लप्रेक विद मुन्नी बेगम

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे 
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे 
तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ मुझे 
तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे 

किसी ऐसी ही शाम को चुरा लाये थे दोनों । अपनी अपनी पाबंदियों से । नादिरा उर्फ मुन्नी बेगम की गाई इस ग़ज़ल की तरह । वो उसके कंधों पर अपने ख़्यालों को रख धड़कनों को गिने जा रही थी । वो था कि हर गुज़र रहे लम्हों के हिसाब में मशरूफ़ ।   ऊब कर बोल उठी । हम इश्क़ में हिसाब बहुत करते हैं । हाँ । क्यों ? इसलिए कि कोई हमारी शाम चुराते वक्त तुम्हें न चुरा ले । इतना कहा ही था कि डीटीसी एक बस तेज़ी से दीवार में घुस गई । किसी को कुछ हुआ तो नहीं मगर वो समझ गई । 

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था
सरे बज़्म आज ये क्या हुआ
मेरी आँख कैसे छलक पड़ी 
मुझे रंज है ये बुरा हुआ 

मुन्नी बेगम की दूसरी ग़ज़ल बजने लगी थी । इस बार कंधे से सर उठा कर बोलने लगी । सुनो ! मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकती हूँ ? तुम प्लीज़ इस शहर को थाम लो । । 

ये मेरे ही शहर के लोग थे
मेरे घर से घर है मिला हुआ ....ग़ज़ल जारी है । 
( लघु प्रेम कथा ) 

मैं ख़्याल हूं किसी और का

मैं ख़्याल हूं किसी और का
मुझे सोचता कोई और है

जब भी इस ग़ज़ल को सुनता हूं एक ऐसे दौर में चला जाता हूं जहां आज का वक्त अभी अभी गुज़रता सा लगता है। उत्तर उत्तर आधुनिक होने के दौर से पहले की यह ग़ज़ल हमारी अभिव्यक्तियों के संबंधों और उनके बीच पैदा हुए ख़्यालों का ऐसा विखंडन करती है कि आप एक बार इसकी पंक्तियों की तस्वीरों में ख़ुद को पाने लगते हैं। हमने फिल्म समीक्षक तो पैदा किये हैं मगर गानों, ग़ज़लों के समीक्षक हुए ही नहीं जो इनके गाने और सुने जाने के दौर में इसके असर को समझा सके।

मुन्नी बेगम जब गा रही होती हैं तो लगता है सुराही में कोई हवा सरसराती हुई भीतर तक उतरती है और बाहर आ रही है। आज के संबंधों के दौर को याद कीजिए और हमारी अभिव्यक्तियों के रिश्तों के बारे में भी । हम अक्सर सोचते हैं किसी और से कहने के लिए ।  मन कितनी दुनिया पार कर लेता है। आपकी हर अभिव्यक्ति किसी ख़ास की जगह सरेआम साझा है । हम ख़ुद को उन रिश्तों में देखने लगते हैं जो हमारी बातों में ख़ुद को ढूंढने के लिए भटक रहे होते हैं । कोई विश्वासघात नहीं हो रहा है। नैतिक संकट नहीं है ।  कोई पुराना नहीं छूट रहा है। लेकिन हमारे संबंधों के तार उलझने लगे हैं। पता नहीं होता कि आप किस अनजान की बातों में खो गए, पता ही नहीं चलता कि कब आप अपनी दुनिया पार कर किसी की दुनिया में जाकर टहल आए हैं। यह ग़ज़ल चाहतों के बंटवारे की नहीं है।  उस हकीकत को बयां कर रही है जहां संबंध-अंतरसंबंध की कई परतें किसी गुप्त राह से होती हुईं कहीं और भटक रही होती हैं।

वही मुंसिफों की रवायतें,
कहीं फ़ैसलों की इबारतें,
मेरा जुर्म तो कोई और था,
पर मेरी सज़ा कोई और है

हमारे कई राज़दार हो गए हैं। हम अपने मन की बात अजनबियों के बीच ज़्यादा कहने लगे हैं जो चुपके से आकर लाइक कर जाते हैं और खुलकर गरिया जाते हैं। एक नई किस्म की पहचान बन रही है जो शायद उलझा रही है या फिर हम इसी तरह से उलझ कर सुलझे हुए महसूस करते हैं। इतनी बातें जो हम आभासी दुनिया में सरेआम करते हैं क्या हम सामने मौजूद रिश्तों से करते हैं। क्या वैसे और ठीक उसी अंदाज़ में करते हैं । शायद नहीं ।  पक्का हां ।  वहां की बातों में से ऐसा क्या बच जाता है , इतना क्या बच जाता है कि फिर भी साझा करने के लिए काफी होता है।

तू करीब आ तुझे देख लूं
तू वही है या कोई और है

हमारी पहचान हमीं से गुम हुई जा रही है। हर रिश्ते के कई उप-कोने(सब-कार्नर) हैं। अब सिर्फ हमारा सबसे करीब ही हमें नहीं जानता । वो भी जानने लगा है जो शायद कभी करीब ही न हो और क्या पता हो भी गया हो। यही कारण है कि सोशल मीडिया की अभिव्यक्तियां और अकेला कर रही हैं क्योंकि यह प्रक्रिया किसी एक जगह से चलकर दूसरी जगह पर जाकर नहीं रूकती । नहीं ठहरती है । वो वहां से कहीं के लिए और मुड़ जाती है।

अजब एतबार पे एतबारी
के दरम्यान है ज़िंदगी
मैं करीब हूं किसी और के,
मुझे जानता कोई और है

बात सिर्फ चाहत या पाने की नहीं है। बात है बातों को कहने की। उनके सुने जाने और उनके कहे जाने के तलब की। हम अभिव्यक्तियों को लिये भटक रहे हैं। लिखे हुए हर्फ़ों से चिपक रहे हैं उनसे लिपट रहे हैं और मचल रहे हैं ।  बातों की दावेदारी है । हर बात जो मेरी है वो मेरी ही है या किसी और की भी है। ये तलाश सिर्फ किसी उत्तर उत्तर आधुनिक दौर की नहीं है। ये तलाश हर दौर की है जिसके कारण इंसान पूरी धरती नाप गया। चलता रहा। बसता रहा। उजड़ता रहा। वो इतना फैला कि सबसे दूर हुआ । उसे ढूंढना ही था खुद को । तार लेकर आया,फोन लेकर आया, ख़त लेकर आया। इंटरनेट लेकर आया। हम होते हैं किसी और के लिए मगर कोई और भी हमारे लिए होता है । 

मैं नसीब हूं किसी और का
मुझे मांगता कोई और है

हम जिन संबंधों में हैं, वहां के अलावा भी हैं । किसी और के ख़्यालों में, किसी और की चाहतों में । दिलचस्प दौर है। संबंधों के इन खांचों को आप संबंधों की उस परिभाषा से मत देखिये जहां कोई अपना दरवाज़ा बंद कर किसी और की खिड़की से दूसरे के कमरे में जा रहा है। हमारे भीतर बन रही अभिव्यक्तियों को साझा करने की भूख किसी एक से नहीं मिट सकती। बहुत बहुत चाहिए। पांच हज़ार दोस्त और पांच लाख अनुचर या फोलोओर। कमाल है। मुन्नी बेगम ने इस ग़ज़ल को सबसे अच्छा गाया है। सुनकर मस्त हो जाइये।

रूडी की फ्लाइट...गोवा की मीट...आओ चले डार्लिंग

बीजेपी महासचिव राजीव प्रताप रूडी इंडिगो फ्लाइट उड़ाने जा रहे हैं । ये अपना जहाज़ खुद ही उड़ा रहे हैं । गोवा की उड़ान है । इसी फ्लाइट में हमारे सहयोगी अखिलेश शर्मा भी जा रहे है जो बीजेपी कवर करते हैं । ये तस्वीर अखिलेश ने भेजी है । यह भी जीवन है । स्टाइल । 

जिया की मौत का अपराधिकरण न करे मीडिया


फ़िल्म अभिनेत्री जिया ख़ान ने ख़ुदकुशी कर ली । जिया ने तनाव के किन आख़िरी और नाक़ाबिले बर्दाश्त की घड़ी में जीवन समाप्त करने का फ़ैसला किया इसकी मुकम्मल जानकारी किसी को नहीं । इस दुखद ख़बर को जिस तरह से हिन्दी न्यूज़ चैनलों ने ज़िंदादिल बनाकर दिखाया वो हम सबके दर्शक होने की संवेदनशीलता की ख़ुदकुशी की भी आत्मकथा है । हम क्यों देख रहे थे एक ज़िंदगी के इस तरह ख़त्म हो जाने पर उसके सेक्सी से लगने वाले वीडियो, हमें क्यों बताया जा रहा था कि उसके किससे क्या संबंध थे, उसकी ख़्वाहिशें और नाकामियों क्या थीं । दर्शक और चैनल एकदूसरे के अनुपूरक होते जा रहे हैं । मौत पर मातम मनाया जाता है । ये कब से होने लगा कि किसी के मरने पर   उसकी वीडियो और फ़िल्मी गानों को बार बार चलाया जाए ।

जिया की ख़ुदकुशी पर जिस तरह से बहस हुई है उस पर बात होनी चाहिए । अचानक से जिया की मौत के बहाने टीवी के दैनिक विशेषज्ञ ज्ञान देने लगे हैं कि जिया की मौत अकेलेपन की नहीं बल्कि आज के युवाओं की उन चाहतों की वजह से भी है जिसे पाने की अंधी दौड़ में वे भागे जा रहे हैं । क्या जिया से मरने के पहले का युवा आत्मत्याग और अपरिग्रह की ज़िंदगी जी रहा था । क्या बीस साल पहले के युवाओं पर ये बात लागू नहीं होती । गुरुदत्त ने कई दशक पहले आत्महत्या की थी । क्या सिर्फ महान बनने या जल्दी कामयाबी पाने की तड़प में उन्होंने ऐसा किया । ज़ाहिर है इस तरह के फ़ैसले के क्षण नितांत व्यक्तिगत होते हैं, ज़रूर ये क्षण उस समाज में बनते हैं जो आपसे कुछ उम्मीद करता है लेकिन हम किसी अभिनेत्री की आत्महत्या के बाद ही क्यों महत्वकांक्षा की लानत- मलामत करने लगते हैं ।

ग्लैमर की दुनिया की आत्महत्या ग्लैमर पैदा करती है । हम ग्लैमर की दुनिया को किसी प्रेतात्मा की तरह कोसने लगते हैं । इसमें क्या शक कि इस दुनिया शर्ते क्रूर हैं । जिया की मौत के बाद कई जानकार माॅडल से लेकर स्टार की आत्महत्या की गिनती करने लगे तो ये संख्या बीस भी पार नहीं कर पाई । जबकि बालीवुड और माडलिंग की दुनिया में हज़ारों लोग नाम और काम के लिए संघर्ष कर रहे हैं । इनकी तुलना में देश में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं । क्या उनके कारणों पर मीडिया इस तरह से बहस करता है । क्या उनके भी वही कारण थे जो जिया के थे । क्या ये किसान भी महत्वकांक्षा के मारे थे । क्या  हम यह मानते हैं कि सारे युवा जिया जैसे बनना चाहते हैं या जिया सारे युवाओं की तरह थी जो उसकी मौत के बाद हम उनकी हर बात की धुलाई करने लगते हैं । अकेलापन और अवसाद के अलग अलग कारण होते हैं । जिन हालात में जिया को जीना पड़ा वैसे हालात में करोड़ों लोग रोज़ तिरस्कृत होते हैं मगर वे तो अपनी ज़िंदगी समाप्त नहीं करते । हम रोज़ाना विज्ञापनों के माध्यम से युवाओं में चाहत पैदा करते हैं कि वो कैसे दिखें । हमने ही उन्हें उपभोक्ता बनाया है । हमने उन्हें  ये नहीं बताया कि कितना खाना है और कितना नहीं खाना है ।

बोर्ड के नतीजे आते हैं तो मीडिया सिर्फ नब्बे प्रतिशत वालों को पहले पन्ने पर छापता है । टीवी भी इन्हें नायकों की तरह दिखाता है । क्या तब हम यह माहौल पैदा करते हैं कि इस सफलता को सामान्य तरीके से लिया जाना चाहिए । ज़िंदगी का मकसद नब्बे प्रतिशत लाना नहीं है । हम सब सफलता के किस्सों को ऐसी ऐसी  किंवदंतियों में बदलते हैं जिसमें नाकामी और अकेलापन की कोई जगह नहीं होती । हमारा युवा इन चुनौतियों से रोज़ लड़ता है हारता है और जीतता भी है ।

ऐसे में यह कहना कि जिया की मौत हमारे युवाओं की महत्वाकांक्षाओं की देन हैं । परिवार टूट रहे हैं और अकेलापन बढ़ रहा है । सोशल मीडिया उस अकेलेपन को बढ़ा रहा है । ये सब कारण आत्महत्या की परिस्थितियों को रचते होंगे लेकिन यही कारण नहीं होते । कृपया कर जीया की चाहतों का अपराधीकरण न करें । सपने देखना अपराध नहीं है । जयपुर में ही रविवार को एक युवक ने एड्स की बीमारी से तंग आकर ख़ुदकुशी कर ली । डाक्टरों ने पोस्टमार्टम करने से इंकार कर दिया और मोहल्ले वालों ने कंधा देने से । हम एक निष्ठूर दौर में रह रहे हैं । इसके बाद भी जीने के तमाम कारण हैं । जीना ही चाहिए । खुद के काम न आ सके तो दूसरे के आ जाइये ।

पुलिस ने अभी तक जितनी जाँच की है उससे यही पता चलता है कि जिया को तीन फ़िल्में मिली थीं । सूरज और उसके बीच के संबंध मामूली खींचतान के साथ सामान्य ही थे । जिया ने पहले भी कलाई की नस काटने का प्रयास किया था । दोनों के बीच अविश्वास से लेकर जो कुछ भी हुआ वो एक ग़ैर महत्वकांक्षीय रिश्तों में भी होता है । अवसाद या निराशा की स्थिति किसी भी रिश्ते में पैदा हो सकती है । जिया की महत्वकांक्षा को क़सूरवार नहीं बनाया जाना चाहिए । दीपिका भी अपनी नई फ़िल्म को लेकर तनाव में थी । मंदिर मस्जिद के चक्कर लगा रही थीं । आप जब सबकी नज़रों में होते है तो वहाँ से गिरने पर सँभलना भी आना चाहिए । इस डर से तो कोई मुख्यमंत्री ही न बने कि सत्ता जाने पर कोई पूछेगा ही नहीं ।


युवाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं को समझने की ज़रूरत है । आज के ही नहीं कल जो युवा थे उनके लिए भी यह सबक़ है । अवसाद एक बीमारी है । आज के शहरी जीवन और आर्थिक तंगी के दौर में बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी रूप में मनोरोग यानी अवसाद के शिकार हैं । इस बीमारी को समझने और कहने की ज़रूरत है । उससे भी ज़्यादा सुनने की । क्या हम दूसरे की तकलीफ़ को ध्यान से सुनते हैं या अपना ही फ़ैसला सुनने के पहले सुना देते हैं ।
 (यह लेख आज के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

बीजेपी में मोदी का विरोध नौटंकी है

पिछले कुछ दिनों से यक़ीन होने लगा है कि बीजेपी में सबसे बड़ा पद चुनाव प्रचार समिति का है । अध्यक्ष और संसदीय दल से भी बड़ा ? बीजेपी के प्रधानमंत्री के भावी दावेदार नरेंद्र मोदी के कारण यह पद महत्वपूर्ण हो गया है । जो प्रधानमंत्री का उम्मीदवार होगा वही चुनाव प्रबंधक भी होगा ये कमाल की व्यवस्था है । इस पद को लेकर भी उसी तरह की मारामारी है जैसे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर । चुनाव प्रचार समिति चुनाव के समय बड़ी अहम संस्था होती है पर टिकट के लिए अलग कमेटी है । संसदीय बोर्ड प्रधानमंत्री तय करने जैसे फ़ैसलों को लिए है ही तो फिर चुनाव प्रचार समिति कौन सा बड़ा भारी पद है । क्या इसी पद से बीजेपी अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार लाँच करेगी ? क्या अटल जी आडवाणी जी भी चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष थे  ।


बीजेपी कवर करने वाले जानते होंगे । बीजेपी धीरे धीरे उत्सुकता बढ़ा रही है और उसे बनाकर रख रही है । कई बार लगता है कि सब रणनीति के तहत हो रहा है । एक ख़बर आती है आडवाणी मोदी के ख़िलाफ़ हैं फिर अगले ही दिन ख़बर आती है कि आडवाणी ने मोदी के नाम पर मंज़ूरी दे दी है । आडवाणी क्या इतने महत्वपूर्ण हैं कि पार्टी में आदरणीय रूप से हाशिये पर रहते हुए भी मंज़ूरी देते हैं । विरोधी कौन है इसका नाम कोई नहीं छापता । एक रणनीति के तहत सब आडवाणी को मोहका बना रहे हैं ताकि लगे कि मोदी की राह आसान नहीं है । मीडिया द्वारा सृजित इस कृत्रिम द्वंद के कारण मोदी लगातार चर्चा में हैं । रणनीति भी यही है कि मोदी लगातार ख़बरों में बने रहें । आज सही में गाँव गाँव में लोग मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देखने लगे हैं । जानने लगे हैं और असहमत होने लगे हैं । प्रचार की यह शानदार रणनीति है । मोदी का नंबर भी तय हो गया । वे 'वन' पर हैं और शिवराज 'थ्री' पर । बाक़ी नेता किस पोडियम पर है पता नहीं । राजनाथ सिंह मोदी को सबसे लोकप्रिय बताते हैं । मोदी के विरोध की ख़बरें ही चली हैं अभी तक । एक भी ख़बर ये नहीं आई हैं जिसमें ये विरोधी मोदी को किसी भी रूप में रोक पाये हों । हर विरोध के बाद मोदी एक क़दम और चल के आ जाते हैं । 

हो सकता है कि ख़बरें सही भी हों मगर मोदी के विरोधी हैं बड़े कमज़ोर । पर्दे के पीछे से वार और सामने से नमस्कार करने वाले ये विरोधी ख़ाक मोदी का विरोध कर पायेंगे । मोदी ने बीसीसीआई के श्रीनिवासन की तरह बीजेपी में सबको हरा दिया है । ये हारे हुए लोग पत्रकारों के ज़रिये कभी इस कमेटी के बहाने तो कभी उस रैली के नाम पर अपना सिक्का चला रहे हैं । मोदी बाहर से कार्यकर्ताओं के ज़रिये अपने नाम की घोषणा कर चुके हैं । बाद में यही विरोधी कहेंगे कि सारा विरोध मीडिया प्रायोजित था । मोदी ही हमारे नेता है । क्या अब बीजेपी के पास ऐसा कोई मौक़ा रह भी गया है कि वह कहे कि मोदी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नहीं होंगे । क्या बीजेपी और संघ ने मोदी के नाम के प्रचार की छूट नहीं दी ? आडवाणी जी जो लिखें और कहें अंत में सब बेअसर हैं । आडवाणी की बातें ब्लाग के लायक ही हैं । मीडिया क्यों नहीं बताता कि बीजेपी मे मोदी के विरोध का वैचारिक राजनीतिक आधार क्या है ?

दरअसल बीजेपी में मोदी का कोई विरोध नहीं है । ये आने वाले दिनों में और साफ़ हो जाएगा । हो चुका है । मोदी के विरोधी भी बीसीसीआई के सदस्यों की तरह है । जो बाहर तेवर दिखाते है और अंदर स्वागत करते हैं । मोदी ही बीजेपी हैं और बीजेपी मोदी । बाक़ी सब बातें लेख लिखने के लिए हैं । अटकलों के लिए है । पत्रकारों की ख़बरों के लिए हैं । इस कृत्रिम विरोध का मज़ा लीजिये जो दरअसल है ही नहीं ।  मुझे पता है आप यक़ीन नहीं करेंगे ।

नोट- हमारे सहयोगी अखिलेश शर्मा ने बताया है कि चुनाव प्रचार समिति की कमान 99 तक आडवाणी के पास हुआ करती थी। 2004  में इसका जिम्मा प्रमोद महाजन के पास था जब बीजेपी हारी थी। 2009  में जेटली ने ज़िम्मेदारी ली थी तब आडवाणी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया गया था और वे खारिज हो गए थे। इस बार ये ज़िम्मेदारी नरेंद्र मोदी को मिल रही है जो घोषित-अघोषित तौर पर खुद ही प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हैं। 

लक्स मार्का मर्द

" असली मर्द गिराते नहीं बचाते हैं " । टीवी पर आज लक्स कोज़ी के विज्ञापन में एक असली मर्द दिखा । ये असली मर्द लफ़ंगों के कारण स्वींमिंग पुल में गिरा दी गई लड़की को तौलिये से ढंक देता है । फिर धीरे धीरे नंगे बदन ऐसे चलता है जैसे हर्निया का आपरेशन हुआ हो । कैमरा उसकी इस चाल चलन के राज़ पर फ़ोकस करता है । लक्स कोज़ी लिखा है । यानी असली मर्द की गुप्त पहचान । ये मर्द छेड़खानी करने वाले लड़कों को धक्का देकर बचा लेता है । इससे पहले के पर्दे के मर्द लड़की पर अपनी शर्ट डाल छेड़ने वाले का कचूमर निकाल दिया करते थे ।  लक्स कोज़ी बिल्कुल कोज़ी है । ये असली मर्द समझौता कर लेता है और मुड़कर अपने अंडरवियर पर इतराता लौट आता है । 

ये कौन से असली मर्द हैं । लगते नक़ली से हैं । इनकी मर्दानगी अंडरवियर समानुपाती है । जैसा अंडरवियर होगा वैसी मर्दानगी होगी । जैसे अंडरवियर न हुआ सबलोक क्लिनिक हो गया । इस तरह के मर्द गढ़े जा रहे हैं रोज़ाना । पता नहीं असली औरत क्या होती होगी । स्वाभाविक है जब असली  मर्द होते होंगे तो असली औरत भी धरती पर कहीं न कही होगी । उसके आने का इंतज़ार कर रहा हूँ । 


विज्ञापनों के इस अंडरवियर काल पर पहले भी कई बार टिप्पणी कर चुका हूँ । ख़बर पढ़ते समय या देखते समय अचानक बीच में बनियान में वोट करते और अंडरवियर में फ़्लोट करते दिख जाते हैं तो खुद के सूट बूट में लदे ढँके होने पर घबराहट होने लगती है । असली मर्द तो बिना कपड़े के चला जा रहा है । जो पूरे पहने हैं वो क्या हैं फिर । एक सवाल और वो ये कि अंडरवियर और बनियान वाले मर्द ज़्यादातर स्वींमिंग पुल, समंदर किनारे या गली में गुंडों से ही भिड़ते क्यों दिखते हैं । ये किसी लैब में किसी दफ्तर में भी तो यूँ आते जाते दिख सकते हैं । 

मर्दानगी को फटीचर कर दिया है इन होज़ियरी वालों ने । मर्दानगी चिरकुट अवधरणा है भी । एक बात और ये सब ब्रांड अंग्रेज़ी के दर्शक नहीं पहनते क्या । क्या आपने अंग्रेज़ी चैनलों पर अंडरवियर बनियान के विज्ञापन देखे हैं ? मुझे ध्यान नहीं आता । क्या अंडरवियर सिर्फ हिन्दी भाषी दर्शकों की राष्ट्रीय चाहत है ? अंग्रेज़ी वाले क्या बिना असली मर्द हुए ही ? राम राम । मैं भी क्या क्या लिखता रहता हूँ । गिली गिली थू थू । एक ही डर है । इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर लोग पतलून क़मीज़ पहनने का आइडिया ही न छोड़ दें । 

चलते चलते: जैसे ही टीवी पर चैनल बदला प्रधानमंत्री नक्सल समस्या पर भाषण दे रहे थे । उनकी तस्वीर के नीचे डाॅलर बनियान का स्लोगन फ़्लैश कर रहा था । फ़िट है बाॅस । बस अब मुझे गेस नहीं करना है । 

जिया की जान मत लो चैनल वालों

जिया ख़ान आज दिन भर चैनलों पर मरेगी । उसने ख़ुदकुशी कर ली है । चैनल उसकी मौत के करणों का ख़ुलासा चाहते हैं । इस युवा अभिनेत्री का जाना शोक का विषय नहीं है । उत्सव है । हम कितने क्रूर हैं । चैनलों के पास दलील भी हैं कि एक चमक भरी दुनिया के अंधेरे में जिया ने जान दे दी । यह ख़बर है । 

रोज़ाना जीये रोज़ाना मरे तेरी यादों मे हम । निशब्द का ये गाना बज रहा है । बार बार बज रहा है । आमिर और अक्षय के साथ उसके अभिनय के सीन चलाये जा रहे हैं । चैनल उसके बंद दरवाज़ों को कवर कर रहे हैं । रिपोर्टर बता रहा है कि दरवाज़ा बंद है । हम नाॅक कर रहे हैं मगर खुल नहीं रहा है । लोगों को पता है कि मीडिया को जवाब देना पड़ेगा इसलिए नहीं खोल रहे हैं । एक एंकर कहते हैं कि जिसका नाम जिया हो उसने ही जीने में कर दी आना कानी । निशब्द फ़िल्म थी जिया की इसलिए हर लाइन के बाद स्तब्ध की जगह निशब्द का इस्तमाल हो रहा है । 

हम क्रूर हो गए हैं । जिन पत्रकारों को इस धंधे में रहना है वे मेरी बात से बिल्कुल प्रभावित न हो बल्कि वही करने का इरादा करें जिसकी मैं आलोचना कर रहा हूँ । वे ऐसा ही करें किसी के मरने पर । मुझसे प्रभावित न हो जाएं वर्ना इस पेशे के किस सुरंग में धकेल दिये जायेंगे, पता भी नहीं चलेगा । इस मीडिया को आलोचना से कोई असर नहीं होता इसीलिए मैंने श्रीनिवासन को सपोर्ट किया था कि उसे इस मीडिया से कोई असर नहीं हुआ । पहली बार किसी ने खुलेआम मीडिया की तरह बिहेव यानी बर्ताव किया है । 

खैर । एक मासूम ज़िंदा चेहरा स्क्रीन पर तैर रहा है । उसके मरने की ख़बर हम उसकी चलती फिरती तस्वीरों के साथ देख सुन रहे हैं । दर्शकों की फंतासी में ज़िंदा और सेक्सी जिया को ठेला जा रहा है । कोई आँसू नहीं है । ग़म नहीं है । अजीब त्रासदी है । पचीस साल की मासूम लड़की । क्या ज़िंदगी रही होगी । सचमुच ख़ामोश हो जाने का वक्त है । मगर चैनल आपको नया संस्कार दे रहे हैं । आपके घर में कोई मर जाये तो उनकी वीडियो रिकार्डिंग निकाल कर मेहमानों को दिखाइयेगा और फिर उसके बाद श्मशान जाइयेगा । वीडियो न हो तो अल्बम निकालियेगा । 

ये क्या मीडिया समाज है । कहीं बेहूदा मनोवैज्ञानिक घटिया विश्लेषण दे रहे हैं तो कहीं उनके पुराने निर्देशक । आज सब सफलता को सुसाइड योग्य बता रहे हैं । इन सब बातों के बीच क्लिप चल रही है । 
शिखर को किसी तनाव का बखान हो रहा है । 

जिया मर गई है । काश वो लड़ती । और जीती रहती । हम सब से गुमनाम होकर । उसके बाद अब हम सब मिलकर उसकी बुज़कुशी कर रहे हैं । टीवी के सामने बैठकर अपने भीतर ज़िया का गला घोंट रहे हैं । ब्रेक के बाद ज़िया लौट आई है । बच्चन उसे पाइप से भिंगो रहे है । 

जिया हमें आपके इस तरह जाने का बेहद अफ़सोस है । वैसे 

ये जवानी है दीवानी

इस फ़िल्म की कहानी इसके गानों से ही चलती है । सुंदर चित्रहार है । मेक माई ट्रीप डाॅट काॅम के लिए यह फ़िल्म बनी है । सिनेमा हाल में लोग जिस तन्मयता से देख रहे थे उससे हैरान हो गया । लोग शायद फ़िल्म से यही उम्मीद करते हैं कि उसमें कहानी नहीं  हो न सही मगर सपनों के इतने टुकड़े हों कि हर सपना देखने वाले के किसी अधूरे कोने को छू कर गुज़र जाए । हमारा दर्शक बहुत उदार है । कहता है मन लग गया । ये जवानी है दीवानी किसी ट्रैवेल कंपनी का प्लाट लगती है जिसमें नायक उन जगहों को देखने का सपना पालता है जहाँ ले जाकर आपको कोई भी कंपनी कमाने का सपना पालती होगी । वेनिस को मुंबई का धारावी बताता है और उदयपुर के होटल के सौंदर्य का लाभ उठाते हुए एक शाही और आवारा शादी का प्रदर्शन करता है । 

रणबीर कपूर की कलाई पर आवारा लिखा देखा तो ख्याल आया कि नायक इस फ़िल्म में दादा राजकपूर की सिनेमाई विरासत से जुड़ कर दिखना चाहता है । कोई बुराई नहीं । लेकिन इस फ़िल्म की कहानी ट्रेवेल एजेंट के मंसूबों के पीछे पीछे चलती है । दुनिया देखने का सपना एक ऐसे ख़्वाब की तरह पेश किया जाता है जैसे जीवन के बने बनाए सिस्टम से निकलने का यही आख़िरी रास्ता हो । ऐसा सपना लिये कोई नायिका अभी खुलकर पर्दे पर नहीं आई है । ये सपना सिर्फ हीरो के लिए रिज़र्व है । कैमरे और ट्रायपोड लाद लेने की दुनिया भी उसी बनी बनाई पैटर्न पर काम करती है । वहां भी तो घुटन है । बताऊं क्या अभी । खैर कुलमिलाकर रणबीर का यह सपना अपनी नौकरी बेकार और दूसरे की अच्छी लगने वाली आदत से ज़्यादा की नहीं है । रणबीर कपूर नब्बे परसेंट के इस दौर में अपने न पढ़े लिखे होने का जश्न मनाते हुए टीवी शो की दुनिया में घुस जाता है । जहाँ टैलेंटेंड होने की निशानी कंधे पर कैमरे का टंगा होना है । जैसे दीपिका का डाक्टर होना अभिशाप हो गया । ट्रीप पर वो अपने लिये जाती है या माय ट्रीप डाट काॅम के लिए । 


तीन दोस्तों के बीच कुछ भी ऐसा नहीं जो पहले के सिनेमाई दोस्तों ने न किया हो । ये अमीर घर के लगते हैं जहां पचीस लाख नहीं होना गरीबी की निशानी है । फिलमों में ऐसे दिखाया जा रहा है हमारा युवा जिसे लेकर राजनीति में हड़बड़ी में बड़ी बड़ी संभावनायें देखी जा रही हैं । दरअसल यह फ़िल्म कई हिन्दी फ़िल्मों के प्लाट को फिर से ज़िंदा करती है । दोस्ती उस यथास्थिति का निर्माण करती है जहाँ कोई सवाल नहीं है । सब एक जैसा हो जाने की बारी का इंतज़ार करते हुए समाज के बनाए ढाँचे में ढलने का इंतज़ार करते हैं । क्या हो जाता गर हीरो शादी न करने, प्यार न करने के अपने फ़ैसले पर क़ायम रह जाता । वो बिना प्यार के पेरिस की सड़को से किसी लड़की को बुलाकर चुम्माचाटी ( चुंबन तो कत्तई नहीं ) कर भुल जाता है । मैं नैतिकता की बात नहीं करता । ये नार्मल है पर नायक की आज़ाद ख़्याली का ये कौन सा लंपट मुकाम है । फ़्लर्ट करने को सेहत के लिए ज़रूरी बताता है । बाद में शादी के ही सिस्टम में लौट भी जाता है । रणबीर का नाम कबीर है और काम कबीर जैसा कुछ नहीं । हिन्दी सिनेमा में कबीर नाम काफी चला हुआ है । अगर ऐसे ही दो चार कबीरों का नाम आता रहा तो लोग असली कबीर की कल्पना भी रणबीर कपूर के बग़ैर नहीं कर पायेंगे । 

यह एक देखी हुई फ़िल्म है जिसे ठीक से बनाया है । दीपिका के अभिनय की तारीफ़ हो रही है । कोई केंमिस्ट्री की बात कर रहा है । रणबीर दीपिका की जोड़ी मैच करा रहा है । पूरी फ़िल्म में दीपिका डाक्टर है । एक शाट अस्पताल या क्लिनिक का नहीं है पर वो पढ़ाई मेडिकल का कर रही है । उसके बाद भी किसी क्लिनिक की चिंता में कबीर के साथ दुनिया देखने नहीं जाती है । अमीर ग़रीब का सीन नहीं है । स्कूल में टापर दीपिका और भोंदू रणबीर के बीच क्लास डिवाइड बनाकर सेंटी सीन क्रिएट किया जा रहा है । 

इस फ़िल्म को स्पाट फ़िक्सिंग के संदर्भ में देखा जाना चाहिए । अवि बुकी है । सट्टेबाज़ । अवि इंडिया पाकिस्तान पर सट्टे लगाता है । किसी को उसके सट्टेबाज़ होने से समस्या नहीं । इनकी दोस्ती के रोमांटिक पल में सट्टेबाज़ी स्वीकृत हो जाती है । 

फ़िल्म चल गई है । ये जवानी है दीवानी । मन लगना ही प्राथमिकता है तो मन लगा लीजिये । दीपिका रोकर और पढ़ाई को बोझ बताकर सहानुभूति बटोर रही है । पढ़ी हुई लड़की का यह विचित्र रूप है । दया का पात्र बनी रहती है दीपिका । मैं तुलसी तेरे आँगन की मार्डन रूप धर कर । पर फ़िल्मी और हकीकी प्यार में यही होता है । इंसान इंतज़ार करने लगता है । रोता है । हँसता है । उसी के बारे में सोचता रह जाता है। ये होता है । उसमें बड़ा दर्द है भाई । 

कल्कि अवतार पर बात होनी चाहिए । कल्कि का अवतार पर्दे पर क्या इसी रोल के लिए हुआ है । ये हिप्पी रोल हिन्दी सिनेमा का घिसा हुआ है । कल्कि मे इतनी संभावनाएँ हैं लेकिन उसके लिए अब यही सब रोल बचे हुए हैं । लेदर जैकेट पहनने वाली, टैटू, सर पर गमछा, लड़कियों के बीच लड़कों जैसी । क्या है ये सब कल्कि । बल्कि तुम कल्कि मत करो ऐसे टाइम पास । इस तरह के रोल को उन नायिकाओं के लिए छोड़ दो जो संघर्ष कर रही हैं । जिन्हें पैसे और पहचान की भी ज़रूरत है । 

ऐसा नहीं था कि मैं रणबीर और दीपिका से माओवाद की समस्या की पृष्ठभूमि में उनसे किसी महान भूमिका की उम्मीद में गया था । सच पूछिये तो मेरा भी मन लग ही गया । सुन कर जल्दी भुला दिये जाने वाले बेहतर गाने, शादी से पहले का संगीत, होटल, ये सब था और "प्यार हो जाएगा फिर से" सुनकर रणबीर दीपिका की असली प्रेम कहानी से थोड़ा कनेक्ट । फ़िल्म कमा रही है । हम सब उन देवी देवताओं और पीर बाबाओं के आदेश से देखने गए थे जिनके यहाँ फ़िल्म के हिट होने की दीपिका ने गुहार लगाई थी । मैं रणबीर की फ़िल्म देखता हूँ क्योंकि कुछ बात है इसमें । फिर भी इस फ़िल्म में वो कई लोगों को क्यूट लगा है । सारे डफ़र क्यूट हू क्यों लगते हैं ? आज तक मेरे लिए यह एक रहस्य है । 

श्रीनिवासन का आसन

प्यारे श्रीनी,

आज मैं भयंकर तनाव से गुज़र रहा हूँ (किसी और वजह से ) ऐसे में तुम्हारा इस्तीफ़ा न देना फिर से मुझे अपना स्टैंड बदलने पर मजबूर कर रहा है । कमाल हो तुम यार । तुम्हें मनमोहन सिंह की जगह होना चाहिए । टीवी चैनल के घंटों कवरेज से ऐसे दबाव में आने लगे तो हो चुका । ट्विटर अख़बार और फ़ेसबुक से तुम अकेले लड़े । तुम्हारी कुर्सी ज़रूर बड़ी होगी कि तुमने थोड़ी सी कमर खिसका कर ज़ग्गू दादा को जगह दे दी । वाह । किसी की मज़ाल नहीं हुई कि इस्तीफ़ा मांग ले तुमसे । ठीक किया तुमने । अब तुम अगले हफ़्ते भी छाये रहोगे । एंकर तुमसे इस्तीफ़ा माँगेंगे और तुम नहीं दोगे । 

मैंने पहले प्रेम पत्र में जो तुम्हारे बारे में बातें कहीं थीं वही सही निकलीं । जो माँगा ही न जाए उसे कैसे भला दिया जाए । नैतिकता मांग पर आधारित होती है । अगर इसकी डिमांड नहीं है तो जाए भाड़ चूल्हे में । सीमेंट ऐसे ही नहीं बेच लेते हो । धारणाओं का धारण नहीं करने वाला ही असाधारण होता है । गीता में कृष्ण लिखवाना भूल गए थे इसलिए उनके बिहाफ़ पर मैंने लिख दिया है । 

हठयोग की तरह तुमने पदयोग स्टार्ट कर दिया है । पद योग पद न छोड़ने का हठ है । तुम्हारी मानसिक बनावट का अध्ययन होना चाहिए । ये बंसल अश्विनी कितने कमज़ोर थे । 

श्रीनी तुम इस्तीफ़ा जैसी तुच्छ चीज़ों से ऊपर हो । ये क्या चीज़ है यार जो दिया जाए । स्टेप असाइड एक नया टर्म है जो अब चलेगा । वाह श्रीनी वाह । यार अब तो चार बोरी सीमेंट दे दो घर के सामने डिवाइडर बनानी है रोज़ वहाँ एक्सीडेंट हो जाता है । 

रही बात बीसीसीआई की छवि की तो उससे किसको फ़र्क पड़ता है । अब तुम्हारी राह पर मैं भी चलूँगा । हालाँकि मैं एक पदविहीन पत्रकार हूँ फिर भी इसे ही पद मानकर इससे कभी इस्तीफ़ा नहीं दूँगा । 

श्रीनी रियली कूल और कैट हो यार । थोड़े मेरी तरह फ़ैट हो । 

तुम्हारा

कोई नहीं तो क्या हुआ हूँ न मैं
रवीश कुमार 

ये जहाज़ और जहाज़ वाले ऐसे उड़ते क्यों हैं ?

कोलकाता एयरपोर्ट का अनाउसमेंट सिस्टम ख़राब है । आवाज़ चीख़ती है । जैसे जहाज़ में विलंब ग्राहक की वजह से हो गया हो । उसके तुरंत बाद रबींद्र संगीत दूसरे स्केल में ले जाता है । कोई सुन नहीं रहा पर बजा जा रहा है । लोगों ने अपने कानों में ईयरपीस ठूंस लिये हैं । कुछ के कान पर फ़ोन चिपके हैं । कोई बता नहीं रहा है कि रवींद्र संगीत का कौन सा धुन है और क्यों सुनना चाहिए । बस बजा जा रहा है । यह मानकर कि हम सब इस मामले में विशारद हैं । अब नई डिग्री आ रही है । बर्कलेट(शायद) । बकलोल के समानार्थक है । 

इसी बीच एक जहाज़ हुआं हुआं करता हुआ भरभराने लगता है और हां़य हां़य करता हुआ बादलों में घुस जाता है । बिना परवाह किये कि मोहल्ले के लौंडों की तरह एक्सलेटर मार कर स्कूटर चलाने की तरह हवाई जहाज़ उड़ाने से मेरे जैसों का कलेजा थोड़ा सिकुड़ जाता है । जहाज़ों ने चिड़ियों से उड़ना तो सीख लिया मगर उनकी तरह उड़ना नहीं आया । बताइये हम जैसे यात्री कबूतर की तरह दुबक जाते हैं । 

लोग हैं कि पोलिथिन में मिठाई का डिब्बा लिये हिलते डुलते चले आ रहे हैं । कई लोगों ने आम का काटन कसवा लिया है । जी भूरे वाले गत्ते के बक्से को काटन कहते हैं । एक हम थे जो कार्टून कहते थे । बल्कि कई लोग कार्टून कहते थे । जवानी के दिनों में कुछ दोस्त जो खुुद लड़कियों से सीख कर आये थे मुझ पर हँसने लगे । कार्टून नहीं रे बे काटन । तो लोगों ने आम कसवा लिये हैं । हम सब को गराज का माल खाने की आदत है । जिन शहरों को रोज़गार की ख़ातिर छोड़ दिया उनके गराज के माल के लिए तरसते रहते हैं । 

सारी टाइल्स यही लग गई है । जल्दी ही एयरपोर्ट के लिए नया जूता आएगा । जो टाइल्स फ्रैंडली हो । आजकल अधेड़ उम्र के लोग शाट्स खूब पहनने लगे हैं । लास्ट टाइम में कूल होने के लिए । लुंगी में क्या प्राब्लम है । बड़ा ही आयातीत लगता है । भारतीय परिधान वाले यहाँ ऐसे लगते हैं जैसे ट्रेन छूट जाने के बाद लास्ट मिनट में फ़र्स्ट एंड लास्ट टाइम के लिए आ गए हों । हज जाने वाले अलग ही ताव में रहते हैं । पूरा मोहल्ला टाटा सूमो में  लाद लाते हैं । बड़ा मौका तो होता है पर दूर से ही लग जाता है कि हैं भाई हज का बुलावा आया है । 

लैपटाप ऐसे खोल के बैठे हैं सब जैसे सारा काम निपटा आये हैं बस एक दो रह गया है । सारे एक्ज़ीक्यूटिव एयरपोर्ट पर काफी काम करते हुए दिखते हैं । मुझे गर्दन में सोने का मोटा चेन पहनने वाले पसंद आते हैं । लगता है कि इसी के लिए कमा रहा है । एयरपोर्ट लगता ही नहीं है कि इंडिया में है । सब यहाँ विदेशी फ़ील करते हुए चले जा रहे हैं । बाप रे कोई इसको मना करेगा । कैसे बोल रही है । मार दिया आज इसने । कान पे कटारी चला दी है । 


पुनश्च- दिल्ली एयरपोर्ट पर कुछ लोग हेल्प हेल्प कहते मिले । उनकी जेब पर पेड पोर्टर लिखा था । यानी एयरपोर्ट पर क़ुली यानी भार वाहक । पहले कभी नोटिस नहीं किया था । चलता भी तो साल में दो बार हूँ ।