खेती के विकास के लिए कभी आपने नेताओं की इतन सक्रियता देखी है? ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के सैंकड़ों स्थानों पर किसानों की ज़मीन विकास के लिए ली जा रही है। खुद खेती संकट के दौर से गुज़र रही है। अनाजों को रखने के लिए अभी तक गोदाम नहीं बन सके हैं। फल-सब्ज़ियों के उत्पाद को बचाने के लिए वातानुकूलित स्टोरेज की व्यवस्था तक नहीं कर पाये। किसान का कर्ज़ा माफ करके और उस पर कर्ज़ लाद कर उसे वहीं का वहीं रख छोड़ा जा रहा है। किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक हो रहा है। गांवों में आप स्कूल,सड़कों और बिजली की हालत देख लीजिए। किसानों के बच्चे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं। बीबी-बच्चों का अस्पताल जिन सरकारी अस्पतालों में होता है उनकी हालत देख लीजिए। इन सब हालात में सुधार के लिए तो कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आता। उनके लिए अब तक कि सबसे बड़ी परियोजना यही सोची जा सकी कि उनकी दिहाड़ी मज़दूरी तय कर देते हैं। एक तरफ उन्हें पिछड़ा बनाए रखो और दूसरी तरफ उन्हें ख़ैरात बांट दो और इस खैरात का भार न पड़े इसलिए रोज़ाना पंद्रह रुपये से अधिक कमाने वाले को ग़रीब से अमीर घोषित कर दो। गांवों और किसानों के विकास के नाम पर बनी तमाम योजनाओं संपादकों के कॉलम में ही ज्यादा बेहतर और नियोजित नज़र आती हैं। ज़मीन की तस्वीर वही है जो बीस साल पहले थी। कुछ सरकार से भावनात्मक आशीर्वाद प्राप्त पत्रकार तो अब यह दलील देने लगे हैं कि देखिये गांवों में लोग टीवी खरीद रहे हैं, डिश टीवी आ रहा है, बाइक की सेल्स बढ़ गईं हैं, वहां कोई गरीबी नहीं हैं। गांवों में पैसा है।
हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं। बैंकों में इनके साठ लाख की फिक्स्ड डिपोज़िट ज़रूर होगी मगर ये बेकार हो चुके हैं। दूसरे गांवों में ज़मीन लेना और बसना इतना आसान नहीं होता। पारंपरिक पेशे से उजड़ने और ज़मीन से जुड़ी सामाजिक मर्यादा के नुकसान की भरपाई मुआवज़े की राशि में नहीं होती है। इस बात का तो अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है कि ज़मीन से बेदखल होने का गांव के पारंपरिक सामाजिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। राजनीतिक नारेबाज़ियों के बीच टप्पल में ही कई दलित किसानों से मिला। कानूनी अड़चनों के कारण उनकी ज़मीन का बाज़ार भाव कम होता है। दलितों ने बताया कि हमें तो अधिक दाम मिला लेकिन वो पैसा जल्दी ही घर बनाने और शादी ब्याह में खत्म हो गया. हम भी जाटों की तरह ही बेकार और विस्थापित हो गए।
इसी के साथ यह सवाल भी उभरा कि फिर इन किसान आंदोलनों के नेतृत्व या समर्थक के पैमाने पर दलितों की भागीदारी कम या नहीं के बराबर क्यों हैं? टप्पल का विरोध बड़ा नहीं होता अगर चौधरी कहे जाने वाले किसानों की ज़मीन नहीं गई होती। मेरी समझ से यह मौजूदा किसान आंदोलनों का अंतर्विरोध है। फिर भी आप देखेंगे कि किसान आंदोलन अब किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं होते। ग्रेटर नोएडा से लेकर टप्पल तक अलग-अलग किसान संघर्ष समितियां हैं। वक्त पड़ने पर इनके बीच साझा ज़रूर हो जाता है मगर इनका चरित्र स्थानीय है। आगरा के भूमि बचाव संघर्ष समिति के नेता ने कहा कि मुआवज़े की लड़ाई ही नहीं हैं। हम तो ज़मीन ही नहीं देना चाहते हैं। सरकार हमें पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर( अनुमानित राशि) देती है जबकि बिल्डर को देती है दो से तीन हज़ार वर्ग मीटर के दर से। यानी पहला मुनाफा तो सरकार ने ही बनाया। फिर बिल्डर उस ज़मीन को पंद्रह से बीस हज़ार प्रति वर्ग मीटर के रेट से बेच रहा है। अगर आप इस इलाके की ज़मीन का औसत मूल्य के आधार पर भी हिसाब लगाए तो यह घोटाला तीस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। सवाल है कि सरकार क्यों नहीं किसानों को सीधे बाज़ार में उतरने दे रही है। वो उनसे ज़मीन लेकर बिल्डरों को क्यों बेच रही है। जो सरकार को मुनाफा हो रहा है वो किसानों को क्यों नहीं मिल रहा है।
दूसरी बात क्या कोई साबित कर सकता है कि बीस साल के उदारीकरण में जो विकास हुआ उसमें किसानों की भी हिस्सेदारी रही। भागीदारी तो नहीं रही उनकी। फिर किस हक से उनकी ज़मीन हड़प ली जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास की इतनी बेताबी है तो खेती में बुनियादी ढांचे के विकास की बात क्यों नहीं हो रही है। कितनी सिंचाई परियोजनाएं आपने इस दौरान बनती देखी है। कितनी ऐसी योजनाएं आपने देखी हैं, मधुमक्खी पालन के अलावा, जिनसे खेती का उद्योगिकरण हो रहा है।
मीडिया तो राहुल गांधी को कवरेज देगी ही। लेकिन जो सवाल है तीस लाख करोड़ रुपये के घोटाले का,उसकी कोई तहकीकात नहीं करेगा। क्योंकि ये सवाल उसे मायावती तक ले जाने से पहले प्रायोजकों के दरवाजे पर ले जायेंगे। इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन की कवरेज में पीपली लाइव का तमाशा देखिये। ऐसा फालतू दर्शक समाज मैंने कहीं नहीं देखा और पालतू मीडिया। किसान मुआवज़े की राशि लेकर देसी शराब के ठेके पर नहीं जायेगा तो क्या करेगा। उसे क्या हमने ऐसी तालीम दी है कि वह अपना उद्योग धंधा कायम कर सके। आखिर मुआवज़े से विकास होता तो आप ग्रेटर नोएडा और गुड़गांव के किसानों का अध्य्यन तो कीजिए और पता तो लगाइये कि इतनी बड़ी राशि आने के बाद कितने किसानों ने उद्यमिता का मार्ग अपनाया। हां कुछ किसानों की शानो शौकत की खबरें आप अखबारों में ज़रूर पढ़ते रहे होंगे। ये वो कुछ किसान हैं जिनके पास बेहिसाब ज़मीन थी और राजनीतिक सत्ता से संबंध जिनके बूते इन्होंने अपने पैसा का तानाबाना बुन लिया। बाकी किसान पव्वा और अध्धा में ही व्यस्त रह गए। टेंपो ड्राइवर बन गए।
भाई साहब,किसी नेता से पूछिये तो वो किसी बिल्डर के बारे में क्यों नहीं बोल रहे। कमीशन तो उन्हें भी मिलता रहा है बिल्डरों से। माफ कीजिएगा। ये आज कल डेवलपर कहलाने लगे हैं। विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू है।
बंगाल में अदल-बदल
ठीक है कि हम दंगों की आग में नहीं जले। लेकिन पेट की आग भी बड़ी चीज़ होती है। बंगाल के मुसलमानों की हालत ख़राब है। अपनी बात कहते हुए अलीमुद्दीन मस्जिद के नीचे बैठे गुलाम हुसैन टेलिग्राफ में छपे आंकड़ों को दिखाने लगे। ये देखिये केंद्र का मंत्री गलत बोलेगा। क्या हुआ मुसलमानों के साथ आप खुद देखिये न। पास में बैठे रसूल मियां मुस्कुराते हुए हज़ामत बना रहे थे. मैंने पूछा कि क्यों हंस रहे हैं? बोले १९६३ से यहीं बैठा हूं। मोतिहारी से कलकत्ता आया था। कमाने। ज्योति बसु का ज़माना ठीक था। कुछ उम्मीद थी। वाम दल ने हमको सड़कों से हटाया नहीं लेकिन कुछ बदला नहीं। हम तो यहां तब से है जब अलीमुद्दीन स्ट्रीट में सीपीएम का दफ्तर नहीं था। मेरे इस पेड़ के नीचे बैठने के बाद ही तो पार्टी बनी। पहले इस गली में सीपीआई का दफ्तर होता था। देखिये चार कमरे से कितना बड़ा दफ्तर हो गया।
आप जिन आवाज़ों को सुन रहे हैं वो उसी अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर सुनाई दे रही थीं जहां सीपीएम का मुख्यालय है। मुस्लिम बहुल इलाका लगता है। कोई हलचल नहीं है। चौरंगी विधानसभा इलाके में पड़ता है सीपीएम मुख्यालय। तृणमूल का गढ़ माना जाता है। इसलिए यहां से सीपीएम नहीं लड़ रही है। लालू का लालटेन छाप है। यहां रहने वाले मुसलमानों में वाम सरकार को लेकर जाश नहीं दिखा। ब्रेड बिस्कुट बेचने वाले एक मुस्लिम दुकानदार का कहना था कि यहां तो लोगों ने बारात घर तक नहीं बनवाया। नाली-पानी तक का इंतज़ाम नहीं किया। तृणमूल के इकबाल साहब(नाम ठीक से याद नहीं) ने कितना काम किया। सीपीएम का पार्टी आफिस ही देख लीजिए। सफेदी भी नहीं कराते। कम से कम रंगाई-पुताई में ही दस लोगों को काम मिल जाता। अच्छा कपड़ा पहनने से लगता है कि आदमी काम का है।
बंगाल के मुस्लिम इस बार अलग तरीके से सोच रहे हैं। वो अपने हालात पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बंगाल के घर-घर में चल रहे मुस्लिम कारीगरों की हालत रोटी-पानी के जुगाड़ तक ही सीमित है। काम तो मिल रहा है मगर यह काम उन्हें किसी काम का बनाने में मदद नहीं कर रहा। सेकुलर दलों को सोच लेना चाहिए कि इस देश का मुसलमान सिर्फ बीजेपी के भय से उसके साथ चिपका नहीं रहेगा। सांप्रदायिकता मुद्दा है मगर इसके अलावा भी कई ज़रूरी सवाल हैं। सीपीएम ने समझने में देर कर दी। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को खारिज कर देना और बताना कि हाल के दो साल में काफी सुधार हुआ है काफी नहीं है। दो साल के काम से किसी समुदाय की आर्थिक हैसियत में बहुत बदलाव नहीं किया जा सकता है। यही काम पांच साल पहले हुआ होता तो राजनीतिक वोट में भी बदल सकता था। मदरसा शिक्षकों को वेतन देने से मुस्लिम समाज का काम नहीं हो जाता है।
जहां भी गया आम मुसलमानों में ममता के प्रति खास लगाव देखा। ममता इसे समझ गईं हैं। इसलिए भाषण में ऊर्दू को दूसरी भाषा बनाने का लोकलुभावन नारा देती हैं। ममता ने बंगाल की राजनीति को ऊपर से हिन्दी,ऊर्दू और बांग्ला तीन खांचों में बांट दिया है। प्रवासी लोगों के लिए अलग से बातें करती हैं। सीपीएम बचाव की मुद्रा में अपनी बात रख रही है। ये और बात है कि ऊर्दू को सेकेंड लैंग्वेज बना देने से भी मुसलमानों को कोई भला नहीं होने वाला। मगर ममता के तालीबजावन नारों से ही एक नई उम्मीद पैदा हो रही है। तृणमूल के कार्यकर्ताओं के समूह को ठीक से देखिये। मुस्लिम कार्यकार्ताओं की सक्रियता खूब दिखेगी।
होज़ियरी के मामले में बंगाल ने पिछले पंद्रह सालों में काफी तरक्की की है। दिल्ली के गांधीनगर में ही व्यापारियों ने बताया था कि लड़कियों के फ्राक बनाने के मामले में कोलकाता का जवाब नहीं। कोलकाता गया तो शाहरूख, ह्रतिक,सनी,सैफ,अक्षय,नितिन मुकेश सब के सब गंजी अंडरवियर के प्रचार में होर्डिंग पर खड़े नज़र आ रहे थे। पता किया तो लोगों ने बताया कि पंद्रह हज़ार करोड़ रूपये का कारोबार है होज़ियरी का। मटियाबुर्ज़ का इलाका इसका गढ़ है। घर-घर में मशीनें चल रही थीं। सब मामूली कारीगर। किसी घर में दो सिलाई मशीन तो किसी में चार। कुछ की हैसियत बड़े व्यापारियों जैसी ज़रूर दिखी लेकिन हर दूसरी मशीन पर दस से बारह साल के बच्चों को कपड़े सिलते देखा तो लगा कि वाम राजनीति विचारधारा के ईंधन से ज्यादा समय तक नहीं चल सकती। पंद्रह घंटे काम करते हैं ये बच्चे। बच्चों के कपड़े बच्चे ही सिलते मिले। लोगों ने बताया कि क्या करें इन्हें पढ़ाई के लिए भेजें या काम करायें। ये बच्चे बटम टांकने का काम नहीं कर रहे थे बल्कि पूरी तरह के कुशल दर्जी की तरह कपड़ों को सिल रहे थे।
एक व्यक्ति ने कहा कि पूरा परिवार मिल कर काम करता है तो भी महीने की कमाई पूरी नहीं पड़ती। इलाके में एक स्कूल था। अब जाकर बन रहा है। हम लोग अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं। क्या करें इस धंधे से पेट ही भरता है बस। बदलाव नहीं होता है। होज़ियरी पर दस फीसदी का कोई टैक्स लगा है,उसे लेकर घर-घर में बातें हो रही हैं। ममता कहती हैं कि प्रणब दा से बोल कर हटवा देंगी। सीपीएम कहती हैं कि जब बजट पास हो रहा था तब क्यों नहीं सवाल उठाया।
बाहर निकला तो मुस्लिम बच्चे क्रिकेट खेलने में व्यस्त थे। मैदान न होने का दोष सीपीएम पर मढ़ रहे थे। सलमान ने कहा कि मल्लिका विक्टोरिया ने तो कोलकाता को कितना बड़ा मैदान दिया। हम लोगों को कुछ नहीं दिया। हम दूसरे मोहल्लों में जाते हैं तो विकास देखेते हैं। वहां सब कुछ होता है। मुस्लिम मोहल्ले में क्यों नहीं होता है। हमारा एरिया बैकवर्ड क्यों लगता है। अगर किसी को यह आवाज़ नहीं सुनाई देती है तो इसका मतलब है कि उसकी हार तय है। राजनीति को ज़िंदा रहने के लिए विचारधारा ही नहीं चाहिए। उसे अब क्रिकेट का मैदान और स्कूल की परवाह करनी होगी।
बंगाल की ग़रीबी ने प्रवास की एक नई पीड़ा को जन्म दिया है। यहां की औरतें पलायन कर रही हैं। अकेले। बिहार यूपी से मर्दों का पलायन ज्यादा हुआ। मगर बंगाल से औरतें के पलायन पर किसी का ध्यान नहीं गया है। अपने छह से दो साल के बच्चों को छोड़ कर ये औरतें घरों में काम करने निकल रही हैं। गांव-गांव में बच्चे सास,नानी,ननद के भरोसे हैं। मेरे घर में अब तक दस बारह लड़कियां काम कर गईं। इसलिए ज्यादा समय तक टिक न सकीं क्योंकि बच्चों की याद सताती थी। मैं खुद सोचता रहता था कि ये दिन भर अपने बच्चे को याद करती होगी, मेरी बेटी को कैसे प्यार से खिलाती होगी। जाने वाली हर बाई से पूछता था कि ज्यादा पैसे जमा हो जाए तब जाया करो। जवाब मिलता था कि हमारा पांच छह हज़ार में ही कई महीने तक काम चल जाता है। अब यह बंगाल के जीवन का सस्ता होने का प्रमाण तो है मगर यह भी सोचिये कि यही पांच हज़ार कमाने का साधन नहीं। यह संकट सिर्फ बंगाल का नहीं है। बिहार का भी है। पलायन पीड़ा दे रहा है। बागी बना रहा है। बंगाल की औरतों ने बंगाल के बाहर की हकीकत को देखा है। एक दूसरे किस्म का नरक भोगा है। शायद उनकी यही तकलीफ ममता से जुड़ जाती है। यही कारण है कि दिल्ली से बड़ी संख्या में कामवालियां अपने घरों को लौटी हैं, ममता को वोट देने।
बंगाल में ममता को संजीवनी इन्हीं नाराज़ आवाज़ों से मिल रही है जिसे सीपीएम के काडर सुन नहीं पा रहे। वो इसी धुन में हैं कि पिछले छह महीने में काफी सुधार कर लिया है। अब हालत उतनी बुरी नहीं है। ममता सरकार नहीं बना सकेगी। सवाल सरकार बनाने का ही नहीं उन सवालों का भी है जो बंगाल में उठ रहे हैं। देखतें हैं कि क्या होता है। सीपीएम सत्ता में आती है या जनता की ममता। लेकिन जब लेफ्ट के नेता पूछने लगे कि आपको क्या लग रहा है और जब आप यही सवाल उनसे कर दें और वे कहने लगे कि नहीं हमने काफी सुधार कर लिया है, तो यह समझ लेना चाहिए कि हवा खामोश है। कई आम लोगों से राय जानना चाहा। एक भी बाइट लेफ्ट के समर्थन में नहीं मिला। अब मैंने दस हज़ार से तो नहीं पूछा लेकिन जिन दस बीस लोगों से पूछा सब वाम सरकार के कामकाज पर खामोश हो गए। मगर तृणमूल और ममता को लेकर खूब बोलते दिखे। वो वाम दल का समर्थन करने का साहस नहीं दिखा पा रहे थे। माइक नीचे करते ही एक ही बात कहते मिले। चेंज चाहिए।
आप जिन आवाज़ों को सुन रहे हैं वो उसी अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर सुनाई दे रही थीं जहां सीपीएम का मुख्यालय है। मुस्लिम बहुल इलाका लगता है। कोई हलचल नहीं है। चौरंगी विधानसभा इलाके में पड़ता है सीपीएम मुख्यालय। तृणमूल का गढ़ माना जाता है। इसलिए यहां से सीपीएम नहीं लड़ रही है। लालू का लालटेन छाप है। यहां रहने वाले मुसलमानों में वाम सरकार को लेकर जाश नहीं दिखा। ब्रेड बिस्कुट बेचने वाले एक मुस्लिम दुकानदार का कहना था कि यहां तो लोगों ने बारात घर तक नहीं बनवाया। नाली-पानी तक का इंतज़ाम नहीं किया। तृणमूल के इकबाल साहब(नाम ठीक से याद नहीं) ने कितना काम किया। सीपीएम का पार्टी आफिस ही देख लीजिए। सफेदी भी नहीं कराते। कम से कम रंगाई-पुताई में ही दस लोगों को काम मिल जाता। अच्छा कपड़ा पहनने से लगता है कि आदमी काम का है।
बंगाल के मुस्लिम इस बार अलग तरीके से सोच रहे हैं। वो अपने हालात पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बंगाल के घर-घर में चल रहे मुस्लिम कारीगरों की हालत रोटी-पानी के जुगाड़ तक ही सीमित है। काम तो मिल रहा है मगर यह काम उन्हें किसी काम का बनाने में मदद नहीं कर रहा। सेकुलर दलों को सोच लेना चाहिए कि इस देश का मुसलमान सिर्फ बीजेपी के भय से उसके साथ चिपका नहीं रहेगा। सांप्रदायिकता मुद्दा है मगर इसके अलावा भी कई ज़रूरी सवाल हैं। सीपीएम ने समझने में देर कर दी। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को खारिज कर देना और बताना कि हाल के दो साल में काफी सुधार हुआ है काफी नहीं है। दो साल के काम से किसी समुदाय की आर्थिक हैसियत में बहुत बदलाव नहीं किया जा सकता है। यही काम पांच साल पहले हुआ होता तो राजनीतिक वोट में भी बदल सकता था। मदरसा शिक्षकों को वेतन देने से मुस्लिम समाज का काम नहीं हो जाता है।
जहां भी गया आम मुसलमानों में ममता के प्रति खास लगाव देखा। ममता इसे समझ गईं हैं। इसलिए भाषण में ऊर्दू को दूसरी भाषा बनाने का लोकलुभावन नारा देती हैं। ममता ने बंगाल की राजनीति को ऊपर से हिन्दी,ऊर्दू और बांग्ला तीन खांचों में बांट दिया है। प्रवासी लोगों के लिए अलग से बातें करती हैं। सीपीएम बचाव की मुद्रा में अपनी बात रख रही है। ये और बात है कि ऊर्दू को सेकेंड लैंग्वेज बना देने से भी मुसलमानों को कोई भला नहीं होने वाला। मगर ममता के तालीबजावन नारों से ही एक नई उम्मीद पैदा हो रही है। तृणमूल के कार्यकर्ताओं के समूह को ठीक से देखिये। मुस्लिम कार्यकार्ताओं की सक्रियता खूब दिखेगी।
होज़ियरी के मामले में बंगाल ने पिछले पंद्रह सालों में काफी तरक्की की है। दिल्ली के गांधीनगर में ही व्यापारियों ने बताया था कि लड़कियों के फ्राक बनाने के मामले में कोलकाता का जवाब नहीं। कोलकाता गया तो शाहरूख, ह्रतिक,सनी,सैफ,अक्षय,नितिन मुकेश सब के सब गंजी अंडरवियर के प्रचार में होर्डिंग पर खड़े नज़र आ रहे थे। पता किया तो लोगों ने बताया कि पंद्रह हज़ार करोड़ रूपये का कारोबार है होज़ियरी का। मटियाबुर्ज़ का इलाका इसका गढ़ है। घर-घर में मशीनें चल रही थीं। सब मामूली कारीगर। किसी घर में दो सिलाई मशीन तो किसी में चार। कुछ की हैसियत बड़े व्यापारियों जैसी ज़रूर दिखी लेकिन हर दूसरी मशीन पर दस से बारह साल के बच्चों को कपड़े सिलते देखा तो लगा कि वाम राजनीति विचारधारा के ईंधन से ज्यादा समय तक नहीं चल सकती। पंद्रह घंटे काम करते हैं ये बच्चे। बच्चों के कपड़े बच्चे ही सिलते मिले। लोगों ने बताया कि क्या करें इन्हें पढ़ाई के लिए भेजें या काम करायें। ये बच्चे बटम टांकने का काम नहीं कर रहे थे बल्कि पूरी तरह के कुशल दर्जी की तरह कपड़ों को सिल रहे थे।
एक व्यक्ति ने कहा कि पूरा परिवार मिल कर काम करता है तो भी महीने की कमाई पूरी नहीं पड़ती। इलाके में एक स्कूल था। अब जाकर बन रहा है। हम लोग अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं। क्या करें इस धंधे से पेट ही भरता है बस। बदलाव नहीं होता है। होज़ियरी पर दस फीसदी का कोई टैक्स लगा है,उसे लेकर घर-घर में बातें हो रही हैं। ममता कहती हैं कि प्रणब दा से बोल कर हटवा देंगी। सीपीएम कहती हैं कि जब बजट पास हो रहा था तब क्यों नहीं सवाल उठाया।
बाहर निकला तो मुस्लिम बच्चे क्रिकेट खेलने में व्यस्त थे। मैदान न होने का दोष सीपीएम पर मढ़ रहे थे। सलमान ने कहा कि मल्लिका विक्टोरिया ने तो कोलकाता को कितना बड़ा मैदान दिया। हम लोगों को कुछ नहीं दिया। हम दूसरे मोहल्लों में जाते हैं तो विकास देखेते हैं। वहां सब कुछ होता है। मुस्लिम मोहल्ले में क्यों नहीं होता है। हमारा एरिया बैकवर्ड क्यों लगता है। अगर किसी को यह आवाज़ नहीं सुनाई देती है तो इसका मतलब है कि उसकी हार तय है। राजनीति को ज़िंदा रहने के लिए विचारधारा ही नहीं चाहिए। उसे अब क्रिकेट का मैदान और स्कूल की परवाह करनी होगी।
बंगाल की ग़रीबी ने प्रवास की एक नई पीड़ा को जन्म दिया है। यहां की औरतें पलायन कर रही हैं। अकेले। बिहार यूपी से मर्दों का पलायन ज्यादा हुआ। मगर बंगाल से औरतें के पलायन पर किसी का ध्यान नहीं गया है। अपने छह से दो साल के बच्चों को छोड़ कर ये औरतें घरों में काम करने निकल रही हैं। गांव-गांव में बच्चे सास,नानी,ननद के भरोसे हैं। मेरे घर में अब तक दस बारह लड़कियां काम कर गईं। इसलिए ज्यादा समय तक टिक न सकीं क्योंकि बच्चों की याद सताती थी। मैं खुद सोचता रहता था कि ये दिन भर अपने बच्चे को याद करती होगी, मेरी बेटी को कैसे प्यार से खिलाती होगी। जाने वाली हर बाई से पूछता था कि ज्यादा पैसे जमा हो जाए तब जाया करो। जवाब मिलता था कि हमारा पांच छह हज़ार में ही कई महीने तक काम चल जाता है। अब यह बंगाल के जीवन का सस्ता होने का प्रमाण तो है मगर यह भी सोचिये कि यही पांच हज़ार कमाने का साधन नहीं। यह संकट सिर्फ बंगाल का नहीं है। बिहार का भी है। पलायन पीड़ा दे रहा है। बागी बना रहा है। बंगाल की औरतों ने बंगाल के बाहर की हकीकत को देखा है। एक दूसरे किस्म का नरक भोगा है। शायद उनकी यही तकलीफ ममता से जुड़ जाती है। यही कारण है कि दिल्ली से बड़ी संख्या में कामवालियां अपने घरों को लौटी हैं, ममता को वोट देने।
बंगाल में ममता को संजीवनी इन्हीं नाराज़ आवाज़ों से मिल रही है जिसे सीपीएम के काडर सुन नहीं पा रहे। वो इसी धुन में हैं कि पिछले छह महीने में काफी सुधार कर लिया है। अब हालत उतनी बुरी नहीं है। ममता सरकार नहीं बना सकेगी। सवाल सरकार बनाने का ही नहीं उन सवालों का भी है जो बंगाल में उठ रहे हैं। देखतें हैं कि क्या होता है। सीपीएम सत्ता में आती है या जनता की ममता। लेकिन जब लेफ्ट के नेता पूछने लगे कि आपको क्या लग रहा है और जब आप यही सवाल उनसे कर दें और वे कहने लगे कि नहीं हमने काफी सुधार कर लिया है, तो यह समझ लेना चाहिए कि हवा खामोश है। कई आम लोगों से राय जानना चाहा। एक भी बाइट लेफ्ट के समर्थन में नहीं मिला। अब मैंने दस हज़ार से तो नहीं पूछा लेकिन जिन दस बीस लोगों से पूछा सब वाम सरकार के कामकाज पर खामोश हो गए। मगर तृणमूल और ममता को लेकर खूब बोलते दिखे। वो वाम दल का समर्थन करने का साहस नहीं दिखा पा रहे थे। माइक नीचे करते ही एक ही बात कहते मिले। चेंज चाहिए।
अनशन पर अंटशंट
क्या किसी को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अब कांग्रेस,बीजेपी या समाजवादी पार्टी में शामिल होना होगा? क्या संविधान से अपने लिए जीने का हक मांगने के लिए चुन कर आना अनिवार्य होगा? क्या सभी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं चुने हुए लोगों के बीच ही पूरी होती हैं? क्या चुनाव के बाद मतदाता-जनता का वजूद ख़त्म हो जाता है? तब क्या चुनाव जीतने के बाद कोई राजनीतिक दल सिर्फ मेनिफेस्टो में दर्ज वादों पर ही काम करता है? क्योंकि जनता ने तो उसे मेनिफेस्टो के हिसाब से वोट दिया है तो सरकार इतर कार्य कैसे कर सकती है? क्या अब किसी लड़ाई में होने के लिए मध्यमवर्ग से नहीं होना पहली शर्त होगी? क्या धरना-प्रदर्शन करना अब से ब्लैक मेलिंग हो जाएगा? क्या अब लोगों को अपनी मांगों की अर्ज़ी राजनीतिक दलों के दफ्तर में देनी होगी?क्या लाखों लोगों का अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना हिस्टीरिया है? क्या अब हर आंदोलन अराजक और दक्षिणपंथी ही कहा जाएगा? जंतर-मंतर पर चार दिन बिताने के बाद आंदोलन के विरोध में उठने वाले सवालों से कई सवाल मेरे मन में बन रहे थे। कुछ लोग आंदोलन को शक की नज़र से देख रहे थे तो कुछ असहमति की नज़र से। रविवार के अंग्रेजी के अखबारों में आंदोलन के विश्लेषण को पढ़ कर लगा कि जंतर मंतर के ज़रिये कुछ खाए-पीए मवाली लोगों का मजमा सरकार को हुले लेले कर रहा था। उनके उपहास के केंद्र में चंद बातें थीं। जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ वह भ्रष्टाचार का सरलीकरण था। गांधी के आदर्शों का सरलीकरण किया गया और फिर उसका नकलीकरण। इस तरह से अनशन पर अंटशंट कहा जा रहा है।
चालीस साल से कई दलों की सरकारें लोकपाल बिल को लेकर जनता को ब्लैक मेल कर रही थीं,ठीक वैसे जैसे महिला आरक्षण विधेयक को लेकर करती रही हैं। कोई यह बताएगा कि महिला आरक्षण बिल राजनीतिक संवैधानिक प्रक्रिया के चलते दबा हुआ है या पास न करने की मंशा के चलते। लोकतंत्र में संविधान के तहत सरकार द्वारा बनाई गईं संस्थाएं क्या अमर हैं? क्या हम कभी सीबीआई का विकल्प नहीं सोच सकते हैं? मुंबई हमले के बाद एनआईए क्या है? सीबीआई के रहते सीवीसी का गठन क्यों किया गया?क्या सीवीसी के रहते भ्रष्टाचार हमेशा के लिए ख़त्म हो गया? अगर नहीं हुआ है तो सीवीसी क्यों हैं? भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ तो क्या अब इसके खिलाफ होने वाली हर लड़ाई को मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा? तो क्या अब से भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा जाएगा? क्या भ्रष्टाचार के नहीं खत्म होने से उसे एक संस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है? ख़त्म नहीं हो सकता तो लड़ना क्यों हैं। भ्रष्टाचार का सरलीकरण क्या है? भ्रष्टाचार को जटिल बताने का मकसद क्या है? जटिल है तभी तो एक जटिल संस्था की मांग हो रही है जिसके पास अधिकार हो। जिन्होंने अण्णा के अनशन को भ्रष्टाचार का सरलीकरण कहा है,वो कहना क्या चाहते हैं? जंतर-मंतर में आई जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त रही है। उसे नाच गाने,बैनर-पोस्टर के बहाने भ्रष्ट तंत्र को मुंह चिढ़ाने का भी मौका मिला जिसे देखकर कई लोग सरलीकरण बता रहे हैं। काश आम लोगों की परेशानी को कोई समझ पाता।
अण्णा हज़ारे के अनशन पर राजनीतिक दल खुद को संविधान से ऊपर समझ कर प्रतिक्रिया दे रहे थे। हर आंदोलन में अतिरेक के कुछ नारे लग जाते हैं। जंतर-मंतर पर भी लग गए। मगर नेता लोग इतने डर गए जैसे सभी उन्हें खत्म करने ही आ रहे हैं। सब नेता चोर हैं। यह जुमला पहली बार जंतर-मंतर पर तो नहीं कहा गया। पहले भी कई बार कहा जा चुका है। क्या रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे ज्ञानी नेता जब किसी राजनीतिक दल पर आरोप लगाते हैं तो यह कहते हैं कि पूरी बीजेपी सांप्रदायिक नहीं है। सिर्फ नरेंद्र मोदी हैं। कांग्रेस में कई लोग ईमानदार हैं मगर हम सिर्फ टू जी को लेकर सुरेश कलमाडी का विरोध कर रहे हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह नहीं कहते हैं। वो भी सरलीकरण और सामान्यीकरण करते हैं। सिम्पलीफिकेशन और जनरलाइज़ेशन। सब नेता चोर नहीं हैं मगर नेता लोग चोर तो हो ही गए हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह ने कभी आरजेडी में रहते हुए लालू प्रसाद यादव पर लगे आरोपों की सार्वजनिक आलोचना नहीं की। क्या वो अब यह कह रहे हैं कि आरजेडी मे वही ईमानदार हैं लालू नहीं। अगर सब नेता चोर नहीं हैं तो कौन-कौन हैं,इतना ही बता दें। वे तो उसी आरजेडी का हिस्सा बने रहे जिसे जनता ने भ्रष्टाचार के चलते दो-दो बार रिजेक्ट किया। मेरे एक मित्र जब फोन पर यह बात कह रहे थे तो मैं सोच रहा था कि रघुवंश बाबू को किस बात का डर पैदा हो गया है। जब वो ईमानदार हैं तो जंतर-मंतर पर क्यों नहीं आए। यह क्यो नहीं कहा कि ऐसे प्रयासों का समर्थन करता हूं। मैं जंतर-मंतर नहीं जाऊंगा पर भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी तरह का स्थायी-अस्थायी मानस बने उसे सराहता हूं। इतना कहने से रघुवंश बाबू को किसने रोका था। मुझे हैरानी हुई कि इस जन सैलाब से वही नेता क्यों डर गया जो खुद को ईमानदार समझता है। वो जिन ईमानदार अफसरों और नेताओं की वकालत कर रहे थे उनको किसने रोका था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने से या फिर उनको किसने कहा कि जंतर-मंतर से भीड़ ईमानदार अफसरों और नेताओं को मारने आ रही है। दरअसल इस आंदोलन से सरकार से ज्यादा राजनीतिक दलों को डरा दिया है। कुछ दिनों बाद यही लोग कहेंगे कि प्रतिनिधि होने का मतलब सिर्फ कांग्रेस बीजेपी का सांसद होना है। निर्दलीय सांसदों को मान्यता हासिल है तो निर्दलीय जनता को मान्यता क्यों नहीं मिल सकती?
अंग्रेजी के अखबारों और कुछ तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों के लेख और बहसों से गुज़र कर यही लगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मानस भी नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी या उनकी पसंद की सरकार को असहजता होती है। लिखने वाले किस नज़रिये से जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ को एक ही तराजू में तौल रहे हैं कि वो मिडिल क्लास है। उसका नक्सल और किसान आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है। क्या कोई आंदोलन और उसमें शामिल लोग तभी सरोकार युक्त कहे जायेंगे जब वो सभी आंदोलनों और मुद्दों से जुड़े हों? क्या इसकी आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि अण्णा ने दिल्ली विश्वविद्यालय में ज़बरिया लागू हो रहे सेमेस्टर सिस्टम पर क्यों नहीं अनशन किया? क्या यह दलील फटीचर नहीं है कि आप तब कहां थे जब वो हो रहा था,ये हो रहा था,कहां था ये मिडिल क्लास? क्या लोगों के भीतर बन रही नागरिक सक्रियता से वाकई कुछ भी लाभ नहीं होने वाला था? तो फिर लिखने वाले तमाम मुद्दों पर क्यों लिखते हैं? उनके लिखने से समस्या समाप्त तो नहीं हो जाती। अगर मैं यह कह दूं कि भारत की हर समस्या आर्टिकल लिखने वालों को नगद भुगतान कराती है तो क्या यह सरलीकरण नहीं होगा। क्या वे फ्री में समाज सेवा के तहत अपनी राय बांटते हैं। वो कौन हैं जो अपनी राय देते हैं। क्या किसी विश्वविद्यालय ने उन्हें अखबारों में लिखने का सर्टिफिकेट दिया है? ऐसी बतकूचन से दलीलें पैदा करनी हैं तो करते रहिए।
जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ उसे एकतरफा नज़रिये से देखने की कोशिश हो रही है। कोई एकसूत्री फार्मूले के तहत खारिज या समर्थन करने की कोशिश की जा रही है। अण्णा के अनशन से पैदा हुई विविधताओं पर पर्दा डाला जा रहा है। कुछ तो था इस आंदोलन में कि सरकार की तरफ से मीडिया को बांधने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं। अगर यह लोगों का गुबार न होता तो मीडिया एक मिनट में इस मुद्दे को सनकी कह कर खारिज कर देता। रिपोर्टर दबाव मुक्त हो गए। स्वत स्फूर्त होकर जनवादी राष्ट्रवादी और ललित निबंधवादी जुमलों में घटना को बयान करने लगे। उनके विश्लेषणों में सिर्फ उन्माद नहीं था। उनकी लाइव रिपोर्टिंग को भी कई स्तरों पर देखने की ज़रूरत है। वो हिस्टीरिया पैदा नहीं कर रहे थे। बल्कि लोगों के उत्साह के साथ रिएक्ट कर रहे थे। अगर न्यूज़ चैनल उन्माद पैदा कर रहे थे तो अखबार क्यों बैनर छाप रहे थे? आंदोलन किसी संप्रदाय के खिलाफ नहीं था। आंदोलन किसी भाषा-लिंग के खिलाफ नहीं था। आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था जिसके निशाने पर प्रत्यक्ष रूप से सरकार और अप्रत्यक्ष रूप से बेईमान नेता थे। मीडिया भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है। जब लोग उठायेंगे तो वो कैसे किनारा कर लेता। उसके भी नैतिक सामाजिक अस्तित्व का सवाल था। इसलिए किसी चैनल या अखबार को हिम्मत नहीं हुई कि जंतर-मंतर के कवरेज को दूसरे तीसरे दिन ग्यारह नंबर के पेज पर गायब कर दे।
अतिरेक के एकाध-अपवादों को छोड़ दें तो जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ उन्मादी नहीं थी। वो आ रही थी कतारों में और घुल मिल रही थी नारों में। तमाम व्यवस्थाएं अपने आप बन गईं थीं। पुलिस ने नहीं बनाई थी। अनुशासन अपने आप बन गया। कोई एक दूसरे को हांक नहीं रहा था। लोगों ने अपने नारे खुद लिखे। फिर भी इस भीड़ को एकवर्गीय रूप दे दिया गया। मिडिल क्लास है ये तो। हद है। जब मिडिल क्लास जागता नहीं है तो आप गरियाते हैं। जब जाग जाता है तब लतियाते हैं। आंदोलन करने वाले अब यह तय कर लें कि उन्हें मिडिल क्लास का साथ नहीं चाहिए। वो इस क्लास को किसी भी जनआंदोलन में शामिल होने से रोक देंगे। जिन लोगों ने जंतर-मंतर पर आने वाली जनता को करीब से देखा है वो यह नहीं कह सकते कि इसमें एक क्लास के लोग थे।
इसमें न तो युवाओं की संख्या ज्यादा थी न बुज़ुर्गों की कम। सब थे। पुणे में पढ़ रही अपनी बेटी को एक पिता ने इसलिए
दिल्ली बुला लिया कि वो देखे और समझे कि देश के लिए क्या करना है। मालवीय नगर से एक महिला गोगल्स लगाए चली आईं। उनके हाथ में तख्ती थी। सरकारी विचारकों में भीड़ के कपड़े तक देखने शुरू कर दिये। जो उपभोक्ता है क्या वो नागरिक नहीं है? किशनगंज के नवोदय स्कूल का एक मास्टर आया जिसने नवोदय स्कूल के प्रिंसिपल के खिलाफ घोटाले उजागर किये मगर कुछ नहीं हुआ। संगम विहार के शिव विहार का एक व्यक्ति आया था। बताने लगा कि उसके यहां करप्शन बहुत है। सब लूट लिया जाता है। कोई सुविधा नहीं है। रैली में अस्थायी तीन हज़ार कंप्यूटर शिक्षकों का जत्था भी अपना बैनर लेकर आ गया। दिल्ली नगर निगर का कर्मचारी संघ भी आ गया। डिफेंस कालोनी रेजिडेंट वेलफेयर संघ भी अपना बैनर बनवा लाया था। कई लोग जो अपने-अपने शहर दफ्तर में भ्रष्टाचार को भुगत रहे थे वो भी आए थे। सब सिर्फ जनलोकपाल बिल के समर्थन में नहीं आए। सब इसलिए भी आए कि शायद उनकी अकेले की लड़ाई समूह में बदल कर ताकतवर हो जाए। कुछ असर कर जाए। एक व्यक्ति ने बताया कि उसकी कंपनी न्यूनतम वेतन नहीं दे रही थी। छह महीने से धरना कर रखा था। अनशन टूटने के एक रात पहले एलान कर दिया कि हम सब जंतर-मंतर जा रहे हैं, कंपनी ने सबकी सैलरी बढ़ा दी। ये लोग अस्थायी मज़दूर थे। अलग-अलग समस्याओं को लेकर महीनों से आंदोलन करने वाले लोग भी धरने में शामिल हो गए। इस वजह से भी अण्णा का अनशन बड़ा होता चला गया।
जिन लोगों जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ को सनकी और एकवर्गीय बताया है उन्हें वहां मौजूद लोगों से मिलना चाहिए था। कई आरटीआई कार्यकर्ता घोटालों की फाइलें लिये पत्रकारों को खोजने लगे। आप तो मिलते नहीं यह फाइल रख लीजिए। आपके दफ्तर चक्कर लगा आया हूं। कोई कवरेज नहीं है। देखिये तीस करोड़ का घोटाला है। एक ऑटो वाला भावुक हो गया। कहने लगा कि सरकार हमको मुर्दा समझती है। चोर बनाने के लिए मजबूर करती है। तंग आकर उसने आटो चलाना छोड़ दिया। गुड़गांव से सेना के ब्रिगेडियर स्तर के रिटायर अफसर चले आए। कहने लगे कि एक सिपाही के नाते आ गया हूं। रोक नहीं सका। भीड़ में मुझसे एक अफसर माइक छिनने लगे। पूछा कि आप कौन है। जवाब मिला कि मैं कस्टम विभाग में चीफ कमिश्नर रहा हूं। रिटायर हो गया हूं। मेरे ख्याल में करप्शन को लेकर इस तरह का पब्लिक ओपिनियन बहुत ज़रूरी है। जिन लोगों ने टीवी पर इसकी कवरेज देखकर लेख लिखकर खारिज किया है उनसे चूक हुई है। जंतर मंतर पर भोजन के स्टॉल वाले ने बताया कि पचीस साल में ऐसी भीड़ नहीं देखी। स्कूल के बच्चे आ रहे हैं। उनके टीचर आ रहे हैं। वो भी चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसे सरोकारों से जुड़ने का अभ्यास करें। एक तरह से यह प्रदर्शन कई लोगों के लिए अभ्यास मैच भी था। अहिंसक चरित्र होने के कारण बड़ी संख्या में गृहणियां आ गईं। कुछ महिलाओं ने आंचल से मुंह ढांक लिया। मेरे एक मित्र ने बताया कि वे अण्णा के पास गईं। समर्थन दे आईं। मीडिया जब फोटू खींचने लगी तो कहने लगी कि हम लोग मिनिस्ट्री में काम करते हैं। फोटू मत लीजिए। नौकरी चली जाएगी।
किस आधार पर इसे मिडिल क्लासवाली आंदोलन कहा जा रहा है। जंतर-मंतर को पेज थ्री कहने वाले लोग इस बात से हिल गए हैं कि उनके मुद्दे पर हर कोई बोलने लिखने लगेगा तो उनकी दुकान न बंद हो जाए। कचरा बिनने वालों का संगठन भी समर्थन करने आ गया। आने वालों की प्रोफाइल का कोई एक रंग तो था नहीं। मगर देखने वालों को सब एक ही रंग में दिख रहे हैं क्योंकि यह दलील सरकार के मैनजरों को सही लगती हैं। वे खुश होते हैं। क्योंकि अण्णा के अनशन ने जंतर-मंतर पर होने वाले धरनों में जान डाल दी है। अब उन्हें डर सता रहा होगा कि सब इस तरह से अनशन करने लगे तो क्या होगा? सब क्यों न करें। अगर सिस्टम सालों तक आदमी और संगठन को टहलाता रहे। क्या सिस्टम का कोई आदमी जंतर-मंतर पर महीनों से धरने पर बैठे लोगों से बात करने भी जाता है? उनके साथ न्याय न हो रहा हो तो क्या करें। जो लोग यह सवाल पूछ रहे कि क्या लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा दरअसल ये वो लोग हैं जो किसी भी रैली या दलीलों में शामिल एलिमेंट की तरह यह पूछने लगता कि इससे क्या होगा? दुनिया में अन्याय खत्म हो जाएगा। चले हैं दुनिया को बदलने। हें..हूं थू। बोलेगा रे। बस हो गई मारपीट।
अण्णा का अनशन एक उत्सव में भी बदल गया। कई लोग एक दूसरे का फोटू खींचने लगे। टीवी पत्रकारों के आटोग्राफ लेने लगे। उनके साथ फोटो खिंचाने लगे। पानी की कुछ कंपनियों ने हजार-हज़ार बोतल फ्री में बांटनी शुरू कर दी। हवन होने लगे। एक एनजीओ आदिवासियों को ले आया उनका नृत्य होने लगा। प्रभात फेरी निकलने लगी। कई लोग तुरंत कविता और शेर लिखकर रिपोर्टर को देने लगे कि मेरा वाला पढ़ दीजिए। बहुत सारे गुमनाम अखबार अपना एडिशन बांटने लगे। कई संगठन अपना पैम्फलेट बांटने लगे। आरएसएस वाले भी बांट रहे थे। यह सब भी हो रहा था मगर यह सब आंदोलन के मूल चरित्र के केंद्र में नहीं हो रहा था। हाशिये पर ऐसी बहुत सी हास्यास्पद और नाटकीय चीज़े हो रही थीं। इंडिया गेट के आइसक्रीम वाले जंतर-मंतर आ गए। यह तो होता ही है। राजनीतिक दलों की रैलियों में भी इस तरह की दुकानें सज जाती हैं। तो इसके आधार पर अण्णा के अनशन को खारिज कर देंगे।
ऐसी बात नहीं है कि जंतर-मंतर के धरने को लेकर अहसमतियों की गुज़ाइश नहीं है। इसमें शामिल कई लोगों पर विचारधारा के स्तर से सवाल उठाये जा सकते हैं। अण्णा हज़ारे ने भी कहा कि मंच से वहीं बोले जिनका चरित्र अच्छा हो। इस आंदोलन में वही आएं जिनका कैरेक्टर हो। उन्होंने कहा कि आरएसएस और बीजेपी से संबंध नहीं है फिर भी उमा भारती को फोन कर बुला लिया। राम माधव आ गए। मेरी राय में वैचारिक आधार नहीं तो स्पष्टता होनी चाहिए। तब यह सवाल उठ सकता है कि क्या हर आंदोलन का वैचारिक आधार होना ज़रूरी है। क्या हर लड़ाई इस खेमे और उस खेमे में ही बंट कर होगी। मंच पर मौजूद संघ और कुछ संत समुदाय से जुड़े लोगों को लेकर मेरी असहमति रही है। लेकिन यह आंदोलन भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक कानूनी हथियार हासिल करने के लिए था। अच्छा हुआ अनुपम खेर और बाबा रामदेव आंदोलन को हाईजैक नहीं कर सके। हमारा देश समाज और सिस्टम दोनों स्तर पर व्यापक रूप से भ्रष्ट है। उन घरों में लोग टीवी से ज़रूर उकता गए होंगे जहां रिश्वत का पैसा आता होगा। दलाली करने वाले पत्रकारों को भी कष्ट हो रहा होगा। हालांकि इस आंदोलन से अहसमति रखने वाले सभी दलाल नहीं कहे जा सकते लेकिन यह बात मेरे मन में उठ रही थी कि घूसखोर कैसे अपने परिवार के साथ जंतर-मंतर से सीधा प्रसारण देख रहा होगा।
राजनीतिक दलों के विरोध पर सवाल करने का मन करता है कि आज आप बड़े हो गए हैं। कई सांसद और विधायक हैं। आपने अलग ही दल क्यों बनाया? कांग्रेस में ही शामिल हो जाते। जिस सिविल सोसायटी को आप खारिज कर रहे हैं, चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं क्या आपकी हालत वैसी नहीं थी जब आपने राजनीतिक दल की स्थापनी की थी। क्या लोकतंत्र में सिर्फ राजनीतिक दलों को ही मान्यता हासिल है? किस आधार पर यह कह रहे हैं कि अण्णा की लड़ाई राजनीतिक नहीं है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई राजनीतिक ही होगी। आगे जा कर यह लड़ाई कहां जाएगी कौन जानता है। किस नतीजे पर पहुंचेगी किसने देखा है। नतीजा तय कर लड़ाई की शुरूआत नहीं होती। वैसे सरकार के मान लेने के बाद जीत तो हो ही गई। सरकार में हिम्मत होती तो कह देती कि हम अण्णा के ब्लैकमेल से मजबूर होकर उनका प्रस्ताव मान रहे हैं। उसने क्यों कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है। सरकार और सिविल सोसायटी को मिलकर काम करना होगा। क्या सरकार ने सिविल सोसायटी को मान्यता नहीं दे दी। बल्कि देनी पड़ी है। अनशन को ब्लैकमेल लिखकर अंग्रेजी के लेखक भाग लिये। वो अब इतिहास भी बदल दें और गांधी को ब्लैकमेलर कह दें। किसी आंदोलन में कमियां नहीं होतीं मगर क्या अण्णा के आंदोलन के मूल उद्देश्य में भी कमी है? क्या हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ना चाहिए? बस इतना ही कह सकता हूं। दो लोग हैं इस वक्त। एक जिसने जंतर-मंतर देखा है और दूसरा जिसने नहीं देखा है। जंतर-मंतर अब अण्णा के अनशन का पर्याय बन चुका है। जिनको अंट-शंट बकना है बकें। मगर असहमतियों को ध्यान से सुना जाना चाहिए। ताकि आगे से ऐसे नागरिक आंदोलनों को चलाने से पहले कुछ सावधानियां बरत ली जाएं।
चालीस साल से कई दलों की सरकारें लोकपाल बिल को लेकर जनता को ब्लैक मेल कर रही थीं,ठीक वैसे जैसे महिला आरक्षण विधेयक को लेकर करती रही हैं। कोई यह बताएगा कि महिला आरक्षण बिल राजनीतिक संवैधानिक प्रक्रिया के चलते दबा हुआ है या पास न करने की मंशा के चलते। लोकतंत्र में संविधान के तहत सरकार द्वारा बनाई गईं संस्थाएं क्या अमर हैं? क्या हम कभी सीबीआई का विकल्प नहीं सोच सकते हैं? मुंबई हमले के बाद एनआईए क्या है? सीबीआई के रहते सीवीसी का गठन क्यों किया गया?क्या सीवीसी के रहते भ्रष्टाचार हमेशा के लिए ख़त्म हो गया? अगर नहीं हुआ है तो सीवीसी क्यों हैं? भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ तो क्या अब इसके खिलाफ होने वाली हर लड़ाई को मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा? तो क्या अब से भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा जाएगा? क्या भ्रष्टाचार के नहीं खत्म होने से उसे एक संस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है? ख़त्म नहीं हो सकता तो लड़ना क्यों हैं। भ्रष्टाचार का सरलीकरण क्या है? भ्रष्टाचार को जटिल बताने का मकसद क्या है? जटिल है तभी तो एक जटिल संस्था की मांग हो रही है जिसके पास अधिकार हो। जिन्होंने अण्णा के अनशन को भ्रष्टाचार का सरलीकरण कहा है,वो कहना क्या चाहते हैं? जंतर-मंतर में आई जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त रही है। उसे नाच गाने,बैनर-पोस्टर के बहाने भ्रष्ट तंत्र को मुंह चिढ़ाने का भी मौका मिला जिसे देखकर कई लोग सरलीकरण बता रहे हैं। काश आम लोगों की परेशानी को कोई समझ पाता।
अण्णा हज़ारे के अनशन पर राजनीतिक दल खुद को संविधान से ऊपर समझ कर प्रतिक्रिया दे रहे थे। हर आंदोलन में अतिरेक के कुछ नारे लग जाते हैं। जंतर-मंतर पर भी लग गए। मगर नेता लोग इतने डर गए जैसे सभी उन्हें खत्म करने ही आ रहे हैं। सब नेता चोर हैं। यह जुमला पहली बार जंतर-मंतर पर तो नहीं कहा गया। पहले भी कई बार कहा जा चुका है। क्या रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे ज्ञानी नेता जब किसी राजनीतिक दल पर आरोप लगाते हैं तो यह कहते हैं कि पूरी बीजेपी सांप्रदायिक नहीं है। सिर्फ नरेंद्र मोदी हैं। कांग्रेस में कई लोग ईमानदार हैं मगर हम सिर्फ टू जी को लेकर सुरेश कलमाडी का विरोध कर रहे हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह नहीं कहते हैं। वो भी सरलीकरण और सामान्यीकरण करते हैं। सिम्पलीफिकेशन और जनरलाइज़ेशन। सब नेता चोर नहीं हैं मगर नेता लोग चोर तो हो ही गए हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह ने कभी आरजेडी में रहते हुए लालू प्रसाद यादव पर लगे आरोपों की सार्वजनिक आलोचना नहीं की। क्या वो अब यह कह रहे हैं कि आरजेडी मे वही ईमानदार हैं लालू नहीं। अगर सब नेता चोर नहीं हैं तो कौन-कौन हैं,इतना ही बता दें। वे तो उसी आरजेडी का हिस्सा बने रहे जिसे जनता ने भ्रष्टाचार के चलते दो-दो बार रिजेक्ट किया। मेरे एक मित्र जब फोन पर यह बात कह रहे थे तो मैं सोच रहा था कि रघुवंश बाबू को किस बात का डर पैदा हो गया है। जब वो ईमानदार हैं तो जंतर-मंतर पर क्यों नहीं आए। यह क्यो नहीं कहा कि ऐसे प्रयासों का समर्थन करता हूं। मैं जंतर-मंतर नहीं जाऊंगा पर भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी तरह का स्थायी-अस्थायी मानस बने उसे सराहता हूं। इतना कहने से रघुवंश बाबू को किसने रोका था। मुझे हैरानी हुई कि इस जन सैलाब से वही नेता क्यों डर गया जो खुद को ईमानदार समझता है। वो जिन ईमानदार अफसरों और नेताओं की वकालत कर रहे थे उनको किसने रोका था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने से या फिर उनको किसने कहा कि जंतर-मंतर से भीड़ ईमानदार अफसरों और नेताओं को मारने आ रही है। दरअसल इस आंदोलन से सरकार से ज्यादा राजनीतिक दलों को डरा दिया है। कुछ दिनों बाद यही लोग कहेंगे कि प्रतिनिधि होने का मतलब सिर्फ कांग्रेस बीजेपी का सांसद होना है। निर्दलीय सांसदों को मान्यता हासिल है तो निर्दलीय जनता को मान्यता क्यों नहीं मिल सकती?
अंग्रेजी के अखबारों और कुछ तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों के लेख और बहसों से गुज़र कर यही लगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मानस भी नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी या उनकी पसंद की सरकार को असहजता होती है। लिखने वाले किस नज़रिये से जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ को एक ही तराजू में तौल रहे हैं कि वो मिडिल क्लास है। उसका नक्सल और किसान आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है। क्या कोई आंदोलन और उसमें शामिल लोग तभी सरोकार युक्त कहे जायेंगे जब वो सभी आंदोलनों और मुद्दों से जुड़े हों? क्या इसकी आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि अण्णा ने दिल्ली विश्वविद्यालय में ज़बरिया लागू हो रहे सेमेस्टर सिस्टम पर क्यों नहीं अनशन किया? क्या यह दलील फटीचर नहीं है कि आप तब कहां थे जब वो हो रहा था,ये हो रहा था,कहां था ये मिडिल क्लास? क्या लोगों के भीतर बन रही नागरिक सक्रियता से वाकई कुछ भी लाभ नहीं होने वाला था? तो फिर लिखने वाले तमाम मुद्दों पर क्यों लिखते हैं? उनके लिखने से समस्या समाप्त तो नहीं हो जाती। अगर मैं यह कह दूं कि भारत की हर समस्या आर्टिकल लिखने वालों को नगद भुगतान कराती है तो क्या यह सरलीकरण नहीं होगा। क्या वे फ्री में समाज सेवा के तहत अपनी राय बांटते हैं। वो कौन हैं जो अपनी राय देते हैं। क्या किसी विश्वविद्यालय ने उन्हें अखबारों में लिखने का सर्टिफिकेट दिया है? ऐसी बतकूचन से दलीलें पैदा करनी हैं तो करते रहिए।
जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ उसे एकतरफा नज़रिये से देखने की कोशिश हो रही है। कोई एकसूत्री फार्मूले के तहत खारिज या समर्थन करने की कोशिश की जा रही है। अण्णा के अनशन से पैदा हुई विविधताओं पर पर्दा डाला जा रहा है। कुछ तो था इस आंदोलन में कि सरकार की तरफ से मीडिया को बांधने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं। अगर यह लोगों का गुबार न होता तो मीडिया एक मिनट में इस मुद्दे को सनकी कह कर खारिज कर देता। रिपोर्टर दबाव मुक्त हो गए। स्वत स्फूर्त होकर जनवादी राष्ट्रवादी और ललित निबंधवादी जुमलों में घटना को बयान करने लगे। उनके विश्लेषणों में सिर्फ उन्माद नहीं था। उनकी लाइव रिपोर्टिंग को भी कई स्तरों पर देखने की ज़रूरत है। वो हिस्टीरिया पैदा नहीं कर रहे थे। बल्कि लोगों के उत्साह के साथ रिएक्ट कर रहे थे। अगर न्यूज़ चैनल उन्माद पैदा कर रहे थे तो अखबार क्यों बैनर छाप रहे थे? आंदोलन किसी संप्रदाय के खिलाफ नहीं था। आंदोलन किसी भाषा-लिंग के खिलाफ नहीं था। आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था जिसके निशाने पर प्रत्यक्ष रूप से सरकार और अप्रत्यक्ष रूप से बेईमान नेता थे। मीडिया भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है। जब लोग उठायेंगे तो वो कैसे किनारा कर लेता। उसके भी नैतिक सामाजिक अस्तित्व का सवाल था। इसलिए किसी चैनल या अखबार को हिम्मत नहीं हुई कि जंतर-मंतर के कवरेज को दूसरे तीसरे दिन ग्यारह नंबर के पेज पर गायब कर दे।
अतिरेक के एकाध-अपवादों को छोड़ दें तो जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ उन्मादी नहीं थी। वो आ रही थी कतारों में और घुल मिल रही थी नारों में। तमाम व्यवस्थाएं अपने आप बन गईं थीं। पुलिस ने नहीं बनाई थी। अनुशासन अपने आप बन गया। कोई एक दूसरे को हांक नहीं रहा था। लोगों ने अपने नारे खुद लिखे। फिर भी इस भीड़ को एकवर्गीय रूप दे दिया गया। मिडिल क्लास है ये तो। हद है। जब मिडिल क्लास जागता नहीं है तो आप गरियाते हैं। जब जाग जाता है तब लतियाते हैं। आंदोलन करने वाले अब यह तय कर लें कि उन्हें मिडिल क्लास का साथ नहीं चाहिए। वो इस क्लास को किसी भी जनआंदोलन में शामिल होने से रोक देंगे। जिन लोगों ने जंतर-मंतर पर आने वाली जनता को करीब से देखा है वो यह नहीं कह सकते कि इसमें एक क्लास के लोग थे।
इसमें न तो युवाओं की संख्या ज्यादा थी न बुज़ुर्गों की कम। सब थे। पुणे में पढ़ रही अपनी बेटी को एक पिता ने इसलिए
दिल्ली बुला लिया कि वो देखे और समझे कि देश के लिए क्या करना है। मालवीय नगर से एक महिला गोगल्स लगाए चली आईं। उनके हाथ में तख्ती थी। सरकारी विचारकों में भीड़ के कपड़े तक देखने शुरू कर दिये। जो उपभोक्ता है क्या वो नागरिक नहीं है? किशनगंज के नवोदय स्कूल का एक मास्टर आया जिसने नवोदय स्कूल के प्रिंसिपल के खिलाफ घोटाले उजागर किये मगर कुछ नहीं हुआ। संगम विहार के शिव विहार का एक व्यक्ति आया था। बताने लगा कि उसके यहां करप्शन बहुत है। सब लूट लिया जाता है। कोई सुविधा नहीं है। रैली में अस्थायी तीन हज़ार कंप्यूटर शिक्षकों का जत्था भी अपना बैनर लेकर आ गया। दिल्ली नगर निगर का कर्मचारी संघ भी आ गया। डिफेंस कालोनी रेजिडेंट वेलफेयर संघ भी अपना बैनर बनवा लाया था। कई लोग जो अपने-अपने शहर दफ्तर में भ्रष्टाचार को भुगत रहे थे वो भी आए थे। सब सिर्फ जनलोकपाल बिल के समर्थन में नहीं आए। सब इसलिए भी आए कि शायद उनकी अकेले की लड़ाई समूह में बदल कर ताकतवर हो जाए। कुछ असर कर जाए। एक व्यक्ति ने बताया कि उसकी कंपनी न्यूनतम वेतन नहीं दे रही थी। छह महीने से धरना कर रखा था। अनशन टूटने के एक रात पहले एलान कर दिया कि हम सब जंतर-मंतर जा रहे हैं, कंपनी ने सबकी सैलरी बढ़ा दी। ये लोग अस्थायी मज़दूर थे। अलग-अलग समस्याओं को लेकर महीनों से आंदोलन करने वाले लोग भी धरने में शामिल हो गए। इस वजह से भी अण्णा का अनशन बड़ा होता चला गया।
जिन लोगों जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ को सनकी और एकवर्गीय बताया है उन्हें वहां मौजूद लोगों से मिलना चाहिए था। कई आरटीआई कार्यकर्ता घोटालों की फाइलें लिये पत्रकारों को खोजने लगे। आप तो मिलते नहीं यह फाइल रख लीजिए। आपके दफ्तर चक्कर लगा आया हूं। कोई कवरेज नहीं है। देखिये तीस करोड़ का घोटाला है। एक ऑटो वाला भावुक हो गया। कहने लगा कि सरकार हमको मुर्दा समझती है। चोर बनाने के लिए मजबूर करती है। तंग आकर उसने आटो चलाना छोड़ दिया। गुड़गांव से सेना के ब्रिगेडियर स्तर के रिटायर अफसर चले आए। कहने लगे कि एक सिपाही के नाते आ गया हूं। रोक नहीं सका। भीड़ में मुझसे एक अफसर माइक छिनने लगे। पूछा कि आप कौन है। जवाब मिला कि मैं कस्टम विभाग में चीफ कमिश्नर रहा हूं। रिटायर हो गया हूं। मेरे ख्याल में करप्शन को लेकर इस तरह का पब्लिक ओपिनियन बहुत ज़रूरी है। जिन लोगों ने टीवी पर इसकी कवरेज देखकर लेख लिखकर खारिज किया है उनसे चूक हुई है। जंतर मंतर पर भोजन के स्टॉल वाले ने बताया कि पचीस साल में ऐसी भीड़ नहीं देखी। स्कूल के बच्चे आ रहे हैं। उनके टीचर आ रहे हैं। वो भी चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसे सरोकारों से जुड़ने का अभ्यास करें। एक तरह से यह प्रदर्शन कई लोगों के लिए अभ्यास मैच भी था। अहिंसक चरित्र होने के कारण बड़ी संख्या में गृहणियां आ गईं। कुछ महिलाओं ने आंचल से मुंह ढांक लिया। मेरे एक मित्र ने बताया कि वे अण्णा के पास गईं। समर्थन दे आईं। मीडिया जब फोटू खींचने लगी तो कहने लगी कि हम लोग मिनिस्ट्री में काम करते हैं। फोटू मत लीजिए। नौकरी चली जाएगी।
किस आधार पर इसे मिडिल क्लासवाली आंदोलन कहा जा रहा है। जंतर-मंतर को पेज थ्री कहने वाले लोग इस बात से हिल गए हैं कि उनके मुद्दे पर हर कोई बोलने लिखने लगेगा तो उनकी दुकान न बंद हो जाए। कचरा बिनने वालों का संगठन भी समर्थन करने आ गया। आने वालों की प्रोफाइल का कोई एक रंग तो था नहीं। मगर देखने वालों को सब एक ही रंग में दिख रहे हैं क्योंकि यह दलील सरकार के मैनजरों को सही लगती हैं। वे खुश होते हैं। क्योंकि अण्णा के अनशन ने जंतर-मंतर पर होने वाले धरनों में जान डाल दी है। अब उन्हें डर सता रहा होगा कि सब इस तरह से अनशन करने लगे तो क्या होगा? सब क्यों न करें। अगर सिस्टम सालों तक आदमी और संगठन को टहलाता रहे। क्या सिस्टम का कोई आदमी जंतर-मंतर पर महीनों से धरने पर बैठे लोगों से बात करने भी जाता है? उनके साथ न्याय न हो रहा हो तो क्या करें। जो लोग यह सवाल पूछ रहे कि क्या लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा दरअसल ये वो लोग हैं जो किसी भी रैली या दलीलों में शामिल एलिमेंट की तरह यह पूछने लगता कि इससे क्या होगा? दुनिया में अन्याय खत्म हो जाएगा। चले हैं दुनिया को बदलने। हें..हूं थू। बोलेगा रे। बस हो गई मारपीट।
अण्णा का अनशन एक उत्सव में भी बदल गया। कई लोग एक दूसरे का फोटू खींचने लगे। टीवी पत्रकारों के आटोग्राफ लेने लगे। उनके साथ फोटो खिंचाने लगे। पानी की कुछ कंपनियों ने हजार-हज़ार बोतल फ्री में बांटनी शुरू कर दी। हवन होने लगे। एक एनजीओ आदिवासियों को ले आया उनका नृत्य होने लगा। प्रभात फेरी निकलने लगी। कई लोग तुरंत कविता और शेर लिखकर रिपोर्टर को देने लगे कि मेरा वाला पढ़ दीजिए। बहुत सारे गुमनाम अखबार अपना एडिशन बांटने लगे। कई संगठन अपना पैम्फलेट बांटने लगे। आरएसएस वाले भी बांट रहे थे। यह सब भी हो रहा था मगर यह सब आंदोलन के मूल चरित्र के केंद्र में नहीं हो रहा था। हाशिये पर ऐसी बहुत सी हास्यास्पद और नाटकीय चीज़े हो रही थीं। इंडिया गेट के आइसक्रीम वाले जंतर-मंतर आ गए। यह तो होता ही है। राजनीतिक दलों की रैलियों में भी इस तरह की दुकानें सज जाती हैं। तो इसके आधार पर अण्णा के अनशन को खारिज कर देंगे।
ऐसी बात नहीं है कि जंतर-मंतर के धरने को लेकर अहसमतियों की गुज़ाइश नहीं है। इसमें शामिल कई लोगों पर विचारधारा के स्तर से सवाल उठाये जा सकते हैं। अण्णा हज़ारे ने भी कहा कि मंच से वहीं बोले जिनका चरित्र अच्छा हो। इस आंदोलन में वही आएं जिनका कैरेक्टर हो। उन्होंने कहा कि आरएसएस और बीजेपी से संबंध नहीं है फिर भी उमा भारती को फोन कर बुला लिया। राम माधव आ गए। मेरी राय में वैचारिक आधार नहीं तो स्पष्टता होनी चाहिए। तब यह सवाल उठ सकता है कि क्या हर आंदोलन का वैचारिक आधार होना ज़रूरी है। क्या हर लड़ाई इस खेमे और उस खेमे में ही बंट कर होगी। मंच पर मौजूद संघ और कुछ संत समुदाय से जुड़े लोगों को लेकर मेरी असहमति रही है। लेकिन यह आंदोलन भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक कानूनी हथियार हासिल करने के लिए था। अच्छा हुआ अनुपम खेर और बाबा रामदेव आंदोलन को हाईजैक नहीं कर सके। हमारा देश समाज और सिस्टम दोनों स्तर पर व्यापक रूप से भ्रष्ट है। उन घरों में लोग टीवी से ज़रूर उकता गए होंगे जहां रिश्वत का पैसा आता होगा। दलाली करने वाले पत्रकारों को भी कष्ट हो रहा होगा। हालांकि इस आंदोलन से अहसमति रखने वाले सभी दलाल नहीं कहे जा सकते लेकिन यह बात मेरे मन में उठ रही थी कि घूसखोर कैसे अपने परिवार के साथ जंतर-मंतर से सीधा प्रसारण देख रहा होगा।
राजनीतिक दलों के विरोध पर सवाल करने का मन करता है कि आज आप बड़े हो गए हैं। कई सांसद और विधायक हैं। आपने अलग ही दल क्यों बनाया? कांग्रेस में ही शामिल हो जाते। जिस सिविल सोसायटी को आप खारिज कर रहे हैं, चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं क्या आपकी हालत वैसी नहीं थी जब आपने राजनीतिक दल की स्थापनी की थी। क्या लोकतंत्र में सिर्फ राजनीतिक दलों को ही मान्यता हासिल है? किस आधार पर यह कह रहे हैं कि अण्णा की लड़ाई राजनीतिक नहीं है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई राजनीतिक ही होगी। आगे जा कर यह लड़ाई कहां जाएगी कौन जानता है। किस नतीजे पर पहुंचेगी किसने देखा है। नतीजा तय कर लड़ाई की शुरूआत नहीं होती। वैसे सरकार के मान लेने के बाद जीत तो हो ही गई। सरकार में हिम्मत होती तो कह देती कि हम अण्णा के ब्लैकमेल से मजबूर होकर उनका प्रस्ताव मान रहे हैं। उसने क्यों कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है। सरकार और सिविल सोसायटी को मिलकर काम करना होगा। क्या सरकार ने सिविल सोसायटी को मान्यता नहीं दे दी। बल्कि देनी पड़ी है। अनशन को ब्लैकमेल लिखकर अंग्रेजी के लेखक भाग लिये। वो अब इतिहास भी बदल दें और गांधी को ब्लैकमेलर कह दें। किसी आंदोलन में कमियां नहीं होतीं मगर क्या अण्णा के आंदोलन के मूल उद्देश्य में भी कमी है? क्या हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ना चाहिए? बस इतना ही कह सकता हूं। दो लोग हैं इस वक्त। एक जिसने जंतर-मंतर देखा है और दूसरा जिसने नहीं देखा है। जंतर-मंतर अब अण्णा के अनशन का पर्याय बन चुका है। जिनको अंट-शंट बकना है बकें। मगर असहमतियों को ध्यान से सुना जाना चाहिए। ताकि आगे से ऐसे नागरिक आंदोलनों को चलाने से पहले कुछ सावधानियां बरत ली जाएं।
राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन-क्रिकेट
(दोस्तों, यह लेख भारत-पाक मैच के तत्वाधान में लिखा गया था। जो कि अमर उजाला के ज़िंदगी लाइव पेज पर प्रकाशित हुआ। दिन रविवार का था। साभार अमर उजाला का है,लेखक कस्बा वाला ही है। यूनिकोड में विग्यापन को सही कैसे लिखें, इसकी जानकारी है आपको तो बतायें)
क्रिकेट राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन है। जिसे हम लुगदी साहित्य भी कहते हैं। एक ऐसा साहित्य जिसमें कोई शिल्प नहीं है। कोई कला नहीं है। कल्पना की असीमित उड़ान है। लुगदी साहित्य का सस्ता बाज़ार कहीं से भी किसी को भी किरदार बनाकर राष्ट्रवाद की जर्सी में मैदान में भेज देता है। मैं उससे इत्तफाक नहीं रखता जो भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच में रास्ट्रवाद को क्लासिकल रूप में देखता है। यहां राष्ट्रवाद प्रहसन है। हास्य है। होली की तरह दोनों पक्ष एक दूसरे का मज़ाक उड़ा रहे हैं,छेड़ रहे हैं और आंखों से लेकर तन के कण-कण में गुलाल मल रहे हैं। जहां मुल्कों के आपसी संबंध मैच के मोहताज़ हो जाएं वहां समझ लेना चाहिए अब के दौर में तनाव के ऐसे क्षण महज़ दिखावे ही हैं। इस दिखावे का अपना जुनून और बाज़ार है।
असली युद्ध में हार-जीत की बड़ी कीमत होती है। दुनिया की नज़र होती है। हथियार होते हुए भी इस्तमाल नहीं हो सकते। लिहाज़ा भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंधों के तनाव के मंचन के लिए क्रिकेट का मैदान लोकमंच बन जाता है। जहां युद्ध के तमाम भावों के कृत्रिम प्रसंग बनाए जाने लगते हैं। मोहाली में भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी हुआ वह पहले भी हो चुका था। मीडिया में युद्ध का अपभ्रंश ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए मुकाबले में भी बनाया गया। फर्क यही है कि पाकिस्तान के साथ हुए मैच का मंचन पहले के मुकाबलों की तुलना में कहीं ज़्यादा भव्य और शर्मनाक दोनों रहा लेकिन यह कोई पहली बार तो नहीं हुआ। फर्क यही रहा कि इस बार तनाव का दिखावा ज्यादा रहा।
मी़डिया ने युद्ध की तमाम उपमाओं को बंदूक और बम की तरह खर्च कर दिया। इस तरह से जैसे दुश्मन की सेना के सामने होने के अंदाज़े भर से तमाम कारतूस खाली कर दिए गए। इसके आस-पास का एक मुहावरा भी है। अंधेरे में तीर चलाना। क्रिकेट को ऐसे गायब कर दिया गया जैसे मुल्क में सिपाही की ज़रूरत नहीं खिलाड़ी की है। महायुद्ध, महाविनाश, आतंकवाद का बदला, सचिन है एक सौ एटम बम के बराबर। कोई शोधकर्ता मीडिया की युद्ध संबंधी उपमाओं का विश्लेषण करेगा तो पाएगा कि युद्ध के हथियारों के बारे में उसकी जानकारी कितनी कम है। कम से कम विविधता नहीं है। किसी खिलाड़ी की तुलना सी हैरियर या युद्ध पोत से नहीं की गई है। मिसाईल,बम और परमाणु बम बस। इन विशेषणों में वायु सेना और नौ सेना के हथियारों को जगह नहीं मिली है।
सेमिफाइनल को लेकर कृत्रिम उन्माद इसलिए भी दिखा क्योंकि भारत और पाकिस्तान की जनता मूल रूप से क्रिकेट में दिलचस्पी रखती ही है। क्रिकेट उसके जीवन का हिस्सा है। उन्माद एक किस्म का तड़का है। इसलिए इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं। मुंबई हमले के बाद उन्माद फैलाने की मीडिया की कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के गाइडलाइन्स भी बनी। हैरानी इस बात की है कि क्रिकेट मैच के दौरान के ऐसे उन्मादों पर लगाम लगाने की कोई कोशिश क्यों नहीं हुई। शायद इस वजह से कि मुंबई हमले के वक्त का गुस्सा और मोहाली के मैच के समय का जुनून दोनों में फर्क है। एक में नफरत थी तो दूसरे में नफरत का स्वांग। फिर भी उन्माद पर लगाम लगाने की कोशिश हो सकती थी। जिस तरह से चैनलों और एफएम रेडियो पर लतीफे और ताने सुनाए जा रहे थे वो सार्वजनिक सूचना के मंचों का काम नहीं होना चाहिए था। इससे पता चलता है कि एक मुल्क के रूप में हमारी परिपक्वता भारत महान की ब्रांडिंग से आगे नहीं जा सकी है। बल्कि मेरा भारत महान की ब्रांडिग को नुकसान भी पहुंचाती है।
क्रिकेट का मैच भारत पाकिस्तान के तनाव भरे रिश्तों के बीच मध्यांतर की तरह है। जिस मैच में दोनों मुल्क एक दूसरे को कुचल देने की सस्ती ख्वाहिशें पालती हैं उसी मैच के ज़रिये रिश्ते को सुधारने की भी संभावनाएं खोजी जाने लगती हैं। यह विरोधाभास नहीं है तो क्या है। इतना ज़रूर है कि क्रिकेट के ज़रिये दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुल जाते हैं। जब बंद होते हैं तब भी भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी देसी न्यूज़ चैनलों के दफ्तर में बैठे पाकिस्तान के महान खिलाड़ी ज़हीर अब्बास, इमरान ख़ान,वसीम अकरम की टिप्पणियों का आनंद लेते रहते हैं। ये क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों की पेशवराना परिपक्वता है। तब तो कोई उन्माद नहीं फैलाता कि जिस इमारन और अकरम की जोड़ी ने कई बार भारतीयों को कुचला है उसे स्टुडियो से भगाओ। बल्कि लाखों क्रिकेट प्रेमी उनकी बातों को क्रिकेट के लिहाज़ से सुनते हैं। उन्हें अपना समझते हैं। इसलिए आम क्रिकेट प्रेमी इस तरह के उन्माद का हिस्सा तभी बनता है जब कृत्रिम रूप से बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उस उन्माद के सहारे बाज़ार और विग्यापन का खेल खेला जा सके।
क्रिकेट को लेकर राजनय और राजनीति में फर्क करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेमिफाइनल के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक राजनीतिक पासा फेंका। एक ऐसे वक्त में जब मनमोहन सिंह पर आरोप लग रहे थे कि विदेश नीति के मामलों में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, उन्होंने विपक्ष को जवाब भी दिया और मैच देखने के बहाने एक संदेश भी दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। मगर जब राजनयिक आपस में बात करेंगे तो ज़ाहिर है वहां क्रिकेट के स्कोर की चर्चा नहीं होगी। बातचीत की मेज़ पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ेगा कि मोहाली में किसने किसको हराया। मुंबई हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी पाकिस्तान में हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। आतंकवाद पर आज भी उसका नज़रिया बहुत साफ और भरोसा का नहीं है। क्या यह सब क्रिकेट के मैदान के ज़रिये बदल सकता है? क्या कभी ऐसा हो सकेगा कि मैच के नतीजे का असर कश्मीर की समस्या पर पड़ेगा? किसी राजनयिक से पूछेंगे तो मुस्करा देगा।
वैसे भी भारत और पाकिस्तान की टीमों के कप्तान ने एक बार भी नहीं कहा कि हां यह मैच जीतना ज़रूरी है ताकि दोनों देशों की बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ सके। हम जीतेंगे तो बातचीत की मेज़ पर हमारे प्रधानमंत्री का पलड़ा भारी रहेगा। दोनों के बयान क्रिकेट तक ही सीमित हैं। वो क्रिकेट के दायरे में ही एक दूसरे को चुनौती देते रहे। मीडिया है कि उसे उठाकर कश्मीर से लेकर मुंबई तक के मामले में लपेटे जा रहा था। तनाव का ऐसा रोचक और विहंगम उत्सव देखने को नहीं मिला होगा। मोहाली का महायुद्ध आईसीसी के नियमों के तहत ही खेला गया न कि भारत पाकिस्तान के रिश्तों की ज़रूरतों के मुताबिक। नागपुर में कप्तान धोनी के बयान को याद रखना चाहिए। खिलाड़ी देश के लिए खेंले न कि गैलरी के लिए। ताली बजाने वाले और हो हल्ला करने वालों से पैदा होने वाले जुनून से मैच की किस्मत तय नहीं होती। सेमिफाइनल के बाद लतीफे, युद्ध की उपमाएं वैसे ही सड़कों पर बिखरे मिलेंगे जैसे मतदान के बाद चुनाव के पोस्टर और झंडियां।
क्रिकेट राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन है। जिसे हम लुगदी साहित्य भी कहते हैं। एक ऐसा साहित्य जिसमें कोई शिल्प नहीं है। कोई कला नहीं है। कल्पना की असीमित उड़ान है। लुगदी साहित्य का सस्ता बाज़ार कहीं से भी किसी को भी किरदार बनाकर राष्ट्रवाद की जर्सी में मैदान में भेज देता है। मैं उससे इत्तफाक नहीं रखता जो भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच में रास्ट्रवाद को क्लासिकल रूप में देखता है। यहां राष्ट्रवाद प्रहसन है। हास्य है। होली की तरह दोनों पक्ष एक दूसरे का मज़ाक उड़ा रहे हैं,छेड़ रहे हैं और आंखों से लेकर तन के कण-कण में गुलाल मल रहे हैं। जहां मुल्कों के आपसी संबंध मैच के मोहताज़ हो जाएं वहां समझ लेना चाहिए अब के दौर में तनाव के ऐसे क्षण महज़ दिखावे ही हैं। इस दिखावे का अपना जुनून और बाज़ार है।
असली युद्ध में हार-जीत की बड़ी कीमत होती है। दुनिया की नज़र होती है। हथियार होते हुए भी इस्तमाल नहीं हो सकते। लिहाज़ा भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंधों के तनाव के मंचन के लिए क्रिकेट का मैदान लोकमंच बन जाता है। जहां युद्ध के तमाम भावों के कृत्रिम प्रसंग बनाए जाने लगते हैं। मोहाली में भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी हुआ वह पहले भी हो चुका था। मीडिया में युद्ध का अपभ्रंश ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए मुकाबले में भी बनाया गया। फर्क यही है कि पाकिस्तान के साथ हुए मैच का मंचन पहले के मुकाबलों की तुलना में कहीं ज़्यादा भव्य और शर्मनाक दोनों रहा लेकिन यह कोई पहली बार तो नहीं हुआ। फर्क यही रहा कि इस बार तनाव का दिखावा ज्यादा रहा।
मी़डिया ने युद्ध की तमाम उपमाओं को बंदूक और बम की तरह खर्च कर दिया। इस तरह से जैसे दुश्मन की सेना के सामने होने के अंदाज़े भर से तमाम कारतूस खाली कर दिए गए। इसके आस-पास का एक मुहावरा भी है। अंधेरे में तीर चलाना। क्रिकेट को ऐसे गायब कर दिया गया जैसे मुल्क में सिपाही की ज़रूरत नहीं खिलाड़ी की है। महायुद्ध, महाविनाश, आतंकवाद का बदला, सचिन है एक सौ एटम बम के बराबर। कोई शोधकर्ता मीडिया की युद्ध संबंधी उपमाओं का विश्लेषण करेगा तो पाएगा कि युद्ध के हथियारों के बारे में उसकी जानकारी कितनी कम है। कम से कम विविधता नहीं है। किसी खिलाड़ी की तुलना सी हैरियर या युद्ध पोत से नहीं की गई है। मिसाईल,बम और परमाणु बम बस। इन विशेषणों में वायु सेना और नौ सेना के हथियारों को जगह नहीं मिली है।
सेमिफाइनल को लेकर कृत्रिम उन्माद इसलिए भी दिखा क्योंकि भारत और पाकिस्तान की जनता मूल रूप से क्रिकेट में दिलचस्पी रखती ही है। क्रिकेट उसके जीवन का हिस्सा है। उन्माद एक किस्म का तड़का है। इसलिए इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं। मुंबई हमले के बाद उन्माद फैलाने की मीडिया की कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के गाइडलाइन्स भी बनी। हैरानी इस बात की है कि क्रिकेट मैच के दौरान के ऐसे उन्मादों पर लगाम लगाने की कोई कोशिश क्यों नहीं हुई। शायद इस वजह से कि मुंबई हमले के वक्त का गुस्सा और मोहाली के मैच के समय का जुनून दोनों में फर्क है। एक में नफरत थी तो दूसरे में नफरत का स्वांग। फिर भी उन्माद पर लगाम लगाने की कोशिश हो सकती थी। जिस तरह से चैनलों और एफएम रेडियो पर लतीफे और ताने सुनाए जा रहे थे वो सार्वजनिक सूचना के मंचों का काम नहीं होना चाहिए था। इससे पता चलता है कि एक मुल्क के रूप में हमारी परिपक्वता भारत महान की ब्रांडिंग से आगे नहीं जा सकी है। बल्कि मेरा भारत महान की ब्रांडिग को नुकसान भी पहुंचाती है।
क्रिकेट का मैच भारत पाकिस्तान के तनाव भरे रिश्तों के बीच मध्यांतर की तरह है। जिस मैच में दोनों मुल्क एक दूसरे को कुचल देने की सस्ती ख्वाहिशें पालती हैं उसी मैच के ज़रिये रिश्ते को सुधारने की भी संभावनाएं खोजी जाने लगती हैं। यह विरोधाभास नहीं है तो क्या है। इतना ज़रूर है कि क्रिकेट के ज़रिये दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुल जाते हैं। जब बंद होते हैं तब भी भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी देसी न्यूज़ चैनलों के दफ्तर में बैठे पाकिस्तान के महान खिलाड़ी ज़हीर अब्बास, इमरान ख़ान,वसीम अकरम की टिप्पणियों का आनंद लेते रहते हैं। ये क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों की पेशवराना परिपक्वता है। तब तो कोई उन्माद नहीं फैलाता कि जिस इमारन और अकरम की जोड़ी ने कई बार भारतीयों को कुचला है उसे स्टुडियो से भगाओ। बल्कि लाखों क्रिकेट प्रेमी उनकी बातों को क्रिकेट के लिहाज़ से सुनते हैं। उन्हें अपना समझते हैं। इसलिए आम क्रिकेट प्रेमी इस तरह के उन्माद का हिस्सा तभी बनता है जब कृत्रिम रूप से बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उस उन्माद के सहारे बाज़ार और विग्यापन का खेल खेला जा सके।
क्रिकेट को लेकर राजनय और राजनीति में फर्क करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेमिफाइनल के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक राजनीतिक पासा फेंका। एक ऐसे वक्त में जब मनमोहन सिंह पर आरोप लग रहे थे कि विदेश नीति के मामलों में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, उन्होंने विपक्ष को जवाब भी दिया और मैच देखने के बहाने एक संदेश भी दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। मगर जब राजनयिक आपस में बात करेंगे तो ज़ाहिर है वहां क्रिकेट के स्कोर की चर्चा नहीं होगी। बातचीत की मेज़ पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ेगा कि मोहाली में किसने किसको हराया। मुंबई हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी पाकिस्तान में हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। आतंकवाद पर आज भी उसका नज़रिया बहुत साफ और भरोसा का नहीं है। क्या यह सब क्रिकेट के मैदान के ज़रिये बदल सकता है? क्या कभी ऐसा हो सकेगा कि मैच के नतीजे का असर कश्मीर की समस्या पर पड़ेगा? किसी राजनयिक से पूछेंगे तो मुस्करा देगा।
वैसे भी भारत और पाकिस्तान की टीमों के कप्तान ने एक बार भी नहीं कहा कि हां यह मैच जीतना ज़रूरी है ताकि दोनों देशों की बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ सके। हम जीतेंगे तो बातचीत की मेज़ पर हमारे प्रधानमंत्री का पलड़ा भारी रहेगा। दोनों के बयान क्रिकेट तक ही सीमित हैं। वो क्रिकेट के दायरे में ही एक दूसरे को चुनौती देते रहे। मीडिया है कि उसे उठाकर कश्मीर से लेकर मुंबई तक के मामले में लपेटे जा रहा था। तनाव का ऐसा रोचक और विहंगम उत्सव देखने को नहीं मिला होगा। मोहाली का महायुद्ध आईसीसी के नियमों के तहत ही खेला गया न कि भारत पाकिस्तान के रिश्तों की ज़रूरतों के मुताबिक। नागपुर में कप्तान धोनी के बयान को याद रखना चाहिए। खिलाड़ी देश के लिए खेंले न कि गैलरी के लिए। ताली बजाने वाले और हो हल्ला करने वालों से पैदा होने वाले जुनून से मैच की किस्मत तय नहीं होती। सेमिफाइनल के बाद लतीफे, युद्ध की उपमाएं वैसे ही सड़कों पर बिखरे मिलेंगे जैसे मतदान के बाद चुनाव के पोस्टर और झंडियां।
एक कमज़ोर क्रिकेटप्रेमी की आत्मकथा।
मैं एक कमज़ोर प्रधान इंसान हूं। घबराहट से ओत-प्रोत। अपनी इसी ख़ूबी और मैच फिक्सिंग से आहत होने के कारण क्रिकेट देखना छोड़ दिया। बचपना में टीम इंडिया का कप्तान बनने की ख़्वाहिश रखने वाला मैं कभी तीन गेंद लगातार नहीं फेंक सका। तीनों गेंद पिच की बजाय तीनों स्लिप से बाहर जाती और मेरे मुंह से झाग निकलने के बाद कपार झन्नाने लगता। बहुत रो-धो के एकाध मैच में खेलने का मौका मिला भी तो इस वजह से कैच नहीं लिया कि ड्यूज़ बॉल से हाथ फट जाएगा। इस गुस्से में एक फिल्डर ने एक थाप लगा भी दिया। थाप चांटा का लघुक्रोधित वर्ज़न है। लेकिन टीवी पर टीम इंडिया को खेलते देख किसी कामयाब खिलाड़ी का प्रतिरूप बन हमेशा मैच का आनंद उठाता रहा। सिर्फ जीत के क्षणों में। हारती टीम से इतनी घबराहट होती थी कि मैच देखना बंद कर देते था। कमरे से निकल कर गली में घूमने लगता था। तमाम तरह के देवी देवताओं की झलकियां भी आंखों के सामने से गुज़र जाती थीं। उनके निष्क्रिय होने से भक्ति में कमी आने लगी। क्रिकेट से दूर होता चला गया। इसीलिए क्रिकेट के बारे में मैं उतना ही जानता हूं जितना फिज़िक्स और बॉटनी के बारे में।
मुझे अपनी इस कमज़ोरी पर नाज़ है। मगर तनाव के क्षणों में धीर-गंभीर होने या होने का अभिनय करने वाले तमाम वीरों और वीरांगनाओं से ईर्ष्या ज़रूर होती है। ऐसा लगता है कि जीवन की उपलब्धियां उन्हीं की धरोहर हैं। उनका कितना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। मैं धारा में बहता हूं और वो धारा को बनाते या मोड़ते हैं। मानता हूं कि जीवन मे कुछ करने के लिए इस टाइप की बाज़ारू ख़ूबियां होनी ही चाहिएं लेकिन क्या मेरे जैसे कमज़ोर आदमी के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी स्कीम नहीं होनी चाहिए। इसीलिए हैरानी होती है कि यहां तक जीवन कैसे जी गया। जो कर रहा हूं वो कैसे हो रहा है। बिना घबराहट के ख़ुद को समझना मुश्किल है।
ऐसे कमज़ोर और पूर्वकालिक क्रिकेट प्रेमी को जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने घर बुला लिया मैच देखने। सप्तनीक
अविनाश,सुर,सप्तनीक समरेंद्र,बेपत्नीक मिहिर और विनीत कुमार के बीच मैं अपनी पत्नी के न आने पर अकेला मौजूद रहा। विशालकाय होम थियेटर पर फाइनल। शानदार माहौल में मैच देखते हुए एक बार हिन्दी ग्रंथी कुलमुला उठी और महसूस करने लगी कि कुलीनता हिन्दी का स्वाभाविक लक्षण है। हम हमेशा संघर्ष मोड में नहीं रहते। मनोरंजन और शौक को भी महत्व देते हैं। हम सिर्फ रचनावलियों के संग्रह नहीं ख़रीदते,क्रिकेट भी देखते हैं। तभी इतने इंतज़ाम और ठाठ से मैच देखने जमा हुए। इसके बाद भी मैच के दौरान कई बार ऐसा लगा कि आज इंडिया और मेरा दोनों का फाइनल हो जाएगा। श्रीलंका की टीम बल्लेबाज़ी कर रही थी। भारत के गेंदबाज़ विकेट ले रहे थे मगर रन नहीं रोक पा रहे थे। क्षेत्ररक्षण में हम अच्छा कर रहे थे। मगर श्रीलंका के स्कोर ने मुझे विकट परिस्थिति में डाल दिया। घबराहट का एन्जाइम निकल पड़ा। मुझे क्रिकेट और अपनी कमज़ोरी दोनों में से एक को चुनना था। साफ था कि मैं बार-बार अपनी कोमज़ोरी के पक्ष में झुकने लगा। सेमिफाइनल की तरह मैच बीच में छोड़ कर भागने की घोषणा करने लगा।
सहवाग का विकेट मेरे सामने नहीं गिरा। सचिन का गिर गया। धड़कनें ऐसी उखड़ीं कि जान निकलने लगी। थाणवी जी के घर जमा सभी साथी धीर-गंभीर वीर लग रहे थे। अब वक्त आ गया था कि अपनी कमज़ोरी का एलान कर दूं। ताकि कुछ हो गया तो इन्हें सनद रहे कि ज़िला अस्पताल जाना है या एस्कार्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट। जब भी मैं भागने का एलान करता और सब चुप करा देते। बैठिये बैठिये,कहां जाइयेगा। अच्छा नहीं लग रहा था। टीम इंडिया दबाव में आ रही थी और मैं तनाव में। लगा कि इस महफिल में अकेला कमज़ोर मैं ही हूं।
तभी कैमरा घूमा और मूर्छितावस्था में पड़ी नीता अंबानी और होश उड़ाये आमिर ख़ान की तरफ गया। इन्हें देखकर हौसला बढ़ा। हम तीनों में एक उभयनिष्ठ लक्षण का पता चल चुका था। मेरी तरह तीनों दबाव और तनाव के क्षणों में एक साधारण और कमज़ोर दर्शक इंसान की तरह बर्ताव कर रहे थे। लगा कि पांच लाख करोड़ वाली नीता अंबानी को किसी चीज़ की कमी नहीं है। वो भी मेरी तरह मूर्छित हैं। साधारण टेलरिंग वाली कमीज़ पहने मुकेश अंबानी को देख कर लगा कि लाख करोड़ कमाने के बाद भी मोहम्मद जेन्ट्स टेलर की सिली हुई कमीज़ में मुकेश गांव के चाचा की तरह लग रहे थे। कॉलर बटन वाली नीली कमीज़ में मुकेश अंबानी ने स्टार वाले चश्मे नहीं पहने थे। वे मेरे बाकी मित्रों जैसे थे। गंभीर और जीत के लिए प्रतिक्षारत। मैं कमज़ोर और तनाव से त्रस्त भागरत। मुकेश अंबानी साधारण कमीज़ में असाधारण लग रहे थे। मगर उनकी पत्नी नीता असाधारण कपड़ों में साधारण लग रही थीं। वो भी तनाव नहीं झेल पा रही थीं और मैं भी नहीं झेल पा रहा था। जब नीता अंबानी,आमिर और उनकी पत्नी किरण राव खुश होते,मैं भी खुश हो जाता। वे दुखी तो मैं दुखी। क्लास डिफरेंस होने के बाद भी इमोशन समानता।
मुझे लगा कि महान भारत में कमज़ोर लोगों की भी कमी नहीं है। मैं बॉल दर बॉल मैच देखने के लिए विवश था। जैसे वे लोग अपने लाखों रुपये के स्टैंड छोड़ कर नहीं जा सकते थे वैसे ही मैं मित्रों के दबाव में उठकर नहीं जा सका। रिज़ल्ट निकलता है तो एक फेलियर अपने जैसा फेलियर को देख शक्ति प्राप्त करता है। उसे टॉपर से प्रेरणा नहीं मिलती। फेल करने वाले से मिलती है। मुझे नीता अंबानी से प्रेरणा मिली। जो वो जी सकती हैं तो मैं क्यों नहीं। वैसे एक बार कमरे से निकल टहलने ज़रूर चला गया। कोहली का विकेट गिरा तो लगा कि बेहोश हो जाऊंगा। उस कमेंटेटर पर गुस्सा आ गया जिसने थोड़ी देर पहले कहा था कि गंभीर और कोहली ने पारी संभाल ली है।
मैं हिंसक हो उठा। दसों उंगलियों के पोर पर पनपे नाखूनों को कतरने लगा। हर गेंद,हर विकेट के बाद कोई न कोई नाखून बिना आवाज़ किये दातों तले छिल जाता था। बेचैनियां बढ़तीं जा रही थीं। दोस्तों को एसएमएस करने लगा ताकि महफिल में बैठे खेलप्रेमी वीरपुरुषों और वीरांगनाओं से दूर जा सकूं। कपार के दोनों साइड बटन यानी टेम्पल पर कुछ महसूस हो रहा था। बेचैनी और नोचनी में फर्क मिट गया। धक-धक-धक। गो की बजाय स्टॉप हो जाता तो ग़ज़ब हो जाता। यही कहने लगा कि अब जो इस मैच को देख रहा है वह सही में खेल प्रेमी है। उसमें धीरज है कि वो हार या चुनौतीपूर्ण क्षणों में भी मैच देखे। मैं सिर्फ विजयी होने पर ताली बजाने वाला दर्शक हूं। ख़ैर मैच देखता गया। गंभीर और धोनी ने कमाल करना शुरू कर दिया। हर चौके पर तनाव काफूर होने लगा। रूह आफज़ा सी तरावट महसूस होने लगी।
जीत का क्षण नज़दीक आ गया। इतिहास बनने वाला था और मैं बिना विश्वविद्यालय के मान्यताप्राप्त इतिहासकार बनने जा रहा था। इस मैच को मैंने भी देखा है। बॉल दर बॉल। तनाव के बाद भी टिका रहा जैसी टिकी रही टीम इंडिया। पहली बार ख़ुद को असाधारण होने का अहसास हो रहा था। लगा कि तनाव झेल सकता हूं। बस एक बार टीम इंडिया की कप्तानी मिल जाए। कमज़ोर लोग ऐसे ही जीते हैं। एक-एक सीढ़ी चढ़ते हैं। घुलटते हैं फिर चढ़ जाते हैं। भारत के विश्वविजयी होते ही मैं धन्य हो गया। अपने डर,घबराहट और आशंकाओं में इतना डूब गया था कि जीतने के वक्त आंसू निकले ही नहीं। काश मैं सचिन की तरह रो पाता।
शाम की समाप्ति बेहद स्वादिष्ठ राजस्थानी व्यंजनों से हुई। सांगरी सब्ज़ी की ख़ूबियों पर थानवी जी के अल्प-प्रवचन के साथ। हम सब अपने-अपने घर लौट आए। रास्ते में लोगों ने घेर लिया। एक ने कहा कार का शीशा नीचे कीजिए। बोला कि भाभी का ख्याल रखना और भर पेट खाना। टीम इंडिया जीती है। मीडिया वालों तुमको भी बधाई। तभी भीड़ में एक मीडिया वाला भाई आया। सर मैं फलाने टीवी में काम करता हूं। आपसे मिलूंगा। प्लीज़ सर। याद रखियेगा। मेरा नाम...। कोई बात नहीं हम भी यही करते थे। सोचा काश इंडिया के जीतते ही सबको पसंद की नौकरी मिल जाती,सैलरी मिल जाती। मुझे रवीश की रिपोर्ट का कोई नया आइडिया मिल जाता।
शनिवार की पूरी शाम मैंने समर्पित कर दी है। थानवी जी की पत्नी के नाम। जिनकी मेहमाननवाज़ी की वजह से मेरे जैसा कमज़ोर इंसान मैच देख सका। वो तमाम क्षणों में सामान्य रहीं। थानवी जी की चाय याद रहेगी। लिकर टी की वजह से रक्त पतला होता रहा और थक्के न जमने के कारण ह्रदयाघात की आशंका मिट गई। काश मैं भी मज़बूत और महान होता। ख़ैर। टीम इंडिया की जीत पर सबको बधाई। कस्बा की तरफ से।
मुझे अपनी इस कमज़ोरी पर नाज़ है। मगर तनाव के क्षणों में धीर-गंभीर होने या होने का अभिनय करने वाले तमाम वीरों और वीरांगनाओं से ईर्ष्या ज़रूर होती है। ऐसा लगता है कि जीवन की उपलब्धियां उन्हीं की धरोहर हैं। उनका कितना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। मैं धारा में बहता हूं और वो धारा को बनाते या मोड़ते हैं। मानता हूं कि जीवन मे कुछ करने के लिए इस टाइप की बाज़ारू ख़ूबियां होनी ही चाहिएं लेकिन क्या मेरे जैसे कमज़ोर आदमी के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी स्कीम नहीं होनी चाहिए। इसीलिए हैरानी होती है कि यहां तक जीवन कैसे जी गया। जो कर रहा हूं वो कैसे हो रहा है। बिना घबराहट के ख़ुद को समझना मुश्किल है।
ऐसे कमज़ोर और पूर्वकालिक क्रिकेट प्रेमी को जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने घर बुला लिया मैच देखने। सप्तनीक
अविनाश,सुर,सप्तनीक समरेंद्र,बेपत्नीक मिहिर और विनीत कुमार के बीच मैं अपनी पत्नी के न आने पर अकेला मौजूद रहा। विशालकाय होम थियेटर पर फाइनल। शानदार माहौल में मैच देखते हुए एक बार हिन्दी ग्रंथी कुलमुला उठी और महसूस करने लगी कि कुलीनता हिन्दी का स्वाभाविक लक्षण है। हम हमेशा संघर्ष मोड में नहीं रहते। मनोरंजन और शौक को भी महत्व देते हैं। हम सिर्फ रचनावलियों के संग्रह नहीं ख़रीदते,क्रिकेट भी देखते हैं। तभी इतने इंतज़ाम और ठाठ से मैच देखने जमा हुए। इसके बाद भी मैच के दौरान कई बार ऐसा लगा कि आज इंडिया और मेरा दोनों का फाइनल हो जाएगा। श्रीलंका की टीम बल्लेबाज़ी कर रही थी। भारत के गेंदबाज़ विकेट ले रहे थे मगर रन नहीं रोक पा रहे थे। क्षेत्ररक्षण में हम अच्छा कर रहे थे। मगर श्रीलंका के स्कोर ने मुझे विकट परिस्थिति में डाल दिया। घबराहट का एन्जाइम निकल पड़ा। मुझे क्रिकेट और अपनी कमज़ोरी दोनों में से एक को चुनना था। साफ था कि मैं बार-बार अपनी कोमज़ोरी के पक्ष में झुकने लगा। सेमिफाइनल की तरह मैच बीच में छोड़ कर भागने की घोषणा करने लगा।
सहवाग का विकेट मेरे सामने नहीं गिरा। सचिन का गिर गया। धड़कनें ऐसी उखड़ीं कि जान निकलने लगी। थाणवी जी के घर जमा सभी साथी धीर-गंभीर वीर लग रहे थे। अब वक्त आ गया था कि अपनी कमज़ोरी का एलान कर दूं। ताकि कुछ हो गया तो इन्हें सनद रहे कि ज़िला अस्पताल जाना है या एस्कार्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट। जब भी मैं भागने का एलान करता और सब चुप करा देते। बैठिये बैठिये,कहां जाइयेगा। अच्छा नहीं लग रहा था। टीम इंडिया दबाव में आ रही थी और मैं तनाव में। लगा कि इस महफिल में अकेला कमज़ोर मैं ही हूं।
तभी कैमरा घूमा और मूर्छितावस्था में पड़ी नीता अंबानी और होश उड़ाये आमिर ख़ान की तरफ गया। इन्हें देखकर हौसला बढ़ा। हम तीनों में एक उभयनिष्ठ लक्षण का पता चल चुका था। मेरी तरह तीनों दबाव और तनाव के क्षणों में एक साधारण और कमज़ोर दर्शक इंसान की तरह बर्ताव कर रहे थे। लगा कि पांच लाख करोड़ वाली नीता अंबानी को किसी चीज़ की कमी नहीं है। वो भी मेरी तरह मूर्छित हैं। साधारण टेलरिंग वाली कमीज़ पहने मुकेश अंबानी को देख कर लगा कि लाख करोड़ कमाने के बाद भी मोहम्मद जेन्ट्स टेलर की सिली हुई कमीज़ में मुकेश गांव के चाचा की तरह लग रहे थे। कॉलर बटन वाली नीली कमीज़ में मुकेश अंबानी ने स्टार वाले चश्मे नहीं पहने थे। वे मेरे बाकी मित्रों जैसे थे। गंभीर और जीत के लिए प्रतिक्षारत। मैं कमज़ोर और तनाव से त्रस्त भागरत। मुकेश अंबानी साधारण कमीज़ में असाधारण लग रहे थे। मगर उनकी पत्नी नीता असाधारण कपड़ों में साधारण लग रही थीं। वो भी तनाव नहीं झेल पा रही थीं और मैं भी नहीं झेल पा रहा था। जब नीता अंबानी,आमिर और उनकी पत्नी किरण राव खुश होते,मैं भी खुश हो जाता। वे दुखी तो मैं दुखी। क्लास डिफरेंस होने के बाद भी इमोशन समानता।
मुझे लगा कि महान भारत में कमज़ोर लोगों की भी कमी नहीं है। मैं बॉल दर बॉल मैच देखने के लिए विवश था। जैसे वे लोग अपने लाखों रुपये के स्टैंड छोड़ कर नहीं जा सकते थे वैसे ही मैं मित्रों के दबाव में उठकर नहीं जा सका। रिज़ल्ट निकलता है तो एक फेलियर अपने जैसा फेलियर को देख शक्ति प्राप्त करता है। उसे टॉपर से प्रेरणा नहीं मिलती। फेल करने वाले से मिलती है। मुझे नीता अंबानी से प्रेरणा मिली। जो वो जी सकती हैं तो मैं क्यों नहीं। वैसे एक बार कमरे से निकल टहलने ज़रूर चला गया। कोहली का विकेट गिरा तो लगा कि बेहोश हो जाऊंगा। उस कमेंटेटर पर गुस्सा आ गया जिसने थोड़ी देर पहले कहा था कि गंभीर और कोहली ने पारी संभाल ली है।
मैं हिंसक हो उठा। दसों उंगलियों के पोर पर पनपे नाखूनों को कतरने लगा। हर गेंद,हर विकेट के बाद कोई न कोई नाखून बिना आवाज़ किये दातों तले छिल जाता था। बेचैनियां बढ़तीं जा रही थीं। दोस्तों को एसएमएस करने लगा ताकि महफिल में बैठे खेलप्रेमी वीरपुरुषों और वीरांगनाओं से दूर जा सकूं। कपार के दोनों साइड बटन यानी टेम्पल पर कुछ महसूस हो रहा था। बेचैनी और नोचनी में फर्क मिट गया। धक-धक-धक। गो की बजाय स्टॉप हो जाता तो ग़ज़ब हो जाता। यही कहने लगा कि अब जो इस मैच को देख रहा है वह सही में खेल प्रेमी है। उसमें धीरज है कि वो हार या चुनौतीपूर्ण क्षणों में भी मैच देखे। मैं सिर्फ विजयी होने पर ताली बजाने वाला दर्शक हूं। ख़ैर मैच देखता गया। गंभीर और धोनी ने कमाल करना शुरू कर दिया। हर चौके पर तनाव काफूर होने लगा। रूह आफज़ा सी तरावट महसूस होने लगी।
जीत का क्षण नज़दीक आ गया। इतिहास बनने वाला था और मैं बिना विश्वविद्यालय के मान्यताप्राप्त इतिहासकार बनने जा रहा था। इस मैच को मैंने भी देखा है। बॉल दर बॉल। तनाव के बाद भी टिका रहा जैसी टिकी रही टीम इंडिया। पहली बार ख़ुद को असाधारण होने का अहसास हो रहा था। लगा कि तनाव झेल सकता हूं। बस एक बार टीम इंडिया की कप्तानी मिल जाए। कमज़ोर लोग ऐसे ही जीते हैं। एक-एक सीढ़ी चढ़ते हैं। घुलटते हैं फिर चढ़ जाते हैं। भारत के विश्वविजयी होते ही मैं धन्य हो गया। अपने डर,घबराहट और आशंकाओं में इतना डूब गया था कि जीतने के वक्त आंसू निकले ही नहीं। काश मैं सचिन की तरह रो पाता।
शाम की समाप्ति बेहद स्वादिष्ठ राजस्थानी व्यंजनों से हुई। सांगरी सब्ज़ी की ख़ूबियों पर थानवी जी के अल्प-प्रवचन के साथ। हम सब अपने-अपने घर लौट आए। रास्ते में लोगों ने घेर लिया। एक ने कहा कार का शीशा नीचे कीजिए। बोला कि भाभी का ख्याल रखना और भर पेट खाना। टीम इंडिया जीती है। मीडिया वालों तुमको भी बधाई। तभी भीड़ में एक मीडिया वाला भाई आया। सर मैं फलाने टीवी में काम करता हूं। आपसे मिलूंगा। प्लीज़ सर। याद रखियेगा। मेरा नाम...। कोई बात नहीं हम भी यही करते थे। सोचा काश इंडिया के जीतते ही सबको पसंद की नौकरी मिल जाती,सैलरी मिल जाती। मुझे रवीश की रिपोर्ट का कोई नया आइडिया मिल जाता।
शनिवार की पूरी शाम मैंने समर्पित कर दी है। थानवी जी की पत्नी के नाम। जिनकी मेहमाननवाज़ी की वजह से मेरे जैसा कमज़ोर इंसान मैच देख सका। वो तमाम क्षणों में सामान्य रहीं। थानवी जी की चाय याद रहेगी। लिकर टी की वजह से रक्त पतला होता रहा और थक्के न जमने के कारण ह्रदयाघात की आशंका मिट गई। काश मैं भी मज़बूत और महान होता। ख़ैर। टीम इंडिया की जीत पर सबको बधाई। कस्बा की तरफ से।
रैव्स रिया की प्रेम कथा वाया मोहाली
मोहाली के मैच के दिन मेरे दिमाग़ में एक प्रेम कथा भुकभुकाने लगी। फेसबुक स्टेटस में वर्ण कैरेक्टर की सीमा में लिखी गई इस कथा को क्रमवार पढ़े। रैव्स और रिया डिसूज़ा की प्रेम कथा।
(1)
पटना के भिखना पहाड़ी के एटीसी ने सीटी बजा दी। पैड और हेल्मेट से लैस मैं फाइटर प्लेन लेकर मोहाली के आकाश में।नीली जर्सी में रिया डिसूज़ा थिंकिंग मुद्रा में-यू नो रैव्स..डिंट नो नैशनलिझम कैन बी सो फनी।तभी फाइटर प्लेन एफएम पकड़ लेता है। बलैती पी गए देसी अभी बाकी है।डैडी है नाराज़ पार्टी...खुश हो ले तू तो..बारूद अभी बाकी है। रैव्स और रिया नीचे न्यूज़ चैनलों के सेट को देखते हैं। मुर्गा छाप बम का कोई भरोसा नहीं। धड़ाम।
(2)
मैं मैड हूं या कंट्री मैड है। रिया यू कांट ब्लेम मी ओनली। बीच हवा में नीली जर्सी वाली रिया का मूड बादलों सा छंट गया। मैं मोहाली के हाई फ्लोर से मैच देखने के लिए ईगर था। रिया डिसूज़ा अचानक हॉकी,कबड्डी को लेकर डिप्रैस हो गई। आय नो रिया। वी हैव प्रॉब्लम। बट यू नो जर्नलिस्ट भी तो नैसनलिस्ट है। कांट आई बी। दिस इझ महायुद्ध। वी आर सेफ हीयर। नो नो..गेट मी डाउन रैव्स। डोंट ड्राइव मी मैड।
(3)
तभी भिखना पहाड़ी एटीसी से कॉल...रैव्स चाची का फोन।ऐ गुड्डू तू दिशासूल में काहे उड़ा रहे हो। पच्छिम के जत्रा नईखे। मोहाली ओनही नू बा।चाची शट अप। रिया भोजुपरी सुन कर एंग्री हो जाती है।सी हेट काउ बेल्ट लैंग्वेज।चाची बाद में...। यू नो रिया माय विलेज कनेक्शन इझ लाइक इंडियन हिस्ट्री। लेट्स गो टू द होटल भेयर पीएम ही स्टेयिंग....रिया चिल न। यू सूड रेस्पेक्ट भोजपुरी। वी आर नॉट गेंजेटिक बार्बेरियन्स। आय एम अ झर्नलिस्ट।
(4)
रिया गुस्से में शकीरा को रिंग करती है।शकीरा दिझ इंडियन्स कांट प्रोनाउन्स योर सांग। वाका वाका इझ वाघा-वाघा। डोंट टेल में रिया। हू आर यू विद। सेम..गेंजेटिक प्लेन वाला। ओ..रैव्स। माय गॉड। आय टोल्ड यू न। दिस मैन इझ क्रिकेट क्रेज़ी। हाउ कैन ही फ्लाई अ फाइटर प्लेन। यू नो शकीरा ही इझ नंबर वन जुगाड़ू। गॉट अ लाइसेन्स फ्राम राजस्थान फ्लाइंग क्लब। फेक है। झर्नलिस्ट है साला। मैनेज कर लेता है। शट अप रिया। यू लभ हिम।
(5)
और रैव्स को मोहाली ब्लूज़ होने लगा। उदासी के पल में उसका फाइटर प्लेन भी गड़गड़ाने लगा। रिया समझ गई। बोली चलो रैव्स भिखना पहाड़ी पर उतरते हैं. वहीं रिमझिम होटल में अंजुम जी के साथ पेट सिस्टम में खा लेंगे। नो रिया। कांट गो बैक। लेट्स गो टू खोड़ा खुर्द एट गाज़ीपुर बोर्डर। एटीसी को बोलता हूं। तुम जर्नलिस्ट लोग अपने ही ट्रैप में फंस गए। है न रैव्स। या...आय थॉट इट विल बी अ महायुद्ध। बट ये तो महाफुस्स निकला। चिल रैव्स।
(6)
पोस्ट स्क्रीप्ट बाय शेक्सपीयर- और रैव्स एक कमजो़र इंसान निकला....बल्लेबाज़ों के ख़राब प्रदर्शन के बाद ही मोहाली से भाग निकला। जर्नलिस्ट होते ही ऐसे हैं। विजेता का पीछा करने वाले। रिया एक समझदार लड़की थी। वो अब भोजपुरी बोलने लगी। एक गांव में सेल्फ हेल्प ग्रुप के साथ काम करने लगी। रैव्स ने एक हिट फिल्म की कहानी लिखी- मोहाली का महापापी कौन। दोनों जुदा हो गए। आज भी पटना म्यूज़ियम में रैव्स का फाइटर प्लेन रखा है।
(7)
भिखना पहाड़ी एटीसी की फिर सीटी बज गई। पटना म्यूज़ियम से फाइटर प्लेन लेकर रैव्स मोहाली की तरफ उड़ चला। रिया को लगा कि रैव्स मैच्योर हो रहा है। क्राइसस एन्ज्यवॉय करने लगा है। धोनी रमाए टीमिंडिया के गेंदबाज़ धौंक रहे थे। रिया ने कहा तुम न्यूज़ करते करते सेन्सिटिभ हो गए हो। थोड़ा मिक्स करो। प्रोफेशन के क्राउड में। अदरभाइझ लोनली हो जाओगे। रैव्स ने हां में हां कह दिया। और फाइटर प्लेन उड़ाने में बिझी हो गया।
(8)
...फाइटर प्लेन में रिया लेज़ी लम्हे सुनते हुए मोहाली के आसमान में चमकते सितारे गिनने लगी। पोएटिक मूड में रिया को देख रैव्स रंजन ऋतुराज के स्टेटस का वो गाना गुनगुनाने लगा...सिमटी हुई ये घड़िया..फिर से न बिखर न जाएं....इस रात में जी ले हम, इस रात में मर जाएं। रिया डिसूजा दोस्तों को मैसेज करने लगी। आय टोल्ड यू न ही इझ ए नाईस गाई। गेंजेटिक बार्बेरियन्स। रैव्स ने भिखना पहाड़ी एटीसी की लाइन काट दी।
(9)
और...रिया ने रैव्स को हग कर लिया...फाइटर प्लेन टिल्ट हो गया....मोहाली के आसमान में उठती आतिशबाज़ियों की लपटों से फाइटर प्लेन में माइनर फायर हो गया...समय रहते बुझा लिया गया...भिखना पहाड़ी के एटीसी को घंटा न पता चला.....बीच मैच से भागा रैव्स मिस्वा को आउट होते देख बहादुर फील करने लगा। मैनली। ओनली रिया उसके जज़्बात को समझ सकी। इसी के साथ मोहाली स.फा. की इस प्रेम कथा का सुखांत होता है।
(1)
पटना के भिखना पहाड़ी के एटीसी ने सीटी बजा दी। पैड और हेल्मेट से लैस मैं फाइटर प्लेन लेकर मोहाली के आकाश में।नीली जर्सी में रिया डिसूज़ा थिंकिंग मुद्रा में-यू नो रैव्स..डिंट नो नैशनलिझम कैन बी सो फनी।तभी फाइटर प्लेन एफएम पकड़ लेता है। बलैती पी गए देसी अभी बाकी है।डैडी है नाराज़ पार्टी...खुश हो ले तू तो..बारूद अभी बाकी है। रैव्स और रिया नीचे न्यूज़ चैनलों के सेट को देखते हैं। मुर्गा छाप बम का कोई भरोसा नहीं। धड़ाम।
(2)
मैं मैड हूं या कंट्री मैड है। रिया यू कांट ब्लेम मी ओनली। बीच हवा में नीली जर्सी वाली रिया का मूड बादलों सा छंट गया। मैं मोहाली के हाई फ्लोर से मैच देखने के लिए ईगर था। रिया डिसूज़ा अचानक हॉकी,कबड्डी को लेकर डिप्रैस हो गई। आय नो रिया। वी हैव प्रॉब्लम। बट यू नो जर्नलिस्ट भी तो नैसनलिस्ट है। कांट आई बी। दिस इझ महायुद्ध। वी आर सेफ हीयर। नो नो..गेट मी डाउन रैव्स। डोंट ड्राइव मी मैड।
(3)
तभी भिखना पहाड़ी एटीसी से कॉल...रैव्स चाची का फोन।ऐ गुड्डू तू दिशासूल में काहे उड़ा रहे हो। पच्छिम के जत्रा नईखे। मोहाली ओनही नू बा।चाची शट अप। रिया भोजुपरी सुन कर एंग्री हो जाती है।सी हेट काउ बेल्ट लैंग्वेज।चाची बाद में...। यू नो रिया माय विलेज कनेक्शन इझ लाइक इंडियन हिस्ट्री। लेट्स गो टू द होटल भेयर पीएम ही स्टेयिंग....रिया चिल न। यू सूड रेस्पेक्ट भोजपुरी। वी आर नॉट गेंजेटिक बार्बेरियन्स। आय एम अ झर्नलिस्ट।
(4)
रिया गुस्से में शकीरा को रिंग करती है।शकीरा दिझ इंडियन्स कांट प्रोनाउन्स योर सांग। वाका वाका इझ वाघा-वाघा। डोंट टेल में रिया। हू आर यू विद। सेम..गेंजेटिक प्लेन वाला। ओ..रैव्स। माय गॉड। आय टोल्ड यू न। दिस मैन इझ क्रिकेट क्रेज़ी। हाउ कैन ही फ्लाई अ फाइटर प्लेन। यू नो शकीरा ही इझ नंबर वन जुगाड़ू। गॉट अ लाइसेन्स फ्राम राजस्थान फ्लाइंग क्लब। फेक है। झर्नलिस्ट है साला। मैनेज कर लेता है। शट अप रिया। यू लभ हिम।
(5)
और रैव्स को मोहाली ब्लूज़ होने लगा। उदासी के पल में उसका फाइटर प्लेन भी गड़गड़ाने लगा। रिया समझ गई। बोली चलो रैव्स भिखना पहाड़ी पर उतरते हैं. वहीं रिमझिम होटल में अंजुम जी के साथ पेट सिस्टम में खा लेंगे। नो रिया। कांट गो बैक। लेट्स गो टू खोड़ा खुर्द एट गाज़ीपुर बोर्डर। एटीसी को बोलता हूं। तुम जर्नलिस्ट लोग अपने ही ट्रैप में फंस गए। है न रैव्स। या...आय थॉट इट विल बी अ महायुद्ध। बट ये तो महाफुस्स निकला। चिल रैव्स।
(6)
पोस्ट स्क्रीप्ट बाय शेक्सपीयर- और रैव्स एक कमजो़र इंसान निकला....बल्लेबाज़ों के ख़राब प्रदर्शन के बाद ही मोहाली से भाग निकला। जर्नलिस्ट होते ही ऐसे हैं। विजेता का पीछा करने वाले। रिया एक समझदार लड़की थी। वो अब भोजपुरी बोलने लगी। एक गांव में सेल्फ हेल्प ग्रुप के साथ काम करने लगी। रैव्स ने एक हिट फिल्म की कहानी लिखी- मोहाली का महापापी कौन। दोनों जुदा हो गए। आज भी पटना म्यूज़ियम में रैव्स का फाइटर प्लेन रखा है।
(7)
भिखना पहाड़ी एटीसी की फिर सीटी बज गई। पटना म्यूज़ियम से फाइटर प्लेन लेकर रैव्स मोहाली की तरफ उड़ चला। रिया को लगा कि रैव्स मैच्योर हो रहा है। क्राइसस एन्ज्यवॉय करने लगा है। धोनी रमाए टीमिंडिया के गेंदबाज़ धौंक रहे थे। रिया ने कहा तुम न्यूज़ करते करते सेन्सिटिभ हो गए हो। थोड़ा मिक्स करो। प्रोफेशन के क्राउड में। अदरभाइझ लोनली हो जाओगे। रैव्स ने हां में हां कह दिया। और फाइटर प्लेन उड़ाने में बिझी हो गया।
(8)
...फाइटर प्लेन में रिया लेज़ी लम्हे सुनते हुए मोहाली के आसमान में चमकते सितारे गिनने लगी। पोएटिक मूड में रिया को देख रैव्स रंजन ऋतुराज के स्टेटस का वो गाना गुनगुनाने लगा...सिमटी हुई ये घड़िया..फिर से न बिखर न जाएं....इस रात में जी ले हम, इस रात में मर जाएं। रिया डिसूजा दोस्तों को मैसेज करने लगी। आय टोल्ड यू न ही इझ ए नाईस गाई। गेंजेटिक बार्बेरियन्स। रैव्स ने भिखना पहाड़ी एटीसी की लाइन काट दी।
(9)
और...रिया ने रैव्स को हग कर लिया...फाइटर प्लेन टिल्ट हो गया....मोहाली के आसमान में उठती आतिशबाज़ियों की लपटों से फाइटर प्लेन में माइनर फायर हो गया...समय रहते बुझा लिया गया...भिखना पहाड़ी के एटीसी को घंटा न पता चला.....बीच मैच से भागा रैव्स मिस्वा को आउट होते देख बहादुर फील करने लगा। मैनली। ओनली रिया उसके जज़्बात को समझ सकी। इसी के साथ मोहाली स.फा. की इस प्रेम कथा का सुखांत होता है।
लोकसभा टीवी का लोकरूप
लोकसभा टीवी को देखना ऐसा लगता है जैसे अचानक शहरी भीड़-भाड़ से निकल कर किसी जैविक फार्म हाउस में आ गया हूं। जहां कुछ भी खाना स्वास्थ्यवर्धक लगने लगता है। वैसा ही कुछ लोकसभा टीवी को देखते हुए लगता है। बिना किसी चिकमिक-चिकचिक और बेवजह के ढूंसे गए ऊर्जा वितरक स्टिंग और वाइप के कार्यक्रम चलते रहते हैं। निजी न्यूज़ चैनलों में बातचीत चल रही हो तो बीच-बीच में थ्री डी एनिमेशन की तरह स्टिंग और वाइप आते जाते रहते हैं। हुर्र.ज़ू...भ्रू...श्रू करते हुए। इनका मकसद यह बताया जाता है कि इससे ऊर्जा आती है। किसी ज्ञात सर्वे और शोध के आधार पर कहना मुश्किल है कि दर्शक इन्हीं सब टिटिमाओं की वजह से ही किसी कार्यक्रम में टिकता है। लोकसभा टीवी आपके घर का वो ड्राइंग रूम हैं जहां आप जीवन की व्यस्तताओं के कारण उठना-बैठना भूल जाते हैं। वक्त मिले तो देखा कीजिए।
बाज़ार के दबाव और केबल वितरण के खर्चे में डूबे निजी चैनलों का संकट बढ़ा दिया है। मार्केटिंग के गुरुओं की तरफ से कम से कम यही बताया जाता है। वो अब कंटेंट की कतरन ही पेश कर सकेंगे। इस भयानक आर्थिक स्थिति के अलावा तथाकथित अच्छे पत्रकारों के रचनात्मक आलस्य ने भी निजी चैनलों की रचनात्मकता को मार दिया है। जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब कंटेंट और फार्मेट को लेकर काफी सराहनीय प्रयोग हुए। टेलीविज़न की क्षमताओं का पता चलने लगा। बाद में बाज़ार के दबाव और उद्देश्य से भटक जाने के कारण निजी चैनलों के कंटेंट और फार्मेट एक जैसे होते चले गए। निजी चैनलों से लोक गायब होते चले गए और स्टुडियों में एंकरों के स्टारडम के भरोसे कंटेंट को रंग-रूप दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में लोकसभा टीवी के टिके रहने के आर्थिक पक्ष को समझा जा सकता है। शायद लोकसभा टीवी के सामने बाज़ार का दबाव नहीं है। सरकार आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाती है। सरकारी विज्ञापन आते हैं,ब्रेक भी है मगर हुड़दंग नहीं है। वहां वितरण का खर्चा नहीं है। सरकार का चैनल है तो केबल वालों को दिखाना ही होगा। केबल वालों ने चैनलों को चूस लिया है। बिना वजह टिकर नहीं हैं। स्क्रीन बड़ा और शांत दिखता है।
लेकिन क्या संतुष्ठ होने के लिए यही दलील काफी है? अगर निजी चैनलों में पैसा ही लग रहा है तो अच्छे कार्यक्रम क्यों नहीं बन रहे। क्यों वहां अब सब कुछ स्टुडियों से रचा जा रहा है। ऐसी बात नहीं कि निजी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम नहीं हैं। वी द पिपुल,आप की अदालत,ज़िंदगी लाइव,टोटल रिकॉल,ज़ायका इंडिया जैसे कई कार्यक्रम हैं जो आते ही स्क्रीन को दर्शनीय बना जाते हैं। लेकिन बाकी कार्यक्रमों को देखें तो लगता है कि ज़्यादा देर तक देखा तो आंख ही फोड़ देंगे। अब तो लोग ख़बरों की रफ्तार की तुलना बम,बंदूक और बुलेट से भी करने लगे हैं। जल्दी ही आप राजा भैया न्यूज़,शहाबुद्दीन खबर और दाऊट काउंटडाउन जैसे कार्यक्रम देखेंगे। जब ख़बरों की भाषा अपराध के सामान जैसी हो जाएगी तो एक दिन अपराधी भी ख़बर पढ़ने लग जाएंगे। बहरहाल इन सब आलोचनाओं का कोई मतलब नहीं है। कोई यही बता दे कि ऐसे कार्यक्रमों और भाषा से उनकी कमाई में कितना सुधार हो गया है।
हालांकि दूरदर्शन अभी भी पुराने ढर्र पर ही चल रहा है। उसकी गुणवत्ता वहीं ठहरी हुई है। लोकसभा टीवी तो पहले भी था। लेकिन पिछले एक साल से इसकी गुणवत्ता में गज़ब का सुधार है। साल भर पहले मैंने लोकसभा टीवी पर मराठी फिल्म सियासत देखी थी। बिना किसी ब्रेक के। राजनीति फिल्म के दौरान अपने स्टुडियो में प्रकाश झा के सामने सियासत का ज़िक्र कर दिया और कहा कि आपकी फिल्म नहीं देखी है मगर सियासत जैसी नहीं हो सकती है। लोकसभा टीवी अपने हिसाब से बदलता रहता है। फिल्म के वक्त फिल्म। न्यूज़ भी और उस पर चर्चा भी। होली के दिन किराये के कोख जैसे जटिल विषय पर शानदार चर्चा देखी थी। इतनी अच्छी चर्चा निजी चैनलों पर हो ही नहीं सकती। सबको बोलने दिया गया और सबको समझाने दिया गया। पहली बार इस विषय की जटिलताओं को गहराई से समझने में मदद मिली। लोकसभा टीवी के विषय भी अलग होते हैं।
जब भी टीवी के सामने होता हूं,लोकसभा टीवी भी देखता हूं। कुछ न कुछ आ ही रहा होता है जहां थोड़ी देर तक टिक जाता हूं और कई बार देर तक देखने लगता हूं। आज दूरदर्शन के पुराने चेहरे सुनीत टंडन का एक शो देखा- कंवर्शेशन। शांत सुनीत उतावले नहीं लगते। सवाल हैं तो हैं। जवाब महत्वपूर्ण हैं। बोलने देते हैं। दुनिया के मशहूर कलाकार सुबोध गुप्ता से उनकी बातचीत बेजोड़ रही। संत स्टीफेंस की अंग्रेजीयत वाले इस देश में सुनीत सुबोध गुप्ता की लिट्टी चोखा इंग्लिश के प्रति सहज दिखते हैं। जहां इज़ इझ है और पिपल पीपुल्स हैं। व्याकरण ठेंगे पे। काम की कामयाबी के सामने भाषा की संगतराशी कुछ भी नहीं है। संवाद और विचार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सुनीत पूरे सम्मान और आदर से सुबोध को अपने शब्द और वाक्य तलाशने के लिए छूट देते हैं। एक अच्छी बातचीत निकलकर आती है। मेरे जैसा बेचैन तबीयत वाला दर्शक भी ठहर कर सुनने लगता है।सुबोध की अंग्रेजी मेरे जैसी है। हिन्दी को इंग्लिश में बोलते हैं। इंग्लिश को इंग्लिश में नहीं। इसी वजह से सुबोध के जवाबों में एक किस्म की भारतीयता, देसीपन झलकता है। सुनीत एक कुलीन इंग्लिश वक्ता खानदान से आते हैं। मुस्कुराते हैं और अपने सवालों को धीरे से सुबोध के सामने रखते चलते हैं।
ऐसी बातचीत आज के समय में सिर्फ लोकसभा टीवी में ही दिख सकती है। लोकसभा टीवी में ही शंकर अय्यर से नताशा झा और एक और एंकर इंग्लिश हिन्दी में सवाल पूछ सकते हैं। नताशा के अंग्रेजी के सवालों के जवाब में पत्रकार शंकर अय्यर इंग्लिश में और दूसरी एंकर नेहा के हिन्दी के सवालों के जवाब हिन्दी में देते हैं। इस तरह का आइडिया आप निजी चैनलों में लेकर जायें तो लोग कपार फोड़ देंगे। मैं पर्सपेक्टिव कार्यक्रम की बात कर रहा हूं। वैसे यह उतना अच्छा नहीं लगा। सवाल है प्रयोग का। निजी चैनलों में प्रयोग बंद हो चुका है। प्रॉणजॉय गुहा ठाकुर्ता का हेड स्टार्ट भी अच्छा कार्यक्रम है। सरकार के भीतर काम कर रहे कई अनुभवी लोगों को भी सुनने समझने का मौका मिलता है।
लोकसभा टीवी में लोक है या नहीं,उनकी टीआरपी कितनी है नहीं मालूम। मगर अच्छा है। और अच्छा हो सकता है। सृजन की अपार संभावना रहती है। कुछ कार्यक्रम बोझिल भी हैं। लेकिन लोकसभा टीवी आज के समय में एक विकल्प तो है ही। टीवी के आलोचक भी बाज़ारू हो गए हैं। वो अच्छे कार्यक्रमों को नहीं ढूंढते। वो भी बेकार कार्यक्रमों पर ही बार-बार लिखते रहते हैं। शायद हम गरियाने में ज्यादा साधक लगते हैं,सराहना करने में कम। कई लाइफस्टाइल चैनलों में अच्छे कार्यक्रम आने लगे हैं।
लोकसभा टीवी के कई कार्यक्रम इस धारणा को तोड़ते हैं कि आप उनके स्टुडियो में बैठकर सरकार या नौकरशाही की आलोचना नहीं कर सकते। सुनीत के जवाब में सुबोध गुप्ता खुलकर ललित कला अकादमियों की फिज़ूल की नौकरशाही पर हमले करते हैं। इसे दिखाया भी जाता है। सुबोध कहते हैं कि भारत में लोग कला की बात नहीं करते हैं। कितने की बिकी यही पूछते रहते हैं। हद है। सुनीत मुस्कुराते रहते हैं। उनके जवाब को स्वीकार करते हैं। निजी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम एंकर के परफार्मेंस के लिए होता है। वो जवाब सुनने के लिए नहीं बल्कि परफार्म करने के लिए बैठा रहता है। सुनीत इस तरह के दबावों मुक्त हैं। वो बस हैं अपने सवालों के साथ। उनके लिए सुबोध गुप्ता महत्वपूर्ण हैं न कि वे खुद। सुनीत के एक सवाल के जवाब में सुबोघ गुप्ता ने कहा उन्हें नया नया आइडिया उत्साहित और प्रेरित करता है। निजी चैनलों को प्रेरणा कहां से मिलती है? एक दूसरे के कार्यक्रम से चुराने से। लोकसभा टीवी के सामने भी कम चुनौती नहीं है। उनके पास एक मौका है। वहां काम कर रहे पत्रकार,संपादक जब तक मौका मिले अच्छी रचना करें। नए प्रयोग करें। अपनी आज़ादी का बेहतर इस्तमाल करें। आलस्य न करें। आप अच्छे हैं सिर्फ इसी दलील से कोई नहीं देखेगा। आपको अच्छा होने का सबूत भी देना होगा। रोल मॉडल बन कर।
बाज़ार के दबाव और केबल वितरण के खर्चे में डूबे निजी चैनलों का संकट बढ़ा दिया है। मार्केटिंग के गुरुओं की तरफ से कम से कम यही बताया जाता है। वो अब कंटेंट की कतरन ही पेश कर सकेंगे। इस भयानक आर्थिक स्थिति के अलावा तथाकथित अच्छे पत्रकारों के रचनात्मक आलस्य ने भी निजी चैनलों की रचनात्मकता को मार दिया है। जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब कंटेंट और फार्मेट को लेकर काफी सराहनीय प्रयोग हुए। टेलीविज़न की क्षमताओं का पता चलने लगा। बाद में बाज़ार के दबाव और उद्देश्य से भटक जाने के कारण निजी चैनलों के कंटेंट और फार्मेट एक जैसे होते चले गए। निजी चैनलों से लोक गायब होते चले गए और स्टुडियों में एंकरों के स्टारडम के भरोसे कंटेंट को रंग-रूप दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में लोकसभा टीवी के टिके रहने के आर्थिक पक्ष को समझा जा सकता है। शायद लोकसभा टीवी के सामने बाज़ार का दबाव नहीं है। सरकार आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाती है। सरकारी विज्ञापन आते हैं,ब्रेक भी है मगर हुड़दंग नहीं है। वहां वितरण का खर्चा नहीं है। सरकार का चैनल है तो केबल वालों को दिखाना ही होगा। केबल वालों ने चैनलों को चूस लिया है। बिना वजह टिकर नहीं हैं। स्क्रीन बड़ा और शांत दिखता है।
लेकिन क्या संतुष्ठ होने के लिए यही दलील काफी है? अगर निजी चैनलों में पैसा ही लग रहा है तो अच्छे कार्यक्रम क्यों नहीं बन रहे। क्यों वहां अब सब कुछ स्टुडियों से रचा जा रहा है। ऐसी बात नहीं कि निजी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम नहीं हैं। वी द पिपुल,आप की अदालत,ज़िंदगी लाइव,टोटल रिकॉल,ज़ायका इंडिया जैसे कई कार्यक्रम हैं जो आते ही स्क्रीन को दर्शनीय बना जाते हैं। लेकिन बाकी कार्यक्रमों को देखें तो लगता है कि ज़्यादा देर तक देखा तो आंख ही फोड़ देंगे। अब तो लोग ख़बरों की रफ्तार की तुलना बम,बंदूक और बुलेट से भी करने लगे हैं। जल्दी ही आप राजा भैया न्यूज़,शहाबुद्दीन खबर और दाऊट काउंटडाउन जैसे कार्यक्रम देखेंगे। जब ख़बरों की भाषा अपराध के सामान जैसी हो जाएगी तो एक दिन अपराधी भी ख़बर पढ़ने लग जाएंगे। बहरहाल इन सब आलोचनाओं का कोई मतलब नहीं है। कोई यही बता दे कि ऐसे कार्यक्रमों और भाषा से उनकी कमाई में कितना सुधार हो गया है।
हालांकि दूरदर्शन अभी भी पुराने ढर्र पर ही चल रहा है। उसकी गुणवत्ता वहीं ठहरी हुई है। लोकसभा टीवी तो पहले भी था। लेकिन पिछले एक साल से इसकी गुणवत्ता में गज़ब का सुधार है। साल भर पहले मैंने लोकसभा टीवी पर मराठी फिल्म सियासत देखी थी। बिना किसी ब्रेक के। राजनीति फिल्म के दौरान अपने स्टुडियो में प्रकाश झा के सामने सियासत का ज़िक्र कर दिया और कहा कि आपकी फिल्म नहीं देखी है मगर सियासत जैसी नहीं हो सकती है। लोकसभा टीवी अपने हिसाब से बदलता रहता है। फिल्म के वक्त फिल्म। न्यूज़ भी और उस पर चर्चा भी। होली के दिन किराये के कोख जैसे जटिल विषय पर शानदार चर्चा देखी थी। इतनी अच्छी चर्चा निजी चैनलों पर हो ही नहीं सकती। सबको बोलने दिया गया और सबको समझाने दिया गया। पहली बार इस विषय की जटिलताओं को गहराई से समझने में मदद मिली। लोकसभा टीवी के विषय भी अलग होते हैं।
जब भी टीवी के सामने होता हूं,लोकसभा टीवी भी देखता हूं। कुछ न कुछ आ ही रहा होता है जहां थोड़ी देर तक टिक जाता हूं और कई बार देर तक देखने लगता हूं। आज दूरदर्शन के पुराने चेहरे सुनीत टंडन का एक शो देखा- कंवर्शेशन। शांत सुनीत उतावले नहीं लगते। सवाल हैं तो हैं। जवाब महत्वपूर्ण हैं। बोलने देते हैं। दुनिया के मशहूर कलाकार सुबोध गुप्ता से उनकी बातचीत बेजोड़ रही। संत स्टीफेंस की अंग्रेजीयत वाले इस देश में सुनीत सुबोध गुप्ता की लिट्टी चोखा इंग्लिश के प्रति सहज दिखते हैं। जहां इज़ इझ है और पिपल पीपुल्स हैं। व्याकरण ठेंगे पे। काम की कामयाबी के सामने भाषा की संगतराशी कुछ भी नहीं है। संवाद और विचार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सुनीत पूरे सम्मान और आदर से सुबोध को अपने शब्द और वाक्य तलाशने के लिए छूट देते हैं। एक अच्छी बातचीत निकलकर आती है। मेरे जैसा बेचैन तबीयत वाला दर्शक भी ठहर कर सुनने लगता है।सुबोध की अंग्रेजी मेरे जैसी है। हिन्दी को इंग्लिश में बोलते हैं। इंग्लिश को इंग्लिश में नहीं। इसी वजह से सुबोध के जवाबों में एक किस्म की भारतीयता, देसीपन झलकता है। सुनीत एक कुलीन इंग्लिश वक्ता खानदान से आते हैं। मुस्कुराते हैं और अपने सवालों को धीरे से सुबोध के सामने रखते चलते हैं।
ऐसी बातचीत आज के समय में सिर्फ लोकसभा टीवी में ही दिख सकती है। लोकसभा टीवी में ही शंकर अय्यर से नताशा झा और एक और एंकर इंग्लिश हिन्दी में सवाल पूछ सकते हैं। नताशा के अंग्रेजी के सवालों के जवाब में पत्रकार शंकर अय्यर इंग्लिश में और दूसरी एंकर नेहा के हिन्दी के सवालों के जवाब हिन्दी में देते हैं। इस तरह का आइडिया आप निजी चैनलों में लेकर जायें तो लोग कपार फोड़ देंगे। मैं पर्सपेक्टिव कार्यक्रम की बात कर रहा हूं। वैसे यह उतना अच्छा नहीं लगा। सवाल है प्रयोग का। निजी चैनलों में प्रयोग बंद हो चुका है। प्रॉणजॉय गुहा ठाकुर्ता का हेड स्टार्ट भी अच्छा कार्यक्रम है। सरकार के भीतर काम कर रहे कई अनुभवी लोगों को भी सुनने समझने का मौका मिलता है।
लोकसभा टीवी में लोक है या नहीं,उनकी टीआरपी कितनी है नहीं मालूम। मगर अच्छा है। और अच्छा हो सकता है। सृजन की अपार संभावना रहती है। कुछ कार्यक्रम बोझिल भी हैं। लेकिन लोकसभा टीवी आज के समय में एक विकल्प तो है ही। टीवी के आलोचक भी बाज़ारू हो गए हैं। वो अच्छे कार्यक्रमों को नहीं ढूंढते। वो भी बेकार कार्यक्रमों पर ही बार-बार लिखते रहते हैं। शायद हम गरियाने में ज्यादा साधक लगते हैं,सराहना करने में कम। कई लाइफस्टाइल चैनलों में अच्छे कार्यक्रम आने लगे हैं।
लोकसभा टीवी के कई कार्यक्रम इस धारणा को तोड़ते हैं कि आप उनके स्टुडियो में बैठकर सरकार या नौकरशाही की आलोचना नहीं कर सकते। सुनीत के जवाब में सुबोध गुप्ता खुलकर ललित कला अकादमियों की फिज़ूल की नौकरशाही पर हमले करते हैं। इसे दिखाया भी जाता है। सुबोध कहते हैं कि भारत में लोग कला की बात नहीं करते हैं। कितने की बिकी यही पूछते रहते हैं। हद है। सुनीत मुस्कुराते रहते हैं। उनके जवाब को स्वीकार करते हैं। निजी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम एंकर के परफार्मेंस के लिए होता है। वो जवाब सुनने के लिए नहीं बल्कि परफार्म करने के लिए बैठा रहता है। सुनीत इस तरह के दबावों मुक्त हैं। वो बस हैं अपने सवालों के साथ। उनके लिए सुबोध गुप्ता महत्वपूर्ण हैं न कि वे खुद। सुनीत के एक सवाल के जवाब में सुबोघ गुप्ता ने कहा उन्हें नया नया आइडिया उत्साहित और प्रेरित करता है। निजी चैनलों को प्रेरणा कहां से मिलती है? एक दूसरे के कार्यक्रम से चुराने से। लोकसभा टीवी के सामने भी कम चुनौती नहीं है। उनके पास एक मौका है। वहां काम कर रहे पत्रकार,संपादक जब तक मौका मिले अच्छी रचना करें। नए प्रयोग करें। अपनी आज़ादी का बेहतर इस्तमाल करें। आलस्य न करें। आप अच्छे हैं सिर्फ इसी दलील से कोई नहीं देखेगा। आपको अच्छा होने का सबूत भी देना होगा। रोल मॉडल बन कर।
चलने का अधिकार
क्या आपको नहीं लगता कि चलने का भी अधिकार होना चाहिए? क्या कभी हमने सोचा है कि ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों की गतिशीलता का माध्यम क्या होगा? क्या कभी हमने सोचा है कि शहर के भीतर आर्थिक रूप से चलने की अक्षमता ने लाखों लोगों को आर्थिक अवसरों से दूर रखा है और घर होते हुए भी बेघर बनाया है? ग्रामीण और शहरी ग़रीबों और बेघरों को सामाजिक सुरक्षा के तहत मिलने वाले अधिकारों के तहत चलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए।
इन सवालों से टकराने का मौका मिला पिछले एक साल में। दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए ऐसे कई लोग मिले जो चलने में आर्थिक रूप से लाचार हैं। पश्चिम दिल्ली के बवाना और सावदा घेवरा में दिल्ली भर से उजाड़े गए लोगों को बसाया गया है। ज़्यादातर के लिए काम करने के जगह की दूरी पचीस से तीस किमी हो गई है। दक्षिण दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट के पास की झुग्गी से उज़ड़े परिवार को यहां बसाया गया तो उनका मुखिया बेघर हो गया। राजीव गांधी आवास योजना के तहत घर मिलने के बाद भी ज़रीना के पति हफ्ते में एक दिन घर आते हैं। बाकी दिन बेघरों की तरह पटरियों पर सोते हैं क्योंकि घर आने के लिए हर दिन पचास रुपये बस का किराया नहीं दे सकते। पांच लोगों के परिवार का मुखिया महीने में पंद्रह सौ रुपये बस में खर्च करेगा जो बाकी सदस्यों की गतिशीलता भी प्रभावित होगी। लिहाज़ा घर वाले बेघरों की संख्या बढ़ती जा रही है।
इसी तरह दिल्ली शहर में कई लोग साइकिल चलाते मिलेंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए नहीं बल्कि किराया बचाने के लिए। हर दिन तीन से चार घंटे लगाकर पंद्रह से बीस किमी की दूरी साइकिल से तय करते हैं। कई लोग तीन चार स्टॉप तक पैदल चलते हैं ताकि बस का किराया बचा सकें। उस पर भी सरकार ने फुटपाथ और साइकिल ट्रैक दोनों खत्म कर दिये हैं। वैसे भी अलग से साइकिल ट्रैक बनाने का मुद्दा इस देश में सिर्फ दिल्ली में ही उठता है। मुंबई, जयपुर,भोपाल,लखनऊ में क्यों नहीं उठता? जबकि सभी शहरों का विस्तार हुआ है और शहर के भीतर की दूरियां पहले से काफी बढ़ गईं हैं। मेट्रो ने इस स्थिति को और भयानक बनाया है। ग़रीबों को तीव्र गतिशीलता से वंचित किया है। मेट्रो में किसी तरह की रियायत नहीं है। मेट्रो के पास बनी झुग्गियों में गया। वहां के लोग मेट्रो को अफसोस के रूप में देखते हैं। देश के किसी भी ग्रामीण इलाके में चले जाइये किराया बचाने के लिए लाखों लोग हर दिन जान पर खेल कर बस से लेकर ऑटो में लटक कर सफर करते हैं। किसी भी शहर में पचास पचीस लोग टाटा 407 में भी खड़े होकर सफर करते दिख जायेंगे। इनके पास किराये के पैसे नहीं होते इसलिए दो या पांच रुपया देकर खड़े होकर अपने काम या रहने की जगह पर पहुंचते हैं। गांव से शहर, शहर से महानगर पलायन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग साहूकारों की चपेट में भी आ रहे हैं।
हमारे देश में तीस करोड़ से ज्यादा लोग ग़रीब बताये जाते हैं। मुझे हैरानी होती है कि अभी तक इनके चलने-फिरने के अधिकार के बारे में क्यों नहीं सोचा गया? क्यों सरकार ने बीपीएल कार्डधारियों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा का एलान नहीं करती है? जवाहर लाला नेहरू नेशनल अर्बन रिनुअल मिशन के तहत सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने की बातें कहीं गईं हैं। इसके तहत कई शहरों को बस के लिए फंड दिए गए हैं। आप अपने शहर की बसों पर जेएनएनयूआरएम लिखा देख सकते हैं। ये सारी सुविधा पब्लिक के लिए है तो ग़रीब पब्लिक को क्यों वंचित रखा जा रहा है।
दिल्ली शहर में ऐसे सैंकड़ों लोगों से मुलाकात हुई जो सरकारी पैमाने से ग़रीब नहीं हैं मगर चलने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। दिल्ली परिवहन निगम के एक टिकट इंस्पेक्टर ने बताया कि बेटिकट यात्रियों में ज्यादातर वही लोग होते हैं जो पंद्रह रुपये का टिकट नहीं ख़रीद सकते। हज़ारों की संख्या में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड किराया लेने में सक्षम नहीं है। उनकी तनख्वाह पांच या छह हज़ार से ज्यादा नहीं है। बल्कि कई मामलों में इससे भी कम होती है। लिहाज़ा वो वर्दी पहनकर भी पचीस रुपये का टिकट नहीं ले पाते। उसी तरह हिन्दुस्तान में रिटेल क्रांति करवाने वाले लोगों को पता भी नहीं होगा कि दक्षिण दिल्ली के ही तमाम मॉल में काम करने वाले कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा बस में बिना टिकट सफर करने के लिए मजबूर है। सरकार या नीतियां बनाने वालों को इल्म नहीं है। शहरी क्षेत्रों में राजनीति करने वाले लोगों को भी इस तरह के मुद्दों को परखने के लिए वक्त नहीं है। ममता बनर्जी अच्छा खासा कमाने वाले पत्रकारों को परिवार के साथ साल में दो बार रेल यात्राएं करने की छूट देती हैं। वाहवाही लूटने के लिए। ग़रीबों को ऐसी छूट मिलेगी तो वाहवाही भी मिलेगी और वोट भी।
सरकारी बसों में स्वतंत्रता सेनानी, विकलांग, मान्यता प्राप्त पत्रकार, सांसद और विधायकों को मुफ्त आरक्षित सीटें देती है। इनमें से पहले दो को छोड़ दें तो बाकी तीन कैटगरी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। बीस लाख की कार में चलने वाला कौन सा सांसद या विधायक अब सरकारी बसों में चलता है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों में आम लोगो के लिए नॉन एसी बस का मासिक रियायती पास 815 रुपये का बनता है। अगर आप मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं तो यही पास 100 रुपये का बनता है। फिर इसी दलील से मान्यता प्राप्त ग़रीबों को बस और ट्रेन में चलने के लिए रियायती या मुफ्त का पास क्यों न हो? बस या ट्रेन में रियायत मिल सकती है तो मेट्रों में क्यों न मिले?
शहरी ग़रीबों या बीपीएलकार्ड वालों के लिए मेट्रो में भी फ्री कार्ड होना चाहिए। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट अस्पतालों में ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए बिस्तर आरक्षित है। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट स्कूलों में ग़रीबों के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित हैं। अदालतें भी इसके लागू होने की खोज खबर लेती रहती हैं तो उनकी निगाह से भी ग़रीबों के चलने का अधिकार कैसे छूट गया।
(साभार-राजस्थान पत्रिका)
इन सवालों से टकराने का मौका मिला पिछले एक साल में। दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए ऐसे कई लोग मिले जो चलने में आर्थिक रूप से लाचार हैं। पश्चिम दिल्ली के बवाना और सावदा घेवरा में दिल्ली भर से उजाड़े गए लोगों को बसाया गया है। ज़्यादातर के लिए काम करने के जगह की दूरी पचीस से तीस किमी हो गई है। दक्षिण दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट के पास की झुग्गी से उज़ड़े परिवार को यहां बसाया गया तो उनका मुखिया बेघर हो गया। राजीव गांधी आवास योजना के तहत घर मिलने के बाद भी ज़रीना के पति हफ्ते में एक दिन घर आते हैं। बाकी दिन बेघरों की तरह पटरियों पर सोते हैं क्योंकि घर आने के लिए हर दिन पचास रुपये बस का किराया नहीं दे सकते। पांच लोगों के परिवार का मुखिया महीने में पंद्रह सौ रुपये बस में खर्च करेगा जो बाकी सदस्यों की गतिशीलता भी प्रभावित होगी। लिहाज़ा घर वाले बेघरों की संख्या बढ़ती जा रही है।
इसी तरह दिल्ली शहर में कई लोग साइकिल चलाते मिलेंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए नहीं बल्कि किराया बचाने के लिए। हर दिन तीन से चार घंटे लगाकर पंद्रह से बीस किमी की दूरी साइकिल से तय करते हैं। कई लोग तीन चार स्टॉप तक पैदल चलते हैं ताकि बस का किराया बचा सकें। उस पर भी सरकार ने फुटपाथ और साइकिल ट्रैक दोनों खत्म कर दिये हैं। वैसे भी अलग से साइकिल ट्रैक बनाने का मुद्दा इस देश में सिर्फ दिल्ली में ही उठता है। मुंबई, जयपुर,भोपाल,लखनऊ में क्यों नहीं उठता? जबकि सभी शहरों का विस्तार हुआ है और शहर के भीतर की दूरियां पहले से काफी बढ़ गईं हैं। मेट्रो ने इस स्थिति को और भयानक बनाया है। ग़रीबों को तीव्र गतिशीलता से वंचित किया है। मेट्रो में किसी तरह की रियायत नहीं है। मेट्रो के पास बनी झुग्गियों में गया। वहां के लोग मेट्रो को अफसोस के रूप में देखते हैं। देश के किसी भी ग्रामीण इलाके में चले जाइये किराया बचाने के लिए लाखों लोग हर दिन जान पर खेल कर बस से लेकर ऑटो में लटक कर सफर करते हैं। किसी भी शहर में पचास पचीस लोग टाटा 407 में भी खड़े होकर सफर करते दिख जायेंगे। इनके पास किराये के पैसे नहीं होते इसलिए दो या पांच रुपया देकर खड़े होकर अपने काम या रहने की जगह पर पहुंचते हैं। गांव से शहर, शहर से महानगर पलायन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग साहूकारों की चपेट में भी आ रहे हैं।
हमारे देश में तीस करोड़ से ज्यादा लोग ग़रीब बताये जाते हैं। मुझे हैरानी होती है कि अभी तक इनके चलने-फिरने के अधिकार के बारे में क्यों नहीं सोचा गया? क्यों सरकार ने बीपीएल कार्डधारियों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा का एलान नहीं करती है? जवाहर लाला नेहरू नेशनल अर्बन रिनुअल मिशन के तहत सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने की बातें कहीं गईं हैं। इसके तहत कई शहरों को बस के लिए फंड दिए गए हैं। आप अपने शहर की बसों पर जेएनएनयूआरएम लिखा देख सकते हैं। ये सारी सुविधा पब्लिक के लिए है तो ग़रीब पब्लिक को क्यों वंचित रखा जा रहा है।
दिल्ली शहर में ऐसे सैंकड़ों लोगों से मुलाकात हुई जो सरकारी पैमाने से ग़रीब नहीं हैं मगर चलने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। दिल्ली परिवहन निगम के एक टिकट इंस्पेक्टर ने बताया कि बेटिकट यात्रियों में ज्यादातर वही लोग होते हैं जो पंद्रह रुपये का टिकट नहीं ख़रीद सकते। हज़ारों की संख्या में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड किराया लेने में सक्षम नहीं है। उनकी तनख्वाह पांच या छह हज़ार से ज्यादा नहीं है। बल्कि कई मामलों में इससे भी कम होती है। लिहाज़ा वो वर्दी पहनकर भी पचीस रुपये का टिकट नहीं ले पाते। उसी तरह हिन्दुस्तान में रिटेल क्रांति करवाने वाले लोगों को पता भी नहीं होगा कि दक्षिण दिल्ली के ही तमाम मॉल में काम करने वाले कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा बस में बिना टिकट सफर करने के लिए मजबूर है। सरकार या नीतियां बनाने वालों को इल्म नहीं है। शहरी क्षेत्रों में राजनीति करने वाले लोगों को भी इस तरह के मुद्दों को परखने के लिए वक्त नहीं है। ममता बनर्जी अच्छा खासा कमाने वाले पत्रकारों को परिवार के साथ साल में दो बार रेल यात्राएं करने की छूट देती हैं। वाहवाही लूटने के लिए। ग़रीबों को ऐसी छूट मिलेगी तो वाहवाही भी मिलेगी और वोट भी।
सरकारी बसों में स्वतंत्रता सेनानी, विकलांग, मान्यता प्राप्त पत्रकार, सांसद और विधायकों को मुफ्त आरक्षित सीटें देती है। इनमें से पहले दो को छोड़ दें तो बाकी तीन कैटगरी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। बीस लाख की कार में चलने वाला कौन सा सांसद या विधायक अब सरकारी बसों में चलता है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों में आम लोगो के लिए नॉन एसी बस का मासिक रियायती पास 815 रुपये का बनता है। अगर आप मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं तो यही पास 100 रुपये का बनता है। फिर इसी दलील से मान्यता प्राप्त ग़रीबों को बस और ट्रेन में चलने के लिए रियायती या मुफ्त का पास क्यों न हो? बस या ट्रेन में रियायत मिल सकती है तो मेट्रों में क्यों न मिले?
शहरी ग़रीबों या बीपीएलकार्ड वालों के लिए मेट्रो में भी फ्री कार्ड होना चाहिए। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट अस्पतालों में ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए बिस्तर आरक्षित है। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट स्कूलों में ग़रीबों के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित हैं। अदालतें भी इसके लागू होने की खोज खबर लेती रहती हैं तो उनकी निगाह से भी ग़रीबों के चलने का अधिकार कैसे छूट गया।
(साभार-राजस्थान पत्रिका)
लघु प्रेम कथा-लप्रेक (फेसबुक फिक्शन)
फेसबुक के सीमित स्पेस और दिल्ली के असीमित स्पेस में प्रेम कथाओं का मतलब कई मोहल्लों से होकर गुज़रना है। हर दिन फैल जाने वाली दिल्ली में प्रेम का एक कोना कोई न कोई प्रेमी जोड़ा अपने लिए रच ही लेता है। ये वो कहानियां हैं जो काल्पनिक पात्रों के सहारे वास्तविक स्पेस में घटित हो रही हैं। हो चुकी होंगी। होने वाली होंगी। मालूम नहीं। यही सोचते-सोचते फेसबुक पर लघु प्रेम कथा लिखने लगा। जिसका संक्षिप्त नाम लप्रेक है। जैसा कि मेरी हर रचना के साथ है। एक ही शर्त होती है। ये सभी कालजयी नहीं हैं। महान नहीं हैं। फालतू वक्त की बेचैनियों को संभालने में साथी रही हैं। आप कस्बा या फेसबुक कहीं पर इसे पढ़ सकते हैं। सिर्फ प्रेमियों के मन में घुस कर शांत नहीं रह जाइयेगा। दिल्ली भी घूमिएगा। कथाकार यही चाहता है। फेसबुक का स्टेटस हमारा मानस मोहल्ला है। हम यहीं पर आकर कुछ भी बक देते हैं। दिल की बात से लेकर दिल्ली की परेशानी तक। वहीं से प्रजनित यह प्रेम कथा यहां पर लाई गई है। व्यापक वितरण के लिए।
(1)
बहुत देर से जाम में फंसा वो तेज़ी से रन लेने की ख्वाहिशों से भर गया। हर रन जान की बाज़ी लगाकर बनाने लगा। स्टेडियम से आ रही तालियों की आवाज़ में एक आवाज़ ताली वाली की भी थी। गाड़ियां वहीं की वहीं खड़ी रह गईं। मास्टर के गुस्से से पसीना आने लगा था। प्रेम पत्र को एक कार्ड कंपनी ने छाप कर बेचने का एलान कर दिया। फिर भी भागा जा रहा था। जाम में फंसने के बाद भी भागने के अहसास से भागा जा रहा था।
(2)
रेडियो की आवाज़ आने लगी थी। उसकी कार धौलाकुआं से मुड़ कर एम्स की तरफ दौड़ने लगी थी। लौटने के फैसले का साहस नहीं जुटा सकी। न ही वो मोतीबाग से यू टर्न लेकर उसके पीछे आया। एक दूसरे के आने और मनाने के इंतज़ार में दोनों बहुत दूर चले गए। गाज़ीपुर पहुंच कर सामने गाज़ियाबाद था। शिवमूर्ति के बाद गुड़गांव आ चुका था। शहरों की प्रेम कहानियां ऐसी ही होती हैं। ट्रैफिक में शुरू होती है और ट्रैफिक में गुम हो जाती है।(लघु प्रेम कथा)
(3)
मोबाइल के इनबॉक्स में सेव मैसेज को वो आधी रात ही भेज देना चाहती थी। पता नहीं इस वक्त फोन उसके सिरहाने होगा या नहीं। क्या पता कोई और पढ़ ले और डिलीट कर दे। क्या पता वो पढ़ ले लेकिन किसी और को फारवर्ड कर दे। इसी उधेड़बुन में पंद्रह दिनों बाद इनबॉक्स में सेव मैसेज अपने आप उड़ गए। बाद में उसे याद ही नहीं आया कि कहना क्या चाहती थी। बहुत दिनों से उसका इनबॉक्स खाली है। न उसने लिखा न उसका आया। (लघु प्रेम कथा)
(4)
मायापुरी से मेट्रो में चढ़ते ही वो सीपी के सेंट्रल पार्क में होने के ख़्यालों से भर गया। अलकनंदा से चलते वक्त उसने हर दुकान के शीशे में खुद को देख लिया था। दोनों के साथ पूरी दिल्ली मिल रही थी। सेंट्रल पार्क में पहुंचते ही पहले से तय खंभे पर कोई और जोड़ा एक दूसरे को छूने की कोशिश कर रहा था। वक्त पर आ कर भी दोनों लेट हो चुके थे। दोनों ने फैसला किया। कल फिर मिलेंगे। यहीं मगर इस जोड़े से पहले।(लघु प्रेम कथा)
(5)
खानपुर से बदरपुर की बस में ढूंसी भीड़ ने दोनों को ऐसे शहर में पहुंचा दिया जहां उनके अलावा सब अजनबी थे। हर स्टॉप पर चढ़ने वाली भीड़ के धक्के से दोनों और करीब होते जा रहे थे। बस भाग तो रही थी सीधी मगर उन्हें हर बार लगा कि किसी मोड़ पर तेज़ी से मुड़ रही है और गिरने से बचाने के लिए एक दूसरे को थामना ज़रूरी है। शहर में प्रेम के ऐसे कोने अपने आप बन जाया करते हैं। भीड़ में घूरे जाने के बाद भी (लघु प्रेम कथा)
(6)
अक्सर साउथ एक्स पहुंच कर कुछ हो जाता था। मज़ा आने लगता था कि हर बस को छोड़ने में। सेल की भीड़ में खो जाने का लुत्फ। सस्ते सामानों से खुद को और मुनिरका के घर को सजाने का सपना, हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता। पूरा करने के लिए अगले दिन दोनों यही करते। हर बस को छोड़ने लगते।(लघु प्रेम कथा)
(7)
कार में रेडियो शोर करने लगा। मुनाफ़ आखिरी गेंद के लिए दौड़ चला था। दोनों भीतर से खामोश हो गए। कमेंटेटर की उत्तेजना के बीच दोनों ने खुद को संभालने का नाटक कर लिया था। आंखें मूंद कर बाहों में भर लिया एक दूसरे को। जैसे गेंद कार के शीशे पर आ लगने वाली हो। दोनों एक दूसरे से जकड़े ही रह गए। जामिया के बाहर लोग नाच रहे थे। मैच टाई हो चुका था।(लघु प्रेम कथा)
(8)
उस रोज़ के बाद वो अक्सर मुखर्जी नगर में भटकती दिख जाती। उससे नोट्स हड़पने के बाद उसने अपना फ्लैट बदल लिया था। वो आदत से मजबूर हो चुकी थी। मुखर्जी नगर का हर कमरा अंधेरा लगता जिसमें वो अपने प्रेम के उजाले से झांका करती। लेकिन वो अब हकीकतनगर के एक कमरे में उसके ही लिखे नोट्स को रट रहा था। तय कर लिया था। पीटी के टाइम में प्रेमी नहीं होना है। दीवार पर हसीना की तस्वीर नहीं थी। टाइम टेबल था। उसके बाप का सपना था। (लप्रेक)
(9)
बुराड़ी से वो पैदल ही चल निकला,आईएसबीटी की तरफ। खान मार्केट की एनडीएमसी कालोनी से वो पुराना किला की तरफ भागी, ऑटो के लिए। इसी आपाधापी में उसका फोन पुराना किला के पास गिर गया। वहां से निकलते एक जोड़े ने फोन में आए मैसेज पढ़ लिए। चलो हम भी इनके पीछे भाग जाते हैं। दिल्ली को खाप बनने के लिए छोड़ जाते हैं। (लप्रेक)
(10)
सराय जुलैना की हसीना थी वो। एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती दिल के मरीज़ भी झांका करते, कैथ लैब की खिड़की से। छत पर आते ही उसके लोटस टेंपल तक हंगामा हो जाता था। चिराग दिल्ली का राजकुमार भिड़ गया मसीहगढ़ के प्रेमी से। होली फैमिली में दोनों भर्ती हो गए। तय नहीं हो सका कि वो किसकी है। नवभारत टाइम्स ने इस ख़बर को बॉटम में छाप कर खूब चटकारे लिए। पंजाब केसरी पीछे रह गया। (लप्रेक)
(11)
खिड़की के पीछे रखी चाबी से ताला खोल वो अंदर आ गई। किसी जासूस निगाह से कमरे को देखने लगी। उसके बक्से में वो तमाम ख़त मिले। जो आदमी इतने संबंधों में एक भी नहीं संभाल पाया वो उनके ख़तों को क्यों सहेजे हुए हैं। इसी उधेड़बुन में उसने एक खत लिखकर बक्से को बंद कर दिया। मैं जा रही हूं। हो सके तो मेरे ख़त को भी संभाल कर रखना। तुम्हें पता होगा पहले की तमाम प्रेमिकाएं मुझसे बेहतर लिखती हैं। मैंने जानबूझ कर कमतर लिखा है।(लप्रेक)
(12)
दक्षिण दिल्ली के महारानी बाग के पास का तैमूर नगर किस तैमूर की याद में बना है।पूछते ही वो भड़क गई। इतिहास के चक्कर में रहोगे तो प्रोफेसर बना कर सेमिनारों में गाड़ दिए जाओगे।चलो यहां से।किलोकरी गांव के पीछे से निकल कर यमुना के किनारे चलते हैं।अब बारी उसकी थी। वहां क्या करोगी।ओखला वालों ने नदी में मकान बना लिये हैं।अतिक्रमण सिर्फ प्रेम का नहीं मकानों,नदियों और हवाओं तक का हो चुका है। चैट करना सीख लो।(लप्रेक)
(13)
लाश बन कर वो बेवजन उसके बैग में घूमते हुए जाने किस सफर में स्टेशन पर छूट गई। किसके लिए बच गया था उसके बदन का गोदना। इस शहर में जिसे चाहना होता है,उसी के हाथों कटना होता है। टुकड़ों-टुकड़ों में बंटते हुए वो लड़की किन ख्यालों में खोई रही होगी और वो लड़का किसके ख्यालों से भाग रहा होगा। इश्क़ क़ातिल बना दे अच्छा, महबूब का क़त्ल हो जाए तो क्या अच्छा। प्रेमियों के बैग में क्या क्या होता है।(लप्रेक)
(14)
माइनस मुद्रिका में पीछे की किनारे वाली सीट मिल गई।उसने उसके कंधे पर सर टिका दिया।कब नींद आ गई और कब सरायकाले खां,आश्रम,धौलाकुआं,और वज़ीराबाद होते हुए जुबली हास्टल आ गया पता ही नहीं चला।वो खोई रही या सोई रही यह भी जान नहीं सका। वो तो बस उसकी तरफ आती हर निगाह से टकराने में भिड़ा रहा। उतरते वक्त उसने ठीक कहा,तुम मेरी कम दुनिया की फिक्र ज्यादा करते हो।कम से कम बैग के नीचे मेरा हाथ तो थामे रह सकते थे।बुज़दिल।(लप्रेक)
(15)
पहली बार दोनों अग्रवाल स्वीट्स में मिले। इसलिए वो उसे कभी डोडा तो कभी गुलाब जामुन बुलाने लगी। लाल रंग के इस बोर्ड को दोनों ने अपने इश्क का नेमप्लेट बना लिया। खाप वालों ने शहर के तमाम अग्रवाल स्वीट्स पर पहरा बिठा दिया। दोनों सुंदर नगर के नत्थू स्वीट्स कार्नर में मिलने लगे। उसने मिठाइयों के नाम से बुलाना छोड़ दिया। पूछने पर बस यही कहा,वो जगह अपनी थी। ये जगह अजनबी है। अब तुम्हारा नाम ही भरोसा है।(लप्रेक)
(16)
अच्छा है न। मल्टीप्लेक्स ने मार्निंग शो का मतलब बदल दिया। वर्ना तो आना और निकलना ही मुश्किल था। देखो अब मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं। अक्षय कुमार को जी भर कूदने दो। इस वक्त हॉल में हमीं हैं। हमारे जैसे कुछ और जोड़े। बस। खाली कुर्सियों का शुक्रिया। तुम हमेशा अंधेरे में मुझे क्यों खोजते हो? इस एक सवाल ने सिनेमा हॉल को थाने में बदल दिया। वो कॉफी लाने चला गया।(लप्रेक)
(17)
बिस्तर के नीचे चुरा कर रखे गए नोट्स को उसने देख लिया। एक-एक पन्ने की तरह करवटें बदलने लगी। इम्तहान के करीब वाले महीने में उनका प्यार फोटोकॉपी मशीन से निकले नोट्स के पन्ने पर कालिख की तरह धुंधला हो गया। वो भी असली नोट्स बक्से में रखता और किसी दूसरे के नोट्स पर अपना नाम लिख कर उसकी फोटोकॉपी बिस्तर के नीचे। इम्तहानों के मौसम में प्रेम कहानियों के एंगल बदल जाया करते हैं। इश्क आईने में नज़र नहीं आता।(लप्रेक)
(18)
त्यागराज नगर से साउथ एक्स होते हुए दोनों पैदल ही दौड़ पड़े दिल्ली हाट की तरफ। दूर से ही बांसुरी, ढोलक की आवाज़ आने लगी। कश्मीरी व्यंजनों की महक सांसों से पेट में उतरने लगी। अंदर आते ही उसकी निगाह मणिपुरी शॉल पर टिक गई। वो खादी की सदरी में खो गया। दोनों शॉल और सदरी में ख़ुद को देखने लगे। एक दूसरे को देखना भूल गए।(लप्रेक)
(19)
मार्च के महीने में हवाएं गरम होने लगी थीं। दोनों की ज़िद कि ऑटोवाला दोनों तरफ का पर्दा गिरा दे। ऑटो के शोर में भी भीतर गज़ब की खामोशी छा गई। चालक की एक आंख बैक मिरर पर टिक गई। दोनों बैक मिरर से बचने के लिए एक दूसरे में छिपने लगे। चालक ने मीटर का हिसाब छोड़ दिया। ऑटो तेज़ी से शंकर रोड की तरफ दौड़ने लगा।(लप्रेक)
(20)
वेंकटेश्वर कॉलेज। क्लास की बेंच पर वो उसका नाम लिखने लगी। रेनॉल्ड पेन की निब घिस-घिस कर। महीने भर में सारे बेंच पर एक नाम उकेर कर रख दिया। तमाम तरह की गालियों और फूलों के बीच बेंच पर नीले रंग से लिखे उस एक नाम पर किसी की नज़र नहीं गई। कोई समझा क्यों नहीं कि इतिहास की पढ़ाई ऐसे ही होती है। दस्तावेज़ों में नाम उकेर कर।वो दीवारों,लकड़ियों,पन्नों को अपना साक्षी बनाने लगी।(लप्रेक)
(21)
मगध एक्सप्रेस,बोगी नंबर एस वन।दिल्ली से पटना लौटते वक्त उसके हाथों में बर्नार्ड शॉ देखकर वहां से कट लिया।लगा कि इंग्लिश झाड़ेगी। दूसरी बोगियों में घूम-घूम कर प्रेमचंद पढ़ने वाली ढूंढने लगा।पटना से आते वक्त तो कई लड़कियों के हाथ में गृहशोभा तक दिखा था।सोचते-सोचते बेचारा कर्नल रंजीत पढ़ने लगा। लफुआ लोगों का लैंग्वेज प्रॉब्लम अलग होता है(लप्रेक)
(22)
गोला देने गया होगा। दोस्तों की खीझ को छोड़ वो रोज़ 4 बजे पी जी वूमेन्स हॉस्टल की तरफ चल देता। हॉस्टल के बाहर जीवन,ज़मीन और जानम के विमर्श में मार्क्सवाद ठेलता रहता। कभी खुद को गंगा पार का ज़मींदार बताता तो कभी ग़रीब। दिल्ली की लड़कियों में सुनने का धीरज न होता तो बिहार यूपी से आए प्रवासी बांकुरे गोलाबाज़ न हो पाते। 5 बजते ही वो हर बार यही कहती।बहुत कंफ्यूजिंग है बट इंटरेस्टिंग हैं। वो खुश हो कर लौट आता।(लप्रेक)
(23)
आर्ची समझ गया। बेज़ुबान प्रेमियों को एक कार्ड की ज़रूरत थी। पर यह भी समझ आ गया कि नाकाम प्रेमियों के भाई-बहन में बदल जाने पर कार्ड की ज़रूरत पड़ेगी। बहनों को दिये जाने वाले कार्ड आकार और दाम में गर्लफ्रैंड वाले कार्ड जैसे ही होते। साउथ एक्स के आर्ची कार्नर में न जाने कितने रिश्ते इधर से उधर होते रहे। राखी के दिन आर्ची की दुकानें खाली तो रह जातीं मगर साल भर इन कार्डों की बिक्री कम नहीं होती।(लप्रेक)
(24)
पैदल चलने वाले जोड़े अक्सर कार में बैठे जोड़े से जला करते। खालसा कॉलेज से निकलती कारों की ढिन चिकवा म्यूज़िक और सामने की सीट पर बैठी बाला। माल रोड तक चलते-चलते वो अमीरी के साइड इफेक्ट पर थीसीस रच देता। आर्थिक विषमता प्रेम के मायने बदल देती है। ग़रीबी रेखा से नीचे वालों का प्यार खालसा से निकलती कार वाले क्या जानेंगे। कमलानगर जाकर चाचा के यहां आइसक्रीम खा लेना ही इश्क का इम्तहान नहीं है।(लप्रेक)
(1)
बहुत देर से जाम में फंसा वो तेज़ी से रन लेने की ख्वाहिशों से भर गया। हर रन जान की बाज़ी लगाकर बनाने लगा। स्टेडियम से आ रही तालियों की आवाज़ में एक आवाज़ ताली वाली की भी थी। गाड़ियां वहीं की वहीं खड़ी रह गईं। मास्टर के गुस्से से पसीना आने लगा था। प्रेम पत्र को एक कार्ड कंपनी ने छाप कर बेचने का एलान कर दिया। फिर भी भागा जा रहा था। जाम में फंसने के बाद भी भागने के अहसास से भागा जा रहा था।
(2)
रेडियो की आवाज़ आने लगी थी। उसकी कार धौलाकुआं से मुड़ कर एम्स की तरफ दौड़ने लगी थी। लौटने के फैसले का साहस नहीं जुटा सकी। न ही वो मोतीबाग से यू टर्न लेकर उसके पीछे आया। एक दूसरे के आने और मनाने के इंतज़ार में दोनों बहुत दूर चले गए। गाज़ीपुर पहुंच कर सामने गाज़ियाबाद था। शिवमूर्ति के बाद गुड़गांव आ चुका था। शहरों की प्रेम कहानियां ऐसी ही होती हैं। ट्रैफिक में शुरू होती है और ट्रैफिक में गुम हो जाती है।(लघु प्रेम कथा)
(3)
मोबाइल के इनबॉक्स में सेव मैसेज को वो आधी रात ही भेज देना चाहती थी। पता नहीं इस वक्त फोन उसके सिरहाने होगा या नहीं। क्या पता कोई और पढ़ ले और डिलीट कर दे। क्या पता वो पढ़ ले लेकिन किसी और को फारवर्ड कर दे। इसी उधेड़बुन में पंद्रह दिनों बाद इनबॉक्स में सेव मैसेज अपने आप उड़ गए। बाद में उसे याद ही नहीं आया कि कहना क्या चाहती थी। बहुत दिनों से उसका इनबॉक्स खाली है। न उसने लिखा न उसका आया। (लघु प्रेम कथा)
(4)
मायापुरी से मेट्रो में चढ़ते ही वो सीपी के सेंट्रल पार्क में होने के ख़्यालों से भर गया। अलकनंदा से चलते वक्त उसने हर दुकान के शीशे में खुद को देख लिया था। दोनों के साथ पूरी दिल्ली मिल रही थी। सेंट्रल पार्क में पहुंचते ही पहले से तय खंभे पर कोई और जोड़ा एक दूसरे को छूने की कोशिश कर रहा था। वक्त पर आ कर भी दोनों लेट हो चुके थे। दोनों ने फैसला किया। कल फिर मिलेंगे। यहीं मगर इस जोड़े से पहले।(लघु प्रेम कथा)
(5)
खानपुर से बदरपुर की बस में ढूंसी भीड़ ने दोनों को ऐसे शहर में पहुंचा दिया जहां उनके अलावा सब अजनबी थे। हर स्टॉप पर चढ़ने वाली भीड़ के धक्के से दोनों और करीब होते जा रहे थे। बस भाग तो रही थी सीधी मगर उन्हें हर बार लगा कि किसी मोड़ पर तेज़ी से मुड़ रही है और गिरने से बचाने के लिए एक दूसरे को थामना ज़रूरी है। शहर में प्रेम के ऐसे कोने अपने आप बन जाया करते हैं। भीड़ में घूरे जाने के बाद भी (लघु प्रेम कथा)
(6)
अक्सर साउथ एक्स पहुंच कर कुछ हो जाता था। मज़ा आने लगता था कि हर बस को छोड़ने में। सेल की भीड़ में खो जाने का लुत्फ। सस्ते सामानों से खुद को और मुनिरका के घर को सजाने का सपना, हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता। पूरा करने के लिए अगले दिन दोनों यही करते। हर बस को छोड़ने लगते।(लघु प्रेम कथा)
(7)
कार में रेडियो शोर करने लगा। मुनाफ़ आखिरी गेंद के लिए दौड़ चला था। दोनों भीतर से खामोश हो गए। कमेंटेटर की उत्तेजना के बीच दोनों ने खुद को संभालने का नाटक कर लिया था। आंखें मूंद कर बाहों में भर लिया एक दूसरे को। जैसे गेंद कार के शीशे पर आ लगने वाली हो। दोनों एक दूसरे से जकड़े ही रह गए। जामिया के बाहर लोग नाच रहे थे। मैच टाई हो चुका था।(लघु प्रेम कथा)
(8)
उस रोज़ के बाद वो अक्सर मुखर्जी नगर में भटकती दिख जाती। उससे नोट्स हड़पने के बाद उसने अपना फ्लैट बदल लिया था। वो आदत से मजबूर हो चुकी थी। मुखर्जी नगर का हर कमरा अंधेरा लगता जिसमें वो अपने प्रेम के उजाले से झांका करती। लेकिन वो अब हकीकतनगर के एक कमरे में उसके ही लिखे नोट्स को रट रहा था। तय कर लिया था। पीटी के टाइम में प्रेमी नहीं होना है। दीवार पर हसीना की तस्वीर नहीं थी। टाइम टेबल था। उसके बाप का सपना था। (लप्रेक)
(9)
बुराड़ी से वो पैदल ही चल निकला,आईएसबीटी की तरफ। खान मार्केट की एनडीएमसी कालोनी से वो पुराना किला की तरफ भागी, ऑटो के लिए। इसी आपाधापी में उसका फोन पुराना किला के पास गिर गया। वहां से निकलते एक जोड़े ने फोन में आए मैसेज पढ़ लिए। चलो हम भी इनके पीछे भाग जाते हैं। दिल्ली को खाप बनने के लिए छोड़ जाते हैं। (लप्रेक)
(10)
सराय जुलैना की हसीना थी वो। एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती दिल के मरीज़ भी झांका करते, कैथ लैब की खिड़की से। छत पर आते ही उसके लोटस टेंपल तक हंगामा हो जाता था। चिराग दिल्ली का राजकुमार भिड़ गया मसीहगढ़ के प्रेमी से। होली फैमिली में दोनों भर्ती हो गए। तय नहीं हो सका कि वो किसकी है। नवभारत टाइम्स ने इस ख़बर को बॉटम में छाप कर खूब चटकारे लिए। पंजाब केसरी पीछे रह गया। (लप्रेक)
(11)
खिड़की के पीछे रखी चाबी से ताला खोल वो अंदर आ गई। किसी जासूस निगाह से कमरे को देखने लगी। उसके बक्से में वो तमाम ख़त मिले। जो आदमी इतने संबंधों में एक भी नहीं संभाल पाया वो उनके ख़तों को क्यों सहेजे हुए हैं। इसी उधेड़बुन में उसने एक खत लिखकर बक्से को बंद कर दिया। मैं जा रही हूं। हो सके तो मेरे ख़त को भी संभाल कर रखना। तुम्हें पता होगा पहले की तमाम प्रेमिकाएं मुझसे बेहतर लिखती हैं। मैंने जानबूझ कर कमतर लिखा है।(लप्रेक)
(12)
दक्षिण दिल्ली के महारानी बाग के पास का तैमूर नगर किस तैमूर की याद में बना है।पूछते ही वो भड़क गई। इतिहास के चक्कर में रहोगे तो प्रोफेसर बना कर सेमिनारों में गाड़ दिए जाओगे।चलो यहां से।किलोकरी गांव के पीछे से निकल कर यमुना के किनारे चलते हैं।अब बारी उसकी थी। वहां क्या करोगी।ओखला वालों ने नदी में मकान बना लिये हैं।अतिक्रमण सिर्फ प्रेम का नहीं मकानों,नदियों और हवाओं तक का हो चुका है। चैट करना सीख लो।(लप्रेक)
(13)
लाश बन कर वो बेवजन उसके बैग में घूमते हुए जाने किस सफर में स्टेशन पर छूट गई। किसके लिए बच गया था उसके बदन का गोदना। इस शहर में जिसे चाहना होता है,उसी के हाथों कटना होता है। टुकड़ों-टुकड़ों में बंटते हुए वो लड़की किन ख्यालों में खोई रही होगी और वो लड़का किसके ख्यालों से भाग रहा होगा। इश्क़ क़ातिल बना दे अच्छा, महबूब का क़त्ल हो जाए तो क्या अच्छा। प्रेमियों के बैग में क्या क्या होता है।(लप्रेक)
(14)
माइनस मुद्रिका में पीछे की किनारे वाली सीट मिल गई।उसने उसके कंधे पर सर टिका दिया।कब नींद आ गई और कब सरायकाले खां,आश्रम,धौलाकुआं,और वज़ीराबाद होते हुए जुबली हास्टल आ गया पता ही नहीं चला।वो खोई रही या सोई रही यह भी जान नहीं सका। वो तो बस उसकी तरफ आती हर निगाह से टकराने में भिड़ा रहा। उतरते वक्त उसने ठीक कहा,तुम मेरी कम दुनिया की फिक्र ज्यादा करते हो।कम से कम बैग के नीचे मेरा हाथ तो थामे रह सकते थे।बुज़दिल।(लप्रेक)
(15)
पहली बार दोनों अग्रवाल स्वीट्स में मिले। इसलिए वो उसे कभी डोडा तो कभी गुलाब जामुन बुलाने लगी। लाल रंग के इस बोर्ड को दोनों ने अपने इश्क का नेमप्लेट बना लिया। खाप वालों ने शहर के तमाम अग्रवाल स्वीट्स पर पहरा बिठा दिया। दोनों सुंदर नगर के नत्थू स्वीट्स कार्नर में मिलने लगे। उसने मिठाइयों के नाम से बुलाना छोड़ दिया। पूछने पर बस यही कहा,वो जगह अपनी थी। ये जगह अजनबी है। अब तुम्हारा नाम ही भरोसा है।(लप्रेक)
(16)
अच्छा है न। मल्टीप्लेक्स ने मार्निंग शो का मतलब बदल दिया। वर्ना तो आना और निकलना ही मुश्किल था। देखो अब मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं। अक्षय कुमार को जी भर कूदने दो। इस वक्त हॉल में हमीं हैं। हमारे जैसे कुछ और जोड़े। बस। खाली कुर्सियों का शुक्रिया। तुम हमेशा अंधेरे में मुझे क्यों खोजते हो? इस एक सवाल ने सिनेमा हॉल को थाने में बदल दिया। वो कॉफी लाने चला गया।(लप्रेक)
(17)
बिस्तर के नीचे चुरा कर रखे गए नोट्स को उसने देख लिया। एक-एक पन्ने की तरह करवटें बदलने लगी। इम्तहान के करीब वाले महीने में उनका प्यार फोटोकॉपी मशीन से निकले नोट्स के पन्ने पर कालिख की तरह धुंधला हो गया। वो भी असली नोट्स बक्से में रखता और किसी दूसरे के नोट्स पर अपना नाम लिख कर उसकी फोटोकॉपी बिस्तर के नीचे। इम्तहानों के मौसम में प्रेम कहानियों के एंगल बदल जाया करते हैं। इश्क आईने में नज़र नहीं आता।(लप्रेक)
(18)
त्यागराज नगर से साउथ एक्स होते हुए दोनों पैदल ही दौड़ पड़े दिल्ली हाट की तरफ। दूर से ही बांसुरी, ढोलक की आवाज़ आने लगी। कश्मीरी व्यंजनों की महक सांसों से पेट में उतरने लगी। अंदर आते ही उसकी निगाह मणिपुरी शॉल पर टिक गई। वो खादी की सदरी में खो गया। दोनों शॉल और सदरी में ख़ुद को देखने लगे। एक दूसरे को देखना भूल गए।(लप्रेक)
(19)
मार्च के महीने में हवाएं गरम होने लगी थीं। दोनों की ज़िद कि ऑटोवाला दोनों तरफ का पर्दा गिरा दे। ऑटो के शोर में भी भीतर गज़ब की खामोशी छा गई। चालक की एक आंख बैक मिरर पर टिक गई। दोनों बैक मिरर से बचने के लिए एक दूसरे में छिपने लगे। चालक ने मीटर का हिसाब छोड़ दिया। ऑटो तेज़ी से शंकर रोड की तरफ दौड़ने लगा।(लप्रेक)
(20)
वेंकटेश्वर कॉलेज। क्लास की बेंच पर वो उसका नाम लिखने लगी। रेनॉल्ड पेन की निब घिस-घिस कर। महीने भर में सारे बेंच पर एक नाम उकेर कर रख दिया। तमाम तरह की गालियों और फूलों के बीच बेंच पर नीले रंग से लिखे उस एक नाम पर किसी की नज़र नहीं गई। कोई समझा क्यों नहीं कि इतिहास की पढ़ाई ऐसे ही होती है। दस्तावेज़ों में नाम उकेर कर।वो दीवारों,लकड़ियों,पन्नों को अपना साक्षी बनाने लगी।(लप्रेक)
(21)
मगध एक्सप्रेस,बोगी नंबर एस वन।दिल्ली से पटना लौटते वक्त उसके हाथों में बर्नार्ड शॉ देखकर वहां से कट लिया।लगा कि इंग्लिश झाड़ेगी। दूसरी बोगियों में घूम-घूम कर प्रेमचंद पढ़ने वाली ढूंढने लगा।पटना से आते वक्त तो कई लड़कियों के हाथ में गृहशोभा तक दिखा था।सोचते-सोचते बेचारा कर्नल रंजीत पढ़ने लगा। लफुआ लोगों का लैंग्वेज प्रॉब्लम अलग होता है(लप्रेक)
(22)
गोला देने गया होगा। दोस्तों की खीझ को छोड़ वो रोज़ 4 बजे पी जी वूमेन्स हॉस्टल की तरफ चल देता। हॉस्टल के बाहर जीवन,ज़मीन और जानम के विमर्श में मार्क्सवाद ठेलता रहता। कभी खुद को गंगा पार का ज़मींदार बताता तो कभी ग़रीब। दिल्ली की लड़कियों में सुनने का धीरज न होता तो बिहार यूपी से आए प्रवासी बांकुरे गोलाबाज़ न हो पाते। 5 बजते ही वो हर बार यही कहती।बहुत कंफ्यूजिंग है बट इंटरेस्टिंग हैं। वो खुश हो कर लौट आता।(लप्रेक)
(23)
आर्ची समझ गया। बेज़ुबान प्रेमियों को एक कार्ड की ज़रूरत थी। पर यह भी समझ आ गया कि नाकाम प्रेमियों के भाई-बहन में बदल जाने पर कार्ड की ज़रूरत पड़ेगी। बहनों को दिये जाने वाले कार्ड आकार और दाम में गर्लफ्रैंड वाले कार्ड जैसे ही होते। साउथ एक्स के आर्ची कार्नर में न जाने कितने रिश्ते इधर से उधर होते रहे। राखी के दिन आर्ची की दुकानें खाली तो रह जातीं मगर साल भर इन कार्डों की बिक्री कम नहीं होती।(लप्रेक)
(24)
पैदल चलने वाले जोड़े अक्सर कार में बैठे जोड़े से जला करते। खालसा कॉलेज से निकलती कारों की ढिन चिकवा म्यूज़िक और सामने की सीट पर बैठी बाला। माल रोड तक चलते-चलते वो अमीरी के साइड इफेक्ट पर थीसीस रच देता। आर्थिक विषमता प्रेम के मायने बदल देती है। ग़रीबी रेखा से नीचे वालों का प्यार खालसा से निकलती कार वाले क्या जानेंगे। कमलानगर जाकर चाचा के यहां आइसक्रीम खा लेना ही इश्क का इम्तहान नहीं है।(लप्रेक)
ग़ज़ल-तहसीन मुनव्वर
फिर वही भूली कहानी है क्या
फिर मैरी आँख में पानी है क्या
फिर मुझे उसने बुलाया क्यों है
फिर कोई बात सुनानी है क्या
ज़िन्दगी हो गयी सुनते सुनते
हम को यह मौत भी आनी है क्या
आज फिर मुसकुरा के देखा है
आज फिर आग लगानी है क्या
मुझ क्यों देख रहे हो ऐसे
मैरी तस्वीर बनानी है क्या
रोज़ क्यों गिर रही है उसकी पतंग
उस को दीवार गिरानी है क्या
फिर मैरी आँख में पानी है क्या
फिर मुझे उसने बुलाया क्यों है
फिर कोई बात सुनानी है क्या
ज़िन्दगी हो गयी सुनते सुनते
हम को यह मौत भी आनी है क्या
आज फिर मुसकुरा के देखा है
आज फिर आग लगानी है क्या
मुझ क्यों देख रहे हो ऐसे
मैरी तस्वीर बनानी है क्या
रोज़ क्यों गिर रही है उसकी पतंग
उस को दीवार गिरानी है क्या
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