एसएमएस की दो किताबें




दिल सा कोई कमीना नहीं...दिल तो बच्चा है जी..

इश्क की अनगिनत नाकाम कथाओं के इस देश में सामाजिक बंधनों को सहलाने वाली तमाम कथाएं, गाने और तस्वीरें मन को सहलाती हैं। शादी की दहलीज़ पर पहुंचने से अनगिनत प्रेम के पल भ्रूण हत्या के शिकार हो जाते हैं। अहसासों को गरम कर उन पर पानी डालने वाला हमारा समाज रिश्तों में बंधकर उसमें बुढ़ा कर मर जाने वाली प्रेम कहानियां पैदा करता है। इसीलिए फिल्मी परदे में प्रेम कथाओं का अनंत सफर जारी है। एक नई कथा आ गई है। विशाल भारद्वाज और अभिषेक चौबे लेकर आ रहे हैं। इश्किया। प्रोमो और गाने ने मन मोह लिया है। जब भी दिल तो बच्चा है जी, कानों तक पहुंचता है, सब कुछ रूक जाता है। एक एक अल्फाज़ के पीछे मन चलने लगता है। म्यूज़िक में जब गिटार के तार झनझनाते हैं और हारमोनियम से निकली कोई बांसुरीनुमा धुन किसी जानी पहचानी इश्किया तकलीफों से जोड़ देती है तो गाना अंदर ही अंदर अमर होने लगता है। गुलज़ार के पास न जाने अहसासों का कितना बड़ा खजाना है जो आज तक भरा ही लगता है। विनीत और पंड्या के लेख के बाद भी लिखने का मन कर रहा है। आखिर कैस रोक लूं खुद को इस लाइन के सुनने के बाद----

हाय ज़ोर करे,कितना शोर करे
बेवजह बातों पे ऐं वें ग़ौर करे
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके,कोई तो टोके
इश्क में अब खाओगे धोखे
डर लगता है अब इश्क करने में जी
दिल्ली तो बच्चा है जी,दिल्ली तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी,दिल्ली तो बच्चा है जी

अभिषेक चौबे ने इस गाने को बेहद खूबसूरती से फिल्माया है। जब पहली बार देखा तो लगा कि वाह। जब बार बार देखा तो और लगा..वाह। ऐसा गाना सुनने को मन करता है जी। अच्छा लगता है जी। सुंदर लगता है जी। सच्चा लगता है जी।

विशाल भारद्वाज के सीने में पश्चिम उत्तर प्रदेश के समाज का हिंसक चेहरा अटका हुआ है। ओमकारा के बाद लगता है एक बार फिर वो अपने दर्द को हलका करेंगे। नैना सूरमा और तमंचा किसी मेट्रो में पले बढ़े कहानीकार के सामान नहीं हो सकते। तभी तो ऐसे संवाद हैं- हमारे गांव में चूतड़ धोने से पहले तमंचा चलाना सीखाते हैं। प्रोमो फिल्म को देखने के लिए उकसा रहा है।

दो चोर एक ऐसी जगह में फंस जाते हैं जो सुरक्षित नहीं हैं। दो चोरों के बीच एक अल्हड़ सी दिखने वाली बालन है। उसकी बतियाती आंखें और दो अलग अलग उम्र के नायकों के साथ इश्क की सहजता। सीधा पल्ला की साड़ी। लंबे बाल। चूड़ीदार चोटी वाले। एक साहसिक फिल्म लगती है। वर्ना एक औरत दो मर्दो से बराबरी से प्रेम करते हुए कब पर्दे पर देखी गई। मेट्रो शहरों की कई सच्ची कहानियों में ऐसी लड़कियां हैं मगर छुप छुप कर। उनके साथी मर्दों को भी पता है मगर छुप छुप कर। सामंती समाज के कोठों पर एक औरत के कई आशिक रहे हैं। मुझे पता भी नहीं कि विद्या का किरदार तवायफ का है या एक आजाद औरत का। जो अपने संबंधों का फैसला और अंजाम दोनों खुद तय करती है। इश्क का फैसला उसका अपना है या बंदूक की कमज़ोरियों का। यही सवाल फिल्म देखने के लिए बेचैन करेंगे। लेकिन जब वो औरत बंदूक चला कर अपने आशिकों को ढेर करती हुई लगती है तो कहानी एक बार फिर से ओमकारा फ्रेम में घुस कर कुछ ढूंढने लगती है।

लेकिन प्रेम के इन अंतरंग और नितांत शहरी लम्हों को गांव या छोटे शहरों की सेटिंग में सहजता से फिल्माने का साहस विशाल भारद्वाज कर सकते हैं। अभिषेक चौबे के बारे में नहीं जानता लेकिन लगता है कि उन्होंने इस कहानी को खूब समझा है। लिखते लिखते गाना यहां आ पहुंचा है...

प्रेम की मारे कटार रे
तौबा ये लम्हे कटते नहीं क्यों
आंखो से मेरी हटते नहीं क्यों
डर लगता है मुझसे कहने में जी
दिल्ली तो बच्चा है जी

एक और गाना हिट होने जा रहा है। इब्न बतूता का। फिल्म चलेगी,लगता है। मैंने फिर से इस गाने को रिवाइंड कर दिया है....

ऐसी उलझी नज़र उनसे,हटती नहीं...
दांत से डोर रेशम की कटती नहीं....
डर लगता है इश्क करने में जी..
दिल तो बच्चा है जी..

क्या बात है,साल की शुरूआत बेहतरीन गानों से हो रही है। इश्क में सब बेवजह होता है। बेवजह के ये गाने कसक पैदा कर रहे हैं।

सभ्यता






सभ्यता के मतलब बदल रहे हैं। गाय कूड़ेदान से खा रही है और इंसान को कूड़ा फेंकने पर असभ्य कहा जा रहा है। पहली तस्वीर हरिद्वार के घाट की है और दूसरी राम झूले के पास की है। गाय का खाना पीना बदल गया है। बचपन में कई सालों तक गाय को पहली रोटी खिलाई है। मां दे देती थी और हम गाय को खिला आते थे। बाद में पता चला कि इसी पहली रोटी को पिछली रोटी कहते हैं। जब पहली रोटी के ऊपर बाकी रोटियों का थाक लग जाता था तब पहली पिछली हो जाती थी। ऊपर की रोटियां गिनती में आगे हो जाती थीं। हम सब कूड़ा उत्पादक शहरी सभ्यता में रह रहे हैं। इन संदेशों को देखकर यही लगता है कि भारत एक कृषि प्रधान नहीं बल्कि संदेश प्रधान देश है।

बाबरी भवन में राम मंदिर





मेरी नज़र गंगा के तट पर बनी इस इमारत पर कैसे नहीं पड़ती। देखते ही जानने का मन करने लगा। जब इसके पुरोहित से पूछा कि भाई अयोध्या में लोग बाबरी मस्जिद गिरा आए और आपके यहां बाबरी भवन,वो कैसे? आप इस सनातन परंपरा में कब से घुले मिले हुए हैं? जवाब इतना साधारण था कि अपनी मूर्खता पर हंसी आ गई। पुरोहित मनीष शर्मा ने कहा कि वत्स तुम नहीं,हर दिन सैंकड़ों आकर पूछ जाते हैं। पूछते हैं कि गंगा के तट पर बाबरी भवन कैसे। मैं रोज़ सैंकड़ों लोगों को जवाब देता हूं। मुज़फ्फरनगर के पास एक गांव है जिसका नाम बाबरी है। वहीं के हिंदू ज़मींदार हैं,उन्होंने ही अपने गांव के नाम पर धर्मशाला बनवा दिया। कोई पचहत्तर साल पहले। हम लोग जयपुर दरबार के भी राजपुरोहित हैं। मनीष शर्मा ने बताया कि बाबरी भवन की पहली मंज़िल पर राम मंदिर है। इशारे से दिखा दिया। पहली तस्वीर में आप देखे सकते हैं कि पहली मंज़िल पर कोने में एक लाल इमारत है। वही राम मंदिर है। दोस्तों ने कहा कि रिपोर्ट करने से पहले ब्लॉग पर मत डालो। न्यूज़ चैनल वाले पहले कर लेंगे। एक बार फिर अपनी इस प्रतिस्पर्धी मूर्खता पर हंसी आई। गंगा तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ कि कथा तो बार बार कही जाती है। हर कथा मुझसे पहले कही जा चुकी है। जो इमारत पचहत्तर साल से खड़ी है वो आज और कल में किसी न्यूज़ चैनल पर आ जाए तो मुझे फर्क नहीं पड़ता। बहुत देखा कंपटीशन का ड्रामा। तो दोस्तों बाबरी भवन में राम मंदिर। इस सनातन गंगा पर थोड़ा इतरा गया।धर्म में समन्वय की ही गुज़ाइश है। समन्वय से ही धर्म महान बनता है। कर्मकांड और झूठे नारों से नहीं। वर्ना क्या आप सोच सकते हैं जिस राम के लिए बाबरी मस्जिद उजाड़ कर लोग भारत राष्ट्र के वजूद के निर्माण में निकल कर सत्ता की खोज में जाने कहां भटक गए,उसी धर्म को ढोने वाली गंगा अपने किनारे बने बाबरी भवन को हर दिन राम का प्रणाम स्वीकार कर बहती जाती होगी। मुझे तो बहुत गुदगुदी हुई।

पेन्टागन और कुम्भ में क्या संबंध हैं?




कुंभ कलश से छलकी अमृत बूंदों से भावी काल में मॉल बनेंगे इसकी कल्पना किसी वेद-पुराण ने क्यों नहीं की,नहीं मालूम।किसी ब्लॉग या अख़बार में एक लेख पढ़ रहा था कि उत्सवों को बाजार यानी मार्केटिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन मार्केटिंग को उत्सवों की ज़रूरत पड़ती है। हम कितना भी संचय कर लें,ऐसे मौकों पर दान देकर खुद को महादानी समझने का अहसास ज़रूर पाना चाहते हैं। अपने उन तमाम जाने-अनजाने पापों को याद करते हुए जेब से जब एक अठन्नी निकल कर भिक्षापात्र में खनकती है या नदी में प्रवाहित होती है तो लगता है वाकई कोई सज़ा चोरी छुपके काट ली है। कुंभ की शुरूआत हो रही है। देव-असुरों के युद्ध को छोड़िये कोक-कपड़ों के युद्ध के शिकार होकर कुछ दान कर आइये। हरिद्वार से ऐसी कई तस्वीरें आप लोगों तक ले कर आऊंगा। एनडीटीवी इंडिया पर भी रिपोर्ट देख सकते हैं। शाम के किसी वक्त। अभी वक्त तय नहीं है लेकिन आ ही जाऊंगा। आध्यात्म की इस सनातन यात्रा में शामिल होने जा रहा हूं। उसके सार को समझने के लिए उसी में विलिन हो जाऊंगा। कभी छिटक कर बाहर से भी देखूंगा। संत होना आईएएस होने से कम है क्या वैसे। बाबा नाम केवलम।

क्या आप इस भगवान को जानते हैं?




हरिद्वार गया था। वहीं पर ये भगवान मुझे मिले। किसके और किन प्रयत्नों से अवतरित हुए हैं,जानना चाहता हूं। बिल्कुल आधुनिक हैं। हिन्दू धर्म के संगठित न होने की सबसे बड़ी खूबी यही है कि कोई भी अपने को देवता घोषित कर सकता है। इस खूबी के कारण इस धर्म की जीवंतता दिलचस्प है। बिल्कुल आधुनिक लिबास में हैं। टाई और सूट पहने हुए हैं,परंपरा की तरह घोड़े की कान को पकड़े हुए हैं। किसी की भावना को आहत नहीं करना चाहता बल्कि किसी आकर्षक आधुनिक ईश्वर नुमा शख्स के अवतरित होने की सूचना दे रहा हूं। पूछ रहा हूं कि आप लोगों को जानकारी हो तो बताइयेगा। ईश्वर रूप में हैं या नहीं,ये नहीं कह सकता। आशीर्वाद की मुद्रा में संत लोग फोटू से लेकर मूर्ति बना लेते हैं। यह भी जानना चाहूंगा कि क्या ये संत हैं और अगर हां तो किस परंपरा में संत हुए हैं।

क्या आप बिहारियों को भी अच्छा लग रहा है?

बिहार से अच्छी ख़बर आने का मतलब आप समझते हैं। हम सब वहां से भागे प्रवासी नागरिक आज कल खुश तो होंगे ही कि बिहार तरक्की कर रहा है। अपने राज्य को लेकर इतना सकारात्मक और सतर्क भाव कभी नहीं आया। पिछले तीन चार सालों में जितनी बार पटना गया,लोगों को डरा हुआ नहीं पाया। उससे पहले घरों और चौराहों की आम बातचीत में भय और विवशता झलकती थी। नीतीश ने यही दूर कर दिया,काफी है। मेरा भी यही मानना है कि बिहार को सिर्फ अच्छी सड़क, बिजली और कानून व्यवस्था चाहिए। कानून व्यवस्था का संबंध कार्य संस्कृति से है। यह खराब होती है तो व्यक्तिगत प्रयासों पर असर पड़ता है।

अपरहरण के टाइम में लोग इतने हताश हो चुके थे कि अपनी दुकान बंद कर दिल्ली बंबई की तरफ रूख करने लगे थे। गांव गया तो पहली बार जम कर घूम रहा था। यह किसी आज़ादी से कम नहीं थी। पहले कब कौन सी गाड़ी रूक जाए और बोलेरो से कोई तिवारी पांडे का भाई बंदूक लिये उतर आता था। हालचाल ऐसे पूछता था मानो अब गोली भी मारेगा। पिछले साल गांव गया था तो इस संस्कृति के अवशेष तो नज़र आए मगर इमारत ढह चुकी थी। बिहार के नेताओं और लोगों ने खतम व्यवस्था के साये में अपराधीकरण का सामाजिकरण कर दिया था। आम संपन्न लोग भी अपराधी रिश्तेदारों को नाम गर्व से लेते थे। अब काफी बदल गया है।


बिहार के ११ फीसदी से अधिक की विकास दर ने साबित कर दिया है कि बिहार की प्रगति बड़े उद्योगों से नहीं होनी है। बिहार की उपजाऊ ज़मीन और पानी की अधिकता उसे बिना उद्योगों के ही तरक्की के रास्ते पर ले जाएगी। कृषि और कृषि आधारित व्यावसाय का जितना विकास होगा,आम बिहारियों की भागीदारी उतनी बढ़ेगी। पलायन रूकेगा और लोगों की कमाई का शेयर बढ़ेगा। इस तरक्की से भले ही कोई शहर खूबसूरत न लगे लेकिन आम घरों में लोग सूकून में नज़र आयेंगे।


एक पहचान के रूप में बिहारी होने का मतलब कई सारे नकारात्मक तत्वों का सार होना है। यह जब भी बदलता है, जितना भी बदलता है अच्छा लगता है। महाराष्ट्र से धकियाये जाने की इतनी दलीलों के बाद भी बिहार के लोगों में क्षेत्रीयता नहीं पनपी। वो इस संकीर्णता से बचे रहे तभी बिहारी होना अच्छा रहेगा। कई लोग हैं जो बिहार की तरक्की की खबर को आशंकाओं से भी देख रहे हैं। उनकी आशंकाएं वाजिब है। इन्हीं आशंकाओं से जब आशा की किरण निकलती है तो बेहतर लगता है।


बिहार के प्रवासी लोग अपने अपने शहरों में राज्य की छवि को लेकर काफी चिंतित रहते हैं। ये उनकी किसी भी कामयाब पहचान को प्रभावित करता है। अगर आप यू ट्यूब देखेंगे तो उसमें पटना शहर को लेकर कितने तरह के वीडियो हैं। विदेशों में बसे लोग पटना की चंद इमारतों को खूबसूरत लगने वाले एंगल से शूट कर उन्हें अंग्रेजी गाने के साथ परोस रहे हैं। दावा करते हैं कि देखो, ये है पटना। किसी की मत सुनो,अपनी आंखों से देख लो। और बिस्कोमान का एफिल टावर नुमा शाट घूमने लगता है। कोने में पड़ा कृष्ण मेमोरियल वीडियो में बुर्ज दुबई की तरह दिखने लगता है। वीडियो अपलोड करने वाला कहता है,देखा पटना गांव नहीं हैं। बिहार को लेकर नई किस्म की इस उत्कंठा पर और नज़र डालनी चाहिए। दिवाली के दिन मैंने अपने इसी ब्लॉग पर वीडियो में बसता एक शहर लिखा था। जिसमें पटना को लेकर बिहारी अभिलाषाओं की झलक मिलती है।


सतह पर भले ही बदलाव कंक्रीट रूप में न दिखे लेकिन इतना तो है कि समझ और सोच में दिखने लगा है। राजनीति होती रहेगी। नीतीश क्या हैं और लालू क्या हैं। लेकिन नीतीश ने कुछ तो किया। शून्य से एक राज्य को यहां तक पहुंचा दिया है। कमियां होंगी तो उनकी आलोचना करते रहिए ताकि नीतीश काम करते रहें। तारीफ करने लायक बात हो तो जम कर कीजिए। बिहार की उन समस्याओं और तस्वीरों को भी सामने लाइये जिनके बारे में अभी कुछ नहीं किया गया है।


तभी हमें भी लोग महफिलों में कह सकेंगे कि ओह...आप बिहार के हैं। वाह। अभी तो लोग कहते हैं...ये सारे के सारे बिहारी। कहने का मतलब होता है कि चोर होते हैं और हर वक्त चोरी की ही बात करते रहते हैं। एक बंडल में समेट कर फेंक दिये जाने का दुख तो होता है लेकिन संकीर्ण न होने की ताकत कहां से आ जाती है,यही समझ नहीं आता। शायद यही बिहारी होना होता है। प्रवासी होकर भी हम संकीर्ण नहीं होते। हम दुनिया को विचार देने वाले लोग रहे हैं। बीच के पचास सालों में सार्वजनिक और व्यक्तिगत संस्कार कम हो गये थे और विकास खतम। ये दो सुधर जाएं तो जितनी कामयाबी बिहार के लोग दूसरे प्रदेशों और मुल्कों में प्रवासी जीवन व्यतीत कर पा रहे हैं,उससे कहीं अधिक कामयाबी अपनी मिट्टी में पा लेंगे।


दूसरे राज्य के पाठक बिल्कुल न सोचें कि हम संकीर्ण हो रहे हैं या हमारे भीतर कहीं किसी दमित रूप में बिहारीवाद बसा था। हम बस हल्का सा खुश हो रहे हैं। इतनी गाली सुनी है कि सरकार का ये आंकड़ा अपने घर का लगता है। बाकी हकीकत आप भी जानते हैं और हम भी जानते हैं।

सिस्टम के थ्री इटियॉटिक बागी

साढ़े चार स्टार्स की फ़िल्म देख रहा था। तारे छिटकते थे और फिर कहीं कहीं जुड़ जाते थे। साल की असाधारण फिल्म की साधारण कहानी चल रही थी। चार दिनों में सौ करोड़ की कमाई का रिकार्ड बज रहा था और दिमाग के भीतर कोई छवि नहीं बन पा रही थी। थ्री इडियट्स की कहानी शिक्षा प्रणाली को लेकर हो रही बहसों के तनाव में कॉमिक राहत दिलाने की सामान्य कोशिश है। कामयाबी काबिल के पीछे भागती है। संदेश किसी बाबा रणछोड़दास का बार बार गूंज रहा था।


पढ़ाई का सिस्टम ख़राब है लेकिन विकल्प भी बहुत बेकार। इसी ख़राब सिस्टम ने कई प्रतिभाओं को विकल्प चुनने के मौके दिये हैं। इसी खराब सिस्टम ने लोगों को सड़ा भी दिये हैं। लेकिन यह टाइम दूसरा है। हम विकल्पों के लिए तड़प रहे हैं। लेकिन क्या हम वाकई विकल्प का कोई मॉडल बना पा रहे हैं? सवाल हम सबसे है।


मद्रास प्रेसिडेंसी में सबसे पहले इम्तहानों का दौर शुरू हुआ था। अंग्रेजों ने जब विश्वविद्यालय बनाकर इम्तहान लिये तो सर्वण जाति के सभी विद्यार्थी फेल हो गए। उसी के बाद पहली बार थर्ड डिविज़न का आगमन हुआ। हिंदुस्तान में सर्टिफिकेट आधारित प्रतिभा की यात्रा यहीं से शुरू होती है। डेढ़ सौ साल से ज़्यादा के इतिहास में परीक्षा को लेकर हमने एक समाज के रूप में तनाव की कई मंज़िलें देखी हैं। ज़िला टॉपर और पांच बार मैट्रिक फेल अनुभव प्राप्त प्रतिभावान और नाकाबिल हर घर परिवार में रहे हैं। दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे में अनुपम खेर अपने खानदान के सभी मेट्रिक पास या फेल पूर्वजों की तस्वीरें लगा कर रखते हैं। शाह रूख खान को दिल की सुनने के लिए भेज देते हैं। पंद्रह साल पहले आई यह कहानी सुपरहिट हो जाती है। अनुपम खेर शाहरूख खान से कहते है कि जा तू मेरी भी ज़िंदगी जी कर आ।


शिक्षा व्यवस्था से भागने के रास्ते को लेकर कई फिल्में बनीं हैं। भागने के कई रास्ते भी हैं।थ्री इडियट्स फिल्म पूंजीवादी सिस्टम को रोमांटिक बनाने का प्रयास करती है। काबिलियत पर ज़ोर से ही कामयाबी का रास्ता निकलता है। काबिल होना पूंजीवादी सिस्टम की मांग है। रणछोड़ दास का विकल्प भी किसी अमेरिकी कंपनी की कामयाबी के लिए डॉलर पैदा करने की पूंजी बन जाता है। कामयाबी के बिना ज़िंदा रहने का रास्ता नहीं बताती है यह फिल्म। शायद ये किसी फिल्म की ज़िम्मेदारी नहीं होती। उसका काम होता है जीवन से कथाओं को उठाकर मनोरंजन के सहारे पेश कर देना। ताकि हम तनाव के लम्हों में हंसने की अदा सीख सकें।


बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में ही प्रेमचंद की कहानी आ गई थी। बड़े भाई साहब। इम्तहान सिस्टम पर बेहतरीन व्यंग्य। बड़े भाई साहब अपने छोटे भाई साहब को नए सिस्टम में ढालने के बड़े जतन करते हैं। छोटा भाई कहता है कि इस जतन में वो एक साल के काम को तीन तीन साल में करते हैं। एक ही दर्जे में फेल होते रहते हैं। लिहाजा खेलने-कूदने वाला छोटा भाई हंसते खेलते पास होने लगात है और बड़े भाई के दर्जे तक पहुंचने लगते हैं।


कहानी में बड़े भाई का संवाद है। गौर कीजिएगा। "सफल खिलाड़ी वह है,जिसका कोई निशाना खाली न जाए। मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दांतों पसीना आ जाएगा। जब अलजेबरा और ज्योमेट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे. इंग्लिस्तान का इतिहास पढ़ना प़ड़ेगा। बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं, आठ-आठ हेनरी हुए हैं। कौन सा कांड किस हेनरी के समय में हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो। हेनरी सातवें की जगह हेनती आठवां लिखा और सब नंबर गायब। सफाचट। सिफर भी न मिलेगा,सिफर भी। दर्जनों तो जेम्स हुए हैं,दर्जनों विलियम,कौड़ियों चार्ल्स। दिमाग चक्कर खाने लगता है।"


भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर ऐसे किस्से इसके आगमन से ही भरे पड़े हुए हैं। प्रेमचंद की यह कहानी बेहतरीन तंज है। उस वक्त का व्यंग्य है जब इम्तहानों का भय और रूटीन आम जीवन के करीब पहुंच ही रहा था। थ्री इडियट्स की कहानी तब की है जब इम्तहानों को लेकर देश में बहस चल रही है। एक सहमति बन चुकी है कि नंबर या टॉप करने का सिस्टम ठीक नहीं है। दिल्ली के सरदार पटेल में कोई टॉपर घोषित नहीं होता। किसी को नंबर नहीं दिया जाता। ऐसे बहुत से स्कूल हैं जहां मौजूदा खामियों को दूर किया गया है या दूर करने का प्रयास हो रहा है। इसी साल सीबीएसई के बोर्ड में नंबर नहीं दिये जायेंगे। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में बोर्ड के इम्तहानों में करीब बीस लाख से ज़्यादा बच्चे फेल हो गए थे।


इन सभी हकीकतों के बीच आमिर की यह फिल्म एजुकेशन के सिस्टम को कॉमिक में बदल देती है। जो मन करो वही पढ़ो। यही आदर्श स्थिति है लेकिन ऐसा सिस्टम नहीं होता। न पूंजीवाद के दफ्तर में और न कालेज में। अभी तक कोई ठोस विकल्प सामने नहीं आया है। प्रतिभायें कालेज में नहीं पनपती हैं। यह एक मान्य परंपरा है। थ्री इडियट्स मौजूदा सिस्टम से निकलने और घूम फिर कर वहीं पहुंच जाने की एक सामान्य फिल्म है। जिस तरह से तारे ज़मीन पर मज़ूबती से हमारे मानस पर चोट करती है और एक मकसद में बदल जाती है,उस तरह से थ्री इडियट्स नहीं कर पाती है। चंद दोस्तों की कहानियों के ज़रिये गढ़े गए भावुकता के क्षण सामूहिक बनते तो हैं लेकिन दर्शकों को बांधने के लिए,न कि सोचने के लिए मजबूर करने के लिए। फिल्मों के तमाम भावुक क्षण खुद ही अपने बंधनों से आजाद हो जाते हैं। जो सहपाठी आत्महत्या करता है उसका प्लॉट किसी मकसद में नहीं बदल पाता। दफनाने के साथ उसकी कहानी खतम हो जाती है। कहानी कालेज में तीन मसखरों की हो जाती है जो इस सिस्टम को उल्लू बनाने का रास्ता निकालने में माहिर हैं। ऐसे माहिर और प्रतिभाशाली बदमाश हर कालेज में मिल जाते हैं।


चेतन भगत की दूसरी किताब पढ़ी है। टू स्टेट्स। थ्री इडियट्स की कहानी अगर पहली किताब फाइव प्वाइंट्स समवन से प्रभावित है तो यह साबित हो जाता है कि फिल्म आईआईटी में गए एक कामयाब लड़के की कहानी है जो आईआईटी के सिस्टम को एक नॉन सीरीयस तरीके से देखता है। चेतन भगत का इस विवाद में उलझना बताता है कि उसकी कहानियों का यह किरदार लेखक एक चालू किस्म का बाज़ारू आदमी है। क्रेडिट और पैसा। दोनों बराबर और ठीक जगह पर चाहिए। विधू विनोद चोपड़ा का जवाब बताता है कि कामयाबी के लिए क्या-क्या किये जा सकते हैं। परदे पर चेतन को क्रेडिट मिली है।लेकिन कितनी मिली है उसे ईंची टेप से नापा जाना बताता है कि फिल्म अपने मकसद में कमज़ोर है।


इसीलिए इस फिल्म की कहानी लगान और तारे ज़मीं पर जैसी नहीं है। हां दोस्ती के रिश्तों को फिर से याद दिलाने की कोशिश ज़रूर है। आमिर खान किसी कहानी में ऐसे फिट हो जाते हैं जैसे वो कहानी उन्हीं के लिए बनी हो। कहानी इसलिए अपनी लगती है क्योंकि कंपटीशन अब एक व्यापक सामाजिक दायरे में हैं। शिक्षा और उससे पैदा होने वाली कामयाबी का विस्तार हुआ है। हम भी कामयाब हैं और आमिर भी कामयाब है। पहले ज़िले में चार लोग कामयाब होते थे,अब चार हज़ार होते हैं। मेरे ही गांव में ज़्यादातर लोगों के पास अब पक्के के मकान है। पहले तीन चार लोगों के होते थे। कामयाबी के सार्वजनिक अनुभव के इस युग में यह फिल्म कई लोगों के दिलों से जुड़ जाती है।


भारत महान के प्रखर चिंतकों के लेखों में एक कामयाब मुल्क बनने की ख्वाहिश दिखती है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी का भारत या अगले दशक भारत का। भारत एक मुल्क के रूप में चीन और अमेरिका से कंपीट कर रहा है। ज़ाहिर है नागरिकों के पास विकल्प कम होंगे। सब रेस में दौ़ड़ रहे हैं। आत्महत्या करने वालों की कोई कमी नहीं है। दिमाग फट रहे हैं। सिस्टम क्रूर हो रहा है। काश थ्री इडियट्स के ये किरदार मिलकर इसकी क्रूरता पर ठोस प्रहार करते। लेकिन ये क्या। ये तीनों कहानी की आखिर में लौटते हैं कामयाब ही होकर। अगर कामयाब न होते तो कहानी का मामूली संदेश की लाज भी नहीं रख पाते। बड़ी सी कार में दिल्ली से शिमला और शिमला से मनाली होते लद्दाख। साधारण और सिर्फ सर्जनात्मक किस्म के लोगों की कहानी नहीं हो सकती। ये कामयाब लोगों की कहानी है जो काबिल भी हैं। कामयाब चतुर रामालिंगम भी है। दोनों अंत में एक डील साइन करने के लिए मिलते हैं। एक दूसरे को सलामी ठोंकते हैं। थोड़ा मज़ा भी लेते हैं। वो सिस्टम से बगावत नहीं करते हैं,एडजस्ट होने के लिए टाइम मांग लेते हैं। सिस्टम का विकल्प नहीं देती है यह फिल्म। न ही तारे ज़मीं की तरह सिस्टम में अपने किरदार के लिए जगह देने की मांग करती है। मनोरजंन करने में कामयाब हो जाती है। शायद किसी फिल्म के लिए यही सबसे बड़ा पैमाना है। साढ़े चार स्टार्स की फिल्म।


नोट- ज़ुबी डूबी गाना रेट्रो इफेक्ट देता है। ओम शांति ओम से लेकर रब ने बना दी जोड़ी तक में ऐसे प्रयोग हो चुके हैं। इससे पहले भी कई फिल्मों में रेट्रो इफेक्ट के ज़रिये पुरानी फिल्मों के क्लिशे को हास्य को बदला जा चुका है। गाना बेहद अच्छा है।

मत लिखो भाई

हर दर-ओ-दीवार पर जब हम लिख आयेंगे
इमारतों के साये से भी लोग घबरायेंगे
खुलेंगी खिड़कियां तो शब्द लटकते नज़र आयेंगे
आएंगी आंधियां तो मतलब उखड़ जायेंगे
कितना लिखोगे कबीर तुम कब तक छपोगे
पढ़ने वाले पढ़ कर तुम्हें कहीं भूल आयेंगे

जगत और योगदान- इसके बिना हिन्दी

जगत। नाना प्रकार के होते हैं। जगत के भी उप-जगत होते हैं। जैसे एक हिन्दी जगत। फलाने जो उठ गए हैं धरती से, हिन्दी जगत के मूर्धन्य टाइप के कुछ थे। फलाने जो नहीं उठ पा रहे हैं वो अभी तक हिन्दी जगत में योगदान कर रहे हैं। हिन्दी जगत और योगदान ये दोनों मूल भाव हैं उनके, जो आगे चलकर महान बनना चाहते हैं। पहले हिन्दी जगत की ज्ञात उप-शाखओं के बारे में विनम्र प्रस्तुति करना चाहता हूं। नए साल के पहले दिन दार्शनिक व्याख्या करना चाहता हूं। इससे पहले कि खारिज कर दिया जाऊं, योगदान और जगत का विश्लेषण कर री-एंट्री करना चाहता हूं। दुकान-भाव में।


हिन्दी जगत कई शाखाओं में विभाजित है। दो मुख्य शाखाएं हैं। साहित्य जगत और पत्रकारिता जगत। साहित्य जगत की कई उप शाखाएं हैं। कविता-जगत,कथा-जगत,आलोचना-जगत,अनुवाद-जगत,लघु-पत्रिका-जगत,मासिक पत्रिका जगत। पत्रकारिता जगत की भी कई शाखाएं हैं। प्रिट पत्रकारिता-जगत,टीवी पत्रकारिता-जगत,वेब पत्रकारिता-जगत,ब्लॉग-जगत। जगत के इतने रूप होंगे, जगत कायम करने वाले ने कभी नहीं सोचा होगा। इन सब जगतों में योगदान करने की गंभीर उत्कंठा हिंदी जगत के लेखों में दिखती है। योगदान एक ऐसा लक्ष्य है जो कुछ लोगों को भरी जवानी में ही बूढ़ा बना देता है। मालूम पड़ता है कि वो कई जगतों में योगदान के लोड से मरा जा रहा है। कुछ लिख दीजिए तो प्रतिक्रिया आती है कि ये योगदान कैटगरी का है। योगदान करने का एक लाभ है कि दुनिया में नहीं रहने के बाद गोष्ठियां आयोजित होती हैं। संस्मरण उस योगदान भाव को ज़िंदा रखने की एक विधा है। बहुत सारे पत्रकार भी अपने जगत में योगदान कर जाना चाहते हैं। बहुत सारे साहित्य जगत में योगदान के साथ-साथ पत्रकारिता जगत में भी योगदान करना चाहते हैं


योगदान और जगत। ये सभी भाषाओं में हैं। योगदान भाव से मुक्त हो गए तो आप फिनिश हो गए। सायास योगदान करने का एक कोर्स बनाना चाहता हूं। अनायास कुछ भी अच्छा नहीं लगता। खुद को बुलंद साबित कर दीजिए तो सवाल उठाया जाता है कि उनका योगदान क्या है। अब इस महादान का हिसाब ही नहीं पूरा होता। क्या हो अगर कुछ भी योगदान न हो और महान बना दिये जाएं। कई लोग इस रास्ते भी अपनी दुकान चला गए हैं। मोबाइल दुकान। जो हर गोष्ठियों और लघु-समूहों में महानता के गुण गा आती है। पान की गुमटियों को हाज़िर-नाज़िर मान कर मित्र-मंडलियों की बैठकों में बकरीवाद के नए शिखर बनाये जाते हैं। बकौल चचा शेष नारायण सिंह बकरीवाद का जीनोम सबसे पहले पत्रकारों में नोटिस किया था। मेरी ख़बर, मैंने ये मैंने वो....टाइप से कर दिया है, वो अब तमाम आने वाली और आ कर मेरी तरह गुज़र जाने वाली पीढ़ियों से नहीं होगा। शिल्प और कथ्य कोई बता देता तो इन दोनों का ख्याल करते हुए किसी महान रचना की तरफ कदम बढ़ाता। भाषा की सहजता भी अब जटिल अवधारणाओं से परिभाषित की जानी चाहिए। इस तरह की बातें कोर्स में होनी चाहिए।

मैं ये क्यों लिख रहा हूं। पता नहीं। अनादर करने के लिए तो बिल्कुल नहीं। लेकिन कई रचनाओं में जब इन दो शब्दों पर नज़र पड़ती है तो लगता है कि इसके पीछे के मनोभावों का विश्लेषण किया जाना चाहिए। ये क्षमता मुझमें नहीं है और न ज्ञान। लेकिन विषय तो रख ही सकता हूं। मूर्तियों में गढ़े गए नायकों की तरह आसमान ताकते और सुदूर खड़ी आभाषी भीड़ को किसी राह चला देने का रास्ता बताती वो एक उंगली की तरह सम्मान तभी मिलता है जब आप किसी एक जगत में योगदान कर जाएं या फिर आपका योगदान इतना बड़ा हो कि वो कई जगतों की सीमाएं लांघ जाए। महानता की दुकान खड़ी हो जाएगी। तारीफ इसका फ्री गिफ्ट है। आह और वाह इसकी दो टॉफियां। चाटते चाटते कब किसी दांत के कोने में चटक जाएं पता नहीं चलता। क्या कोई ड्रेस कोड नहीं होना चाहिए? उनका जो किसी जगत में योगदान करना चाहते हैं। उनका हुलिया कुछ डिफरेंट होना चाहिए।

नोट- हमारे एक मित्र काफी लिख रहे हैं. उनका परिचय छपता है- लेखक पत्रकार हैं। मैंने कहा कि इतना लिखेंगे तो अब छपेगा- पत्रकार लेखक है।