ईद मुबारक

कुछ अच्छा खाने का मन कर रहा है 
कुछ नया पहनने का मन कर रहा है 
फिलहाल बिरयानी से काम हो जाएगा
थोड़ी सेवई मिल जाए तो चल जाएगा 

टीवी पर युद्ध

युद्ध चाहिए 
एस एम एस कीजिए 
बम गिराना है 
एस एम एस कीजिए 
रक्त चाहिए
एस एम एस कीजिये 
सबक़ सीखाना है 
एस एम एस कीजिये 
क़ुर्बानी गाइये 
एस एम एस कीजिये 
शहीद शहीद 
एस एम एस कीजिये  
बयान बयान 
एस एम एस कीजिये 
जवाब जवाब
एस एम एस कीजिये 
पाकिस्तान चाहिए
एस एम एस कीजिये 
सख़्त क़दम के लिए
एस एम एस कीजिये 
नकारा भारत
एस एम एस कीजिये 
चीन से डरता भारत
एस एम एस कीजिये 
एक अरब के भारत में 
दो लाख लोगों ने किया है 
उस एंकर को एस एम एस 
जो पूछता है जनमत से 
कि पक्ष में हों युद्ध के
फ़ेसबुक ट्विटर पर चीख़ते 
कुछ लोगों को देख 
ट्विटर पर कुछ फ़ालतू राष्ट्रवादी 
युद्ध माँगते हैं 
कुछ फ़ालतू राष्ट्रवादी नेता 
पुरुषार्थ जगाते हैं 
एक ट्विट से जंग मचाते हैं 
ले बदला 
दे बदला 
चिल्लाते हैं 
रिमोट बदल बदल 
इस चैनल से उस चैनल 
आते जाते रहते हैं 
टीवी पर युद्ध खोजते हैं 
शहीदों के लिए रोते धोते 
अपना इंवेस्टमेंट प्लान करते हैं 
एंकर लफंदर होता है
और
लफंदर हमेशा युद्ध चाहता है 
लड़ने के लिए नहीं 
उकसाने के लिए 
आप लफंदर हो जाइये 
टीवी के सामने बैठे बैठे
एंकर हो जाइये 
राष्ट्रवाद के पालतू बंदर
राजधानी के फ़ालतू बंदर
सब बन जायें टीवी एंकर
फिर कीजिये एस एम एस 
हमें युद्ध चाहिए 




मिल गया मिल गया

धीरज मिल गया है । उसकी पत्नी से बात हो गई है ।  पूरा ब्योरा नहीं मिल पा रहा है । कुछ तो गड़बड़ है । अब उसके पटना पहुँचने पर ही सब पता चलेगा । पूरी रात जागने और अभी तक जागे रहने का टेस्ट हो गया है । फ़ोन पर काफी घबराया हुआ था । जिस होटल से बात करने का दावा कर रहा था उसे वो कई घंटे पहले छोड़ चुका था । इसी वजह से थोड़ी चिन्ता बरक़रार है । वर्ना बात होने पर आशंकायें तो समाप्त हो ही जाती हैं  आप सबका शुक्रिया । 

आज जान निकली जा रही है ।

आज अजीब हुआ । प्राइम टाइम की तैयारी पूरी कर स्टुडियो जाने का इंतज़ार कर रहा था । पंद्रह मिनट बाक़ी थे नौ बजने में । अचानक माँ और भाभी का फ़ोन आता है कि ममेरा भाई का अता पता नहीं चल रहा । मेरे होश उड़ गए । किसी तरह मनीष को सूचना देकर प्राइम टाइम करने गया । कुछ होश ही नहीं रहा कि क्या पूछ रहा हूँ और कौन क्या जवाब दे रहा है । पूरे शो के दौरान पटना से फ़ोन आता रहा । कुछ प्रिय दर्शक एस एम एस कर रहे थे कि क्या शो है ये । युद्ध की बात क्यों नहीं करते । ये अजय शुक्ला क्यों बकवास कर रहे हैं । आप थके हुए लग रहे हैं । आप कांग्रेसी दलाल हैं । मेरा मन शो में था ही नहीं । ब्रेक में रोने लगा । जिसके साथ बचपन बीता उसके बारे में तरह तरह की आशंकाओं ने घेर लिया । दर्शकों के लिए प्रदर्शन करना था और खुद से लड़ना था । किसी तरह शो ख़त्म कर बाहर निकला तो फ़ोन पर फ़ोन । एडीजी कंट्रोल रूम से फ़्लैश के बाद भी धीरज की कोई सूचना नहीं । दानापुर होते हुए बिहटा शाहपुर आरा के रास्ते डिहरी आन सोन के लिए निकला था । सुबह सात बजे और रात के ग्यारह बजे तक कोई सूचना नहीं । कभी माँ को तो कभी भाभी को तो कभी उसकी पत्नी श्वेता को । सबका धीरज जवाब दे गया था । रोते रोते सब एक दूसरे पर चीख़ने चिल्लाने लगे । मैं जिस समाज और परिवेश से आता हूँ वहाँ यह सामान्य है । फिर भी उनकी और अपनी तकलीफ़ से जूझ रहा हूँ । कई फ़ोन के बाद उसके आॅन सोन जाने के रास्ते में किसी दुर्घटना की कोई सूचना नहीं मिली । रिलायंस जीओ के अधिकारियों ने भी बताया कि कोई सूचना नहीं है । फिर दिमाग गया कि बारिश के दिनों में बिहार की सड़कों के किनारे काफी पानी भर जाता है । अगर उसमें गिरा हो तो मुमकिन है कि सूचना न मिली हो । पत्नी श्वेता कह रही थी कि सहयोगियों से किसी बात पर अनबन थी जिसकी शिकायत धीरज ने अपने बास से की थी लेकिन एक महीने की नौकरी में अनबन का ऐसा ख़तरनाक नतीजा हो सकता है समझना मुश्किल है । उसका फ़ोन बंद है । टावर का लोकेशन घर के पास ही बता कहा है । गोला रोड, टावर के मालिक का नाम मुकेश कुमार है । समय दोपहर सवा दो के क़रीब का जबकि घर से वो सुबह सात बजे निकला था । दानापुर पुलिस के पास सुबह से दुर्घटना की कोई सूचना नहीं है । क्या हो सकता है । मेरी हालत ख़राब है । क्यों लिख रहा हूँ पता नहीं लेकिन आशंकाओं से घिरा हुआ हूँ । उम्मीद नज़र नहीं आती । कंट्रोल रूम के फ़्लैश के बाद कोई सूचना तो मिलती । पटना के  रूपसपुर थाने में सूचना दर्ज करा दी है । धीरज सफ़ेद रंग की होंडा ट्विस्टर बाइक से निकला था जिसका नंबर 2353 है । tel:+9197-71-423507 ये उसका फ़ोन नंबर है । पैंतीस साल की उम्र है । क्या करूँ । वो ऐसा लड़का नहीं है । दिन भर में पत्नी से कई बार बात करता है ।अपनी दोनों बेटियों से काफी लगाव रखता है । नौकरी में मन नहीं लग रहा था मगर किसी ख़ास तनाव में भी नहीं था । क्या वो परेशान होकर कहीं जा सकता है ? आत्म हत्या ? हत्या ? अगवा ? दुर्घटना ? नक्सल ?  यही सब सोच रहा हूँ । शो के साथ तो न्याय नहीं ही कर पाया लेकिन लग रहा है कि धीरज के लिए भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ । उसका पता क्यों नहीं चल पा रहा । ये कैसा इम्तिहान है ? दुआ कीजियेगा । 

मिट्टी का गिलास



मेरे मोहल्ले में एक चायवाला है । उसके यहाँ मिट्टी के खूसबूरत गिलासों में चाय और लस्सी बेचता है । गिलास की डिज़ाइन काफी ख़ूबसूरत और साफ़ सुथरी है । कुछ बर्तनों को शो पीस के लिए भी बेचता है । दस रुपये की चाय अच्छी है । 

बी ए पास

इस हफ़्ते तो यही फ़िल्म चल रही है । थोड़ा एडल्ट टाइप है न ! मुश्किल से आँख मिलाते हुए सिनेमा हाल के मैनेजर ने कहा । दरवाज़े पर बीस बाइस साल के लड़के लड़कियों की तादाद इंतज़ार कर रही थी । सबके हाव भाव से लग रहा था कि बीए पास देखने जा रहे हैं और कहानी पहले से मालूम है । फ़िल्म शुरू होती है और कुछ देर बाद उस सीन पर पहुंचती है जिसे सोच कर देखने वाले आये थे । अलग अलग सीटों से हँसी ठिठोली की आवाज़ छलकने लगती है । सारिका और मुकेश के पहले प्रसंग से हाल में गुदगुदाहट उठी थी या बेहूदगी मालूम नहीं । पर सब उस बोल्ड सीन के लिए ही आए थे जिसके बारे में निर्देशक समझा रहा थे कि बोल्ड सीन को किसी फ्रेम में मत ठूंसिये । हाल में बैठे युवा दर्शकों की ठिठोली और पर्दे पर समाज की उस तस्वीर के बीच फँसा एक दर्शक हर सीन के साथ बढ़ती कहानी से कुचलता चला जा रहा था । दर्शक की दिलचस्पी उन्हीं दृश्यों में थी । यह फ़िल्म दर्शकों के देखने के नज़रिये की भी फ़िल्म है । 

शहर और समाज अनगिनत अतृप्त आकांक्षाओं का ख़ज़ाना है । लुटा देने और लूट लेने की टकराहट के बीच गँवा देने की हताशा उस ख़जाने को हमेशा राज़ रखने पर मजबूर करती हैं । पर इन्हीं मजबूरियों के बीच फंसी हुई कहानी निकलने का रास्ता ढूँढते ढूँढते किसी होटल की छत से कूद कर आत्महत्या कर लेती है । सारिका नेहा रानी न जाने नाम बदल कर चंद पल अपना ख़रीदने वाली आंटियां इस शहर की मुर्दा ज़रूरतें हैं । जिनकी हत्या शहर ने भी की है और समाज ने भी । धीरज नाम के उस पति ने भी की है और अशोक नाम के पति ने भी । अपने तिरस्कार की क्षतिपूर्ति के क्षणों में ये औरतें उस बेशुमार दौलत से खरीदी गई गुप्त आज़ादी को नए सिरे से गढ़ती हैं जो किसी काली कमाई के ज़रिये से आता है । दिल्ली रहने के दौरान जिन गाँवों में रहने का तजुरबा हुआ वहाँ ऐसे किस्से दबी ज़ुबान में सुनने को मिल ही जाते थे । रात को मालिक बने स्थानीय शराब के नशे में धुत होते थे और कुछ प्रवासी किरायेदार लड़के अपने मालिक के कमरे में जाग रहे होते थे । रेलवे आंटी कहानी मैंने नहीं पढ़ी है लेकिन अजय बहल की फ़ोटोग्राफ़ी ने जिस तरह इसे पर्दे पर उतारी है वो सुनी सुनाई कहानियों को हक़ीक़त में बदल देती है  । समाज के रिश्ते सिर्फ औपचारिक नहीं होते ।

मुकेश और सारिका के बीच हमारे महानगर की घुटन भी बिस्तर बदलती है । निर्देशक ने जिन दृश्यों को सामान्य बनाने की कोशिश की है वो उतनी भी नहीं है । दर्शक अपनी निजी कुंठाओं या चाहतों को उन दृश्यों के सहारे जीने का प्रयास करेगा ही । कहानी की निर्ममता से किसे लेना देना है । मुकेश की त्रासदी पर किसी को रोते नहीं देखा । स्टेशन पर इंतज़ार करती सोनू से किसी का रिश्ता नहीं जुड़ता । मिस नवल से बात करने की बेचैनी किसे है । उनके एकांत में सारिका जैसी भूख तो नहीं है पर किसी को अपना बनाकर कहने की तड़प तो है ही । आख़िर सीरीयल वाली आंटी जब धीरज धीरज करती हुई कहती है कि ये मेरा पति है तो वो ज़रूर किसी उपेक्षा के बदले का एलान भी करती है ।  अजय बहल का साफ़ सुथरा कैमरा जब रात के एक दृश्य में आख़िरी मेट्रो में मुकेश के ख़ालीपन को पकड़ता है तो कहानी सारिका और उन औरतों की बची हुई भूख की ऊपरी मंज़िल पर अकेली खड़ी नज़र आती है । जिनके शौहर किसी का ख़ज़ाना लूटने के लिए सेब की पेटियाँ मंगवाते रहते हैं । जाॅनी भी जानता है दिल्ली में किसी का ख़ज़ाना लूट कर ही मारीशस जाने का सपना पूरा हो सकता है वर्ना मुर्दों की दाँत से सोना निकाल कर शाम की दारू का ही जुगाड़ हो पाएगा । अतृप्त आकांक्षाओं का ख़ज़ाना लुटने या लूटने के लिए होता है । इसका कोई खाता नहीं होता न ही कोई दराज़ । 

सारिका का किरदार समाज की बनी बनाई परिस्थिति की तरह है और मुकेश का किरदार उसका शिकार । फ़िल्म अच्छी है या बुरी है इससे आगे जाकर यह भी सवाल करना चाहिए कि कहानी सही है या नहीं । मुकेश जैसे लोग है या नहीं । सारिका के सीन एक स्तर पर अतृप्त चाहतों के सीन भी है । बुढ़िया का पहले ही दस्तक पर मुकेश को भाग जाने का आदेश सारिका की अतृप्त चाहत को लत के रूप में रेखांकित करती है या कोई अस्वीकृति है जिसे हम तब समझते हैं जब उसका पति हमला करता है और कहता है कि मज़े करेगा खन्ना और मुंह काला होगा तेरा । खन्ना के लिए सारिका ड्राइंग रूम में रखी गई पोर्सिलिन की मूर्ति भर है और सारिका के लिए खन्ना ख़त्म हो चुकी उम्मीद की तरह । मुकेश इस बंजर ज़मीन पर थोड़े समय के लिए उग आया घास है । 

इस शहर की आंकाक्षाएं सिर्फ ज़रूरतें नहीं हैं, उसकी सीमा से आगे जाकर लत भी हैं । जिसके लिए कोई शौक़ से जुआ खेलता है तो कोई उस जुए को शतरंज समझ कर । कास्परोव या कार्पोव की चाल पढ़ कर कोई मुकेश लत बन चुकी आकांक्षाओं की चालें चलता है । न कि अपनी न कि कास्परोव की । इस फ़िल्म की औरतों की छोटी छोटी कथाओं पर अलग से लिखा जाना चाहिए । सबकी दास्तान एक होते हुए भी अलग है । जिस्म की चाहत है या उस ठुकराए जाने की तड़प जिसका बदला या पूर्ति वे अपने पैसे के दम पर करती हैं । ये औरतें अपनी ज़रूरतों की मालिक खुद हैं । वो अपना शिकार ढूँढती हैं न कि बनती हैं । उनकी जिस्मानी चाहतें पति के घर लौटने के वक्त की ग़ुलाम नहीं हैं । वो आज़ादी उन्हें गुमनाम करने वाला शहर ही देता है । वो अपनी साइड भी खुद चुनती हैं । वो किसी की आग़ोश में नहीं हैं, उनकी आग़ोश में कोई है । यही सारे दृश्य हैं जो देखने वालों को उकसाती हैं एडल्ट या साफ्ट पाॅर्न की तरह देखने के लिए । यह एक सिलसिला है जो अनगिनत फ़िल्में ने हमारी ज़हन में गढ़ा है आप इसके बदल जाने की उम्मीद एक फ़िल्म से मत कीजिए कि मुकेश अक्सरहां नीचे क्यों है और आंटी ऊपर । 

बहुत साफ़ सुथरी फ़ोटोग्राफ़ी है । पहाड़गंज की रातों और नियान लाइट को बख़ूबी दिखाया है । रेलवे कालोनी के उस मकान का एकांत किसी साहित्य के किरदार की तरह लगता है । बी ए पास एक बेज़रूरत की पढ़ाई है । ऐसी कहानियों के किरदार भी बी ए पासकोर्स से ही मिलेंगे । दावा तो नहीं है पर विश्वसनीय ज़रूर लगा । मुकेश की मासूमियत अंत तक नहीं बदलती है । तब भी नहीं जब वो सारिका को मार देता है । वो सारिका को मार कर कम से कम एक बार या फिर हमेशा के लिए निकल जाने की उड़ान भरता है । फ़िल्म को औरतों की निगाह से न देख पाने की आदत के कारण ही कई लोगों को यह बी ए फ़ेल लगी होगी । कहानी दुखदा़यी है पर फ़िल्म अच्छी है । कहीं आप पर्दे पर औरतों को मर्दों पर हावी देख कर तो विचलित नहीं हो गए । हमारा देखने का तरीक़ा भी कितना रूढ़ है । फिक्स कडींशनिंग है । फिर भी इस फ़िल्म के बारे में कई तरह से देखना और सोचना बाक़ी रह जाता है । यही खूबी है । 

लप्रेक

फ़ासले ऐसे भी होंगे...ये कभी सोचा न था..सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था । गुलाम अली की आवाज़ में यह ग़ज़ल चुपचाप तैरती जा रही थी । वो पूर्वी दिल्ली की तरफ़ देखे जा रही थी और वो क़ुतुब मीनार की दिशा में डूबते सूरज को देख रहा था । दोस्त होकर भी वो दोस्त नहीं लग रहे थे जैसे दिल्ली होकर भी दिल्ली नहीं लग रही थी । बीच बीच में हरे और संतरे रंग की डीटीसी की बसें शहर को काट कूट किये जा रही थीं । उसने मन बना लिया था । पीछा करना प्यार नहीं होता है । मैं उसकी 'मेरी' नहीं हूँ । ग़ज़ल पूरी होने लगी थी । गुलाम अली गा रहे थे....रात भर पिछली ही आहट कानों में आती रही...झाँक कर देखा गली में कोई भी आया न था...वो अपने तमाम ख़तों को ख़ंजर में लपेटे चला जा रहा था । उसके साथ बिताये हर पल का हिसाब जोड़े जा रहा था । जैसे कोई आशिक पूर्वी दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली में प्रेम का गुना भाग कर रहा हो । इश्क़ साँस लेने के लिए है । नाक में दम करने के लिए नहीं । 

एक आवश्यक सूचना



यह नया पथ का सिनेमा विशेषांक है । हिन्दुस्तान का सिनेमा सौ साल का हुआ है और जश्न ऐसे मनाया गया जैसे ये सिनेमा किसी का था ही नहीं । चंद हलचलों के साथ सौ बरसवां साल जा भी रहा है । इस मौक़े पर जनवादी लेखक संघ की पत्रिका नया पथ का विशेषांक आया है । साढ़े तीन सौ पन्नों में सिनेमा के अलग अलग रूप समाहित हैं । सिनेमा पर लिखने वाले कुछ बेहतरीन नाम हैं । शिखर झींगन, अरविंद कुमार, कृष्ण कुमार, संजीव कुमार, रवींद्र त्रिपाठी, विभास वर्मा , अकबर महफ़ूज़ आलम रिज़वी,अजय ब्रह्मात्मज,रविकांत, आशीष नंदी के लेख हैं । सब हिन्दी में है । यह समीक्षा नहीं है सूचना है । डेढ़ सौ रुपये की इस पुस्तकनुमा पत्रिका को आप 9818859545, 9811119391 पर फ़ोन कर मँगा सकते हैं । पढ़ियेगा तो आपका भला ही होगा वर्ना टीवी की डिबेट देखिये जिससे आप रोज़ अपठनीय सामग्री के रूप में तब्दील हो जाते हैं । काउच दर्शक से अच्छा है कुछ पढ़ा जाए । मैं यह नहीं कहता कि नया पथ का सिनेमा विशेषांक ही पढ़ा जाए पर टीवी कम देखिये । टीवी देखने से कृपा नहीं आएगी ! ( अंतिम पंक्ति टीवी पर आने वाले निर्मल बाबा की 'कृपा' विधि से प्रेरित है ) । संग्रहणीय विशेषांक है । कृपा आयेगी । 



लप्रेक

इस शहर में घबराहट बहुत होती है । ये कुछ ज़्यादा बड़ा नहीं है । क्या सिर्फ मैं ही ऐसा सोचती हूँ या तुम भी । हाँ ये शहर बड़ा तो है । ओर है न छोर । तुम्हारे जाने के बाद मुझे भी घबराहट होती है । हर कोई किसी न किसी ऊँचाई पर दिखता है । मैं चलते चलते ऊँचा महसूस करने लगता हूँ । तुम सही कहती हो । यह शहर सबके माथे पर बैठ गया है । ऊँचाई की ओर सब दौड़े चले जा रहे हैं । मैं दूसरी तरफ़ से लुढ़कता चला आ रहा हूँ । नीचे की ओर । घबराहट होती तो है । क्या तुम दिल्ली छोड़ नहीं सकते । मैं छोड़ सकती हूँ । मतलब सोचती हूँ कि छोड़ दूँ । तुम चाहती हो और चाहने से दिल्ली नहीं छूटती है । ये दिल्ली जकड़ लेती है । इतना निचोड़ लेती है कि हम किसी आधे सूखे तौलिये की तरह सूखे होने का अहसास भर रह जाते हैं । इसलिए अब जाने से क्या फ़ायदा । तुम कहाँ कहाँ जाओगी । हर शहर दिल्ली की नक़ल है । मैं भी किसी की नक़ल हूँ । ये इश्क़ तो और अजनबी बना देता है सबको ।