(दोस्तों,आश्राम जाम पर मेरा यह ब्लाग धारावाहिक अब रवानगी में लौट रहा है। आप पाठक ही बतायेंगे कि कहानी आगे बढ़ रही है या नहीं। मैं किसी छप चुके उपन्यास की तरह पाठकों पर बोझ नहीं बनना चाहता। जहां लगे कि कहानी में टिव्स्ट नहीं है बता दीजिए, हम नए मोड़ की तरफ मुड़ जाएंगे)
आश्रम जाम लंबा होने लगा था। इतना लंबा की आक्षम की लंबाई एयरपोर्ट से लेकर नोएडा तक नापी जाने लगी। जाम युग में यह आश्रम का विस्तार था।आश्रम अपने आप में एक शहर,उसके बाद राज्य बनने लगा।मूलचंद,साउथ एक्स,एम्स सब उसके ज़िले लगने लगे। आश्रम जाम को स्थाई रूप देने की सभी प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली गईं थी। सोमदत्त शर्मा को उसी दिन रिटायर होना पड़ रहा था। बर्फी बांटी जा रही थी। शर्मा जी को मलाल था कि एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर के पद पर रहते हुए वो एक ऐसा नक्शा न बना सके जिससे आश्रम को जाम से मुक्ति मिलती। उनके हर नक्शे पर एक नया फ्लाईओवर बन जाता और जाम से मुक्ति का सपना अधूरा रह जाता।
उस शाम बर्फी के साथ बीयर भी ख़ूब पी ली शर्मा जी ने। वो खुल कर कहना चाहते थे। नीतियों से लेकर नीयत तक पर गालियों का महाकाव्य रचने लगे। चिल्लाने लगे अरे तुम नहीं जानते। आश्रम को जाम से मुक्त किया जा सकता था। मैं कहता रहा इस मुख्यमंत्री को, उस मुख्यमंत्री को, ये जाम अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो लोग इन रास्तों पर अपना घर बना लेंगे। धीरे धीरे शहर से एक राज्य बन जाएगा। राष्ट्र भी बन सकता है। जाम एक विस्तारवादी योजना है। इसे उसी तरह रोकना चाहिए जैसे गांधी ने अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति को रोका था।
शर्मा जी की बाते सुनकर उनकी जगह पर नियुक्त हुए ईश्वरचंद बहल भयभीत हो गए। क्या कहते हैं शर्मा जी,क्या जाम से मुक्ति मिल सकती थी? बहल साहब के इस जवाब पर शर्मा जी ने आंखे दिखा दी। एक लार्ज बीयर गटकने के बाद बोले, मिलती अगर हम संघर्ष करते। लेकिन हम तो विदेशी सहायता की मानिंद फ्लाईओवर बनाते रहे। बहल साहब जून की तपती दोपहरी में कांप रहे थे। पसीने को पोंछने के लिए जिस अखबार को उठाया उसमें मुख्यमंत्री का बयान देख घबरा गए। सीएम ने प्रेस से कहा था कि आश्रम में लगने वाले जाम से बसे शहर को मिटा दिया जाएगा। जिन कारों में लोगों ने अपने घर बसा लिये हैं उनके पुनर्वास की योजना बनाई जाएगी।
बहल साहब रोने लगे। कहने लगे शर्मा जी मेरे साथ घोखा हुआ है। मैंने कभी सुना ही नहीं कि जाम से परेशान लोगों ने कार में अपना घर बसा लिया है। वो लंबी कारों में अकेले ड्राइविंग से उकता गए थे। बाद में फैमिली रखने लगे। बीबी बच्चे भी उनके साथ कार में ही रहते थे। तभी तो रियल इस्टेट वाले प्रोपर्टी का कारोबार छोड़ ओटोमोबिल डीलर बनने लगे हैं। शर्मा जी ने कहा बहल अभी तो पेशा बदल रहा है। कल को जाम में फंसे ये लोग ख़ुद को हिंदुस्तान से आज़ाद होने का एलान कर दें तो क्या करोगे। जानते हो इन्हें जो कुछ भी मिल रहा है उसमें हिंदुस्तान का कुछ नहीं। इनकी कारें जर्मनी की हैं। तेल अरब देशों से आता है। इन्होंने अरब देशों से आश्रम जाम में फंसे लोगों के लिए सस्ता तेल आयात किया है। पहली बार किसी मुल्क ने इस तरह के मुल्क से राजनयिक और व्यापारिक करार किये हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस बात पर बहस चल रही है कि सड़क पर बने एक मोबाइल मुल्क को मान्यता दे या नहीं।इस बीच आश्रम जाम के कारनागरिकों ने अमरीका से पैक्ड फूड का आयात शुरू कर दिया है। वो ईंधन बचाना चाहते हैं। जब से सड़क पर उनका घर बना है उन्हें घर जाने की जल्दी ही नहीं रही।
बहल साहब चिल्लाने लगे। मुझे लार्ज बीयर दो। यह तो अलगाव वाद है।एक तरह का नक्सलवाद है। गृहमंत्री को ख़त लिखूंगा। शर्मा जी आपने एक्ज़िक्यूटिव इंजनीयर के पद पर रहते हुए भारत सरकार को नहीं लिखा। शर्मा जी गुस्से में आ गए। बोले मिस्टर बहल हज़ार बार लिखा लेकिन दिल्ली सरकार को। और यह सरकार वोट की खातिर आश्रम जाम पर चुप्पी साधती रही। दिल्ली को नहीं बताने के लिए मेरा मुंह बंद किया गया। मेरा तबादला बुराड़ी करने की धमकी दी जाती थी। जहां न पब्लिक थी न पब्लिक स्कूल। क्या मैं अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाता। साउथ दिल्ली के स्कूलों के कारण मैंने राज्य सरकार की हर बात मानी। लेकिन मैं भूल गया कि मैं अपने मुल्क के साथ गद्दारी कर रहा हूं। बहल कहने लगे..हां हां शर्मा तुमने गद्दारी की है।
शर्मा जी रोने लगे। सच कहता हूं बहल मैं बुज़दिल हो गया था। कभी नहीं सोचा कि एक दिन जाम से उकताए लोग कारों में अपना घर बसा लेंगे और फिर एक दिन शहर और राज्य। मुझे नहीं मालूम था कि वो अलगाववादी रास्ते पर जा सकते हैं। मुझसे ग़लती हो गई। अच्छा हुआ मैं रिटायर हो रहा हूं। भगत सिंह की आत्मा मुझे माफ करे और तुम्हें ताकत दे कि तुम जाम में फंसे इस शहर के खिलाफ मोर्चा खोल सको। भारत सरकार की मदद कर सको।
बहल ने एक पत्रकार को फोन किया। बताने के लिए कि आप ही इस ख़बर को कर सकते हैं। फोन उठाते ही बहल का पहला सवाल था कि आप कहां हैं? अभी आइये? जवाब था हम तो आपके दफ्तर के पास ही हैं। यहीं रहते हैं और यहां से कहीं जाते नहीं। मैं अपने राज्य को छोड़ कर नहीं जाता। बहल को लगा कि पत्रकार भविष्य कुमार मज़ाक कर रहा है।शायद अब वह बीस साल दिल्ली में रहने के बाद इस शहर से अपनी वफादारी निभा रहा है। लेकिन भविष्य कुमार ने भी गुस्से में कह दिया, मिस्टर बहल,मैं अपने राज्य,जो जल्दी ही एक मुल्क बनने वाला है,का ज़िम्मेदार नागरिक हूं। जिसका नाम है आश्रम जाम। इससे पहले न तो दिल्ली न तो भारत सरकार ने हमारे दुखों को समझा। झूठे वादे करते रहे। सरकारों को लगा कि अलगाववाद सिर्फ कम सुविधा संपन्न इलाकों और लोगों के बीच पनपता है,लेकिन वो ग़लत निकले। इस बार अलगाववाद का रास्ता उन लोगों ने इख्तियार किया है जो आश्रम जाम में फंसे रहने से उकता गए थे,जो सुविधा संपन्न थे,जो गाढ़ी कमाई से टैक्स देते थे,जिनके पास बड़ी बड़ी कारें थीं,लेकिन घर पहुंचने का रास्ता नहीं था। अब हमारा राष्ट्र बनेगा तो इस जाम से मुक्ति मिलेगी। हम इस रास्ते को अपना राष्ट्र बना देंगे। दिल्ली को दिखा देंगे कि आश्रम जाम में फंसे रहने वाले लोग शर्मा और बहल की तरह बुज़दिल नहीं हैं। बहल अब फोन काट दो। मेरे स्वयंभू वित्तमंत्री का फोन आ रहा है। मैं अपने कैबिनेट का मुखिया हूं। लेकिन एक फर्क है। दिल्ली की तरह लोग मुझे प्रधानमंत्री नहीं कहते, बल्कि मैं जामपति कहलाता हूं। आश्रम जाम के इस नए राष्ट्रवाद से डरो बहल, इसकी आंधी में तुम्हारे सारे फ़र्ज़ी फ्लाईओवर उड़ जाएंगे।
मिस्टर बहल लार्ज बीयर का एक और पैग लगा कर अपनी मेज़ पर लुढ़क चुके थे। रिटायर शर्मा जी को कर्मचारियों ने आटो में डालकर डिफेन्स कालोनी के रास्ते विनय मार्ग होते हुए मुनिरका पहुंचा दिया था।
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आश्रम जाम की सत्या कथा
मास्कों पोस्टिंग के बाद जब वह दिल्ली आया तो इस शहर को देख कर बौरा गया। अपनापन ढूंढने की चाह में इस शहर की गंदी चीज़ भी उसे हीरे की तरह चमकती नज़र आने लगी। वो आश्रम चौराहे से ठीक पहले लाजपत नगर चौराहे के पास ढाबे में दाल फ्राई खाना चाहता था। दाल की छौंक की गंध उसे बार बार इस रास्ते पर ले आती। भारतीय विदेश सेवा में चुने जाने से पहले मनोज प्रकाश लाजपत नगर के ही एक जर्जर मकान में रहता था। मकान में खिड़की नहीं थी। सिर्फ दरवाज़ा था। रेल का डब्बा लगता था उसका कमरा। इस कमरे की सडांध से निकलने के बाद उसे आश्रम चौराहे पर ही खुली हवा मिलती थी। बात नब्बे के दशक की है। बाबरी मस्जिद गिर चुकी थी। राजनीति गरम हो चुकी थी। मनोज बीच रात को सेक्युलर और मुक्त आकाश की आकांक्षा में आश्रम और लाजपत नगर के बीच टहलने लगता था। रिंग रोड के दोनों किनारे पर बने मकान को लेकर वह पूंजीवाद के प्रति क्रिटिकल हो जाता था। मार्क्स और मनमोहन सिंह के बीच के द्वंदवाद को समझते समझते उसकी जवानी अपना मतलब ढूंढ रही थी।
उसका एक और मित्र आकाश नया नया सिगरेट पीना सीख रहा था। उसके लिए यह जगह एक किस्म की आज़ादी थी। तब न तो लाजपत नगर चौराहे पर कोई फ्लाईओवर था न आश्रम पर। वो ज़माना कुछ और था जब जाम में फंसे लोग अख़बारों में पढ़ा करते थे कि आश्रम फ्लाईओवर का काम कब पूरा होगा। कब इस जाम से मुक्ति मिलेगी। मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुष्मा स्वराज सबने कहा था कि मस्जिद गिरने का गम आश्रम पर बनने वाले फ्लाईओवर से हलका हो जाएगा। यह वो समय था जब पुल और सड़क के सहारे अपनी राजनीति चमकाने का दौर शुरू हो रहा था। विकास की राजनीति की ओट में सियासत के झूठे बर्तन मांजे जा रहे थे। मनोज प्रकाश और आकाश सिगरेट पीते पीते यही सोचा करते कि रात को दिल्ली देखने का अपना ही मज़ा है। बिहार में ऐसी रात तो होती ही नहीं। लालू के राज में जब से पिछड़ों को आवाज़ मिली है तब से वहां बाकी चीज़ों का बेड़ा गर्क हो गया है। कम से कम लाजपत नगर से लेकर आश्रम के बीच का रास्ता उन्हें काफी खुला लगता। पूरे भरोसे के साथ सिगरेट पीते टहला करते थे कि इस वक्त तो कोई नहीं देखेगा। जवानी में सिगरेट सेवन कितना भी बेफ़िक्री का आलम क्यों न हो लेकिन इस एक फ़िक्र के बिना सिगरेट नहीं पी जा सकती।
चुटकी लेते हुए आकाश मनोज से पूछ बैठा,यार तुम कम्युनिस्ट ही सिनिकल क्यों होते हैं? मनोज का जवाब था क्योंकि हम क्रिटिकल होते हैं। मनोज कहने लगा पता है सीताराम येचुरी भी एक दिन इसी जाम में होगा। उसकी गाड़ी फंस जाएगी। आकाश बोल उठा साले ये तो तुम्हारा नेता है। तुम तो इसके लिए पोस्टर लगाते हो, नारे लिखते हो। मनोज ने सिगरेट का कश अंदर तक खींचा और कहा कि पता है कम्युनिस्ट आंदोलन सिर्फ एक स्लोगन साहित्य है। साहित्य से विचारधारा नहीं पनपती। प्रकाशक पनपते हैं। आलोचक पलते हैं। पता है कि दास कैपिटल के प्रसार के लिए कितने पेड़ काट कर लाखों प्रिंट छापे गए, कितने लाइब्रेरियन को कमीशन दिया गया। तुम्हें कुछ नहीं पता। लोकतत्र से कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं लड़ सकता। वो गठबंधन का हिस्सा होकर अमरीकी नीतियों का विरोध ही कर सकेगा। आने वाले वक्त में जब हरकिशन सिंह सुरजीत बूढ़े हो जाएंगे तब सीताराम यही करेंगे। सरकार में रह कर उसे धमकी देंगे।
बातचीत करते करते दोनों भोगल तक चले जाते और धुंआ छोड़ते छोड़ते वापस आ जाते। यह सड़क उनके जवान होने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने लगी। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि फ्लाईओवर बनने से रिंग रोड के इस हिस्से की किस्मत बदल जाएगी। कुछ साल बाद उनकी किस्मत बदल गई। मनोज प्रकाश विदेश सेवा के लिए चुन लिया गया और आकाश किसी कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट हो गया। इस बीच फ्लाईओवर का काम पूरा हो गया।
लेकिन तब दोनों दिन के उजाले में जाम के कारण ही सड़क आसानी से पार कर लेते। और पहुंच जाते उस ढाबे पर। दाल तड़का और तंदूरी रोटी खाने। दाल की छौंक दोनों के ज़हन में इस कदर उतर गई कि उसकी याद हर वक्त सताने लगती। एक बार आकाश थाईलैंड में मसाज करवा रहा था तभी वह दाल की छौंक की गंध से तड़प उठा। वो चिल्लाने लगा कि आश्रम पहुंचना है, वहां फ्लाईओवर से उतरते ही लाजपत नगर चौराहे पर एक ढाबा है जहां कोई उसके लिए दाल तड़का बना रहा है। मसाज करने वाली मोहतरमा को लगा कि उसका कस्टमर पगला गया है।
छौंक की इस गंध से मनोज प्रकाश भी परेशान रहा करता था। लेनिनग्राद की चौड़ी और विशालकाय सड़के भी वो मज़ा नहीं देती जो मजा उसे आश्रम और लाजपत नगर के बीच के रास्ते को याद कर मिलता। वो अक्सर अपनी पत्नी को कहता दिल्ली चलना तुम्हें वो सड़क दिखाऊंगा। मूलचंद और आश्रम के बीच का हिस्सा मेरा है। वहां से गुज़रना किसी सपने को बार बार हासिल करने जैसा लगता है। मास्को से दिल्ली लौटते ही मनोज प्रकाश डीएनडी एक्सप्रैस वे से सीधा आश्रम फ्लाईओवर पहुंचा। वहां से लाजपत नगर फ्लाईओवर पर पहुंच कर नीचे उस ढाबे को देखने लगा। दाल तड़के की गंध ऊपर तक आ रही थी। सीएनजी के कारण प्रदूषण मुक्त दिल्ली में दाल की छौंक की गंध मिलते ही मनोज प्रकाश को उसका वजूद मिल गया था। उसकी पत्नी हैरानी से देखने लगी। मन ही मन सोचने लगी कि क्या दाल की गंध के कारण ही आश्रम से इतना रोमांस है या फिर कहीं कोई और तो नहीं है। मनोज हंसने लगा। कहने लगा कि बिहार से आकर हम अपने में ही डूबे हुए थे। किसी से प्रेम करने का वक्त ही नहीं मिला। धीरे धीरे मनोज इसी रास्ते से विदेश मंत्रालय जाने लगा। उसे प्रगति मैदान से इंडिया गेट होते हुए विदेश मंत्रालय जाना अच्छा नहीं लगता था।
और वापसी के इसी क्रम में एक दिन मनोज प्रकाश ने कानून तोड़ दिया। हैंड्स फ्री कान में लगाई और मुझे फोन कर दिया। अरे तुम्हें पता है मैं कहां हूं। सवाल में ही जवाब था। उसकी बेकरारी बता रही थी कि वो आश्रम के जाम में है। और उसे कोई परेशानी नहीं। मनोज कहने लगा परेशानी किस बात की। याद नहीं नब्बे के दशक के उन दिनों में भी तो ऐसा ही जाम लगा करता था। तब कौन सा यहां से गाड़ियां दनदनाती हुई गुज़रा करती थी। मनोज ने आईआईटी के उस प्रोफेसर के एक संपादकीय लेख की याद दिलाते हुए कहा कि तुम भूल गए उस प्रोफेसर ने कहा था कि फ्लाईओवर से ट्रैफिक जाम की समस्या का हल नहीं होता। मैंने कहा हां, उसकी बात तो सही निकली यार।
लेकिन वो इस बेकार बहस से निकल कर दाल तड़का पर आना चाहता था। तभी कार की पीछली सीट पर रखा उसका ब्रीफकेस अचानक मिरर में दिखना बंद हो गया। मनोज ने हैंड्स फ्री फेंक दिया।
तीन दिन बाद उसने पार्टी में यह कथा सुनाई। उसका ब्रीफकेस कोई लेकर भाग चुका था। पैसा तो नहीं था लेकिन पासपोर्ट, चेकबुक और विदेश मंत्रालय के कुछ कागज़ात थे। सोनीपत से उसे फोन आया कि जनाब आपका ब्रीफकेस यहां पड़ा है। मनोज तुरंत किराये की टैक्सी से वहां पहुंचा। पता चला कि डीटीसी बस से यह ब्रीफकेस मिला। खोला तो सब कुछ था। मनोज को हैरानी हुई। ब्रीफकेस सोनीपत कैसे। यह तो आश्रम जाम से गायब हुआ था। तभी उसकी नज़र एक खत पर पड़ी। शायद चोर ने लिखी थी।
प्रिय मनोज प्रकाश जी
आश्रम जाम में फंसी कारों से ब्रीफकेस उड़ाने का यह मेरा पहला प्रयास नहीं था। मुझे नहीं मालूम था कि आश्रम जाम में फंसे हुए लोग इतने कंगाल भी हो सकते हैं। उनके पास चेकबुक तो होता है मगर ब्रीफकेस में आठ आना नहीं। छह लाख की कार और जाम में फंसे होने का दर्द समझता हूं और बहुत अफसोस के साथ ब्रीफकेस लौटा रहा हूं। आगे से किसी और रास्ते पर ब्रीफकेस उड़ाया करूंगा। इस चोरी से तो अच्छा है कि मैं दाल रोटी ही खाकर गुज़ारा कर लूं।
आपका चोर
मनोज प्रकाश के होश उड़ गए। दाल की छौंक की गंध एक बार के लिए नाक और ज़हन से जाती रही। वो सोनीपत से लौट रहा था। नेशनल हाईवे पर उसकी कार दौड़ रही थी। फिर भी उसे लग रहा था कि वह कहीं फंसा हुआ है। उसकी कार नहीं चल रही। वो अब दाल नहीं खाना चाहता था। दिल्ली लौटते ही उसने विदेश सचिव से मुलाकात का वक्त मांगा। फिर से मास्को पोस्टिंग हो गई।
उसका एक और मित्र आकाश नया नया सिगरेट पीना सीख रहा था। उसके लिए यह जगह एक किस्म की आज़ादी थी। तब न तो लाजपत नगर चौराहे पर कोई फ्लाईओवर था न आश्रम पर। वो ज़माना कुछ और था जब जाम में फंसे लोग अख़बारों में पढ़ा करते थे कि आश्रम फ्लाईओवर का काम कब पूरा होगा। कब इस जाम से मुक्ति मिलेगी। मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुष्मा स्वराज सबने कहा था कि मस्जिद गिरने का गम आश्रम पर बनने वाले फ्लाईओवर से हलका हो जाएगा। यह वो समय था जब पुल और सड़क के सहारे अपनी राजनीति चमकाने का दौर शुरू हो रहा था। विकास की राजनीति की ओट में सियासत के झूठे बर्तन मांजे जा रहे थे। मनोज प्रकाश और आकाश सिगरेट पीते पीते यही सोचा करते कि रात को दिल्ली देखने का अपना ही मज़ा है। बिहार में ऐसी रात तो होती ही नहीं। लालू के राज में जब से पिछड़ों को आवाज़ मिली है तब से वहां बाकी चीज़ों का बेड़ा गर्क हो गया है। कम से कम लाजपत नगर से लेकर आश्रम के बीच का रास्ता उन्हें काफी खुला लगता। पूरे भरोसे के साथ सिगरेट पीते टहला करते थे कि इस वक्त तो कोई नहीं देखेगा। जवानी में सिगरेट सेवन कितना भी बेफ़िक्री का आलम क्यों न हो लेकिन इस एक फ़िक्र के बिना सिगरेट नहीं पी जा सकती।
चुटकी लेते हुए आकाश मनोज से पूछ बैठा,यार तुम कम्युनिस्ट ही सिनिकल क्यों होते हैं? मनोज का जवाब था क्योंकि हम क्रिटिकल होते हैं। मनोज कहने लगा पता है सीताराम येचुरी भी एक दिन इसी जाम में होगा। उसकी गाड़ी फंस जाएगी। आकाश बोल उठा साले ये तो तुम्हारा नेता है। तुम तो इसके लिए पोस्टर लगाते हो, नारे लिखते हो। मनोज ने सिगरेट का कश अंदर तक खींचा और कहा कि पता है कम्युनिस्ट आंदोलन सिर्फ एक स्लोगन साहित्य है। साहित्य से विचारधारा नहीं पनपती। प्रकाशक पनपते हैं। आलोचक पलते हैं। पता है कि दास कैपिटल के प्रसार के लिए कितने पेड़ काट कर लाखों प्रिंट छापे गए, कितने लाइब्रेरियन को कमीशन दिया गया। तुम्हें कुछ नहीं पता। लोकतत्र से कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं लड़ सकता। वो गठबंधन का हिस्सा होकर अमरीकी नीतियों का विरोध ही कर सकेगा। आने वाले वक्त में जब हरकिशन सिंह सुरजीत बूढ़े हो जाएंगे तब सीताराम यही करेंगे। सरकार में रह कर उसे धमकी देंगे।
बातचीत करते करते दोनों भोगल तक चले जाते और धुंआ छोड़ते छोड़ते वापस आ जाते। यह सड़क उनके जवान होने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने लगी। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि फ्लाईओवर बनने से रिंग रोड के इस हिस्से की किस्मत बदल जाएगी। कुछ साल बाद उनकी किस्मत बदल गई। मनोज प्रकाश विदेश सेवा के लिए चुन लिया गया और आकाश किसी कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट हो गया। इस बीच फ्लाईओवर का काम पूरा हो गया।
लेकिन तब दोनों दिन के उजाले में जाम के कारण ही सड़क आसानी से पार कर लेते। और पहुंच जाते उस ढाबे पर। दाल तड़का और तंदूरी रोटी खाने। दाल की छौंक दोनों के ज़हन में इस कदर उतर गई कि उसकी याद हर वक्त सताने लगती। एक बार आकाश थाईलैंड में मसाज करवा रहा था तभी वह दाल की छौंक की गंध से तड़प उठा। वो चिल्लाने लगा कि आश्रम पहुंचना है, वहां फ्लाईओवर से उतरते ही लाजपत नगर चौराहे पर एक ढाबा है जहां कोई उसके लिए दाल तड़का बना रहा है। मसाज करने वाली मोहतरमा को लगा कि उसका कस्टमर पगला गया है।
छौंक की इस गंध से मनोज प्रकाश भी परेशान रहा करता था। लेनिनग्राद की चौड़ी और विशालकाय सड़के भी वो मज़ा नहीं देती जो मजा उसे आश्रम और लाजपत नगर के बीच के रास्ते को याद कर मिलता। वो अक्सर अपनी पत्नी को कहता दिल्ली चलना तुम्हें वो सड़क दिखाऊंगा। मूलचंद और आश्रम के बीच का हिस्सा मेरा है। वहां से गुज़रना किसी सपने को बार बार हासिल करने जैसा लगता है। मास्को से दिल्ली लौटते ही मनोज प्रकाश डीएनडी एक्सप्रैस वे से सीधा आश्रम फ्लाईओवर पहुंचा। वहां से लाजपत नगर फ्लाईओवर पर पहुंच कर नीचे उस ढाबे को देखने लगा। दाल तड़के की गंध ऊपर तक आ रही थी। सीएनजी के कारण प्रदूषण मुक्त दिल्ली में दाल की छौंक की गंध मिलते ही मनोज प्रकाश को उसका वजूद मिल गया था। उसकी पत्नी हैरानी से देखने लगी। मन ही मन सोचने लगी कि क्या दाल की गंध के कारण ही आश्रम से इतना रोमांस है या फिर कहीं कोई और तो नहीं है। मनोज हंसने लगा। कहने लगा कि बिहार से आकर हम अपने में ही डूबे हुए थे। किसी से प्रेम करने का वक्त ही नहीं मिला। धीरे धीरे मनोज इसी रास्ते से विदेश मंत्रालय जाने लगा। उसे प्रगति मैदान से इंडिया गेट होते हुए विदेश मंत्रालय जाना अच्छा नहीं लगता था।
और वापसी के इसी क्रम में एक दिन मनोज प्रकाश ने कानून तोड़ दिया। हैंड्स फ्री कान में लगाई और मुझे फोन कर दिया। अरे तुम्हें पता है मैं कहां हूं। सवाल में ही जवाब था। उसकी बेकरारी बता रही थी कि वो आश्रम के जाम में है। और उसे कोई परेशानी नहीं। मनोज कहने लगा परेशानी किस बात की। याद नहीं नब्बे के दशक के उन दिनों में भी तो ऐसा ही जाम लगा करता था। तब कौन सा यहां से गाड़ियां दनदनाती हुई गुज़रा करती थी। मनोज ने आईआईटी के उस प्रोफेसर के एक संपादकीय लेख की याद दिलाते हुए कहा कि तुम भूल गए उस प्रोफेसर ने कहा था कि फ्लाईओवर से ट्रैफिक जाम की समस्या का हल नहीं होता। मैंने कहा हां, उसकी बात तो सही निकली यार।
लेकिन वो इस बेकार बहस से निकल कर दाल तड़का पर आना चाहता था। तभी कार की पीछली सीट पर रखा उसका ब्रीफकेस अचानक मिरर में दिखना बंद हो गया। मनोज ने हैंड्स फ्री फेंक दिया।
तीन दिन बाद उसने पार्टी में यह कथा सुनाई। उसका ब्रीफकेस कोई लेकर भाग चुका था। पैसा तो नहीं था लेकिन पासपोर्ट, चेकबुक और विदेश मंत्रालय के कुछ कागज़ात थे। सोनीपत से उसे फोन आया कि जनाब आपका ब्रीफकेस यहां पड़ा है। मनोज तुरंत किराये की टैक्सी से वहां पहुंचा। पता चला कि डीटीसी बस से यह ब्रीफकेस मिला। खोला तो सब कुछ था। मनोज को हैरानी हुई। ब्रीफकेस सोनीपत कैसे। यह तो आश्रम जाम से गायब हुआ था। तभी उसकी नज़र एक खत पर पड़ी। शायद चोर ने लिखी थी।
प्रिय मनोज प्रकाश जी
आश्रम जाम में फंसी कारों से ब्रीफकेस उड़ाने का यह मेरा पहला प्रयास नहीं था। मुझे नहीं मालूम था कि आश्रम जाम में फंसे हुए लोग इतने कंगाल भी हो सकते हैं। उनके पास चेकबुक तो होता है मगर ब्रीफकेस में आठ आना नहीं। छह लाख की कार और जाम में फंसे होने का दर्द समझता हूं और बहुत अफसोस के साथ ब्रीफकेस लौटा रहा हूं। आगे से किसी और रास्ते पर ब्रीफकेस उड़ाया करूंगा। इस चोरी से तो अच्छा है कि मैं दाल रोटी ही खाकर गुज़ारा कर लूं।
आपका चोर
मनोज प्रकाश के होश उड़ गए। दाल की छौंक की गंध एक बार के लिए नाक और ज़हन से जाती रही। वो सोनीपत से लौट रहा था। नेशनल हाईवे पर उसकी कार दौड़ रही थी। फिर भी उसे लग रहा था कि वह कहीं फंसा हुआ है। उसकी कार नहीं चल रही। वो अब दाल नहीं खाना चाहता था। दिल्ली लौटते ही उसने विदेश सचिव से मुलाकात का वक्त मांगा। फिर से मास्को पोस्टिंग हो गई।
आश्रम जाम का आध्यात्म- पांच
आश्रम में फंसे हुए दो घंटे हो चुके थे। घर फोन कर पत्नी को बता दिया था कि आने में देर होगी। दफ्तर भी फोन कर चुका था। रेडियो जॉकी की बातें अब कान के बगल से गुज़र रही थीं। सुनाई दे रही थीं मगर समझ नहीं आ रहा था। इतने तनाव में जाम में फंसी कारों के पीछले शीशे पर कुछ लिखा दिखाई देने लगा। सभी कारों के शीशे पर राम लिखा नज़र आया। मैं हैरान हो गया। इतने सारे राम जाम में। वो लड़की जिसे मैंने ट्रेड फेयर में टाटा की नैनो कार के बगल में नंगी टांगों के साथ देखा था वो भी जाम में फंसी थी। वो तो ट्रेड फेयर में भी फंस गई थी। शुक्र है नेता नहीं थे। चीयर्सलीडर के कपडों से बहुत पहले उसने कम कपड़ों में अपनी कमसिन अदाओं से कार को निम्न मध्यमवर्ग की आकांक्षाओं में पहुंचा दिया था। ट्रेड फेयर में नैनो कार के आने के बाद जाम लगने की आशंकाओं को यही लड़की अपनी अदाओं से खारिज कर रही थी। मैं भी आश्रम जाम की आशंका से बहुत दूर निकल आया। घूमती कार के साथ स्थायी भाव में खड़ी उस मॉडल ने बता दिया कि समस्या कार में नहीं बल्कि सरकार में है। कार नहीं ख़रीदने से भी जाम लगता रहा है। उन तमाम शहरों के चौराहों पर जहां अभी कार का आना बाकी है,वहां रिक्शे ठेले जाम लगाते हैं। दिल्ली के लोग क्यों डरें। आने दो नैनो को और आने से पहले देखने दो इन नयनों वालियों को। इनके होने से जाम का आध्यात्म कितना रोमांचक हो जाता है।
पुरानी स्मृतियों से दिमाग फारिग हुआ तो वो लड़की नज़र आने लगी। इस बार कम कपड़ों में नहीं थी। उसने रामनामी पहन लिया था। राम राम राम। अपनी कुर्ती पर अनगिनत बार राम नाम का वरण कर लिया था। घर के लिए ख़रीदे गए आशीर्वाद ब्रांड के आटे को उसने गरम बोनट पर रख दिया। ताकि भुन कर प्रसाद बन जाए। मुझे देखते ही पहचान लिया। आप तो ट्रेड फेयर में भी थे न। मैंने सर हिलाया तो बोली कि धीरज रखो। यह जाम सदियों तक चलेगा। आध्यात्म की शरण में आ जाओ। तुम भी अपनी कार के पीछे राम लिख डालो। मैंने कहा ज़रूरत नहीं है। मैं भी दुनिया को मुक्ति का मार्ग बताने वाला पत्रकार हूं। प्रेस लिखा है अपनी कार के शीशे पर। पुलिस वाला डरता है।चोर सोचता है कि चुरायें या छोड़ दें। पार्किंग वाला पैसे नहीं मांगता। प्रेस और राम की ताकत की तुलना मत करो। मेरे इस जवाब पर कार वाली मॉडल बिदक गई। कहा कि इस जाम से मुक्ति सिर्फ आध्यात्म के रास्ते मिलेगी। तुम राम की शरण में आ जाओ। कब तक जाम के सांसारिक दर्द से कराहते रहोगे। शारीरिक पीड़ा को भुला कर आध्यात्मिक शांति हासिल करो।
मैं उसके हर प्रस्ताव को खारिज कर रहा था। जाम से मुक्ति के लिए राम की शरण में नहीं जाऊंगा। ज़रूर यह कोई मज़ाक है। जंगलों में भटके राम को ट्रैफिक जाम का क्या अनुभव। लेकिन वो मॉडल ठीक कहती थी। जीवन में जाम के कारण भजन का वक्त नहीं रहा। तो क्यों न जाम में भी भजन का मार्ग अपना लें। मगर राम ही क्यों। तभी मेरी नज़र आश्रम से लगे सिद्धार्थ एक्सटेंशन की दीवार से लगे एक पोस्टर पर पड़ी। मां आनंदमयी का दिल्ली आगमन। एक ऑटो पर लिखा देखा- धन धन गुरु तेरा ही आसरा। सामने एक टाटा चार सौ सात खड़ी थी। भगवती जागरण के बाद दुर्गा, हनुमान और गणेश को लाद कर साहनी घोड़ी वाला अगले पड़ाव की ओर जाने वाला था। लेकिन जाम में फंस गया था। मूर्तियों को संभाले कारीगर भगवान पर ही तरस खा रहे थे। उनसे मांगने की बजाए कहने लगे कि प्रभु सरकार और इंजीनियर भी तो आपने ही पैदा किये हैं। फिर हमीं क्यों सरकार को गाली दें, उसे बदलें। आप भी तो कुछ कीजिए न।
इस बीच कार वाली मॉडल फिर कहने लगी, मुझे भी लगता था कि कम कपड़ों में आज़ादी है। अब सोचती हूं कि मन की आज़ादी कपड़ों में नहीं बल्कि भक्ति में है। कार हो, कम कपड़े हों और आश्रम जाम में फंस गए तो आधुनिकता गई तेल लेने। ऐसे में तो सिर्फ लिपस्टिक लगाने का ही वक्त मिलेगा। और कब तक होठों को चमकाते रहें। क्यों न भजन में मन रमा दे। और जाम की पीड़ा को भुला दें।
इस बीच कार की बोनट पर आशीर्वाद ब्रांड का आटा भुन कर प्रसाद बन चुका था। मॉडल ने सबको बांटना शुरू कर दिया। मैंने हाथ बढ़ा दिया और चरणामृत पी ली। घऱ पहुंचने से पहले आध्यात्म और आश्रम का यह रोमांस तनावों से मुक्ति देने लगा। नैनो कार की वेदना कम होने लगी। उस ट्रक पर लिखा था- शंकर तेरा सहारा। ज़माने से ट्रक वाले शंकर के सहारे गंगा तेरा पानी अमृत का जाप करते हुए शहरों को पार करते रहे हैं। आश्रम जाम से गुज़रने वाली कारों ने भी अब भगवान का सहारा ढूंढ लिया है। कार के पीछले शीशे पर राम का नाम लिख लिया है।
पुरानी स्मृतियों से दिमाग फारिग हुआ तो वो लड़की नज़र आने लगी। इस बार कम कपड़ों में नहीं थी। उसने रामनामी पहन लिया था। राम राम राम। अपनी कुर्ती पर अनगिनत बार राम नाम का वरण कर लिया था। घर के लिए ख़रीदे गए आशीर्वाद ब्रांड के आटे को उसने गरम बोनट पर रख दिया। ताकि भुन कर प्रसाद बन जाए। मुझे देखते ही पहचान लिया। आप तो ट्रेड फेयर में भी थे न। मैंने सर हिलाया तो बोली कि धीरज रखो। यह जाम सदियों तक चलेगा। आध्यात्म की शरण में आ जाओ। तुम भी अपनी कार के पीछे राम लिख डालो। मैंने कहा ज़रूरत नहीं है। मैं भी दुनिया को मुक्ति का मार्ग बताने वाला पत्रकार हूं। प्रेस लिखा है अपनी कार के शीशे पर। पुलिस वाला डरता है।चोर सोचता है कि चुरायें या छोड़ दें। पार्किंग वाला पैसे नहीं मांगता। प्रेस और राम की ताकत की तुलना मत करो। मेरे इस जवाब पर कार वाली मॉडल बिदक गई। कहा कि इस जाम से मुक्ति सिर्फ आध्यात्म के रास्ते मिलेगी। तुम राम की शरण में आ जाओ। कब तक जाम के सांसारिक दर्द से कराहते रहोगे। शारीरिक पीड़ा को भुला कर आध्यात्मिक शांति हासिल करो।
मैं उसके हर प्रस्ताव को खारिज कर रहा था। जाम से मुक्ति के लिए राम की शरण में नहीं जाऊंगा। ज़रूर यह कोई मज़ाक है। जंगलों में भटके राम को ट्रैफिक जाम का क्या अनुभव। लेकिन वो मॉडल ठीक कहती थी। जीवन में जाम के कारण भजन का वक्त नहीं रहा। तो क्यों न जाम में भी भजन का मार्ग अपना लें। मगर राम ही क्यों। तभी मेरी नज़र आश्रम से लगे सिद्धार्थ एक्सटेंशन की दीवार से लगे एक पोस्टर पर पड़ी। मां आनंदमयी का दिल्ली आगमन। एक ऑटो पर लिखा देखा- धन धन गुरु तेरा ही आसरा। सामने एक टाटा चार सौ सात खड़ी थी। भगवती जागरण के बाद दुर्गा, हनुमान और गणेश को लाद कर साहनी घोड़ी वाला अगले पड़ाव की ओर जाने वाला था। लेकिन जाम में फंस गया था। मूर्तियों को संभाले कारीगर भगवान पर ही तरस खा रहे थे। उनसे मांगने की बजाए कहने लगे कि प्रभु सरकार और इंजीनियर भी तो आपने ही पैदा किये हैं। फिर हमीं क्यों सरकार को गाली दें, उसे बदलें। आप भी तो कुछ कीजिए न।
इस बीच कार वाली मॉडल फिर कहने लगी, मुझे भी लगता था कि कम कपड़ों में आज़ादी है। अब सोचती हूं कि मन की आज़ादी कपड़ों में नहीं बल्कि भक्ति में है। कार हो, कम कपड़े हों और आश्रम जाम में फंस गए तो आधुनिकता गई तेल लेने। ऐसे में तो सिर्फ लिपस्टिक लगाने का ही वक्त मिलेगा। और कब तक होठों को चमकाते रहें। क्यों न भजन में मन रमा दे। और जाम की पीड़ा को भुला दें।
इस बीच कार की बोनट पर आशीर्वाद ब्रांड का आटा भुन कर प्रसाद बन चुका था। मॉडल ने सबको बांटना शुरू कर दिया। मैंने हाथ बढ़ा दिया और चरणामृत पी ली। घऱ पहुंचने से पहले आध्यात्म और आश्रम का यह रोमांस तनावों से मुक्ति देने लगा। नैनो कार की वेदना कम होने लगी। उस ट्रक पर लिखा था- शंकर तेरा सहारा। ज़माने से ट्रक वाले शंकर के सहारे गंगा तेरा पानी अमृत का जाप करते हुए शहरों को पार करते रहे हैं। आश्रम जाम से गुज़रने वाली कारों ने भी अब भगवान का सहारा ढूंढ लिया है। कार के पीछले शीशे पर राम का नाम लिख लिया है।
आश्रम जाम का रोमांस- मुलाक़ात रागदरबारी से
सड़क के कोरिडोर बनने के इस नए दौर में आश्रम फ्लाईओवर से उतरते हुए बेचैनी बढ़ती जा रही थी। जाम के इस साझा सामूहिक दर्द को अब क्यारियों में बांट दिया जाएगा। रूई की तरह सिर्फ बस वाले उड़ाने भरते निकल जाया करेंगे। बाकी लोग अपने अपने लेन में फंसे रहेंगे। सरकार की नज़र आश्रम की तरफ फिर गई तो क्या होगा। लौट रहा था दक्षिण दिल्ली के उस छोर से जहां अंबेडकरनगर, देवली गांव,खानपुर और मदनगीर के तमाम कारीगर,कामगार हरी रंग की एक शानदार सी बस में चले जा रहे थे। उनकी बस को एक सीधा और खुला रास्ता दे दिया गया है। हिंदुस्तान के मध्यमवर्ग की राजधानी दिल्ली के कारवाले कुढ़ने लगे हैं। उनकी कार के कंधे एक दूसरे से टकराने लगे हैं। बाइक और कारसाइकिल किनारे धकिया कर क्यारी में बंद कर दिये जा रहे हैं। सड़कों के इतिहास में पहली बार बस वालों से कार वाले जलभून रहे हैं। इसी लेन में अपनी कार में आने वाले पत्रकारों ने कलम निकाल ली। गियर बदलने से पहले वो ख़बर लिख दी। बीआरटी कोरिडोर को लेकर बवाल मचा दिया। उधर बसों में धक्का मुक्की खा रहे लोगों ने अपनी कमीज़ की क्रीज़ सीधी कर ली और महिलाओं ने बाल खोल दिए। रेडियो एफएम पर हंसोंड़ सुड आ गया। हैलो पार्टी पीपल, आज बस का सफर कैसा है। कहीं आप क्नॉट प्लेस की बजाए सैनिक फार्म तो नहीं जा रहे। हा हा...ही ही...करता हुआ सुड कहता है बेचारे कार वाले। तमाम बंदिशों का जीवन। सीट बेल्ट, सिगरेट नहीं, फोन नहीं, और चलो तो चींटी की तरह,एक दूसरे के पीछे। बस वाले ठीक है। लंबी बस में आगे पीछे घूम सकते है। बाय बाय पार्टी पीपल।
रागदरबारी की वो पहली पंक्ति याद आने लगी- शहर का किनारा। उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था। लेखक श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं चालू फैशन के हिसाब से ड्राइवर ने ट्रक का दाहिना दरवाज़ा खोलकर डैने की तरह फैला दिया था। इससे ट्रक की ख़ूबसूरती बढ़ गयी थी, साथ ही यह ख़तरा मिट गया था कि उसके वहां होते हुए कोई दूसरी सवारी भी सड़क के ऊपर से निकल सकती है। लेखक बता रहे हैं कि सड़क का खुलापन और ड्राइवर की दादागिरी में कैसा गहरा संबंध है। अब सड़क के कोरिडोर बनने के ज़माने में श्रीलाल शुक्ल क्या लिखेंगे पता नहीं। सोचता हुए अपनी कार का हैंडब्रेक ऑन कर दिया। लग रहा था कि श्रीलाल शुक्ल कह रहे हैं कि ऐ आश्रम जाम के लेखक देखो मुझे कितना मज़ा आ रहा है, देखकर इस जाम में कि ड्राइवर ट्रक को कैसे सहमा सहमा सा सरका रहा है। लगता नहीं कि वही ट्रक और ड्राइवर है जिस मैंने डैने फैलाये दौड़ते देखा था। भला हो इस ट्रैफिक जाम का जिसने स़ड़क पर सबको बराबर कर दिया है। क्या राजा क्या रंक सब फंसे है। अतिसुंदर। मगर बातें अतीत की हो चुकी हैं। भारत की रचना संसार में अब सड़क को खुलेपन के प्रतीक के रुप में नहीं बल्कि संकीर्ण सफर के रुप में देखने का वक्त आ गया है। हर लेखक को आश्रम जाम से गुज़रना ही होगा। बिना जाम में गए रचना में नई जान नहीं आ सकती।
आज हर शहर का अपना एक आश्रम है जहां कई दिशाओं से आने वाले लोगों की रफ्तार थम जाती है। गंगासागर जैसा लगता है। हर शाम को पास से गुज़रती सभी मॉडल की कारों को एक जगह देखकर यकीन हो जाता है कि उनकी कार का मॉडल भले ही अलग हो, जाम का दर्द एक ही है। भारतीय समाज में कार का आगमन सामाजिक गतिशीलता और हैसियत की हौसला आफ़ज़ाई करने के लिए हुआ है। सामाजिक रूप से हम आगे बढ़ चुके हैं यह बताने के लिए कार से बेहतर कोई और उपभोक्ता सामान नहीं। आपके पास घर हो और कार नहीं तो आप हैसियतवालों में शुमार नहीं होंगे। घर नहीं है लेकिन कार है तो क्या बात। मगर अब कार का मतलब गतिशील होना नहीं बल्कि कार सहित किसी जाम में गतिहीन होना हो गया है। इस बीच घंटो जाम में एक ही कार में बैठे बैठे उकता चुकी उस महबूबा को मैंने उसके प्रेमी से लड़ते हुए देख लिया। मोहब्बत में आगे बढ़ने की ज़िद से कार का दरवाज़ा खुलता है। इससे पहले कि प्रेमी स्टियरिंग छोड़ कर उसे बुलाता...पीछे खड़ी कारों ने हार्न बजा कर
कार सरकाने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन बगल की सीट से उतर चुकी महबूबा की कोई मजबूरी नहीं थी। वो मोहब्बत के इस घुटन से आज़ाद हो चुकी थी। वो फंसा रह गया था। जाम में। आश्रम में। श्रीलाल शुक्ल को अपनी कथा सुनाने के लिए
रागदरबारी की वो पहली पंक्ति याद आने लगी- शहर का किनारा। उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था। लेखक श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं चालू फैशन के हिसाब से ड्राइवर ने ट्रक का दाहिना दरवाज़ा खोलकर डैने की तरह फैला दिया था। इससे ट्रक की ख़ूबसूरती बढ़ गयी थी, साथ ही यह ख़तरा मिट गया था कि उसके वहां होते हुए कोई दूसरी सवारी भी सड़क के ऊपर से निकल सकती है। लेखक बता रहे हैं कि सड़क का खुलापन और ड्राइवर की दादागिरी में कैसा गहरा संबंध है। अब सड़क के कोरिडोर बनने के ज़माने में श्रीलाल शुक्ल क्या लिखेंगे पता नहीं। सोचता हुए अपनी कार का हैंडब्रेक ऑन कर दिया। लग रहा था कि श्रीलाल शुक्ल कह रहे हैं कि ऐ आश्रम जाम के लेखक देखो मुझे कितना मज़ा आ रहा है, देखकर इस जाम में कि ड्राइवर ट्रक को कैसे सहमा सहमा सा सरका रहा है। लगता नहीं कि वही ट्रक और ड्राइवर है जिस मैंने डैने फैलाये दौड़ते देखा था। भला हो इस ट्रैफिक जाम का जिसने स़ड़क पर सबको बराबर कर दिया है। क्या राजा क्या रंक सब फंसे है। अतिसुंदर। मगर बातें अतीत की हो चुकी हैं। भारत की रचना संसार में अब सड़क को खुलेपन के प्रतीक के रुप में नहीं बल्कि संकीर्ण सफर के रुप में देखने का वक्त आ गया है। हर लेखक को आश्रम जाम से गुज़रना ही होगा। बिना जाम में गए रचना में नई जान नहीं आ सकती।
आज हर शहर का अपना एक आश्रम है जहां कई दिशाओं से आने वाले लोगों की रफ्तार थम जाती है। गंगासागर जैसा लगता है। हर शाम को पास से गुज़रती सभी मॉडल की कारों को एक जगह देखकर यकीन हो जाता है कि उनकी कार का मॉडल भले ही अलग हो, जाम का दर्द एक ही है। भारतीय समाज में कार का आगमन सामाजिक गतिशीलता और हैसियत की हौसला आफ़ज़ाई करने के लिए हुआ है। सामाजिक रूप से हम आगे बढ़ चुके हैं यह बताने के लिए कार से बेहतर कोई और उपभोक्ता सामान नहीं। आपके पास घर हो और कार नहीं तो आप हैसियतवालों में शुमार नहीं होंगे। घर नहीं है लेकिन कार है तो क्या बात। मगर अब कार का मतलब गतिशील होना नहीं बल्कि कार सहित किसी जाम में गतिहीन होना हो गया है। इस बीच घंटो जाम में एक ही कार में बैठे बैठे उकता चुकी उस महबूबा को मैंने उसके प्रेमी से लड़ते हुए देख लिया। मोहब्बत में आगे बढ़ने की ज़िद से कार का दरवाज़ा खुलता है। इससे पहले कि प्रेमी स्टियरिंग छोड़ कर उसे बुलाता...पीछे खड़ी कारों ने हार्न बजा कर
कार सरकाने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन बगल की सीट से उतर चुकी महबूबा की कोई मजबूरी नहीं थी। वो मोहब्बत के इस घुटन से आज़ाद हो चुकी थी। वो फंसा रह गया था। जाम में। आश्रम में। श्रीलाल शुक्ल को अपनी कथा सुनाने के लिए
आश्रम जाम का एकांत- तीन
घर पहुंचना नहीं चाहता था। दफ्तर रूकना नहीं चाहता था। वो कहीं और रूकना चाहता था। लेकिन दिल्ली के तमाम रास्ते रूके पड़े थे। देर से घर पहुंचने से पहले के वक्त को अपने हिसाब से गुज़ारने की ख़्वाहिश उसे आश्रम चौक पर ले आई। मूलचंद से पहले लाजपत नगर फ्लाईओवर चढ़ा फिर उससे लुढ़कते हुए आश्रम फ्लाईओवर पर। कार का स्टीरियो मद्धम मद्धम संगीत को उसकी रूह में उतार रहा था। घर दफ्तर के तनाव भरे लम्हों के बीच आज जाम ने उसे वो एकांत दिया जिसकी तलाश में उसने न जाने कितनी सिगरेट पी, कितने दोस्तों को फोन किया।
तारे ज़मीन पर का गाना बज रहा था। पर मैं अंधेरे से डरता हूं मैं मां। राकेश सुन रहा था और रो रहा था। यह गाना उसे आश्रम से उड़ा कर सीधे पटना के उस आंगन में ले जा चुका था जहां उसके घुटनों ने अभी रेंगने से फुर्सत पाकर चलना सीखा था। वो अपनी कमज़ोरियों और परेशानियों को उसी तरह कहना चाहता था जैसे वह बचपन में मां को देखते ही बक देता था। मम्मी देखो न राजू ने मार दिया। मैं गिर गया और चोट आ गई। खूब रोता रहा। अब वह किसी से नहीं कह पाता। दोस्तों से नहीं। पत्नी से नहीं। राकेश अपने भीतर के जाम से निकल रहा था। उसके भीतर एक ऐसा रास्ता खाली हो रहा था...जहां उसका मन एक नई रफ्तार पकड़ने के लिए बेचैन था। तभी बम बम बोले...मस्ती में डोले का गाना आते ही वह झूमने लगा। अंगुलियों से स्टीयरिंग पर थाप देने लगा था। उसकी कार वहीं खड़ी थी जहां थी। इस बीच सिर्फ एक लंबा वक्त ही गुज़रा था लेकिन इससे भी कम समय में राकेश एक लंबा सा सफर तय कर वापस जाम में आ चुका था। रोते रोते उसकी आंखें साफ हो चुकी थीं। जैसे किसी ने वाइपर चला दी हो और आंसूओं के बूंद और धूंध पोछी जा चुकी हो। आश्रम के जाम में ऐसे कितने एकांतों में लोग अपने भीतर खुद के लिए रास्ता बनाते होंगे। तभी रेडियो जौकी इतना मुस्कुराता रहता है।
जारी...
तारे ज़मीन पर का गाना बज रहा था। पर मैं अंधेरे से डरता हूं मैं मां। राकेश सुन रहा था और रो रहा था। यह गाना उसे आश्रम से उड़ा कर सीधे पटना के उस आंगन में ले जा चुका था जहां उसके घुटनों ने अभी रेंगने से फुर्सत पाकर चलना सीखा था। वो अपनी कमज़ोरियों और परेशानियों को उसी तरह कहना चाहता था जैसे वह बचपन में मां को देखते ही बक देता था। मम्मी देखो न राजू ने मार दिया। मैं गिर गया और चोट आ गई। खूब रोता रहा। अब वह किसी से नहीं कह पाता। दोस्तों से नहीं। पत्नी से नहीं। राकेश अपने भीतर के जाम से निकल रहा था। उसके भीतर एक ऐसा रास्ता खाली हो रहा था...जहां उसका मन एक नई रफ्तार पकड़ने के लिए बेचैन था। तभी बम बम बोले...मस्ती में डोले का गाना आते ही वह झूमने लगा। अंगुलियों से स्टीयरिंग पर थाप देने लगा था। उसकी कार वहीं खड़ी थी जहां थी। इस बीच सिर्फ एक लंबा वक्त ही गुज़रा था लेकिन इससे भी कम समय में राकेश एक लंबा सा सफर तय कर वापस जाम में आ चुका था। रोते रोते उसकी आंखें साफ हो चुकी थीं। जैसे किसी ने वाइपर चला दी हो और आंसूओं के बूंद और धूंध पोछी जा चुकी हो। आश्रम के जाम में ऐसे कितने एकांतों में लोग अपने भीतर खुद के लिए रास्ता बनाते होंगे। तभी रेडियो जौकी इतना मुस्कुराता रहता है।
जारी...
आश्रम जाम पर उपन्यास- पार्ट टू
क़ातिल रफ्तार के लिए बदनाम ब्लू लाइन भी जाम में धंस गई थी।ड्राइवर अपनी भुजाओं को फैला अंगड़ाई लिये जा रहा था। सामने बोनट पर बैठी महिला पास आती उसकी भुजाओं से खुद को बचाती जा रही थी। दिल्ली को कोसती जा रही थी। उसके सामने देखने के सारे रास्ते बंद थे। सामने की सड़क पीठ के पीछे थी और उसके सामने अधेड़ लोग झुके चले आ रहे थे। अपनी ब्लू लाइन की इस बेचारगी पर ड्राइवर मर्दाना होने के अन्य रास्तों को बड़ी हसरत से तलाश रहा था।
बाहर से कंडक्टर की थपथपाहट सप्तम स्वर में कर्कश हुई जा रही थी। कंडक्टर उसे देखते ही रूकी हुई बस को थपथपाने लगा था। हर शाम आश्रम पर पहुंच कर उसकी बेचैनी बढ़ जाती। अपने दफ्तर में घूरे जाने की एक पूरी शिफ्ट पूरी करने के बाद सुधा के लिए वो आखिरी बस हुआ करती थी। लेकिन कंडक्टर की शक्ल याद दिला देती थी कि यह बस आखिरी है,लेकिन
बस में गुज़रने वाले अनुभव अभी शुरू हुए हैं। कंडक्टर सुधा के लिए सीट रखता था। कई बार सुधा ने मना कर खड़े खड़े सफर करने का इरादा किया। लेकिन जाम में शरीर पर गिरते देहों ने उसे हिकारत से भर दिया था। बहुत हसरत से सुधा ने बोनट पर बैठी महिला को देखा था। दोनों की नज़र टकराई और सहमति बन गई कि बस में सफर का यही रास्ता है। सीट ढूंढ लो, कम से कम से बचने का रास्ता मिल जाता है। कंडक्टर की बदनीयति से मिली सीट पर सुधा ने पीठ टिकाई और बहुत देर तक सोचती रही...काश ये बस जाम में न फंसती। कम से कम तकलीफों का सफर कुछ छोटा हो जाता।
गुप्ता जी सेंट्रल सेक्रेटेरियट से इस बस में बैठे थे। रास्ते में कई बार सो कर उठ चुके थे। हर बार लगता कि घर का स्टाप आ गया लेकिन पता चलता कि वहीं हैं,आश्रम जाम में। शीला दीक्षित की कामयाबी की कहानी कहते फ्लाईओवर से लुढ़कती तमाम गाड़ियां आश्रम मोड़ पर बेसुध निढ़ाल पड़ी रहती है। गुप्ता जी लेडीज सीट पर बैठे घर पहुंचने का इंतज़ार करते रहे।
तभी बस के बोनट पर बैठी महिला की नज़र कार में करीब आ रहे उन दोनों पर पड़ गई। नज़र ड्राइवर की भी पड़ी। लेकिन उसने सीटी बजाकर माहौल बदमज़ा कर दिया। महिला सोचती रही कि काश कार होती। जाम में तब भी होते मगर ऐसे न होते।
दिल्ली की बसों में गंधाते मर्दों की सड़ी नज़रों से सामना न होता। ड्राइवर की सीटी कार तक नहीं पहुंच सकी। गनीमत था कि कार के शीशे बंद थे। और अंदर बैठे जोड़े ने ऊपर नज़र तक नहीं की।
ड्राइवर ने रेडियो का वाल्यूम तेज कर दिया था। बस के भीतर जाम बढ़ती जा रही थी। सीट पर बैठे लोगों ने बाहर देखना बंद कर दिया था। ब्लू लाइन के भीतर की व्यथा बाहर सड़क पर आते आते हार्न के शोर में खो जा रही थी। सुधा ने कंडक्टर को हिकारत से देख कर इशारा कर दिया था। दोनों तरफ की सीटों के बीच खड़ी लड़कियों की पीड़ा दिल्ली के इतिहास के पन्ने में दर्ज नहीं हो सकी। न ही इन लड़कियों ने किसी थाने में बात दर्ज कराई। कुछ शरीफ लोगों ने इन लड़कियों के लिए जगह बनाया भी लेकिन पीछे से आती भीड़ ने धक्का देकर बस का भार इन लड़कियों की पीठ पर लाद दिया। विंडो सीट पर बैठ लड़की ने अपने कान में इयर फोन डाल लिए थे। रे़डियो जौकी उसके ज़ख्मों को हल्का कर रहा था। उसे पता था तीन किमी आगे चौराहे पर ब्वायफ्रैंड बाइक पर इंतज़ार कर रहा है। वह सिर्फ उस दिन का इंतज़ार कर रही थी कि कब कार होगी। आराम से बैठ कर जाएंगे। उसने डाउन टू अर्थ पत्रिका का कार से लगने वाली जाम का अंक फाड़ दिया था। अपनी सहेलियों से कह कर आई थी कि कोई बस के भीतर के जाम को हल्का करने के लिए सिग्नल या फ्लाईओवर क्यों नहीं बनाता। ईयरफोन से आती आवाज़ ने उसके विरोध के तेवर कम करने शुरू कर दिये थे तभी उसकी नज़र उस कार पर पड़ी जिसके भीतर दो लोग करीब आ चुके थे। एक ही आश्रम चौक के जाम में अनुभव अलग अलग हो रहा था। एमएनसी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का काम करने वाली प्रियंका कार के खरीदने के सपने में खो गई जिसकी अगली सीट के बीच गैप तो होगा मगर उस गैप में वो तमाम मर्द नहीं होंगे जो भीड़ का फायदा उठा कर ब्लू लाइन के भीतर लड़कियों की पीठ पर अपनी शराफत कुचलते रहते हैं। हर दिन एक लड़की की मौत होती रहती है। दिल्ली की तमाम लड़कियों ने इन अनुभवों को हमेशा के लिए अपने भीतर ज़ब्त कर लिया है। अपने पतियों को भी नहीं बताया। भाइयों को भी नहीं। दोस्तों को भी नहीं। बस जब भी जाम में फंसती है इनकी धड़कने किसी शैतानी हमले की आशंका में बढ़ जाती हैं।
जारी....
बाहर से कंडक्टर की थपथपाहट सप्तम स्वर में कर्कश हुई जा रही थी। कंडक्टर उसे देखते ही रूकी हुई बस को थपथपाने लगा था। हर शाम आश्रम पर पहुंच कर उसकी बेचैनी बढ़ जाती। अपने दफ्तर में घूरे जाने की एक पूरी शिफ्ट पूरी करने के बाद सुधा के लिए वो आखिरी बस हुआ करती थी। लेकिन कंडक्टर की शक्ल याद दिला देती थी कि यह बस आखिरी है,लेकिन
बस में गुज़रने वाले अनुभव अभी शुरू हुए हैं। कंडक्टर सुधा के लिए सीट रखता था। कई बार सुधा ने मना कर खड़े खड़े सफर करने का इरादा किया। लेकिन जाम में शरीर पर गिरते देहों ने उसे हिकारत से भर दिया था। बहुत हसरत से सुधा ने बोनट पर बैठी महिला को देखा था। दोनों की नज़र टकराई और सहमति बन गई कि बस में सफर का यही रास्ता है। सीट ढूंढ लो, कम से कम से बचने का रास्ता मिल जाता है। कंडक्टर की बदनीयति से मिली सीट पर सुधा ने पीठ टिकाई और बहुत देर तक सोचती रही...काश ये बस जाम में न फंसती। कम से कम तकलीफों का सफर कुछ छोटा हो जाता।
गुप्ता जी सेंट्रल सेक्रेटेरियट से इस बस में बैठे थे। रास्ते में कई बार सो कर उठ चुके थे। हर बार लगता कि घर का स्टाप आ गया लेकिन पता चलता कि वहीं हैं,आश्रम जाम में। शीला दीक्षित की कामयाबी की कहानी कहते फ्लाईओवर से लुढ़कती तमाम गाड़ियां आश्रम मोड़ पर बेसुध निढ़ाल पड़ी रहती है। गुप्ता जी लेडीज सीट पर बैठे घर पहुंचने का इंतज़ार करते रहे।
तभी बस के बोनट पर बैठी महिला की नज़र कार में करीब आ रहे उन दोनों पर पड़ गई। नज़र ड्राइवर की भी पड़ी। लेकिन उसने सीटी बजाकर माहौल बदमज़ा कर दिया। महिला सोचती रही कि काश कार होती। जाम में तब भी होते मगर ऐसे न होते।
दिल्ली की बसों में गंधाते मर्दों की सड़ी नज़रों से सामना न होता। ड्राइवर की सीटी कार तक नहीं पहुंच सकी। गनीमत था कि कार के शीशे बंद थे। और अंदर बैठे जोड़े ने ऊपर नज़र तक नहीं की।
ड्राइवर ने रेडियो का वाल्यूम तेज कर दिया था। बस के भीतर जाम बढ़ती जा रही थी। सीट पर बैठे लोगों ने बाहर देखना बंद कर दिया था। ब्लू लाइन के भीतर की व्यथा बाहर सड़क पर आते आते हार्न के शोर में खो जा रही थी। सुधा ने कंडक्टर को हिकारत से देख कर इशारा कर दिया था। दोनों तरफ की सीटों के बीच खड़ी लड़कियों की पीड़ा दिल्ली के इतिहास के पन्ने में दर्ज नहीं हो सकी। न ही इन लड़कियों ने किसी थाने में बात दर्ज कराई। कुछ शरीफ लोगों ने इन लड़कियों के लिए जगह बनाया भी लेकिन पीछे से आती भीड़ ने धक्का देकर बस का भार इन लड़कियों की पीठ पर लाद दिया। विंडो सीट पर बैठ लड़की ने अपने कान में इयर फोन डाल लिए थे। रे़डियो जौकी उसके ज़ख्मों को हल्का कर रहा था। उसे पता था तीन किमी आगे चौराहे पर ब्वायफ्रैंड बाइक पर इंतज़ार कर रहा है। वह सिर्फ उस दिन का इंतज़ार कर रही थी कि कब कार होगी। आराम से बैठ कर जाएंगे। उसने डाउन टू अर्थ पत्रिका का कार से लगने वाली जाम का अंक फाड़ दिया था। अपनी सहेलियों से कह कर आई थी कि कोई बस के भीतर के जाम को हल्का करने के लिए सिग्नल या फ्लाईओवर क्यों नहीं बनाता। ईयरफोन से आती आवाज़ ने उसके विरोध के तेवर कम करने शुरू कर दिये थे तभी उसकी नज़र उस कार पर पड़ी जिसके भीतर दो लोग करीब आ चुके थे। एक ही आश्रम चौक के जाम में अनुभव अलग अलग हो रहा था। एमएनसी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का काम करने वाली प्रियंका कार के खरीदने के सपने में खो गई जिसकी अगली सीट के बीच गैप तो होगा मगर उस गैप में वो तमाम मर्द नहीं होंगे जो भीड़ का फायदा उठा कर ब्लू लाइन के भीतर लड़कियों की पीठ पर अपनी शराफत कुचलते रहते हैं। हर दिन एक लड़की की मौत होती रहती है। दिल्ली की तमाम लड़कियों ने इन अनुभवों को हमेशा के लिए अपने भीतर ज़ब्त कर लिया है। अपने पतियों को भी नहीं बताया। भाइयों को भी नहीं। दोस्तों को भी नहीं। बस जब भी जाम में फंसती है इनकी धड़कने किसी शैतानी हमले की आशंका में बढ़ जाती हैं।
जारी....
आश्रम जाम में रोमांस- पार्ट वन
(अविनाश की ख्वाहिश पूरी करने का इरादा कर लिया है। ट्रैफिक जाम पर अपने अनुभवों को उपन्यास में बदलने की कोशिश कर रहा हूं। पहली कड़ी हाज़िर है। )
कार ने बढ़ना बंद कर दिया था। शीशे पर चढ़े काले रंग की पन्नी ने कार के भीतर के अंधेरे को और गहरा कर दिया था। शाम आकर रात में ढल चुकी थी। एक रूके हुए सफ़र में इंतज़ार लंबा होता जा रहा था। दोनों ने अब सामने देखना बंद कर दिया था। वो अब एक दूसरे को देख रहे थे। इंतज़ार छोटा होने लगा। बेक़रारी बढ़ने लगी। सामने बहुत दूर पहिए से उतरा ट्रक एक सब्र पैदा कर चुका था। अब बहुत देर यहीं रहना होगा। सड़क के किनारे खड़े बिजली के खंभे की रौशनी उनके कार के बोनट पर उतर रही थी। सामने की कार की बैक लाइट अटक गई थी। दोनों को लगने लगा कि कार बंद हो गई है। बिजली के खंभे की रौशनी के बाद भी अंधेरा गहरा गया है। ट्रैफिक जाम की छटपटाहट शांत होने लगी थी।
बैक मिरर दूर तक नहीं देख पाता। लेकिन पीछे की कार की अगली सीट पर बैठे लोगों को साफ साफ देख लेता है। उनका चेहरा क्लोज़ अप में दिखने लगता है। दोनों के भाव बदलने लगे थे। वो एक दूसरे को देखने लगे थे। बहुत देर तक देखना चाहते थे। सामने की दोनों सीटों के बीच की दूरी कार डिज़ाइनर की बेवकूफी लगने लगी। इस गैप का कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा था। दोनों करीब आना चाहते थे। उनके कंधे झुकने लगे। इस तरह से झुक रहे थे जैसे दोनों मिलकर एक साथ कुछ देखना चाह रहे हों। बैक मिरर में साफ साफ दिख रहा था वो एक दूसरे को छूना चाहते थे। घर जाने की बेकरारी ट्रैफिक जाम में रोमांस पैदा कर रही थी। उनकी लाल होती आंखें बाहर उड़ते पेट्रोल के लाल धुएं में घुल रही थीं। दिमाग के जकड़े हुए नस अब खुलने लगे थे। साफ साफ दिख रहा था दोनों एक दूसरे में घुलमिल रहे थे। बैक मिरर पीछे की कार का पता बताता है। लेकिन कार की सामने के शीशे के पार जाकर देखने लगता है, जिस पर काली पन्नी की परत नहीं चढ़ाई जा सकती। ट्रैफिक जाम के तमाम बेकार लम्हों में यह लम्हा बेकरार हुआ जा रहा था। रेड एफएम का बकबक उनकी दुनिया में बाहरी दुनिया का दखल बन कर तंग रहा था। दोनों ने रेड एफएम बंद कर दिया।
बाहर जाम से तंग आकर बजाए जा रहे हार्न के शोर में अंदर एक खूबसूरत खामोशी तैरने लगी थी। मैंने लेन बदलने के लिए अपनी कार थोड़ी तिरछी कर ली। बैक मिरर की तरसती निगाहों को हमने हल्की सी सज़ा दी तो किसी को मेरे इस इंसाफ की भनक तक नहीं लगी। इस बीच कार के भीतर सामने की दोनों सीटों की छोटी सी दूरी पाट ली गई थी। मेरी कार की विंग मिरर से कुछ ऐसा ही दिखा था। विंग मिरर की इस किस्मत पर बैक मिरर जल भून गया। मोहब्बत के तमाम महफूज़ लम्हों में एक लम्हा दुनिया की नज़रों का भी होता है। जिनकी नज़र में चढ़ कर मोहब्बत पूरी दुनिया में फैलने के लिए उड़ान भरने लगता है। एक आशिक कई आशिक पैदा करता है। ट्रैफिक जाम में फंसे धंसे लोग कई कहानियां लिख रहे हैं।
जारी....
कार ने बढ़ना बंद कर दिया था। शीशे पर चढ़े काले रंग की पन्नी ने कार के भीतर के अंधेरे को और गहरा कर दिया था। शाम आकर रात में ढल चुकी थी। एक रूके हुए सफ़र में इंतज़ार लंबा होता जा रहा था। दोनों ने अब सामने देखना बंद कर दिया था। वो अब एक दूसरे को देख रहे थे। इंतज़ार छोटा होने लगा। बेक़रारी बढ़ने लगी। सामने बहुत दूर पहिए से उतरा ट्रक एक सब्र पैदा कर चुका था। अब बहुत देर यहीं रहना होगा। सड़क के किनारे खड़े बिजली के खंभे की रौशनी उनके कार के बोनट पर उतर रही थी। सामने की कार की बैक लाइट अटक गई थी। दोनों को लगने लगा कि कार बंद हो गई है। बिजली के खंभे की रौशनी के बाद भी अंधेरा गहरा गया है। ट्रैफिक जाम की छटपटाहट शांत होने लगी थी।
बैक मिरर दूर तक नहीं देख पाता। लेकिन पीछे की कार की अगली सीट पर बैठे लोगों को साफ साफ देख लेता है। उनका चेहरा क्लोज़ अप में दिखने लगता है। दोनों के भाव बदलने लगे थे। वो एक दूसरे को देखने लगे थे। बहुत देर तक देखना चाहते थे। सामने की दोनों सीटों के बीच की दूरी कार डिज़ाइनर की बेवकूफी लगने लगी। इस गैप का कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा था। दोनों करीब आना चाहते थे। उनके कंधे झुकने लगे। इस तरह से झुक रहे थे जैसे दोनों मिलकर एक साथ कुछ देखना चाह रहे हों। बैक मिरर में साफ साफ दिख रहा था वो एक दूसरे को छूना चाहते थे। घर जाने की बेकरारी ट्रैफिक जाम में रोमांस पैदा कर रही थी। उनकी लाल होती आंखें बाहर उड़ते पेट्रोल के लाल धुएं में घुल रही थीं। दिमाग के जकड़े हुए नस अब खुलने लगे थे। साफ साफ दिख रहा था दोनों एक दूसरे में घुलमिल रहे थे। बैक मिरर पीछे की कार का पता बताता है। लेकिन कार की सामने के शीशे के पार जाकर देखने लगता है, जिस पर काली पन्नी की परत नहीं चढ़ाई जा सकती। ट्रैफिक जाम के तमाम बेकार लम्हों में यह लम्हा बेकरार हुआ जा रहा था। रेड एफएम का बकबक उनकी दुनिया में बाहरी दुनिया का दखल बन कर तंग रहा था। दोनों ने रेड एफएम बंद कर दिया।
बाहर जाम से तंग आकर बजाए जा रहे हार्न के शोर में अंदर एक खूबसूरत खामोशी तैरने लगी थी। मैंने लेन बदलने के लिए अपनी कार थोड़ी तिरछी कर ली। बैक मिरर की तरसती निगाहों को हमने हल्की सी सज़ा दी तो किसी को मेरे इस इंसाफ की भनक तक नहीं लगी। इस बीच कार के भीतर सामने की दोनों सीटों की छोटी सी दूरी पाट ली गई थी। मेरी कार की विंग मिरर से कुछ ऐसा ही दिखा था। विंग मिरर की इस किस्मत पर बैक मिरर जल भून गया। मोहब्बत के तमाम महफूज़ लम्हों में एक लम्हा दुनिया की नज़रों का भी होता है। जिनकी नज़र में चढ़ कर मोहब्बत पूरी दुनिया में फैलने के लिए उड़ान भरने लगता है। एक आशिक कई आशिक पैदा करता है। ट्रैफिक जाम में फंसे धंसे लोग कई कहानियां लिख रहे हैं।
जारी....
आश्रम पर उपन्यास
बाहर की दुनिया को धीरे धीरे सरकता हुआ देख कर
अंदर एक शख्स ठहरा हुआ सा बैठा है
पीठ टेढ़ी हो गई है
गर्दन टेढी हो गई है
कमर सिकुड़ गई है
आंखें थक गई हैं
सीट बेल्ट से ज़कड़ा हुआ शरीर उसका
जाम में किसी बंधुआ सा लगता है
नैय्यरा नूर को सुनते हुए अविनाश ने
एफएम की तरह फरमाइश की
लिखा जाए आश्रम जाम पर एक उपन्यास
क्या लिखा जाए आश्रम जाम पर उपन्यास
सीट बेल्ट से आज़ादी के सपने देखता हमारा किरदार
ज़रा सी जगह की गुज़ाइश देख हरकत में आ जाता है
क्लच पर पांव दबाता है, ब्रेक से पांव हटाता है
गियर को हाथों से इधर उधर करता है
सरकारी फाइल की तरह सरक कर उसकी कार
वापस उसी अवस्था में ठहर जाती है
दफ्तर से सात बजे का निकला हुआ
दस बजे तक अटका हुआ है
किरदार आश्रम जाम में फंसा हुआ है
कहानी आगे कैसे बढ़ाई जाए
किरदार को सोचने के लिए कहा जाए
ट्रैफिक जाम के तीन समाधानों पर लिखो एक लंबा लेख
सिग्नल फ्री, फ्लाईओवर और एक्सप्रेस वे
उसकी व्यथा को शब्दों में बांध सुनाए, इससे पहले
रेड एफएम पर सूड नाम के जॉकी की आवाज़
पढ़ने लगता है हंसी के फव्वारे जैसी किताब
जाम में फंसे हुए लोगों का एक बाज़ार बनाता है
सूड उन्हें यथार्थ से दूर ले जाता है,रोते हुए लोगों को
एफएम वाला हंस हंस कर गाना सुनाता है
इस उपन्यास के कई काल खंड हो सकते हैं
कोई आश्रम में कोई सीपी में फंसा हो सकता है
दूर से राहत की तरह नज़र आती ट्रैफिक सिग्नल की लाइट
घर पहुंचने जैसे अहसासों से भर देती है
चौराहो पर पहुंच कर सफर अपने मंज़िल के करीब लगती है
गियर,क्लच और सीटबेल्ट के ज़रिये लिखा जा सकता है
ट्रैफिक जाम में फंसे किरदार पर उपन्यास
जब भी लिखा जाएगा, जैसा भी लिखा जाएगा
जाम में फंसे लोगों को ही समर्पित किया जाएगा
अंदर एक शख्स ठहरा हुआ सा बैठा है
पीठ टेढ़ी हो गई है
गर्दन टेढी हो गई है
कमर सिकुड़ गई है
आंखें थक गई हैं
सीट बेल्ट से ज़कड़ा हुआ शरीर उसका
जाम में किसी बंधुआ सा लगता है
नैय्यरा नूर को सुनते हुए अविनाश ने
एफएम की तरह फरमाइश की
लिखा जाए आश्रम जाम पर एक उपन्यास
क्या लिखा जाए आश्रम जाम पर उपन्यास
सीट बेल्ट से आज़ादी के सपने देखता हमारा किरदार
ज़रा सी जगह की गुज़ाइश देख हरकत में आ जाता है
क्लच पर पांव दबाता है, ब्रेक से पांव हटाता है
गियर को हाथों से इधर उधर करता है
सरकारी फाइल की तरह सरक कर उसकी कार
वापस उसी अवस्था में ठहर जाती है
दफ्तर से सात बजे का निकला हुआ
दस बजे तक अटका हुआ है
किरदार आश्रम जाम में फंसा हुआ है
कहानी आगे कैसे बढ़ाई जाए
किरदार को सोचने के लिए कहा जाए
ट्रैफिक जाम के तीन समाधानों पर लिखो एक लंबा लेख
सिग्नल फ्री, फ्लाईओवर और एक्सप्रेस वे
उसकी व्यथा को शब्दों में बांध सुनाए, इससे पहले
रेड एफएम पर सूड नाम के जॉकी की आवाज़
पढ़ने लगता है हंसी के फव्वारे जैसी किताब
जाम में फंसे हुए लोगों का एक बाज़ार बनाता है
सूड उन्हें यथार्थ से दूर ले जाता है,रोते हुए लोगों को
एफएम वाला हंस हंस कर गाना सुनाता है
इस उपन्यास के कई काल खंड हो सकते हैं
कोई आश्रम में कोई सीपी में फंसा हो सकता है
दूर से राहत की तरह नज़र आती ट्रैफिक सिग्नल की लाइट
घर पहुंचने जैसे अहसासों से भर देती है
चौराहो पर पहुंच कर सफर अपने मंज़िल के करीब लगती है
गियर,क्लच और सीटबेल्ट के ज़रिये लिखा जा सकता है
ट्रैफिक जाम में फंसे किरदार पर उपन्यास
जब भी लिखा जाएगा, जैसा भी लिखा जाएगा
जाम में फंसे लोगों को ही समर्पित किया जाएगा
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