राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन-क्रिकेट

(दोस्तों, यह लेख भारत-पाक मैच के तत्वाधान में लिखा गया था। जो कि अमर उजाला के ज़िंदगी लाइव पेज पर प्रकाशित हुआ। दिन रविवार का था। साभार अमर उजाला का है,लेखक कस्बा वाला ही है। यूनिकोड में विग्यापन को सही कैसे लिखें, इसकी जानकारी है आपको तो बतायें)

क्रिकेट राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन है। जिसे हम लुगदी साहित्य भी कहते हैं। एक ऐसा साहित्य जिसमें कोई शिल्प नहीं है। कोई कला नहीं है। कल्पना की असीमित उड़ान है। लुगदी साहित्य का सस्ता बाज़ार कहीं से भी किसी को भी किरदार बनाकर राष्ट्रवाद की जर्सी में मैदान में भेज देता है। मैं उससे इत्तफाक नहीं रखता जो भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच में रास्ट्रवाद को क्लासिकल रूप में देखता है। यहां राष्ट्रवाद प्रहसन है। हास्य है। होली की तरह दोनों पक्ष एक दूसरे का मज़ाक उड़ा रहे हैं,छेड़ रहे हैं और आंखों से लेकर तन के कण-कण में गुलाल मल रहे हैं। जहां मुल्कों के आपसी संबंध मैच के मोहताज़ हो जाएं वहां समझ लेना चाहिए अब के दौर में तनाव के ऐसे क्षण महज़ दिखावे ही हैं। इस दिखावे का अपना जुनून और बाज़ार है।

असली युद्ध में हार-जीत की बड़ी कीमत होती है। दुनिया की नज़र होती है। हथियार होते हुए भी इस्तमाल नहीं हो सकते। लिहाज़ा भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंधों के तनाव के मंचन के लिए क्रिकेट का मैदान लोकमंच बन जाता है। जहां युद्ध के तमाम भावों के कृत्रिम प्रसंग बनाए जाने लगते हैं। मोहाली में भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी हुआ वह पहले भी हो चुका था। मीडिया में युद्ध का अपभ्रंश ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए मुकाबले में भी बनाया गया। फर्क यही है कि पाकिस्तान के साथ हुए मैच का मंचन पहले के मुकाबलों की तुलना में कहीं ज़्यादा भव्य और शर्मनाक दोनों रहा लेकिन यह कोई पहली बार तो नहीं हुआ। फर्क यही रहा कि इस बार तनाव का दिखावा ज्यादा रहा।

मी़डिया ने युद्ध की तमाम उपमाओं को बंदूक और बम की तरह खर्च कर दिया। इस तरह से जैसे दुश्मन की सेना के सामने होने के अंदाज़े भर से तमाम कारतूस खाली कर दिए गए। इसके आस-पास का एक मुहावरा भी है। अंधेरे में तीर चलाना। क्रिकेट को ऐसे गायब कर दिया गया जैसे मुल्क में सिपाही की ज़रूरत नहीं खिलाड़ी की है। महायुद्ध, महाविनाश, आतंकवाद का बदला, सचिन है एक सौ एटम बम के बराबर। कोई शोधकर्ता मीडिया की युद्ध संबंधी उपमाओं का विश्लेषण करेगा तो पाएगा कि युद्ध के हथियारों के बारे में उसकी जानकारी कितनी कम है। कम से कम विविधता नहीं है। किसी खिलाड़ी की तुलना सी हैरियर या युद्ध पोत से नहीं की गई है। मिसाईल,बम और परमाणु बम बस। इन विशेषणों में वायु सेना और नौ सेना के हथियारों को जगह नहीं मिली है।

सेमिफाइनल को लेकर कृत्रिम उन्माद इसलिए भी दिखा क्योंकि भारत और पाकिस्तान की जनता मूल रूप से क्रिकेट में दिलचस्पी रखती ही है। क्रिकेट उसके जीवन का हिस्सा है। उन्माद एक किस्म का तड़का है। इसलिए इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं। मुंबई हमले के बाद उन्माद फैलाने की मीडिया की कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के गाइडलाइन्स भी बनी। हैरानी इस बात की है कि क्रिकेट मैच के दौरान के ऐसे उन्मादों पर लगाम लगाने की कोई कोशिश क्यों नहीं हुई। शायद इस वजह से कि मुंबई हमले के वक्त का गुस्सा और मोहाली के मैच के समय का जुनून दोनों में फर्क है। एक में नफरत थी तो दूसरे में नफरत का स्वांग। फिर भी उन्माद पर लगाम लगाने की कोशिश हो सकती थी। जिस तरह से चैनलों और एफएम रेडियो पर लतीफे और ताने सुनाए जा रहे थे वो सार्वजनिक सूचना के मंचों का काम नहीं होना चाहिए था। इससे पता चलता है कि एक मुल्क के रूप में हमारी परिपक्वता भारत महान की ब्रांडिंग से आगे नहीं जा सकी है। बल्कि मेरा भारत महान की ब्रांडिग को नुकसान भी पहुंचाती है।

क्रिकेट का मैच भारत पाकिस्तान के तनाव भरे रिश्तों के बीच मध्यांतर की तरह है। जिस मैच में दोनों मुल्क एक दूसरे को कुचल देने की सस्ती ख्वाहिशें पालती हैं उसी मैच के ज़रिये रिश्ते को सुधारने की भी संभावनाएं खोजी जाने लगती हैं। यह विरोधाभास नहीं है तो क्या है। इतना ज़रूर है कि क्रिकेट के ज़रिये दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुल जाते हैं। जब बंद होते हैं तब भी भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी देसी न्यूज़ चैनलों के दफ्तर में बैठे पाकिस्तान के महान खिलाड़ी ज़हीर अब्बास, इमरान ख़ान,वसीम अकरम की टिप्पणियों का आनंद लेते रहते हैं। ये क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों की पेशवराना परिपक्वता है। तब तो कोई उन्माद नहीं फैलाता कि जिस इमारन और अकरम की जोड़ी ने कई बार भारतीयों को कुचला है उसे स्टुडियो से भगाओ। बल्कि लाखों क्रिकेट प्रेमी उनकी बातों को क्रिकेट के लिहाज़ से सुनते हैं। उन्हें अपना समझते हैं। इसलिए आम क्रिकेट प्रेमी इस तरह के उन्माद का हिस्सा तभी बनता है जब कृत्रिम रूप से बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उस उन्माद के सहारे बाज़ार और विग्यापन का खेल खेला जा सके।

क्रिकेट को लेकर राजनय और राजनीति में फर्क करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेमिफाइनल के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक राजनीतिक पासा फेंका। एक ऐसे वक्त में जब मनमोहन सिंह पर आरोप लग रहे थे कि विदेश नीति के मामलों में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, उन्होंने विपक्ष को जवाब भी दिया और मैच देखने के बहाने एक संदेश भी दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। मगर जब राजनयिक आपस में बात करेंगे तो ज़ाहिर है वहां क्रिकेट के स्कोर की चर्चा नहीं होगी। बातचीत की मेज़ पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ेगा कि मोहाली में किसने किसको हराया। मुंबई हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी पाकिस्तान में हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। आतंकवाद पर आज भी उसका नज़रिया बहुत साफ और भरोसा का नहीं है। क्या यह सब क्रिकेट के मैदान के ज़रिये बदल सकता है? क्या कभी ऐसा हो सकेगा कि मैच के नतीजे का असर कश्मीर की समस्या पर पड़ेगा? किसी राजनयिक से पूछेंगे तो मुस्करा देगा।

वैसे भी भारत और पाकिस्तान की टीमों के कप्तान ने एक बार भी नहीं कहा कि हां यह मैच जीतना ज़रूरी है ताकि दोनों देशों की बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ सके। हम जीतेंगे तो बातचीत की मेज़ पर हमारे प्रधानमंत्री का पलड़ा भारी रहेगा। दोनों के बयान क्रिकेट तक ही सीमित हैं। वो क्रिकेट के दायरे में ही एक दूसरे को चुनौती देते रहे। मीडिया है कि उसे उठाकर कश्मीर से लेकर मुंबई तक के मामले में लपेटे जा रहा था। तनाव का ऐसा रोचक और विहंगम उत्सव देखने को नहीं मिला होगा। मोहाली का महायुद्ध आईसीसी के नियमों के तहत ही खेला गया न कि भारत पाकिस्तान के रिश्तों की ज़रूरतों के मुताबिक। नागपुर में कप्तान धोनी के बयान को याद रखना चाहिए। खिलाड़ी देश के लिए खेंले न कि गैलरी के लिए। ताली बजाने वाले और हो हल्ला करने वालों से पैदा होने वाले जुनून से मैच की किस्मत तय नहीं होती। सेमिफाइनल के बाद लतीफे, युद्ध की उपमाएं वैसे ही सड़कों पर बिखरे मिलेंगे जैसे मतदान के बाद चुनाव के पोस्टर और झंडियां।

22 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

दाँय तो मची रहेगी, कोई भी जीते।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

Shift + 5 = ज्ञ

सम्वेदना के स्वर said...

अफरीदी की बात में दम था, जब उसने भारतीय मीडिया को तिल का ताड़ बना देने वाला नेगेटिव मीडिया कहा। देश के भीतर तो हम इस नौटंकी की आदी ही हो गये हैं।

यह भी सही है कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी की मार्केटिंग के बाद, इसी मीडिया ने उनकी कूटनीति की मार्केटिंग भी जमकर की!यह अलग बात है कि हवाना और शर्म-एल-शेक की तरह के किसी बबाल में न पड़्ना ही उनकी उपलब्धी रही।

रवीश भाई! इतिहास में "रवीश की रिपोर्ट" का नाम लिखाना है तो अपना माईक और छतरी उठाईये और जंतर-मंतर पहुचिये, देश तो बहुत उम्मीद हैं आपसे।

Vishnukant Mishra said...

rastravad ka mithak ----skaratmk aur nkaratmk dono hai . ek viswa aur ek sarkar ki drasti rkhney walo ke liye to yeh katai anukool nahi parantu agar rastra vad n ho to swarthvad ki koi sema nahi rahege. khel se dusri duniya me aaieye.. bhrstachar jo aaj bhart mey uchaiyon ko chuu raha hai uska vinash kewal rastravad hi kar skta hai.
Ravish ji ka maiy bahut bada fan hooon ...thodi alochana ke liya chmayachna.

bolo bindasssssss......... said...

rastravaad ki bhayanarta tabhi kghatm hogi jab haam khel ko khel ki tarah se lenge.apka lekh criket ke junoon me baaauaye ham darshakon ko sochne par maazboor kartaa hai.

bolo bindasssssss......... said...

rastravaad ki bhayanarta tabhi kghatm hogi jab haam khel ko khel ki tarah se lenge.apka lekh criket ke junoon me baaauaye ham darshakon ko sochne par maazboor kartaa hai.

anoop joshi said...

ravish sir 'Anna hazare' ke amaran ansan ke baare me jarur dikhyiyega.

Madhukar said...

विज्ञापन के ज्ञ को युनिकोड में सही लिखने के लिए शिफ्ट 5 का इस्तेमाल करें।

A said...
This comment has been removed by the author.
A said...

नमस्कार सर जी
"राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन-क्रिकेट"
अभी मैंने इस लेख को नहीं पढ़ा सोचा पहले आपकी एक समस्या का समाधान कर दूँ
फोनिटिक में विज्ञापन लिखने की समस्या
आप अपने कंप्यूटर पर एपिक डाउनलोड कर लीजिये फिर देश की किसी भी भाषा में लिखिए बिना ये पूछे की इसे फोनिटिक में कैसे लिखते हैं.

प्रशांत अवस्थी
DLA

गिरधारी खंकरियाल said...

मीडिया तो बदर की तरह पेड़ को हिला हिला कर फलों को गिरा रहा है

hamarijamin said...

Nationalism ke Cricket edition se
desh ko suraksha ki jarurat hai.

Nationalism bas cricket tak simat kar rah gaya hai, wah bhi apane ghatia rup mein. Bharat ki jeet cricket ki jeet hai, khel ki jeet hai...mehanat aur ranniti ki jeet hai---lanka dahan, Pak wadh jaise unmad ki nahi. Bhartiya media ki kishorochit harakatein kafi karunik hai. Cricket ko unmad banakar promote karane me media ka
bhari role hai.
Logoan ki bewkufiyoan ko bhi promote karane me media ne jee jan laga diya. Meri gujaris hai ki Ishwar jeet ke unmad se desh ko bachayein rakhein.

abhi said...

सही है बात आपकी.

Rahul Singh said...

हम तो विज्ञापर लिखने में 'ज्ञ' के लिए shift K key इस्‍तेमाल करते हैं.

Ganesh Jee "Bagi" said...

http://www.google.com/transliterate/

tool ka paryog kar Vigyapan likhey विज्ञापन ho jayega.

सञ्जय झा said...

ankh pe pari gard......saaf karne ke
liye....ye kafi hai.........jo wakai
anjan hain.....lekin jo janboojhkar
palp pale hue hain......usko kaise
sambhalenge........

@samvedna ke swar......apke agrah me
hamri gujarish ka bhi gujara ho jai.......

pranam.

deepti said...

ravish ji aapke is blog ke madhyam se aapse aur sabhi news channel se ye gujarish karna chahti hoon jaise aapne cricket ka fever poore desh par chadhaya bas usi tarah Anna Hajare ki muhim ko bhi aandhi bana dijiye har ek news ke baad hume har news channel par hume 75 saal ki umar me kadi dhoop ke tale curruption door karne ki zid ke sath anshan par bathe Anna dikhai de ...yakeen maaniye Sir aap aur aapke channel se bahut ummeddein hai hum jaise bhartiyo ko...media ko apni taakat istemaal karne ka bahut bada mauka haasil hua hai ..Dussahsi hone ka ilzam to aap log bahut baar jhel chuke hai ab waqt hai us saahas ko dikhane ka ..jo poore hindustaan ko ek sath khada kar de..jis tarah har channel par sirf world cup tha usi tarah es baar Anna ko cha jane dijiye...Hindustaan jaagega zaroor jaagega kyuki hum soye bhale hi hai par zinda abhi bhi hai...hamari baat par gaur zaroor kariyega

Pratik Maheshwari said...

जो बिकता है वही दिखता है.. भारतीय मिडिया इसी उसूल पर चलती है..
पर मैंने तो आजकल समाचार चैनल देखना ही छोड़ दिया है.. अगर जनता इन्हें नकारेगी तभी ये सुधरेंगे..
अगर अन्ना सर्कार हिला सकते हैं तो हम देशवासी भी इनको झंकझोर सकते हैं.. और आशा है कि ऐसा हो..

पढ़े-लिखे अशिक्षित पर आपके विचार का इंतज़ार है..
आभार

सम्वेदना के स्वर said...

हम आपको इतिहास में नाम लिखाने का नुस्खा सुझाये थें। और आप आज आखिरी दिन ही जंतर-मंतर पर मनोरजन भारती जी के साथ दिखायी दिये।

माईक और छतरी के मालिकों के सामने, पापी पेट बेबस है, यह भी देखा इन पांच दिनों के भारत जागरण आयोजन में।

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

विज्ञापन लिखने के लिए आप गूगल का त्रन्स्लतिओन भी उसे कर सकते है... आपको viGyaapan
लिखना होगा... पोस्ट आपका बढ़िया लगा... समय की कमी रहती है तो ब्लॉग पर समय दे नहीं पाता... आज सोंचा कम से कम २-३ घंटे तो ब्लॉग को समय दूंगा ही दूंगा... आपके ब्लॉग को देखने की चाहत बहुत दिनों से थी... आज आखिर आ ही गया आपके ब्लॉग पर...

anuj said...

विज्ञापन

http://www.google.com/transliterate/
आप इसकी मदद से लिख सकते है

saurabh said...

माइक्रोसॉफ़्ट का हिन्दी translator, गूगल का हिन्दी translator करें इस सूत्र का प्रयोग करे उसे download करने के लिए http://www.google.com/ime/transliteration/
या
http://specials.msn.co.in/ilit/Hindi.aspx का प्रयोग करें.
ब्लॉग पोस्ट अच्छा लगा....लिखते रहिये