मोदीयागमन

मोदी का विरोध हो सकता है और बीजेपी में ही हो सकता है । लाल कृष्ण आडवाणी ने संसदीय बोर्ड में न जाकर इस विरोध को आज आवाज़ दी है । जिस मोदी का विरोध कांग्रेस नाम लेकर नहीं कर पाती है( राहुल ने हाल की रैली में विपक्ष कहकर संबोधित किया ) उनका विरोध आडवाणी ने करके दिखाया है । यह समझना कि आडवाणी ने अकेले मोदी का विरोध किया है ठीक नहीं होगा । जब जश्न की तस्वीरें टीवी पर चल रही थीं तब बीजेपी के कार्यकर्ता टाइप नेता फोन पर कह रहे थे कि मोदी ने नेताओं को ' यूज़ एंड थ्रो' पेन समझ लिया है । इतनी जल्दी है पीएम बनने की कि आडवाणी की रत्ती भर चिंता भी नहीं की । कार्यकर्ता ख़ुश था लेकिन आडवाणी के इस क़दम को गैर ज़रूरी मानने को तैयार ही नहीं था । पार्टी सत्ता में तो आ जाएगी मगर अब पार्टी ख़त्म हो जाएगी । कहता ही जा रहा था । 

जो भी हो आडवाणी के विरोध का फलितार्थ अब चुनाव के बाद ही सामने आयेगा । कोई इस मुग़ालते में न रहे कि मोदी को नंबर नहीं मिलेंगे तो आडवाणी को आगे कर सहयोगी लाया जायेगा । जो भी इस तरह की दलील दे रहा है वो यह मान कर चल रहा है कि क्षेत्रीय दलों की मजबूरी है बीजेपी को सपोर्ट करना । मुज़फ्फरनगर और चौरासी कोसी परिक्रमा से साफ है कि मोदी या बीजेपी या संघ को विकास के मुद्दे में कितना गहरा यकीन है । मोदी चुनावी मुद्दों का ध्रुवीकरण कर वोट ले आयें और कुछ सीट कम पड़ जाए तो संघ उन्हें पीछे कर देगा । हंसी नहीं आती क्या आपको । बीजेपी में मोदी का लाभ उनके अलावा किसी और को नहीं मिलेगा । जिस संघ ने मोदी को आगे किया है क्या वही संघ नंबर न आने पर आडवाणी को आगे करेगा ? राजनाथ अपना गेम चल देंगे ? मुझे यह बकवास लगता है । कोई यह तो बताए कि कौन सा दल है जो राजनाथ सिंह को नेता मान लेगा और क्यों ? गाज़ियाबाद के सासंद राजनाथ के नेतृत्व में बीजेपी की यूपी विधानसभा में सीटें और कम हो गईं । आज से अध्यक्ष के रूप में राजनाथ का काम भी समाप्त हो गया । राजनाथ मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रहे हैं और नंबर नहीं आया तो इतना विरोध होगा कि राजनाथ सहन नहीं कर पायेंगे । उन्होंने मोदी की जीत के कसीदे में अपने लिए दो चार लाइनें सुरक्षित कर ली है । इससे ज्यादा कुछ नहीं । बीजेपी को कम सीटें आईं तो सबसे पहले राजनाथ का राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाएगा । क्या राजनाथ यह कहेंगे कि जनादेश मोदी को नहीं बीजेपी को मिला है और उसके अध्यक्ष के नाते मुझे मिला है ? सब इतना सरल नहीं होता । अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी चुनाव जीत कर हार जाएगी । मोदी अकेले बहुमत नहीं ला पाये तो इस चुनाव में बीजेपी की हर संभावना समाप्त हो जाएगी । 

इसीलिए जिस तरह से आडवाणी ने बड़ा दाँव चला है उसी तरह से बीजेपी ने भी एक जोखिम उठाया । बीजेपी के पास यही जोखिम ही मौक़ा है । आज से पहले तक हुए चुनावों में नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकप्रियता कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है ।  इसका मतलब यह नहीं कि आगे भी ऐसा ही होगा । आज तो वे लांचिंग पैड पर सेट किये गए हैं । काउंटडाउन शुरू हो गया है । आर एस एस और बीजेपी का यह राकेट आरबिट में जाएगा या नहीं यह सिर्फ वैज्ञानिकों के आत्मविश्वास पर निर्भर नहीं करेगा लेकिन यह मानना कि हर राकेट का परीक्षण फ़ेल ही होगा पूरी तरह से अवैज्ञानिक है । अगर 272 आया तो देखियेगा कि वैज्ञानिक की भूमिका में नज़र आ रहा संघ अवकाश पर चला जाएगा । ख़बरें लीक करेगा कि मोदी किसी को सम्मान नहीं दे रहे हैं । तब संघ को आडवाणी की याद आएगी । 

सही है कि गुजरात भारत नहीं है पर क्या यह सही नहीं कि गुजरात भारत में ही है । जानकार जब इस जुमले का इस्तमाल करते हैं तो क्या वे यह कहते हैं कि सारे सांप्रदायिक गुजरात में हैं और सारे धर्मनिरपेक्ष गुजरात के बाहर । मोदी ने टोपी नहीं पहनी तो क्या हुआ लेकिन जयपुर में टोपी बुर्का पहनवा कर मुसलमानों को बुलवा तो लिया । मोदी इस तरह के कांग्रेसी और सपाई नाटक खूब करेंगे । जयपुर में हुई सेकुलरिज़्म की फैन्सी ड्रैस पार्टी भी उसी तरह हास्यास्पद है जिस तरह से मोदी विरोधी पार्टियों का सेकुलर विचारधारा की जड़ें मज़बूत करने के ढकोसले । जिसे समाजवादी पार्टी की सरकार ने साबित कर दिखाया है । सेकुलर विचारधारा का नाम लेने के अलावा क्या इन दलों ने कोई ठोस वैचारिक प्रयास किया है ? क्या किया है ? सचर रिपोर्ट सेकुलरिज़्म नहीं है वो एक समुदाय के नागरिक अधिकार से वंचित किये जाने की रिपोर्ट है । विचारधारा के स्तर पर सभी समुदायों में सांप्रदायिक तत्वों से लड़ने के लिए इन दलों ने क्या किया है , इस पर खुलकर बहस होनी चाहिए । 

मोदी अपना प्रचार करने में माहिर हैं लेकिन मोदी को लाभ मिल रहा है कांग्रेस जनित परिस्थितियों के कारण । वर्ना मोदी कर्नाटक में पार्टी की हार को जीत में बदल देते । मोदी जीत की गारंटी नहीं रहे हैं ।  हर चुनाव पिछले चुनाव से अलग होता है मगर जानकारों की आशंकाओं को देखें तो सिर्फ मोदी के कारण अगला चुनाव पिछला जैसा होने जा रहा है । जो हो रहा है उसे तो देखने और कहने का साहस होना ही चाहिए । मोदी अपनी पार्टी में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए एक अनुकूल समय में राजनीतिक क्षितिज पर आए हैं । जो लोग यह कह रहे हैं कि पब्लिक मोदी को वोट नहीं देगी उन्हें विश्लेषण की ख़ातिर ही कहना चाहिए कि पब्लिक कांग्रेस को क्यों वोट देगी । क्या हम यह मान लें कि महँगाई भ्रष्टाचार और लचर सरकार से कोई त्रस्त ही नहीं है । क्या लोग फिर से मनमोहन को अपना नेता मान लेंगे ? क्या राहुल गांधी खुद को नेता मनवाने की दावेदारी करेंगे ? क्या खाद्य सुरक्षा बिल चुनाव के नतीजे तय करने वाला है ? नगद हस्तांतरण को गेम चेंजर बताया जा रहा था उसका क्या हुआ ? क्या ये नीतियाँ सचमुच कांग्रेस के प्रति लोगों को सम्मोहित कर रही हैं ? 


किसी को कोई मुगालता नहीं पालना चाहिए । मैं यह नहीं कह रहा कि मोदी की जीत अवश्यंभावी है लेकिन यह भी नहीं कह रहा कि मोदी की हार तय है । और जीत जायें तो किसी को हैरानी भी नहीं होनी चाहिए । ऐसा लग रहा है कि मोदी के बारे में बात करते वक्त जानकार जीतने के विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहते । यह चुनाव मोदी को चुनने के लिए नहीं हो रहा है । यह चुनाव हो रहा है कांग्रेस को हराने के लिए । अगर ऐसा नहीं है तो साफ़ साफ़ कहना चाहिए कि कांग्रेस के हक़ में हवा है । मोदी के प्रधानमंत्री न बनने की सारी दलीलें आप क्षेत्रिय दलों के भरोसे नहीं दे सकते । उनकी अपनी स्थिति क्या है । क्या नीतीश इस वक्त बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में हैं ? क्या मुलायम मोदी से विश्वसनीय लड़ाई लड़ेंगे ख़ासकर मुज़फ़्फ़रनगर दंगे के बाद ? क्या नवीन पटनायक और ममता का कुछ भी बाल बाँका न होगा । अगर ऐसा है तो नरेंद्र मोदी को आज ही ख़ारिज कर देना चाहिए । कांग्रेस ने अपनी करतूत से क्षेत्रिय दलों को भी मजबूर किया है कि वे बिना कांग्रेस को गरियाये चुनाव में जा ही नहीं सकते । 

एक बात और है । पिछले दो चुनावों में कांग्रेस ने एक व्यापक गठबंधन क़ायम किया था । इस बार वो बिखरा हुआ और कमज़ोर है । कांग्रेस के साथ उसके सहयोगी भी कांग्रेस विरोधी नाराज़गी की चपेट में हैं । उनकी हर सीट पर हार मोदी का लाभ है । ममता, मुलायम, मायावती, नीतीश, नवीन सब कांग्रेस से भी लड़ रहे हैं । लड़ाई कई तरफ़ा हो गई है । सेकुलर मोर्चा बिखरा हुआ है । सेकुलर राजनीति का मोर्चा बनाने वाले लेफ्ट की कोई राजनीतिक भूमिका नज़र नहीं आती । प्रकाश करात बीजेपी के साथ कांग्रेस को विपक्ष में बिठाना चाहते हैं । लेकिन दिल्ली के लिए मोर्चा का कोई प्लान है इसका जवाब भी नहीं देते । क्षेत्रिय दलों ने किसी विकल्प के लिए लेफ्ट की तरफ देखना बंद कर दिया है । प्रकाश सुरजीत नहीं हैं । इसलिए पिछले चुनाव के आधार पर कुछ भी कहना वैसा ही जोखिम है जैसा बीजेपी ने लिया है । बीजेपी ने गठबंधन तोड़ कर अपना नेता चुना है । अगर यह रिस्क है तो इस चुनाव में इस मुक़ाबले का किसी और दल ने जोखिम उठाने का न तो संकेत दिया है न साहस दिखाया है । 

मोदी के आगमन से यह तो साफ़ हो गया कि बीजेपी में आडवाणी के अलावा सब उनसे डरते हैं । मोदी ने बीजेपी जीत लिया है । अब उनके सामने लक्ष्य है चुनाव जीतने का । मोदी को समझने के लिए एक उदाहरण देना चाहता हूँ । यूपीएससी देने वालों में दो टाइप के लोग होते हैं । एक जो सोचते तो हैं मगर तैयारी नहीं करते । दूसरा जो सोचते भी हैं और तैयारी में दिन रात जुटे रहते हैं । वे पहले से लेकर चौथे प्रयास तक में जुटे रहते हैं । मोदी दूसरे तरह के विधार्थी हैं । उन्हें यूपीएससी कंपीट करना है । प्रधानमंत्री बनना है । जैसे तैयारी की गंभीरता प्रदर्शित करने के लिए यूपीएससी का विधार्थी सर भी मुंडा लेता है वैसे ही मोदी ने आज मुंडन करवा लिया । सत्ता की ऐसी चाह आपने मौजूदा समय में किसमें देखी है । मुझे सत्ता चाहिए इसका प्रदर्शन वे दिन रात करते रहते हैं । मोदी सत्ता के बिना न नेता हैं न कार्यकर्ता । उनको मालूम हैं कि उनका ग्लैमर उनका पावर है । अब नतीजा क्या होगा देखेंगे लेकिन मोदी 
प्रिलिम्स से मेन्स और मेन्स से इंटरव्यू तक आ गए हैं । बीजेपी में आज का दिन नौरोज़ की तरह मनाया गया । मोदियागमन हुआ है । बीजेपी में आज सत्तापलट हुआ है तख्तापलट के लिए इंतज़ार कीजिये । 

पाषाणकालीन पंखा

आज कनाट प्लेस गया था । तहलका टीवी के लिए ।  स्टेट्समन हाउस के सामने आक्सफोर्ड बुक स्टोर जीने के लिए एक सब वे में उतरा तो इस पंखे को देख हैरान रह गया ।आप ग़ौर से देखेंगे कि पत्थर के कई स्लैब एक दूसरे के ऊपर रखे हुए हैं । इनके बीच पंखे का मोटर अटका दिया गया है । बिना जाली के ब्लेड नाच रहे हैं । मज़दूरों ने अपना टेबल फ़ैन बनाकर दोपहर की नींद का जुगाड़ कर लिया है । मुझे लगा कि पाषाणकालीन फ़ैन खोज लिया मैंने । यूरेका ! 





पितृपक्ष से पहले पितृपुरुष

हे पितृपुरुष आडवाणी,

ये मेरी दूसरी चिट्ठी है जो आपको लिख रहा हूँ । मुझे आप जैसे बड़े नेता इंटरव्यू देने लायक नहीं समझते और मुझे माँगने की हिम्मत भी न होती इसलिए ख़त लिख रहा हूँ । ख़त कम लेख ज़्यादा है । 


"जो प्रधानमंत्री बनने के सपने देखता है वह बर्बाद हो जाता है ।" अहमदाबाद में शिक्षक दिवस के मौक़े पर नरेंद्र मोदी ने कहा तो सबको लगा कि मोदी या तो इंगलिस में 'सल्क' कर रहे हैं या हिन्दी में गल्प । जानकार परेशान कि मोदी ने ऐसा क्यों कहा । मोदी ने अपने लिये क्यों कहा तब जब पार्टी और आर एस एस दोनों उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार पेश करने जा रहे हैं । नहीं बनना था तो ट्विटर से लेकर फ़ेसबुक तक इतना क्यों हंगामा मचवाया कि नमो फ़ोर पीएम का जाप लगने लगे । कहीं वे फिर से गुजरात गुजरात न करने लग जायें । 

दरअसल मोदी ने यह सूक्ति अपने लिए नहीं कही । मोदी का यह स्वयं सिद्ध प्रमेय राजनीति की गोधूली बेला में स्वप्न देख रहे आदरणीय आडवाणी जी आप पर सटीक लागू होता है । जहां तक मुझे स्मरण है आडवाणी जी आपका प्रधानमंत्री के सपने देखने का यह तीसरा प्रयास है । आप अटल जी के समय कुलाँचे मारते रहे । लौह पुरुष का तमगा लेकर ' टू आई सी' यानी सेकेंड इन कमांड बने रहे । आपने अपने लिए हमेशा ग़लत उपमा चुनी है । सरदार पटेल ने किसी के लिए कोई काम ही नहीं छोड़ा था जिसे पूरा कर आप उनका उत्तराधिकारी बन जाते । मंच पर भाषणबाज़ अपने नेताओं की तुलना महाराणाप्रताप से लेकर लेनिन तक से करते रहते हैं । उनसे कंफ्यूज़ नहीं होना चाहिए । आप हो गए । तंग आकर अटल जी ने आपको उप प्रधानमंत्री पद से नवाज़ दिया । डिप्टी बाबू बना दिया । फिर अटल जी ने कहा कि २००४ के चुनाव में आडवाणी जी के नेतृत्व में प्रस्थान होगा । बीजेपी चुनाव हार गई । जीत जाती तो वो दौर डिप्टी बाबू के लीडर बनने का होता । 

२००९ में आडवाणी जी आपने कमज़ोर प्रधानमंत्री का नारा दिया और खुद को कृशकायी मनमोहन सिंह की तुलना में मज़बूत प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित कर दिया । पार्टी ने आपको प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया । २००४ में अघोषित रूप से और २००९ में  घोषित रूप से । बिना किसी बवाल के । बल्कि चुनाव जीतने से पहले आपने पूरा कैबिनेट ही बना डाला था जो बिना किसी बैठक के भंग हो गई । बीजेपी चुनाव हार गई । कमज़ोर प्रधानमंत्री का नारा फुस्स हो गया । जनता जानती है कि कुशल प्रशासक के बाद भी सरदार पटेल कभी जननेता नहीं बन सके । हालाँकि पटेल की शुरूआत बारदोली सत्याग्रह से एक किसान नेता के रूप में उभरने से ही हुई थी फिर भी उसी सत्याग्रह ने उनकी छवि एक प्रशासक की भी बना दी जिससे वे कभी आज़ाद नहीं हो सके । ऐसा आपके साथ भी हो गया लगता है । 

आडवाणी जी आप तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं । मगर इस बार फिर आपके सामने एक जननेता खड़ा है । अमरीका की दो दलीय प्रणाली और प्रेसिडेंशियल डिबेट की वकालत की शुरूआत आपने की थी । आपको लगता रहा कि अच्छा भाषण देने से और प्रखर निखर लगने से पब्लिक पागल हो जाती है । मोदी ने उस मोडल को दूसरी तरीके से अपनाया । मोदी ने सोशल मीडिया और अपने नेताओं को मोदी राग जपने के लिए मजबूर कर एक किस्म से बीजेपी के भीतर का ' प्राइमरी' ( अमरीकी तर्ज) चुनाव जीत लिया है । गोवा में मिली पहली ही जीत पर मोदी ने अहमदाबाद लौटकर सबसे पहले सरदार पटेल को वापस किसान नेता बनाया । लोहे की मूर्ति बनाने का एलान किया और पटेल को गुजरात में दर्शनीय बनाकर राजनीति में उनकी उपमा के उपयोग की धार को कुंद कर दिया । 

अब आडवाणी जी आप फिर कंफ्यूज़ हैं । मान नहीं रहे हैं । अख़बारों में तरह तरह की ख़बरें आ रही हैं कि आप विधानसभा चुनाव से पहले नाम के एलान का विरोध कर रहे हैं । खबरें छप रही हैं कि संघ के नेताओं ने भी बीजेपी के इस सदाबहार ' टू आई सी' को मनाने का प्रयास किया । नहीं माने । ये मिले वो मिले फिर भी नहीं माने । सांस्कृतिक संगठन संघ को भी राजनीतिक काम में उलझा दिया !  आप खुलकर कहते भी नहीं कि मुझे एक चांस और दो । पटेल सिंड्रांम के शिकार लगते हैं । मुझे नहीं मालूम कि सरदार पटेल से किसी ने यह सवाल किया था या नहीं और उनका जवाब क्या रहा होगा । 

एक और जननेता सुष्मा स्वराज भी आपकी राय की हैं । ट्विटर पर भी आईं, अपना यू ट्यूब चैनल भी बनाया लेकिन वो मोदीनुपात में समां नहीं बाँध सकीं । वैसे ब्लाग पर आप पहले आए मोदी से । खैर लगता है नेता बनने के लिए अच्छे भाषण शैली में सुष्मा का भी घोर यक़ीन है । इसी तरह का मुग़ालता प्रखर विद्वान राजनेता मुरली मनोहर जोशी को भी रहा है कि उनकी दलीलें ही ललिता जी की क़मीज़ की तरह श्रेष्ठ हैं । वक़्ता होने का गर्व बीजेपी के कई नेताओं का भ्रम में डाल रहा है । इसकी सिर्फ एक ही वजह हैं - मनमोहन सिंह । ख़राब वक़्ता होने के गुण ने खुद मनमोहन सिंह को दस साल प्रधानमंत्री बनवा दिया लेकिन उनकी इस क्वालिटी से बीजेपी में कई नेता ग़लतफ़हमी के शिकार हो गए । तो मोदी प्रमेय के अनुसार आप प्रधानमंत्री बनने का ख़्वाब देखते हुए कहीं बर्बाद न हो जाएं यक़ीन मानिये आप सभी नेताओं के मुक़ाबले मोदी कमज़ोर वक़्ता हैं । उनके सभी भाषणों का प्रिंट निकाल कर विवेचना कर लीजियेगा । लेकिन भाषण से कोई नेता नहीं बनता न । 

तो हे बीजेपी के पितृपुरुष आपको पितृपक्ष से पहले मनमोहन सिंह से एक ट्यूशन लेना चाहिए । इसमें कोई हर्ज नहीं है । विजेता से परास्त को सीख लेनी चाहिए । जिस तरह से मनमोहन सिंह ने इस बार विदेश यात्रा से लौटते वक्त भूल सुधार की वो काबिले तारीफ है । ज़रूर संघ के नेता इसकी मिसाल आपको को दे रहे होंगे । पिछली बार मनमोहन ने तीसरी पारी की बात कर सबको चौंका दिया था कि कहीं मनमोहन कांग्रेस के आडवाणी तो नहीं हैं  । इस बार उन्होंने आप ही कह दिया कि मैं राहुल के अंडर काम करने को तैयार हूँ । नरेंद्र मोदी ने इसकी ग़लत आलोचना की । खुद किसी के नेतृत्व में काम करने के लिए तैयार नहीं हैं तो दूसरे पर हँसने से पहले सोचना चाहिए । देखना चाहिए कि किस तरह मनाने के नाम पर आडवाणी जी की बाँह मरोड़ी जा रही है उनके हर एतराज़ को मीडिया में लीक किया जा रहा है । 

मनमोहन सिंह पर इस बयान के संदर्भ में हँसने से पहले बीजेपी को सोचना चाहिए था कि अगर आडवाणी जी आप मनमोहन की तरह होते तो कितना अच्छा होता । वे दो बार पीएम रहकर आसानी राहुल के अंडर काम करने के लिए तैयार हैं आप तीसरी बार प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनने के लिए इतना बेचैन हैं कि किसी अंडर पास से गुज़रना ही नहीं चाहते । उस पार्टी में जहाँ इस वक्त ज़्यादातर नेता एक दूसरे के अंडर काम कर चुके हैं । खुद आडवाणी जी आप कितने अध्यक्षों के अंडर काम कर चुके हैं । गडकरी राजनाथ के अंडर तो राजनाथ गडकरी के अंडर । अंडर ही अंडर । 

आडवाणी सुष्मा या मुरली मनोहर जोशी का विरोध किस बात पर है । यही कि मोदी की उम्मीदवारी से विधानसभा में ध्रुवीकरण होगा ? क्या आप मानते हैं कि मोदी कम्युनल है ? साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहते । तब गुजरात दंगों में मोदी से अलग लाइन क्यों नहीं ली । विधानसभा में ध्रुवीकरण होगा तो क्या लोकसभा में नहीं होगा । क्या ये संदेश देना चाहते हैं कि जो नेता चार राज्यों के लायक नहीं उसे बाद में पूरे देश का बना देना । बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण क्या है ? दिल्ली की सत्ता या राजस्थान की ? क्या आडवाणी और जोशी जी आप लोगों के वक्त ध्रुवीकरण नहीं हुआ था ? दंगे तो बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद भी हुए थे । अगर ध्रुवीकरण की चिंता थी तो अमित शाह को क्यों नहीं रोका फिर । इसलिए आप लोगों का मोदी को लेकर समय का विरोध तर्कपूर्ण नहीं है । आडवाणी सुष्मा या संघ कोई हो सब मोदी से हार चुके हैं । अब सब बीजेपी में मोदीनुसार और मोदीनुपात में होगा । आडवाणी जी आपकी ये बात सही है कि पार्टी का ढाँचा बर्बाद हो जाएगा क्योंकि बीजेपी ने जिस संसदीय बोर्ड का संयुक्त राष्ट्र की तरह ढोल पीटा था वो ढोल फट गया है । मोदी बाहर से दबाव बनाकर भीतर आ गए हैं । दरवाज़े पर पहुँचता देख संघ से लेकर संगठन तक उनके स्वागत में है । लेकिन किसी भी पार्टी का लक्ष्य सत्ता है संगठन नहीं । संगठन माध्यम है । नेता संगठन में पैदा होते हैं । जब आप पूरे देश को मोदी के पीछे चलाना चाहते हैं तो संगठन चल लेगा तो क्या हो जाएगा । अजीब है । जिसका नेतृत्व संगठन ही मानने को तैयार नहीं उसके बारे में देश से कैसे कहेंगे कि इसे नेता मान लो । 

अतएव आदरणीय आडवाणी जी और सुष्मा जी आप लोग मोदी का स्वागत कीजिये । आप लोग अपनी पार्टी में हार गए हैं । पितृपक्ष से पहले पितृपुरुष की तरह युवा को ज़िम्मेदारी सौंप दीजिये । कृपा आएगी । कार्यकर्ताओं की । आपको पार्टी ने मेंटर बनाया था । आप बता दीजिये कि नेतृत्व के लिए किसे मेंटर किया है । कोई है भी या खुद ही को किया है । मोदी ही पितृपुरुष हैं । बीजेपी के । आप कम से कम अब त्याग पुरुष तो बन जाइये । 

आपका
ट्वीटर पर मोदी भक्तों द्वारा प्रचारित एक कांग्रेसी दलाल पत्रकार 

रवीश कुमार' एंकर' 

राजनीतिक साज़िश के नाम एक ख़त

मेरी प्यारी राजनीतिक साज़िश,

तुम कब हो जाती हो, किसके ख़िलाफ़ हो जाती हो, किसकी तरफ़ से की जाती हो पता नहीं चलता है । तुम हर घटना के बाद ज़रूर होती हो । तुम्हें कौन अंजाम देता है किसी को मालूम नहीं  । हर कोई तुम्हें अंधेरे में टटोल रहा होता है । देश के तमाम दल राजनीतिक साज़िश का नाम लेते हैं । तुम हो गई तो इतने लोग मारे गए, तुम्हारे तहत यानी राजनीतिक साज़िश के तहत कोई जेल चला जाता है, अरबों ख़रबों का घोटाला हो जाता है । तुम बहुत पोलिटिकल हो गई हो । 

तुम मुज़फ़्फ़रनगर में होती हो तुम गोधरा से गुजरात तक में होती हो तुम सिख दंगों में होती हो । तुम्हारे नाम पर क्या क्या नहीं हुआ जा रहा है ।  राजनीतिक साज़िश, तुम बाहर आओ । दिखा दो दुनिया को कि तुम कैसे होती हो । तुम बीजेपी में होती हो, तुम कांग्रेस में होती हो, तुम सपा में बसपा के ख़िलाफ़ होती हो तो बसपा में सपा के ख़िलाफ़ । तुम मिड डे मील में बच्चों की जान लेती हो तो तुम ढाई लाख करोड़ के घोटाले में मौज करती हो । आख़िर तुम हो कैसे जाती हो । मूल कोच्चन ये है । 

तुम किस लोहे के पर्दे के पीछे हो कि आज तक सब कोई राजनीतिक साज़िश का पर्दाफ़ाश नहीं कर पाया । आयोगों और जजों को जब कुछ पता नहीं चलता उन्हें राजनीतिक साज़िश का पता कैसे चल जाता है । वैसे पता सबको होता है कि तुम अमुक मामले में हो गई हो यानी राजनीतिक साज़िश का नतीजा है फ़लाँ मामला मगर यही पता नहीं चलता कि होने से पहले कहाँ थी और होने के बाद कहाँ चली गई । 

अतएव मेरी प्यारी राजनीतिक साज़िश तुम अब होना बंद कर दो । सब तुम्हारे नाम पर कुर्कम धो रहे हैं । भगवान हो तुम पोलिटिक्स की । ऐसे नाम लेते हैं िक यह पता चलते ही कि तीस लोग राजनीतिक साज़िश से मरे हैं अब कोई तुम्हें पकड़ नहीं पाएगा । लिहाज़ा मुआवज़ा लेकर ही घर जाना पड़ेगा । नेताओं ने तुम्हारे नाम पर बहुत वोट काटा है । इसलिए तुम यानी राजनीतिक साज़िश अब होना बंद कर दो ।

तुम्हारा 
राजनीतिक नवाज़िश,
रवीश कुमार 'एंकर' 

मुज़फ़्फ़रनगर में दंगा, दलों का दंगल

उत्तर प्रदेश में कुछ तो सुनियोजित है जो नज़र नहीं आ रहा । एक के बाद एक दंगे तात्कालिक नहीं हो सकते । समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद कई दंगे हो चुके हैं । मुज़फ़्फ़रनगर का दंगा शायद चुनाव के करीब है मगर उससे पहले के कई दंगों को आप चुनावी पृष्ठभूमि से जोड़ सकते हैं क्या ? बीजेपी पर आरोप लगा देने से भी प्रमाणिक जवाब नहीं मिलता । जिस बीजेपी का राजनीतिक आधार सांप्रदायिक राजनीति के कारण ही कमज़ोर हो गया उस राज्य में सांप्रदायिक दंगों के लिए बीजेपी को आधार कैसे मिल गया है । वो भी इतनी जल्दी । अमित शाह के यूपी आने से पहले भी दंगे हो चुके थे । ज़ाहिर है यह एक मुकम्मल जवाब नहीं है । अगर समाजवादी पार्टी चुनाव के लिए यह सब करवा रही है तो सरकार बनते ही दर्जन भर जो दंगे हुए उन्हें आप कैसे समझेंगे । 

कुछ ऐसा है जो अतिसरलीकृत विश्लेषणों से बाहर नहीं आ पा रहा है । सारे तर्क पहले से तय और पुराने लगते हैं । ज़मीन पर कुछ तो दरका है । जिस उत्तरप्रदेश ने बानवे के दंगों के बाद सीख लिया था,जिसने तमाम दलों के बहकावों को समझ लिया था,अचानक वो दंगों की चपेट में कैसे आ रहा है । अगर ज़मीन पर कोई राजनीतिक दल या संगठन साम्प्रदायिक रूप से सक्रिय हो रहा है तो क्या उसे सामने लाने का काम अखिलेश का नहीं है । अगर  दंगे नहीं सँभल रहे तो कम से कम कारण का पता तो चलता होगा । क्या यूपी सरकार ने तमाम दंगों की कोई रिपोर्ट पेश की है ? आख़िर अखिलेश उन राजनीतिक शक्तियों से लड़ते हुए नज़र क्यों नहीं आते जिनके ख़िलाफ़ लड़ते हुए मुलायम मौलाना बन गए । विश्व हिन्दू परिषद की चौरासी कोसी यात्रा जिस तरह से फुस्स हुई उससे एक निष्कर्ष निकल ही सकता है कि इस संगठन कोई व्यापक आधार नहीं है वर्ना अखिलेश को अयोध्या के साथ साथ पूरे उत्तर प्रदेश में सेना तैनात करनी पड़ जाती । पुराने रिकार्ड को देखते हुए पुराने दलों पर शक की सुई तुरंत जा सकती है लेकिन स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के पहले ही साल में इतने दंगे कैसे हो गए ख़ासकर तब जब वोट देने वाली जनता का भरोसा और समर्थन भी नया नया होता है । चुनाव तो विधान सभा के भी हुए थे तब क्यों नहीं दंगे भड़के । 

जब भी सवर्ण लोगों से बात करता हूँ उनकी दलील होती है कि समाजवादी की सरकार मुसलमानों का पक्ष ले रही है इसलिए लोग नाराज़ हैं । इस तरह के आरोपों का कोई ठोस आधार नही होता । फिर भी यह धारणा तेज़ी से फैल रही है । आज़म खान खलनायक हैं तो मायावती के समय नसीमुद्दीन  सिद्दीक़ी भी थे । लेकिन मायावती के समय ऐसी बातें नहीं कहीं गईं । क्या यह सच नहीं िक अखिलेश ब्राह्मणों को लुभाने के लिए जाति सम्मेलन कर रहे थे जिसे अदालत के आदेश के कारण बंद करना पड़ा । यूपी की जेलों में बंद मुस्लिम युवकों की रिहाई के लिए बने रिहाई मंच का ईमेल रोज़ आता है जिसमें कुछ न करने की मुलायम सरकार की आलोचना होती है । अगर ये सरकार मुस्लिम परस्त ही होती तो रिहाई मंच जस्टिस निमेष कपूर की रिपोर्ट लागू न कर पाने की आलोचना न करता । मुस्लिम नेताओं से मिलता हूँ तो वे यही शिकायत करते हैं कि हमारा वोट ले लिया मगर काम कुछ नहीं कर रहे हैं । इसलिए ज़रूरी है देखना कि कहने वाला कौन है । हाँ विश्व हिन्दू परिषद का ईमेल मुज़फ़्फ़रनगर या सहारनपुर से ज़रूर आता रहा है इन दिनों । लेकिन मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहा । इन सबक़ा हाथ हो सकता है मगर अचानक इन्हीं का हाथ क्यों होने लगा । कम से कम प्रमाण तो पेश करना ही चाहिए ।


मैं इन राजनीतिक दलीलों को शक की निगाह से देख रहा हूं क्योंकि मैं ज़मीन पर नहीं हूँ । ये रेडिमेड राजनीतिक आलोचनाएँ संतुष्ट नहीं कर रही हैं । सही है कि बिना राजनीति के भड़काए या चुप रहे ऐसा हो नहीं सकता लेकिन कोई ठोस उदाहरण तो होना ही चाहिए । इतने दंगे देखने के बाद भी यूपी के लोग इन संगठनों के हाथों के खिलौने कैसे बन रहे हैं । क्या सामाजिक रिश्ता टूटा है । पता नहीं । कुछ तो और हुआ है जो जातीय प्रतिस्पर्धा को धार्मिक उन्माद में बदल रहा है । जिसे हम देख नहीं पा रहे या आसान आलोचनाओं से काम चला ले रहे हैं । 

सपा बीजेपी की इस तरह से मदद क्यों करेगी कि आप हिन्दू रख लो और हम मुसलमान रख लेते हैं । राजनीति का गणित इतना साफ़ नहीं होता है । क्या दंगा कराने से मुसलमान मुलायम के पास चले जायेंगे । क्या हमारे राजनीतिक पंडितों की इतनी ही समझ है मुसलमानों की । मुस्लिम मतदाताओं को इस बहाने बदनाम किया जा रहा है । उनकी आंकाक्षाएं दस सालों में बदली हैं । आप प्रतापगढ़ की घटना को ज़रा याद कीजिये । कथित रूप से एक दलित लड़की के आरोप के बहाने मुसलमानों के पैंतीस घर जला दिये गए थे । इसी की जाँच कर रहे डीएसपी ज़ियाउल हक़ को मार दिया गया । वो रिपोर्ट कहां है आज तक किसी को पता नहीं । मुज़फ़्फ़रनगर में भी ऐसी कहानी है । कथित रूप से एक हिन्दू लड़की को मुस्लिम लड़कों ने छेड़ा था और फिर बात इक्कीस लोगों की जान तक चली आई है । क्या कोई पैटर्न दिख रहा है आपको । क्या ये कारण पर्याप्त हैं या ऐसी परिस्थितियाँ प्रायोजित हैं ? कमाल खान की रिपोर्ट कहती है िक इस छेड़खानी के विरोध में बीजेपी ने बहू बेटी बचाओ सम्मेलन कर दिया तो दूसरी क़ौम को लगा कि सारे मुसलमानों को इस रंग में रंगा जा रहा है वो भी उस पश्चिम उत्तर प्रदेश में जहाँ हिन्दू बेटियाँ गर्भ से लेकर शादी करने तक मार दी जाती हैं । महापंचायत में किसने क्या बोला अगर वो कारण है तो उनके भाषणों को अदालत के सामने पेश किया जाए । पर कुछ करोगे तब न भाई । 

जो भी हो निश्चित रूप से अखिलेश यादव की सरकार फ़ेल हो चुकी है । अखिलेश ने सख़्त और स्पष्ट संकेत देने के हर मौक़े गँवा दिये हैं । बरेली में हफ्तों दंगा चला था । क्या कोई नई दलील है जिससे यूपी के दर्जनों दंगों को समझने में मदद मिले । किस वोट के लिए अखिलेश ये ज़हर या ख़ून पी रहे हैं । यूपी में ध्रुवीकरण होगा यह बात कई पत्रकार कई दिनों से लिख रहे हैं । क्या कोई पहले से लिखी स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है ? अगर हां तो अखिलेश के पास इसके क्या प्रमाण है ? 

इस बीच अफ़वाह फैलाने की मशीनरी सक्रिय हो गई है । जिनसे सावधान रहने की ज़रूरत है । हर हाल में सेकुलर बने रहिए । ऐसे मौक़े पर सांप्रदायिक ठोस दलीलें लेकर हाज़िर हो जाते है अपना विस्तार करने के लिए । उन्हें जगह मत दीजिये । कोई ट्वीट कर रहा है कि दंगे की कवरेज नहीं हो रही । गुजरात की आज तक हो रही है । ये कौन लोग हैं आप इन्हें पहचानियें । हर दल है दलदल में, फिर हम क्यों इनके दलबल में । 

तुलसीराम प्रजापति की जाति

आदरणीय कांग्रेस पार्टी,

अंग्रेज़ी के बड़े पत्रकारों से मुझे भी चिट्ठी लिखने की आदत हो गई है । क़स्बा पर कई चिट्ठियाँ लिखी हैं । पूछना था कि ये तुलसीराम प्रजापति कब से बैकवर्ड हो गया ? यह सही है कि तुलसीराम प्रजापति का एनकाउंटर हुआ था जिसके फ़र्ज़ी होने का मुक़दमा अदालत में कई साल से चल रहा है । पर आपने इसे बैकवर्ड समाज का क्यों कहा ।

कल आपकी प्रेस कांफ्रेंस में पी एल पुनिया साहब ने ऐसा कहा है । पुनिया साहब अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष हैं । उन्होंने कहा कि प्रजापति समाज के लोग सीडी लेकर आए थे । आपके कल उस सीडी जारी की थी जिसमें प्रकाश झावड़ेकर और भूपेंद्र यादव एक रिपोर्टर से बात कर रहे हैं कि  प्रजापति की माँ से सादा वकालतनामा दस्तखत करा लाते हैं और अदालत में उनकी तरफ़ से अपना वक़ील भेज देते हैं ताकि मुक़दमा कमज़ोर हो सके । आपने इस सीडी के बहाने नरेंद्र मोदी से इस्तीफ़ा माँगा । बहुत दिनों बाद आपने मोदी से इस्तीफ़ा माँगा । अव्वल तो वही आपके प्रधानमंत्री से माँगते रहते हैं । तो खैर प्रकाश जी और भूपेंद्र जी इस सीडी को लेकर टीवी पर नहीं जा रहे हैं । खंडन भी नहीं कर रहे कि उसमें चेहरा हमारा नहीं है । उनकी मर्ज़ी । सीडी विवादास्पद क़रार दे दी गई है ।

लेकिन आपने प्रजापति को बैकवर्ड बताकर चौंका दिया । ठीक है कि सुशील मोदी जैसे नेता नरेंद्र मोदी की पैकेजिंग पिछड़ा नेता के रूप में कर चुके हैं और मोदी ने भी चुप रहकर अपने बैकवर्ड तमगे को स्वीकार ही किया है लेकिन इसके राजनीतिक मुक़ाबले में प्रजापति बैकवर्ड ?  प्रजापति समाज ज़रूर पिछड़ा है । यह समाज बसपा से ज़्यादातर जुड़ा है । पर मेरी जानकारी में यह बात पहले नहीं आई (अख़बार कम पढ़ता हूँ ) िक प्रजापति समाज तुलसी को लेकर स्वाभिमान और इंसाफ़ का मुद्दा बना रहा है । 

क्या ऐसे उदाहरणों से आप बैकवर्ड मोदी की काट निकालेंगे । एक पत्रकार ने सही कहा कि इस हिसाब से तो गुजरात की जेलों में बंद वंझारा, पांडियन और सिंघल जैसे पुलिस अफ़सर भी बैकवर्ड हैं । क्या यह राजनीतिक मामला बनने लायक है कि बैकवर्ड मोदी की सरकार में बैकवर्ड पुलिस अफ़सर ही जेल में क्यों । एक संयोग हो सकता है कि कहीं इसी वजह से ये अफसर मोदी के वफादार न हो गए हों । इस संयोग से गुजरात की दूसरी ही तस्वीर बनती है । बैकवर्ड शासन ? नहीं नहीं वहां तो छह करोड़ गुजरात की राजनीति ? नहीं ? मने कह रहे हैं । अच्छा राजनेता अपने वफादारों का बेहतर इस्तमाल करता है । वंझारा की चिट्ठी से साफ है । वैसे इस लिस्ट में पांडे साहब भी जुड़ गए हैं । भागते भागते धरा ही गए हैं । 

बेनी प्रसाद वर्मा टाइप पोलिटिक्स मत कीजिये । जो सीडी सोमवार को प्रशांत भूषण ने सार्वजनिक रूप से जारी की थी उसे प्रजापति समाज के हवाले से बताने का क्या मतलब । हो सकता है कि कुछ लोग आए होंगे मगर क्या ये हल्की रणनीति नहीं है । अचानक आप तुलसीराम की जाति की खोज करेंगे तो मुश्किल में ही पड़ेंगे और प्रजापति समाज को भी असमंजस में डालेंगे । हाँ इस समाज को कई ज़रूरी मसले हैं वो उठायेंगे तो किसी न किसी का भला हो जाएगा । प्रजापति के साथ जो भी हुआ वो एक नागरिक सवाल है 

आपका, 
सर्वदलीय विरोधी रवीश कुमार 'एंकर' 

मीडिया ट्रायल है- चैनलों का तीर,घेरा और फ़्लैश

जब भी न्यूज़ चैनलों पर किसी प्रसंग में गिरफ्तार व्यक्ति के चेहरे को लाल घेरा, तीर या आयताकार घेरे से घिरा देखता हूँ तो सिहर जाता हूँ । मीडिया उसके चारों तरफ़ लाल घेरा बनाकर अपना फ़ैसला पहले ही सुना देता है । गोल घेरा,तीर या आयाताकार बक्सा मीडिया ट्रायल का हिस्सा लगते हैं । मीडिया ने ऐसे कई कटघरों की खोज कर ली है । जैसे इजलास में अपराधी सज़ा सुनने के लिए पेश किया गया हो । जैसे उसके अपराधी होने या अपराध साबित होने का फ़ैसला आ गया हो । आप दर्शक भी देख लीजिये । यही है, यही है ।  कई बार घेरा बना कर उसे स्टिल करते हैं और फिर उस घेरे को स्लाइस की तरह काट कर अलग कर लेते हैं । जिससे आपके ज़हन में वो सज़ायाफ़्ता की तरह उतर जाए । पिछले कुछ सालों से इनका इस्तमाल काफी होने लगता है । 

कोई संपादक कहेगा कि सटीक पहचान के लिए ऐसे घेरे मददगार होते हैं । दर्शक तेज़ी से गुज़रती तस्वीरों में से प्रमुख पात्र को पहचान नहीं पाता है । हो सकता है पर आप इन घेरों को ध्यान से देखिये । इनकी अपनी एक भाषा होती है । ये किसी चेहरे के ईर्द-गिर्द चमक चमक कर आपको बता रहे होते हैं कि ठीक से पहचान लो इसे । ये वही है । अपराधी । जबकि कई बार स्क्रीन पर इन घेरों के बिना भी स्पष्ट हो जाता है कि गिरफ़्त में आया अपराधी कौन है । क्या ये घेरे मीडिया ट्रायल नहीं है । हर दूसरे तीसरे रोज़ किसी न किसी मामले में ऐसे घेरे बना दिये जाते हैं । एक तीर होता है जो मार मार कर पहचनवा रहा होता है कि इहे है अपराधी । आज चुप रहेंगे तो कल आप भी इन घेरों के बीच हो सकते हैं । इन घेरों के कारण आरोपी और अपराधी के बीच का फ़ासला समाप्त हो जाता है । 

एक तरह से चैनल इन घेरों के ज़रिये 'स्टिग्मा' यानी कलंक की छवि बनाते हैं । ये उनकी अपनी गढ़ी हुई भाषा है जो शब्दों से कहीं ज़्यादा मारक है । आरोप को धब्बा में बदल देते हैं । हो सकता है कि अदालत बरी भी कर दे लेकिन इन घेरों से जो बट्टा लगता है वो स्थायी हो जाता है । प्रिंट के शब्दों में कथित या 'अलेज़्डेली' का इस्तमाल होता है । टीवी में भी कुछ एंकर या एकाध चैनल इसका इस्तमाल करते हैं मगर ये घेरे ऐसी सतर्कताओं को बाई पास कर जाते हैं । किसी कलंक की तरह चस्पाँ हो जाते हैं । प्रिंट के ग्राफ़िक्स में भी ऐसे घेरों का चलन बढ़ा है । आप किसी का चेहरा न दिखायें मगर घेरा बनाकर निर्दोष साबित होने की गुज़ाइश समाप्त तो कर ही देते हैं 

मुझे इन घेरों से दिक्क्त होती है । कई बार उत्सुकता पैदा करने के लिए किसी डूबते को भी इन घेरों में क़ैद कर दिया जाता है । कई बार पहचान को और स्पष्ट करने के लिए लेकिन क्या अपराध के मामले में न्यूज़ चैनल किसी व्यक्ति को लाल घेरे में डाल कर एक किस्म का फ़ैसला नहीं सुना रहे हैं । हमेशा लाल घेरा ही क्यों ? नीला या पीला क्यों नहीं । आसाराम की पहचान तो उतनी अनजान नहीं है । सब पहचानते हैं । दस दिनों से वही दिख रहे हैं टीवी पर । उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए लेकिन सज़ा मिलने से पहले क्या ये घेरे जजमेंट नहीं हैं ? स्टिग्मा नहीं हैं ? कई बार तो पीड़िता को भी घेरे में कैद कर दिया जाता है । चेहरा धुंध से ढंक दिया जाता है लेकिन घेरा बनाकर क्या चैनल उसकी पहचान स्थापित नहीं कर देते हैं । मैं बात एक विज़ुअल कलंक की कर रहा हूँ । ये मीडिया की बनाई हथकड़ी है । कल किसी को पहना दी गई थी और आज किसी और को । यही नहीं पुलिस के पकड़ने या अदालत का फैसला सुनाने से पहसे ग्राफिक्स आर्टिस्ट से सलाखें बनवा कर उसके पीछे व्यक्ति का चेहरा लगा दिया जाता है । लगे कि जेल हो गई है ।प्लीज़ बहस इसी पर कीजियेगा न कि संदर्भ के लिए यहां दिए गए नामों पर । हम सब इन घेरों का इस्तमाल करते हैं लेकिन क्या इसके करण इनके असर पर कभी सोचा ही न जाए । 

दिल्ली के वोट में जात-पात नहीं चलता, क्या बात करते हैं

क्या इस देश में ऐसा भी कोई राज्य है जहां लोग जात के आधार पर वोट नहीं करते हैं? हम सब पिछले कई चुनावों के तमाम विश्लेषणों से इस सत्य को बिना किसी चुनौती के ही स्वीकार करते रहे हैं कि सिर्फ जाति ही एक कारण है। क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक आधार का मूल्यांकन जाति और धर्म की सीमा से कभी आगे जाता नहीं। ख़ैर ये विवाद का विषय है। संजय कुमार की दलील है कि दिल्ली एक राज्य है जहां लोग वर्ग के आधार पर वोट करते हैं। दिल्ली में ज्यादतर मतदाता तीन वर्गों में बंटे हैं और क्लास के आधार पर ही वोट करते हैं क्योंकि इनकी गोलबंदी जाति या इलाके के आधार पर नहीं होती है। संजय कुमार ने अपने शोध और सर्वे से दिल्ली की एक दूसरी ही तस्वीर खींची है। दिल्ली मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और ओबीसी के प्रभुत्व वाली राजनैतिक भौगोलिक स्पेस है। तब भी यहां मतदान वर्ग के आधार पर होता है। वर्ग के लिहाज़ से इसके वोटर का बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से गरीब है। लोअर क्लास का है।

किसी शहर के मतदान करने की प्रवृत्ति पर कम शोध हुए हैं। शायद यह पहला बड़ा शोध है। संजय की बात तब ठीक ठीक बैठने लगती है जब देखता हूं कि निर्भया या अन्ना अरविंद आंदोलन के वक्त तमाम वर्गों और जातियों को लेकर चल रही दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा एक नागरिक बोध की पहचान में शामिल होने के लिए आतुर हो उठता है। इनमें से कुछ रामलीला या रायसीना पहुंचते हैं तो कुछ टीवी के सामने बैठकर दर्शक बन जाते हैं। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि दुर्गा को लेकर जब मीडिया ने अभियान उठाया तो यूपी में कोई लहर पैदा नहीं हुई। सोचता रहा कि क्यों ऐसा हुआ। शायद वहां ज़िला इलाका भाषा जाति और पार्टी की पहचान गहरी होगी। लोग नाराज भी होंगे तो समाजवादी पार्टी के खिलाफ बाहर नहीं आना चाहते होंगे। मगर दिल्ली में लोग निर्दलीय किस्म से बाहर आए। हो सकता है कि संजय के अनुसार यही बात उनके वोट देने में भी झलकती हो। लेकिन जब जिंद में दलित लड़की के साथ बलात्कार होता है, वहां से लोग आकर यहां प्रदर्शन करते हैं तो अनुसूचित जाति और ओबीसी की दिल्ली में कोई हलचल नहीं होती है। ऐसा नहीं कि बिल्कुल नहीं होती मगर मीडिया और मिडिल क्लास तक नहीं पहुंचती है।

यह किताब नई तस्वीर पेश करती है तो पुरानी धारणाओं पर बनी हमारी सोच से टकराती भी है। संजय कहते हैं कि लोअर क्लास कांग्रेस को वोट करता है। उसका बड़ा हिस्सा। इस लोअर क्लास में बीएसपी आ गई है जो चुनौती दे रही है। लेकिन बीएसपी यहां के दलितों में क्या क्लास के आधार पर जगह बना रही है। फिर यह किताब बताती है कि दलितों का अपर क्लास कांग्रेस के साथ है। दलितों का अपर क्लास कौन है। जाटव है या तमाम दलित जातियों का मलाईदार तबका है। अगर जाटव है तो पड़ोस के यूपी में वो बीएसपी का आधार है और दिल्ली में नहीं। वैसे ज़रुरी नहीं है कि हर दलित वोट बीएसपी का ही है। दूसरी तरफ भगवान शनि की लोकप्रियता भी दूसरे एंगल से संजय की बात की पुष्टि करती है। और आम आदमी पार्टी के उभरने का आत्मविश्वास भी कि दिल्ली वो जगह है जहां जाति छोड़कर एक आम नागरिकता को लेकर राजनीति की जा सकती है। संजय की बात सही है कि दिल्ली में जाति के आधार पर राजनीतिक गोलबंदी नहीं हुई है। मंडल को छोड़ कर जब स्थानीय और बाहर से आए छात्रों का तबका सर्वण और पिछड़ों में बंट गया था। सवर्ण छात्र उसका नेतृत्व कर रहे थे। बाद में ये सभी उदारीकरण के दौर में तमाम धंधों से लेकर तमाम दलों तक में एडजस्ट हो गए।

इन सबके बावजूद कि दिल्ली में वर्ग के आधार पर लोग वोट करते हैं संजय की किताब बताती है कि विधानसभा की कई सीटें हैं जिन्हें जातियों के आधार पर अमुक जाति बहुल सीटें कहा जा सकता है। जैसे दिल्ली में दस विधानसभा सीटें ब्राह्मण बहुल हैं यह एक दिलचस्प जानकारी है। अब किताब यह नहीं बताती कि इन सीटों पर जीतने वाला या कांग्रेस बीजेपी से टिकट पाने वाला उम्मीदवार इसी जाति का होता है या नहीं। क्या एक जाति के बीच वर्ग विभाजन इतना साफ हो सकता है कि ब्राह्मणों का अपर क्लास बीजेपी को वोट दे और लोअर क्लास कांग्रेस को। पंजाबी खत्री जातियों के भी १९ सीटें हैं। बवाना नज़फगढ़ और हस्तसाल जैसे क्षेत्रों में गैर जाट नेतृत्व उभरा ही नहीं। यहां की सीटें जाट बहुल मानी जाती हैं।

जाति गई नहीं है। लेकिन राजधानी में वर्ग आ गया है। हम आराम से जाति और वर्ग के बीच की सीमा लांघते रहते हैं। यहां की राजनीतिक आबादी शायद अपने पूर्व के इलाको की राजनीति को भी जात से ऊपर उठ कर देखती होगी। मालूम नहीं। मुझे डर है कि दिल्ली हमेशा ऐसा नहीं रहेगी। या फिर दिल्ली को भी इन चुनौतियों से गुज़रना होगा। जब पूर्वांचल के नेताओं की सक्रियता और उनके भीतर पनप रही महत्वकांक्षा को देखता हूं तो लगता है कि संख्या अपने तरीके से दावेदारी करेगी।


अच्छी बात यह है कि यह किताब एक ऐसे स्पेस की खोज करती है जहां जाति की राजनीतिक पहचान प्रभावशाली नहीं लगती है। अगर ऐसा है तो दिल्ली भारतीय राजनीति का एक सुंदर भविष्य है। और ऐसा है भी। जाट हों या बिहारी हों इनके बीच तनाव नहीं है। दिल्ली में मुंबई की तरह भैय्या भगाओ राजनीति नहीं है। स्थानीय और बाहरी राजनीतिक गोलबंदियों में घुले मिले रहते हैं। इस किताब में कई आंकड़ें दिये गए हैं। उन आंकड़ों से गुज़र कर दिल्ली को इस नज़र से देखना राजनीतिक समझ की नई दुनिया में प्रवेश करना है बस आदत है कि जाती नहीं। जाति को लेकर पुराने सवाल पीछा नहीं छोड़ते।

(संजय कुमार सीएसडीएस में योगेंद्र यादव के साथ जुड़े रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषण का उनका लंबा और स्वतंत्र  अनुभव है। )

शहर के एकांत का विराट रूप है 'लंच बाक्स'

हमारे रिश्ते भी किसी शहर से कम नहीं । रिश्तों के किस हिस्से में क्या घट रहा है और क्या घटने वाला है हम उसमें रहते हुए भी नहीं हमेशा नहीं जानते । फिल्म लंच बाक्स देखते देखते अपने और शहर के भीतर के किसी ख़ालीपन से गुज़रने लगा । जब भी किसी मोड़ पर तेज़ी से मुड़ती हुई गाड़ी की छत पर रखे लंच बाक्स का दृश्य आता था लगता था कि छत की रेलिंग पर खुद हम बैठे हैं । निर्देशक ने बड़ी ख़ूबी से छत पर रखे लंच बाक्स का मानवीकरण किया है जैसे किसी नए रिश्ते से जुड़ कर हवा में बाँहें फैला रहा हो । फड़फड़ा रहा हो । शहर कभी भरता नहींंं है । ख़ाली ही करता है । जितना भरता है हम उतना ही ख़ाली हो जाते हैं । 

हम सब महानगरों की भीड़ के एकांत में जी रहे हैं । ज़िंदगी और शहर सब एक पैटर्न है । फ़िल्म के किरदार साजन फ़र्नांडिस की ज़िंदगी की तरह ।  हमारी ज़िंदगी की तरह । रघुवीर सहाय की कविता की तरह । 

देखो शाम घर जाते बाप के कंधे पर 
बच्चे की ऊब देखो, 
उसको तुम्हारी अंग्रेज़ी कह नहीं पाएगी 
और मेरी हिन्दी भी कह नहीं पाएगी
अगले साल 

फ़र्नांडिस की ज़िंदगी में एक लंच बाक्स भटक कर आ जाता है । बस यहीं से कहानी पर्दे पर घटने लगती है और सामने बैठे हमारे भीतर । ईला की ज़िंदगी में शुक्रिया की बजाय शिकायत की चिट्ठी आती है । फिर दो चुपचाप लोग बातें करने लगते हैं । एक दूसरे को देखे बिना खुलने लगते हैं । दोनों अब बात करते हैं । दरअसल बात करने से ही शहर का घड़ा भरता है और ज़िंदगी का एकांत । ईला और फ़र्नांडिस के बीच लंच बाक्स संवाद का ज़रिया बनता है । फ़र्नांडिस और ईला । ईला और फ़र्नांडिस । कभी तीखे खाने से तो कभी खाली बर्तन से । शहर के सीलन भरे कोने और एकांत जी उठते हैं । काई जमी दीवारें और टूटे फूटे सामानों से भरी बालकनी और ये जो है ज़िंदगी का पुराना वीडियो । वीएचएस टेप । इस सीरीयल के बहाने अपनी पत्नी की मौत के कई साल बाद फ़र्नांडिस उसकी फ़ितरत को समझते हैं । एक ही सीरीयल,वही प्रसंग और बार बार हँसना । कुछ नहीं बदलेगा तब भी हमें बार बार हँसना ही होगा । उसी बात पर । 

मुंबई की बोरियत की बेचैनी को जिस तरह से इरफ़ान ने अपने चेहरे पर जज़्ब किया है वो अदभुत है । फुटपाथ पर एक पेंटर का रोज़ एक जैसी तस्वीर बनाने का रूपक ग़ज़ब है । उन तस्वीरों पर छोटे छोटे बदलावों को नज़दीक से ग़ौर करना शहर के प्रति हमारी नज़र और समझ को उकसाता है । फ़िल्म के दृश्य किसी ठहरे हुए पानी की तरह है जिसके नीचे गहराई में कितना कुछ चलता है । दरअसल यह शहर के एकांत का विराट रूप है । लंच बाक्स एक बेहतरीन फ़िल्म है । 

निम्रत कौर ने ईला का किरदार खूब निभाया है । ईला की रसोई की खिड़की और ऊपरी माले पर रहने वाली आंटी के बीच संवाद का प्रसंग आप देखते हुए मुंबई के निराकार संबंधों में चले जाते हैं । जो अपनी टोकरी, सामान और पुराने टेपरिकार्डर से 
बात करती हैं । बस ऊपरी माले से भारती अचरेकर की आवाज़ ही आती है । कभी आदमी की आवाज़ निराकार हो जाती है तो कभी आवाज़ एक आदमी । और वो पंखा । उफ्फ! निर्दशेक ने कमाल का स्केच खिंचा है । छोटे छोटे इतने प्रसंग हैं कि उन पर लिखते हुए इस फ़िल्म पर एक और फ़िल्म बन सकती है । 

यह फ़िल्म ठहर कर देखने की मांग करती है । न फ़िल्म चीख़ती है न कलाकार । देखते देखते आपसे बात करने लगती है और अचानक से चुप हो जाती है खूब हंसाती भी है । सलमान शेख़ के रूप में नवाज़ुद्दीन का किरदार और उनका अभिनय बेजोड़ है । नवाज़ हमारे सिनेमाई शहरों का एक घूमता फिरता क़स्बा है । गाँव है । कोई पुराना मोहल्ला है । मैंने सऊदी देखा है ! पांच सितारा होटल के पोर्टिको में खड़ी महंगी कारों के बीच नवाज़ किसी आटो की तरह घुस आता है । भड़भड़ाते हुए । इरफान अब महानगर हो चुके हैं । इतनी गहराई में उतर जाते हैं कि पर्दे पर इरफ़ान को देखना मुश्किल हो जाता है । हमेशा फ़र्नांडिस ही नज़र आते हैं । किरदार का असर ऐसा था कि फ़िल्म के बाद हाथ मिलाते वक्त लगा कि इस इरफ़ान को तो जानता भी नहीं । हाँ फ़र्नांडिस को जानता हूँ जो हम सबके भीतर है । ईला की भूमिका निभाने वाली निम्रत कौर की जितनी तारीफ़ की जाए कम है । वो बिल्कुल हमारे जैसी है । हमारी सहयोगियों और सखियों की तरह, घर और दफ्तर में ऊबी हुई । नहीं ऊबी हुई नहीं । साॅरी । बात करने की तड़प में कुछ कहने की तलाश करती हुई । कहने के लिए कितना कुछ है । हम कहते ही नहीं । जो कहना चाहिए हमेशा उसे न कहने की सतर्कता हमारी और उनकी बातों को बोझिल करती हैं । लंच बाक्स एक आइडिया है । अचानक और किसी अजनबी से बात करने का । 

फ़िल्म में भूटान का ज़िक्र आता रहता है । हम सब अपने भीतर एक दूसरा शहर रखते हैं । जिस शहर में रहते हैं उसके एकांत का विकल्प एक दूसरा एकांत । भूटान । कई बार लगता है कि इस शहर से जाना चाहिए । वहाँ जहाँ इससे तो कुछ अच्छा हो । हम सब शहरी अपनी घोर असुरक्षा के बीच एक काल्पनिक सुरक्षा रखते हैं । बैंक के लाकर की तरह । इस समीक्षा को पढ़कर नहीं लगेगा कि फ़िल्म की बात कर रहा हूँ । पर लंच बाक्स का मक़सद भी यही है कि हम फ़िल्म के बाद फ़िल्म की कम शहर के बारे में ज़्यादा बात करें । अपने रिश्तों के खालीपन का दरवाज़ा खटखटायें । इस फ़िल्म को दो बार देखियेगा । एक बार फ़िल्म के लिए और दूसरी बार इस फ़िल्म की तीन औरतों के लिए । इनके लिहाज़ से देखना और लिखना ज़रूरी है । कई बार लगा कि औरतों और शहर की ज़िंदगी में कुछ तो 'काॅमन' है । हर घर एक शहर है और हर शहर एक दफ्तर । हम सब उस दफ्तर की फ़ाइलें जिससे कभी प्याज़ की गंध आती है तो कभी उस घिन की जिससे आजा़द होकर अपने पति की मौत के बाद ईला की माँ पराँठें खाना चाहती है । लिलेट दूबे ने उस एक छोटे से प्रसंग में रूला दिया है । 


दरअसल लंच बाक्स हिन्दी सिनेमा के आज के स्वर्ण युग की एक फ़िल्म है । स्वर्ण युग हमेशा अतीत में घटा एक टाइम फ्रेम नहीं है जो कभी दोबारा घटेगा ही नहीं । वो घटता रहता है । कई बार । अक्सर ऐसी फ़िल्मों से । निर्देशक और इरफ़ान की हिम्मत की दाद दीजिये कि फ़िल्म रिलीज़ होने से महीना भर पहले दिल्ली के सिरी फ़ोर्ट में दिखा दिया कि लोग आलोचना करें तो करें मगर बात तो करें । ईला और फर्नांडिस की तरह । बिना कहानी बताये, बिना फ़िल्म दिखाये चैनल चैनल दौड़ने के इस दौर में यह साहस का काम है । एन एफ डी सी को भी बधाई । एक अच्छी फ़िल्म के निर्माण में आगे आने के लिए । आॅस्कर ? क्या पता शायद । पहले आप देखिये तो । हाँ आइटम सांग नहीं है इसमें । एक घंटे पचास मिनट की यह फ़िल्म जल्दी गुज़र जाएगी मगर देर तक आपके ज़हन मे ठहरने के लिए । शायद बीस सितंबर को भारत में रिलीज़ हो रही है । ऐसी फ़िल्मों को आप सपोर्ट नहीं करेंगे तो कौन करेगा । याद रखने लायक फ़िल्म है लंच बाक्स । 

मूड किया तो ये लिखा

(1)
सियासत में एक बात अच्छी होती है 
रंग कुछ भी हो चमड़ी मोटी होती है । 
(2)
मुल्क की बीमारी की पैमाइश हो रही है,
टीवी में बोलने की समझाइश हो रही है ।
(3)
जबसे उनके फ़ालोअर कुछ लाख हो गए ,
बता रहे हैं सबको कि सबके बाप हो गए । 
(4)
नेताओं के फ़ेसबुक पर खाते खुल रहे हैं ,
स्विस बैंक पूछो है कितने में खुल रहे हैं ।