क़ातिल रफ्तार के लिए बदनाम ब्लू लाइन भी जाम में धंस गई थी।ड्राइवर अपनी भुजाओं को फैला अंगड़ाई लिये जा रहा था। सामने बोनट पर बैठी महिला पास आती उसकी भुजाओं से खुद को बचाती जा रही थी। दिल्ली को कोसती जा रही थी। उसके सामने देखने के सारे रास्ते बंद थे। सामने की सड़क पीठ के पीछे थी और उसके सामने अधेड़ लोग झुके चले आ रहे थे। अपनी ब्लू लाइन की इस बेचारगी पर ड्राइवर मर्दाना होने के अन्य रास्तों को बड़ी हसरत से तलाश रहा था।
बाहर से कंडक्टर की थपथपाहट सप्तम स्वर में कर्कश हुई जा रही थी। कंडक्टर उसे देखते ही रूकी हुई बस को थपथपाने लगा था। हर शाम आश्रम पर पहुंच कर उसकी बेचैनी बढ़ जाती। अपने दफ्तर में घूरे जाने की एक पूरी शिफ्ट पूरी करने के बाद सुधा के लिए वो आखिरी बस हुआ करती थी। लेकिन कंडक्टर की शक्ल याद दिला देती थी कि यह बस आखिरी है,लेकिन
बस में गुज़रने वाले अनुभव अभी शुरू हुए हैं। कंडक्टर सुधा के लिए सीट रखता था। कई बार सुधा ने मना कर खड़े खड़े सफर करने का इरादा किया। लेकिन जाम में शरीर पर गिरते देहों ने उसे हिकारत से भर दिया था। बहुत हसरत से सुधा ने बोनट पर बैठी महिला को देखा था। दोनों की नज़र टकराई और सहमति बन गई कि बस में सफर का यही रास्ता है। सीट ढूंढ लो, कम से कम से बचने का रास्ता मिल जाता है। कंडक्टर की बदनीयति से मिली सीट पर सुधा ने पीठ टिकाई और बहुत देर तक सोचती रही...काश ये बस जाम में न फंसती। कम से कम तकलीफों का सफर कुछ छोटा हो जाता।
गुप्ता जी सेंट्रल सेक्रेटेरियट से इस बस में बैठे थे। रास्ते में कई बार सो कर उठ चुके थे। हर बार लगता कि घर का स्टाप आ गया लेकिन पता चलता कि वहीं हैं,आश्रम जाम में। शीला दीक्षित की कामयाबी की कहानी कहते फ्लाईओवर से लुढ़कती तमाम गाड़ियां आश्रम मोड़ पर बेसुध निढ़ाल पड़ी रहती है। गुप्ता जी लेडीज सीट पर बैठे घर पहुंचने का इंतज़ार करते रहे।
तभी बस के बोनट पर बैठी महिला की नज़र कार में करीब आ रहे उन दोनों पर पड़ गई। नज़र ड्राइवर की भी पड़ी। लेकिन उसने सीटी बजाकर माहौल बदमज़ा कर दिया। महिला सोचती रही कि काश कार होती। जाम में तब भी होते मगर ऐसे न होते।
दिल्ली की बसों में गंधाते मर्दों की सड़ी नज़रों से सामना न होता। ड्राइवर की सीटी कार तक नहीं पहुंच सकी। गनीमत था कि कार के शीशे बंद थे। और अंदर बैठे जोड़े ने ऊपर नज़र तक नहीं की।
ड्राइवर ने रेडियो का वाल्यूम तेज कर दिया था। बस के भीतर जाम बढ़ती जा रही थी। सीट पर बैठे लोगों ने बाहर देखना बंद कर दिया था। ब्लू लाइन के भीतर की व्यथा बाहर सड़क पर आते आते हार्न के शोर में खो जा रही थी। सुधा ने कंडक्टर को हिकारत से देख कर इशारा कर दिया था। दोनों तरफ की सीटों के बीच खड़ी लड़कियों की पीड़ा दिल्ली के इतिहास के पन्ने में दर्ज नहीं हो सकी। न ही इन लड़कियों ने किसी थाने में बात दर्ज कराई। कुछ शरीफ लोगों ने इन लड़कियों के लिए जगह बनाया भी लेकिन पीछे से आती भीड़ ने धक्का देकर बस का भार इन लड़कियों की पीठ पर लाद दिया। विंडो सीट पर बैठ लड़की ने अपने कान में इयर फोन डाल लिए थे। रे़डियो जौकी उसके ज़ख्मों को हल्का कर रहा था। उसे पता था तीन किमी आगे चौराहे पर ब्वायफ्रैंड बाइक पर इंतज़ार कर रहा है। वह सिर्फ उस दिन का इंतज़ार कर रही थी कि कब कार होगी। आराम से बैठ कर जाएंगे। उसने डाउन टू अर्थ पत्रिका का कार से लगने वाली जाम का अंक फाड़ दिया था। अपनी सहेलियों से कह कर आई थी कि कोई बस के भीतर के जाम को हल्का करने के लिए सिग्नल या फ्लाईओवर क्यों नहीं बनाता। ईयरफोन से आती आवाज़ ने उसके विरोध के तेवर कम करने शुरू कर दिये थे तभी उसकी नज़र उस कार पर पड़ी जिसके भीतर दो लोग करीब आ चुके थे। एक ही आश्रम चौक के जाम में अनुभव अलग अलग हो रहा था। एमएनसी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का काम करने वाली प्रियंका कार के खरीदने के सपने में खो गई जिसकी अगली सीट के बीच गैप तो होगा मगर उस गैप में वो तमाम मर्द नहीं होंगे जो भीड़ का फायदा उठा कर ब्लू लाइन के भीतर लड़कियों की पीठ पर अपनी शराफत कुचलते रहते हैं। हर दिन एक लड़की की मौत होती रहती है। दिल्ली की तमाम लड़कियों ने इन अनुभवों को हमेशा के लिए अपने भीतर ज़ब्त कर लिया है। अपने पतियों को भी नहीं बताया। भाइयों को भी नहीं। दोस्तों को भी नहीं। बस जब भी जाम में फंसती है इनकी धड़कने किसी शैतानी हमले की आशंका में बढ़ जाती हैं।
जारी....
आश्रम जाम में रोमांस- पार्ट वन
(अविनाश की ख्वाहिश पूरी करने का इरादा कर लिया है। ट्रैफिक जाम पर अपने अनुभवों को उपन्यास में बदलने की कोशिश कर रहा हूं। पहली कड़ी हाज़िर है। )
कार ने बढ़ना बंद कर दिया था। शीशे पर चढ़े काले रंग की पन्नी ने कार के भीतर के अंधेरे को और गहरा कर दिया था। शाम आकर रात में ढल चुकी थी। एक रूके हुए सफ़र में इंतज़ार लंबा होता जा रहा था। दोनों ने अब सामने देखना बंद कर दिया था। वो अब एक दूसरे को देख रहे थे। इंतज़ार छोटा होने लगा। बेक़रारी बढ़ने लगी। सामने बहुत दूर पहिए से उतरा ट्रक एक सब्र पैदा कर चुका था। अब बहुत देर यहीं रहना होगा। सड़क के किनारे खड़े बिजली के खंभे की रौशनी उनके कार के बोनट पर उतर रही थी। सामने की कार की बैक लाइट अटक गई थी। दोनों को लगने लगा कि कार बंद हो गई है। बिजली के खंभे की रौशनी के बाद भी अंधेरा गहरा गया है। ट्रैफिक जाम की छटपटाहट शांत होने लगी थी।
बैक मिरर दूर तक नहीं देख पाता। लेकिन पीछे की कार की अगली सीट पर बैठे लोगों को साफ साफ देख लेता है। उनका चेहरा क्लोज़ अप में दिखने लगता है। दोनों के भाव बदलने लगे थे। वो एक दूसरे को देखने लगे थे। बहुत देर तक देखना चाहते थे। सामने की दोनों सीटों के बीच की दूरी कार डिज़ाइनर की बेवकूफी लगने लगी। इस गैप का कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा था। दोनों करीब आना चाहते थे। उनके कंधे झुकने लगे। इस तरह से झुक रहे थे जैसे दोनों मिलकर एक साथ कुछ देखना चाह रहे हों। बैक मिरर में साफ साफ दिख रहा था वो एक दूसरे को छूना चाहते थे। घर जाने की बेकरारी ट्रैफिक जाम में रोमांस पैदा कर रही थी। उनकी लाल होती आंखें बाहर उड़ते पेट्रोल के लाल धुएं में घुल रही थीं। दिमाग के जकड़े हुए नस अब खुलने लगे थे। साफ साफ दिख रहा था दोनों एक दूसरे में घुलमिल रहे थे। बैक मिरर पीछे की कार का पता बताता है। लेकिन कार की सामने के शीशे के पार जाकर देखने लगता है, जिस पर काली पन्नी की परत नहीं चढ़ाई जा सकती। ट्रैफिक जाम के तमाम बेकार लम्हों में यह लम्हा बेकरार हुआ जा रहा था। रेड एफएम का बकबक उनकी दुनिया में बाहरी दुनिया का दखल बन कर तंग रहा था। दोनों ने रेड एफएम बंद कर दिया।
बाहर जाम से तंग आकर बजाए जा रहे हार्न के शोर में अंदर एक खूबसूरत खामोशी तैरने लगी थी। मैंने लेन बदलने के लिए अपनी कार थोड़ी तिरछी कर ली। बैक मिरर की तरसती निगाहों को हमने हल्की सी सज़ा दी तो किसी को मेरे इस इंसाफ की भनक तक नहीं लगी। इस बीच कार के भीतर सामने की दोनों सीटों की छोटी सी दूरी पाट ली गई थी। मेरी कार की विंग मिरर से कुछ ऐसा ही दिखा था। विंग मिरर की इस किस्मत पर बैक मिरर जल भून गया। मोहब्बत के तमाम महफूज़ लम्हों में एक लम्हा दुनिया की नज़रों का भी होता है। जिनकी नज़र में चढ़ कर मोहब्बत पूरी दुनिया में फैलने के लिए उड़ान भरने लगता है। एक आशिक कई आशिक पैदा करता है। ट्रैफिक जाम में फंसे धंसे लोग कई कहानियां लिख रहे हैं।
जारी....
कार ने बढ़ना बंद कर दिया था। शीशे पर चढ़े काले रंग की पन्नी ने कार के भीतर के अंधेरे को और गहरा कर दिया था। शाम आकर रात में ढल चुकी थी। एक रूके हुए सफ़र में इंतज़ार लंबा होता जा रहा था। दोनों ने अब सामने देखना बंद कर दिया था। वो अब एक दूसरे को देख रहे थे। इंतज़ार छोटा होने लगा। बेक़रारी बढ़ने लगी। सामने बहुत दूर पहिए से उतरा ट्रक एक सब्र पैदा कर चुका था। अब बहुत देर यहीं रहना होगा। सड़क के किनारे खड़े बिजली के खंभे की रौशनी उनके कार के बोनट पर उतर रही थी। सामने की कार की बैक लाइट अटक गई थी। दोनों को लगने लगा कि कार बंद हो गई है। बिजली के खंभे की रौशनी के बाद भी अंधेरा गहरा गया है। ट्रैफिक जाम की छटपटाहट शांत होने लगी थी।
बैक मिरर दूर तक नहीं देख पाता। लेकिन पीछे की कार की अगली सीट पर बैठे लोगों को साफ साफ देख लेता है। उनका चेहरा क्लोज़ अप में दिखने लगता है। दोनों के भाव बदलने लगे थे। वो एक दूसरे को देखने लगे थे। बहुत देर तक देखना चाहते थे। सामने की दोनों सीटों के बीच की दूरी कार डिज़ाइनर की बेवकूफी लगने लगी। इस गैप का कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा था। दोनों करीब आना चाहते थे। उनके कंधे झुकने लगे। इस तरह से झुक रहे थे जैसे दोनों मिलकर एक साथ कुछ देखना चाह रहे हों। बैक मिरर में साफ साफ दिख रहा था वो एक दूसरे को छूना चाहते थे। घर जाने की बेकरारी ट्रैफिक जाम में रोमांस पैदा कर रही थी। उनकी लाल होती आंखें बाहर उड़ते पेट्रोल के लाल धुएं में घुल रही थीं। दिमाग के जकड़े हुए नस अब खुलने लगे थे। साफ साफ दिख रहा था दोनों एक दूसरे में घुलमिल रहे थे। बैक मिरर पीछे की कार का पता बताता है। लेकिन कार की सामने के शीशे के पार जाकर देखने लगता है, जिस पर काली पन्नी की परत नहीं चढ़ाई जा सकती। ट्रैफिक जाम के तमाम बेकार लम्हों में यह लम्हा बेकरार हुआ जा रहा था। रेड एफएम का बकबक उनकी दुनिया में बाहरी दुनिया का दखल बन कर तंग रहा था। दोनों ने रेड एफएम बंद कर दिया।
बाहर जाम से तंग आकर बजाए जा रहे हार्न के शोर में अंदर एक खूबसूरत खामोशी तैरने लगी थी। मैंने लेन बदलने के लिए अपनी कार थोड़ी तिरछी कर ली। बैक मिरर की तरसती निगाहों को हमने हल्की सी सज़ा दी तो किसी को मेरे इस इंसाफ की भनक तक नहीं लगी। इस बीच कार के भीतर सामने की दोनों सीटों की छोटी सी दूरी पाट ली गई थी। मेरी कार की विंग मिरर से कुछ ऐसा ही दिखा था। विंग मिरर की इस किस्मत पर बैक मिरर जल भून गया। मोहब्बत के तमाम महफूज़ लम्हों में एक लम्हा दुनिया की नज़रों का भी होता है। जिनकी नज़र में चढ़ कर मोहब्बत पूरी दुनिया में फैलने के लिए उड़ान भरने लगता है। एक आशिक कई आशिक पैदा करता है। ट्रैफिक जाम में फंसे धंसे लोग कई कहानियां लिख रहे हैं।
जारी....
आश्रम पर उपन्यास
बाहर की दुनिया को धीरे धीरे सरकता हुआ देख कर
अंदर एक शख्स ठहरा हुआ सा बैठा है
पीठ टेढ़ी हो गई है
गर्दन टेढी हो गई है
कमर सिकुड़ गई है
आंखें थक गई हैं
सीट बेल्ट से ज़कड़ा हुआ शरीर उसका
जाम में किसी बंधुआ सा लगता है
नैय्यरा नूर को सुनते हुए अविनाश ने
एफएम की तरह फरमाइश की
लिखा जाए आश्रम जाम पर एक उपन्यास
क्या लिखा जाए आश्रम जाम पर उपन्यास
सीट बेल्ट से आज़ादी के सपने देखता हमारा किरदार
ज़रा सी जगह की गुज़ाइश देख हरकत में आ जाता है
क्लच पर पांव दबाता है, ब्रेक से पांव हटाता है
गियर को हाथों से इधर उधर करता है
सरकारी फाइल की तरह सरक कर उसकी कार
वापस उसी अवस्था में ठहर जाती है
दफ्तर से सात बजे का निकला हुआ
दस बजे तक अटका हुआ है
किरदार आश्रम जाम में फंसा हुआ है
कहानी आगे कैसे बढ़ाई जाए
किरदार को सोचने के लिए कहा जाए
ट्रैफिक जाम के तीन समाधानों पर लिखो एक लंबा लेख
सिग्नल फ्री, फ्लाईओवर और एक्सप्रेस वे
उसकी व्यथा को शब्दों में बांध सुनाए, इससे पहले
रेड एफएम पर सूड नाम के जॉकी की आवाज़
पढ़ने लगता है हंसी के फव्वारे जैसी किताब
जाम में फंसे हुए लोगों का एक बाज़ार बनाता है
सूड उन्हें यथार्थ से दूर ले जाता है,रोते हुए लोगों को
एफएम वाला हंस हंस कर गाना सुनाता है
इस उपन्यास के कई काल खंड हो सकते हैं
कोई आश्रम में कोई सीपी में फंसा हो सकता है
दूर से राहत की तरह नज़र आती ट्रैफिक सिग्नल की लाइट
घर पहुंचने जैसे अहसासों से भर देती है
चौराहो पर पहुंच कर सफर अपने मंज़िल के करीब लगती है
गियर,क्लच और सीटबेल्ट के ज़रिये लिखा जा सकता है
ट्रैफिक जाम में फंसे किरदार पर उपन्यास
जब भी लिखा जाएगा, जैसा भी लिखा जाएगा
जाम में फंसे लोगों को ही समर्पित किया जाएगा
अंदर एक शख्स ठहरा हुआ सा बैठा है
पीठ टेढ़ी हो गई है
गर्दन टेढी हो गई है
कमर सिकुड़ गई है
आंखें थक गई हैं
सीट बेल्ट से ज़कड़ा हुआ शरीर उसका
जाम में किसी बंधुआ सा लगता है
नैय्यरा नूर को सुनते हुए अविनाश ने
एफएम की तरह फरमाइश की
लिखा जाए आश्रम जाम पर एक उपन्यास
क्या लिखा जाए आश्रम जाम पर उपन्यास
सीट बेल्ट से आज़ादी के सपने देखता हमारा किरदार
ज़रा सी जगह की गुज़ाइश देख हरकत में आ जाता है
क्लच पर पांव दबाता है, ब्रेक से पांव हटाता है
गियर को हाथों से इधर उधर करता है
सरकारी फाइल की तरह सरक कर उसकी कार
वापस उसी अवस्था में ठहर जाती है
दफ्तर से सात बजे का निकला हुआ
दस बजे तक अटका हुआ है
किरदार आश्रम जाम में फंसा हुआ है
कहानी आगे कैसे बढ़ाई जाए
किरदार को सोचने के लिए कहा जाए
ट्रैफिक जाम के तीन समाधानों पर लिखो एक लंबा लेख
सिग्नल फ्री, फ्लाईओवर और एक्सप्रेस वे
उसकी व्यथा को शब्दों में बांध सुनाए, इससे पहले
रेड एफएम पर सूड नाम के जॉकी की आवाज़
पढ़ने लगता है हंसी के फव्वारे जैसी किताब
जाम में फंसे हुए लोगों का एक बाज़ार बनाता है
सूड उन्हें यथार्थ से दूर ले जाता है,रोते हुए लोगों को
एफएम वाला हंस हंस कर गाना सुनाता है
इस उपन्यास के कई काल खंड हो सकते हैं
कोई आश्रम में कोई सीपी में फंसा हो सकता है
दूर से राहत की तरह नज़र आती ट्रैफिक सिग्नल की लाइट
घर पहुंचने जैसे अहसासों से भर देती है
चौराहो पर पहुंच कर सफर अपने मंज़िल के करीब लगती है
गियर,क्लच और सीटबेल्ट के ज़रिये लिखा जा सकता है
ट्रैफिक जाम में फंसे किरदार पर उपन्यास
जब भी लिखा जाएगा, जैसा भी लिखा जाएगा
जाम में फंसे लोगों को ही समर्पित किया जाएगा
दिल्ली के आश्रम फ्लाईओवर का जाम
कितनी उम्मीद से देखता हूं
सामने वाली लंबी सी कार में
बैक मिरर से चलाने वाले की आंखें
किसी दयावान की लगती हैं
कहता रहता हूं कि कब बढ़ायेंगे
बहुत देर हो गई,कार कब चलायेंगे
तभी अपने बैक मिरर में भी आंखें
किसी परेशान की दिखती हैं
पूछती है मुझसे वही सवाल
आप अपनी कार कब बढ़ायेंगे
बीस मिनट से वहीं थमी रही दुनिया
एफएम ने अनाउंस किया बदल गई दुनिया
ठहरे हुए,सरकते हुए,एक दूसरे से बचते हुए
सबने एक दूसरे को देखा और पूछा भी है
कार चलाने वालों की क्यों नहीं बदलती दुनिया
बस सबने बदल दिया अपना रेडियो चैनल है
रेडियो सिटी के जॉकी ने भी कर दिया एलान है
आश्रम चौक पर पांच किमी प्रति घंटे की रफ्तार है
हर दिन घर जाने का रास्ता लंबा होता जाता है
आश्रम आते ही सब कुछ थम सा जाता है
इस जाम का क्या करें, कैसे कहें इसका दर्द
बगल वाली कार की मोहतरमा ने देख कर मुझे
गुस्से से फेर लीं अपनी नज़र हैं
पीछे की कार में अंकल जी, छुपके छुपाके
कुरेद रहे हैं अपनी नाक को
सामने वाली कार में बैठा साफ्ट वेयर इंजीनियर
ईयर फोन ठूंस कर अपने कानों में
बतिया रहा है कलिग से, गरिया रहा है बॉस को
बीच बीच में पत्नी का टूं टूं करता एसएमएस भी
आता जाता रहता है
दिल्ली के आश्रम चौक का यह आंखों देखा हाल है
कहने को चौक है, लगता कारों की लंबी कतार है
सामने वाली लंबी सी कार में
बैक मिरर से चलाने वाले की आंखें
किसी दयावान की लगती हैं
कहता रहता हूं कि कब बढ़ायेंगे
बहुत देर हो गई,कार कब चलायेंगे
तभी अपने बैक मिरर में भी आंखें
किसी परेशान की दिखती हैं
पूछती है मुझसे वही सवाल
आप अपनी कार कब बढ़ायेंगे
बीस मिनट से वहीं थमी रही दुनिया
एफएम ने अनाउंस किया बदल गई दुनिया
ठहरे हुए,सरकते हुए,एक दूसरे से बचते हुए
सबने एक दूसरे को देखा और पूछा भी है
कार चलाने वालों की क्यों नहीं बदलती दुनिया
बस सबने बदल दिया अपना रेडियो चैनल है
रेडियो सिटी के जॉकी ने भी कर दिया एलान है
आश्रम चौक पर पांच किमी प्रति घंटे की रफ्तार है
हर दिन घर जाने का रास्ता लंबा होता जाता है
आश्रम आते ही सब कुछ थम सा जाता है
इस जाम का क्या करें, कैसे कहें इसका दर्द
बगल वाली कार की मोहतरमा ने देख कर मुझे
गुस्से से फेर लीं अपनी नज़र हैं
पीछे की कार में अंकल जी, छुपके छुपाके
कुरेद रहे हैं अपनी नाक को
सामने वाली कार में बैठा साफ्ट वेयर इंजीनियर
ईयर फोन ठूंस कर अपने कानों में
बतिया रहा है कलिग से, गरिया रहा है बॉस को
बीच बीच में पत्नी का टूं टूं करता एसएमएस भी
आता जाता रहता है
दिल्ली के आश्रम चौक का यह आंखों देखा हाल है
कहने को चौक है, लगता कारों की लंबी कतार है
जख़्मी कपड़ों का डॉक्टर

नोट- उत्तर प्रदेश के ज़िला ग़ाज़ियाबाद के वैशाली स्थित मार्केट सेक्टर फोर से यह तस्वीर ली गई है। रविवार की दोपहर अविनाश से बातचीत करते हुए अचानक इस पर नज़र गई। डा हरि नाम का यह दर्ज़ी इस दौर में नए आइडिया के साथ हाज़िर है। वो एक डाक्टर है। तुरपई नहीं करता बल्कि जख्मों की सीलता है। जख़्म शब्द को डा हरि ने ख़ून से रंग दिया है। जो हमारे कपड़ों के इधर उधर से फट जाने की व्यथा कह रहा है।
चमनमोती- इसका क्या मतलब है?
बिहार में निरक्षरों( सरकारी शब्दालय से लिया गया शब्द)ने अपने लिये एक डिग्री बनाई है। बहुत से पाठक जानते होंगे। इसे
सर्वजन भाषा में एलएलपीपी कहते हैं। इसका विस्तार कुछ इस तरह से है- लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर। अक्सर पढ़े लिखे लोग कमअक्लों को एलएलपीपी कहते हैं। अरे भई वो तो एलएलपीपी ही है। उसके पीछे दिमाग मत खराब करो। इस शब्द की उत्पत्ति किस काल और संदर्भ में हुई नहीं मालूम। लेकिन लगता है कि इसका उदगम साक्षरता निरक्षता विवाद के मध्य से हुआ होगा। साक्षर के पास डिग्री और निरक्षर के पास नहीं। कोई बर्दाश्त करेगा। मुझे तो लगता है कि इसे साक्षरों ने निरक्षरों को नवाज़ा होगा। उनकी तुलना में अपनी हैसियत ऊंची करने के लिए। तो आप कितने एलएलपीपी को जानते हैं बताइयेगा।
चमनमोती- साठ के दशक में अंगूर इसी नाम से बिकता था। मेरे ससुर जी ने कहा कि जब वो कलकत्ता से दिल्ली आए तो फेरीवाला इसी नाम से अंगूर बेचा करता था। चमनमोती ले लो। आज कल वो इसी नाम से तिन्नी को अंगूर खाने के लिए प्रेरित करते हैं। तिन्नी को अंगूर पसंद नहीं है। इसलिए उसके नाना जी कहते हैं कि ये अंगूर नहीं है, चमनमोती है। इसे खा लो। तिन्नी भी जानती है। सिर्फ नाम का कोई मतलब नहीं होता। आकार देखकर जान जाती है कि अंगूर ही है। नाम बदल गया तो क्या हुआ।
अहाता- इसका इस्तमाल अब तक आंगन के अर्थ में होता था। एक ऐसा इलाका जिस पर व्यक्ति विशेष का कब्जा होता था। उनके अहाते में कोई नहीं जा सकता था। किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनके अहाते में चला जाए। एक तरह से ज़मींदारी रौब से जुड़ा था। राजाओं का दरबार हुआ करता था तो ज़मींदारों का अहाता। आज ही पानीपत में एक बोर्ड देखा। देसी शराब का अहाता। अब अहाता का इस्तमाल ठेके के बदले हो रहा है। यहीं पर एक और साइनबोर्ड दिखा। लिखा था पानीपत जूस बार। ठेका अहाता और जूस कार्नर बार हो गया है। वैसे जूस कार्नर के प्रयोग पर हिंदी तहलका में एक ज़बरदस्त लेख छपा था। अभी भी साइट पर है। पढ़ें तो दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है।
पी देसी बोल विदेशी- यह भी एक देसी शराब के ठेके पर लिखा था। मजा आया। गुज़रता हुआ देखता जा रहा था।
नोट- अनामदास ने एलएलपीपी और चमनमोती का उदगम सही ढंग से बताया है। ककड़ियां लैला की के बारे में जानना हो तो
टिप्पणी में जाकर प्रियंकर को पढ़ सकते हैं।
सर्वजन भाषा में एलएलपीपी कहते हैं। इसका विस्तार कुछ इस तरह से है- लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर। अक्सर पढ़े लिखे लोग कमअक्लों को एलएलपीपी कहते हैं। अरे भई वो तो एलएलपीपी ही है। उसके पीछे दिमाग मत खराब करो। इस शब्द की उत्पत्ति किस काल और संदर्भ में हुई नहीं मालूम। लेकिन लगता है कि इसका उदगम साक्षरता निरक्षता विवाद के मध्य से हुआ होगा। साक्षर के पास डिग्री और निरक्षर के पास नहीं। कोई बर्दाश्त करेगा। मुझे तो लगता है कि इसे साक्षरों ने निरक्षरों को नवाज़ा होगा। उनकी तुलना में अपनी हैसियत ऊंची करने के लिए। तो आप कितने एलएलपीपी को जानते हैं बताइयेगा।
चमनमोती- साठ के दशक में अंगूर इसी नाम से बिकता था। मेरे ससुर जी ने कहा कि जब वो कलकत्ता से दिल्ली आए तो फेरीवाला इसी नाम से अंगूर बेचा करता था। चमनमोती ले लो। आज कल वो इसी नाम से तिन्नी को अंगूर खाने के लिए प्रेरित करते हैं। तिन्नी को अंगूर पसंद नहीं है। इसलिए उसके नाना जी कहते हैं कि ये अंगूर नहीं है, चमनमोती है। इसे खा लो। तिन्नी भी जानती है। सिर्फ नाम का कोई मतलब नहीं होता। आकार देखकर जान जाती है कि अंगूर ही है। नाम बदल गया तो क्या हुआ।
अहाता- इसका इस्तमाल अब तक आंगन के अर्थ में होता था। एक ऐसा इलाका जिस पर व्यक्ति विशेष का कब्जा होता था। उनके अहाते में कोई नहीं जा सकता था। किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनके अहाते में चला जाए। एक तरह से ज़मींदारी रौब से जुड़ा था। राजाओं का दरबार हुआ करता था तो ज़मींदारों का अहाता। आज ही पानीपत में एक बोर्ड देखा। देसी शराब का अहाता। अब अहाता का इस्तमाल ठेके के बदले हो रहा है। यहीं पर एक और साइनबोर्ड दिखा। लिखा था पानीपत जूस बार। ठेका अहाता और जूस कार्नर बार हो गया है। वैसे जूस कार्नर के प्रयोग पर हिंदी तहलका में एक ज़बरदस्त लेख छपा था। अभी भी साइट पर है। पढ़ें तो दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है।
पी देसी बोल विदेशी- यह भी एक देसी शराब के ठेके पर लिखा था। मजा आया। गुज़रता हुआ देखता जा रहा था।
नोट- अनामदास ने एलएलपीपी और चमनमोती का उदगम सही ढंग से बताया है। ककड़ियां लैला की के बारे में जानना हो तो
टिप्पणी में जाकर प्रियंकर को पढ़ सकते हैं।
बलिया में बूनी पड़ल बा का- आ गया भोजपुरी चैनल
ए भूपेद्र जी- तनी बताइ त बलिया में बूनी पड़ता का...
भूपेद्र जी- का कही शर्मिला जी,बिहाने से बूनी पड़ता। खेत के खेत गेंहूं दहा गईल बा।
अब इस संवाद को सुनने का मजा जल्द मिल जाएगा। भोजपुरी में एक चैनल लांच हो रहा है। उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर के पी के तिवारी यह काम करने जा रहे हैं।तिवारी जी ने न्यू दिल्ली टाइम्स नाम की फिल्म बनाई थी। इनके सेंचुरी कम्युनिकेशन्स ने
प्रज्ञा चैनल भी लांच किया है।यह धार्मिक चैनल है। अप्रैल माह में यह चैनल आ जाएगा।आज के दैनिक जागरण के अंक नई राहें में चैनल का विज्ञापन छपा है। विज्ञापन भोजपुरी में है।
चैनल का नाम महुआ है। इसमें न्यूज़ के अलावा गीत संगीत और सीरीयल भी होंगे। भोजपुरी में ब्लाग भी चल रहा है। मेरे लिए यह सुखद समाचार है। हर बोली का बाज़ार होना चाहिए और बाज़ार में हर बोली हो। भोजपुरी को कोई भगा ले। अब तो यह आ गई है। उन तमाम भाषाओं से मिल कर इतराने। ठुमका लगाने। उम्मीद है कामयाब चैनल होगा। शुभकामनायें।
कोशिश करता हूं कि पी के तिवारी का पता करें और उनका इंटरव्यू छापें ताकि भाई जी के विचार जानल जाओ। पता त चले कि न्यूज़ में शारदा सिन्हा के गीत सुनइहें या बलेसर के...आ रे रे....। चल भइया...डिश टीवी के बोल हो...तनि इहो चैनलवा दिखा
भूपेद्र जी- का कही शर्मिला जी,बिहाने से बूनी पड़ता। खेत के खेत गेंहूं दहा गईल बा।
अब इस संवाद को सुनने का मजा जल्द मिल जाएगा। भोजपुरी में एक चैनल लांच हो रहा है। उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर के पी के तिवारी यह काम करने जा रहे हैं।तिवारी जी ने न्यू दिल्ली टाइम्स नाम की फिल्म बनाई थी। इनके सेंचुरी कम्युनिकेशन्स ने
प्रज्ञा चैनल भी लांच किया है।यह धार्मिक चैनल है। अप्रैल माह में यह चैनल आ जाएगा।आज के दैनिक जागरण के अंक नई राहें में चैनल का विज्ञापन छपा है। विज्ञापन भोजपुरी में है।
चैनल का नाम महुआ है। इसमें न्यूज़ के अलावा गीत संगीत और सीरीयल भी होंगे। भोजपुरी में ब्लाग भी चल रहा है। मेरे लिए यह सुखद समाचार है। हर बोली का बाज़ार होना चाहिए और बाज़ार में हर बोली हो। भोजपुरी को कोई भगा ले। अब तो यह आ गई है। उन तमाम भाषाओं से मिल कर इतराने। ठुमका लगाने। उम्मीद है कामयाब चैनल होगा। शुभकामनायें।
कोशिश करता हूं कि पी के तिवारी का पता करें और उनका इंटरव्यू छापें ताकि भाई जी के विचार जानल जाओ। पता त चले कि न्यूज़ में शारदा सिन्हा के गीत सुनइहें या बलेसर के...आ रे रे....। चल भइया...डिश टीवी के बोल हो...तनि इहो चैनलवा दिखा
कौन क्या पढ़ रहा हैः पुस्तक मेले से लौट कर
पुस्तक मेले से लौट कर सोचा कि क्यों न हम ब्लागर इस बात की भी चर्चा करें कि कौन सी किताब खरीदी है और क्या पढ़ रहे हैं। तो शुरूआत कर रहा हूं कि कौन कौन सी किताबें मैंने खरीदी है।
१.मीडियानगर पार्ट ३, नेटवर्क संस्कृति, वाणी प्रकाशन
२.1857 के बाग़ी सिख- शम्सुल इस्लाम,वाणी प्रकाशन
३.1857 के हैरत अगेज़ दास्तान- शम्सुल इस्लाम, वाणी प्रकाशन
४.जातियों का राजनीतिकरण, बिहार में पिछड़ी जातियों के उभार की दास्तान - कमल नयन चौबे, वाणी
5.Noam Chomsky- Powers and prospects
6.Islam and healing, loss and recovery of an indo muslim medical tradition
by Seema Alavi, Permanent Black
7.The languages of political Islam in India c1200-1800 by Muzaffar Alam, Permanent Black
8. Man-eaters of Kumaon- Jim Corbett
9.Covering Islam- Edward W.Said
10.अंतरंगता का स्वप्न, भारतीय समाज में प्रेम और सेक्स, सुधीर कक्कड़
11.हिंदू स्त्री का जीवन, पं रमाबाई,अनुवाद- शंभू जोशी, संवाद प्रकाशन
12. रेहन पर रग्घू- काशीनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन( प्रियदर्शन ने भेंट की है यह किताब)
13. काशी का अस्सी- काशीनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन( प्रियदर्शन जी की एक और मेहरबानी)
14 तीन द्विज हिंदू स्त्रीलिंगों का चिंतन- डॉ धर्मवीर, वाणी प्रकाशन
१५. राजेंद्र माथुर संचयन, वाणी प्रकाशन
कुछ पुस्तकें पहले भी खरीदीं गईं हैं। लेकिन पाठकों को प्रभावित करने के लिए सूची लंबी कर दी गई है। कितना पढ़ पाते हैं यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। (वैसे आने वाला वक्त ही बतायेगा पंक्ति टीवी में खूब इस्तमाल होती है। पीटूसी के अंत में, पता नहीं पत्रकार पत्रकार रहेगा या नहीं लेकिन वो अपनी रिपोर्ट इस लाइन से खत्म करता है)
१.मीडियानगर पार्ट ३, नेटवर्क संस्कृति, वाणी प्रकाशन
२.1857 के बाग़ी सिख- शम्सुल इस्लाम,वाणी प्रकाशन
३.1857 के हैरत अगेज़ दास्तान- शम्सुल इस्लाम, वाणी प्रकाशन
४.जातियों का राजनीतिकरण, बिहार में पिछड़ी जातियों के उभार की दास्तान - कमल नयन चौबे, वाणी
5.Noam Chomsky- Powers and prospects
6.Islam and healing, loss and recovery of an indo muslim medical tradition
by Seema Alavi, Permanent Black
7.The languages of political Islam in India c1200-1800 by Muzaffar Alam, Permanent Black
8. Man-eaters of Kumaon- Jim Corbett
9.Covering Islam- Edward W.Said
10.अंतरंगता का स्वप्न, भारतीय समाज में प्रेम और सेक्स, सुधीर कक्कड़
11.हिंदू स्त्री का जीवन, पं रमाबाई,अनुवाद- शंभू जोशी, संवाद प्रकाशन
12. रेहन पर रग्घू- काशीनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन( प्रियदर्शन ने भेंट की है यह किताब)
13. काशी का अस्सी- काशीनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन( प्रियदर्शन जी की एक और मेहरबानी)
14 तीन द्विज हिंदू स्त्रीलिंगों का चिंतन- डॉ धर्मवीर, वाणी प्रकाशन
१५. राजेंद्र माथुर संचयन, वाणी प्रकाशन
कुछ पुस्तकें पहले भी खरीदीं गईं हैं। लेकिन पाठकों को प्रभावित करने के लिए सूची लंबी कर दी गई है। कितना पढ़ पाते हैं यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। (वैसे आने वाला वक्त ही बतायेगा पंक्ति टीवी में खूब इस्तमाल होती है। पीटूसी के अंत में, पता नहीं पत्रकार पत्रकार रहेगा या नहीं लेकिन वो अपनी रिपोर्ट इस लाइन से खत्म करता है)
किसान किसकाः पवार या प्रेमचंद का
साहित्य और फिल्मों ने किसानों के बारे में कुछ छवियां तय कर दी हैं। बाकी छवि प्रेस ने बनाई है। बारिश का इंतज़ार करते हुए आसमान तकते किसान की तस्वीर। उसके चेहरे की झुर्रियों का वर्णन और क्लोज अप में खाली बर्तन। किसान के बारे में क्या सोचें यह सब तय कर हमें विरासत में दिया गया है जिसे हम ढो रहे हैं।
सहारनपुर के योगेश दहिया, कृषि स्नातक हैं और खेती ही करते हैं। गुस्सा गए कि हम किसान को आदर्श किस आधार पर मानते हैं। वो किस आधार पर लाचार है। उन्होंने कहा कि आप किसान की हालत बतायें मगर एक ही हालत पिछले साठ साल से क्यों बता रहे हैं। जिस खेती पर साठ फीसदी आबादी निर्भर है उसकी समस्याओं की विविधता है। मगर आप पत्रकारों की नजर में किसान की एक ही समस्या है। भूखमरी, गरीबी या आत्महत्या क्या किसान सापेक्ष ही हैं। क्या दसवीं कक्षा के विद्यार्थी आत्महत्या नहीं करते। क्या साफ्टवेयर कंपनी के इंजीनियर आत्महत्या नहीं करते। योगेश ने कहा प्रेमचंद या साहित्य की नज़र से मत देखिये।
हमारा किसान काम नहीं करता। यह गलत धारणा है कि वह हाड़ तोड़ मेहनत करता है। धूप में वही काम नहीं करता। धूप में ड्राइवर भी गाड़ी चलाता है। ठेले वाला सब्जी बेचता है। हमारा किसान वक्त बर्बाद करता है। वह कचहरी जाएगा, दूसरे के खेत में जाकर नुकसान करता है। वह कोई अलग से आदर्श मानवजाति नहीं है। फिर बात आगे बढ़ी। कहा कि किसान को बदलना होगा। वह परंपरा के नाम पर गलत तरीके से खेती कर रहा है। योगेश कहते हैं क्या कोई पत्रकार यह बात कह सकता है कि किसान अपनी खेती बेवकूफी से करता है। जबकि सच्चाई यही है।
बहस लंबी होती जा रही थी। मैंने कहा बुंदेलखंड में स्थिति अलग है। पानी नहीं है। साधन नहीं है। योगेश ने कहा कि वो बुंदेलखंड की स्थिति हो सकती है पूरे किसान की नहीं। जहां कि मिट्टी अच्छी है और बाज़ार के नज़दीक है वहां क्यों नहीं किसान फायदा उठाते। योगेश कहने लगे कम से कम वह पहल तो करे। नए तरीके से सोच समझ कर खेती तो करे। जिनके पास ज़मीन है वो तो नए तरीके से खेती करें। ऐसा कैसे हो सकता है कि पच्चीस बीघे वाला किसान भी परेशान है और दो बीघे वाला भी। इसका मतलब कहीं गड़बड़ है।
इन बातों को लिए मैं बारामती आ गया। सहारनपुर के किसानों की हालत के उलट कृषि मंत्री शरद पवार का बारामती। योगेश का किसान यहां मिल गया। शीतल कंप्यूटर पर कई बाज़ारों में अंगूर की कीमत देख रहे थे। कहा कि अब हर बार पुणे में नहीं बेचता। सौ रुपये का लाभ उठाने के लिए कलकत्ता बेच देता हूं। शीतल कहने लगे हमें लागत कम करना होगा। इसके लिए गोबर से बने वर्मी कंपोस्ट का इस्तमाल करना होगा। ड्रीप इरिगेशन से पानी की लागत और मात्रा में बचत करनी होगी। तभी फायदा अधिक होगा। शरद पवार ने अपने यहां के किसानों में इसी सोच का निर्माण कर दिया है। इसीलिए बारामती एक शानदार कस्बा लगता है। सफाई है। हरियाली है और किसान एक्ज़िक्यूटिव लगता है। बारामती की अनाज मंडी का दफ्तर देखने लायक है। सोच वही कि किसान आए तो उसे लगे कि यह एक पेशेवर काम है सेवा नहीं है।
बारामती, जहां तीस साल पहले सिर्फ ज्वार की खेती होती थी, आज अंगूर, गन्ना, जरवेरा, गेहूं, धान, फूल और केला आदि की खेती करने लगे है। खेती से बाकी बचे ज़मीन पर वहां ईमू पक्षी का पालन होने लगा है। किसान सिर्फ अनाज नहीं उगाता वह दूध से लेकर तमाम तरह के कारोबार करता है। तमाम तरह के कोपरेटिव में वह संगठित है। शरद पवार ने यही सुनिश्चित किया है कि इनमें कोई घोटाला नहीं है। सभी किसानों का जीवन स्तर बेहतर और उम्मीदों भरा लगता है।
इसलिए कि किसान बदल गए हैं। बारामती में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक केंद्र है। किसान इस केंद्र का भरपूर इस्तमाल करता है लेकिन कोई सेवा मुफ्त में नहीं है। वह मिट्टी की जांच करता है, पानी की जांच करता है फिर शुल्क देकर एक सर्टिफिकेट लेता है। उसकी सोच किसान जैसी रहमत मिलते रहे वाली नहीं रही। राजनीतिक संरक्षण में भी किसान भ्रष्ट नहीं हुआ है। वह परजीवी नहीं हुआ है। यहां किसानों के लिए कोई भी सेवा फ्री नहीं है। उन्हें स्वावलंबी और चतुर बना दिया गया है। बाज़ार से खेलना जान गया है। बारामती कमाल का लगता है। पूरे इलाके में गुणगान करने वाला शरद पवार का एक भी पोस्टर नज़र नहीं आया। न ही दीवारों पर पुता हुआ उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह।
महाराष्ट्र के किसानों ने प्रगतिशीलता दिखाई है। नया प्रयोग किया है और साझा भी। वहां दैनिक सकाल का एक कृषि अखबार रोज़ निकलता है। अग्रो वन। महाराष्ट्र के एक लाख से अधिक किसान रोज़ इस दो रुपये के कृषि अखबार को खरीदकर पढ़ते हैं। दो साल से यह अखबार बिक रहा है। किसी किसान ने इसकी एक भी प्रति नहीं बेची है। बल्कि अखबार के सहारे वो अपनी खेती बदल रहे हैं।
किसान की समस्या अपनी जगह है। मगर इसकी बात तो करनी पड़ेगी। किसान को प्रेमचंद के बनाए पिंजड़े से निकालना होगा। उड़ना सीखाना होगा। आप कहेंगे कि बारामती की तरह भारत क्यों नहीं। जवाब भी है। भारत बारामती की तरह क्यों नहीं।
इसे मैंने मेरा गांव मेरा बजट में समेटने की कोशिश की है। जो शुक्रवार रात साढ़े दस बजे एनडीटीवी इंडिया पर आएगा। शनिवार को दोपहर साढ़े बारह बजे।
सहारनपुर के योगेश दहिया, कृषि स्नातक हैं और खेती ही करते हैं। गुस्सा गए कि हम किसान को आदर्श किस आधार पर मानते हैं। वो किस आधार पर लाचार है। उन्होंने कहा कि आप किसान की हालत बतायें मगर एक ही हालत पिछले साठ साल से क्यों बता रहे हैं। जिस खेती पर साठ फीसदी आबादी निर्भर है उसकी समस्याओं की विविधता है। मगर आप पत्रकारों की नजर में किसान की एक ही समस्या है। भूखमरी, गरीबी या आत्महत्या क्या किसान सापेक्ष ही हैं। क्या दसवीं कक्षा के विद्यार्थी आत्महत्या नहीं करते। क्या साफ्टवेयर कंपनी के इंजीनियर आत्महत्या नहीं करते। योगेश ने कहा प्रेमचंद या साहित्य की नज़र से मत देखिये।
हमारा किसान काम नहीं करता। यह गलत धारणा है कि वह हाड़ तोड़ मेहनत करता है। धूप में वही काम नहीं करता। धूप में ड्राइवर भी गाड़ी चलाता है। ठेले वाला सब्जी बेचता है। हमारा किसान वक्त बर्बाद करता है। वह कचहरी जाएगा, दूसरे के खेत में जाकर नुकसान करता है। वह कोई अलग से आदर्श मानवजाति नहीं है। फिर बात आगे बढ़ी। कहा कि किसान को बदलना होगा। वह परंपरा के नाम पर गलत तरीके से खेती कर रहा है। योगेश कहते हैं क्या कोई पत्रकार यह बात कह सकता है कि किसान अपनी खेती बेवकूफी से करता है। जबकि सच्चाई यही है।
बहस लंबी होती जा रही थी। मैंने कहा बुंदेलखंड में स्थिति अलग है। पानी नहीं है। साधन नहीं है। योगेश ने कहा कि वो बुंदेलखंड की स्थिति हो सकती है पूरे किसान की नहीं। जहां कि मिट्टी अच्छी है और बाज़ार के नज़दीक है वहां क्यों नहीं किसान फायदा उठाते। योगेश कहने लगे कम से कम वह पहल तो करे। नए तरीके से सोच समझ कर खेती तो करे। जिनके पास ज़मीन है वो तो नए तरीके से खेती करें। ऐसा कैसे हो सकता है कि पच्चीस बीघे वाला किसान भी परेशान है और दो बीघे वाला भी। इसका मतलब कहीं गड़बड़ है।
इन बातों को लिए मैं बारामती आ गया। सहारनपुर के किसानों की हालत के उलट कृषि मंत्री शरद पवार का बारामती। योगेश का किसान यहां मिल गया। शीतल कंप्यूटर पर कई बाज़ारों में अंगूर की कीमत देख रहे थे। कहा कि अब हर बार पुणे में नहीं बेचता। सौ रुपये का लाभ उठाने के लिए कलकत्ता बेच देता हूं। शीतल कहने लगे हमें लागत कम करना होगा। इसके लिए गोबर से बने वर्मी कंपोस्ट का इस्तमाल करना होगा। ड्रीप इरिगेशन से पानी की लागत और मात्रा में बचत करनी होगी। तभी फायदा अधिक होगा। शरद पवार ने अपने यहां के किसानों में इसी सोच का निर्माण कर दिया है। इसीलिए बारामती एक शानदार कस्बा लगता है। सफाई है। हरियाली है और किसान एक्ज़िक्यूटिव लगता है। बारामती की अनाज मंडी का दफ्तर देखने लायक है। सोच वही कि किसान आए तो उसे लगे कि यह एक पेशेवर काम है सेवा नहीं है।
बारामती, जहां तीस साल पहले सिर्फ ज्वार की खेती होती थी, आज अंगूर, गन्ना, जरवेरा, गेहूं, धान, फूल और केला आदि की खेती करने लगे है। खेती से बाकी बचे ज़मीन पर वहां ईमू पक्षी का पालन होने लगा है। किसान सिर्फ अनाज नहीं उगाता वह दूध से लेकर तमाम तरह के कारोबार करता है। तमाम तरह के कोपरेटिव में वह संगठित है। शरद पवार ने यही सुनिश्चित किया है कि इनमें कोई घोटाला नहीं है। सभी किसानों का जीवन स्तर बेहतर और उम्मीदों भरा लगता है।
इसलिए कि किसान बदल गए हैं। बारामती में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक केंद्र है। किसान इस केंद्र का भरपूर इस्तमाल करता है लेकिन कोई सेवा मुफ्त में नहीं है। वह मिट्टी की जांच करता है, पानी की जांच करता है फिर शुल्क देकर एक सर्टिफिकेट लेता है। उसकी सोच किसान जैसी रहमत मिलते रहे वाली नहीं रही। राजनीतिक संरक्षण में भी किसान भ्रष्ट नहीं हुआ है। वह परजीवी नहीं हुआ है। यहां किसानों के लिए कोई भी सेवा फ्री नहीं है। उन्हें स्वावलंबी और चतुर बना दिया गया है। बाज़ार से खेलना जान गया है। बारामती कमाल का लगता है। पूरे इलाके में गुणगान करने वाला शरद पवार का एक भी पोस्टर नज़र नहीं आया। न ही दीवारों पर पुता हुआ उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह।
महाराष्ट्र के किसानों ने प्रगतिशीलता दिखाई है। नया प्रयोग किया है और साझा भी। वहां दैनिक सकाल का एक कृषि अखबार रोज़ निकलता है। अग्रो वन। महाराष्ट्र के एक लाख से अधिक किसान रोज़ इस दो रुपये के कृषि अखबार को खरीदकर पढ़ते हैं। दो साल से यह अखबार बिक रहा है। किसी किसान ने इसकी एक भी प्रति नहीं बेची है। बल्कि अखबार के सहारे वो अपनी खेती बदल रहे हैं।
किसान की समस्या अपनी जगह है। मगर इसकी बात तो करनी पड़ेगी। किसान को प्रेमचंद के बनाए पिंजड़े से निकालना होगा। उड़ना सीखाना होगा। आप कहेंगे कि बारामती की तरह भारत क्यों नहीं। जवाब भी है। भारत बारामती की तरह क्यों नहीं।
इसे मैंने मेरा गांव मेरा बजट में समेटने की कोशिश की है। जो शुक्रवार रात साढ़े दस बजे एनडीटीवी इंडिया पर आएगा। शनिवार को दोपहर साढ़े बारह बजे।
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