फांसी पर एक पुराना प्रकाशित लेख


फांसी की सज़ा कौन तय करे? अदालत या सियासत? इंसाफ की परिभाषा कानून से तय हो या उस समाज की भावनाओं से जो राजनीति तय करती है। राजनीति तय करेगी तो कहां तक करेगी और किस किस मामले में करेगी। इसका इम्तहान राजनीति देगी। बलवंत सिंह राजोआना के मसले ने फांसी की राजनीति को बदल दिया है। बीजेपी की पुरानी सहयोगी अकाली दल ने बीजेपी और कांग्रेस के शुरूआती विरोध और चुप्पी के बाद भी जिस तरह से माफी के लिए पहल की उसे आने वाले वक्त में सियासी कसौटी पर परखा जाता रहेगा। अव्वल तो पंजाब में ही यह सवाल लंबे समय तक गूंजेगा कि प्रकाश सिंह बादल ने समझदारी का परिचय दिया या गर्म ख्याली संगठनों के आगे घुटने टेक दिये। बहुत गहराई से देखें तो कांग्रेस और बीजेपी ने चुप रह कर फांसी पर होने वाले फैसलों को सख्त या नरम राज्य की परिभाषा से मुक्त कर दिया है। अब फांसी पर राजनीतिक निर्णय लेना आसान हो जाएगा। ध्यान रखना होगा कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी जिसने अकाली दल की मांग को तुरंत स्वीकार कर लिया। राजोआना की फांसी टल गई।

जिस वक्त पंजाब के लोग सड़कों पर उतर रहे थे उसी दौरान दिल्ली में कहा जा रहा था कि यह पंजाब में गर्म ख्याली संगठनों का उभार है। कोई लोगों की भावना को राजनीतिक तौर पर नहीं पढ़ पा रहा था। आतंकवाद के दौर के बाद कई चुनावों में पंजाब ने अलगाववादी मुद्दों को छोड़ दिया है। इसी चुनाव में किसी भी ऐसे संगठन को जीत हासिल नहीं हुई जिन्हें कट्टरपंथी बताया जाता है। और फिर जिस वक्त लोग सड़कों पर उतरे उस वक्त सूबे में कोई चुनाव भी नहीं हो रहा था। ज़ाहिर है इस जनाक्रोश को आशंका के अलावा इस तरह से भी देखा जाना चाहिए कि पंजाब चौरासी के दंगों और आंतकवाद के दौर में हुई नाइंसाफियों पर बराबर का हिसाब चाहता है। उनकी बात को सुना जाना चाहिए जिन्होने कहा कि अगर चौरासी के दंगों के दोषियों को फांसी हुई होती तो कोई राजोआना के लिए सड़क पर नहीं उतरता। कहना मुश्किल है कि क्या होता मगर यह सवाल महत्वपूर्ण है। उतना ही जितना कि यह सवाल भी जो लोग आतंकवाद के शिकार हुए उनके हिसाब से इंसाफ कब और कैसे होगा। हमारी जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर सबको भरोसा होता तो ये सवाल अदालत के हर फैसले के साथ शांत होते जाते। भड़कते नहीं।

ऐसी बात नहीं है कि पंजाब में राजनीतिक दलों ने किसी अदम्य साहस का परिचय दिया है। एक फौरी समझदारी ज़रूरी दिखाई है। अगर साहस से सामना करना होता तो सरकारें बताती कि आतंकवाद के दौर में आम लोगों के साथ कैसी ज्यादातियां हुई, उनमें शामिल लोगों को सज़ा देती। तब इंसाफ उन्हें भी मिलता जिनके लोग आतंकवादियों के निशाने पर आए और जिनके लोग सिर्फ शक के आधार पर आतंकवादी बताकर मार दिये गए। लेकिन यह एक जटिल सवाल है। आसान सवाल यह है कि फांसी के सवाल पर लाइन ले ली जाए। इससे भावनाओं के तरफ होने में सहूलियत हो जाती है।यह कहना आसान है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पहल कर इस मसले को कट्टरपंथी ताकतों के हाथ में जाने से बचा लिया। जो सवाल है उससे प्रकाश सिंह बादल भी नहीं टकराते।
बलवंत सिंह राजोआना ने कभी रहम की मांग नहीं की। वो फांसी पर चढ़ना चाहता है। लेकिन उसके उठाये सवाल जवाब मांगेंगे। यही कि दंगों में मारे गए निर्दोष सिखों के कातिल कहां हैं? पंजाब की धरती पर मारे गए नौजवानों की पहचान क्यों नहीं हुई? मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिपोर्टों और धरने प्रदर्शनों में धूल खा रहे इन सवालों को राजोआना ने आवाज़ दे दी है। उसने भी इस मौके का फायदा उठाया है ताकि लोग चौरासी के दंगों के ऊपर बात कर सके। जिसे बीजेपी ने भी छोड़ दिया है। राजोआना के मसले पर कांग्रेस और बीजेपी ने चुप रहकर अहसान नहीं किया है। अपनी मजबूरी स्वीकार की है। इसका एक फायदा ज़रूर हुआ कि पंजाब में इस मसले पर राजनीतिक टकराव नहीं हुआ। लोगों का सड़कों पर उतरना राज्य सरकार की नज़र में कानून और व्यवस्था का ही सवाल बना रहा है।

राजनीतिक दलों ने इन सवालों को सांप्रदायिक चश्मों से नहीं देखा। इसीलिए पूछा जा रहा है कि यह चश्मा तब भी पहनेंगे जब अफज़ल गुरू की फांसी को दया याचिका में बदलने की मांग जोर पकड़ेगी। हम अफज़ल के मसले पर कांग्रेस और बीजेपी का खेल देख चुके हैं। कांग्रेस चुप हो जाती है। बीजेपी उग्र हो जाती है। अकाली दल के इस फैसले ने आगे से बीजेपी को भी नई लाइन तय करने के लिए मजबूर किया है। अब बीजेपी को सफाई देनी पड़ेगी कि बलवंत सिंह राजोआना की फांसी पर वह चुप हो जाती है और अफज़ल गुरु को लेकर आक्रामक। क्या उसका विरोध धर्म आधारित है? अकाली दल के सांसद नरेश गुजराल कह रहे हैं कि वक्त आ गया है कि राजनीतिक दल मिलकर एक सख्त फैसला करें। फांसी की सज़ा के प्रावधान को हटा दें और हमेशा के लिए इस मजबूरी से आजा़द हो जाएं। शायद यही बेहतर ही होगा वर्ना बादल की यह लाइन बीजेपी के किसी भी लाइन को बहुत परेशान करेगी।


राजोआना के सवाल पर राजनीति को इतनी जगह नहीं मिलती अगर दंगों के सवाल पर हमारी राज्य संस्थाएं निष्पक्ष नज़र आती। पूछा तो जाएगा ही कि गुजरात दंगों का इंसाफ नहीं मिलता है, सिख दंगों का इंसाफ नहीं मिलता है लेकिन इनसे पैदा हुए हालातों से भटके कुछ लोगों को फांसी पर ज़रूर लटका दिया जाता है। यह कानून की निष्पक्षता के लिए भी ज़रूरी है कि हर सवाल के जवाब उससे मिले। इस सवाल का जवाब भी कि बलवंत सिंह राजोआना आतंकवादी क्यों बना? जिसके पिता को आतंकवादियों ने मार दिया वो लड़का आतंकवादी क्यों बना? क्यों उसके मुंहबोले डैडी के परिवार के साथ पुलिस ने ज्यादतियां की? क्यों उसकी मुंहबोली बहन और मां को भी मार दिया गया। बलवंत सिंह राजोआना शायद इसीलिए फांसी पर चढ़ जाना चाहता है ताकि वो हम सबकी बुज़दिली को आइना दिखा सके। पूछ सके जिन्हें शक या संबंध के आधार पर आतंकवादी बताकर मारा गया उनका क्या कसूर था? अगर उनका बलिदान ही था तो इतिहास कैसे दर्ज करेगा।

उन आंकड़ों का कोई फायदा नहीं कि आज़ादी के बाद साल में एक से भी कम लोगों को फांसी हुई। उन बातों का भी मतलब नहीं कि राष्ट्रपति को यह प्रावधान दिया गया है कि वो फांसी को रहम में बदलने से पहले जनहित की परिस्थितियों पर भी विचार करें। यह सवाल उन बातों से भी हल नहीं होंगे कि दुनिया भर में फांसी की सज़ा के खिलाफ जनमत है। यह सवाल उन बातों से भी हल नहीं होंगे कि अमेरिका के कई राज्यों में फांसी की सज़ा फिर से शुरू हो रही है। राजनीति से मिलेगी। भागलपुर के दंगों , गुजरात के दंगों और सिख विरोधी दंगों का इंसाफ सिर्फ अदालती फैसलों से नहीं निकलेगा।

इस सवाल का सामना करने का साहस अभी राजनीतिक दलों में नहीं आया है। जनता में आया है। इसीलिए वो कई दलों और सरकारों को माफ कर देती है और आगे बढ़ जाती है। मगर अधूरे सवाल जवाब मांगते हैं। उन सवालों का जवाब आप विधानसभाओं से फांसी के खिलाफ प्रस्ताव पास कर नहीं दे सकते। मेनिफेस्टों के किसी कोने में लिख कर नहीं दे सकते। बलंवत सिंह राजोआना के उठाये सवालों को फिर किसी मोड़ और मुद्दे के लिए अधूरा छोड़ दिया गया है। जिसका जवाब हम पुराने हथकंडों से नहीं दे सकते कि पंजाब में कट्टरपंथी ताकतें पांव पसार रही हैं। एक बार फिर से पंजाब के चुनावों में जनता की भागीदारी और पसंद को सामने रख लीजिएगा।



6 comments:

shahbaz alam said...

Ye lekh nehayat hi sanjida hai ,hamare desh mein rajniti ka dohra mapdand hai!logon ko khabar tak nahi hoti fansi ho jati hai,ek state mein curfew lag jata hai,internet,mobile,cable sabhi thap!aisa kyon?

anurag kumar said...

fansi ko hatana kya fansi pr ho rhe samasyao ka samadhan h??muje nhi lagta hamare desh me hamesa se her chiz pr politics huyi h..kisi ko fansi dena n dena ye bhi partiya apne fyade se nirdharit karti h..bjp apni fyade ke liye guru ki fansi mang rhi thi or congress apne fyade ke liye fansi nhi de rhi thi..phir punja koi achuta nhi..ek rashtpati 6 fansi ki file clear kr dete h ek ke pass ek bhi file nhi pahuchti..to phir fansi pr bawal kyu jb man ho apne fyade se de de fansi..isi chiz ko lekar phir hungame honge phir political partiyo ko fansi ka mauka milega...hamara dohrapan hi hamari samsya h..kashmir ke halat ki chinta kiye bagar fansi di jaa skti h to phir punjab ke saath bhi ho skta h..

JS said...

Today, Phansi has become a political punishment.

JS said...

Today, Phansi has become a political punishment.

प्रवीण पाण्डेय said...

फाँसी में भी पक्षपात, लोग इससे ही आहत हैं।

ddp said...

hello sir,.., your twitter account is not working.. ? didnt know how to contactyou and hence wrote this comments. Have you stopped ur account on twitter ? Pls reply ..,

Thanks
darshan.