वहाँ जाने से पहले मैं कुछ लेख तो ज़रूर पढ़ रहा था । तीन दिनों से । पढ़ते पढ़ते अपने सवालों की दुनिया में चला गया जिनके कुछ जवाब किताब में हैं और कुछ किताब से बन रही समझ से भी मिल जाते हैं । हिन्दी की आधुनिकता किसके बरक्स है । हिन्दी की पारंपरिकता और रूढ़िवादिता क्या रही होगी जिसे हिन्दी ने तोड़ कर अपने भीतर आधुनिकता पैदा की होगी । इसका जवाब मुझे नहीं मिला । दूसरा इसका भी नहीं मिला कि हिन्दी की आधुनिकता को अंग्रेज़ी या दूसरी प्रभावशाली भाषायें कैसे देखती हैं । यानी जब आप आधुनिक होते हैं तो कुछ नये तो होते ही होंगे तो यह नया कहाँ से आया और इस नये को कैसे देखा गया ।
जब मैं हिन्दी बोलता हूँ तो लोग कहते हैं कि आपकी भाषा देसी है, खाँटी है । तो क्या कोई शहरी और क़ुलीन हिन्दी भी है । जिसमें मिट्टी की ख़ुश्बू नहीं है । एक बार एच एम टी शब्द सुना था । सहेलियों के साथ विचरण करते हुए । किसी सहेली ने कहा कि वो एच एम टी टाइप है । मुझे लगा कि घड़ी की बात हो रही है जो टाइटन के मुक़ाबले अब कमज़ोर पड़ चुकी है । जवाब मिला कि हिन्दी मीडियम टाइप । तो मैंने पूछा कि और मैं ? नहीं तुम हिन्दी मीडियम टाइम नहीं लगते हो । तुम देखने से हिन्दी वाला नहीं लगते । मैं अक्सर सोचता हूँ मुझे जैसे हिन्दी भाषियों को अलग से और भदेसपन के साथ कैसे एक साथ देखा जाता है । क्या हिन्दी मीडियम टाइप कोई प्रोटो टाइप है रूढ़िवादिता की, किसी गए गुज़रे ज़माने का प्रोटोटाइप ।
हिन्दी में आधुनिकता का प्रवेश कैसे होता है । उसके आधुनिक प्रभाव क्या है । फ़्रेंच आधुनिकता से आई या स्पेनिश या अंग्रेज़ी की आधुनिकता से । अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों से पहले भी हम ग्लोबल थे । दुनिया से कारोबार और सम्पर्क था । उन आधुनिकताओं का किया हुआ । हमारी आज की या उन्नीसवीं सदी की हिन्दी पूर्व आधुनिकता क्या थी । जब हमारी ज़मीन पर आलू और टमाटर बाहर से आ रहे थे, पजामे आ रहे थे सिले हुए कपड़े आ रहे थे तब हम किस तरह से आधुनिक हो रहे थे । आलू खाते वक्त आधुनिकता थे तो कफ़न में आलू कैसे क्रूरता का प्रतीक बन जाता है । जातिवादी बन जाता है ।
भाषा जब ज़ुबान से पहचान बनती है तो वह बोले जाने वाले समाज का अलग तरह से गोलबंदी करती है । क्या ये पहचान किसी उर्दू या बांग्ला के ख़िलाफ़ बनते हुए समाज का सांप्रदायिकरण करती है या आधुनिक बनाती है । हम तो हिन्दी में पश्चिम के प्रति जो तिरस्कारभाव रखते हैं उसके ख़िलाफ़ कोई स्वतंत्र या स्वायत्त आधुनिकता है हिन्दी की या उसी में से काँट छाँट कर । ओम प्रकाश वाल्मीकि की एक लाइन पर नज़र गड़ गई । लिखते हैं कि दलितों की बस्तियाँ नदी नालों के पार पश्चिम दिशा में रखी गईं । कहीं हिन्दी का एक हिस्सा इसी वजह से भी पश्चिम से तो नहीं चिढ़ता । पश्चिम में क़ाबा भी पर उस पर नहीं जाता अभी । हम पश्चिम और पश्चिम की आधुनिकता को घृणा की नज़र से क्यों देखते हैं । हिन्दी की आधुनिकता की दिशा क्या है । पूरब और पश्चिम की बाइनरी से अलग पूरब और पूर्वोत्तर तो नहीं ।
मेरी मातृभाषा भोजपुरी है । हिन्दी मेरी पहली अंग्रेजी । हिन्दी बोलना कांवेंट होना था । गाँव घर में हिन्दी बोलने पर डाँट पड़ती थी कि ज़्यादा अंग्रेज़ी मत बोलो । मुझे रटाया गया है कि मेरी मातृभाषा हिन्दी है । बाद में सचेत हुआ तो पूछने लगा कि जो मेरी माँ बोलती है वो मातृभाषा नहीं है । क्यों । मेरी माँ भोजपुरी है । हिन्दी मेरे लिए अंग्रेज़ी की तरह कामकाज की एक और भाषा है । विकल्प है । हिन्दी के इतिहास को इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ सकता हूँ मगर ओढ़ नहीं सकता क्योंकि मैं इसके इतिहास का आरंभिक सहयात्री नहीं रहा । अपनी पारिवारिक पीढ़ियों में विशुद्ध रूप से हिन्दी बोलने वाले हम पहली पीढ़ी हैं । तो क्या हम भोजपुरी बोलते हुए आधुनिक नहीं हैं । नहीं थे । भोजपुरी की आधुनिकता कहाँ से आई ।
मेरे लिए हिन्दी मरीन ड्राइव है । भोजपुरी की इतिहास चेतना भले न हो मगर वो मेरी भाषा है । जिसे जानने के लिए मैंने व्याकरण की किताब नहीं पढ़ी और मैट्रिक पास होने के लिए नंबर नहीं लाने पड़े । इस हिन्दी को अपने ही घर में डराते देखा है । बचपन में हिन्दी बोलने वाली संभ्रांत महिलाएँ चाचियां मेरी माँ को गँवार समझती थी । मेरी माँ उनसे वैसे ही टूटी फूटी हिन्दी बोलती थी जैसे मैं अंग्रेज़ी बोलता हूँ । उन चाचियों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी । उनके लिए हिन्दी शहरी और अफ़सरी की भाषा थी जो गाँव से पटना आई मेरी भोजपुरी बोलने वाली माँ को हिक़ारत और अनपढ़ नज़र से देखती थी । इसलिए हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है । हम हिन्दी को हमेशा औपनिवेशिकता के ख़िलाफ़ देखते हैं, हिन्दी में औपनिवेशिकता को नहीं देखते । हिन्दी की आधुनिकता ज़रूर पढ़ियेगा ।












