ज़हर खाए मरीज़ों का अस्पताल



यह साइन बोर्ड दो साल पहले देखा था। विजेंद्र के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने पर मीडिया ने भिवानी पर धावा बोल दिया था। तब से यह साइन बोर्ड मुझे परेशान कर रहा था। इस कहानी को आप तक लाने के लिए कई कोशिशें की। कई बार आत्महत्या की कोशिश करने के बाद बच गए मरीज़ों ने कैमरे पर बात करने से मना कर दिया तो कई बार डॉक्टरों ने हिम्मत नहीं दिखाई क्योंकि यह मेडिकल नैतिकता का मामला था। इस बीच सल्फास और कीटनाशक स्प्रे खा या पीकर आत्महत्या की कोशिश करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। आप भी किसी अस्पताल के बाहर इस तरह के साइन बोर्ड देखकर सोच रहे होंगे कि कोई न कोई कहानी तो होगी इसके पीछे। अंततोगत्वा जब हिसार और भिवानी पहुंचा तो एक बार फिर से यह कहानी बीच में ही दम तोड़ने लगी। फिर डॉ जे बी गुप्ता ने ही मदद कर दी। कुछ मरीज़ों को तैयार किया बोलने के लिए। उनका चेहरा और पहचान न दिखे इसकी पूरी कोशिश की गई।


कहानी यह है कि हरित क्रांति के बाद कीटनाशक दवाएं घर-घर में उपलब्ध हैं। डॉक्टरों ने बताया कि आत्महत्या की कोशिशें करने वाले मरीज़ों या कहें तो लोगों की संख्या काफी बढ़ी है। एक डॉक्टर ने बताया कि दो साल पहले उनके अस्पताल में एक ही वेंटिलेटर था। अब तीन तीन है। एक डॉक्टर ने दावा किया कि अट्ठाईस साल के कैरियर में इस तरह के दस हज़ार मरीज़ों को ठीक किया है। इनमें वो संख्या शामिल नहीं है जो मरीज़ कीटनाशक दवा लेने के बाद गांव में ही मर गए या अस्तपाल पहुंचने से पहले। आत्महत्या की इन कोशिशों में कर्ज़ बड़ा कारण नहीं है। वो भी कई कारणों में से एक है मगर ज्यादातर मामलों में औरतें पति के बात न मानने पर या पराई स्त्री से संबंध होने के मामले में कीटनाशक दवायें पी लेती हैं। हालत यह है कि अब अस्पतालों ने ज़हर खाए मरीज़ों के लिए बकायदा पैकेज बना दिया है। सरकार के पास इसके आंकड़ें नहीं हैं क्योंकि सरकार प्राइवेट अस्पतालों से आंकड़े नहीं लेती। ज्यादातर मरीज़ झूठ बोलते हैं कि गलती से सल्फास या कीटनाशक दवा ले ली। अब यह बात समझने लायक है कि हर महीने एक अस्पताल में इस तरह के बीस मामले आ जाते हैं। क्या इतने लोग गलती से सल्फास या स्प्रे ले रहे हैं। कुछ किसान अनजाने में अपनी लापरवाही के कारण स्प्रे के ज़हर से मर जाते हैं। मगर यह मामला अलग है।



आप इस शुक्रवार रात 9:28 बजे रवीश की रिपोर्ट देखेंगे तो अच्छा लगेगा। कार्यक्रम अच्छा लगे तो किसी को देखने के लिए ज़रूर बताइये। शनिवार की सुबह 10:28 बजे और रात 10:28 बजे रवीश की रिपोर्ट दुबारा दिखाई जाती है। नीचे की बाकी तस्वीरें भिवानी और हिसार की हैं। एक तस्वीर परमिट कक्ष वाली करनाल की है।









मोबाइल चार्जिंग की सामाजिकता



पिछले बीस सालों में कई प्रकार के नए रोज़गारों का जन्म हुआ है। मोबाइल इंजीनियर और चार्जर का धंधा। अक्सर अखबारों में इसके बारे में छपता भी रहा है। गढ़ मेले में मोबाइल चार्जर काउंटर पर मेरी नज़र पड़ी। गांवों में बिजली नहीं है मगर फोन है। फोन बिजली के भरोसे नहीं है। चार्ज करने के कई सारे विकल्प ग्रामीण जीवन में ढूंढ निकाले गए हैं। कहीं ट्रैक्टर से चार्ज किया जा रहा है तो कई कंपनियां यह प्रचारित कर रही हैं कि बैटरी चार दिनों तक चलने वाली है। लोग मोबाइल चार्ज कराने के लिए पांच पांच किमी साइकिल यात्रा करते हैं। कोसी बाढ़ के दौरान देखा कि लोगों ने चीनी एंटिना के ज़रिये अपने नेटवर्क को बेहतर कर लिया था। एंटिना से मोबाइल फोन चलाने का आइडिया पूरी तरह से देसी है।



तस्वीरों में आप देखेंगे कि कई मोबाइल चार्ज के लिए लगे हैं। हर चार्जर पर मॉडल का नाम लिखा है। फोन पर उपभोक्ता का नाम, गांव और नंबर लिखा है। मोबाइल चार्ज करने के लिए ट्रैक्टर में लगने वाली बड़ी बैट्रियों का इस्तमाल किया गया है। पूरा एक सिस्टम बन गया है। पांच टका में मोबाइल चार्ज। एक साथ बीस लोग बैठ कर मोबाइल चार्ज कर रहे हैं। चार्जिंग का अनुभव हुक्का पीने या आग तापने जैसा हो गया है। किस्से भी चल रहे होते हैं। हम शहरी लोगों के लिए मोबाइल चार्जिंग सामाजिक अनुभव नहीं है। ग्रामीण लोगों के लिए हैं। वहां मोबाइल फोन के मॉडल से लेकर मनमोहन के मॉडल तक की चर्चा हो रही थी। थोड़ा और ध्यान देना चाहिए था। पता चलता कि बीस मोबाइल फोन में ज्यादा किस मॉडल और किस कंपनी के हैं।

शीला या मुन्नी

चंद महीने के अंतराल पर भारतीय सिनेमा के पर्दे पर दो नायिकाएं एक अपने अपने सामाजिक दास्तानों से निकल कर आइटम के रूप में पेश-ए-नज़र हुई हैं। इनकी नृत्य शैली और सुर लहरियों पर फिसलती लचकती कमरों का अध्ययन किया जाना चाहिए। क्या कैट और मलाइका का डांस अखिल भारतीय कुंठा तत्व को सामूहिकता देता है या फिर दोनों अलग-अलग वर्ग विशेष की नुमाइंदगी कर रही हैं? क्या यह सही सवाल है?

पहली नज़र में मुन्नी की ठसक लौंडिया वाली है। शीला बेब लगती है। मुन्नी सामंतवाद के हिन्दी मीडियम स्कूल से पास आउट लगती है तो शीला इंग्लिश मीडियम स्कूल से। मुन्नी की जवानी की आग झंडू बाम और एटम बम से निकल रही है तो शीला इतनी सेक्सी है कि अपने नायक से कहती है कि मैं तेरे हाथ न आऊं। अकड़ देखिये इस बेब की। कहती है वो खुद को ही प्यार करते रहना चाहती है। जबकि मुन्नी अपने डार्लिंग के लिए बदनाम हो जाना चाहती है। मुन्नी चाहे तो शीला का एक जवाब में काम तमाम कर सकती है। कह देगी कि इंग्लिश बोलकर ये मत समझना की तुम शकीरा हो। तुम्हारा नाम भी तो हमारे मोहल्ले वाला ही है न। मुन्नी की बहन शीला। शीला की जवानी। गिटपिट इंग्लिश बोलकर साबित क्या है करती। चल हट। हिन्दी की कापी मार कर इंग्लिश में महारानी बनने निकली है। नाशपिटी।

इन दोनों आइटम गीतों में डांस के लय वही हैं। कमर प्रदेश के अंग झटके खा रहे हैं। मुन्नी एक ही कपड़े में असल ज़िंदगी के जेठ के साथ डांस कर रही है। मुन्नी के साथ मर्द लफंगों की सक्रियता दिखती है। मर्द किरदार गाने में इन्वाल्व हैं। सलमान तो बालकनी पर चढ़ गया है और उसका विरोधी खलनायक खटिया पर अपनी बांहों को समेट कर कसमसा रहा है। कुर्ता और गमछा में। सलमान तो लगता है कि वर्दी फाड़ कर निकल आएगा। शीला के गाने में मर्द बिना काम के लार टपका रहे हैं। वो आगे पीछे बंदर की तरह कूद रहे हैं। अक्षय कुमार हैट पहनकर आते तो हैं मगर इंग्लिश मीडियम वाली शीला के सामने उनकी कोई औकात नहीं दिखती। शीला रिजेक्ट करती है। हर सीन में कपड़े बदल कर आ जाती है। वो एक ही गाने में कई वर्गों को लुभा रही है। मुन्नी तो एक ही कपड़े में सारे वर्गों को अपने घुटने तक ले आती है।

मर्दवादी कुंठा जगत में ऐसे गाने न जाने किस अहसास को रंगीन बनाते होंगे। मगर नाक और गला दबाकर गाये गए ऐस गाने कहीं न कहीं तेज धुनों के साथ आज़ाद ज़रूर करते होंगे। तभी मुन्नी और शीला सभी वर्गीय दीवारों को लांघ जाती हैं। कजरारे की ऐश को लोग भुलने लगे हैं। मुन्नी किसी गांव में फंस गई लगती है तो शीला बाइलिंगुअल हो गई है। बाई सेक्सुअल भी। दोनों की सेटिंग बताती है कि सामंतवादी तत्व हर तरह के समाजों में ज़िंदा है। मुन्नी और शीला आज के तथाकथित शालीन स्त्री पुरुषों के भीतर छुपे लंठई के प्रशस्त मार्ग हैं।

कतरनालय सही शब्द है सैलून का







(लखनऊ की चंद तस्वीरें आपके लिए)

ल लखनऊ या व से वखनऊ


हर शहर की अपनी सीमेंट संस्कृति होती है। लखनऊ की अवध संस्कृति में कोठी कल्चर घुल मिल गया है। गोमती नगर,इंदिरा नगर,विकास नगर में फैला लखनऊ कोठियों से भरा नज़र आता है। कतार में कोठियां खड़ी कर दी गई हैं। अठारह सौ से सत्ताईस सौ वर्ग फुट के दायरे में बनी इन कोठियों का अलग पैटर्न नज़र आता है। शायद ही किसी शहर में इस तादाद में कोठियां नज़र आएंगी। दिल्ली मुंबई से तुलना करें तो बिल्कुल अलग। गगनचुंबी इमारतों वाले महानगरों में एक महानगर ऐसा भी है जहां गगनचुंबी इमारतों का चलन अब शुरू हो रहा है। उत्तर भारत में दिल्ली के बाद लखनऊ को ही महानगर का दर्जा हासिल है।


सबसे पहले इंदिरा नगर बसा था। इसका पुराना नाम राम सागर मिश्र नगर था। कांग्रेस की सरकार ने बदल कर इंदिरा नगर कर दिया। भूतनाथ मार्केट इंदिरा नगर में ही है। इंदिरा नगर में धीरे-धीरे अपार्टमेंट बनने की शुरूआत हो हो गई है। कई सरकारी कर्मचारियों और मध्यमवर्ग का ठिकाना है इंदिरा नगर। इसके बाद बसा गोमती नगर। अपने आप में एक शहर। दो-दो रेलवे स्टेशन है। मेरे मित्र सर्वेश तिवारी ने बताया कि यहां बीस खंड हैं। सभी खंड के नाम व से शुरू होते हैं। विराम, विकल्प,विशेष,विनम्र खंड। दिल्ली मुंबई की तरह गार्डेनिया फार्डेनिया नहीं हैं। जिस किसी अधिकारी का यह फैसला होगा उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए। कम से कम उसने अपने अफसरों को व से शुरू होने वाले कई शब्दों और नामों को ढूंढने का काम तो दिया। यह अधिकारी चाहे तो किसी हिन्दी न्यूज चैनल में भी नौकरी कर सकता है। वहां के स्वयंभू अनुप्रास संपादकों की छुट्टी कर देगा। एक बार गोमती नगर घूम कर डेस्क पर जाए तो लखनऊ को वखनऊ लिख देगा। विकास,विवेक और विनय खंड ज्यादा हाई प्रोफाइल माने जाते हैं। यहां ज्यादातर नौकरशाही के राजा लोग रहते हैं। आईएएस,आईपीएस टाइप के। इसके बाद आता है विकास नगर। विकास नगर का अंदाज़ शाही तो नहीं लगता मगर गोमती नगर का अलग से अध्ययन किया जाना चाहिए।



इन तीनों नगरों की कोठियों का रंग रोगन देखना चाहिए। एक पेंटर ने बताया कि व्हाईट इमल्सन की खूब डिमांड है। जितने भी रंग बेचता है उसका पचासी फीसदी हिस्सा व्हाई इमल्सन होता है। नब्बी फीसदी कोठियों की बाहर से रंगाई सफेद रंग में ही हुई है। सात आठ कोठियों के बाद हरे या नीले या पीले रंग की भी कोठिया नज़र आती है। इन सबकी बनावट का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। सभी कोठियां एक दूसरे से सटी हैं। किसी ने अगल बगल ज़मीन नहीं छोड़ी है। अगल-बदल खिड़कियां नहीं हैं। दीवारों से मकान डब्बे की तरह बंद है। कई कोठियों में गुंबद बनाने का चलन है। कारण साफ नहीं हुआ मगर अंदाज़ा लगा कि लखनऊ की नवाबी संस्कृति का बचा खुचा माल इन कोठियों की छतों तक चला आया है। एक तरह का पावर सिम्बल लगता है। कोठी को संसद या विधानसभा की तरह बनाकर रहने में अलग पहचान मिलती होगी। वैसे ज्यादातर कोठियों के नक्शे सभी मकानों से लिये दिये गए लगते हैं।



लखनऊ में पली बढ़ीं पत्रकार प्रतिभा कटियार कहती हैं कि जिसे भी कोठी बनानी होती है वो एक बार गोमती नगर का चक्कर लगा ही आता है। नक्शा मिल जाता है। इतने आर्किटेक्ट तो हैं नहीं और कोठियों की कितनी डिज़ाइन बन सकती है। लखनऊ में गोमती नगर की कोठियों की इतनी हैसियत तो बन ही गई है। मुझे भी लगा कि अगर इन मकानों के छज्जे, गुंबदों और मीनारों का सर्वे करायें तो सबकी एक-एक कैटगरी बन जाएगी। सब मकान एक दूसरे से कुछ लिये हुए हैं।

सारी सजावट सामने से की गई है। क्योंकि मकान तीन तरफ से बंद है। घिरा हुआ है। इसलिए सारा ज़ोर सामने लगा दिया गया है। सामने के ही हिस्से में डिजाईन निकाली गई है। स्पेस का आभास होता है। बालकनी बड़ी है। सीढ़ियां चौड़ी हैं। खंभे लगे हैं। लगता है कि किसी सेठ का मकान है। भले हो न हो लेकिन कोठी संस्कृति को धक्का इतना गहरा है कि सारी कोठियां अगर एक नज़र से देखी जाएं तो एक ही लगती हैं। इनती कोठियां दिल्ली वाले को परेशान करती हैं। दिल्ली में पंजाबी बाग या ग्रेटर कैलाश या फिर फ्रैंड्स कालोनी ही हैं। लेकिन इन कालोनियों से सौ गुना ज्यादा कोठिया लखनऊ की इन कालोनियों में हैं।


मगर समय के दबाव में कोठियां बदल रही हैं। रहने वाले कम हो गए हैं। कुछ ने कोठियों में एटीएम खुलवा दिये हैं तो कुछ ने क्रेश और सलून। हर शहर के लोग अपने शहर को कम समझते हैं। उन्हें लगता है कि यहां कुछ नहीं है। इसलिए बच्चे भी पढ़ाई के समय से ही घर से बाहर रहने लगे हैं। नौकरियां कम है इसलिए भी नौजवान नहीं रहते। नतीजा कोठियां खाली हो रही हैं। इसलिए अब लोग अपार्टमेंट की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। कुछ तस्वीरें भी लगा रहा हूं आपके लिए ताकी पैटर्न समझ में आ सके।

नीतीश का नया पिछड़ावाद

बिहार का चुनाव इस बार कई मामलों में प्रस्थान बिंदु है। पिछले बीस सालों से राजनीति में बनी बनाई सोच को झकझोरने वाले नतीजे आ रहे हैं। राजनीति जब ऊपर से नहीं बदलती है तो नीचे से जनता बदल देती है। इस बार के नतीजे साबित करेंगे कि राजनीति में सामाजिक समीकरण कालजयी नहीं होता है। लालू यादव खुद को मुस्लिम यादव गठबंधन से आगे नहीं ले जा सके और उनके सहयोगी राम विलास पासवान दलित राजनीति को कोई मायने नहीं दे सके। इस समीकरण में नया कुछ भी नहीं जुड़ा,बल्कि कम होता रहा। इनदोनों का गठबंधन जनता के बीच दरक गया है। वहीं कांग्रेस लालू पासवान की डुप्लिकेट समीकरण बनाने में लगी रही। मगर नीतीश कुमार की सबसे बड़ी कामयाबी यह मानी जाएगी कि उन्होंने अपने जनाधार को नया और वृहद बनाया है।


पांच साल पहले जब नीतीश को सत्ता मिली थी तब उनका जातिगत-सामाजिक आधार सीमित था मगर जनाकांक्षा असीमित थी। नीतीश कुमार लालू विरोधी खुमारी में डूबे नहीं रहे। बल्कि अति पिछड़ा और महादलित का नारा देकर राजनीति में पिछड़ावाद को पुनर्परिभाषित तो किया ही, इसे प्रासंगिक भी बना दिया। यूपीए की दो बार की सफलता से लगा कि राजनीति दो ध्रुवीय हो रही है। मगर कांग्रेस की गुटबाज़ी और दिशाहीनता कोई सामाजिक आधार नहीं बना सकी। कांग्रेसी बेकार में राहुल गांधी को दौड़ाते रहे। वहीं नीतीश सामाजिक आधार के वि्स्तार में लगे रहे। पिछड़ा का मतलब यादव या कुर्मी ही नहीं होता। यह एक ऐसा पिछड़ावाद है जिसे सभी सवर्णों और मुसलमानों का भी समर्थन हासिल है। ठीक वैसे जैसे उत्तर प्रदेश में मायावती ने उपेक्षित ब्राह्मणों और मुसलमानों को दलितों के साथ जोड़ कर संपूर्ण बहुमत पा लिया था, नीतीश के भी नतीजे वैसे ही आएंगे। नीतीश ने पिछड़ावाद को प्रगतिशील और विकासोन्मुख बना दिया है।


एक बड़ा सवाल विकास बनाम जाति का पूछा जा रहा है। पूछने वाले वही लोग हैं जो सामाजिक और सियासी हकीकत को अलग-अलग करके देखते हैं। किसी भी राजनीति के लिए सामाजिक आधार ज़रूरी है। सामाजिक आधार जिन ईंटों से बनता है उनमें से एक ईंट जाति भी है। जनादेश से जाति खत्म नहीं होती है। जाति को खत्म करने के लिए सामाजिक आंदोलन की ज़रूरत है। यूपी में सवर्णों और दलितों के साथ आने से दलितों के प्रति अत्याचार कम नहीं हुए हैं। बिहार के नतीजे बतायेंगे कि सभी जातियों ने मिलकर विकास की राजनीति का समर्थन किया है। अब नीतीश पर निर्भर करेगा कि वे सामाजिक अंतर्विरोध को अपने राजनीतिक फैसले से कितना कम करते हैं। नहीं करेंगे तो मायावती की तरह कमज़ोर होने लगेंगे।


आंकड़ों के आधार पर कहें तो नीतीश कुमार ने कोई अप्रत्याशित विकास नहीं किया है। नीतीश कुमार का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने सांख्यिकीय विकास की जगह मनोवैज्ञानिक विकास का माहौल बनाया। नीतीश जानते हैं। इसलिए अपनी रैलियों में कहते रहे कि अभी बुनियाद रखी गई है,इमारत का निर्माण बाकी है। नीतीश कुमार भाग्यशाली है कि इमारत बनाने में उन्हें हर तबके का हाथ मिल रहा है। उन्होंने एक जनाकांक्षा पैदा कर दी है। वे इतिहास और भविष्य दोनों की दहलीज़ पर खड़े हैं,उन्हें तय करना है कि वो अपने लिए इतिहास में कैसी जगह चाहते हैं और बिहार को कैसा भविष्य देना चाहते हैं। नतीजे के बाद लालू प्रसाद उस मास्टर की तरह क्लास रूम में खड़े नज़र आएंगे जो ज्ञानी तो है मगर उसे नहीं मालूम कि सिलेबस बदल गया है।

मजनूं का टीला- बस्ती जो बसती ही नहीं है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की तमाम यादें यहां की दीवारों पर चस्पां हैं। सत्तर हज़ार वर्ग मीटर इलाके में बसा है मजनूं का टीला। साढ़े तीन सौ से अधिक मकान हैं। तीन हज़ार की आबादी है। ज्यादा आबादी दक्षिण भारत के बौद्ध मठों और वहां किसानी करने लगे तिब्बती निर्वासितों का मिलन स्थल है। यहीं ठहर कर वो धर्मशाला की तरफ रवाना होते हैं। पहले यहां तिब्बती आए तो इस वीरानें में झोपड़ियां डालकर रहने लगे। कूली,रेल पटरी बनाने का काम किया। फिर लुधियाना से इनका रिश्ता हुआ। लुधियाना के ऊन व्यापारियों ने इन्हें उधार पर गर्म कपड़े दिये। हम बचपने में सोचते थे कि ये लोग तिब्बत से गर्म कपड़ा लाते हैं। मगर ये अपनी डिज़ाइन देकर लुधियाना के व्यापारियों से स्वेटर मफलर और मोजे बनवाते रहे। उन्हें देश भर के तिब्बती बाज़ारों में ले जाकर बेचते रहे। अक्तूबर नवंबर में लुधियाना में काफी तिब्बती लोगों का मजमा होता है।

लुधियाना ने इन्हें व्यापारिक समर्थन दिया जिसकी बदौलत इनके पास कुछ पूंजी आई। धीरे-धीरे अपने बच्चों को पढ़ाने लगे। अब वो काल सेंटर में नौकरी कर रहे हैं। कई विदेश जा चुके हैं। कुछ को होटलों में चीनी खान-पान बनाने की नौकरी मिल गई है। इससे जो पैसा आया उसका असर यहां की इमारतों पर हुआ। पक्के मकान बने। उनमें किरायेदार ठहरने लगे। बड़ी संख्या में बौद्ध मठों ने धर्मशालाएं बनवाईं। जिनसे होने वाली कमाई के कारण उनका काम चलने लगा। इन मठों में बिहार के गरीब बालिग बच्चों को नौकरियां दी जाने लगीं। इसलिए आपको यहां कई ट्रैवल एजेंट दिखेंगे। फिलहाल यहां किसी तरह के निर्माण कार्य पर रोक लगी हुई है।

तिब्बत की आज़ादी के सपने के साथ- साथ इस छोटे से तिब्बत को देखना चाहिए। गलियां तंग हो चुकी हैं। गाड़ियां अंदर नहीं आ सकतीं इसलिए मंदिर के आंगन और घर के बाहर बने छोटे-छोटे चौराहों पर लोग ठाठ से बैठे चाय पीते नज़र आएंगे। बच्चे बेफिक्र खेलते नज़र आएंगे। एक सुरक्षित माहौल नजर आता है। घरों में अब पारंपरिक चीज़ें कम होती जा रही हैं। सारे घर मुनिरका या बेरसराय जैसे लगने लगे हैं। अभी भी कुछ घरों में धूप जलाने का पवित्र चूल्हा बना हुआ है। मंत्रों से लैस पताके लहरा रहे होते हैं। छुबा लबादा अब कोई नहीं पहनता। अच्छी क्वालिटी का छुपा दस से पंद्रह हज़ार का आता है। कुछ औरतें पहनती हैं। मगर हल्के कपड़ों के।

इस तस्वीर में आप यमुना के किनारे बने एक क्लब देख रहे हैं। तिब्बती यूथ कांग्रेस का क्लब। इसके मालिक ने पैसे की कमी के कारण मकान नहीं बनाया। लिहाज़ा यहां चाय नाश्ते की शानदार दुकान है। खूबसूरत नज़ारा। कैरम खेलते हुए और खिड़की से नदी को देखते हुए। दिल्ली में यह सबसे बेहतरीन जगह होगी जो इतनी सस्ती भी है। यहां के लोगों को कान की सफाई कराने की आदत है। दस रुपये में कान साफ करने वाले खूब दिखते हैं। आखिर की तस्वीर में प्रेम पाल जी हैं। बुलंदशहर खुर्जा के एक गांव के। तेईसा साल पहले आए तो कोई आइडिया नहीं था कि तिब्बती पहनावा क्या होता है। आज वे यहां जम गए हैं।

खास बात यह है कि मोहल्ले की देखरेख पंचायत परिषद करती है। वोटिंग से सात सदस्य चुने जाते हैं। यहां के रेजिडेंट वेलफेयर दफ्तर में हर नागरिक की फाइल बनी हुई है। इसके प्रधान दोरज़ी का कहना है कि हर मकान के नीचे दुकान है। इंडिया ने हमें कितना कुछ दिया। अब हम अपनी तरफ से इंडिया को देना चाहते हैं। इसलिए सारे दकानों की गिनती की गई है। हम अपनी तरफ से कमर्शियल टैक्स देंगे। मोहल्ले का कचरा यमुना में ना जाए इसलिए महिला समिति कचरा उठाने वालों की खुद निगरानी करती है। कचरे को दो भागों में बांटा जाता है। एक प्लास्टिक वाला और दूसरा सड़ने वाला। यमुना में कुछ भी नहीं जाता। लोगों ने बताया कि वो बचपन में जमना बोलते थे। अब यमुना बोलने लगे हैं क्योंकि अभी दिल्ली में सब यमुना बोलते हैं। तब तो हम यमुना में खूब तैरते थे। अभी तो नहीं जा सके।

तिब्बत कभी तो आज़ाद होगा। यहां के लोग विस्थापन के भीतर विस्थापन भुगत रहे हैं। मां-बाप कई सालों तक मेहनत करने के बाद स्थायी होने लगे तो उनके बच्चे बाहर चले गए। यहां के स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चे पांचवी के बाद धर्मशाला या पहाड़ों पर बने तिब्बती स्कूलों में चले जाते हैं। यानी फिर से विस्थापन। विस्थापन निरंतर है।
कुछ भी स्थाई नहीं है। पूरी बस्ती ही उजड़कर फिर से तिब्बत में बसने के इंतज़ार में हैं।

एक शहर के भीतर कई तरह के स्पेस हैं। सब स्पेस एक दूसरे से अलग हैं। हर मामले में। इसी थीम को लेकर रवीश की रिपोर्ट का एक हिस्सा चलता है। आज रात आप ९ बजकर २८ मिनट पर एनडीटीवी इंडिया पर देख सकते हैं। शनिवार को सुबह १० बज कर २८ मिनट और रात १० बजकर २८ मिनट और रविवार को ११ बजकर २८ मिनट पर देख सकते हैं।