पॉल रॉबसन- तुम्हारी मिसिसिपी और मेरी गंगा

पहलेजा घाट से बच्चा बाबू के जहाज़ से एलसीटी घाट तक की यात्रा में एक ही कसक होती थी। उफनती लहरों के बीच उबला अंडा बाबूजी खिला दें। उसका पीला हिस्सा और ऊपर काली मिर्च की कतरनें। धोती कुर्ता में पितृपुरुष जब पूछ लेते थे कि खाना है तो लगता था कि गंगा की तरह कितनी ममता है इनमें। गांव से पटना की बीच गंगा ज़रूर होती थी। उसके बाद स्कूल के रास्ते में कई वर्षों तक समानांतर बहती रही। ठीक से याद है कि ज़माने तक गांव से लेदी(गाया का चारा) और हमलोगों के खाने का अनाज नाव पर लाद कर आता था। गंगा ले आती थी। जब नाव आती थी तो घर मलाहों से भर जाता था। मछली का स्वाद बदल जाता था। उनकी चमकती बाज़ुओं की बलिष्ठता आकर्षित करती थी। लगता था कि कितनी शक्ति है इन मलाहों में। सिक्स पैक वाले ख़ानों से बहुत पहले हमने स्वाभाविक बलिष्ठता अपने गांव के मलाहों में देखी थी। मालूम नहीं था कि सड़क और मोटर क्रांति नदियों से सामाजिक रिश्ते को खत्म कर देगी। और फिर एक दिन नदियां भी खत्म होने लगेंगी।

फिर वो वक्त आया जब पटना एशिया से लेकर विश्व तक में प्रसिद्ध हो गया। गंगा नदी पर पुल बन गया। गांधी सेतु। हम गंगा के ऊपर से उड़ने लगे। मोतिहारी पटना की दूरी कई घंटों की जगह पांच घंटे में सिमट गई। अब उबले अंडे का रोमांच चला गया था। वो विशिष्ठ नहीं रहा। पटना की सड़कों पर सर्दी में मिलने लगा था। बाबूजी कहते थे कि साहब लोगों का नाश्ता होता है। सीखो खाना। लेकिन बाबूजी अब मोतिहारी पटना के बीच बने लाइन होटलों पर रूकने लगे। मीट और भात। सिरुआ और पीस की बात होने लगी। हाजीपुर रूककर बस से हाथ निकालकर मालभोग केला। दूर कहीं गंगा छूटती नज़र आने लगती थी। उसकी ठंडी हवा याद दिलाती रहती थी कि हमारी धारा से न सही, धारा के ऊपर से तो गुज़रने लगे हो। फिर भी हाईवे पर ट्रकों के कपार पर गंगा तेरा पानी अमृत लिखा देखता तो कुछ हो जाता। लगता कि गंगा है तो। भले ही गंगा हमारे रास्ते में नहीं है। अब तो गंगा तेरा पानी अमृत भी सड़क साहित्य से गायब हो चुका है। हमलोगों ने गांधी सेतु को रास्ता बना लिया था। गंगा छूट गई थी। दिल्ली आने के बाद बनारस के पास गंगा दिखने लगी। तेज़ी से गुज़र जाती। कई सालों तक दिल्ली पटना के रास्ते में खिड़की पर बैठा बनारस का इंतज़ार करता रहता था। गंगा को प्रणाम करने के लिए। आज भी करता हूं। किसी अंध श्रद्दा से नहीं। गहरे रिश्ते के कारण। गंगा को देखना और देखते रहना आज भी जीवन के सर्वोत्तम रोमांच में से एक है। धीरे धीरे पटना जाना कम होने लगा। गंगा दिखनी कम हो गई।

जब पहली बार हवाई जहाज़ से पटना गया तो शहर के ऊपर से निकलते हुए जहाज़ अचानक गंगा के ऊपर से मुड़ने लगा। खिड़की से झांककर देखा तो गंगा बीमार लग रही थी। उसकी गोद से रेत के गाद निकल आए थे। ऐसा लगा कि किसी ने गंगा की लाद को चीर दिया है। प्रणाम तब भी किया। हाथ तो नहीं जो़ड़ा लेकिन मन ही मन। देख रही हो न गंगा। अब हम हवा में उड़ रहे हैं। बहुत दुख हुआ अपनी गंगा को देखकर। गांधी सेतु भी गंगा की तरह जर्जर हो चुका है। गंगा को हमने खूब देखा है। चौड़े पाट। बेखौफ लहरें। नावें। कभी कभी मोहल्ले के दोस्तों के साथ बांस घाट में नहाना। वो भाव कभी नहीं उमड़ा जो पटना में गंगा को देखकर होता था। हरिद्वार और बनारस में गंगा अल्बम की तस्वीर लगती थी। अभी तक मैंने नदियों के मसले को लेकर किसी आंदोलन के बारे में कुछ भी नहीं पढ़ा था। बस एक रिश्ता था जो स्मृतियों में धंसा हुआ है।

पहली बार नयना से पता चला था पॉल राबसन के बारे में। ऐसा लगा कि मिसिसिपी गंगा की मौसी है। दोनों बहने हैं। दोनों की व्यथा एक है। भूपेन हज़ारिका की आवाज़ में सुना तो धड़कनें तेज़ हो गई। गंगा तुम गंगा बहती हो क्यों। किसके लिए ये नदी बहती आ रही है। मनुष्य का नदियों से प्रयोजन पूरा हो चुका है। वो नदी मार्ग से सड़क मार्ग की ओर प्रस्थान कर चुका है। नदियों की धाराओं और मार्गों के नाम को लेकर कोई लड़ाई नहीं है। हर मनुष्य का ख्वाब है कि कोई सड़क उसके नाम हो जाए। तब भी गंगा क्यों बही जा रही है। हम जैसे रिश्तेदारों को तड़पाने के लिए। कुछ तीज त्योहारों के लिए। गंगा उपक्रम नहीं रही है। वो कर्मकांड बन चुकी है। पॉल रॉबसन के बारे में जानकर बड़ा गर्व हुआ था। वैसे ही जैसे पहली बार पानी के जहाज़ में उबला अंडा खाकर बड़े लोगों का नाश्ता सीख लिया था। लेकिन जब एनडीटीवी के न्यूज़ रूम में अचानक एक दिन कह दिया कि पॉल रॉबसन को सुना है। किसी ने सर नहीं हिलाया। सोचा क्या फर्क पड़ता है। गंगा तब भी बहती जा रही होगी। पॉल रॉबसन तब भी गाया जाता रहेगा।

गंगा को लेकर गाने यूट्यूब पर खूब सुनता रहा हूं। गंगा मइया,मइया,हो गंगा मइया,गंगा मइया में जब तक कि पानी रहे, मेरे सजना तेरी ज़िंदगानी रहे। क्यों रो देता हूं मालूम नहीं। गंगा तेरा पानी अमृत झर झर बहता जाए। याद तो नहीं जब गंगा मइया तोरे पियरे चढइबो देखी थी तो दिल खूब मचला था । आज भी इसके गाने यूट्यूब पर सुनता हूं। इस गाने में बनारस की गंगा की जवानी देखियेगा। क्या लहरें हैं। क्या मस्ती है। कितनी नावें एक साथ चल रही हैं। हे गंगा मइया तोहे पियरी चढइबो, सइयां से कर दे मिलनवा हाय राम। मालूम ही नहीं था गंगा महबूब के आने का रास्ता भी है। उसे मिलाने का ज़रिया भी है। इस गाने में गंगा में जो नावों की भीड़ है वो बताती है कि गंगा पवित्र पावनी से ज्यादा नदी मार्ग थी। हमारे आने जाने का ज़रिया। पॉल रॉबसन तुम्हारी मिसिसिपी को हमने नहीं देखा है। पढ़ा था कभी किताबों में। समझ सकता हूं एक नदी का बुढ़ाना। अविनाश के फेसबुक वॉल पर तुम्हारे जन्मदिन की बात देखी। बुढ़े नदी को कुछ तो मालूम ही है। गंगा को भी कुछ क्या सब मालूम है। पर उसे मालूम ही नहीं कि वो बहती है क्यों।

47 comments:

रज़िया "राज़" said...

गंगा मइया,मइया,हो गंगा मइया,गंगा मइया में जब तक कि पानी रहे, मेरे सजना तेरी ज़िंदगानी रहे। क्यों रो देता हूं मालूम नहीं।
रविशजी आपको हर जगह पढते हैं हमें लगता है जैसे आपको हिन्दुस्तान के हर गांम तहसील से लेकर जिला राज्य यहाँ तक सारा हिन्दुस्तान आपको जानता-मानता है । आपके एसी संवेदनशील मन की वजह से । सिर्फ़ एक अंकर या रिपोर्टर न बनकर आप अपने काम के साथ साथ हर रिपोर्ट की गहराई तक सारे दर्शकों को लेजाते हैं। इसी लिये आपका रोना लाजमी है।

Meenakshi said...

ravish ji Main Ganga ji ki god me badi hui hun जब पहली बार हवाई जहाज़ से पटना गया तो शहर के ऊपर से निकलते हुए जहाज़ अचानक गंगा के ऊपर से मुड़ने लगा। खिड़की से झांककर देखा तो गंगा बीमार लग रही थी haan aaj chubhti aaj wahan kakadi kheti hoti hai ek wakt tha jab mehndru se paleja ghat jaya jata tha फिर वो वक्त आया जब पटना एशिया से लेकर विश्व तक में प्रसिद्ध हो गया। गंगा नदी पर पुल बन गया। गांधी सेतु। ab toh Gandhi setu bhi badi ho gayi Ganga ji nadarat dil rota hai ..badi hui mangurahan see nagdahan areeraaj- gadaak dekhi lekindil rota hain main roti hun meri ganga aaj kahan hai kash main bhi vidiya pati hoti toh mere dawar bhi GANGA JI aati meenakshi singh

Taj said...

AAP KA SHUKRYA HUM KAUN HAI WO AAP YAAD KARATE RAHTE HAI.....

Taj said...
This comment has been removed by the author.
Poornima said...

Really heart touching..

smiley said...

Ganga Jaal aaj bhi hamare liye Pujya hai.Per Jab Hum Vanaras Ya Haridwar Jate Hai,Bottle mai Pani To Bhar Lete hai,Lekin Nahane K Liye Hichkichahat karte hai.Charo Taraf Itni Gandi Hoti hai ki Pani ke chita sar pe dekar hi Ganga Naha Leta hai.noitikotae stholon dekheo manobotaar poton dekheo nirlojjo olosh bhabe boicho kano ??

Ajit Jha said...

दिल्ली आने के बाद बनारस के पास गंगा दिखने लगी। तेज़ी से गुज़र जाती। कई सालों तक दिल्ली पटना के रास्ते में खिड़की पर बैठा बनारस का इंतज़ार करता रहता था। गंगा को प्रणाम करने के लिए। आज भी करता हूं। किसी अंध श्रद्दा से नहीं। गहरे रिश्ते के कारण। गंगा को देखना और देखते रहना आज भी जीवन के सर्वोत्तम रोमांच में से एक है। ........ रवीश जी आप जिस तरह से अपने भावनाओ को एक रिपोर्टर होकर दर्शक को उस की गहराईयों में ले जाते है वो बहुत ही काम लोग कर पाते है

suresh said...

Heart touching ravishji

Abhay said...

मुंह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन,

आवाज़ों के बाज़ारों में, ख़ामोशी पहचाने कौन?
- निदा फ़ाज़ली

आश्चर्य होता है, ये एक माँ की व्यथा है, जिसने न जाने कितने को पाला -पोसा है. हम भी पुश्तैनी विन्ध्याचल (मिर्ज़ापुर) से जुड़े हुवे लोग हैं, बिना गंगाजल के आज भी..क्या मजाल है, एक कर्मकांड हो जाये.. लेकिन बात वही कि...हमारे लोगों को लगता ही नहीं ..."गंगा जो दूसरों को पवित्र करती है कभी खुद भी ऐसे गन्दगी का शिकार हो सकती हैं."

ओ गंगामैया... तुम बहती हो क्यूँ - ऐसी व्यथा सहती हो क्यूँ?

ओह! तुम .... माँ हो न.. ममतामयी माँ! शायद इसीलिए.

Sameer Ranjan said...

Bahut hi acha h

विनीत कुमार said...

बाबूजी के साथ जब भी आप कुछ खाने-पीने की चर्चा करते हैं, मेरा तुरंत मन खाने को कर जाता है.कितनी तरलता होती है, उस वर्णन में, पहले दहीबड़े और अब अंडे..पोस्ट की दूसरी लाइन पढ़कर दो अंडे लाने गया,चूल्हे पर चढ़ा दिया है और फिर आगे का हिस्सा पढ़ा..

Sumit Sharma said...

behad umda

ABHISHEK KUMAR MISHRA said...

ravish jee mai aapko to kaphi dino se sunta aa raha hoon..par aaj pahli baar aapko padha hai...aapne to mujhe mere bachpan ki yaad taza kara di jab hum buxar se ballia jane ke liye steamer se ganga paar kar ujiyar ghat jaya karte the...us waqt jahaz pe wo khatte mitthe pachak bika karte the... hum badi himmat karke pitajee se pachak kharidne ko kaha karte the...us apchak ka to anand hi kuchh aur tha...
aur fir schooling ke dauran bhagalpur me jahaz ghat pe hamara matargasti karna ab to smritiyon me hi dafan ho gaya hai...wahan ganga g ke kinare ek purana jahaz pada hua tha jo kabhi ganga me faskar bekar ho gaya tha,hamare khelne ka adda hua karta tha...shukrawar ko jo ek ghante ktifin hota tha tab hm apne school cms high school se bhagkar wahan pahunch jaya karte the...wo anand to ab bade bade beach par bhi ghumne me nahi aata hai...
in sabo me ek chiz badi hi common thi aur wo thi ganga jiski yaad aapne taaza kara di dhanyawad ravish g dhanyawad.

Shailesh said...

Saw Mississippi River last year in Minneapolis. Uski haalat bhi apni Ganga ki tarah hi kharaab hai..Ganga to fir bhi bah rahi hai kahin kahin par. Mississippi to apni delhi ki Yamuna ki bahan lag rahi thi.

Good article. Felt emotional. Nadiyan samaaj aur community ko jodne ka bhi kaam karti thi..par samay ke sath sath soch badalne lagi hai hamari aur samaaj dono ki ..shayad hamein ab ye accept kar hi lena chahiye..par agar ham nadi ke sath waisa rishta nahi jos sakte to bhi hamein unhein bachaaye rakhna padega warna ek din ham nahi bach paayenge unke paani ke bina..

Krishna said...

बिलकुल दिल को छू लेने वाला वर्णन बहुत अच्छा लिखा है आपने...सच मे गंगा अब स्मृतियों तक ही सीमित हो कर रह गई है....मुझे भी अपना बचपन याद आता है जब हम गाँव से आकार उजियार घाट पर, बक्सर के लिए नाव या स्टीमर से गंगा पार करते थे पटना आने के लिए क्योंकि उस समय वहाँ पुल नहीं बना हुआ था और अजब सा रोमांच महसूस होता था गंगा की रवानी देख कर, बीच नदी मे सोंस की कलाबाजियां देख कर अजब सा भय मिश्रित अचरज होता था की ये कौन सा प्राणी है...माँ गंगा जी को देखते ही प्रणाम करती हमसे भी करने को कहतीं ...शायद ये संस्कार बचपन से ही मन के किसी कोने मे जड़ जमा कर बैठ गए हैं..और आज भी पटना हाजीपुर के बीच या बक्सर-भरौली, या मुगलसराय -बनारस के बीच गंगा के ऊपर से गुजरते हुए श्रद्धा तो होती है मगर रोमांच न जाने कहाँ खो गया....हमने अपनी जीवनदायिनी गंगा की कितनी दुर्गति कर दी है वो देख के ही समझ मे आ जाता है....

Ashok Bhargava said...

रविशजी,
पटना से पहलेजाघाट की वो यात्राएं आपने याद करवा दीं जो हम लोगों ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान की थीं। मैं अनुपम मिश्र का घनिष्ट मित्र हूं। आपकी टिप्पणियां शौक से पढ़ता हूं।
अशोक भार्गव

dr.mahendrag said...

bahut hi sundar prastuti,ab pratidin padhna chhaunga

Kailash Singh said...

maine pehli baar apka blog padha hai.bahut prabhavit hua hoon.hum Ganga ko maa kehte hain.par apni maa ki stithi itni buri karne wali aulad ko kya kahenge.humne ismein apne paap dhoye hain.lekin maa ko dooshit karne ka paap kahan dhoya ja sakta hai..sochna to padega hi.aao Gaanga ko swachchh karein..prayshchit karein..

Pratham Verma said...

Ravish sir.!! Apka post padha, its really touching. Pahle bhi apke kayi post padhe hain maine..but ye post padh kar aisa laga jaise ye ek mahaj blog post nahi hai aapke andar Ganga ke present aur future ki ek pida hai..jo bilkul sahi hai..

प्रवीण पाण्डेय said...

गंगा गवाह है, तभी तो स्व भूरे हजारिका यह प्रश्न पूछते हैं।

shailendira singh said...

ravish ji aap ko sunna kaanoo ko bahut sukuun deta haiii.lovee you

shailendira singh said...

ravish ji aap ko sunna kaanoo ko bahut sukuun deta haiii.lovee you

shailendira singh said...

ravish ji aap ko sunna kaanoo ko bahut sukuun deta haiii.lovee you

Brij ka baashinda said...

गंगा को देखना और देखते रहना आज भी जीवन के सर्वोत्तम रोमांच में से एक है। satya vachan. behad umda. ganga maiya aapki lekhni ko anvarat banaye rakhe aisi kaamna h. shukriya

JC said...

JC
7:22 AM (13 minutes ago)

to me
JC has left a new comment on the post "पॉल रॉबसन- तुम्हारी मिसिसिपी और मेरी गंगा":

"यहीं तो हिन्दुस्तान मार खा गया" रविश बाबू!
गंगा नदी हर मानव शरीर में प्रतीकात्मक रूप में बह रही है, और उसे आप और हम पढ़े-लिखे किन्तु 'नाड़ी' कहते हैं, 'सुसुक्ष्मना नाड़ी', और मनरूपी मानसरोवर से ही उपजी अन्य दो मुख्य नदियों यमुना और लुप्त सरस्वती/ ब्रह्मपुत्र को इंगला और पिंगला नाड़ी... ये तीनों ही तो उद्गम से सागर तक, सहस्रार और मूलाधार के बीच सूचना का आदान प्रदान करती चली आ रहीं हैं अनादि काल से, जब से स्वयं शून्य, शक्ति रूप, से उत्पत्ति कर मानव को धरा अर्थात गंगाधर शिव ने धर लिया...:)

yogvir singh said...

पढ़ कर अच्छा लगा ।

Gurpreet said...

It is worth reading..........thanks for writing such lines.

shashank ashwin said...

I have been to Patna only once, truth be told, I never paid attention to the condition of Ganga there, but once again you have proved to be the thought-provoking person I have come to respect. This blog made me ponder back on the condition of living near my hometown-Jamshedpur and the condition of rivers around it. Keep writing, your blog is an inspiration for many unknown writers out in the world.

Akhilesh Jain said...

'यावत गंगा कुरुक्षेत्रे, तावत जीवित बालक:' यानी जब तक गंगा रहे, तब तक बालक जीवित रहे। ऐसे आशीर्वाद भी नहीं रहे..

Subash Vaid said...

Govt has spent many crores to clean Ganga. In future also many crores will be spent to clean Ganga. Shall we allow to keep Ganga clean or keep spending on cleaning, cleaning, cleaning.

माधोदास उदासीन said...

माटी की खुश्बू है आपकी वाणी मे....

माधोदास उदासीन said...

फ़ेसबुक पे आपके पेज का लिंक हो सके तो दीजियेगा

swaraj said...

sir main hindi main apne coputer par likhna nahi janta,par itna kahta hoon ki jab aap ndtv par boltey ho to lagata hai pura india bol raha hai.

nptHeer said...

We have cornered our rivers like our parrents in the madness of modernisation.we says rivers are our mother but the truth is-they are just some streems for us to drain off our industrial and hezardous wastes.not only poluting our resouces but the public higine too.
These all just 'human barking' in the ears of rigid govts and corporates.useless.
Anyways i can not forget 'kankhal' for giving me plasent experiances of the holy gunga.
god save it.hope a new 'bhagirath' will come forward.

ajeet said...

1984 के पहले एक-आध बार बच्चा बाबु के जहाज से एल.सी.टी. घाट उतरना मुझे भी याद है, उम्र पांच-छह साल होगी. जहाज में नीचे ही बैठना होता था. बाकी सरस्वती पूजा के भसान में तो नाव पर का रोमांच और भैया लोगों का मल्लाहों से कहकर नाव को बीच धार में ले जाकर भसान करना. गंगा जी हमारे भी खुशकिस्मत बचपन का यादगार हिस्सा रही हैं. कुर्जी घाट पर एक सरकारी स्टीमर लगा रहता था, दोनों भाई चुपके से घर से निकलते थे और उस स्टीमर से कूद कर खूब नहाते थे. घर आने पर देह सफ़ेद हुआ रहता था फिर खूब मां की डांट मिलती थी. वैसे गाँधी सेतु का क्या दोष है, गंगा जी की धार सिमटने में? ये तो हम शहरी जीवन के सुखों की ही कीमत चूका रहे हैं जहाँ हमें बिजली देने के नाम पर गंगा जी के जीवनदायिनी प्रवाह को रोक लिया गया है. अब तो एक छठ पर्व ही है जब सारे पटनावासी गंगा जी की दुर्दशा पर चिंता करते हैं और फिर पारण के साथ ही उन चिंताओं को भी विसर्जित कर देते हैं. आने वाली पीढ़ी के लिए तो हमारे पास सिर्फ गंगा जी से जुडी यादें और अपने बचपन के किस्से ही रहेंगे, जिनपर शायद उन्हें विश्वास भी ना हो......

Niraj said...

waisse to main aapki reporting ka murid pahle se hi tha. Aapki 'Ravish ki report' aur abb 'Prime time' ka intezaar hamesaa rahta hain. Aaj hi aapke blog ke bare mein pata chala. Ekdum vastavikta ke karib. Purane dino ki yaad aa gayi jab Patna se gaawn jaate the.
Good writing...

JC said...

Mississippi (?) & Ganga (and all other big and small rivers) carry potable, life-giving, water to all family members of Vasudha...:)

Quamar Hashmi said...

शानदार,लेखन शैली ने मस्तिष्क में छाप छोड़ दी

ERP Consultant said...

kya neeche diya gaya comment aapko sambodhit hai -

नाम बड़े और दर्शन छोटे ..... !!! '' पर उपदेश कुशल बहुतेरे... की हकीकत NDTV के एक बरिष्ठ पत्रकार है रवीस कुमार ,,,उनके प्रोग्राम में और पत्रकारों की अपेक्षा थोडा सा अंतर पाया जाता है क्यों बो कभी कभी बैलेंस बात भी कर लिया करते है ...लेकिन कल गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनाई गई स्पेशल SIT से क्लीन चिट मिलने के बाद NDTV पर एक प्रोग्राम के दौरान दर्शको से मिली प्रतिक्रिया के बाद रबीस कुमार अपना आपा खो बैठे और धमकी देने लगे की बो अपना प्रोग्राम TRP के लिए नहीं करते है और जिसको ना देखना हो बो उनका प्रोग्राम न देखे ..और बो किसी को बुला कर अपना प्रोग्राम नहीं दिखाते है उनकी इस प्रतिकिया से ये तो पता चल गया की खुद को बरिष्ठ पत्रकार होने का दंभ पाले बैठे जादातर पत्रकार सपनो की दुनिया में जीने के साथ खुद के बनाये स्वपनलोक में ही जीने के आदि है और ये भूल जाते है की जब बो टीबी स्क्रीन पर आ कर तमाम तरह के भाषण देते तो दर्शक उनके भाषणों को बखूबी समझ भी लेते है ..जैसे की हर पत्रकार ये कहता है की जनता की आबाज सबसे जादा महत्वपूर्ण है और उसका टीबी चैनल अपने दर्शको को सच दिखने के लिए दुनिया भर के पापड़ बेलता है ..पर कल की धमकी और दर्शको के लिए निम्नस्तरीय भाषा पर उतर आये रबीस कुमार को बोलते समय ये याद नहीं रहा होगा की तमाम तिकड़मो और नेताओं से सैटिग के बाद कोई भी अपना टीबी चैनल भले ही खोल ले लेकिन टीवी चैनल को जिन्दा रहने के लिए दर्शको की ही जरुरत पड़ती है और शायद रबीश जी ये भी भूल गए की इसी देश में एक कहाबत है..'' पर उपदेश कुशल बहुतेरे....'' और रबीस जी की प्रष्ठभूमि भी ग्रामीण छेत्र की है तो उनको इस लाईन का अर्थ भी भलीभांति पता होना चाहिए .... .. उनको ये भी याद रखना चाहिए की बो जमाना गया जब ...मुन्ने मियां फाख्ता उड़ाया करते थे''' अब बो दौर नहीं है की आप जो चाहे बोल बक देगे और जनता आप की हर बात को सर माथे पर ले लेगी ... रबीस कौन होते है दर्शको से ये कहने बाले की दर्शक क्या देखे और क्या ना देखे ,,अगर रबीस एक सामान्य नागरिक की तरह अपने ड्राइंग रूम में कुछ बोलेगे तो उस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी लेकिन जब बो एक पत्रकार के रूप में टीबी पर देश के मुद्दों पर बात करेगे और अपनी राय रक्खेगे तो जनता को हक़ है की बो अपनी प्रतिकिर्या दे ,,,, ऐसा कैसे हो सकता है की रबीस कुछ भी बोले और जनता उसको खुदा का आदेश मान ले .... और रही बात TRP की तो रबीस को इस मुद्दे पर अपने उन साहब लोगो और चैनल के मालिको से बात करनी चाहिए जिनसे बो अपनी तनखा लेते है .... जनता को धमकी और भाषण देने से पहले उनको और उनके चेनल को अपने गिरेबान में झाकने की जरुरत है .... ऐसा कैसे हो सकता है की NDTV के पत्रकार जनता द्वारा चुनी हुई गुजरात सरकार के खिलाफ अभियान चला कर एक पक्षीय समाचार दिखाते रहे और जनता इनकी हर बात पर आँखे मुंद कर भरोसा कर ले .........!!!Ranveer Singh Bhadoria

yogvir singh said...

ERP Consultant जी इतनी कुंठित मनस्थिति ठीक नहीं.... दर्शक बेवकूफ नहीं होते उनकी चिंता मे आप चिंतित न हों । बंदा ठेठ बेबाक इंसान है और आप पर भरोसा करने के लिए भी कोई दबाव नहीं है ।

Aamir said...

behtareen!!! dil ko choo lene wali.... lekin ye hamari kami hai k hum sirf kehte hain, sunte hain, rote hain phr chup ho jate hain... apne kaamo mein mast.... phr kuch din baad wahi rona....

JC said...

JC said...
"गंगा तू आये कहाँ से/ गंगा तू जाए कहाँ रे"???
अरब सागर आदि से पंचभूतों के मिले जुले प्रयास से मॉनसून हवाओं द्वारा प्रतिवर्ष निरंतर पूर्वोत्तर दिशा की ओर बादलों के रूप में अग्रसर हो हिमालय रुपी बाँध के कारण रोके जाने पर 'भारत' में ही बरस पुनः अपने पिता सागर से मिलन से पहले प्यासी धरा और उसके परिवार के असंख्य सदस्यों की विभिन्न क्षेत्रों की मांग पूरी करने मानसरोवर से अपने उद्गम स्थल गोमुख से बह......

"जल ही जीवन है"!!! और "गंगा तेरा पानी अमृत"!!!
"शिव ही सत्य है", और "सत्यमेव जयते"...
जब हम बच्चे थे तो एक ओर तो दुखी परिवार के सदस्य अर्थी उठाये सड़क में जाते 'राम नाम सत्य है' कह रहे होते थे, तो सरल किन्तु शैतान बच्चे 'मुर्दा बेटा मस्त है' कह रहे होते थे... शायद सत्य यही है!

April 15, 2012 6:29 AM

cfp123 said...

Good one…
chennaiflowerplaza.com

Aryaputra said...

i might have visited my native place only a few times for god knows why..but the attachment i have with the soil of Bihar is something which a child has with his mother... ek Telepathy hai... Kab sochta hun to dil khun ke aansoon rota hai... Sirf Ganga hi nahi...wahan ki zindagi..waha ki kathinaiyan..mujhe neend se utha deti hai... shayad yahi jazba hai..kuch karne ka...apne Bihar ke liye..apne Bihar ke logo ke liye..jo mujhe prerit karta hai mujhe UPSC ki preparation me...ki mai kuch kar paunga apne logon ke liye... kuch behtar..kuch accha.. kuch yaaden jo ....agne aane wali peedhiyan bhi dekh saken..mehsoos kar sake..

ravish ji... you are the only reporter/anchor in NDTV which i like...keep doing the good work.. haan mujhe kabhi kabhi lagta hai li...Naukri ki mazbooriyan kabhi kabhi aap se woh kam bhi karwa leti hain...jo shayad aapka jameer jiski permission na de...phir bhi... keep up the good work..

akhilesh said...

sach dil ko choone wala lekh hai lekin aakhir is tarah ganga kab tak bahegi? kya hame iske liye koi thos kadam nahi uthane chahiye

preety said...

..गंगा के सारे रिश्तेदार ऐसा ही सोचते हैं..बहुत अच्छा लिखा है ..

shankar couture said...

ravish ji ...aap ki lekhni ..mujhe apni school ki yad dila deti hai...mai v hindibhashi school se hu...aisi kalamtod pahle school me padhi ..aaj aapse suni...bahut achha lga...man ko gudguda gaye