तकनीक का धाक धिना धिन


आज पान की गुमटी में बारह वोल्ट के इस इंवर्टर को देखकर सुखद अहसास सा हुआ। पान की गुमटीवाले ने बताया कि नगद अठारह सौ में और किश्त पर दो हज़ार में। इस इंवर्टर से आठ वाट का सीएफएल बल्ब जल जाता है। इंवर्टर घर से चार्ज करके लाता हूं। इससे रोशनी भी हो रही है और कटिया लगाकर बिजली चोरी करने से मुक्ति मिल गई है। बार-बार बिजली और पुलिसवाले को रिश्वत देनी पड़ती थी। हमारे देश में करोड़ों गुमटियों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के उत्पाद बिकते हैं। ये रोज़गार का सबसे बड़ा ज़रिया है। मगर इन्हें औपचारिक तरीके से बिजली नहीं मिलती। ये बिजली कंपनियों की अदूरदर्शिता और तकनीकी नाकामी है कि वे सड़क के किनारे सजी दुकानों को बिजली मुहय्या नहीं करा सकतीं। लिहाज़ा एक लंबे वक्त तक ढ़िबरी,लालटेन और बैटरी के लालटेन से इन्हें अपनी रोज़ी रोटी चलानी पड़ी। फिर इन्होंने सर के ऊपर से गुज़रती तारों से गैर कानूनी तरीके से अपना हिस्सा मांगा। लोगों को लगा कि ये बिल नहीं दे सकते इसलिए चोरी करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ऐसा कभी था भी नहीं। चोरी की बिजली से मुक्ति का जश्न मनाने का मौका मिला तो गुमटीवाले ने झट से दो हज़ार रुपये की किश्त पर छोटा इंवर्टर ले लिया।

यही अनुभव कोलकाता में भी हुआ। झाल मुरी और फुचका बेचनेवालों के ठेले से ढ़िबरी गायब है। चीन से आयातित एल ई डी बल्बों की भुकभुकाहट से उनका ठेला रौशन हो रहा है। धंधा चकाचक चल रहा है और रौशनी पर खर्च भी कम हो रहा है। पूंजीवाद कभी भी आम लोगों की तकलीफों के निदान का प्रयास सबसे पहले नहीं करता। वर्ना सोचिए भुने हुए चने के बीच में एक टिन की डिब्बी में जलती बाती। हल्की सी हवा पर भुकभुकाहट और फिर बंद हो जाना। पेट्रोमेक्स का ज़माना तो और भी तकलीफदेह था। अचानक बुझ गया। उसकी जाली जल गई। हवा पर हवा दिये जा रहे हैं। टाइट होने के बाद ही जाली जलती थी और रौशनी मिलती थी। अब इन सबसे मुक्ति मिल रही है। देश में बिजली के उत्पादन की जो हालत है उसके लिए और बीस पचीस साल इंतज़ार करने होंगे। लेकिन उससे पहले ऐसे कमाल के आइटम कमाल कर रहे हैं।

इसीलिए जब सैमसंग और कैनन के फोटोस्टेट मशीनें लघु रूप में आईं तो अब ये दर्जी,परचून और दवा की दुकानों पर भी मिलने लगी हैं। तकनीकी की इस उपलब्धता ने लोगों को अतिरिक्त रोज़गार का साधन उपलब्ध करा दिया है। इससे पहले जब आर टी ओ दफ्तर के बाहर के दलालों ने भी कई विकल्प निकाले। उन्हें दफ्तर बनाने की अनुमति नहीं है इसलिए वो मारुति ८०० और वैन में फोटो स्टेट मशीन लाद लाये। वो एक महंगा विकल्प था। एक दिन अचानक इंडिया गेट की झाड़ियों में फोटो स्टेट मशीनें दिखीं। उनके ऊपर गीला तौलिया रखा था ताकि भीषण गर्मी में मशीन गर्म न हो जाए। ये मशीनें देसी दिमाग के इस्तमाल से बैटरी से जोड़ दी गईं थीं। झट फोटो पट प्रिंट। लेकिन अब नई आधुनिक मशीनों ने इन तकलीफों को काफी कम किया है। आज दिल्ली के आनंद विहार में दर्ज़ी की मशीन पर फोटो स्टेट की मशीन देखकर सुखद अहसास हुआ। अब कोई भी प्रिंट कर सकता है। इसके लिए ज़्यादा स्पेस की ज़रूरत नहीं है। तकनीकी आम लोगों का जीवन बदलती है या काम आती है तभी अच्छी लगती है। काम की लगती है। तो है न ये तकनीक का ताक धिना धिन। वाह।

29 comments:

संतोष कुमार said...

बिलकुल सही कहा आपने.... हमें इन कंपनियों और उत्पादों का भी आभार मानना होगा , जो उन्होंने कई उपयोगी सामान कम कीमत में उपलब्ध कराई ... आज तकनीक सभी के पहुँच में है...

मनोज पटेल said...

सही नब्ज पकड़ी आपने. हाल ही में मुम्बई की यात्रा के दौरान मैनें पाया कि दर्शनीय स्थलों पर फोटोग्राफर छोटा प्रिंटर अपने बैग में लेकर घूम रहे थे. डिजिटल कैमरे से तस्वीर उतारी और बैग से प्रिंटर निकाल वहीं जमीन पर बैठ गए. तकनीकी रूप से उन्नत 'झट-पट' स्टूडियो.

Rahul Singh said...

सचमुच 'ताक धिना धिन'

सतीश पंचम said...

बढ़िया प्रेक्षण रहा। यहां मुम्बई में भी अब कई जगह फुटपाथ पर इस तरह के इन्वर्टर दिखने लगे हैं।

गाँवों में तो बिजली की हालत देख कुछ स्टूडेंट्स को देखा कि वे खत्म हो चुकी टॉर्च की बैटरी खोलकर उसके मेटालिक हिस्से और निरमा वाशिंग पाउडर के घोल से तीन चार घंटे चलने वाला मिनी बल्ब जलाते हैं और इतना उनकी पढ़ाई के लिये रात के समय अच्छा काम देता है। सुबह फिर वही घोल और मेटालिक हिस्सा छत पर धूप में रख दिया जाता है ताकि शाम होते होते आयन फायन सब अलग होकर मेटालिक हिस्सा साफ हो जाय और शाम को फिर तारों को जोड बिजली उत्पन्न की जाय।

दीपक की बातें said...

जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी ने कुछ सुविधाओं तक आम आदमी की भी पहुंच बना दी है।

चंदन कुमार मिश्र said...

प्रवीण पाण्डेय said...

जब छोटे में हो काम,
तो काहे ताम-झाम।

Ritu said...

मुझे तो लगता है हिंदुस्‍तान इनवर्टर के सहारे ही जिंदा है... इनवर्टर का हम सबकी जिंदगी में बहुत ही महत्‍वपूर्ण स्‍थान है

हिन्‍दी गालियों की परिभाषा

abhi said...

इनोवेसन कहिये इसको :) अच्छा लगा!! :)

घनश्याम मौर्य said...

सही है। यह शर्मनाक है कि आजादी के इतने सालों बाद भी सबको बिजली मुहैया नहीं की जा सकी है। आम आदमी की समस्‍याओं को दूर करने वाली ऐसी किफायती तकनीक और उसे बनाने वाले लोगों को सरकारी प्रश्रय मिलना चाहिये, तभी बात बनेगी। लेकिन सरकार तो कारपोरेट के चंगुल में फंसी है। वह आम आदमी का ध्‍यान कैसे रखेगी।

vivek mishra said...

sir, namaste
takneek ke taak dhina dhin se dukane hee nahi laakhon ghar bhee roshan ho rahe hain. sarkaar fail hone ke baad ab 6 lakh ngo desh me isliye kaam kar rahe hain kee ve gharon me roshni karenge.baavjood gaanvo me andhera bana raha. 6 lakh gaanv aur unke vaasi ab sarkaar ya ngo ke bharoshe nahi hai. thoda bacpan me laute to mujhe yaad hai jugaad pranaali. chip aur semi conducter base battery ne kraanti laa dee hai. fir vah cheen se aaytit ho paakistaan se khareeda gaya ho. kam se kam light n rahne kee soorat me bade gharo ke inverter guman nahi kar sakenge. aur aapne sahi kaha hai hume tv akhbaar kee baat blog par nahi karnee chaahiye. jo likha-padha gaya hai apne manch apr us par hee baat karnee chaahiye. www.gaanvtola.blogspot.com

शेरघाटी said...

रविश भाई ..आप हमेशा नज़र चौकस रखते हैं.निओटी नई जानकारी! नयी बहस! नज़रिए की ताजगी..
बेबाकी, और साफगोई इस दौर में!! डर लगता है! खुदा आपको अपने सुरक्षा में रखे.
इल्म नहीं हैं..लेकिन लगता ज़रूर है..किसी डायरी मैं आपकी कवितायें होंगीं ही...क्या अपन उस से कभी रूबरू होंगे!!!!! ऐसा इसलिए कि उन कविताओं में निसंदेह संसार का अगोपन होगा.
शहरोज़

Parul said...

rochak :)

Paresh Kumar Singh said...

very good. a nice application of technology

Rajhans raju said...

जरूरत और मज़बूरी दोनों ही, चीज़ों को बनाने और अपने अमुकूल ढालने में अहम् भूमिका निभाते हैं. देश में तमाम साधनों का निर्माण आम लोग अपने जुगाढ़ से कर लेते हैं. अब इन आविष्कारों को देख कर हमें खुश होना चाहिए या दुखी कई बार यह सोच और समझ पाना मुश्किल हो जाता है. फ़िलहाल यह एक अच्छी खोज है.

सञ्जय झा said...

wakai........majedar nazar hai aapka
.............

..........

sanjeev said...

dear sir

wonderful,there is a request as u r from bihar but u have done schooling in very good school,but see the pathetic conditions of cbse schools in patna no playgrounds,no salries to teachers,very high teacher student ration please make a programme on it if u need i will give my help.
sanjeev

प्रतीक माहेश्वरी said...

ये तो बहुत ही ख़ुशी वाली जानकारी दी.. जब जगह-जगह पढ़-पढ़कर थक जाता हूँ सबका रोना उस समय ऐसे लेख बड़े सुखद लगते हैं..
जुगाड़ तो भारत का सबसे सफलतम आविष्कार रहा है और ज़बरदस्त चलता भी है...

RAJIV's BLOG said...

Ravish Bhaiya....

Kal dekha apko Primetime mein... Kaphi gap ke bad aaye..

kundan said...

ek shoot ke silsile me Babadham gaya tha..Savan ka mahina tha so kanvariyo ki katar bhi thi..raste bhar...5 se 1010 mega pixel ke camera aur HP ka chhota printer liye ladke dikhe..das rs me..jhatpat foto..aur to aur janglo me bijli ka intzam aapke isi inverter se ho raha tha...

महुवा said...

interesting :)

Mahendra Singh said...

Ravishji taknik aur research ka matlab he yahi hai ki utpad sulabh aur kam keemat ka ho. Petromax ka varnan sunkar UP board ke Highschool sylabus main kahani "Panchlite" ki yaad aa gayi. Bahoot khoob.

Rati said...

रवीश जी

रवीश की रिपोर्ट एक ऐसा माध्यम है जो ना केवल सही पत्रकारिता की राह बताता है अपितु यह विश्वास भी जताता है कि देशीय भाषाएँ कहाँ कहाँ तक पैठ सकती हैं।
संभवतया आपने कृत्या पत्रिका ना देखी हो, कृपया देखिए, www.kritya.in और अपने कोई लेख इसे भी दे, जो साहित्य के इर्दगिर्द घूमता हो, कस्बे के गीत या कुछ और

धन्यवाद

रति सक्सेना

www.kritya.in

politices said...

sir namste..
aapka lekhe padha bahuth hi khushi hui padhkar..aur hindi ka yah blog dekhkar dil bahuth hi khush hua..yah mera pahla mooka hai jab main pahli bar aapke blog ko dekh raha hu..

love sms

brajesh said...

namskar
ravish apki ye report to wahi darsati hi ki jangale me log gum ho jate hi raaste apne aap bante chale jaate hi.lekin thodi kathinaayion ke saath ye log bhi samay ke saath badal rahe hi jaisa ki ap aur apka bihar badal raha hi jaisa ki mai apko pahle janta tha .

राजेश उत्‍साही said...

बिजली का रोना रोने से पहले यह याद कर लेना चाहिए कि ऐसे इन्‍वरटर चलाने के लिए भी बिजली तो चाहिए ही। गुमटी वाला भाई भी उसे घर से चार्ज करके ही लाता है।

Adee said...

रविश जी, आप बेहद अच्छा लिखते और बोलते हैं, पर उस से भी जो ज्यादा अच्छी बात है, वो है आप जिस नज़रिए से अपने आस-पास की ज़िन्दगी देखते हैं... आप prose में poetry करते हैं :)

G.bankar said...

sahi kaha ravish sir aap ne taknik ka use to sahi hone laga hai ....

G.bankar said...

sir aap se agree hone ke alawa main kuchh nahi kar sakta , aap ki subject par puri tarah pakad ap ko ek shresht patrkar banati hai ...ur the best ravish kumar