जो भी हो आडवाणी के विरोध का फलितार्थ अब चुनाव के बाद ही सामने आयेगा । कोई इस मुग़ालते में न रहे कि मोदी को नंबर नहीं मिलेंगे तो आडवाणी को आगे कर सहयोगी लाया जायेगा । जो भी इस तरह की दलील दे रहा है वो यह मान कर चल रहा है कि क्षेत्रीय दलों की मजबूरी है बीजेपी को सपोर्ट करना । मुज़फ्फरनगर और चौरासी कोसी परिक्रमा से साफ है कि मोदी या बीजेपी या संघ को विकास के मुद्दे में कितना गहरा यकीन है । मोदी चुनावी मुद्दों का ध्रुवीकरण कर वोट ले आयें और कुछ सीट कम पड़ जाए तो संघ उन्हें पीछे कर देगा । हंसी नहीं आती क्या आपको । बीजेपी में मोदी का लाभ उनके अलावा किसी और को नहीं मिलेगा । जिस संघ ने मोदी को आगे किया है क्या वही संघ नंबर न आने पर आडवाणी को आगे करेगा ? राजनाथ अपना गेम चल देंगे ? मुझे यह बकवास लगता है । कोई यह तो बताए कि कौन सा दल है जो राजनाथ सिंह को नेता मान लेगा और क्यों ? गाज़ियाबाद के सासंद राजनाथ के नेतृत्व में बीजेपी की यूपी विधानसभा में सीटें और कम हो गईं । आज से अध्यक्ष के रूप में राजनाथ का काम भी समाप्त हो गया । राजनाथ मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रहे हैं और नंबर नहीं आया तो इतना विरोध होगा कि राजनाथ सहन नहीं कर पायेंगे । उन्होंने मोदी की जीत के कसीदे में अपने लिए दो चार लाइनें सुरक्षित कर ली है । इससे ज्यादा कुछ नहीं । बीजेपी को कम सीटें आईं तो सबसे पहले राजनाथ का राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाएगा । क्या राजनाथ यह कहेंगे कि जनादेश मोदी को नहीं बीजेपी को मिला है और उसके अध्यक्ष के नाते मुझे मिला है ? सब इतना सरल नहीं होता । अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी चुनाव जीत कर हार जाएगी । मोदी अकेले बहुमत नहीं ला पाये तो इस चुनाव में बीजेपी की हर संभावना समाप्त हो जाएगी ।
इसीलिए जिस तरह से आडवाणी ने बड़ा दाँव चला है उसी तरह से बीजेपी ने भी एक जोखिम उठाया । बीजेपी के पास यही जोखिम ही मौक़ा है । आज से पहले तक हुए चुनावों में नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकप्रियता कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है । इसका मतलब यह नहीं कि आगे भी ऐसा ही होगा । आज तो वे लांचिंग पैड पर सेट किये गए हैं । काउंटडाउन शुरू हो गया है । आर एस एस और बीजेपी का यह राकेट आरबिट में जाएगा या नहीं यह सिर्फ वैज्ञानिकों के आत्मविश्वास पर निर्भर नहीं करेगा लेकिन यह मानना कि हर राकेट का परीक्षण फ़ेल ही होगा पूरी तरह से अवैज्ञानिक है । अगर 272 आया तो देखियेगा कि वैज्ञानिक की भूमिका में नज़र आ रहा संघ अवकाश पर चला जाएगा । ख़बरें लीक करेगा कि मोदी किसी को सम्मान नहीं दे रहे हैं । तब संघ को आडवाणी की याद आएगी ।
सही है कि गुजरात भारत नहीं है पर क्या यह सही नहीं कि गुजरात भारत में ही है । जानकार जब इस जुमले का इस्तमाल करते हैं तो क्या वे यह कहते हैं कि सारे सांप्रदायिक गुजरात में हैं और सारे धर्मनिरपेक्ष गुजरात के बाहर । मोदी ने टोपी नहीं पहनी तो क्या हुआ लेकिन जयपुर में टोपी बुर्का पहनवा कर मुसलमानों को बुलवा तो लिया । मोदी इस तरह के कांग्रेसी और सपाई नाटक खूब करेंगे । जयपुर में हुई सेकुलरिज़्म की फैन्सी ड्रैस पार्टी भी उसी तरह हास्यास्पद है जिस तरह से मोदी विरोधी पार्टियों का सेकुलर विचारधारा की जड़ें मज़बूत करने के ढकोसले । जिसे समाजवादी पार्टी की सरकार ने साबित कर दिखाया है । सेकुलर विचारधारा का नाम लेने के अलावा क्या इन दलों ने कोई ठोस वैचारिक प्रयास किया है ? क्या किया है ? सचर रिपोर्ट सेकुलरिज़्म नहीं है वो एक समुदाय के नागरिक अधिकार से वंचित किये जाने की रिपोर्ट है । विचारधारा के स्तर पर सभी समुदायों में सांप्रदायिक तत्वों से लड़ने के लिए इन दलों ने क्या किया है , इस पर खुलकर बहस होनी चाहिए ।
मोदी अपना प्रचार करने में माहिर हैं लेकिन मोदी को लाभ मिल रहा है कांग्रेस जनित परिस्थितियों के कारण । वर्ना मोदी कर्नाटक में पार्टी की हार को जीत में बदल देते । मोदी जीत की गारंटी नहीं रहे हैं । हर चुनाव पिछले चुनाव से अलग होता है मगर जानकारों की आशंकाओं को देखें तो सिर्फ मोदी के कारण अगला चुनाव पिछला जैसा होने जा रहा है । जो हो रहा है उसे तो देखने और कहने का साहस होना ही चाहिए । मोदी अपनी पार्टी में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए एक अनुकूल समय में राजनीतिक क्षितिज पर आए हैं । जो लोग यह कह रहे हैं कि पब्लिक मोदी को वोट नहीं देगी उन्हें विश्लेषण की ख़ातिर ही कहना चाहिए कि पब्लिक कांग्रेस को क्यों वोट देगी । क्या हम यह मान लें कि महँगाई भ्रष्टाचार और लचर सरकार से कोई त्रस्त ही नहीं है । क्या लोग फिर से मनमोहन को अपना नेता मान लेंगे ? क्या राहुल गांधी खुद को नेता मनवाने की दावेदारी करेंगे ? क्या खाद्य सुरक्षा बिल चुनाव के नतीजे तय करने वाला है ? नगद हस्तांतरण को गेम चेंजर बताया जा रहा था उसका क्या हुआ ? क्या ये नीतियाँ सचमुच कांग्रेस के प्रति लोगों को सम्मोहित कर रही हैं ?
किसी को कोई मुगालता नहीं पालना चाहिए । मैं यह नहीं कह रहा कि मोदी की जीत अवश्यंभावी है लेकिन यह भी नहीं कह रहा कि मोदी की हार तय है । और जीत जायें तो किसी को हैरानी भी नहीं होनी चाहिए । ऐसा लग रहा है कि मोदी के बारे में बात करते वक्त जानकार जीतने के विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहते । यह चुनाव मोदी को चुनने के लिए नहीं हो रहा है । यह चुनाव हो रहा है कांग्रेस को हराने के लिए । अगर ऐसा नहीं है तो साफ़ साफ़ कहना चाहिए कि कांग्रेस के हक़ में हवा है । मोदी के प्रधानमंत्री न बनने की सारी दलीलें आप क्षेत्रिय दलों के भरोसे नहीं दे सकते । उनकी अपनी स्थिति क्या है । क्या नीतीश इस वक्त बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में हैं ? क्या मुलायम मोदी से विश्वसनीय लड़ाई लड़ेंगे ख़ासकर मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के बाद ? क्या नवीन पटनायक और ममता का कुछ भी बाल बाँका न होगा । अगर ऐसा है तो नरेंद्र मोदी को आज ही ख़ारिज कर देना चाहिए । कांग्रेस ने अपनी करतूत से क्षेत्रिय दलों को भी मजबूर किया है कि वे बिना कांग्रेस को गरियाये चुनाव में जा ही नहीं सकते ।
एक बात और है । पिछले दो चुनावों में कांग्रेस ने एक व्यापक गठबंधन क़ायम किया था । इस बार वो बिखरा हुआ और कमज़ोर है । कांग्रेस के साथ उसके सहयोगी भी कांग्रेस विरोधी नाराज़गी की चपेट में हैं । उनकी हर सीट पर हार मोदी का लाभ है । ममता, मुलायम, मायावती, नीतीश, नवीन सब कांग्रेस से भी लड़ रहे हैं । लड़ाई कई तरफ़ा हो गई है । सेकुलर मोर्चा बिखरा हुआ है । सेकुलर राजनीति का मोर्चा बनाने वाले लेफ्ट की कोई राजनीतिक भूमिका नज़र नहीं आती । प्रकाश करात बीजेपी के साथ कांग्रेस को विपक्ष में बिठाना चाहते हैं । लेकिन दिल्ली के लिए मोर्चा का कोई प्लान है इसका जवाब भी नहीं देते । क्षेत्रिय दलों ने किसी विकल्प के लिए लेफ्ट की तरफ देखना बंद कर दिया है । प्रकाश सुरजीत नहीं हैं । इसलिए पिछले चुनाव के आधार पर कुछ भी कहना वैसा ही जोखिम है जैसा बीजेपी ने लिया है । बीजेपी ने गठबंधन तोड़ कर अपना नेता चुना है । अगर यह रिस्क है तो इस चुनाव में इस मुक़ाबले का किसी और दल ने जोखिम उठाने का न तो संकेत दिया है न साहस दिखाया है ।
मोदी के आगमन से यह तो साफ़ हो गया कि बीजेपी में आडवाणी के अलावा सब उनसे डरते हैं । मोदी ने बीजेपी जीत लिया है । अब उनके सामने लक्ष्य है चुनाव जीतने का । मोदी को समझने के लिए एक उदाहरण देना चाहता हूँ । यूपीएससी देने वालों में दो टाइप के लोग होते हैं । एक जो सोचते तो हैं मगर तैयारी नहीं करते । दूसरा जो सोचते भी हैं और तैयारी में दिन रात जुटे रहते हैं । वे पहले से लेकर चौथे प्रयास तक में जुटे रहते हैं । मोदी दूसरे तरह के विधार्थी हैं । उन्हें यूपीएससी कंपीट करना है । प्रधानमंत्री बनना है । जैसे तैयारी की गंभीरता प्रदर्शित करने के लिए यूपीएससी का विधार्थी सर भी मुंडा लेता है वैसे ही मोदी ने आज मुंडन करवा लिया । सत्ता की ऐसी चाह आपने मौजूदा समय में किसमें देखी है । मुझे सत्ता चाहिए इसका प्रदर्शन वे दिन रात करते रहते हैं । मोदी सत्ता के बिना न नेता हैं न कार्यकर्ता । उनको मालूम हैं कि उनका ग्लैमर उनका पावर है । अब नतीजा क्या होगा देखेंगे लेकिन मोदी
प्रिलिम्स से मेन्स और मेन्स से इंटरव्यू तक आ गए हैं । बीजेपी में आज का दिन नौरोज़ की तरह मनाया गया । मोदियागमन हुआ है । बीजेपी में आज सत्तापलट हुआ है तख्तापलट के लिए इंतज़ार कीजिये ।



