संशय से निकलते हुए राहुल

नरेंद्र मोदी, मायावती के बाद राहुल गांधी की रैली से आ रहा हूँ । टीवी पर राहुल के सपाट भाषणों को सुना है मगर ज़माने बाद या शायद पहली बार सामने से सुन रहा था । राहुल गांधी का भाषण बदल रहा है । शुरू में जिस तरह का अबोध लगता था अब बहुत बेहतर तो नहीं लेकिन पहले से सुधरा हुआ लग रहा है । राहुल गांधी का यह कमज़ोर पक्ष कुछ ठीक होता लग रहा है । 

भाषणों का मूल्याँकन करें तो राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के आगे कहीं नहीं ठहरते । मैं बात दलील की नहीं शैली की कर रहा हूँ । मोदी अपने भाषण और भीड़ को टीवी और दर्शक के रिश्ते में बदल देते हैं । ग़ुस्सा  भी होता है, आवाज़ में उतार चढ़ाव होता है, अपनी बात को उस मौक़े तक ले जाने की चतुराई होती है जहाँ लोग या तो सिर्फ हाँ कहें या ना या ताली बजायें । नाटकीयता, भावुकता और गंभीरता सबका मिश्रण । मोदी अपने कमज़ोर पक्ष को भी ताक़त में बदल देते हैं । मुहावरों और क़िस्सों की कलाबाज़ी में माहिर हैं । 

बोलने में मोदी के मुक़ाबले लालू ही ठहरते हैं । मगर लालू अब मीडिया के प्रिय नहीं रहे । लालू का वक्त भी नहीं रहा । मीडिया को मोदी मिल गए हैं । मोदी हँसाते हैं,आँख दिखाते हैं और हमले करते हैं । कई बार झूठ सच सब मिलाकर बोल जाते हैं । मोदी जीतने की अदम्य इच्छाशक्ति से भरे हुए हैं । जिसका असर उनके बोलने में दिखता है । खुद को दावेदार के रूप में इस तरह पेश किया है जिसके कारण ध्यान चला जाता है । इसलिए बोलने में मोदी को बढ़त मिल जाती है । क्या बोलते हैं से ज़्यादा कैसे बोलते हैं महत्वपूर्ण हो जाता है । 

राहुल गांधी बोलते वक्त काफी सोचते हैं कि कहीं भारी न पड़ जाए । इस चक्कर में कई बार बोलते नहीं । 'रेटरिक' नहीं आती है । मोदी जिस तरह सटीक निशाना लगाते हैं राहुल तानते तो सही हैं मगर तीर छोड़ते वक्त धनुष को ढीला कर देते हैं । इसलिए मोदी की तुलना में राहुल की बात पर कम तालियाँ बजती हैं । जैसे ही लगता है कि राहुल हमला करने वाले हैं वे उस बात से उतर कर कुछ और कहने लग जाते हैं । कभी नाम लेते हैं कभी नहीं । इसलिए वे बोलते हुए मनोरंजन कम करते हैं । ज़रूरत से ज़्यादा संजीदा हो जाते हैं । एक अपराधबोध या सतर्कता आ जाती है जिससे उन्हें लगता है कि ये बोलूँगा तो लोग मुझे भी बोलेंगे । 

मोदी कुछ नहीं सोचते । वे बोलते हैं बल्कि कई बार बोलते हैं ।  जिस तरह से आज राहुल ने मोदी के प्रचार की बात की वो हमला नहीं लगा । ऐसा लगा कि राहुल कह रहे हैं । आक्रमण नहीं कर रहे । मोदी को यही बात कहनी होती तो वे क़िस्सों में बदल देते । कहते कि आपने देखा है नेता जी अभी से तरह तरह के कुर्ते में सज रहे हैं । रोज़ नया कुर्ता । दर्ज़ी परेशान है । कह रहा है कि  शहज़ादे हमारे पास रंग तो छोड़ो कपड़ा भी नहीं बचा है । लगता है टू जी के सारे पैसे से कुर्ते ही सिल गए हैं । थोड़ी अकल होती तो शहज़ादे कुर्ते की जगह छोटा मोटा कारख़ाना ही खोल लेते जहाँ दो चार लोगों को काम ही मिल जाता । शहज़ादे का ध्यान बस इसमें लगा होता है कि आज मैडम सोनिया जी कौन सा कुर्ता सिलवा के देंगी । मोदी ने ऐसा मौक़ा कांग्रेस को दिया मगर राहुल इस तरह की बात नहीं कर पाते । संशय दिख जाता है । हालाँकि वे अब मोदी की नाम लेकर या बिना नाम लिये हमले करने लगे हैं मगर उसमें नाटकीयता या समां बाँधने की कला का अभाव है । 

फिर भी राहुल मोदी को निशाने पर ले रहे हैं । पहले वे अपनी बात कहते थे । भाषण छोटा रखते थे । अब लंबा बोलने लगे हैं । मोदी के ग़ुब्बारे के फटने की बात कर रहे हैं । सपाट ही सही थोड़ा हँसाने का प्रयास कर रहे हैं । ग़ुब्बारा गिरा धड़ाम टाइप से । धूम फ़िल्म के तीन संस्करणों का उदाहरण देते हैं । कैसे शाइनिंग इंडिया का ग़ुब्बारा फूट गया और इसी लाइन में कहते हुए निकल जाते हैं कि दो तीन उद्योगपतियों के पैसे से प्रचार कर रहे हैं । इसी बात को उनसे पहले कांग्रेस का कार्यकर्ता ज़्यादा बेहतर आक्रामक शैली में उठा रहा था । पूछ रहा था कि कहाँ से आया पैसा । राहुल यह सोचने लग गए हों कि कहीं लोग यह न कह दें कि उनके प्रचार का पैसा कहाँ से आता है । 


राहुल देर से ही सही संशय से निकलने का प्रयास कर रहे हैं । यह काम उन्हें तीन महीने पहले करना चाहिए था । कानपुर कांग्रेस का गढ़ रहा है । इस लिहाज़ से भीड़ थी और तमाम रैलियों की तरह राहुल के प्रति आकर्षण भी दिखा मगर राहुल ने उसे खाली हाथ लौटा दिया । 

मोदी हाँ या ना में बात करते हैं ताकि भीड़ तुरंत प्रतिक्रिया ज़ाहिर करे । इस शैली में सोचने या सवाल करने की गुज़ाइश कम रहती है । मोदी की तरह आप किसी भी राज्य की भीड़ में जाकर कहिये कि यहाँ मौजूद लोगों में से किसी को नौकरी मिली । जवाब दो । किसी युवा को नौकरी मिली । ऐसे सामूहिक प्रश्नों का जवाब ना में ही आएगा । ऐसा कर मोदी भीड़ में अनुगूँज पैदा करते हैं । कंपन । राहुल की बात निकलकर कहीं खो जाती है । कौन जानता है लोगों को समझ भी आती हो लेकिन जो दिख रहा है उसे लिख रहा हूँ । 

राहुल अनुगूँज पैदा नहीं कर पाते हैं । राहुल को सुनते हुए लोग चुप रहते हैं । तालियाँ कम बजती हैं । कार्यकर्ता भी मोदी मोदी की तरह राहुल राहुल नहीं करते । नारे नहीं लगाते । बल्कि लोग राहुल की बात को सवालों के साथ सुनने लगते हैं । यह एक बेहतर तरीक़ा है भाषण देने का । लेकिन ' रेटरिक' के बिना रैली नहीं लगती । राहुल को मोदी की तरह नारों की शक्ल में बात करना होगा । मोदी के पक्ष में अख़बारों से लेकर टीवी तक में लेख और भाषण दिये जा रहे हैं । राहुल के पक्ष में आपको कोई लेख नहीं मिलेगा । इसका कारण राहुल ही हैं । वे लोगों को बात करने का कम मौक़ा देते हैं ।

चुनाव में भाषण का भी विश्लेषण होना चाहिए । धीरे धीरे राहुल गांधी बेहतर तो हो रहे हैं मगर देर हो चुकी है । उन्हें रैली या महफिल लूटने की कला नहीं आती । सीख रहे हैं पर सीखे नहीं है । ऐसी बात नहीं है कि उनकी बातों में दम नहीं मगर बात दम की ही नहीं होती साख के समय की भी होती है । फिर भी राहुल इस माहौल को बदल सकते थे । आख़िर अन्ना आंदोलन के समय तक भ्रष्टाचार के मामले में बीजेपी गडकरी और येदुरप्पा को लेकर बैकफ़ुट पर हो ही जाती थी लेकिन मोदी ने आक्रामक तरीका अपना कर अपनी कमज़ोरी को ढंक दिया ।

राहुल को मोदी की तरह मंचीय कवि होना होगा । वे किसी गंभीर व संशयपूर्ण साहित्यकार की तरह कविता पढ़ते हैं । मोदी से सीख लेने में कोई हर्ज नहीं है । इस मामले में वे सोनिया गांधी से भी सीख सकते हैं । लेकिन भाषण देने की मोदी की शैली सर्वमान्य होती तो नवीन पटनायक भी मोदी के भाषणों से उड़ जाते । मायावती उड़ जातीं । नीतीश कुमार टिक नहीं पाते । रमण सिंह तो एक रैली नहीं कर पाते । सबका वक्त होता है । ये राहुल का वक्त नहीं लगता । लेकिन अच्छा है कोई अपने सबसे कमज़ोर वक्त में लड़ाई के बीच में लड़ना सीख रहा है । शायद यह सीख मोदी के सामने संसद में विपक्ष के नेता के रूप में काम आ जाये । वैसे तक़दीर में किसके क्या है कौन जानता है । फ़िलहाल भाषण से तो यही झलकता है ।

ख़्याल

ख़्याल,

सोचा तुम्हें एक ख़त लिखूँ । तुमसे बात करूँ । तुम मेरे राज़दार हो । हमने हर ख़्वाब तुम्हारी चादर के नीचे देखे हैं । कब कौन अजनबी आया तुमको पता है । किसे देख मुस्कुराया ये तुम जानते हो । हमारी सारी चाहतें तुमने देखी हैं । किसके आने की आहट में करवटें बदलता रहा तुम मेरे सिरहाने सब देखते रहे हो । हर वो स्केच जो अपने भीतर बनाता रहा हूँ,उसे सबसे पहले तुमने देखा है ।

मेरा जो भी बाहर है वो भीतर नहीं है । जो भी भीतर है बाहर नहीं है । तुम्हारे भीतर मेरे अनगिनत 'मैं' हैं । शातिर मैं और क़ातिल मैं । ज़ाहिर मैं और माहिर मैं । आदमी भीतर से ही अनगिनत होता है । ख़्यालों के साये में हम अपने अनगिनत मैं को लपेटते खोलते रहते हैं । मुझे नहीं मालूम कि मैं किन किन के ख़्यालों में रहता हूँ । कैसे रहता हूँ । किसका होके रहता हूँ । मुझे मालूम है मेरे ख़्यालों में कौन कौन रहता है । कोई तो है जिसे मैं देख नहीं पाता मगर बात करते रहता हूँ । वो निराकार कौन है । वहाँ मुझे सुनने वाला और कौन है । दिखते नहीं मगर होते हो ।

हमने वक्त से भी ज़्यादा वक्त ख़्यालों में बिताया है । एक ही साथ मैं बाहर भी होता हूँ और भीतर भी । हमने यहाँ लम्हों में सदियाँ गुज़ारी हैं । चुपके से बिना इजाजत़ किसी का हाथ पकड़ा है । किसी के साथ चला हूँ । कोई मेरे साथ चला है । वो कौन थे जो मेरे ख़्यालों में आए । तुम मेरे भी हो क्या । कोई तो है जो आता है मगर दिखता नहीं । वो कौन है जिससे मैं ख़्यालों में बतियाता हूँ । वो एक है या अनेक । 

ख़्याल, मेरा पता तो तुम हो । तुमने जाना है मुझे । मैं सब तुम्हें ही बताया । अलग से । कभी किसी रोज़ आकर कहना तो मेरे बारे में । सुनाना तो ज़रा इस दुनिया को । मुझसे अलग होकर मेरा ही ख़्याल मुझे कैसे बयां करता है जानने को बेताब हूँ । तुमने जो देखा है वो मैंने भी नहीं देखा है । मैं सुनना चाहता हूँ ।

तुम न होते तो मैं न होता । तुम न होते तो मेरा कोई अपना न होता । हमारी आहें और रातें सब बेकार होतीं । असल में होने के लिए ख़्यालों में होना ज़रूरी है । दरवाज़ा न छत फिर भी मकां । तुम जन्नत नहीं जहाँ हो मेरी । 

तुम्हारा 

मैं 

इटावा की कुछ और तस्वीरें








इटावा की एक गली

कामरेड की लस्सी

लस्सी वाक़ई लाजवाब थी । मोटी मलाई की परत के साथ । आह वाह कर ही रहा था कि नज़र उस तस्वीर पर पड़ गई जिस पर लिखा था कामरेड सूरज पाल वर्मा जी । इटावा के चौक पर इतनी अच्छी लस्सी मिलेगी और वो भी किसी कामरेड की दुकान पर सोचा न था । भारत एक क़िस्सा प्रधान देश है । कब कोई क़िस्सा मिल जाए कोई नहीं जानता । 

सूरज पाल वर्मा इटावा के पुराने कम्युनिस्ट नेता रहे हैं । उनके पुत्र हीरा लाल पटेल तो छूटते ही कहने लगे कि हमारे घर प्रकाश करात आते हैं । वृंदा करात आती हैं । सीपीएम के कई सांसदों का नाम लेने लगे । हीरा लाल जी हमारे लिए लस्सी बनाते बनाते इटावा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की हालत बताने लगे । कहा कि अभी भी पार्टी का ही काम करते हैं । वोट किसे देते हैं ? अब काम तो कम्युनिस्ट का करते हैं लेकिन वोट सपा को देते हैं । क्या करें हमारी पार्टी का वजूद कमज़ोर है । तो कभी पार्टी छोड़ने का मन नहीं किया ? नहीं जी । विचारधारा नहीं छोड़ सकते । 

सुबह की शुरूआत एक बेहतरीन लस्सी से हो जाए तो क्या बात । उसके बाद इटावा के ही यासीनगर गाँव गए । यह गाँव शाक्य समाज का माना जाता है । मतलब यहाँ बुद्ध, चंद्रगुप्त और अशोक को अपने गौरवशाली इतिहास का नायक मानने वाले शाक्य समाज के लोग बड़ी सँख्या में रहते हैं । शाक्य, कुशवाहा, मौर्य और सैनी ओबीसी में यादवों के बाद दूसरे नंबर की प्रभावशाली जातियाँ हैं । इस गाँव में भी कुछ कम्युनिस्ट कार्यकर्ता मिले । एक नौजवान ने कहा कि वो अपनी जाति की पहचान को उभारना चाहता है मगर उसकी जाति में जागरूकता आने में वक्त लगेगा । बात आगे बढ़ी तो नौजवान ने कहा कि वो कम्युनिस्टों के धरना प्रदर्शन में जाता तो है मगर वोट बीजेपी को देगा क्योंकि माकपा यहाँ जीत नहीं सकती । हम अपना वोट क्यों बर्बाद करें । 

मतदान और लहर को इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता । वोट देने की प्राथमिकताएँ हर मतदाता की अलग होती हैं । फ़िलहाल हम तो कामरेड की लस्सी पीकर गदगद हैं । 

साड़ी डाँस

हिन्दी प्रदेश के किसी देहात या कस्बाई एरिया में ऐसा दृश्य कम देखा था । बंगाल में देखा है । वहाँ दुर्गा विसर्जन के वक्त औरतें और लड़कियाँ जमकर डाँस करती हैं मगर घूँघट में नहीं । लड़कों से भी ज़्यादा स्पेस लेकर डाँस करती हैं । रामनवमी के दिन हम फ़िरोज़ाबाद शिकोहाबाद से गुज़र रहे थे । रामनवमी का ऐसा शानदार उल्लास कम देखा है । ट्रैक्टर पर औरतें बच्चे बच्चियाँ सवार हैं । एक लंबे बाँस को ताज़िये की तरह सजाया गया है । क्रिसमस ट्री और ताज़िया में जिस तरह कई तरह के सामान लगाये जाते हैं वैसे इन ध्वजों को सजाया जाता है । पैसा, ग्लास, प्लास्टिक के खिलौने आदि से । इन्हें पास के दुर्गा मंदिर में समर्पित कर दिया जाता है । तीन दिनों तक इसका जुलूस देखा । बड़ी संख्या में औरतें घूँघट में डाँस करती हुई तमाम वर्जनाओं से मुक्त डाँस करती हुईं । नाचने की शैली पूरी तरह लड़कों जैसी । उसी की तस्वीर है । हम उल्लास को कम समझते हैं । महानगरों के पैमाने से गाँवों को देखकर दुखी होते हैं । लेकिन गाँव वाले खुद को देख सुखी होते हैं । रामनवमी का ऐसा जलवा पहली बार देखा । 
हर जुलूस में औरतों का जलवा । वही डाँस करती हुईं । रामनवमी के बहाने जिस सार्वजनिक स्पेस को हासिल करती हुई वे साड़ी डाँस करती चली जा रही थीं मैं उनकी इस उन्मुक्तता पर मुग्ध हुआ जा रहा था । 






फ़िरोज़ाबाद के मैथिल ब्राह्मण

मैनपुरी की एक दुकान पर इस छुटकु से पोस्टर को देखकर चौंक गया । ' गर्व से कहो हम मैथिली हैं ' जैसे नारे का मैनपुरी में क्या काम । झट तस्वीर खींची और पोस्टर में लिखे मैथिली ब्राह्मण सभा के अध्यक्ष को फ़ोन कर दिया । यह संगठन मैनपुरी से सटे फ़िरोज़ाबाद का है । उसके बाद विस्थापन और विच्छेदन की एक नई कहानी निकल कर आने लगी ।

महेश जी को फ़ोन किया तो उनकी बोलचाल से लगा ही नहीं कि मैथिल हैं । एक ज़माने में मैथिल बोल लेता था इसलिए बांग्ला की तरह इस मिठी बोली  का स्वाद मालूम है । महेश जी अवधि बोल रहे थे । मैं समाजशास्त्री मानवशास्त्री की तरह पूछने लगा । तभी ध्यान आया कि जिस दुकान पर पोस्टर लगा था वे भी झा थे मगर मैथिल एक शब्द न बोल पाये । कहा कि नाम ही झा है पर पता नहीं यहाँ कैसे आ गए । यहाँ तो पीढ़ियों से हैं । किसी तरह से कुछ बचा हुआ है तो उनके नाम के बाद लगा 'झा' जो मैथिल ब्राह्मण अपने नाम के साथ लगाते हैं । 

ब्राह्मण सभा के अध्यक्ष ने बताया कि उनके पास कोई पुस्तिका है जिससे पता तो चलता है कि कहाँ से कौन यहाँ आया था । लेकिन किसी को कुछ याद नहीं । उनका दावा था कि फ़िरोज़ाबाद शहर में चालीस हज़ार मैथिल वोट है । इतने के ही लगभग गाँवों में है । वहाँ कई लोगों ने ज़मीन ख़रीद ली है । गाँव में ही रहते हैं । शहर में भी दो हज़ार तीन हज़ार के पाकेट में रहते हैं । हमलोगों का मिथिला से सम्बंध टूट गया है । वहाँ के रीति रिवाज की जानकारी भी कम है । कोई मैथिली नहीं बोल पाता । सब चूड़ियों के कारोबार में कभी यहाँ आए थे और आज यहाँ के तरह तरह के धंधे में शामिल हैं मगर कोई बहुत बड़े आर्थिक हैसियत वाला नहीं है । इनकी शादी भी यहीं के झा लोगों में होती है । मिथिला में नहीं । 

महेश जी ने बताया कि सात आठ साल पहले ही वे लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय हुए हैं । बीजेपी ने जगह नहीं दी इसलिए सपा के साथ हैं । बीजेपी में जो ब्राह्मण हैं वे कुछ नहीं समझते । अस्सी हज़ार का वोट है हमारा । उनके किसी दावे को सत्यापित तो नहीं कर सकता था मगर फ़ोन पर हुई इस बातचीत को आपके लिए लिख रहा हूँ । ये लोग अपनी जड़ों से कट चुके हैं । नई जड़ें निकल आईं हैं । पलायन स्थानीय बोली तो सीखा देता है लेकिन पीढ़ियों बाद पूरी तरह से अपने जड़ों से विच्छेदित कर देता है । इसे और भी कई तरीके से पढ़ा जा सकता है मगर यह सोच कर रोमांचित तो ही गया कि फ़िरोज़ाबाद में अस्सी हज़ार मैथिल ब्राह्मण की कुछ तो पूछ होगी ही । अपना हिंदुस्तान क़िस्सों से भरा है । 



मैनपुरी के सारस



कुछ करो भाई

उत्तर भारत के जिन हिस्सों में जहाँ भी जाता हूँ व्यवस्थाएँ ठप्प पड़ी हैं । उबाल मारती आकांक्षाएँ इन ठप्प दीवारों से टकरा रही हैं । भला हो जाति और धर्म की राजनीति का जो इस ग़ुबार को किसी और दिशा में मोड़ दे रही है वर्ना लोग सरकारों या प्रशासनों के ख़िलाफ़ व्यापक आंदोलन छेड़ दें । आदमी लाचार है मगर उसी जाति और धर्म की राजनीति का शिकार होकर खुद को ताक़तवर भी महसूस कर रहा है । सबको एक शक्तिशाली झुंड चाहिए ताकि उसका हिस्सा बनकर वह खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें । व्यवस्थाएँ जितनी चरमरायेंगीं आम लोगों की ऐसे लोगों पर निर्भरता बढ़ेगी । 

स्कूल, कालेज और अस्पताल सबकी हालत ख़राब है । जब तक राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचा नहीं बदलेगा कुछ नहीं होगा । सरकारी लूट में लोग भी शामिल हैं । लोगों का पता है कि कौन लूट रहा है । उन्हें यह भी पता है कि गाँव में किस योजना में कितना अनुदान आया है और कितना खा पी कर बराबर कर दिया गया है । फिर भी सब चुप हैं । 


सरकारी स्कूल साक्षरता और पंजीकरण दर के आँकड़ों को बढ़ाने के लिए हैं । गाँव क़स्बों के बच्चे अब उन स्कूलों में ठेले जा रहे हैं जिनकी इमारतें काँच की हैं और नाम प्राइवेट से लेकर इंटरनेशनल स्कूल तक है । पढ़ाई का स्तर ख़ास नहीं है । तकलीफ़ होती है देखकर । अस्पतालों को देखकर रोना आता है । आम आदमी बेहद तकलीफ़ से गुज़र रहा है । 

सरकारों को समझना चाहिए कि अब कामचलाऊ रफ़्तार से नहीं होगा । व्यवस्था को बदलने की ज़रूरत है । यह वक्त था इन सब मुद्दों पर खुल कर बहस करने का मगर सारा वक्त हाँ या ना टाइप के नारों में चला गया । ज़मीन पर स्थानीय नेताओं को खरीद कर और टीवी में हवा बनाकर बहस हो रही है । घोषणापत्र में स्लोगन ज़्यादा लिख दिये गए हैं । देश बदलाव मांग रहा है । सिर्फ कुर्सी का बदलाव नहीं । आमूलचूल बदलाव । 

यह चुनाव चूक गया । राजनीतिक सुधार के मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं । प्रशासनिक सुधार कैसे होंगे इस पर कोई बात नहीं । लोगों ने जात पात को छोड़ काम काज को प्राथमिकता देना शुरू नहीं किया तो ग़ज़ब होगा । ऐसा कैसे हो सकता है कि लोग प्रधान से लेकर सांसद तक से परेशान है । सब कहते हैं कि क्या कर सकते हैं साहब । आख़िर समुदायों के आधार पर चुनें नेताओं से क्या लाभ हुआ । ऐसा नहीं है कि उनसे लाभ नहीं मिला मगर अब उसकी उपयोगिता समाप्त हो जानी चाहिए । हर मतदाता क्यों कहता है कि वो लाचारी में चुन रहा है । ग़लत लोगों को चुनने के लिए मतदान करना है तो मतदान केंद्र तक जाना ही क्यों । चुनाव मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए नहीं होते । न ही सरकार चुनने के लिए होते हैं । चुनाव होता है लोक सभा के गठन के लिए । ऐसा नहीं है कि लोगों ने उम्मीद छोड़ दी है मगर उन्हें अब अपनी ताक़त की पहचान करनी ही होगी । 



मैच शुरू हुआ है, ख़त्म नहीं


उत्तर प्रदेश में अगर मोदी को पचास सीटें आ गईं तो इसका सीधा मतलब है कि बसपा सपा का समापन । आख़िर ऐसा क्या हो गया है यूपी में कि ये दोनों पार्टियाँ समाप्त हो जाएँगी । अगर अस्सी में से तीस सीटों पर बसपा, सपा, कांग्रेस, आर एल डी सिमट गईं तो समझिये कि यूपी की राजनीति में ज़लज़ला आ गया है । अगर ऐसा नहीं हुआ तो इतना याद रखियेगा कि यूपी के हर चुनाव में मीडिया और विज्ञापनों की हल्ला गाड़ी कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस के उभार का नारा जपने लगती है । जब नतीजा आता है तो सारे होर्डिंग,पर्चे और नारे कबाड़ में बदल जाते हैं और सत्ता सपा या बसपा में से किसी के पास होती है ।

लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने ऐसा क्या सोशल इंजीनियरिंग कर लिया है जो उसे अटल के अंठानबे युग की तरफ़ ले जायेगा जब बीजेपी को साठ कम दो सीटें मिली थीं । याद रखियेगा तब समाजवादी और बसपा का आधार उस तरह मज़बूत नहीं हुआ था जैसा आज है । इन वर्षों में बीजेपी अंठावन सीटों से कम होकर दस पर आ गई और सपा और बसपा ने अलग अलग इक्कीस से अट्ठाईस सीटें जीतीं । आज बसपा और सपा दोनों यूपी की मज़बूत और मुख्य सत्तारूढ़ व विपक्षी दल हैं । 

दो साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में यूपी की जनता ने कांग्रेस बीजेपी की तरफ़ देखा तक नहीं । दो साल बाद अगर बीजेपी पचास सीटों पर जीत रही है तो प्रति लोक सभा पाँच सीटों के हिसाब बीजेपी को विधान सभा की ढाई सौ सीटें मिलने वाली हैं । बीजेपी को खुद भी इस नंबर पर यक़ीन नहीं होगा । यह तभी हो सकता है कि जब मुसलमान, जाटव, यादव अति पिछड़ी और ग़ैर जाटव दलित जातियाँ एकमुश्त बीजेपी को वोट दे दें । लेकिन ज़मीन पर संख्या के आधार पर प्रमुख बड़ी जातियों में बिखराव इस तरह का नहीं दिखता जो सर्वे में दिखाया जा रहा है । 

मायावती और अखिलेश मुलायम की सभाओं में आ रही भीड़ किसी मायने में नरेंद्र मोदी की रैलियों सभाओं से कम नहीं है । बीजेपी इस उम्मीद में आगे बढ़ने का ख़्वाब देख रही है कि ज़्यादा से ज़्यादा ध्रुवीकरण के बयानों से दलित और पिछड़ी जातियाँ हिन्दुत्व के पाले में आ जायेंगी । मगर ऐसा तो बाबरी मस्जिद ध्वस्त करने के बाद नहीं हुआ था तो मोदी और मुज़फ़्फ़रनगर के सहारे कैसे हो जायेगा । कोई दावा नहीं कर सकता कि नहीं होगा मगर किसी को यह भी दावा नहीं करना चाहिए कि यही होगा । 

मुज़फ़्फ़रनगर और बनारस उत्तर प्रदेश के दो ज़िले हैं । उत्तर प्रदेश नहीं है । पिंडदान के लिए पूरे भारत से लोग गया भी जाते हैं । क्या गया से बिहार की राजनीति संचालित हो सकती है । वैसे ही मुज़फ़्फ़रनगर के ही आस पास के ज़िलों पर दंगों की राजनीति का असर नहीं है । एक ज़िला से दूसरे ज़िला में जाते ही समीकरण और उम्मीदवार की कहानी बदल जाती है । बसपा में उन्नीस मुसलमान और इक्कीस ब्राह्मण और सत्रह पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों को टिकट दिये हैं । इनमें से कई ग़ैर यादव पिछड़ी जातियों के हैं जो अपने क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं । बीजेपी को इन्हीं ग़ैर यादव और ग़ैर दलित जातियों से उम्मीद है । मगर इनमें बीजेपी की तरफ़ व्यापक पलायन होता नहीं दिख रहा । मोदी बसपा को लेकर जितना आक्रामक हो रहे हैं बसपा की समर्थक जातियाँ उतना ही सतर्क हो रही हैं । उन्हें पता है कि गाँव क़स्बों के चौराहे पर उनका अस्तित्व बसपा या सपा के कारण है । 

इसलिए उत्तर प्रदेश में बीजेपी के शानदार प्रदर्शन की बात करने से पहले खुद को चिकोटी काटना ज़रूरी है । यह सोचना ज़रूरी है कि क्या सचमुच में हिन्दुत्व के दायरे से बाहर की समाजवादी पिछड़ी चेतना समाप्त हो रही है, दलित चेतना नष्ट हो चुकी है । क्या कांशीराम की तैयार फ़सल अतीत का हिस्सा बनने जा रही है । धीरे धीरे मामूली रूप से कमज़ोर हो रहीं मायावती का असर समाप्त हो रहा है ? क्या मुलायम वापस नब्बे के दशक की स्थिति में पहुँच जायेंगे । ज़मीन पर ऐसी बग़ावत तो मुझे नहीं दिखी ।  यह तभी हो सकता है जब किन्हीं अदृश्य पूँजीपतियों के दबाव में ये दोनों नेता अपने अस्त्वित्व का सरेंडर कर दें ।


मोदी अगर यह समझते हैं कि खुद को पिछड़ा बता कर हिन्दुत्व का वैसा विस्तार कर लेंगे जैसा कभी लोध जाति में प्रभाव रखने वाले कल्याण सिंह ने किया था तो इसमें कुछ तो दम है । मगर बहुत नहीं । अगर विकास के सवाल पर बीजेपी आगे बढ़ चुकी है तो अंत समय में माँस निर्यात और अमित शाह के बहाने एक सम्प्रदाय को टारगेट क्यों करने लगी है । क्या बीजेपी भी समझ रही है कि यूपी में जीत के लिए अगर जातियों का व्यापक गठबंधन बनाना है तो विकास से नहीं ऐसे बयानों से बनेगा जो हिन्दू बनाम मुस्लिम का भेद गहरा करें । 

इससे बीजेपी आक्रामक तो लगेगी मगर इस रणनीति का एक ख़तरा है । पचास सीटों पर असर रखने वाले मुसलमानों के साथ साथ साम्प्रदायिकता विरोधी हिन्दू जमात की गोलबंदी बीजेपी के ख़िलाफ़ हो सकती है । बीजेपी को समझना चाहिए कि उसे मिलने जा रहा कांग्रेस विरोधी मत हिन्दुत्व के लिए नहीं है । अगर दंगों की राजनीति से सरकारें बनतीं तो इस देश का इतिहास दूसरा होता । जिन्होंने सरकारें बनाई हैं वो भी दंगों के इतिहास से परेशान है । जो लोग मुस्लिम मतों के बिखराव की बात कर रहे हैं वो जल्दी कर रहे हैं । बिखराव बहुत कम है ।

उत्तर प्रदेश में नतीजों के आने तक भविष्यवाणी से बचिये । अगर बीजेपी बीएसपी और एसपी को कुचलते हुए पचास सीटों से आगे निकल जाती है तो जरूर अमित शाह को माला पहना आइयेगा लेकिन तब तक के लिए माले को बाहर मत निकालिये । चुनाव देखिये । जिस यूपी में मुस्लिम वोट से कांग्रेस बीस सीट पाकर हैरान हो सकती है और यूपी की इतनी ही सीटों के बावजूद सरकार बना सकती है उस यूपी में कुछ भी हो सकता है । इतनी जल्दी क्या है मायावती और मायावती की श्रद्धांजली लिखने की । लड़ाई का मज़ा लीजिये । मैच अभी शुरू हुआ है । 


( यह लेख आज के प्रभात ख़बर में छप चुका है )