हिन्दी की आधुनिकता

वाणी प्रकाशन ने तीन खंडों में इसी नाम से किताब छाप दिया है । अखिल भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला के तत्वावधान में हिन्दी की आधुनिकता पर दस दिनों तक लंबा मंथन चला था जिसे पुस्तक रूप दे दिया गया है । हिन्दी में दिलचस्पी रखने वालों को दो हज़ार रुपये की लागत वाली तीनों पुस्तकों को रखना चाहिए । इसमें ओम प्रकाश वाल्मीकि,आदित्य निगम,अभय कुमार दुबे, रविकांत, अपूर्वानंद,संजीव कुमार,सदन झा, शीबा, विनीत कुमार जैसे कई अकादमिक जनों ने हिन्दी की आधुनिकता पर काफी मारामारी की है । पुस्तक मेले में आज तीन बजे इसका विमोचन टाइप का कुछ होना है ।

वहाँ जाने से पहले मैं कुछ लेख तो ज़रूर पढ़ रहा था । तीन दिनों से । पढ़ते पढ़ते अपने सवालों की दुनिया में चला गया जिनके कुछ जवाब किताब में हैं और कुछ किताब से बन रही समझ से भी मिल जाते हैं । हिन्दी की आधुनिकता किसके बरक्स है । हिन्दी की पारंपरिकता और रूढ़िवादिता क्या रही होगी जिसे हिन्दी ने तोड़ कर अपने भीतर आधुनिकता पैदा की होगी । इसका जवाब मुझे नहीं मिला । दूसरा इसका भी नहीं मिला कि हिन्दी की आधुनिकता को अंग्रेज़ी या दूसरी प्रभावशाली भाषायें कैसे देखती हैं । यानी जब आप आधुनिक होते हैं तो कुछ नये तो होते ही होंगे तो यह नया कहाँ से आया और इस नये को कैसे देखा गया । 

जब मैं हिन्दी बोलता हूँ तो लोग कहते हैं कि आपकी भाषा देसी है, खाँटी है । तो क्या कोई शहरी और क़ुलीन हिन्दी भी है । जिसमें मिट्टी की ख़ुश्बू नहीं है । एक बार एच एम टी शब्द सुना था । सहेलियों के साथ विचरण करते हुए । किसी सहेली ने कहा कि वो एच एम टी टाइप है । मुझे लगा कि घड़ी की बात हो रही है जो टाइटन के मुक़ाबले अब कमज़ोर पड़ चुकी है । जवाब मिला कि हिन्दी मीडियम टाइप । तो मैंने पूछा कि और मैं ? नहीं तुम हिन्दी मीडियम टाइम नहीं लगते हो । तुम देखने से हिन्दी वाला नहीं लगते । मैं अक्सर सोचता हूँ मुझे जैसे हिन्दी भाषियों को अलग से और भदेसपन के साथ कैसे एक साथ देखा जाता है । क्या हिन्दी मीडियम टाइप कोई प्रोटो टाइप है रूढ़िवादिता की, किसी गए गुज़रे ज़माने का प्रोटोटाइप । 

हिन्दी में आधुनिकता का प्रवेश कैसे होता है । उसके आधुनिक प्रभाव क्या है । फ़्रेंच आधुनिकता से आई या स्पेनिश या अंग्रेज़ी की आधुनिकता से । अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ों से पहले भी हम ग्लोबल थे । दुनिया से कारोबार और सम्पर्क था । उन आधुनिकताओं का किया हुआ । हमारी आज की या उन्नीसवीं सदी की हिन्दी पूर्व आधुनिकता क्या थी । जब हमारी ज़मीन पर आलू और टमाटर बाहर से आ रहे थे, पजामे आ रहे थे सिले हुए कपड़े आ रहे थे तब हम किस तरह से आधुनिक हो रहे थे । आलू खाते वक्त आधुनिकता थे तो कफ़न में आलू कैसे क्रूरता का प्रतीक बन जाता है । जातिवादी बन जाता है । 

भाषा जब ज़ुबान से पहचान बनती है तो वह बोले जाने वाले समाज का अलग तरह से गोलबंदी करती है । क्या ये पहचान किसी उर्दू या बांग्ला के ख़िलाफ़ बनते हुए समाज का सांप्रदायिकरण करती है या आधुनिक बनाती है । हम तो हिन्दी में पश्चिम के प्रति जो तिरस्कारभाव रखते हैं उसके ख़िलाफ़ कोई स्वतंत्र या स्वायत्त आधुनिकता है हिन्दी की या उसी में से काँट छाँट कर । ओम प्रकाश वाल्मीकि की एक लाइन पर नज़र गड़ गई । लिखते हैं कि दलितों की बस्तियाँ नदी नालों के पार पश्चिम दिशा में रखी गईं । कहीं हिन्दी का एक हिस्सा इसी वजह से भी पश्चिम से तो नहीं चिढ़ता । पश्चिम में क़ाबा भी पर उस पर नहीं जाता अभी । हम पश्चिम और पश्चिम की आधुनिकता को घृणा की नज़र से क्यों देखते हैं । हिन्दी की आधुनिकता की दिशा क्या है । पूरब और पश्चिम की बाइनरी से अलग पूरब और पूर्वोत्तर तो नहीं । 

मेरी मातृभाषा भोजपुरी है । हिन्दी मेरी पहली अंग्रेजी । हिन्दी बोलना कांवेंट होना था । गाँव घर में हिन्दी बोलने पर डाँट पड़ती थी कि ज़्यादा अंग्रेज़ी मत बोलो । मुझे रटाया गया है कि मेरी मातृभाषा हिन्दी है । बाद में सचेत हुआ तो पूछने लगा कि जो मेरी माँ बोलती है वो मातृभाषा नहीं है । क्यों । मेरी माँ भोजपुरी है । हिन्दी मेरे लिए अंग्रेज़ी की तरह कामकाज की एक और भाषा है । विकल्प है । हिन्दी के इतिहास को इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ सकता हूँ मगर ओढ़ नहीं सकता क्योंकि मैं इसके इतिहास का आरंभिक सहयात्री नहीं रहा । अपनी पारिवारिक पीढ़ियों में विशुद्ध रूप से हिन्दी बोलने वाले हम पहली पीढ़ी हैं । तो क्या हम भोजपुरी बोलते हुए आधुनिक नहीं हैं । नहीं थे । भोजपुरी की आधुनिकता कहाँ से आई । 

मेरे लिए हिन्दी मरीन ड्राइव है । भोजपुरी की इतिहास चेतना भले न हो मगर वो मेरी भाषा है । जिसे जानने के लिए मैंने व्याकरण की किताब नहीं पढ़ी और मैट्रिक पास होने के लिए नंबर नहीं लाने पड़े । इस हिन्दी को अपने ही घर में डराते देखा है । बचपन में हिन्दी बोलने वाली संभ्रांत महिलाएँ चाचियां मेरी माँ को गँवार समझती थी । मेरी माँ उनसे वैसे ही टूटी फूटी हिन्दी बोलती थी जैसे मैं अंग्रेज़ी बोलता हूँ । उन चाचियों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी । उनके लिए हिन्दी शहरी और अफ़सरी की भाषा थी जो गाँव से पटना आई मेरी भोजपुरी बोलने वाली माँ को हिक़ारत और अनपढ़ नज़र से देखती थी । इसलिए हिन्दी मेरे लिए औपनिवेशिक भाषा है जो अंग्रेज़ी की औपनिवेशिक सत्ता के बरक्स अपना वजूद बनाते हुए सत्ता की बोली बोलने लगती है । हम हिन्दी को हमेशा औपनिवेशिकता के ख़िलाफ़ देखते हैं, हिन्दी में औपनिवेशिकता को नहीं देखते । हिन्दी की आधुनिकता ज़रूर पढ़ियेगा ।

प्रेम पत्र

प्रिय सो एंड सो,

बहुत दिनों बाद सोचा किसी महबूब को ख़त लिखूँ । महबूब कोई भी हो सकता है । जो भी है वो उससे नए सिरे से बात करने की कशिश मुझसे यह ख़त लिखवा रही है । मुझे चिढ़ है कि सारे महबूब एक से लगते हैं । किसी ने कम्प्यूटर के ज़रिये हमारे अहसासों और संकेत चिन्हों को गढ़ दिया है जिसे एक पैकेज की तरह लेकर हम किसी के सामने उपलब्ध हो जाते हैं । ग़ुलाम हैं हम आशिक़ी उम्र तलब तमन्ना बेताब जैसे बेकार फलसफों के । जो घिस कर हमारी रग़ों में दौड़ रहे हैं । ये हमें इश्क़ में बोर करते हैं । उसकी विविधता को ख़त्म करते हैं । इसलिए लगा कि लिखना ज़रूरी है । 

दरअसल हमने मोहब्बत में अपने सपने देखे ही नहीं । वर्षों बाद अहसास हुआ कि सारे सपने कहीं और से बनकर डोम्नोज़ पित्ज़ा की तरह होम डिलिवरी किये गए हैं । कई बार हमारा प्यार भी बाज़ार लगता है । मौसम और गानों के हिसाब से मूड का बदलना, शहरों के बदलते ही यादों का बदल जाना यह सब बाज़ार से आता है । बने हुए गाने और छपी हुई नज़्मों कविताओं के ज़रिये हमने कब चाँद को सराहने की नक़ल मार ली और कब हम अपने एकांत को किसी सिनेमा के दृश्य की तरह जीने लगे, पता होते हुए भी पता नहीं चला । इसलिए मैं तुम्हारे साथ हूँ या तुम किसी का साथ छोड़ मेरे साथ हो इसमें ख़ास फ़र्क नहीं है । तुम्हारा रोना और मेरा मिस करना सब एक जैसा है । रविवार को छपने वाले 'लव टिप्स' जैसा ।

ऐसा करते हुए हम प्यार के अहसास से नहीं बल्कि प्यार के शापिंग माॅल से गुज़र रहे होते हैं । हमारे सपने असंख्य लोगों के देखे गए सपनों की तरह है । वर्ना कैसे मेरा सपना उसके सपने जैसा हो सकता है । पहली बार जब आर्ची कार्ड को देखा तो यही लगा कि इसे कैसे मालूम कि अब हम सबका किसी को चाहना या खो देने की अभिव्यक्तियों का फ़र्क मिट चुका है । सब अख़बार मौक़ा है और हर एक मौक़े को लिए आर्ची का कार्ड है । दरअसल हमने अपना कोई एकांत बनाया ही नहीं जहाँ सिर्फ तुम हो और मैं हूँ । हमारी भाषा क्या है । हमारे प्रतीक क्या है । क्या हम साथ साथ कुछ करते हुए अपने लिए शब्द रचते हैं जहाँ सिर्फ हमारी और हमारी स्मृतियाँ बन रही हो । कितना भयावह है सबकुछ । शहर और नौकरियाँ जिस तरह मोहब्बत के ख़िलाफ़ हैं वे किसी भी तरह खाप पंचायत से कम नहीं । खाप जान लेते हैं और नौकरियाँ वक्त । जात और वक्त दोनों के नाम पर हमारी हत्या हो रही है। दफ़्तर किस क़दर हमारी अंतरात्मा में घुस चुका है यह देखना हो तो हमारी बातचीत के तमाम वाक्यों को देख लो । धर्म,मंदिर मस्जिद, पीर मज़ार ,तीज त्योहार सबने मिलकर मोहब्बत के तमाम पलों को सार्वजनिक और सामुदायिक बना दिया है । इकहरा कर दिया है । हमारी करवटें तक अमिताभ रेखा या रणबीर प्रियंका जैसी हैं । 

मेरी महबूबाओं तुम सब एक जैसी हो । मैं भी सबके जैसा हूँ । इसीलिए तुम्हारी स्मृतियों में बिना इजाज़त के मैं अपनी यादों के सहारे घुस सकता हूँ । एक को चाहते हुए सबको चाह सकता हूँ । हम सब अलग अलग जोड़ों में एक ही तरह के आशिक हैं । समानता इतनी भयावह है कि हम कब किसके आँगन में चले जाते हैं पता ही नहीं चलता । दूसरे से मिलकर आने पर क्यों लगता है कि पहले से मिलकर आए हैं । तुममें से कौन मुझे इस समानता की दीवार को तोड़ने में मदद करेगा । चलो न एक बार के लिए किशोर कुमार और केदारनाथ सिंह और गुलज़ार से लेकर ग़ालिब तक को तिलांजलि दे आते हैं । हम फिर से जीते हैं । इन सब औज़ारों और सामानों के बिना जीते हैं । जीते हुए अपने शब्द बनाते हैं, उनसे अपनी कविता और गीत लिखते हैं ताकि किसी और की मोहब्बत के कोई भी निशाँ हमारे बीच न हो । हमारे बीच सर्फ़ हमारा और तुम्हारा गुज़ारा गया वक्त हो । वर्ना ये प्रेम मुझे प्रोडक्ट लगता रहेगा । हमारे बीच कई और चेहरे नज़र आयेंगे । कई और चेहरों में मैं नज़र आता रहूँगा । तुम नज़र आओगी ।

मैं तुमको जीना चाहता हूँ । तुम्हारे साथ तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ । रोज़ तुम्हें एक ख़त लिखना चाहता हूँ । मोहब्बत सिर्फ पहली बार बोल देना नहीं है । पार्क और पेरिस घूम आना नहीं है । 'टूगेदर' होना नहीं है । एक वक्त है जिसे यूँ ही गुज़र जाने से रोक देना मोहब्बत है । वो कहाँ है । मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी आँखों में ख़ुद को देखो और मैं तुम्हारी निगाहों में ख़ुद को देखने के बाद बाहर जाऊँ । आइना क्यों है । हम कुछ तो साथ साथ रचते हुए मोहब्बत के उन पलों जी जायें जो किसी अपार्टमेंट बेचने वाले के ब्रोशर में न हो । कुछ तो मोहब्बत बचा होगा जो किसी काउंसलर के बताये फ़ार्मूले से बाहर होगा ।

इस ख़त को तुम सब अपना ही समझना । बस एक ही तरह से मत पढ़ना । अलग अलग तरीके से लिखते हुए पढ़ना । मोहब्बत के दौर में हम मोहब्बत के सामान बन रहे हैं । उसके रचनाकार नहीं ।

तुम्हारा ,

रवीश कुमार 


गाय माता नहीं नागरिक है

क़स्बा पढ़ने वाली रश्मि ने लिखा है कि मुझे गाय की दुर्दशा पर लिखना चाहिए क्योंकि हम गाय को लेकर पाखंडी हैं । रश्मि ने किसी अमरीकी राजदूत वाजदूत के हवाले से टिप्पणी की है कि हम पूजा करने का ढोंग करते हैं और दूसरी तरफ़ सड़कों पर मारा मारा फिरने के लिए मजबूर करते हैं । रश्मि की बात सही है । गाय के बारे में ज़्यादातर लोग बातें क्यों नहीं करते जबकि उसका दूध सब पीते हैं । 

मैं खुद दो संयोग की वजह से गाय के बारे में सोच रहा था । इनदिनों सब्ज़ीवाला जूस निकालने के बाद बड़ी संख्या में पल्प निकल आता है । जाड़े के कारण साग और गोभी की डंंठल निकल कर बर्बाद हो जाते हैं । यह सब बड़ी संख्या में कचरे में जाता है जहाँ चारा ढूँढते ढूँढते गाय पोलिथिन खा लेती है । जब तक बाबूजी ज़िंदा थे तब तक घर में गाय रही । चारा खिलाने से लेकर उसकी चमड़ी से अठईं निकालना कुछ न कुछ तो किया है । बछड़ा देने पर बाँस के कोंपल खिलाना और सर्दी में बोरे की चट्टी ओढ़ाना ।साग सब्ज़ी की कतरनें और पहली रोटी गाय को देना । गाय हमारी ज़िंदगी का हिस्सा रही है । दुख होता है कि इस तादाद में हरा चारा बर्बाद होता है । रोज़ सोचता हूँ कि इसे किसी गाय को खिला आऊँ । दूध ज़्यादा देगी ।

हम अंधाधुँध शहरी होने के क्रम में भूल गए हैं कि कभी गाय घर घर चौखट से बँधा करती थी । गाय से हमारी सामाजिक पारिवारिक यात्रा में सम्पत्ति का सृजन होता है । गाय से गोत्र बना है और गाय को हड़पने के लिए खूब युद्ध हुए हैं । उन युद्धों में गायों का क़त्ल भी हुआ है । गाय लूट ली जाती थी ।इस्लाम के उदय से पहले की बात कर रहा हूं । आज जब हम उसी गाय को सड़कों पर देखते हैं तो हार्न बजाकर आतंकित करते हैं और मज़ाक़ उड़ाते हैं । वो अब भी अर्थव्यवस्था का हिस्सा है मगर हम उसे ट्रैफ़िक की समस्या के रूप में देखते हैं । गोबर का मज़ाक़ उड़ाते हैं । यह नहीं सोचते कि गाय तब क्यूँ है । शहर इतना विशाल हो ही गया तो गाय क्यों हैं । क्यों नहीं हर शहर में गायों के लिए चारागाह है । हम गाय के प्रति बेहद क्रूर लोग हैं । तब भी जब उसकी उपयोगिता़ रहती है ।

दरअसल गाय को लेकर हमारा नज़रिया काफी समस्याग्रस्त है । नेता दूध के उत्पादन में अपने अपने राज्य को नंबर वन बताते हैं लेकिन गाय का नाम नहीं लेते । डेरी उद्योग का नाम देकर बिज़नेस माडल बताते हैं मगर गाय से दूध लेने के लिए उसके साथ क्रूरता बरतते हैं । इंजेक्शन लगाते हैं । हाल ही में हमारी एक दोस्त ने बताया कि डेरी वाले गाय को कैल्शियम फास्फेट नहीं देते जिसके कारण गाय दूध कम देने लगती है और वो जल्दी ही अनुपयोगी हो जाती है । जो पालता है वही पोलिथिन खाने के लिए शहर में छोड़ देता है । हम भूल जाते हैं कि गायों के लिए चलना बेहद ज़रूरी है । वो कहाँ चलने और चरने जाए । गाय के साथ जो बर्ताव हो रहा है उसके लिए माता माता कहने वाले लोग ही ज़िम्मेदार हैं । ढकोसले साम्प्रदायिक सब । 

गाय हमारी अर्थव्यवस्था की पहली ईकाइयों में से एक है । वह हमारी सहचर है । लेकिन हमने गाय को कभी जीव माना ही नहीं । परीक्षाओं में काऊ इज़ अ फ़ोर फ़ुटेज एनिमल लिखकर भूल जाते हैं । धार्मिक और साम्प्रदायिक राजनीति ने गाय के प्रति हमारे नज़रिये को और भी कुंद किया है । कुछ धार्मिक संगठन हैं जो वाक़ई गाय की सेवा करते हैं । घर घर से चारा जमाकर खिलाते हैं पर वो काफी नहीं है । लेकिन कुछ धार्मिक संगठनों ने गौ रक्षा का विषय बनाकर इसे हिन्दू बनाम मुस्लिम राजनीति के द्वंद में फ़िट कर दिया है । इनके लिए गाय का होना साम्प्रदायिक द्वेष के मुद्दे से ज़्यादा कुछ नहीं । इन्हीं के कारण सामान्य लोग भी गाय के बारे में बात नहीं करते । इनके ढकोसलों ने गाय को एक चश्मे में बंद किया है । गाय पूजनीय है मगर उसकी पूजनीयता को ख़ास राजनीतिक रंग देकर उसे पत्थर के जीव में बदल दिया गया है । जिसे ये खुद ठोकर मारते हैं । 

वाक़ई हमें गायों को धार्मिक सांप्रदायिक नज़रिये से मुक्त कराना चाहिए । सारे संगठनों को गाय के बारे में बात करना चाहिए । सिर्फ धार्मिक और दक्षिणपंथी संगठनों के भरोसे गाय नहीं छोड़ सकते । शहर और गाँव किसी का भी गाय के बिना काम नहीं चल सकता । इसलिए गाय रहेगी क्योंकि गाय माता से पहले या माता होने के नाते ही सही शहर की नागरिक है । महाराष्ट्र के बारामती में गाँव पर्यटन का माडल देख रहा था । किसान ने कहा कि शहरी पर्यटकों के लिए गाय भी है । मैंने पूछा क्यों तो जवाब दिया कि साहब बहुत बच्चों को मालूम नहीं कि दूध गाय देती है । वे समझते हैं कि दूध अमूल देता है, मदर डेयरी देती है । हम सचमुच गाय की चिन्ता करते हैं तो उसे गौ रक्षा के नाम पर हिन्दू मुस्लिम राजनीति का खुराक बनने से बचाना होगा । आप भी किसी भी गौ रक्षा सम्मेलनों के पोस्टर देख लीजिये । हमें बस उसके स्वस्थ भोजन और परिवेश की चिन्ता करनी चाहिए । गाय को लेकर भावुकता छोड़कर उसके साथ एक सह नागरिक का बर्ताव करना चाहिए । तभी हम उसके अधिकारों के प्रति सचेत हो सकेंगे और बच्चों को स्वस्थ दूध दे सकेंगे । 

बेगानी संसद में अब्दुल्ला तेलंगाना

दलील देने में बीजेपी कांग्रेस का कोई सानी नहीं । कब दोनों मिल जाते हैं और कब भिड़ जाते हैं पता नहीं चलता । जिस तरह से आज तेलंगाना बिल पास हुआ है वो एक कमज़ोर और जर्जर हो चुके लोकतंत्र की निशानी है । बीजेपी बाहर आकर बाक़ी दलों की तरह लोकतंत्र की हत्यागान में शामिल हो चुकी है । जब वह साथ दे रही थी तब क्या उसने लोकसभा टीवी की कार्यवाही रोकने का विरोध किया, इसकी जानकारी नहीं है । सलमान ख़ुर्शीद बाहर निकल कर कहते हैं कि बेहतर तरीक़ा अपनाया जा सकता था मगर आज का दिन एतिहासिक है । मुरली मनोहर जोशी कहते हैं कि हमने तेलंगाना का समर्थन किया मगर सरकार ने ग़लत तरीक़ा अपनाया । कोई भी भाषाविद इन दो बयानों को पढ़ेगा तो समझ जाएगा कि कहाँ समानता है और कहाँ विरोध जताने के नाम पर विरोध । 

बीजेपी तो यही कह रही कि वो हंगामे में पास कराने के लिए साथ नहीं देगी । अंग्रेज़ी में 'डीन' बोलते हैं । सदन में व्यवस्था और बहस हो तो साथ देगी । बीजेपी बताये कि आज सदन में क्या था । क्या इस तरह से सीमांध्र के सांसदों को बाहर कर और प्रसारण बंद कर सदन में व्यवस्था हो गई थी । वो कौन से संशोधन थे जिस पर बहस हुई । आख़िर बीजेपी सरकार के खेल में क्यों फँसी । किन मूल्यों की ख़ातिर । 

मुलायम सिंह यादव ने कहा कि यह कांग्रेस बीजेपी की मिल़ीभगत है । ये दोनों पूरे देश को लड़ा कर राज करना चाहती हैं । तृणमूल के दिनेश त्रिवेदी ने मुलायम से पहले स्पीकर की भूमिका पर सवाल उठाये । जद यू तक ने सदन का बहिष्कार किया ।जगन मोहन रेड्डी ने कहा कि आज काला दिवस है । न तो ना में हाथ उठे न हाँ में । कांग्रेस ने पास तो करा लिया मगर क्या उसने तेलंगाना बिल की लोकतांत्रिकता का गला नहीं घोटा । आज जो हुआ उसके साथी कौन था । आर पी एन सिंह का कहना है कि कुछ लोग सदन नहीं चलने दे रहे थे । ज़्यादातर सेंस आफ़ हाउस था । 

इसीलिए कह रहा था कि कांग्रेस बीजेपी के भेजे टाटा 407 से उतर जाइये । वोट जिसे देना है दीजिये लेकिन इन सब मूल्यों की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी से भागने के लिए नमो या रागा फ़ैन्स मत बनिये । तेलंगाना को बधाई लेकिन क्या तेलंगाना को इस तरीके से पास हुए बिल का विरोध नहीं करना चाहिए । कमलनाथ बाहर आकर सुष्मा पर हमला कर रहे हैं । कहा कि बीजेपी के नेता कहते हैं कि हम सपोर्ट करते हैं मगर यह ग़ैर संवैधानिक है और सदन में सपोर्ट भी किया । यह बीजेपी का डबल गेम है । क्या बीजेपी कांग्रेस ने राजनीतिक स्तर पर सीमांध्र के सांसदों से संवाद करने का प्रयास किया । लोकतंत्र का आचरण कौन कर रहा है । सीमांध्र के सांसदों ने भी जो किया उससे अपना विरोध कमज़ोर ही किया । उनका तरीक़ा क्या लोकतांत्रिक था । कई सवाल हैं और कई एंगल से बयान ।

इसीलिए कांग्रेस बीजेपी के नूरा कुश्ती वाले बयानों पर नज़र रखनी चाहिए । जब लोकसभा के फ़ंड से संचालित लोक सभा टीवी का प्रसारण बंद हो सकता है तो निवेशकों से संचालित मीडिया की स्वायत्तता पर कोई रोने वाला भी नहीं बचेगा । आज की चुप्पी इस बात की पुष्टि करेगी कि राजनीतिक दल भी अपने अपने राज्य में चैनलों को बंद करते रहेंगे । कर ही रहे हैं । दरवाज़ा बंद कर संसद चले उससे तो अच्छा था कि इंदिरा गांधी स्टेडियम में जन लोकपाल पास होता । इसलिए कहा कि आज का दिन हमारे लोकतंत्र का कमज़ोर क्षण है जिसके िक हम सब को शर्म से सिर झुका कर साठ साल से संघर्षरत तेलंगाना को बधाई देनी चाहिए । तेलंगाना का सपना पूरा हुआ । ज़रूरी था बनना मगर ऐसे ? बाकी त जो है सो हइये है । 

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गुफ़ाओं में गुम हो गई सांकेतिक भाषा मोबाइल युग में लौट आई । स्माइली के संकेत चिन्हों की दुनिया काफी बड़ी हो गई है । एक दिन एक दोस्त की भेजी स्माइली के जवाब देने के लिए जब संकेतों की दुनिया में गया तो न जाने कितने संकेत चिन्ह वहाँ बने हुए थे जो तमाम शब्दों के विकल्प बनकर छा जाने का इंतज़ार करने लगे । कभी स्माइली को बचपना समझ कर नज़रअंदाज़ करने वाला मैं उनसे शब्द बनाने लगा । खेलने लगा । मतलब पूछने लगा । मज़ा आ गया । निश्चित रूप से आपमें से कई इसमें माहिर होंगे लेकिन मैं अपनी बैंगनी तो पेश करता हूँ ।

🌹 तुम्हें भेजा है📜में 💐नहीं मेरा ❤️है । ये पूरा गाना ऐसे लिखा जा सकता है । जल्दी आओ या भागने के लिए आप ये 🏃इस्तमाल कर सकते हैं और जब खुशी से झूमने का मन हो ते 💃और जब आँसू टपके को ये 💦 । 👍👎👌👊✊✌️👋✋👐👆👇👇👈🙌🙏☝️👏💪 तमाम तरह की हस्त मुद्रायें हैं जिन्हें आप राम राम करने से लेकर वाह वाह करने और रूको रूको करने में इस्तमाल कर सकते हैं । 💅 नाख़ूनों की रंगाई में कोई व्यस्त हो तो ऐसे बोल सकती है । 👜👓🎀👢👠👕🎽👗🌂💄हर मूड के संकेत हैं । 

🏠💒🌇🗼🚇🚊🚉🚝🚘🚈✈️🚁🚔🚒🚨🚦🚧⛽️ इन सब संकेतों के ज़रिये आप हवाई यात्रा से लेकर रेल यात्रा, पेट्रोल भराना, रेड लाइट, मेट्रो सब व्यक्त कर सकते हैं । नाश्ते खाने के भी कई संकेत बने हुए हैं । ☕️🍟🍤🍕🍼🍴🍷🍻🍳🍞🍧🍫🍦🌽🍎🍭🍍🍠 । 🆕🆙🆒🆓🚾🚰🆑🆘🆔📴🔝🔚🔙🔛🏧♥️♠️✖️➕➖➗✔️〰☑️ इन सब संकेतों के ज़रिये आप पूरा का पूरा वाक्य बना सकते हैं । बल्कि बना रहे हैं । स्माइली की भाषा थोड़ी प्राइवेट सी है । इनबाक्स या व्हाट्स अप में ख़ूब इस्तमाल होता है । स्माइली चिन्ह तरह तरह के मनोभाव को व्यक्त करने के लिए हैं । 

🆗🔼🔽↩️↪️↙️↘️ ये सब एक शब्द की तरह है । शायद हर किसी के लिए अलग अलग मायने रखते होंगे । आपके पास इनके बारे में और जानकारी हो तो ज़रूर बतायें। 🐎🐆🐫🐊🐓🐞🐜🐝🐄🐷🐺🐼 तरह तरह के जीव जन्तु । हमारी दुनिया सचमुच विशाल और रंगीन है ।

गुंडे

बचपन की दौड़ । स्लो मोशन वाली । हाथ में हाथ डालकर मालगाड़ी से सरकते कोयले से फिसलते हुए गिरना । जुर्म करते हुए भागना और भागते भागते  बड़ा हो जाना । कोयला बचपन और दोस्ती हिन्दी सिनेमा की वो यादें हैं जो लौटती रहती हैं । गैंग आफ़ वासेपुर, भाग मिल्खा भाग से लेकर गुंडे तक ।

इस कहानी में कलकत्ता के अलावा कुछ नहीं है । दो ख़ूबसूरत नौजवानों की बलिष्ठ छातियाँ हैं । इरफ़ान और प्रियंका हैं । धनबाद और कोलकाता का कोयले से रोमांस अब उस अतीत का हिस्सा बन चुके हैं जो अब लौटते हुए मौलिक नहीं लगते है । रामलीला के इस हीरो का नाम याद नहीं आ रहा मगर इसमें तेवर है । आगे जायेगा । इरफ़ान इरफ़ान हैं । फ़िल्म के आख़िरी सीन में पान सिंह तोमर के एनकाउंटर वाले सीन की तरह लौटते हैं । डाकू नहीं दारोग़ा बनकर । प्रियंका हसीन लगती हैं । अच्छी अदाकारा है मगर उनका रोल ख़ास नहीं है । बस वो हैं अपनी ख़ूबसूरती के साथ । गुंडे देखकर भुल जाने वाली फ़िल्म है । ऐं वीं पर ठीक ठाक । कैमरा निर्देशन और पटकथा अपनी जगह पर होने के कारण ही देखी जा सकती है वर्ना चलती फ़िल्म के दौरान समीक्षा नहीं लिखता । फ़िल्म का अंत ख़ूबसूरत है । स्केच से रोमांटिक बना दिया गया है ।

तुम्हारा जात क्या है वोटर !

इक्कीसवीं सदी के चौदह साल बाद इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए हो रहे चुनाव नया लगते लगते पुराना लगने लगा है । यह चुनाव किसी नए भारत के लिए नहीं हो रहा है बल्कि इसमें वही जात-पात है वही खर-पतवार है । कांग्रेस बीजेपी ने जात-पात की राजनीति के ख़िलाफ़ एक ऐसा विकल्प पेश किया है जो कम विश्वसनीय लगता है । ये दोनों ही पार्टियाँ क्षेत्रीय दलों की आलोचना करती है मगर इन्हें उन्हीं जात पात वाले दलों से गठबंधन करने या विलय करने में कोई नैतिक संकट नहीं होता । ऐसे विलय महज़ चुनावी होते हैं । इनमें कोई स्पष्टता नहीं होती कि विलय कर रहे दलों ने जात पात की राजनीति का त्याग कर दिया है या क्यों राष्ट्रीय दलों ने इनके जात पात को अंगीकार किया है ।

अब नरेंद्र मोदी की जीत किसी नए भारत की वजह से नहीं होने जा रही है । शायद मोदी और बीजेपी भी समझ गए हैं कि रैलियों और सेमिनारों के स्लोगन से चुनाव नहीं जीते जाते । जातिगत आधार ख़ज़ाना पड़ेगा । तभी तीन तीन चुनाव जीत चुके मोदी ने कभी अपने पिछड़ा होने की बात नहीं की और न चाय बेचने वाली अतीत का राजनीतिक इस्तमाल किया । पार्टी के कई नेता जातिगत आधार सर्च करने में जुट गए हैं । तभी यूपी जाकर बीजेपी दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान कांशीराम को भारत रत्न देने का वादा कर बसपा के इस महान संस्थापक की विरासत पर अतिक्रमण करना चाहते हैं । इसे अंग्रेज़ी में 'अप्रोप्रिएट' करना कहते हैं यानी हड़पना । बसपा ने अनेक बार कांशीराम को भारत रत्न दिये जाने की बात की है । संजय पासवान दिल्ली बीजेपी मुख्यालय में बने अपने दफ़्तर में कांशीराम की तस्वीर भी लगाई हैं । उन्होंने जगजीवन राम पर भी किताब लिखी है जिसका नाम है राष्ट्रनिष्ठ बाबूजी ।इस किताब में दिलचस्प तरीके से जगजीवन क़ी राजनीति को हिन्दुत्व के फ़्रेम में फ़िट कर देते हैं । जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार कांग्रेस की सांसद हैं । मुझे नहीं मालूम की मीरा कुमार अपने पिता को हिंदुत्व के खांचे में देखती हैं या नहीं । वैसे उन्हें संजय पासवान की किताब का एक चैप्टर तो पढ़ना ही चाहिए जिसका शीर्षक है 'ख़ून में बसा था हिन्दुत्व ' । आज की राजनीति में वैचारिक बहसें नहीं होतीं इसलिए ऐसी किताबें लोगों तक पहुँच कर भी चर्चित नहीं होती । कम से कम भरमाने की राजनीति का ख़ुलासा तो हो ।




बहरहाल खबर आ रही है कि बीजेपी बिहार में कुशवाहा समाज के नेता उपेन्द्र कुशवाहा से गठबंधन करने जा रही है ताकि ओबीसी मतदाता पार्टी की तरफ़ आ सकें । तो सर्वाधिक लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी की जीत बिना जातिवादी नेता उपेंद्र कुशवाहा के नहीं हो सकती क्या । उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति में ऐसा कौन सा राष्ट्रवादी तत्व है जिसके लिए बीजेपी चुनाव के समय ही हाथ मिलाना चाहती है । बीजेपी में कुशवाहा नेता नहीं है क्या ? उसी तरह पार्टी यूपी में भी अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल के सम्पर्क में हैं और ख़बरों के अनुसार अपना दल को बीजेपी में विलय की तैयारी चल रही है । क्या ये बीजेपी कांग्रेस का जातिवाद नहीं है । कांग्रेस ने भी यूपी विधानसभा चुनावों से पहले कुर्मी समुदाय में पकड़ रखने वाले नेता बेनी प्रसाद वर्मा को समाजवादी पार्टी से अपनी पार्टी में लाकर केंद्र में मंत्री बनवा दिया । ये और बात है कि कोई चुनावी लाभ नहीं हुआ ।

क्या इन दलों पर अवसरवादी जातिवादी राजनीति का आरोप नहीं लगना चाहिए । ये पार्टियाँ राजनीत स्तर पर जात पात ख़त्म करने का जोखिम क्यों नहीं उठातीं । फिर इनके जात पात और दूसरे के जात पात में क्या अंतर है । अंग्रेज़ी अख़बार  इंडियन एक्सप्रेस से इंटरव्यू में बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि बिहार में पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग काफी बड़ा है । इस बहुसंख्यक समाज के बारे में बात करना ग़लत नहीं है । हम इनसे मोदी के पिछड़े होने और चाय बेचने की कहानी से राब्ता क़ायम करना चाहते हैं । सुशील मोदी कहते हैं एक सौ तीस जातियाँ हैं अति पिछड़ा समूह में । हम मतदाताओं की छतरी बनाना चाहते हैं जाति और धर्म से आगे । लेकिन उनके बयान से यह साफ़ नहीं होता है कि यह छतरी किस तरह से बिना जातिवाद के बन रही है । वे यह भी नहीं बताते कि मोदी की पहचान के अलावा कौन से वे मुद्दे हैं जिनसे वो पिछड़ावाद की राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं । 

बीजेपी और कांग्रेस को कहना चाहिए कि वे पिछड़ावाद ी राजनीति को ख़त्म करना चाहते हैं । यह साफ़ हो ताकि पिछड़े और अति पिछड़े मतदाता भी फ़ैसला करें कि वे अपने राजनीतिक वर्चस्व की दावेदारी को छोड़ने के लिए तैयार है । बीजेपी में मोदी का उभार शायद एक और प्रक्रिया का उभार है जिसकी तरफ़ सुशील मोदी मतदाताओं की छतरी की बात से इशारा करते हैं । यही कि अब पिछड़ा नेतृत्व राष्ट्रवादी बीजेपी में भी उभर सकता है । बल्कि उभर चुका है । तभी दलित मोर्चा के अध्यक्ष संजय पासवान कहते हैं कि वे आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कहने वाले कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी की बात से सहमत हैं । जाति आधारित आरक्षित की समीक्षा होनी चाहिए । तो क्या आरक्षण का अधिकार गँवा कर देश का बहुसंख्य मतदाता पिछड़ा अति पिछड़ा और दलित बीजेपी के राष्ट्रवादी ढाँचे में विलीन होना चाहेगा । क्या बीजेपी सचमुच जात पात के ख़िलाफ़ लड़ रही है या कथित रूप से उसी जात पात के अंडे को अपने बाड़े में लाकर सेंकना चाहती हैं । आख़िर जब मोदी की लहर है तब अनुप्रिया पटेल या उपेंद्र कुशवाहा की ज़रूरत क्यों है । क्या बीजेपी को लगने लगा है कि स्वर्ण मतदाताओं की मुखरता लहर तो पैदा करती है मगर असर नहीं । इसीलिए मैं कहता हूँ कि  यह चुनाव हो तो रहा है जात पात पर ही । बाकी त जो है सो हइये है ।

धवल नैनिताल

ये आज नैनीताल की तस्वीर है । बर्फ ने सफ़ेद कर दिया है । 




यहाँ प्यार ज़िंदगी में

एक मिनट । मैं आपको कुछ देना चाहता हूँ । प्लीज़ मना मत कीजियेगा । मैं बस पैंट कर रहा हूँ । ये आपका नाम सही है न । आपको देखा घूमते तो जल्दी जल्दी पेंट करने लगा । प्राइम टाइम अच्छा लगता है । 

उसके बाद कलाकार जय शर्मा अपनी दुकान पर जा बैठे और बाक़ी की कलाकारी पूरा करने लगे । मैं उनकी दुकान पर खड़े होकर निहारने लगा । अजीब दुनिया के सामान । बैज, चेल्सी बार्सीलोना के झंडे, की रिंग, माला । 

जय शर्मा ने तो भावुक ही कर दिया । मालूम नहीं प्राइम टाइम में ऐसा क्या है । पर इस भरोसे और प्यार से सिहरन पैदा होती है । वे कहे जा रहे थे कि ऐसे ही काम कीजियेगा । सच के साथ बने रहियेगा । मैं उनकी बातों को इस तरह से सुन रहा था कि दर्शक सिर्फ सच्चाई और निष्पक्षता पकड़ते हैं । इसके अलावा उन्हें कुछ नहीं चाहिए । कप तैयार हो चुका था । कलाकार ने मेरे लिए एक संदेश भी लिख दिया- एक्सप्लोर द वर्ल्ड 

महागुन माॅल में आज ऐसे ही दिन गुज़रा । पत्नी के साथ चाय पी रहा था कि कोई मनीष आए । कनाट प्लेस में इवेंट मैनेजमेंट का काम करते हैं । बिहार से आये इस नौजवान ने अपनी कंपनी बनाई है । कहा कि नौ बजे घर पहुँचना ही होता है । भाग के आता हूँ । मनीष ने सैमसंग के स्टोर में बुला लिया और मियाँ बीबी की तस्वीर खींच कर फ़्रेम कर दिया । साथ का साथ और हाथ का हाथ । तब तक कुछ और लोग फोटो खिंचाने आ गए । इस बीच एक लड़की किनारे खड़ी मेरी पत्नी की तस्वीर लेने लगी । फिर मेरी भी । साथ में पाँच सौ रुपये का एक गिफ़्ट वाउचर पकड़ा दिया । । 

दो दिन पहले मुंबई जाते वक्त एक पोस्ट किया था । पोस्ट पढ़ते ही शिशिर और अखिलेश का फोन आ गया । आप मुंबई में ? हाँ । वादा हुआ कि लौटते वक्त एयरपोर्ट पर मुलाक़ात हुई । इससे पहले कोई जान पहचान नहीं । मैंने ई मेल कर दिया । दोनों मेरा बोर्डिंग कार्ड लेकर तैयार थे । बाद में उनके और दोस्त लवलीन गर्ग, मिश्रा जी भी आ गए । ये सभी दिल्ली के स्कूल आफ प्लानिंग के छात्र रहे हैं । नए बने मुंबई टर्मिनल में काम किया है । बस वही अड्डा जम गया । प्राइम टाइम के दर्शक परिवार की तरह हो गए हैं । 

अखिलेश तो नए टर्मिनल का एक कैलेंडर भी ले आए थे । मेरे लिए । मिलकर अच्छा लगा । 

प्राइम टाइम ने मेरी दुनिया बड़ी कर दी है । एकांत तो समाप्त ही हो गया । हर समय लोगों की निगाहों में रहता हूँ । अपनी कमज़ोरियों और कमियों के जानने के कारण यक़ीन ही नहीं होता कि वाक़ई में लोग इतनी शिद्दत से देखते हैं । विनम्रता से स्वीकार करने के अलावा रास्ता क्या है । मैं बहकता नहीं पर दिल तो धड़कता ही है । 

दर्शकों के साथ मिलने जुलने के अनुभवों पर इसी ब्लाग पर कई लेख लिख चुका हूँ । मुंबई से लौटते वक्त जब जहाज़ में बैठा तो बगल की सीट से एक सज्जन मेरी तरफ़ झुक गए । कारपोरेशन बैंक का कार्यकारी निदेशक हूँ । आपकी बहस अच्छी लगती है पर आपको रवीश की रिपोर्ट नहीं बंद करनी चाहिए थी । बनारस का हूँ और अगले साल रिटायर कर जाऊँगा । सोचा है बुंदेलखंड के इलाक़े में जाकर लोगों के लिए काम करूँगा । 

उसके बाद श्रीवास्तव साहब पत्रकारिता के असर की बात करने लगे । कहा कि दिनमान ने जवानी बचा ली वर्ना घूसखोर अफ़सर होता । शुक्रिया आप सभी का । प्राइम टाइम के ज़रिये मुझ तक पहुँचने के लिए और आप तक पहुँचने का मौक़ा देने के लिए । 

1947 में मीडिया

"कोई कितना भी चिल्लाता रहे अख़बार वाले सुधरते नहीं । लोगों को भड़काकर इस प्रकार अख़बार कि बिक्री बढ़ाकर कमाई करना, यह पापी तरीक़ा अख़बार वालों का है । ऐसी झूठी बातों से पन्ना भरने की अपेक्षा अख़बार बंद हो जायें या संपादक ऐसे काम करने के बजाय पेट भरने का कोई और धंधा खोज लें तो अच्छा है । "
12.2.1947- महात्मा गांधी( सौजन्य: वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत)