लूटेरा का चितेरा

कहानी हमेशा कहानी नहीं होती । जैसे ज़िंदगी कभी वैसी ज़िंदगी नहीं होती । इश्क़ निरपेक्ष भी हो सकता है । तमाम तरह की बंदिशों और दलीलों के निरपेक्ष । लूटेरा कहानी है न कविता । कभी कहानी है तो कभी 
कविता है । कविता में भी छंद नहीं है । नागार्जुन है । कहानी में भी सुखांत दुखांत नहीं है । ओ हेनरी की लास्ट लीफ़ ( पढ़ी है न पढ़ूँगा ) का आख़िरी पत्ता है । मगर वैसा नहीं जैसा वो पत्ता था । किसी कहानी से बाहर आकर पेंटिंग का वो टुकड़ा है जिसे पेड़ पर धागे से बाँध दिया जाता है । हेनरी की कहानी का यह पत्ता किसी कविता के अधूरे छंद की तरह लटकाया जाता है । वरुण और पाखी के इश्क़ को समझने के लिए पाखी को उसकी बुद्धि या परिपक्वता के चश्मे से देखने की लत होगी तो उसका किरदार समझ से परे लगेगा । कैसे पाखी एक लूटेरा पर दिल लुटा सकती है । कैसे पाखी में लूटेरा के प्रति इश्क़ तब भी बचा रह जाता है जब वो जानती है कि उसके बाबा की मौत का कारण ही वरुण है । दरअसल यही पाखी है । उसका इश्क़ उसके भीतर लगातार सूख रहा है । सूखा नहीं है अभी । जब तक उसका आख़िरी क़तरा बचा है वो वरुण की याद में जागती है । वो बदला लेने से पहले उस आख़िरी क़तरे को अपने भीतर पूरा होने देती है । वरुण एक शातिर लूटेरा है । वो जानता है । पर हो जाने देता है । एक क़तरा पाखी का अपने भीतर पनप जाने देता है । जानता है कि वो कहीं से भी आता हो जाना उसे उसी सुरंग से है जहाँ उसके चाचा और दोस्त इंतज़ार कर रहे होते हैं । भगोड़ा । गिरोह छोड़ कर आ जाता तो क्या कहानी हमारी आपकी तरह हो जाती जो आए दिन सिनेमा के पर्दे पर उतरती रहती है । क्या यह कथाकार निर्देशक की हिम्मत की बात नहीं कि पाखी का लूटेरा लूटेरा लौटता है । डलहौज़ी में वो सन्यासी या कुछ और बनकर लौट सकता था । दरअसल वो पाखी की आहट को भांप गया था । इसलिए कि उसके भीतर वो कशिश रह गई थी जिसे वो माणिकपुर में छोड़ आया था । मगर वो सब कुछ तर्कों से देखता है । जैसे हम सिनेमा को तर्कों से देखना चाहते हैं । पाखी देखना ही नहीं चाहती । वो बाहर से भले मरती लग रही हो मगर भीतर से अपने वरुण को जी रही है । जैसे बर्फ से ढंक जाने और पत्तों के झड़ जाने के बाद भी पेड़ ज़िंदा रह जाते हैं । मरते नहीं हैं । हम अब इश्क़ कहाँ करते हैं । मैच मेकिंग करते हैं । दिलचस्पियों की अदला बदली करते हैं । हैसियत का हिसाब लगाते हैं । क़द और रंग का मिलान करते हैं । सब जोड़ने घटाने के बाद इश्क़ करते हैं । लूटेरा की कहानी इन्हीं सब तय यक़ीनों के दायरे के बाहर घट रही है । जिसे देखने के लिए ग़ैर यकीनी की ज़िद छोड़नी पड़ती है । जैसे आप एक लड़की का उसकी जान लेने की हद तक पीछा करने वाले रांझणा के नायक के चित्रण पर अपने यक़ीन को दरकिनार कर देते हैं । रांझणा का नायक 'स्टाकर' है । आपराधिक प्रवृत्ति वाला । लूटेरा का नायक अपराधी ही है । दोनों में ख़ास अंतर नहीं मगर हम एक को स्वीकार कर लेते है और दूसरे को ख़ारिज । क्यों ? लूटेरा की कहानी वरुण की नहीं पाखी की है । पर्दे और दरवाज़े के पीछे वो कितनी बार छिपती है और निकलती है । पाखी इश्क़ में उड़ नहीं रही । दरवाज़े से बार बार झांकती निकलती है । आगे बढ़ती है पीछे हटती है । जलती है । सुलगती है । लूटेरा एक अलग फ़िल्म है । हर सीन एक स्केच है । दूसरे से अलग । कहानी दोनों के बनते इश्क़ के निजी प्रसंगों में घट रही है । कहानी का कोई 'ग्रैंड नैरेटिव' महावृतांत नहीं है । पर्दे पर बोलने के एक नए लहज़े की खोज है । या कहीं भुला दी गई शैली की पुनरावृत्ति । सरगोशियों का कविता की तरह इस्तमाल है । पाखी और वरुण की बातों की सरसराहट आपको उस स्पेस में ले जाती है जहाँ पहले से सारी कहानियाँ मौजूद नहीं हैं । हैं भी तो वो उनसे बच बचाकर आहिस्ता आहिस्ता बात कर रहे हैं । लाजवाब लगा । दोनों के कपड़े किसी पेंटिंग से कम नहीं । सोनाक्षी का अभिनय संतुलित है बल्कि शुरू से लेकर अंत तक एक ही मीटर पर है । लूटेरा कई लोगों को अच्छी नहीं लगी । यह फ़िल्म अच्छी या बुरी के पैमाने पर शायद ही खरी उतर पाये । उसी के दिल में उतरेगी जिसने कभी किसी को चाहा है । किसी का कोई स्पर्श उसके भीतर बचा रह गया है । ज़ुबिश की आहट जिसने महसूस की है । जिसने किसी के लिए खत भी लिखा मगर पुरानी पढ़ी गई कहानियों के अनुभव से घबरा कर फेंक दिया । जैसे पाखी लिख ही नहीं पाती । वो भी उन कहानियों से बाहर निकल कर रचने का स्पेस नहीं खोज पाती या बना पाती । वरुण घर से बाहर पत्तों से ख़ाली पेड़ पर एक रंगीन पत्ता टाँग कर स्पेस बना देता है । और तमाम तय कहानियों की तरह अंत में गोली खाने चला जाता है । पाखी एक अनकही कहानी के इस नए स्पेस को देख मुस्कुराती है । वरुण उसे घर के बाहर ले आता है । नए स्पेस में । हवा तेज़ है । लास्ट लीफ़ की फड़फड़ाहच बेचैन करती है । पैराग्राफ़ मत बदलो जीवन में । वाक्यों का बदल जाना ही पैराग्राफ़ का बदलना है । हर नई पंक्ति को पिछली पंक्ति से अलग लिखो और जीने की आदत डालो । हम इस कहानी को अपनी ज़िंदगी के मानकों से कभी स्वीकार नहीं करेंगे मगर पर्दे पर इश्क़ की ख़ूबसूरत चित्रकारी को देख तो सकते ही हैं । क्या किसी कहानी पर आह या वाह कहना हमेशा ज़रूरी ही है । क्या यह भी तय है ? जैसे क्या यह ज़रूरी है कि हम हमेशा लुटेरा ही लिखें, लूटेरा नहीं । जब नाम में व्याकरण नहीं तो कहानी में कैसे हो सकता था । 

6 comments:

प्रमोद सिंह said...
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प्रमोद सिंह said...

लुटेरवा लुटलल जाये रे, कवने डगरिया बहंगिया, हो सखी.. छठ वाला गाना का एमें यूज किया है कि नहीं?

Ravi Parashar said...

mujhe aisa lagta hai ravish ji ne iss kahani ko kabhi jiya.

Nimue said...

poori movie fir se aankhon me utar aayi .. liked the movie. and the post !

दीपक की बातें said...

बेहद शानदार, आपकी यह पोस्ट दिल में उतर गई।

malini awasthi said...

ravish ji, bahut lambe arse k bad maine ek aisi film dekhi, jis se ishq kiya ja sakta hai... kahani, paatr, naaika, chhayankan, prishthbhoomi sangeet, aur ishq ke itne aayam... sab.. bahut dinon k bad kisi film me dekhne ko mila.. lootera dekhna aisa hi anubhav hai.. jaise ki shartchandra ya gurudev tagore ki koi bangali premkatha ko padhna.. ya phir... dil me utar jane vali ek mohak painting ka aankh men bas jana..
shukriya is post k liye...