स्मॉल टाउन कौन तय करता है

स्माल टाउन के कई प्रकार हो सकते हैं। एक स्माल टाउन होता है जो सिर्फ अंग्रेजी के अखबार और टीवी के पत्रकारों को दिखाई देता है। दूसरा स्माल टाउन वो होता है जो होता तो है स्माल यानी छोटा लेकिन उसकी गिनती नहीं होती।

दिल्ली और मुंबई के विचारकों, पत्रकारों को स्माल टाउन खूब नज़र आता है। उन्हें बरेली, मेरठ, आगरा और जमशेदपुर स्माल टाउन नज़र आते हैं। रांची के महेंद्र सिंह धोनी कप्तान बना तो सबने कहा कि स्माल टाउन का उदय हो रहा है। तो क्या रांची वाकई स्माल टाउन है? क्या धोनी के कप्तान बनने से पहले रांची का कोई वजूद नहीं था?

रांची झारखंड की राजधानी है। उससे पहले औद्योगिक शहर हुआ करता था। इसी के बगल में जमशेदपुर में आरआईटी है जिसकी अपनी मान्यता है। जमशेदपुर में देश का एक बेहतर मैनजमेंट संस्थान है एक्सएलआरआई। जहां सभी किस्म के टाउन के प्रतिभाशाली बच्चे बढ़ते हैं। आगरा और मेरठ तो हर दूसरे दिन स्माल टाउन में गिने जाते हैं। क्या ये शहर वाकई में इतने स्माल हैं?

स्माल टाउन किसे कहेंगे? रीवां, सासाराम, जलगांव या मोतिहारी को या फिर रांची, आगरा या को। दिल्ली मुंबई, पुणे, बंगलौर और कोलकाता से बाहर क्या हर शहर स्माल टाउन है? या फिर स्माल टाउन कहलाने वाले शहरों में भी बदलाव आया है।

महानगरों के विचारक भूल जाते हैं कि दिल्ली और मुंबई में भी कई स्माल टाउन हैं। साउथ दिल्ली के मुकाबले पूर्वी दिल्ली का यमुना विहार स्माल टाउन न हो लेकिन डाउन टाउन तो हैं ही।कल अगर यमुना विहार से दस लड़के आईएएस हो जाएं तो क्या इस पर बहस करेंगे कि दक्षिण दिल्ली का वर्चस्व कम हो जाएगा। क्या दिल्ली और मुंबई स्माल टाउन के लोगों से नहीं बनें? मुंबई, दिल्ली या कोलकाता हर बड़ा महानगर छोटे शहरों से आए लोगों से बना है। इनके ज़रिये बड़े शहरों का ताल्लुक छोटे शहरों में रहा है। सिर्फ भूगोल और आर्थिक विस्तार के कारण ही तो बिग टाउन का दंभ पाल रहे हैं। ठीक है कि इन शहरों में सुविधाएं हैं।बिजली, सड़क और अस्पताल। लेकिन क्या महत्वकांक्षा सिर्फ कम सुविधाओं में ही पनपती है? इसका क्या प्रमाण है कि स्माल टाउन साबित करना चाहता है?अगर ऐसा है तो स्माल टाउन की अपनी हालत खराब क्यों है? क्यों वहां का डाक्टर काम पर नहीं जाता? क्यों वहां लिंग अनुपात कम है? क्यों वहां कानून व्यवस्था खराब है? लेकिन यह सब सवाल पीछे रह जाते हैं जब इन शहरों से कोई आईएएस में अव्वल आ जाता है या कोई अपनी मेहनत से कप्तान बन जाता है तो इसमें स्माल टाउन का क्या योगदान है?

दिल्ली में ही कई स्माल टाउन हैं। कोई कह सकता है कि मैं जहांगीरपुरी के मामूली स्लम स्कूल से पढ़कर आईएएस बन गया। कोई कह सकता है कि मैं राजधानी कालेज में पढ़ कर पूरे दिल्ली विश्वविद्यालय में टाप कर गया। वैसे यह एक तथ्य भी है। इस बार यानी २००७ में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में तीसरे और पहले साल में राजधानी कालेज का लड़का टॉप किया है। दूसरे वर्ष में आरएसडी कालेज का लड़का टॉप किया है। स्टीफेंस या लेडी श्रीराम कालेज का नाम नहीं है। अब स्मॉल टाउन की अवधारणा यहां भी फिट हो सकती है। महानगर पूरी तरह से बिग टाउन नहीं है। यह कई स्माल टाउन का समुच्य है।


तुलना विश्लेषण का अनिवार्य अंग है। मगर पैमाना बनाते समय भी विश्लेषण होना चाहिए। अंग्रेजों ने कुछ छोटे शहरों को कस्बा कहा और कस्बों को मुफस्सिल। जहां रहने की सिर्फ बुनियादी सुविधा होती है। आज इस पैमाने पर सिर्फ कस्बे ही हैं। और देश के दो सौ से अधिक पिछड़े ज़िले। बाकी कई ज़िलों की हालत बेहतर है। स्माल टाउन की अवधारणा से अलग है। पटना, भुवनेश्वर और रांची राजधानी होने के कारण स्माल टाउन में नहीं गिने जा सकते। इन ज़िलों से आने वाले कई सांसद केंद्रीय स्तर पर मंत्री बनते हैं। कई ऐसे ज़िलों से आते हैं जिनकी चर्चा राष्ट्रीय अखबारों में साल में भी एक बार नहीं होती होगी। लेकिन वहां से चुने जाने के कारण वो गृहमंत्री से लेकर शिक्षा मंत्री बनते हैं। तब तो कोई स्माल टाउन के उदय की बात नहीं करता। लेकिन कप्तान या साफ्टवेयर कंपनी बना देने पर स्माल टाउन का उदय हो जाता है। इस अवधारणा से समस्या है। पहले शहरों को देखने का नज़रिया बदलना चाहिए फिर शहरों की आपस में तुलना होनी चाहिए। स्माल टाउन महानगरों के विचारकों की छोटी होती नज़र से दिखने वाला एक ऐसा शहर है जो हमेशा छोटा ही रहता है। नए पावर के चश्मे की ज़रूरत है।

11 comments:

अनुराग द्वारी said...

रवीश जी लेख अच्छा था पर अगर धृष्टता न मानें तो लिखना चाहूंगा कि रांची में बीआईटी है आरआईटी दरअसल जमशेदपुर में है। जहां तक स्मॉल टाउन की बात है तो वाकई छोटे और बड़े शहरों को लेकर विद्वानों को अपना चश्मा बदलने की जरूरत है।

Sanjeet Tripathi said...

वाकई!! एक बढ़िया मुद्दा उठाया है आपने!

विष्णु बैरागी said...

रवीशजी,

हर छोटा अपने छोटेपन पर कसमसाता रहता है और जैसे ही वह बडा बनता है, सबसे पहले अपने जैसे छोटो को ही दुत्‍कारने लगता है । गुलाबी रंग के कागज वाले अखबार और काले सूट,खुद को 'बिग' और दूसरों को 'स्‍माल' बता कर अपना छोटापन छुपाने की भोंडी कोशिशें करते हैं । ये भूल जाते हैं कि इनके बडेपन की जडें छोटों में ही है ।
बहरहाल आपने बात बहुत अच्‍छी उठाई है और बहुत ही खूबसूरती से उठाई है ।

इन दिनों आप एनडीटीवी पर दिखाई कम दे रहे हैं और सुनाई ज्‍यादा पड रहे हैं । क्‍या बात है ।

SHASHI SINGH said...

अब का किया जाये किसको-किसको समझाया जाय। इहां तक कि ई गुलाबी अख़बारन में भी छोटे (?) शहर वालन के भयंकर दखल हो तो चुका है बाकी ऊंहा जाके ऊ ऊंहा का रंग-ढ़ंग बदलने की जगह खुदे बदल गिया है... उनका मिजाज भी सादा से गुलाबी हो गया है। का कीजियेगा... कमोवेश सभत्रर इहे हाल है। बाकी धीरज धरिये... तनी गांव वाला लौउंडन के हाथे 100 डॉलर वाला लैपटपवा लगने दीजिये... सबका मिजाज गुलाबी के जगहआ हरियर हो जायेगा।

बहुत खूब रवीश भाई,
इस तरह के भूले-भटके-छूटते मुद्दों पर आपकी नज़र का जाना सुकून देती है।

mamta said...

बहुत सही बात लिखी है।

आशीष said...

सही कहा महानगरों के विचारकों की नज़र में केवल मुम्बई और देल्ली ही महानगर है बाकी सब स्माल टाउन हैं. रविश आपको देखे हूए कई दिन हो गए हैं. तबियत पानी तो सही है ना ?

प्रभाष कुमार झा said...

रवीश जी, तथ्यात्मक त्रुटि की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ. दरअसल आरआईटी जमशेदपुर के आदित्यपुर इलाक़े में है.

राज यादव said...

रविश जी काफी अच्छा टोपिक चुना आपने ,ये "तुलना विश्लेषण का अनिवार्य अंग है। मगर पैमाना बनाते समय भी विश्लेषण होना चाहिए।" अच्छी लाईन लिखा आपने ,...आपका हमारे ब्लोग भी है वेलकम है जी .

निशान्त said...

स्माल टाउन कौन तय करता है
- छोटे शहर बड़े सपने जैसे कार्यक्रम और आप जैसे बुद्धिजीवी पत्रकार ... सासाराम या मोतिहारी में तो अब बुद्धिजीवी बचे ही नहीं हैं...

अभिनव said...

बढ़िया लेख पढ़ने को मिला, साधुवाद।

शहर छोटा हो या बड़ा,
पर होना चाहए अपने पैरों पर खड़ा।

Ajit Chouhan said...

well said ravish