राजशाही चूल्हा



उत्तरप्रदेश के मुज़फ्फरनगर के मोहम्मदपुर जाट गांव गया था। बीस बीघे के जोतदार एक मुस्लिम परिवार का चूल्हा है। चूल्हे की बनावट मुगलकालीन महलों से मिलती है। बीच के खंभे की शक्ल महलों के खंभे से मिलती है। चूल्हे की एक छत है जिस पर बर्तन रखे गए हैं। छत पर छज्जे भी बने हैं। पूरी तरह से एक किले का रूप झलकता है। राजशाही चूल्हा लगता है। इन चूल्हे में रात भर उपले की हल्की आंच में दूध रख दिया जाता है। जिससे घी और मलाई बनती है। छाछ भी सुबह सुबह तैयार हो जाती है। रसोई के आस-पास का माहौल गोबर से लीप कर साफ कर दिया गया है। बाकी भोजन बगल के छोटे चूल्हे में तैयार होता होगा।

4 comments:

डॉ टी एस दराल said...

interesting .

shalini kaushik said...

purana samay aaj bhi up ke muzaffarnagar ke muslim parivaron me dekhne ko milta hai.yahan ki sthaniy nagrik hone ke karan main janti hoon ki yahan aaj bhi gas ke mukable muslim lakdi ka prayog karte hain.vigyan ke nai aavishkaron ko apnana abhi inhone shuru nahi kiya hai.

Dhirendra Giri said...
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मधुकर राजपूत said...

इसे कायदे में तो भरोसी कहते हैं। दूध ओटाने के लिए तड़के ही चढ़ा दिया जाता है और सामान्य भरोसी एक शराब के जाम की तरह दिखती है। यह भरोसी बरसात की मार सहने के लिए छतदार बनायी गई है।