हमेशा पोलियो की दवा खिलाएगा और वोट डलवाएगा। इंटरनेशनल स्कूल के शिक्षकों को भी भरपूर सुविधाएं दी गई हैं। फिर भी मुझे इस स्कूल का मतलब समझ नहीं आ रहा था। किसी प्रचार के मकसद से यह लेख नहीं लिख रहा हूं। मुझे यकीन है कि मेरे पाठक अपने बच्चों के लिए ऐसे स्कूल का ख्वाब नहीं देखते होंगे। देखते भी होंगे तो बीस हज़ार रुपये की हैसियत कुछ ही रखते होंगे। या नहीं ही रखते होंगे। मुझे मालूम नहीं। इस अरबपति स्कूल का प्रचार यह अदना ब्लॉगर क्या करेगा। लेकिन सचमुच भीतर से देखना दुर्लभ अनुभव था।

उम्मीद है यहां के बच्चे कलमाडी टाइप उद्योगपति नहीं बनेंगे। पता नहीं कलमाडी ने भी ऐसे स्कूलों की शक्ल देखी होगी या नहीं। भ्रष्ट तो म्यूनिसपल स्कूलों से भी निकलते हैं। खैर जो भी हो,इसका लोड मैं ही क्यों ढो रहा हूं। उनके मां-बाप को तो ऐसा ही स्कूल चाहिए था। वैसे स्कूल की इमारत से लेकर क्लास रूम तक,सभी विश्वस्तरीय। अगर अच्छी इमारत का होना विश्वस्तरीय होना है तब। ग्लोबल स्कूल एक हकीकत तो है ही। क्या पता आने वाले दिनों में यहां कोरिया,जापान,इंग्लैंड के बच्चे पढ़ने आ जाएं। किसी को नहीं मालूम। स्टेडियम,तलवारबाज़ी,स्क्वॉश गेम की उत्तम व्यवस्था है। स्कूल की छत पर शानदार टेनिस कोर्ट बनाया गया है। जिम के नाम पर किसी कोने का जुगाड़ नहीं किया गया है बल्कि विशालकाय हाल हैं। स्केटिंग के लिए कोई संकरा रास्ता नहीं बल्कि लंबा और चौड़ा गलियारा है।

बनाने वाले ने अपना सपना पूरा कर लिया है। इमारत इस लिहाज़ से बनाई गई है कि स्कूल न चला तो होटल या मॉल खुल ही जाएगा। लेकिन इस तरह की सोच कोई हिन्दीवाला ही रख सकता है। जिन्होंने बनाया होगा उनका ख्वाब तो होगा कि दुनिया में ऐसा स्कूल न हो। ये स्कूल उसी ख्वाब का ऐशगाह लगता है। पढ़ाई के स्तर पर भी काफी ध्यान रखा गया है। क्लासरूम में सर्वशिक्षा अभियान टाइप भगदड़ नहीं मची है। टीचर के पास पूरा समय है,हर बच्चे पर ध्यान देने के लिए।


आप भी देखिये। ये कार मर्सेडिज़ की है। मॉडल नहीं मालूम। पचास लाख से सत्तर लाख तक की कीमत वाली कार है।
ऐसे स्कूलों में किसी ने मुझे नहीं पहचाना। पंद्रह साल टीवी पर काम करने का एक फायदा तो है कि एकाध लोग हल्के में पहचान लेते हैं। आप वही हैं न जो जी टीवी पर आते हैं, स्टार न्यूज़ में आते हैं..नहीं नहीं..आज तक पर देखा है। यहां इस तरह का कोई अनुभव नहीं हुआ। मगर करोड़ रुपये की कार के ड्राइवर ने नमस्कार कर दिया। निकलते वक्त जता दिया कि मैं कहां से कनेक्टेड हूं। बस गला गला सूखने लगा था। हर बच्चे को अच्छा भविष्य मिले। कौन नहीं चाहता कि सुविधाओं की कमी न रह जाए। आखिर अब्राहन लिंकन की बायोग्राफी कब तक ढोते रहेंगे। बस कभी-कभी सोचता हूं कि ये बच्चे कभी मोतिहारी जैसी जगह में नौकरी करने जायें तो क्या करेंगे। फिर कर दी न मैंने भी। मिडिल क्लास वाली बात। कोई इंग्लिश एलित गया होता तो कहता..वाउ..कूल डूड..इट्स रौकिंग। वी हैव अराइव्ड।

हैलो..राहुल गांधी, नूरी ख़ान कुछ कहना चाहती है......



सवा सौ साल की बूढ़ी कांग्रेस के महाधिवेशन में आए करीब साढ़े बारह हज़ार से ज्यादा पार्टी प्रतिनिधियों में से नूरी ख़ान के बारे में लिखने का कोई ठोस औचित्य तो नहीं है मगर जवान होने की चाह में चमचमाने की कोशिश कर रही कांग्रेस के युवा नेताओं पर नज़र पड़ गई। इंदौर से लौट रहा था। फ्लाईट में एक तीस साल की लड़की अपने मोबाइल फोन उलट-पलट रही थी। बेचैन थी। उसी ने कहा कि आप पत्रकार हैं। जवाब हां में मिलते ही बातें शुरू हो गईं। तभी मैंने तय कर लिया कि मैं नूरी ख़ान के बारे में लिखूंगा। क्योंकि पूरी बातचीत में राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व की कंगाली के प्रति के एक किस्म का विद्रोह नज़र आ रहा था। सियासत में बिना बाप-दादे के यह लड़की अकेले अल्पसंख्यकों की आवाज़ बनने का ख्वाब पाले हुई थी।

नूरी ख़ान दिल्ली आईं हुईं हैं। राजनीति में आने की ख्वाहिश किसी विरासत में नहीं मिली। पूरे ख़ानदान में कोई नेता नहीं है। नूरी ने कहा कि बस उन्हें राजनीति में कुछ करना है। अगर नहीं हुआ तो,मेरी इस आशंका पर उनका जवाब सोचने लायक था। नूरी ने कहा कि राजनीति तपस्या है। कोई खंभा तो है नहीं,गए और छू कर आ गए। मुझे इस लड़की का बकबक करना अच्छा लग रहा था। एक युवा मुस्लिम महिला नेता। पूरे अधिकार से बोले जा रही थी। ऑफ रिकार्ड और ऑन रिकार्ड के भय से मुक्त।



बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि नूरी ख़ान अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में मध्यप्रदेश से सबसे छोटी सदस्य हैं। पूरे राज्य से अकेली अल्पसंख्य महिला। मध्यप्रदेश के तिरेसठ डेलिगेट्स हैं,जिसमें राज्य के सांसद,विधायक सभी हैं। नूरी ने ज़ोर देकर कहा कि वे मनोनित सदस्य नहीं हैं। चुन कर आईं हैं। और एक बात और...मैं सबसे कम उम्र की पार्टी की प्रवक्ता भी रह चुकी हूं। राज्य स्तर पर। मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी। कहा कि अठारह साल की उम्र में एनएसयूआई में आ गई। नागड़ा के गवर्मेंट कॉलेज से बीए किया है। वहीं चुनाव लड़ा। मां ने कांग्रेस पार्टी के झंडे सिल कर दिये थे। दसवीं में थीं तो नौवीं के बच्चों को पढ़ाया करती थी। बीस साल की उम्र में उज्जैन एनएसयूआई यूनिट की ज़िला अध्यक्ष बन गई। पिता एक फैक्ट्री में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी थे। नूरी फटाफट उर्दू,अंग्रेजी,हिन्दी और अखोमिया बोलती हैं। असम की भाषा..वो कैसे? मेरे इस सवाल के जवाब में एक भावी राजनेता की कहानी रोमांटिक मोड़ की तरफ मुड़ गई।

नूरी ने कहा कि दस साल पहले हैदराबाद गई थी। कांग्रेस का दृ्ष्टिकोण सम्मेलन था। वहां भाषण दिया तो खूब ताली बजी और सर्वोत्तम वक्ता का पुरस्कार भी मिला। वो भी सोनिया गांधी से। पार्टी के कई सदस्यों ने मुझसे नंबर ले लिये। मुझे मालूम नहीं कि किस किस को मैंने अपना नंबर दिया। उन्हीं में से एक थे,रक़ीबुद्दीन अहमद साहब। बाद में उनका फोन आया और फिर निकाह का प्रस्ताव। हम दोनों ने तय किया कि साथ जीयेंगे और राजनीति भी मिलकर करेंगे। लेकिन राजनीति की ज़मीन अलग अलग होगी। पति असम के गुवाहाटी विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हो गए। रक़ीबुद्दीन युवा कांग्रेस के नेशनल कार्डिनेटर हैं। असम युवा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष। पांच साल तक नूरी अपने पति के साथ असम में रही। वहां की राजनीति में सक्रिय हुईं तो भाषा भी सीख ली। नूरी के दो बच्चे हैं। सात साल की सोफिया और छह साल का रेहान। अब दोनों बच्चे अपनी नानी के पास उज्जैन में रहते हैं। नूरी और रक़ीबुद्दीन अलग-अलग। नूरी ने कहा कि त्याग औरत को ही करना पड़ता है। मगर मैं राजनीति का यह सफर बीच में नहीं छोड़ने वाली। २००६ में नूरी असम से उज्जैन आ गईं। सियासत में अच्छा मुकाम और अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज़ बनने के सपने को लेकर। दोनों की मुलाक़ातें महीने में तीन या चार दिनों के लिए ही हो पाती हैं। नूरी कहती हैं कि हम दोनों एक जुआ खेल रहे हैं। मालूम नहीं कैरियर किस मोड़ पर जाकर खत्म हो जाए। लेकिन मुझसे देखा नहीं जाता कि अल्पसंख्यकों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है।

यहां से बातचीत रोमांटिक टोन को छोड़ राजनीतिक होने लगी। नूरी कहने लगीं कि अगर एआईसीसी के बैठक में मुझे बोलने का मौका मिल गया तो वही बोलूंगी जो हकीकत है। आखिर मुसलमानों का सर्वमान्य नेता क्यों नहीं है। क्यों मुसलमानों से कहा जाता है कि वो ऐसी सीट देखे जहां तीस से चालीफ फीसदी मुसलमान हों? मैं ऐसा नहीं चाहती। सर्वमान्य नेता तभी पैदा होगा जब वो जनरल सीट से लड़ेगा जिसे बाकी समुदाय के लोग भी वोट देंगे। आज मुसलमानों को ऐसा नेता चाहिए जो माइनॉरिटी के भीतर लड़े लेकिन नेतृत्व सबका करे। मैं मुस्लिम बहुल सीट से अपनी राजनीति नहीं शुरू करना चाहती। मैं चाहती हूं कि जोखिम लूं। लोग मुझे भी स्वीकार करेंगे। मुझे जनता पर भरोसा है कि वो इस पूर्वाग्रह को तोड़ देगी।



बिहार के नतीजे से सबक लेने की ज़रूरत है। मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया है।मध्यप्रदेश में जिस सीट पर चालीस फीसदी मुसलमान हैं वहां से बीजेपी कैसे जीत जाती है? हम कब सीखेंगे। पार्टी के भीतर मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व अल्पसंख्य समुदाय की उतनी ख़बर नहीं ले रहा,जितनी लेनी चाहिए। मध्य प्रदेश में ही अल्पसंख्यक समुदाय की सारी केंद्रीय योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। आवाज़ उठाने वाला नहीं है। मैं अभी उस काबिल नहीं हुई हैं कि लोग मुझे सुनें। फिर भी मैं बोलती रहती हूं।

एआईसीसी महाधिवेशन में सभी को बोलने का मौका नहीं मिलता। चिट सिस्टम होता है। उम्मीद करता हूं कि नूरी की लॉटरी लग जाए और खूब बोलने वाली यह नेता अपने दिल की बात कह सके। राजनीति में किसी की तरफदारी करना जोखिम का काम है। वो भी एक मुलाकात के बाद। फिर भी कुछ तो अच्छा लगा ही कि लिख रहा हूं। एक ऐसे समय में जब कांग्रेस का अहंकार चरम पर है। तमाम आरोपों के प्रति उसका रवैया अलोकतांत्रिक है। फिर भी उसके युवा कार्यकर्ताओं में पार्टी के लिए उम्मीदें हैं।

ज़हर खाए मरीज़ों का अस्पताल



यह साइन बोर्ड दो साल पहले देखा था। विजेंद्र के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने पर मीडिया ने भिवानी पर धावा बोल दिया था। तब से यह साइन बोर्ड मुझे परेशान कर रहा था। इस कहानी को आप तक लाने के लिए कई कोशिशें की। कई बार आत्महत्या की कोशिश करने के बाद बच गए मरीज़ों ने कैमरे पर बात करने से मना कर दिया तो कई बार डॉक्टरों ने हिम्मत नहीं दिखाई क्योंकि यह मेडिकल नैतिकता का मामला था। इस बीच सल्फास और कीटनाशक स्प्रे खा या पीकर आत्महत्या की कोशिश करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। आप भी किसी अस्पताल के बाहर इस तरह के साइन बोर्ड देखकर सोच रहे होंगे कि कोई न कोई कहानी तो होगी इसके पीछे। अंततोगत्वा जब हिसार और भिवानी पहुंचा तो एक बार फिर से यह कहानी बीच में ही दम तोड़ने लगी। फिर डॉ जे बी गुप्ता ने ही मदद कर दी। कुछ मरीज़ों को तैयार किया बोलने के लिए। उनका चेहरा और पहचान न दिखे इसकी पूरी कोशिश की गई।


कहानी यह है कि हरित क्रांति के बाद कीटनाशक दवाएं घर-घर में उपलब्ध हैं। डॉक्टरों ने बताया कि आत्महत्या की कोशिशें करने वाले मरीज़ों या कहें तो लोगों की संख्या काफी बढ़ी है। एक डॉक्टर ने बताया कि दो साल पहले उनके अस्पताल में एक ही वेंटिलेटर था। अब तीन तीन है। एक डॉक्टर ने दावा किया कि अट्ठाईस साल के कैरियर में इस तरह के दस हज़ार मरीज़ों को ठीक किया है। इनमें वो संख्या शामिल नहीं है जो मरीज़ कीटनाशक दवा लेने के बाद गांव में ही मर गए या अस्तपाल पहुंचने से पहले। आत्महत्या की इन कोशिशों में कर्ज़ बड़ा कारण नहीं है। वो भी कई कारणों में से एक है मगर ज्यादातर मामलों में औरतें पति के बात न मानने पर या पराई स्त्री से संबंध होने के मामले में कीटनाशक दवायें पी लेती हैं। हालत यह है कि अब अस्पतालों ने ज़हर खाए मरीज़ों के लिए बकायदा पैकेज बना दिया है। सरकार के पास इसके आंकड़ें नहीं हैं क्योंकि सरकार प्राइवेट अस्पतालों से आंकड़े नहीं लेती। ज्यादातर मरीज़ झूठ बोलते हैं कि गलती से सल्फास या कीटनाशक दवा ले ली। अब यह बात समझने लायक है कि हर महीने एक अस्पताल में इस तरह के बीस मामले आ जाते हैं। क्या इतने लोग गलती से सल्फास या स्प्रे ले रहे हैं। कुछ किसान अनजाने में अपनी लापरवाही के कारण स्प्रे के ज़हर से मर जाते हैं। मगर यह मामला अलग है।



आप इस शुक्रवार रात 9:28 बजे रवीश की रिपोर्ट देखेंगे तो अच्छा लगेगा। कार्यक्रम अच्छा लगे तो किसी को देखने के लिए ज़रूर बताइये। शनिवार की सुबह 10:28 बजे और रात 10:28 बजे रवीश की रिपोर्ट दुबारा दिखाई जाती है। नीचे की बाकी तस्वीरें भिवानी और हिसार की हैं। एक तस्वीर परमिट कक्ष वाली करनाल की है।









मोबाइल चार्जिंग की सामाजिकता



पिछले बीस सालों में कई प्रकार के नए रोज़गारों का जन्म हुआ है। मोबाइल इंजीनियर और चार्जर का धंधा। अक्सर अखबारों में इसके बारे में छपता भी रहा है। गढ़ मेले में मोबाइल चार्जर काउंटर पर मेरी नज़र पड़ी। गांवों में बिजली नहीं है मगर फोन है। फोन बिजली के भरोसे नहीं है। चार्ज करने के कई सारे विकल्प ग्रामीण जीवन में ढूंढ निकाले गए हैं। कहीं ट्रैक्टर से चार्ज किया जा रहा है तो कई कंपनियां यह प्रचारित कर रही हैं कि बैटरी चार दिनों तक चलने वाली है। लोग मोबाइल चार्ज कराने के लिए पांच पांच किमी साइकिल यात्रा करते हैं। कोसी बाढ़ के दौरान देखा कि लोगों ने चीनी एंटिना के ज़रिये अपने नेटवर्क को बेहतर कर लिया था। एंटिना से मोबाइल फोन चलाने का आइडिया पूरी तरह से देसी है।



तस्वीरों में आप देखेंगे कि कई मोबाइल चार्ज के लिए लगे हैं। हर चार्जर पर मॉडल का नाम लिखा है। फोन पर उपभोक्ता का नाम, गांव और नंबर लिखा है। मोबाइल चार्ज करने के लिए ट्रैक्टर में लगने वाली बड़ी बैट्रियों का इस्तमाल किया गया है। पूरा एक सिस्टम बन गया है। पांच टका में मोबाइल चार्ज। एक साथ बीस लोग बैठ कर मोबाइल चार्ज कर रहे हैं। चार्जिंग का अनुभव हुक्का पीने या आग तापने जैसा हो गया है। किस्से भी चल रहे होते हैं। हम शहरी लोगों के लिए मोबाइल चार्जिंग सामाजिक अनुभव नहीं है। ग्रामीण लोगों के लिए हैं। वहां मोबाइल फोन के मॉडल से लेकर मनमोहन के मॉडल तक की चर्चा हो रही थी। थोड़ा और ध्यान देना चाहिए था। पता चलता कि बीस मोबाइल फोन में ज्यादा किस मॉडल और किस कंपनी के हैं।

शीला या मुन्नी

चंद महीने के अंतराल पर भारतीय सिनेमा के पर्दे पर दो नायिकाएं एक अपने अपने सामाजिक दास्तानों से निकल कर आइटम के रूप में पेश-ए-नज़र हुई हैं। इनकी नृत्य शैली और सुर लहरियों पर फिसलती लचकती कमरों का अध्ययन किया जाना चाहिए। क्या कैट और मलाइका का डांस अखिल भारतीय कुंठा तत्व को सामूहिकता देता है या फिर दोनों अलग-अलग वर्ग विशेष की नुमाइंदगी कर रही हैं? क्या यह सही सवाल है?

पहली नज़र में मुन्नी की ठसक लौंडिया वाली है। शीला बेब लगती है। मुन्नी सामंतवाद के हिन्दी मीडियम स्कूल से पास आउट लगती है तो शीला इंग्लिश मीडियम स्कूल से। मुन्नी की जवानी की आग झंडू बाम और एटम बम से निकल रही है तो शीला इतनी सेक्सी है कि अपने नायक से कहती है कि मैं तेरे हाथ न आऊं। अकड़ देखिये इस बेब की। कहती है वो खुद को ही प्यार करते रहना चाहती है। जबकि मुन्नी अपने डार्लिंग के लिए बदनाम हो जाना चाहती है। मुन्नी चाहे तो शीला का एक जवाब में काम तमाम कर सकती है। कह देगी कि इंग्लिश बोलकर ये मत समझना की तुम शकीरा हो। तुम्हारा नाम भी तो हमारे मोहल्ले वाला ही है न। मुन्नी की बहन शीला। शीला की जवानी। गिटपिट इंग्लिश बोलकर साबित क्या है करती। चल हट। हिन्दी की कापी मार कर इंग्लिश में महारानी बनने निकली है। नाशपिटी।

इन दोनों आइटम गीतों में डांस के लय वही हैं। कमर प्रदेश के अंग झटके खा रहे हैं। मुन्नी एक ही कपड़े में असल ज़िंदगी के जेठ के साथ डांस कर रही है। मुन्नी के साथ मर्द लफंगों की सक्रियता दिखती है। मर्द किरदार गाने में इन्वाल्व हैं। सलमान तो बालकनी पर चढ़ गया है और उसका विरोधी खलनायक खटिया पर अपनी बांहों को समेट कर कसमसा रहा है। कुर्ता और गमछा में। सलमान तो लगता है कि वर्दी फाड़ कर निकल आएगा। शीला के गाने में मर्द बिना काम के लार टपका रहे हैं। वो आगे पीछे बंदर की तरह कूद रहे हैं। अक्षय कुमार हैट पहनकर आते तो हैं मगर इंग्लिश मीडियम वाली शीला के सामने उनकी कोई औकात नहीं दिखती। शीला रिजेक्ट करती है। हर सीन में कपड़े बदल कर आ जाती है। वो एक ही गाने में कई वर्गों को लुभा रही है। मुन्नी तो एक ही कपड़े में सारे वर्गों को अपने घुटने तक ले आती है।

मर्दवादी कुंठा जगत में ऐसे गाने न जाने किस अहसास को रंगीन बनाते होंगे। मगर नाक और गला दबाकर गाये गए ऐस गाने कहीं न कहीं तेज धुनों के साथ आज़ाद ज़रूर करते होंगे। तभी मुन्नी और शीला सभी वर्गीय दीवारों को लांघ जाती हैं। कजरारे की ऐश को लोग भुलने लगे हैं। मुन्नी किसी गांव में फंस गई लगती है तो शीला बाइलिंगुअल हो गई है। बाई सेक्सुअल भी। दोनों की सेटिंग बताती है कि सामंतवादी तत्व हर तरह के समाजों में ज़िंदा है। मुन्नी और शीला आज के तथाकथित शालीन स्त्री पुरुषों के भीतर छुपे लंठई के प्रशस्त मार्ग हैं।

कतरनालय सही शब्द है सैलून का







(लखनऊ की चंद तस्वीरें आपके लिए)

ल लखनऊ या व से वखनऊ


हर शहर की अपनी सीमेंट संस्कृति होती है। लखनऊ की अवध संस्कृति में कोठी कल्चर घुल मिल गया है। गोमती नगर,इंदिरा नगर,विकास नगर में फैला लखनऊ कोठियों से भरा नज़र आता है। कतार में कोठियां खड़ी कर दी गई हैं। अठारह सौ से सत्ताईस सौ वर्ग फुट के दायरे में बनी इन कोठियों का अलग पैटर्न नज़र आता है। शायद ही किसी शहर में इस तादाद में कोठियां नज़र आएंगी। दिल्ली मुंबई से तुलना करें तो बिल्कुल अलग। गगनचुंबी इमारतों वाले महानगरों में एक महानगर ऐसा भी है जहां गगनचुंबी इमारतों का चलन अब शुरू हो रहा है। उत्तर भारत में दिल्ली के बाद लखनऊ को ही महानगर का दर्जा हासिल है।


सबसे पहले इंदिरा नगर बसा था। इसका पुराना नाम राम सागर मिश्र नगर था। कांग्रेस की सरकार ने बदल कर इंदिरा नगर कर दिया। भूतनाथ मार्केट इंदिरा नगर में ही है। इंदिरा नगर में धीरे-धीरे अपार्टमेंट बनने की शुरूआत हो हो गई है। कई सरकारी कर्मचारियों और मध्यमवर्ग का ठिकाना है इंदिरा नगर। इसके बाद बसा गोमती नगर। अपने आप में एक शहर। दो-दो रेलवे स्टेशन है। मेरे मित्र सर्वेश तिवारी ने बताया कि यहां बीस खंड हैं। सभी खंड के नाम व से शुरू होते हैं। विराम, विकल्प,विशेष,विनम्र खंड। दिल्ली मुंबई की तरह गार्डेनिया फार्डेनिया नहीं हैं। जिस किसी अधिकारी का यह फैसला होगा उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए। कम से कम उसने अपने अफसरों को व से शुरू होने वाले कई शब्दों और नामों को ढूंढने का काम तो दिया। यह अधिकारी चाहे तो किसी हिन्दी न्यूज चैनल में भी नौकरी कर सकता है। वहां के स्वयंभू अनुप्रास संपादकों की छुट्टी कर देगा। एक बार गोमती नगर घूम कर डेस्क पर जाए तो लखनऊ को वखनऊ लिख देगा। विकास,विवेक और विनय खंड ज्यादा हाई प्रोफाइल माने जाते हैं। यहां ज्यादातर नौकरशाही के राजा लोग रहते हैं। आईएएस,आईपीएस टाइप के। इसके बाद आता है विकास नगर। विकास नगर का अंदाज़ शाही तो नहीं लगता मगर गोमती नगर का अलग से अध्ययन किया जाना चाहिए।



इन तीनों नगरों की कोठियों का रंग रोगन देखना चाहिए। एक पेंटर ने बताया कि व्हाईट इमल्सन की खूब डिमांड है। जितने भी रंग बेचता है उसका पचासी फीसदी हिस्सा व्हाई इमल्सन होता है। नब्बी फीसदी कोठियों की बाहर से रंगाई सफेद रंग में ही हुई है। सात आठ कोठियों के बाद हरे या नीले या पीले रंग की भी कोठिया नज़र आती है। इन सबकी बनावट का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। सभी कोठियां एक दूसरे से सटी हैं। किसी ने अगल बगल ज़मीन नहीं छोड़ी है। अगल-बदल खिड़कियां नहीं हैं। दीवारों से मकान डब्बे की तरह बंद है। कई कोठियों में गुंबद बनाने का चलन है। कारण साफ नहीं हुआ मगर अंदाज़ा लगा कि लखनऊ की नवाबी संस्कृति का बचा खुचा माल इन कोठियों की छतों तक चला आया है। एक तरह का पावर सिम्बल लगता है। कोठी को संसद या विधानसभा की तरह बनाकर रहने में अलग पहचान मिलती होगी। वैसे ज्यादातर कोठियों के नक्शे सभी मकानों से लिये दिये गए लगते हैं।



लखनऊ में पली बढ़ीं पत्रकार प्रतिभा कटियार कहती हैं कि जिसे भी कोठी बनानी होती है वो एक बार गोमती नगर का चक्कर लगा ही आता है। नक्शा मिल जाता है। इतने आर्किटेक्ट तो हैं नहीं और कोठियों की कितनी डिज़ाइन बन सकती है। लखनऊ में गोमती नगर की कोठियों की इतनी हैसियत तो बन ही गई है। मुझे भी लगा कि अगर इन मकानों के छज्जे, गुंबदों और मीनारों का सर्वे करायें तो सबकी एक-एक कैटगरी बन जाएगी। सब मकान एक दूसरे से कुछ लिये हुए हैं।

सारी सजावट सामने से की गई है। क्योंकि मकान तीन तरफ से बंद है। घिरा हुआ है। इसलिए सारा ज़ोर सामने लगा दिया गया है। सामने के ही हिस्से में डिजाईन निकाली गई है। स्पेस का आभास होता है। बालकनी बड़ी है। सीढ़ियां चौड़ी हैं। खंभे लगे हैं। लगता है कि किसी सेठ का मकान है। भले हो न हो लेकिन कोठी संस्कृति को धक्का इतना गहरा है कि सारी कोठियां अगर एक नज़र से देखी जाएं तो एक ही लगती हैं। इनती कोठियां दिल्ली वाले को परेशान करती हैं। दिल्ली में पंजाबी बाग या ग्रेटर कैलाश या फिर फ्रैंड्स कालोनी ही हैं। लेकिन इन कालोनियों से सौ गुना ज्यादा कोठिया लखनऊ की इन कालोनियों में हैं।


मगर समय के दबाव में कोठियां बदल रही हैं। रहने वाले कम हो गए हैं। कुछ ने कोठियों में एटीएम खुलवा दिये हैं तो कुछ ने क्रेश और सलून। हर शहर के लोग अपने शहर को कम समझते हैं। उन्हें लगता है कि यहां कुछ नहीं है। इसलिए बच्चे भी पढ़ाई के समय से ही घर से बाहर रहने लगे हैं। नौकरियां कम है इसलिए भी नौजवान नहीं रहते। नतीजा कोठियां खाली हो रही हैं। इसलिए अब लोग अपार्टमेंट की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। कुछ तस्वीरें भी लगा रहा हूं आपके लिए ताकी पैटर्न समझ में आ सके।