मोबाइल में पड़ी तस्वीरें

यह सब इतिहास का हिस्सा बन जायेंगी । गुड़गाँव में योगेंद्र यादव के प्रचार के समय ली थी । 


कन्नड़ उड़ीया में आम आदमी

अलग अलग भाषा बोली के हिसाब से आम आदमी का भी प्रचार चल रहा है । उड़ीया टी शर्ट और कन्नड़ टोपी में कार्यकर्ता दिखे । 


हम सब एक हैं बस टीवी में नहीं हैं

मीडिया में जो चुनाव दिखता है वो चुनाव की हक़ीक़त के बहुत क़रीब नहीं होता । हम तक जो पहुँचता है या परोसा जाता है वो मीडिया के पीछे होने वाली गतिविधियों का दशांश भी नहीं होता । जो सवाल होते हैं वो हवाई होते हैं और जो जवाब होते हैं वो करिश्माई । सबकुछ इस तरह से स्वत आयोजित हो जाता है कि लोगों को प्रायोजित लगना स्वाभाविक है । एक ही बात का सुकून रहा कि बड़ी संख्या में लोग मिले जो इस सच्चाई को समझते हैं । इसका मतलब यह भी नहीं कि इस समझ को वे अपने फ़ैसले का आधार बनाते ही हो । सिर्फ छिपाने वाला ही पर्दा नहीं करता, जानने वाला भी करता है ।

जैसे आप कभी कैमरे पर होते नहीं देख पायेंगे कि कैसे अतीत के एक बड़े राष्ट्रीय नेता के प्रपौत्र विदेश से बुलाये जाते हैं ताकि वे अपने दादा का नाम लेकर अपनी जाति के इलाक़े में घूम सकें । सेवापुरी शायद भूमिहार बहुल इलाक़ा है । उस इलाक़े में प्रचार के लिए बिहार से भी बड़े नेता हैं । प्रपौत्र महोदय के साथ का लड़का कई बड़े नेताओं का नाम लेता है । शान से बिना पूछिए जाति बताता है । मैं सन्न रह गया । जिस राजनेता का ज़िक्र हमेशा करामात करने में आता रहा है उसका प्रपौत्र जात लिये घूम रहा है । क्या राजनारा़ण भूमिहार थे ? कहीं मैंने लंका के शोर में ग़लत तो नहीं सुन लिया । बहुत देर तक यही सोचता रहा है कि रणनीतिकार ने क्या शानदार डिटेलिंग की है । ख़ानदानों की खोज की है और विदेशों तक से बुलाया है । युवक बताता है कि हमारी ड्यूटी सेवापुरी में लगी है । सी पी ठाकुर की को भी बुलाया गया है । एक लाख वोट है भूमिहारों का । 

भीड़ में मेरे प्रदेश से कई नेता मिलते हैं । कहते हैं उनका कवर कर लीजिये । ये हाल ही में भाजपा में आए हैं । इनका क्यों कर लें ? धरना हो रहा है । सबका कवर होगा । इनका करें या उस कार्यकर्ता का जो इस गर्मी में तपती सड़क पर लेटा है । मुँह दिखाई की परिपाटी पर वो नेता भी चलता है जो राजनीति में एन आर आई, एम एन सी, आई ए एस और सेना से आता है । आज कल से राजनीति में विदेशों से आए लोग ऐसे परिचय देते हैं जैसे अहसान कर रहे हों । जबकि कर वही रहे हैं जो अपना सब गँवा कर स्थानीय कार्यकर्ता कर रहा है । लेकिन इनके मियामी, हावर्ड बोलते ही लोगों के कान खड़े हो जाते हैं । ये लोग भी अपने स्कूल कालेज का नाम जात की तरह बताते हैं ।

एक और राजपूत नेता वहाँ जा रहे हैं जहाँ राजपूत बिरादरी के लोग हैं । चौरसिया समाज के बीच चौरसिया जा रहे हैं । पटेलों के बीच पटेल जा रहे है । हर मोहल्लेे की पहचान जाति और भाषा के आधार पर की गई है । जनसम्पर्क के ज़रिये इन सब पहचानों को संगठित किया जा रहा है । कोई तो टूटेगा कोई तो जुटेगा । नतीजा जब आयेगा तो जानकार लिखेंगे कि इस बार जाति की राजनीति टूट गई । जबकि यह चुनाव जातियों की नई डिटेलिंग के साथ लड़ा जा रहा है । बीजेपी ने वाक़ई इस चुनाव को युद्ध की तरह लड़ा है । सब जायज़ है । बिहार के अख़बारों में विज्ञापन छपते हैं जिसमें मोदी के साथ एक जाति विशेष के नए पुराने नेताओं तस्वीर होती है । टीवी को यह सब नहीं दिखता । वो सिर्फ बयान सुनता है । बयान बंदर । बयान लोक कर पेड़ पर । इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस सपा बसपा या जो भी प पा वाली पार्टियाँ हों वे जातियों की राजनीति नहीं कर रही हैं । 

होटलों में जाइये । आपको कई उद्योगपति और कारोबारी मिलेंगे । इनमें गुजरात से आए कारोबारी और उद्योगपति हैं । जिस चुनाव को जीता हुआ घोषित कर दिया गया है वहाँ उद्योगपति क्यों आ रहे हैं । कई तो ऐसे उद्योगपति भी हैं जो मौजूदा सरकार में लाभांवित होते रहे हैं । कोई अपनी तरफ़ से दस हज़ार नेता पर बने कामिक्स की किताब से आया है । हिन्दी अंग्रेज़ी में बाल नरेंद्र की प्रतियाँ बाँट रहा है । एक अजीब सी राजनीति संस्कृति पर बन रही है जो कई कारणों से आलोचना के केंद्र में ही नहीं है । रसूख़ वाले लोग आराम से बताते हैं अरे फ़लाँ होटल में वो उद्योगपति ठहरे हैं जो बल्ब बनाते हैं वो हैं जो टीवी बनाते हैं वहाँ वो हैं जो गंजी अंडरवियर बनाते हैं । 

वाराणसी के होटलों की लाबी में जाइये । अलग अलग राज्यों से अलग अलग जाति और भाषा के नेता आते जाते दिख जायेंगे । ज़्यादातर तो कांग्रेस बीजेपी के ही होते हैं । बसपा का तो कोई बेचारा भी नहीं दिखता । सारे स्टार वाले होटल हैं । इन होटलों में नेता और उद्योगपतियों के अलावा मीडिया के लोग ठहरे हैं । सुबह सुबह निरीह कार्यकर्ता इन नेताओं को लेने आते हैं । लाबी में खड़े खड़े इंतज़ार करते हैं । परफ़्यूम और कलफ़ से लकदक कुर्ता पहने नेता जी उतरते हैं । फारच्यूनर और स्कार्पियों धायं से रूकती है और नेता जी को कार्यक्रम में ले जाती है । इसमें भी एक भेदभाव दिख गया । एक समृद्ध पार्टी के दलित नेता को सैंट्रो कार या आई टेन में जाते देखता हूँ । आम आदमी पार्टी को नेता भी किसी बड़े होटल में ठहरे हैं क्या । मुझे़ नहीं दिखे । इतने महँगे होटलों में तो नहीं दिखे । 

खैर शाम होती है । ये नेता धीरे धीरे लौटने लगते हैं । 
दिन भर राष्ट्रवाद और संस्कार पर भाषण देने के बाद शाम अचानक इन सबसे से ऊपर उठ कर तर होने लगती है । थकान शायद शराब से ही उतरती होगी । बनारस बजबजा रहा है । सत्ता को सेवकों से भर देने वाली राजनीति संस्कृति शाम को होटलों में मिलती है । लाबी में खड़ा परिश्रमी या शायद आदर्शों या विचारधारा में डूबा कार्यकर्ता अपने लिए भी ऐसे दिनों की कल्पना करता होगा । आप कांग्रेस और बीजेपी में कोई फ़र्क नहीं कर सकते । अब तो यह बहस भी नहीं है । राजनीति की एक ही संस्कृति होती है । सत्ता । और सत्ता की देहभाषा एक ही होती है । रूतबा । पैसा,पावर और पोलिटिक्स । इनका संगम टीवी पर नहीं दिख सकता । टीवी सिर्फ बयान दिखा सकता है । जो टीवी देखते हैं वो भी भीतर से ऐसे होते हैं । बाहर से विकास, ग़रीबी दूर करने का जादू ,राष्ट्रवाद सेवा और विकास के भाषणों को पसंद करते होंगे । अंदर से कुछ और होते तो टीवी के ख़िलाफ़ सड़कों पर न होते । दर्शक भी तो इस गठजोड़ में शामिल है । होटल में नहीं रूका है तो क्या हुआ ऐसे सवालों पर चुप तो है । हम सबकी तरह । हम सब एक दूसरे के जैसे हैं । अपने अपने कमरों से निकल कर होटल की लाॅबी में घुलमिल जाते हैं ।

बनारस क्लब

बनारस क्लब गया था । डाक्टर नमित, शिप्रा और बालक शुभम के साथ । शानदार शाम रही । 1848 का यह क्लब है । शायद हिन्दुस्तान के 'प्राचीन' क्लबों में से एक होगा । क्लब की दीवार को बनारस की अलग पहचान से नवाज़ा गया है । मनीष खत्री की पेंटिंग से अलग ही बनारस का रूप उभरता है । उनकी पेंटिंग बनारस को अलग पहचान देती है । बल्कि बनारस की पहचान को बनारस में घर देती है ।





क्लब शानदार है । साइकिल ट्रैक है । बड़ा सा टीवी स्क्रीन है और हरी दूब का मैदान । बनारस की धार्मिकता में हम इतने डूब गए हैं कि भूल ही गए कि न्यू ईयर पर बनारसी डाँस कहा़ं करते हैं । हलक की तलब होती है तो कहाँ जाते हैं । यहाँ के बार का नाम भी हाउस आफ़ लार्ड है । बनारस के विमर्श में भरी पौराणिकता में थोड़ी आधुनिकता ठेलने के लिए यह तस्वीरें लेकर आया हूं । सूत्रों के मुताबिक़ आजीवन सदस्य बनना हो तो बारह लाख देने पड़ेंगे ! 


घूँघट में मर्द बनारसी !

गर्मी ने बनारस को गमछा आर्ट दिया है । तेज़ धूप से अपने नाज़ुक गालों और ललाटों को बचाते हुए तरह तरह के गमछानशीं मर्द दिख जायेंगे । कोई इन्हें घूँघट की तरह ओढ़े रहता है तो कोई मुरेठा बाँध के चाक चौबंद । गमछे में कुछ मर्द ख़ूबसूरत हो जाते हैं तो कुछ भकुआये और बकलोल भी लगते हैं । गमछा बाँधने की भी अपनी अपनी कला है । गमछे के भी कई प्रकार है । करोड़ों रुपये का गमछा कारोबार है । बनारस से लेकर बिहार तक में । आइडिया दे रहा हूँ । किन्हीं रघु राय जी को इस पर फोटो फ़ीचर करना चाहिए ।









बदलने लगा बनारस में सपा का पोस्टर





ब्रांड मोदी बनाम ब्रांडेड झाड़ू

नरेंद्र मोदी ब्रांड भी हैं । बनारस के साजन तिराहा पर युवाओं के जंक और फंक सामान बेचनेवाले ने बताया । कहा कि ऐसा कभी नहीं देखा था । युवा आते हैं और सामान देखते हैं और अपने आप ख़रीदने लगते हैं । बस जो बीजेपी कार्यालय से बंट रहा है वो नहीं रखते क्योंकि युवा जो है कुछ अलग चाहता है । मोदी कंगन बीस रुपये का है । मोदी हेयरबैंड और पिन तो ख़त्म ही हो गया । 

दुकानदार ज़रा स्मार्ट भी हैं । पता है कि प्रेस को क्या बोलना है और बोलने के बाद जो छपता है उसे वापस दुकान में टांगना है । इसलिए मोदी छाप टी शर्ट है तो अरविंद छाप भी है । डेढ़ सौ रुपये की टी शर्ट । 

 
दुकान के बाहर मोदी मैनिक्विन है । मुखौटा लगाकर मूर्ति को मोदी बना दिया गया है । मोदी जिस टोपी को पहनते हैं वो भी दो सौ रुपये में मिल रही है । 


लड़कियों के लिए मोदी के नाम पर स्कार्फ़ है । पचास रुपये की । बटन है । साढ़े चार सौ रुपये का केसरिया पर्स है । वुड्स कंपनी का । 



 पैराशूट है जो हवा में मोदी मोदी करता उड़ जाता है । एक अख़बार में ख़बर छपी है तो उसकी कतरन भी है ।


दुकानदार को रंज है कि केजरीवाल दस बीस रुपये की झाड़ू से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं । इसलिए डेढ़ सौ रुपये का झाड़ू लाँच कर दिया गया है । सफ़ेद रंग से रंगा हुआ है और कलाई से बाँधने के लिए बैंड भी है इस झाड़ू में । थोड़ा क्लास है । 

मोदी और अनुप्रिया पटेल

पूरे वाराणसी में भाजपा की दो ही प्रकार की होर्डिंग लगी है । एक में भाजपा बनारस और गंगा को लेकर नारे लिखे हैं और दूसरे में इन्हीं बातों को लेकर नरेंद्र मोदी की तस्वीरें हैं । सिर्फ मोदी की तस्वीरें । लेकिन पटेलों के इलाक़े में बीजेपी का प्रचार कवर मुझे ये पर्चा दिखा । मोदी और अपना दल वाले पटेल समाज की नेता अनुप्रिया पटेल की तस्वीर एक साथ । पिक्चर में इन दोनों से बड़ी तस्वीर सरदार पटेल की और सभी तीनों से सबसे छोटी तस्वीर वाजपेयी की ।

इस पर्चे पर लिखे साँझी विरासत और संस्कृति का मतलब क्या है आप समझ सकते हैं । किसी होर्डिंग में तो मोदी के साथ वाजपेयी के अलावा कोई नहीं दिखा लेकिन यहाँ अनुप्रिया पटेल हैं । यहाँ तक कि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी नहीं । वाराणसी के ही दूसरे इलाक़े में ऐसे पर्चे नहीं दिखे । तो किया ये सिर्फ पटेल इलाक़े के लिए तैयार किया गया है । यही नहीं पटेलों की बस्ती में प्रचार के लिए बीजेपी ने गुजरात के पुरुषोत्तम रूपाला को बुलाया है । वहाँ मौजूद एक कार्यकर्ता ने बताया कि ये पटेलों के बड़े नेता हैं । इन मोहल्लों में सरदार पटेल को चतुराई से पटेल नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है । वैसे सरदार पटेल के बारे में कोई कितना भी कहे पटेल और भगत सिंह की तस्वीरें पटेल ओर जाट समाज की रैलियों में लगाई जाती है । अब बीजेपी को मोदी के साथ अनुप्रिया पटेल की तस्वीर क्यों लगाना पड़ी और जब ये दोनों आ भी गए तो सरदार पटेल की क्यों । आप इसके कई मतलब निकाल सकते हैं मगर यह भी ध्यान रखिये कि इसी पर्चे के पीछे जात पात तोड़ने की भी बात लिखी है ताकि इल्ज़ाम न लगे । मैंने तो अनुप्रिया पटेल और मोदी के साझा पोस्टर ' ग़ैर वाराणसी' इलाक़ों में भी नहीं देखे जहां पटेल बड़ी संख्या में हैं । क्या पता हो और मेरी नज़र न पड़ी हो ! 

बनारस में मोदी का यह नया बैनर है । इसमें मोदी के अलावा भी मोदी ही हैं । गंगा और वाराणसी से पुराने रिश्ते को ज़ाहिर करने के लिए गंगा को नमन करते हुए मोदी की बहुत पुरानी तस्वीर है । जिससे साबित हो सके कि मोदी का वाराणसी से पुराना रिश्ता है । इस तस्वीर में मोदी युवा लग रहे हैं । जिस वाराणसी में अपनी जीत को लेकर भाजपा इतनी सुनिश्चित है कि अब सिर्फ जीत के अंतर की बात करती है वहाँ कभी अनुप्रिया पटेल तो कभी मोदी के युवावस्था की निजी तस्वीरों को होर्डिंग पोस्टर पर चिपका रही है । क्या तीन लाख के अंतर से होने वाली जीत को छह लाख करने के लिए ! 

क्या नकारे जायेंगे नीतीश


विकास पुरुष बनाम सुशासन बाबू । बिहार की राजनीति में सुशासन बाबू का तमग़ा हासिल करना कोई साधारण बात नहीं थी । 'सुशासन बाबू' नीतीश कुमार का व्यक्तिगत राजनीतिक उपनाम ही नहीं था बल्कि बिहार की जनता की आकांक्षाएँ भी इसमें शामिल है । मोदी देश के स्तर विकास पुरुष की पहचान लेकर निकले तो नीतीश को लगा कि ' सुशासन बाबू' की उनकी पहचान ढाल की तरह खड़ी हो जाएगी । लेकिन बिहार की राजनीति में विकास पुरुष और सुशासन बाबू के बीच लालू यादव 'सेकुलर साहब' उठ कर खड़े हो गए हैं । अलग अलग जातियों ने खुद को इन तीनों पहचान के पीछे कर लिया है । कंबीनेशन या समीकरण की जटिलता से गुज़रते हुए जो इस गणित को हल कर पाएगा वही लोकसभा में सबसे अधिक सीटें लाएगा । इसीलिए बिहार का चुनावी इम्तहान आई आई टी की प्रवेश परीक्षा की तरह कठिन हो गया है ।

इस इम्तहान में नीतीश कुमार फिर से अकेले हैं । मीडिया और चौराहे के चर्चाकार इस लोक सभा चुनाव में नीतीश कुमार को तीसरे नंबर पर देख रहे हैं । ये चर्चाकार सूप लेकर जातियों को कंकड़ पत्थर की तरह फटक कर अलग कर रहे हैं । स्वर्ण भाजपा की तरफ़ है । यादव मुसलमान लालू के साथ है और अति पिछड़ा और महादलित नीतीश के साथ है मगर इसका कई हिस्सा भाजपा के साथ । इस चुनाव में जातियों का नया पुराना समीकरण तो बन रहा है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि गेंहूं में धान मिल गया है । चर्चाकार भंसार की तरह रेत में चावल चना और मकई भुन रहे हैं । 

ग्रामीण से लेकर शहरी इलाक़े में भाजपा के पक्ष में सवर्ण मुखर और उग्र नज़र आते हैं । ग्रामीण इलाक़ों में जब मैंने पूछा कि आप नीतीश से क्यों नाराज़ हैं । आप लोग तो लालू को हराने के लिए नीतीश को अपना नेता माना था । उनके कई जवाबों में प्रमुख रूप से यह बात झलकती है कि नीतीश कुमार ने सिर्फ अति पिछड़ा और महादलित की राजनीति की है । उन्हीं को हक़ और सुविधायें दी हैं । यह बात वे चौक चौराहे पर कहते फिरते हैं । जबकि पिछले चुनाव में यही स्वर्ण इस बात को लेकर नाराज़ नहीं था । इस बार ऐसा क्या हो गया कि नीतीश का यह मास्टर स्ट्रोक उनके ख़िलाफ़ काम करता हुआ बताया जा रहा है ।

अगर ऐसा है तो अति पिछड़ा और महादलित उन सवर्णों के साथ इतनी आसानी से जा सकता है । क्या नीतीश का यह वोट बैंक उस तबके के साथ स्वाभाविक रूप से उठ बैठ सकता है जो इन्हें मिल रहे अधिकारों से ईर्ष्या करता है । अतिपिछड़ा भी यही कहते हैं कि नीतीश ने उन्हें राजनीतिक पहचान दी है । इस तबके ने पहली बार राजनीतिक पहचान का स्वाद चखा है । स्वर्ण और अतिपिछड़ों के बीच का टकराव नया नया है । जिसे आप बिहार की बोली में टटका यानी ताज़ा कहते हैं । क्या ये तबक़ा नीतीश को छोड़ देगा । छोड़ दिया तो बिहार में बीजेपी की बड़ी जीत को कोई नहीं रोक सकता । 

शरद यादव नीतीश पर जातिवादी राजनीति का आरोप लगा रहे हैं । अगर नीतीश महादलित या अतिपिछड़ा की राजनीति नहीं करते तो क्या यह कोई गारंटी से कह सकता है कि सवर्ण बीजेपी को छोड़ नीतीश के साथ रहते । क्या भाजपा ने पासवान को मिलाकर अपने पक्ष में जातिवादी समीकरण नहीं बनाया । बिहार में नीतीश नहीं अकेले पड़ रहे हैं बल्कि अलग अलग दलों में बिखर कर पिछड़ी जातियों का राजनीतिक वर्चस्व कमज़ोर पड़ रहा है । इन जातियों के कई युवाओं के लिए राजनीतिक आकांक्षा का मतलब विकास तो हो गया है मगर अभी भी इस समूह के एक बड़े हिस्से के लिए राजनीतिक पहचान ही आकांक्षा है । क्यों सवर्णों को नीतीश अहंकारी लगते हैं । नीतीश को अहंकारी कहने वाले दस लोगों से जाति पूछिये तो जवाब मिल जाएगा कि ये नीतीश का अहंकार है या सवर्णों का ।

दरअसल यह चुनाव हवा से कहीं ज़्यादा संगठन शक्ति का है । भाजपा इस मामले में कहीं आगे हैं । संघ को शामिल कर लें तो उसकी व्यवस्था के मुक़ाबले जदयू और राजद एक पार्टी सिस्टम की तरह काम नहीं करते । नीतीश को इसी बात की कमी खल रही होगी । सिर्फ अपने काम पर विश्वास ही काफी नहीं होता बल्कि उस काम को नारों में बदलने के लिए संगठन भी चाहिए । किसी भी घटना पर बोलने के लिए बीजेपी के पास अच्छे प्रवक्ताओं की फ़ौज है । सत्ता में होते हुए भी जदयू के पास इसकी घोर कमी है । अगर यह कमी न होती तो नीतीश इतने कमज़ोर नहीं लगते । 

फिर भी नेता की असली पहचान मुसीबत के वक्त उसके आचरण से होती है । इस चुनाव में नीतीश के भाषणों में संयम और शिष्टाचार देख कर हैरानी होती है । वे जनता को आकर्षित करने के लिए अपनी बातों में नाटकीय उतार चढ़ाव नहीं लाते । भावुकता पैदा नहीं करते । महाराजगंज की एक सभा में भारी भीड़ के बीच कहते हैं कि डेढ़ सौ सभाएँ करने के बाद भी मेरी ज़ुबान नहीं फिसली । शायद इसलिए भी नीतीश के भाषणों की कम चर्चा हुई । विवादों की भूखी मीडिया को मसाला नहीं मिला । इस चुनाव में टीवी की बहसों का भी इम्तहान है । जनमत बनाने में टीवी की भूमिका से इंकार नहीं कर सकते । बड़ा सवाल यह भी है कि नीतीश अपने सुशासन को क्यों नहीं बेच पा रहे हैं । कहाँ हैं वो होर्डिंग जिसमें बिहार के विकास के दावे हो । 

इस चुनाव में नीतीश कुमार कमज़ोर हुए तो जात पात की राजनीति विकास का मुखौटा पहनकर लौटेगी । बिहार में जातियों के समीकरण का पुनर्गठन भी होगा । जब भाजपा जदयू के साथ रहते सवर्ण और पिछड़ी जातियों का गठबंधन टिकाऊ साबित नहीं हुआ तो ये विषमता भाजपा में जाकर कैसे विलीन हो जाएगी । अगर भाजपा ऐसा कर पाती है तो यह उसकी संगठन शक्ति की बड़ी कामयाबी होगी । बिहार की राजनीति इस बार सिर्फ हार जीत तय नहीं करेगी बल्कि यह भी बताएँगी कि कौन सी जाति अब किसके साथ नहीं है । नीतीश कुमार के साथ कौन नहीं है इस पर अंतिम फ़ैसला सोलह मई से पहले मत दीजिये । 
( यह लेख आज के प्रभात ख़बर में छप चुका है )

सुबह दोपहर शाम बनारस की गंगा