पत्रकार अब प्रचार भी कर रहा है

जो काम फिल्म वाले करते हैं, वहीं अब हम पत्रकार करने लगे हैं। अपनी स्टोरी या शो का सेल्फ प्रमोशन। फेसबुक का स्टेटस अपडेट कब बिलबोर्ड बन गया पता ही नहीं चला। मैं खुद अपनी रिपोर्ट का मल्टी स्तर पर प्रचार करने लगा हूं। यू-ट्यूब में प्रोमो अपलोड कर देता हूं। फेसबुक पर दो दिन पहले से टीज़ करने लगता हूं। एनडीटीवी के सोशल साइट्स पर जाइये तो वहां सारे एंकर और अब तो रिपोर्टर भी अपनी स्टोरी का विज्ञापन करते हैं। बताते हैं कि दस बजे या नौ बजे मेरी रिपोर्ट देखियेगा। नहीं देखा जाने का डर सबको सता रहा है। इतने सारे माध्यम हो गए हैं। हर माध्यम में नाना प्रकार के चैनल या अखबार। टीवी,लैपटॉप,ट्विटर,फेसबुक,आरकुट,अखबार,एफएम इत्यादि। जब एफएम पर न्यूज आने लगेगा तब घर पहुंचते पहुंचते चटपटे अंदाज़ में ख़बर मिल जाया करेगी। फिर कार से निकलकर टीवी के सामने न्यूज के लिए कोई क्यों जाएगा? जब थ्री जी से मोबाइल में ही टीवी चल जाएगा तब टीवी पर क्या देखेंगे मालूम नहीं।

पहले जब कोई रिपोर्ट करता था तो टीआरपी का आतंक नहीं होता था। क्योंकि तब टीआरपी के सौ फीसदी का बंटवारा तीन चार चैनलों में होता था। अब कई चैनलों में होता है। तब एक रिपोर्ट पर कई लोगों की प्रतिक्रिया मिलती थी। अब भी मिलती है लेकिन दर्शकों से कम। उन दर्शकों से मिलती है जो बौद्धिक कार्यों में ज्यादा संलग्न हैं। प्रतिक्रिया देने वाले ज्यादातर लोगों में से भावी पत्रकार हैं या फिर पत्रकार हैं। कई लोग इन दोनों कैटगरी से बाहर के भी हैं। फेसबुक पर सक्रियता के अनुभव से कुछ-कुछ ऐसा लगता है। यह कहने का मेरे पास कोई आधार नहीं है कि लोगों के पास टीवी देखने का वक्त नहीं है। लोग थक कर घर आते हैं तो सीरीयल ही देखते हैं। यही वजह है कि टीवी की खबरों का असर कम होने लगा है। अफसरों पर तो और भी कम हो गया है। इम्पैक्ट का वाइप( जो खबर के असर के तौर पर धांय धांय करता आता है) कम ही दिखता है।

टीवी को एसएमएस के ज़रिये इंटरएक्टिव बनाने का प्रयास हुआ। राय मंगाई गई। अब यह लगभग बंद होने लगा है। मुझे याद है जब मैंने दरभंगा से अपनी रिपोर्ट की एक पीटूसी में एसएमएस का नंबर ही बोल दिया। स्टुडियो में नग्मा और सिक्ता हंस पड़ी। न्यूज़ चैनलों ने फीडबैक के लिए ईमेल का सिलसिला शुरू किया। मुझे नहीं लगता कि बहुत फीडबैक आते हैं। आते भी हैं तो उनका खास प्रभाव नहीं है। पढ़कर अच्छा ज़रूर लगता है मगर ईमेल से हिन्दुस्तान का दर्शक एसएमएस की तरह राय नहीं भेजता है। इसके बाद न्यूज़ चैनलों ने इंटरएक्टिविटी बढ़ाने के लिए अपने अपने वेबसाइट बना डाले। वेबसाइट पर वीडियो लाइव देखने की सुविधा दे दी गई। टीवी अपनी खबरों को अखबार की तरह छापने भी लगा। अखबार तो टीवी होने का प्रयास नहीं करता। कल ही खबर देखी कि दैनिक भास्कर अपने रिपोर्टर को ऑन स्पॉट रिपोर्टिंग की सुविधा दे रहा है। मालूम नहीं कि यह किस लिए किया जा रहा है। क्या अखबार को भी अब पाठक का संकट हो रहा है जिससे जूझने के लिए वे अब टीवी की तरह बनने लगे हैं।

जो भी हो टीवी संकटग्रस्त हो गया है। यह एक जाता हुआ माध्यम लगता है। थ्री जी के आते ही बड़े बड़े ओबी वैन बेकार हो जाएंगे। कैमरे के साथ सेट टॉप जैसा बक्सा होगा जिससे आप लाइव टेलिकास्ट कर सकेंगे। इसे पूरी तरह सक्रिय होने में कम से कम तीन साल लगेंगे लेकिन थ्री जी का प्रयोग होने लगा है। क्वालिटी खराब है मगर इसका रास्ता निकल आएगा। वर्तमान में टीवी बौरा गया है। वो कभी ट्विटर से कमेंट उठाता है तो कभी फेसबुक से। वॉक्स पॉप लेने का रिवाज भी कम होता जा रहा है।टीवी आंखें ढूंढ रहा है। आंखें किस टीवी को ढूंढ रही हैं मालूम नहीं।

मैं जिस फ्लोर पर रहता हूं। उस में पांच घर हैं। नीचे के फ्लोर पर भी इतने ही हैं। इन दस घरों में से छह मुझे सीधे तौर पर जानते हैं। इनके घरों में मैं कभी भी अचानक चला जाता हूं। लेकिन कभी भी अचानक इन्हें न्यूज़ देखते हुए नहीं पाया। इनमें से एक या दो को मालूम है कि मेरे शो की टाइम क्या है। टीवी खूब देखते हैं। चलता है तो इंडियन आइडल टाइप कुछ चल रहा होता है। मेरे घर में जब बुज़ुर्ग आते हैं तो कभी उनको न्यूज देखते नहीं देखा। सास-ससुर न्यूज के लिए बांग्ला चैनल लगा कर देख लेते हैं। बहुत कम समय के लिए। उसके बाद अगर टीवी चल रहा होता है तो सिर्फ सीरीयल या क्रिकेट के लिए। टीआरपी के विशेषज्ञ एक मित्र ने कहा कि अकेले दिल्ली में न्यूज़ के दर्शकों में चालीस फीसदी की गिरावट है। टैम मीटर की सत्यता पर मेरे जैसे खिन्न पत्रकार ही सवाल उठाते हैं। आज तक किसी मीडिया मालिक को टैम को गरियाते नहीं सुना। जबकि ये काम वो हमसे बेहतर कर सकते हैं। टैम नहीं जाएगा। वो रहेगा।

नहीं देखे जाने के मलाल से सब परेशान हैं। मैं तो फेसबुक पर चैट करने वालों से पूछने लगता हूं कि आपने मेरा शो देखा? न जाने उन पर क्या बितती होगी। बेचारे गरियाते भी होंगे कि चाट है। जब देखो यही बात करता है। कुछ नहीं तो सबके चैट में शो की टाइमिग डाल देता हूं। फिर कई लोगों से पूछने लगता हूं कि देखा मेरा शो। जवाब मिलता है कि मिस कर गए तो मायूस हो जाता हूं। ये एक पत्रकार के व्यवहार में आ रहे बदलाव की आत्मस्वीकृति है। ये तो शुरूआत है। पता नहीं अंत कहां होगी। क्या पता एक दिन मैं टी शर्ट पहनकर घूमने लगूं। जिसके पीछे लिखा होगा कि आप रवीश की रिपोर्ट नहीं देखते हैं? क्या करते हैं। एनडीटीवी के सोशल साइट्स पर लोग अपनी स्टोरी या टॉपिक डालने लगे हैं। स्टेटस मन की बातों के लिए था। हम धंधे के दबाव में आ गए। आखिर सवाल तो है ही क्या हम न देखे जाने के लिए काम करें या फिर वो काम करें जो देखा जा सके। तब क्या हो जब दूसरे टाइप का काम भी करें और देखे न जाएं। मीडिया का असर कम हो रहा है। विविधता से मीडिया को क्या फायदा हुआ इसका अध्ययन किया जाना बाकी है। फिलहाल यह फैसला करना होगा कि क्या करें। बेहतर रिपोर्ट कौन तय करेगा। चार बुद्धिजीवी या फिर चालीस दर्शक।

56 comments:

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी said...

I don't agree with you about this Sir. When you creat something good, there should be promotion of that. So that it can reach to maximaum people.
Isme koi buraai nahi hai....
And don't worry hum aapki report dekh kar kabhi gariyaate nahi ....

Ranjan said...

रवीश भाई - आप बहुत हद तक बहुत ही बढ़िया लिखे हैं ! कुछ करना होगा ...सोचिये जिस दिन ये मनोरंजन चैनल वाले ...न्यूज को स्क्रोल करने लगे ..उस दिन क्या होगा ?

आप सभी पत्रकारों के बीच बंद कमरे में एक जोरदार बहस होनी चाहिए ..दिल करे तो मुझे भी बुला लीजियेगा :)

Rangnath Singh said...

आपकी आत्म-स्वीकृति भली लगी। ब्लाग के नए रंग-विधान में पढ़ने में थोड़ी तकलीफ हो रही है।

सतीश पंचम said...

रवीश जी,

मैंने आपकी रिपोर्टो की केवल चार या पांच कड़ियां ही देखी होंगी....सभी पसंद तो आई लेकिन अगले दिन के लिए मुझे फिर देखने के लिए लालायित न कर सकीं। मैं फिर सब टीवी के सजन रे झूठ मत बोलो....लापतागंज टाईप की ओर मुड़ जाता हूँ।

एक वक्त था न्यूज खूब देखता था...लेकिन वह पुराने जमाने की बात हो गई।

फीचर के तौर पर आपकी रिपोर्टिंग बेहतर है।

मेरे हिसाब से साहित्य को कुरेदा जाय......माहौल बनाया जाय..... किसी घटना को साहित्य के किसी प्रसंग से जोडा जाय तो न्यूज चैनलों में लोगों का कुछ कुछ इंटरेस्ट वापस लौट सकता है....अभी तो पढ़ा जाता है कि जब कैटरीना रैम्प पर उतरी तो लोग बस देखते रह गए.....सलमान ने कैटरीना को मिस किया.....यह सब देख कर दर्शक आखिर बोर न हो तो क्या हो। यही कारण है कि सब टीवी ने नब्ज पकड़ ली है और हल्के फुल्के अंदाज में शरद जोशी के लापतागंज और शहाबुद्दीन राठौड के पापड पोल जैसी चीजें देने लगा है।

उम्मीद है लोग किसी साहित्यिक रचना के पन्नों के किनारे अपनी थूक लगी अंगुलियां फेरेंगे।

इनिशियेटिव तो लिजिए....।

इस तरीक का कुछ अंश मुझे आपके लखनऊ वाले रिपोर्टर कमाल में दिखता है...अक्सर किसी खबर के साथ साथ कमाल किसी साहित्य की पंक्तियां या प्रसंग को पेश करते हैं और यह उनकी रिपोर्टिंग को कुछ हद तक अलग बना देता है।

रंजन (Ranjan) said...

आप तो मनमोहन सिंह को गाली दो.. प्रचार अपने आप हो जाएगा... TRP भी बढ़ ही जायेगी..

lakshman sharma said...

रवीश जी
आपकी आत्म स्वीकृति अच्छी लगी पर कहीं ये आपकी पिछली रिपोर्ट की टी आर पी की बदौलत तो नहीं है? चमार की रिपोर्ट में आप एक प्रस्तोता कम पर प्रचारक अधिक लगे.
इन्टरनेट, फेसबुक और ट्विट्टर को ले कर आपकी चिंता और भय उचीत ही है पर क्या आपको नहीं लगता की जैसे एक ख़ास वर्ग का बदलाव आप दिखाने की कोशिश करते हैं वैसे ये भी एक बदलाव ही है और आप-हम सभी इसके आगे मजबूर हैं. अपने आपको बेचा जाना हर धंधे की मजबूरी है क्योंकि सब गंदा है पर धंधा है ये.
खैर आपने कहा कि लोग ई-मेल पर एस एम् एस की तरह विचार नहीं भेजते पर कितने ई-मेल्स का जवाब आप दे पाते हैं? आपका समय बहुत कीमती है पर आपके दर्शकों का भी. मैंने सोशल पर या फेसबुक पर आपको कभी ज़्यादा इंटरेक्ट करते नहीं पाया, जैसा कि आपने भी कहा है पर इस से हम जैसे लोगों को अछा तो नहीं लगता होगा क्यूंकि वो समय जो हमने आपकी रिपोर्ट देख कर और प्रतिक्रया में बिताया उसकी खुशी आपके उत्तरों से ही पूरी हो सकती है. ठीक है कि हमारा समय आप पर खर्च करने के लिए आपने हमें मजबूर नहीं किया पर आपके कई सहकर्मी जवाब देते हैं चाहे छोटा सा ही हो. उनसे जुड़े होने का एहसास ही शायद उन्हें फिर से कार्यक्रम देखने और उन की रिपोर्ट पर टिप्पणी करने के लिए उकसाता है. भले ही हमारी प्रतिक्रया पढने लायक न हों पर फिर भी उनमे से कुछ तो जवाब की हक़दार हैं ही.
अगर इन सोशल साईट्स पर ख़ुद को बेच ही रहे हैं तो फिर ग्राहक/दर्शक से संपर्क बनाये रखने में कोई बुराई तो नहीं है. अब लोकप्रिय होने की इतनी कीमत तो आपको चुकानी ही पड़ेगी. और हाँ सोशल पर आपके ज़्यादातर फ्रेंड्स पत्रकार नहीं, आम दर्शक ही हैं. बुद्धिजीवी होने का दंभ आपके किसी दर्शक को नहीं है. दर्शकों द्वारा आपके शो का मिस किया जाना आपको अच्छा नहीं लगता है तो फिर आपके जवाब ना पा कर वे भी मायूस ही होते होंगे.
अंत में, आप जो कर रहे हैं करते रहिये. आपके दर्शक कभी आपका शो मिस नहीं करते. करते भी हैं तो रिपीट देख लेते हैं.
उत्तर भले ही न दें पर विचार ज़रूर कीजिएगा.

gurpreet waraich said...

read out my blog on indian politics i think you will find interesting @ www.gurpalshergill.blogspot.com AAZAD BHARAT KE GHULAM LOG

विनीत कुमार said...

मीडिया विमर्श के लिए जरुरी पोस्ट। पैसिव ऑडिएंस के प्रोज्यूमर बनने तक शायद कोई रास्ता निकल आए..

महेश शर्मा MAHESH SHARMA said...

RAVISHJI khari-khari baat kahi hai aapne.Electronic media ke journalists ke saamane ye sankat jyada hai kyonki report miss hui to phir nahin dekhi jaa sakegi.print vaale phir bhee kuchh nishchint ho sakate hain ki aaj nahin to kal unka kaam dekha jaa sakata hai...

Jandunia said...

इसमें कोई बुराई नहीं है कि पत्रकार अपने काम की पब्लिसिटी कर रहे हैं। आपका काम बेहतर है या खराब, ये तो आपका दर्शक या पाठक ही तय करेगा। सवाल ये है कि अब इतने सारे माध्यम हो गए हैं कि पाठक या दर्शक कन्फ्यूज हो गया है। ऐसे में आप सभी लोकप्रिय माध्यमों का सहारा लेकर अपनी बात लोगों तक पहुंचाते हैं तो इसमें क्या गलत है। यदि आपका काम अच्छा है तो निश्चित तौर पर आपको तारीफ मिलेगी और यदि आपके काम में किसी प्रकार की खामी है तो उसकी आलोचना भी हो सकती है। चाहे टीवी चैनल हो या फिर नेट पर विभिन्न वेबसाइट्स और ब्लॉग्स, इनकी संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है वो मीडिया के लिए तो शुभ संकेत है, लेकिन समस्या ये हो रही है कि किस चैनल पर कब क्या आ रहा है या फिर किस बेवसाइट या ब्लॉग पर क्या लिखा जा रहा है अब इतना रिसर्च करने का वक्त किसके पास है। यदि काम की पब्लिसिटी हो रही है तो कम से कम लोगों का वक्त तो बचेगा। कंटेंट अच्छा हो तो लोग उसे वक्त देंगे और बुरा होगा तो अपना रास्ता बदल लेंगे।

SACCHAI said...

" sundar aur sarthak post ke liye aapko badhai sir "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

अनूप शुक्ल said...

आत्मप्रचार में आत्मनिर्भरता सफ़लता की अपरिहार्य आवश्यकता है।

Anurag Effect Dil Se said...

आपका ब्लॉग पड़ा...सत्य है, अब मुश्किल होती है | मन भर जाता हैं ,जब किसी गंभीर विषय पर आप कुछ लिखते हैं और वो विना किसी प्रतिक्रिया के गुजर जाता है , दुःख होता हैं जब सान्या मिर्ज़ा की शादी की खबर की आधी भी झारखण्ड मैं मरे शहीदों को नहीं मिलती..आज की रिपोर्टर ख़बरों से ज्यादा TRP को जानने लगे हैं | व्यवसायिकता के नाम पर फूहड़ता परोसी जाने लगे है , मॉडल की आत्महत्या कश्मीर मैं मरे लोगों से बड़ी हो जाती है, खबरें केवल दिल्ली और मुंबई तक सीमित रह गए हैं और पत्रकार सुविधाभोगी हो गए है |
वो जमाना गया जब माँ कहती थी की सांच को आंच नहीं किसी भी रूप मैं आये स्वीकृति मिल ही जाएगी, अब तो सच को भी पैकेज करना पड़ता है..उस पैकेज को इन ख़बरों की मंडी मैं बेचना पड़ता हैं , नहीं तो सच या यूँ कहें ख़बरों की दुकान नहीं चलती... आप youtube या twitter पर लगे रहिये, नहीं तो हम जैसे ग्राहकों का क्या होगा जिन्हें चाहे अनचाहे खबर देखने, सुनने और खरीदने की आदत हो गए हैं | अभी फ़िलहाल हमें आपकी दुकान का ही पता याद हैं | ये दुकान चलते रहिये ....

Samagra said...

Raveesh,
What you have accepted as a reporter, I think you know more than me and I am no one to comment upon that.But, you may feel a bit relaxed that whenever i am at my home I watch your report and literally I adore you as an orator.
As much I know about journalism I can say you have very less to deliver for whole day.If news-channels have lost their viewrs base then they themselves are culprits as a viewer can't afford a youtube video on a news channel leaving a special show of Indian Idol.What news channels talk about is building an utopia which is all rubbish on real grounds.
Once again,I am thankful to one of the finest reporter of our country and one one of my favorites too.

Rajesh Roshan said...

मैंने हैरी पॉटर की सातों किताबें पढ़ी हैं...इस दौर का हूं और किताबों का कंटेंट मुझे अच्‍छा लगा सो सारी पढ़ ली...मुझसे बड़े ऑफिस के सहयोगियों को बताया तो कहते हैं कि इससे अच्‍छी है चंद्रकांता संतति, उसे पढ़ो...मैंने कहा दे दीजिए मैं पढ़ लूंगा...

कहने का मतलब है जमाने के साथ आपको चलना होगा...आप बासमती उगाते हैं...लेकिन अगर आपाको आईपीआर के बारे में नहीं पता है तो जल्‍दी ही आपकी बासमती पर किसी और का हक होगा...

शायद चंद्रकांता संतति के पब्लिशरों को इंटरनेट के जमाने में थोड़ी बहूत प्रचार जरूर करना चाहिए...कंटेट अच्‍छा है तो उसे चलने से कोई नहीं रोक सकता...

Content is King but we should know how to advetize content

Rajesh Roshan said...

आईपीआर की जगह पेटेंट पढें. हमें पेटेंट और आईपीआर जैसे नए कानूनों से अवगत होना चाहिए.

JC said...

जैसा रंगनाथ जी ने भी सही कहा, नीले के ऊपर काले अक्षर पढने में तकलीफ हो रही है (दोनों रंग आकाश के ही हैं - एक दिन के समय और दूसरा रात को - जो पृष्ठभूमि का ही काम करते हैं! दिन में सफ़ेद सूर्य और रात को सुनहरे चन्द्रमा और तारों के dharati पर vibhinn roop में aa खेल rachane के liye!)...

प्रदीप जिलवाने said...

रवीश जी/नमस्‍कार,
अपनी पोस्‍ट में आपने मीडिया के संकट काल की न सिर्फ पहचान की है, बल्कि उसके कारणों पर भी सार्थक बहस की है.
मैं तो वर्तमान समाचार चैनलों को कभी देखता ही नहीं, हो सकता है आपको मेरा कथन कुछ कड़वा लगे मगर इसे अन्‍यथा न लें, मैं दूरदर्शन के समाचार प्रसारण को देखना ज्‍यादा पसंद करता हूं. 15 मिनट में सारे समाचार. संयमित और मुद्दे की बात. खबर को उतना ही महत्‍व जितने की वह खबर हकदार है.
बहरहाल आपकी पोस्‍ट पठनीय है. बधाई

cardiac_carnage said...

Aaab bhi bhoot pakadne wala show dikhane lagiye TRP badh jayegi..

INDIA TV wale dikhate hai aur meri kaam wali ko bahut pasand hai..

Mrityunjay Kumar Rai said...

पता नहीं क्यों पर ये प्रचार कुछ जम नहीं रहा है . समाचार एक प्रोडक्ट बन गया है ओउर दर्शक उपभोक्ता

Vikas Kumar said...

रवीश जी.....आपसे मेरी चैट से कम ही बात होती है लेकिन जब आप मुझसे पूछते हैं तो बुरा नहीं लगता.

क्योंकि जब मेरा भी कोई लेख छपता है तो मैं भी अपने जानने वालों को ऐसे ही बताता हूं.....हा हा हा

वैसे आपके इस पोस्ट को पढ कर अचला शर्मा द्वारा लिखा गया रेडियो नाटक "रेस" याद आ गया

डॉ .अनुराग said...

अच्छा कन्फेशन है .यही हाल रहा तो इन्स्युरेंस एजेंट की तरह लोग पत्रकारों से भी डरने लगेगे .......वैसे हमारे हरी जोशी जी शरीफ आदमी है ...ओर आपके चैनल वाले श्याम .कभी नहीं पूछते या एस एम् एस करते के' देखो '

Anonymous said...

जो भी हो टीवी संकटग्रस्त हो गया है। यह एक जाता हुआ माध्यम लगता है।

Internet will kick the filthy idiot box out. May tv go obsolete...amen.

Anonymous said...

जो भी हो टीवी संकटग्रस्त हो गया है। यह एक जाता हुआ माध्यम लगता है।

Internet and new media will kick the filthy idiot box out. May tv go obsolete...amen.

Asad ali said...

आपने आच्छा पकड़ा भाई
मेरी शुभकामनाये

चन्दन कुमार said...

facebook par agle ravish ki report ka pata aur subject dekh kar hi laga trp nahin aa rahi hai. yah bhi sahi hai ki jitna prachaar prasaar soshal site par hota hai ham samajh baithte hai ki hame log khoob dekh rahe hain. filmon ki tarah marketing me ham lag gaye hain. jahan prachar-prasar se hit hone ka short-curt formulae apnaya gaya hai. par yah chalne wala nahin hai. kites ki halt ham dekh hi chuke hain. ud nahi payee. aapke blog par yah peeda dekh laga pata nahin sir aapme itni imaandaari kaha se aayee hai. maf kijiyega zada kah gaya vah to aapme pahle se hi hai. par aap jante hain sir facebook, aur bhi doosare site par jitne log aapki baton me sahmati jatate hai unke liye aap nayak hain. agar itne imaandaar sabhi hone lage to koi samsya hi nahin rahegi.

Parul kanani said...

kehte hai pyar aur jang mein sab jayaj hai..aur phir ye to 'rann' hai :)

JAIVEER PUNDIR said...

RAVISH JI NAMSKAR,
AAPKA LEKH BAHUT AHCHHA LAGA.AAJ NEWS CHANNELS KE PASS KHABERON KI KAFI KAMI LAGTI HAI.NEWS CHANNELS KO APNI SOCH BADLNI HOGI,JAB TAK CHANNEL BADE LOGON KI HALKI-PHULKI SI BAATON KO BADHA CHADHA KAR DIKHANA BAND NAHI KARTE TAB TAK YEHI HAAL HONE WALA HAI.
ROCHAK AUR GYANWARDHAK KHABRON KO AAJ KOI BHI CHANNEL PRASTUT NAHI KARTA.CRIME NEWS KO AISA PRASTUT KIYA JATA HAI,JAISE CRIME KARNE WALA KOI BAHUT BADA HERO HO.AUR JO LOG DESH AUR SAMAJ KI BHALAI KE LIYE KAAM KAR RAHE HAIN,UNKE KAAMON KO KHABRO MAI JAGAH HI NAHI MILTI.YA FIR YE MAAN LIYA JATA HAI KI YE HOT NEWS NAHI HAI.AAJ IN SAB SE DARSHAK UB CHUKE HAIN.
NEWS CHANNELS KO APNI SOCH MAI BADLAO LANA CHAHIYE.DARSHAK AAJ BHI ACHHHAI HI PASAND KARTE HAIN.
JAIVEER PUNDIR
MAGIK TV
#9719405646

आशुतोष कुमार said...

येल्लो , मैं तो फेसबुक से यह सोच कर यहाँ आया था कि यह आप की आने वाली रिपोर्ट है या उस के बारे में है .

Unknown said...

Wen the journalist wakes up, the greed to be heard n talked of has to diminish............else............every journalist will face the dilemma that Ravish Sir is facing..........the blurring line between glamour and journalism must be broadened to save Journalism

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
गिरधारी खंकरियाल said...

RAVISH JI AAPKI REPORT TO DEKHNE KO NAHI MILI VAKT NAHI HOTA. PRANT MAIN KHABRON KO DEKHNA HI PASAND KARTA HON SIRF DOORDARSHAN KI. SAAF AUR SUTHARI. KOI BHOND PRADARSHAN NAHI. YAA PHIR COLORS PAR SERIALS DEKHNA PASAND KARTA HON. YADI 9.30 PAR GHAR PAHUCH GAYA TO VINOD DUA LIV JAROOR DEKHNAPASAND KARTA HON. KAHNE KA MATLAB PRASTUTI KA HAI. AB AAP CHILLA CHILLA KAR NEW REPEAT KARTE RAHENGE TO CHANNEL BAND HI KARNA PADEGA.AUR GALTI SE INDIA TV KHUL GAYA TO MMOD HI KHARAAB HO GAYA HAI. AAPKI ATMGLAANI SACH HAI. YE SAB KUKERMUTON KITARAH UG AYE PATRKARON KIJAMAT AUR KACHARE KE DIBE KI TARAH NEW CHANNE KA HI KARA DHARA HAI. TO PHIR KYUN AASON BAHATE HO APE KARTOOT PAR. CHILLAO AUR JOR JOR SE TAKI BACHE HUYE SUNNE WALON KE BHI KAN PHOOT JAYEN AUR KOI BHI NA SUN SAKE AAPKI JAMMAT KO.

deepak said...

ravish ji apka dard un sab jaisa hai jo apne apne field me kam kar rahe hai aur apne he kam ko sresth mante hai .hona bhi esa hi chahye.lakin ye mat bhulo ek bhut jyada tadad un logo ki bhi hai jo ap tak feed back nahi pahucha pate. ya yo kahe aap unse puchte hi nahi.jo apke bhakt hai.bhakto ko khojange to aap ki peera kam hi nahi khatam ho jayegi.
me bhi esa hi hu.

Sushil Raghav said...

रविश जी नमस्‍कार
सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूं कि आपके ब्‍लॉग का नया कलेवर आंखों के अनुकूल नहीं है तो कृपया इसे बदल दें।
दूसरी बात यह है कि हर पञकार का काम ही उसका प्रचार होता है। आपकी बढाई नहीं कर रहा हूं लेकिन मैं ऐसे काफी लोगों को जानता हूं तो अपकी रिपोर्ट देखना पसंद करते हैं। अगर आप चाहते हैं कि लोग ज्‍यादा से ज्‍यादा आपको प्रतिकिया दें तो आपको भी उनको जवाब देना होगा। हरिवंश राय बच्‍चन के पास काफी पञ आया करते थे और वह नियमति रूप से सभी पञों को जवाब भी देते थे। चाहे उन्‍हें सिर्फ 'पञ के लिए धन्‍यवाद' ही लिखकर जवाब देना होता। कई बार जब उनके पास पञों का ढेर लग जाता तो वह सिर्फ 'प के लिए ध' ही लिखकर अपने प्रशंसकों को जवाब देते लेकिन उत्‍तर जरूर देते। यह तो आप भी मानेंगे कि आप दर्शकों से हैं दर्शक आप से नहीं है और वह ग्राहक है जो हमारे यहां पर देवता होता है। इसके बाद भी आप उसकी उपेक्षा करके कैसे आगे बढ सकते हैं। इसलिए आप ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को जवाब दिया करें इससे आपको भी अच्‍छा लगेगा। जहां तक मेरी अपनी बात है तो मै आपकी रिपोर्ट काफी समय से देखता आ रहा हूं, जिनमें मेरी पसंदीदा रिपोर्ट कूडे का ताजमहल है। आपने एक बात हो लिखी है कि आपको प्रतिक्रिया देने वालों में ज्‍यादातर पञकार या भावी पञकार होते हैं तो इसमें परेशानी क्‍या है। उन्‍हें आपका काम अच्‍छा लगा तो उन्‍होंने अपनी बात आपके समाने रखी। आखिर वह भी तो आपके दर्शक ही हैं।
आपकी प्रतिक्रिया के इंतजार में
सुशील राघव

an shibli said...

रविश जी यह सही है की न्यूज़ देखने वालों की संख्या घाट रही है मगर यह भी सच है की कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनके चाहने वालों की कमी नहीं हैं। मैं झूठ नहीं बोल रहा आप भी वैसे ही पत्रकारों में से हैं जिन्हें लोग देखना और सुनना पसंद करते हैं। मैं खुद पत्रकार हूँ मेरी यह कोशिश होती है की रविश की रिपोर्ट विनोद दुआ लाइव और चकरवेउव ज़रूर देखूँ। किसी कारण से नहीं देख पता तो दुख होता है।

an shibli said...

रविश जी यह सही है की न्यूज़ देखने वालों की संख्या घाट रही है मगर यह भी सच है की कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनके चाहने वालों की कमी नहीं हैं। मैं झूठ नहीं बोल रहा आप भी वैसे ही पत्रकारों में से हैं जिन्हें लोग देखना और सुनना पसंद करते हैं। मैं खुद पत्रकार हूँ मेरी यह कोशिश होती है की रविश की रिपोर्ट विनोद दुआ लाइव और चकरवेउव ज़रूर देखूँ। किसी कारण से नहीं देख पता तो दुख होता है।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

सही कहा आपने, इसमें असहमति का प्रश्न ही नहीं उठता।
………….
दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

pricey said...

Article ghazab kaa hai, bilkul isiliye aapse anurodh hai ki aap ek baar SIDH ho aayen TRP key bhoot sey toh mukt ho jaayenge (Meri Gurantee hai likhit mein)

Unknown said...

रवीश भाई बहुत सही लिखा है, सच्चाई का अहसास है.. कम से आप इसे लिखने की हिम्मत तो कर पाए.. काफी बड़ी तादात में लोग मान नहीं पा रहे अब तक, कि अपनी हरकतों से टीवी इतना गिर गया है कि (आम) लोगों ने देखना तकरीबन छोड़ दिया.. आप सही लिखते हैं कि लोग या तो एंटरटेनमेंट की तरफ चले गए हैं या खेल कूद देखते हैं.. टीवी न्यूज में तो आत्मा,परमात्मा हंसी ठिठोली वगैरा ही रह गई हैं.. बाकी जो बचा वो दलाल चला रहे हैं.. आशा है आप मेरी बात समझेंगे..

Rajeev Singh Raju said...

बदले समय में तो सब का धंधा बदला है रवीश जी,,मीडिया में जब आप जैसे विग्यापन बाजों का आगमन हुआ तो लम्बे झोला और कुर्तो वाले आदर्शवादी पत्रकार सीना पीट कर मर गये,,,दस बीस विगड़ैल किस्म के दर्शकों का साथ लेकर आप उनका हक मार गये,,तब आप जैसे लोगों को तरस नहीं आयी। सोचा हम तो अमर हो गये,,लेकिन आज वही दर्शक जब होशियार हो गया, पढ़ लिख गया तो आप लोगों को रोना आ रहा है,वो भी दर्सकों की उदासीनता की आड़ लेकर। और उसके बाद भी किया क्या,,अन्दर कोई भी मसाला भर दिया और सोचा समोसे के नाम पर सब बिक जायेगा,,और जब नहीं बिका तो आप लोग कहने लगे कि दर्शक उदासीन हैं,,,आप तो गांव के आदमी हैं। गांव में एक कहावत है कि ‌‍,,,जेके बंदरिया ओही से नाचै,,,। लेकिन मीडिया ने हर बंदरिया को नचाने का कॉनट्रैक्ट ले लिया। देश की समस्याओं का हल ढ़ूढ़ने वाले प्रणव राय राखी सावंत के लिये दूल्हा ढ़ढ़ने लेगे,,,चेतनाशील विनोद दुआ सिबाका गीतमाला की तरह मनपसंद गीत सुनाने लगे,,इंडिया को फिट रखने के लिये,,,टीवी स्क्रीन को जिमखाना बना दिया,,और दोपहर तक सोने वाली लड़कियों को योगासन कराने का जिम्मा दे दिया,,कहां है खबरों की खबर,,जिसने जो किया उसे खुश करने के लिये वही दिखा दिया,,क्या करना चाहिये ये कौन बतायेगा?,,खाप पंचायतों को पानी पीकर गरियाने वाले पत्रकार ये क्यों नहीं बताते कि खाप पंचायतों ने दहेज रोकने के लिये कितना काम किया है,,पत्रकार निरुपमा पाठक हत्या मामले में उसके मां,बाप, भाई को मुजरिम घोषित करने वाले पत्रकारों को ये बोलने कि हिम्मत क्यों नहीं होती,,कि कुवांरी बेटियां गर्भवती होकर मां के सामने न जायें,,खबर सबसे पहले के चक्कर में ये उसूल कहां लुप्त हो गये,,,वाह रवीश जी जैसा देश वैसा भेष,,।शुक्र है उदारीकरण का नहीं तो विदर्भ के किसानों से ज्यादा पत्रकार भूख के कारण आत्म हत्या करते,,पता नहीं आप सही में भावुक हैं,,या इमोशनली ब्लैकमेल कर रहे हैं।

Pankaj Kapahi said...

nmskaar sir,,,,,,
aap himat na hro hr cheej ka wakt aata hai aaj yellow jounalism or masala news ka hai to kuch dino me logo ki bigdti halt shi hogi or log shi report ko dekhna psnd krenge aap apna kaam jari rkho log bdlenge

prakashmehta said...

what is news?
minister movements?
bhoot and all??
studio cheap debate hey i hate manish tiwati kapil saibbal chandan mitra ravishankar prasad all say same things in all sunjest and yes manushindhvi

news is ravish kumar bihari view of every things
ya youtube download of india tv

enjoy yar kahao kamao mast raho

why behaving like pseudo intellecual

विजय प्रकाश सिंह said...

रवीश भाई, आज कई दिनो बाद क़स्बा पर आया । बदला रंग देखकर अच्छा लगा । इस लिए नहीं कि रंग मे कोई खास बात है , बस बदलाव अलग सा लगता है , मतलब जो कलर सोच कर क्लिक किया , उसके बदले दूसरा आया तो लगा गलत साइट तो नही , दुबारा चेक किया तब लगा रवीश जी बदल गये ।

आप का आज का विषय , अब क्या कहूं , इतने दिनो से आप को पढ़ रहा हूं , आप की साफ़गोयी का हमेशा से कायल हूं । बस गमन फ़िल्म के गाने कि यह लाइन याद आती है :

सीने मे जलन आखों मे तूफ़ान सा क्यूं है, इस शहर मे हर शख़्स परेशान सा क्यूं है ।

विजय प्रकाश सिंह said...
This comment has been removed by the author.
हिन्दुस्तानी said...

भाई साहब, ये मेरी राय है, टेलीविजन के समाचारों पर से दर्शकों का विश्वास अब धीरे धीरे कम हो रहा है, प्रिंट मीडिया का हश्र इतना नहीं होगा जितना टीवी का क्यों की दर्शक जो देखना चाहता है वो टीवी नहीं दिखाता, समाचार चेनल भी मनोजंजन परोसने लगे है और उनसे अच्छा मनोरंजन डेली सोप मैं होता है तो कोई वो क्यों ना देखे समाचार क्यों देखे ?

दूसरा, समाचार चेनल अपने समाचार भी प्रायोजित करते है एकतरफा होते है वस्तुस्थितियों का अपने ढंग से प्रसारण जैसे पैसे ले कर समाचार दे रहे हो कभी कभी ये लगने लगता है की कहीं ये विज्ञापन एजेंसियां तो नहीं बन गयी ?

आपना प्रसारण एक अलग प्रकार का होता है उसमें सच्ची पत्रकारिता झलकती है और सही मुद्दों को तलाशते नजर आटी है रवीश की रिपोर्ट, पर जब समाचार चेनलों से मोह भांग होने लगा है तो रवीश की रिपोर्ट कब आई और कब चली गयी ये रवीश की रिपोर्ट के भक्तो को भी पता नहीं चलेगा, इसलिए आपका अपनी रिपोर्ट को देखने के लिए फसबूक इत्यादि पर चर्चा करना कोई गलत नहीं कहा जा सकता, कमसकम आपकी रिपोर्ट के दीवानों के लिए तो ये एक सौगात से कम नहीं :)

Ashkara Farooqui said...

रवीशजी
आपकी रिपोर्ट वस्तुपरक व तफ्तीशी होती है.
आज ही सुबह आप की गोत्र वाली रिपोर्ट का अंक 'वाच' किया है.
ईश्वर आपको बनाए रखे.

हिमांशु डबराल Himanshu Dabral (journalist) said...

काफी हद तक आप सही है...आजकल ऐसा ही देखने को मिलता है...लेकिन ये आने वाले समय में और फैल जायेगा...इसी आदत के करण हमारे एक पत्रकार मित्र ब्लोगिंग और शोसल नेट्वोर्किंग भी छोड़ चुके है...अब कहते ही की यार नशे से मुक्ति मिल गयी...
लेकिन आपने ऐसा सच लिखा है जिसे बहुत कम लोग मानने को तैयार है...
एक अच्छे और सच्चे लेख के लिए बहुत बधाई....
-हिमांशु डबराल

delhidreams said...

:) चलिए अब टीवी को महसूस हो रहा है, जो किताबों को लगा होगा टीवी के आने पर! और आजकल पत्रकारों का हाल हम कवियों से कम नहीं, दर्शकों के लिए वैसे ही भटकते-तरसते हैं जैसे हम पाठकों के लिए :)

और अब यहाँ आया ही हूँ तो अपना 'विज्ञापन' भी कर ही हूँ. एक नयी ग़ज़ल "मुश्किल तो नहीं, आसान भी नहीं" पेश-ऐ-खिदमत है, इस लिंक पर: http://delhidreams.blogspot.com/2010/07/blog-post.html

अच्छी लगे तो जरूर बताइयेगा, और बहुत अच्छी लगे, तो थोडा प्रचार भी कर दीजियेगा. हम दोनों में से किसी का तो भला हो :)

मयंक said...

सवाल ये है कि पत्रकार क्यों आपने को अलग या ऊंचा समझें और मानें....क्यों जब एक फेरीवाला चीख कर कह सकता है कि उसके अमरूद असली इलाहाबाद के हैं...और बाकियों से ज़्यादा मीठे हैं....तो पत्रकार अगर अपने कार्यक्रमों का प्रचार करते हैं...फेसबुक या अन्य माध्यमों से तो बेहत है इसे संकट के तौर पर नहीं बल्कि पटती खाई के तौर पर देखा जाए....कि अब फेरीवोले और पत्रकार में ज़्यादा अंतर नहीं बचा....कारण वाकई ये है कि हम पत्रकारों ने अंतर छोड़ा ही नहीं....और ज़ाहिर है कि जिसका अमरूद ज़्यादा मीठा होगा....और सस्ता भी...उसी का बिकेगा....
एक औऱ ईमानदार लेख के लिए धन्यवाद पर संकट इतना बड़ा बी नहीं है....और है तो हमारा खुद का पैदा किया हुआ....अपनी विश्वसनीयता खोने की सज़ा पा रहे हैं हम....

शोभना चौरे said...

मै तो आपके प्रचार के बिना ही आपकी रिपोर्ट देखती हूँ |जैविक खेती वाली रिपोर्ट बहुत अच्छी लगी थी |बाकि सतीश पंच्मजी की बात से सहमत

Abhishek Anand said...

There is an issue with kind of content as well as the viewers.

But maine abhi tak bbc/cnn sarekhe program nahi dekhe..the closest we have is NDTV.

Mayus na hon aap ..log abhi bhi pasand karte hain aacha kaam..

Main Tubaah pe saare program dekhta hoon..including..Ravish ki report..we need to find new ways to get revenue out of internet/3G..only TV will not do in the long run.

Abhishek Anand said...

There is an issue with kind of content as well as the viewers.

But maine abhi tak bbc/cnn sarekhe program nahi dekhe..the closest we have is NDTV.

Mayus na hon aap ..log abhi bhi pasand karte hain aacha kaam..

Main Tubaah pe saare program dekhta hoon..including..Ravish ki report..we need to find new ways to get revenue out of internet/3G..only TV will not do in the long run.

Abhishek Anand said...

There is an issue with kind of content as well as the viewers.

But maine abhi tak bbc/cnn sarekhe program nahi dekhe..the closest we have is NDTV.

Mayus na hon aap ..log abhi bhi pasand karte hain aacha kaam..

Main Tubaah pe saare program dekhta hoon..including..Ravish ki report..we need to find new ways to get revenue out of internet/3G..only TV will not do in the long run.

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

रवीश जी आपका यह लेख मैं अपनी राष्ट्रीय बेसहारा जन पत्रिका में लेना चाहता हूं...
आपका
अखिलेश कुमार
अमर भारती मीडिया ग्रुप दिल्ली
meil.id akhileshnews@gmail.com

BIHAN said...

1 sodh kar raha hon lalit narayan mithila university se.. hindi sahitya mein media vimarsh.aapki madad chahiye .karengye? kunal9327kumar@gmail.com

kunal kumar