रेलगाड़ी और सिनेमा

सिमरन आज भी भागना चाहती है मगर भगा कर ले जाने वाले राज के पाँव काँपते हैं । बाउजी के थप्पड़ों से राज के क्लिन शेव वाले गाल लाल हो उठते हैं । फ़िल्म आख़िर में पहुँचते पहुँचते बी ग्रेड होकर यादगार हो जाती है । राज किसी का दिल जीतने आया था किसी का दिल तोड़ने नहीं आया था । हम नहीं जानते थे या शायद जानते थे कि इस फ़िल्म से एक सुपर स्टार पैदा हो रहा है । समीक्षक ही बता सकेंगे कि इश्क़ मोहब्बत की वही फ़िल्म स्टार क्यों पैदा करती है जो बने हुए सिस्टम से बहुत ज़्यादा छेड़छाड़ नहीं करती है । कुछ ले दे के एडजस्ट कर जाती है । सिमरन जैसी लड़कियाँ हतप्रभ रह जाती हैं । राज जैसे प्रेमी माफी माँगने लगते हैं । वो उसी खाप का एक नरम विस्तार बन जाते हैं जो माँ बाप या समाज से अलग रास्ते पर चलकर प्यार के परवान चढ़ाने से डराते हैं और डर जाते हैं । जाते जाते राज सबसे माफी माँगते चलता है । प्रीति से । संगीत ही है कि लाज बचा लेती है । सिनेमा के घिसे पिटे यथार्थ से निकाल लो जाती है । राज हाल्ट पर पहुँचता है । एक प्लाट के तहत कि बाउजी खुद लेकर आएँगे । बस बस बस बस । अनुपम खेर चौधरी साहब को क्या रोकते हैं बस बस गूँजने लगता है । राज लात खाता है । गिर जाता है । फिर पलटता है । बंदूक के साथ । चीखते हुए । लाठियों को हटाने के सिनेमा के स्थायी और कालजयी दृश्य में प्रवेश करते हुए । एंग्री यंग मैन का खुदरा खुदरा चेहरे पर तैरता है । उधर हवेली में माँ दरवाज़ा खोलती है । चल सिमरन मेरे साथ । भारतीय रेल का यह छोटा सा हाल्ट एक साधारण सिनेमा के क्लाइमेक्स का मेट्रो स्टेशन बन जाता है । फाइट सीन । ढिशूम ढिशूम । टेबल फ़ैन की हवा से राज के गहरे काले बाल उड़ रहे हैं । ट्रेन आने वाली है । आ रही है । प्लेटफार्म पर लग रही है । वक्त कम है । बाप बेटे कोच में चढ़ने लगते हैं । नाॅन एसी कोच । नब्बे का मध्यमवर्ग आख़िरी बार देखता है । एसी थ्री में शिफ़्ट होने से पहले । बाप ऊपर और बेटा नीचे । फिर से वही संगीत का मायावी यथार्थ । बाउजी सिमरन की कलाई पर अपनी आख़िरी ताक़त आज़माते हैं । ट्रेन चल देती है । कलाई छूट जाती है । राज कोच के दरवाज़े पर है । जा सिमरन जा । इस लड़के से ज़्यादा प्यार तुझे कोई और नहीं कर सकता । जा जी ले अपनी ज़िंदगी । अमरीश पुरी खलनायक से एक उदार पिता बन जाते हैं । सिमरन दौड़ पड़ती है । दौड़ रही है । ट्रेन कमबख्त चल रही है । सब कुछ स्लो मोशन में है । सिमरन का लहंगा । राज का लेदर जैकेट । वायलीन या बैंजो का ट्यून ।  राज की बाहों में सिमरन । भारतीय रेल । नब्बे के दशक के एक सुपर स्टार को लेकर चलने लगती है । दुल्हनियाँ ऐसे बुज़दिलों को दिलवाले कब तक समझेगी । मसखरी आशिक़ी नहीं है । तमन्ना बेताब है । अब चैनल बदल चुका हूँ । इसी फार्मेट से पहले पैदा हो चुका सुपर स्टार गा रहा है । रे मीत न मिला रे मन का । गाने के बाद कहता है सैड सांग था । विरह गीत । सिगरेट के धुएँ से छल्ले बनाता है । अभिमान उस शोहरत के तमाशे का तमाशा है जिसका हीरो सुधीर कुमार एक लाख का ब्लैक मनी रखता है । शोहरत के साथ बंगला खरीदता बेचता है । हिन्दी फ़िल्म की कहानियाँ चलती रहती हैं । रेलगाड़ी की तरह । प्लेटफार्म पर खड़े लोग इस रेलगाड़ी में चढ़ते रहते हैं और गाड़ी से नीचे उतरता रहता है । दोपहर बर्फ़ी देख रहा था । बर्फ़ी की पहली महबूबा दौड़ती है भागती रेल को पकड़ने के लिए । पतली दुबली लड़की साड़ी में लिपटी अंधेरी लाइट के शेड्स में दौड़ रही है । कुछ दिन पहले रांझणा जैसी एक बेकार फ़िल्म देखी थी । बनारस में इसका हीरो भी प्लेटफार्म पर साइकिल से भाग रहा है । सोनम अलीगढ़ जा रही है । वही सेकेंड क्लास का डिब्बा । ऐसे सीन के लिए सेकेंड क्लास का डिब्बा ही काम आता है । सिनेमा की रेलगाड़ी में एसी कोच अभी तक क्यों नहीं आया । रांझणा का हीरो साइकिल लिये पटका जाता है । ज़ोया की गाड़ी अलीगढ़ । रेल का सीन भी फिक्स है भाई । टीटी को ले दे कर । 

पागलनामा पार्ट नाइन

एक फलाने हैं जो चिलाने से मिलकर ढिमकाने को निपटाने में लगे हैं । विष्णु मुद्रा में लात पसार कर सोये हुए लोग अपना अवतार भेज कर काम करा रहे हैं । अवतार के साथ वरदान का पैकेज भी होता है । कभी वामन तो कभी रावण बनकर ये लोग काम करते हैं । राजनीति खाजनीति है । लोशन ही लोकतंत्र है । चुनाव आयेगा वोट मांगेगा तुम नोट से फंसना ज़रूर । उत्तराखंड की तबाही कवर करने गया रिपोर्टर पाँच किमी चल कर बड़ा काम कर गया है । मरे हुए लोगों के बीच वो जान पर खेल रहा है । पीठ ठुकाई हो रही है । तबाही की दो सौ कहानियों का स्पीड न्यूज़ बन चुका है । लेदी( चारा) की तरह ख़बरें कट रही हैं । दर्शक गाय की तरह टीवी की नाद में मुड़ी गड़ाये है । हनुमान चालीसा का एप्स बन गया है । स्टीव जाब के एप्पल फ़ोन पर चालीसा सुनो । कुंडली का भी पचपन रुपये का एप्स है । निर्मल बाबा टीवी पर आ गया है । तुम आयफोन पर चले जाओ । सोसायटी का मकान श्मशान लगता है । बूढ़े लोग टहलते जा रहे हैं । देश कौन चलायेगा । इसकी चिन्ता अख़बार से उठा लेते हैं । टीवी देख देख कर ज़ालिम लोशन हुए जाते हैं । खजुआते हैं फिर सहलाते हैं । हर दलील एक लोशन है । लोशन ही लोकतंत्र है । एंकर पिटी हुई फ़िल्म का हीरो है । प्रेशर कूकर के विज्ञापन का नायक है । पत्नी कूक करती है और एंकर नायक ठूंस कर मोटाता है । भारत को विश्व विजेता और विश्व गुरु होने की कुंठा ठेले जाते हैं । चीन होना ही होगा भारत को । वर्ना चीन कोई और हो जाएगा । चीन बनाने के लिए नेता पैदा हो रहे हैं । रात की बहस मरघट में जलती लकड़ियों की चरमराहट है । खोपड़ी फटती है और फट फुट की चिंगारी से हंगामा होता है । ब्रेक आ जाता है । देश में भ्रष्टाचार बहुत फैल गया है । जिन राजनीतिक दलों ने उसे फैलाया वही दूर करने का झंडू बाम बेच रहे हैं । बाम वाले तामझाम रोप रहे हैं । दर्शक खजुआते रह जाते हैं । देश पागलपन के दौर से गुज़र रहा है । प्रेमचंद पढ़कर हिन्दी बोलने वाला पाठक हो गया । बाँध बना बना कर हर ललिल का निबंध कर देता है । हर निबंध एक प्रबंध है । डिपार्टमेंट का गंध है । बोलने और हगने की एक ही शैली हर दिशा में है । हिन्दी पत्रकारिता फ़ेल हो चुकी है । हिन्दी के अख़बार प्रेम पत्र लगते हैं और चैनल मधुमति के गाने । इंडिया गेट पर विजय चौक क्यों हैं ? इस देश में हिन्दू और मुसलमान क्यों हैं । हिन्दू में मुसलमान और मुसलमान में हिन्दू क्यों नहीं हैं । पैराग्राफ़ मत बदलो । व्याकरण सबसे भ्रष्ट प्राधिकरण है । व्याकरण वाले लिंग निर्णय कराते हैं । अर्थ का राम नाम सत्य गाते हैं । मरी हुई भाषा के ज़िंदा लोग श्राद्ध खा रहे हैं । देश को विश्व गुरु नहीं बना पा रहे है । चेलों के जगत को जगत गुरु बनायेंगे, सौंगंध दुर्गन्ध की खाते हैं हम चीन बन जायेंगे । कोयले की दलाली में काला होकर भी सफ़ेद कुर्ता पहने नेताओं के गर्भ में ग्रोथ रेट पल रहा है । भ्रूण परीक्षण पर रोक लगाकर सब निश्चिंत हैं । किसी को क्या पता बेटा है कि बेटी है । यहाँ भी लिंग निर्णय है । निर्णय पर रोक है । भारी बारिश हो रही है । तानसेन का तानपुरा फट गया है । रहमान का घटिया म्यूज़िक शोर मचाये है । जाति जाति गिनती है । हाँ जी हाँ जी चलता है । लोकतंत्र तंत्र मंत्र है । झाड़ फूँक के लिए ओझाओं का जंत्र है । चौथा खंभा धँस गया है । इसी पर कबूतर हग रहा है । हम कितना अच्छा काम करते हैं कहने वाला कोई नहीं ।  कथा बांचने का कुछ तो श्रेय दे दो । वर्ना पहाड़ धँसने से पहले क्या हम अच्छा काम नहीं कर रहे थे । स्पीड न्यूज़ ही नियति है । जो रचेगा स्पीड न्यूज़ वही बचेगा मुक्ति बोध । नागार्जुन ठेला गए हैं ट्वीटर पर । बिजली आती नहीं है । जो विष्णु है वही सफल है । विष्णु न करवट बदलते हैं और न पैराग्राफ़ । अवतार का पैकेज भेज कर लोकतंत्र में नायक पैदा करते हैं । ब्रह्मा चुप हैं । शंकर तांडव कर रहे हैं । महामृत्युंजय का जाप करो । चाँदनी चौक से रोल गोल्ड का लौकेट ले आओ । पत्रकार को खत लिखो । भारत महान की दशा पर । बीस बीस पेज का । पैराग्राफ़ मत बदलो । चैनल बदलो । डाक टिकट जमा करो । आधी बात कान में बाक़ी बात श्मशान में । फ़लाना मिल गया चिलाना से । ढिमकाना ढह गया मलियाना में । 

पागलनामा पार्ट आठ

आता हुआ अख़बार कितनी कशिश पैदा करता है । खुश्बू से लिपटी हुई ख़बरों में इतराता दोहरा तिहरा होता कुम्हलाता है । परतों में परती पड़ी उसकी ज़मीन पर घास की तरह ख़बरें खुरदरी उगी नज़र आती है । कतरनें घुसी पड़ी होती हैं दुकानों और मकानों के पते की । एक अख़बार से कितने ठोंगे बनते हैं इसका हिसाब किसी संपादक को नहीं मालूम । पत्रकार पान की पीक से होंठ लाल कर ख़बर काली कर रहा है । अख़बार दैनिक बोख़ार है । चढ़ता है पर उतर जाता है । सरकार लोकतंत्र का बोख़ार है । जिसके एक खंभे पर टिका अख़बार है । चौथा है तो हर दिन इसका चौथा है । पन्ना पन्ना बंट जाता है । रूह किसी के हाथ में जिस्म किसी और की बाँहों में ।  जो जहाँ,जैसा है,ऐसा है,वैसा है । पहले कोमा है फिर फुलस्टाप है । नहाकर आई नायिका के बालों को काला करने वाली दवा की तरह ख़बर छपती है और उतर जाती है । सफ़ेद बालों पर कोई और सूचना सपना बनाकर बिठा दी जाती है । लेटी हुई नायिका के लिए टिप्स है अख़बार । संपादक का पाचक है अख़बार । पाठक पादक है । उसका हाज़मा ख़राब है । मर गया मर गया । जल गया जल गया । खंभा जो चौथा है । पोथा है बकवासों का । सब दलाल सब हलाल । सब माई के लाल । सूचना अनाथ है । लोकतंत्र केदारनाथ । बच जाता है । बाक़ी बह जाता है । टीवी के स्टुडियो में उतराता रहता है । एंकर भोले शंकर हैं । तांडव करते हैं । संपादक विष्णु हैं । लेटे हैं लक्ष्मी के साथ नाग के बिछौने पर । हाहाकार ही जयकार है । साधन बदलने से ज़माना नहीं बदलता । अख़बार के आने से हगने का टाइम नहीं बदलता । साथ साथ जाता है अख़बार । शोचालय का सच्चा साथी । लोकतंत्र का मदन मंजरी । पत्रकार खम्भे से लटका सरकार है । सैलरी साली है । नौकरी भाभी । मरेगा साला । दलाल बन जाए तो बच जाएगा । सेट होना ज़रूरी है । नहीं होता है तो कर देना चाहिए सेट । हेडलाइन ब्लूलाइन है । कुचलकर बासी हो जाती है । पैराग्राफ़ बिना बदले ही अख़बार छापो । पन्ना और पैराग्राफ़ मत बदलो । जूते के दराज़ में बिछाओ साले अख़बार को जिस पर बांचता पत्रकार है । टीवी में डालो इसको । बचाएगा जाकर लापता लोगों को । टूं टूं संगीत बजाएगा । दशहरी आम क्यों नहीं कोई खाता है । मनमोहन क्या खाता है मोदी क्या खाता है । लालू कितना खा गया । संजय दत्त जेल में पीता है । लोकतंत्र ने जब अपना अख़बार निकाला है हर दिन उसका मज़ार बना है । पैराग्राफ़ बदल लिये कि ठीक हो जाओगे । मत बदलो । सारे बाबू डाकू हैं । दो चार बौड़म साधो हैं । कबीर तो बच्चों के कैट नाम हैं । कबीर न किसी की तक़दीर है न बग़ावत की लकीर है । माला जपो । माल कमाओ । अख़बार पढ़ोगे तो तलवार कबाड़ में बेचोगे । 

पागलनामा पार्ट सेवन

हफ़्ता ख़ाली गुज़रा है । वैसे अब भरता ही कहाँ है । छत को आसमान समझ कर ज़मीन पर तारे गिनते गिनते कोने में पड़ी एक गेंद पर नज़र पड़ी । स्थूल । जैसे किसी ने बहुत दिनों से खेला ही नहीं । अब खेलना भी कहाँ होता है । कुछ खेलते हैं बाक़ी दर्शक बनकर खेलने वाले के साथ खेलते हैं । स्टेडियम की बेंच पर बैठे चिप्स खाते मोटाते रहे । खेलना आभासी है । टीवी विचित्र है । आलोचना आसमान में थूके जैसा चेहरे पर गिर आती है । जीवन चंदा नहीं है । जीवन धंधा है । बाक़ी सब गंदा है । जीवन को धंधे की तरह जीयो । नफ़ा नुक़सान देखकर । कविता हिन्दी में लिखो पर काम अंग्रेज़ी में करो । सब अंग्रेज़ी बोल रहे हैं । हिन्दी के शो में अंग्रेज़ी बोल रहे हैं । तो हिन्दी में पूरा का पूरा अंग्रेज़ी क्यों न बोली जाए । ब्रेड बटर ने और मोटा कर दिया है । कौन है जो चिट्ठी लिखता है और कौन है जो पत्रकार से बात करना चाहता है । भाग भाग कर बोलने आ जाते हैं । बोलते बोलते भाग जाते हैं । बोला नहीं कि पहले का बोला बोल दिया जाता है । अजीब सा माहौल है । क्या हो गया बोलने से और क्या नहीं हुआ नहीं बोलने से । तभी पैराग्राफ़ बदलने का मन नहीं करता । जिस कुर्सी पर बैठे हो उसी से रिटायर हो जाओ । नेमप्लेट बदल लो मगर कमरा मत बदलो । कुछ बदलता नहीं । झुर्रियाँ जुड़ती हैं । जिगर से लेकर फ़ीगर तक घट जाता है । भात खा लो वर्ना डाक्टर मना कर देगा । मौक़ा देखकर सेट हो जाओ । नहीं हो पाओ तो चलते रहो । धर्मगुरुओं की तरह । एक सरकार से दूसरी सरकार में फिर अपनी सरकार बना लो । भरते रहो खुद को । ख़ाली मत रहो । नींद नहीं आए तो जागो । अगला हफ्ता भी वैसे ही गुज़रेगा । ख़ाली बर्तन फिर बजेगा । ख़ाली बर्तन फिर बजेगा । जो सुनेगा वो ख़ाली हो जाएगा । बर्तन बचा रह जाएगा । टीवी बोलता रह जाएगा । 

पागलनामा पार्ट सिक्स

आसमान नीला लग रहा है ।हवा आँधियों के गुज़र जाने की बाद की लग रही है । भारत की समस्याओं के दो रूप पावडर पोत पोत कर सफ़ेद होने की तैयारी कर रहे हैं। दोनों की पूँछ में कार्यकर्ता तेल लगा रहे हैं । पुष्पक विमान उड़ा जा रहा है । गरूड़ नीचे गिरे पड़े है । सत्य के दो दल हैं । दोनों दलों के दलबल हैं । दलबल में दलाल हैं । दलील ज़लील होती है । जाहिल ज़ाहिर है । सत्य माहिर है । सत्य ही सियासत है । सत्य बहुमत है । सत्य महत्वकांक्षा है । भारत की समस्याओं के दो रूप एक ही रंगमंच के दो ड्रामे हैं । दोनों का अतीत और वर्तमान एक सा है । दोनों के खाते में बराबर या नहीं तो कम बेस आरोप जमा हैं । मार मची है । आपका हर कहा ख़रबूज़ है, गिरेगा चाक़ू पर ही है । घात लगाकर बैठे दलाल आपको भक्त बना देंगे । गालियों के रोली चंदन से टीक देंगे । दोनों के झंडे में कुछ रंग समान है । दोनों के झंडे का डंडा भी समान है । एक जाता है तो सबसे पूछवाता है वो कहाँ हैं । दूसरा जाता है तो जताता है कि वो आया था किसलिए । दोनों तरफ़ देश है । दोनों तरफ़ दंगा है । तराज़ू बराबर है । निर्लज्जता बराबर है । ये मारा वो मारा । जो बोलेगा वो गिरेगा चाक़ू पर । पागलों की दौड़ है । पागलों के पास ख़ूब आँकड़े हैं । इनसे इनके अपने भी कट रहे हैं । इनसे इनके परा़ये भी लुट रहे हैं । उनसे इनका चल रहा है । अजब हिंसा का दौर है । तू इसकी हाँ कहेगा तो तेरी माँ बहन । तू उसकी हाँ कहेगा तो सबकी माँ बहन । गालियों से भारत की समस्याओं के दो रूप सजाये जा रहे हैं । सत्ता हिंसा माँगती है । सत्ता लाश माँगती है । जो मर गया वो भुन गया ।जो बच गया वो धुल गया । तो आसमान नीला लग रहा है । हवाओं मे वो कशिश नहीं है । गालियों की आँधियाँ चल रही हैं । दलीलों का भंडारा बंट रहा है । काट पर काट है । लात पर लात है । लाद पर लाश है । हर हर महादेव है । अल्लाहू अकबर है । उसके बाद ईद मिलन है । उससे पहले होली मिलन है । पुष्पक विमान उड़ रहे हैं । मंदाकिनी का हरा पानी लाल होने वाला है । दो ब्रह्मांड हैं । दोनों के चारों तरफ़ भांड हैं । हाहाकार है । टीवी बंद कर दो । पैराग्राफ़ मत बदलो । चलते रहो । दोनों रूपों के पीछे पीछे । भारत की आत्मा को मुक्त करने । रिमोट फेंक दो । असली रिमोट किसी और के पास है । गालियां दो , लाठियाँ फेंक दो । महान महान महान जपो । हर हर महादेव तज दो । भागो उसके मंदिर के पीछे से मलबा चला आ रहा है । जान बचा लो। मर जाओ तो पड़े रहना । भारत की समस्याओं के दो रूप चले आयेंगे । शांति शांति शांति । नहीं नहीं । दे गाली दे गाली । इनबाक्स में गाली । आउटबाक्स में गाली ।  गाली हवन है । गाली यवन है । गाली पताका है । गाली महत्वकांक्षा है । सत्ता गाली की साली है । 

पागलनामा- पार्ट पाँच

सोर्टीज़ । उत्तराखंड में आई आपदा में यह शब्द यूं हवा में तैर रहा है जैसे हम सब रोज़ अपनी छत पर हेलिकाप्टर उड़ाते रहे हैं । हर रिपोर्टर हर चैनल इतना सोर्टीज़ सोर्टीज़ जप रहे हैं कि पूछिये मत । मरने वालों,फंसे लोगों और बचाये गए लोगों की संख्या के साथ सोर्टीज़ की गिनती भी बढ़ गई है । इस आपदा के बहाने यह शब्द हिन्दी और अंग्रेज़ी के दर्शकों में ठेल दिया गया है । कोई नहीं बता रहा है कि इस गिनती में सोर्टीज़ क्यों महान है । क्यों इसकी चर्चा हो रही है । एक सोर्टीज़ में कितना वक्त और जोखिम शामिल है । जब सौ पचास हेलीकाप्टर उड़ेंगे तो उनके सौ डेढ़ सौ उड़ाने ज़रूर होंगी । मैंने कुछ लोगों से पूछा भी कि भाई सोर्टीज़ क्या होती है । कोई जवाब नहीं मिला । आप लोगों की तकलीफों से जुड़ी ख़बरों के बीच अचानक एक ऐसे शब्द से टकराते हैं जिसका आपके जीवन से कोई लेना देना नहीं । इस्तमाल करने वाला भी नहीं बताता कि सोर्टीज़ का मतलब क्या है । अगर हम यह कह देंगे कि हेलिकाप्टरों ने इतने फेरे लगाए हैं तो कुछ कम पढ़े लिखे लगेंगे क्या । कांग्रेस की प्रवक्ता रेणुका चौधरी से लेकर सेना के बनाये बेस तक से रिपोर्टर सोर्टीज़ सोर्टीज़ बोल रहे है । आज हेलीकाप्टरों ने अस्सी सोर्टीज़ लगाईं । अबे कितने हेलीकाप्टरों ने ये सोर्टीज मारे ये भी तो बता । क्या ये हेलिकाप्टर इतनी सोर्टीर्ज़ लगाने के योग्य नहीं है । क्या इस संकट में मार मार कर हेलिकाप्टरों से सोर्टीज़ लगवाई जा रही है । हिन्दी के पत्रकार भी सोर्टीज़ ऐसे बोल रहे हैं जैसे उनके ख़ानदान में किसी का हेलीकाप्टर का गराज रहा हो । क्या मतलब है सोर्टीज़ का । ये सोर्टीज़ भी सिर्फ सेना के हेलीकाप्टरों की ज़्यादा गिनी जा रही है । एनडीआरएफ और आईटीबीपी की चर्चा सेना के मुक़ाबले कम है । रिपोर्टर धड़ाक से सेना के पास पहुँचते और वहाँ रहते वक्त सेना का गुणगान करते हैं । मैं भी सेना का क़ायल हूँ और इस आपदा में भी सेना का योगदान स्वर्णिम रहा है । लेकिन क्या  किसी ने यह देखने या दिखाने का प्रयास किया कि जो राष्ट्रीय आपदा रिसपांस फ़ोर्स बनी है वो कैसे काम कर रही है । बीस हज़ार की संख्या में यह फ़ोर्स है । इसे कुछ तो ट्रेनिंग मिली होगी । ये भी तो कुछ कर रहे होंगे । इनकी क्या तैयारी है ।  सीमा सड़क सुरक्षा बल के प्रयासों की भी चर्चा सेना के मुक़ाबले कम है । साफ़ है कैमरे वालों को ख़बर या सूचना की विविधता की चिंता कम है वे शानदार से दिखने वाले हेलीकाप्टरों और वर्दी में स्मार्ट और जाबांज़ दिखने वाले सैनिक अफ़सरों के अति प्रभाव में हैं । सबने उनकी भाषा सोर्टीज़ को आत्मसात कर लिया है । ताकि आप दर्शकों को यह न लगे कि आपका रिपोर्टर हेलीकाप्टर के कलपुर्जों की जानकारी नहीं रखता है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि स्थानीय प्रशासन या पुलिस कोई काम ही न कर रही हो । ठीक है कि इनकी लापरवाही रही है पर ये भी तो कुछ कर ही रहे होंगे । इनके बारे में कोई रिपोर्टिंग नहीं है ।  जब देखो तब किसी ब्रिगेडियर या विंग कमांडर की बाइट चल रही है । ऐसा लगता है कि सेना की आंतरिक बुलेटिन जारी की जा रही है । हम सब सेना के अति प्रभाव में रहने वाले लोग हैं । पर अगर इस आपदा राहत में लगे सभी अंगों पर बराबर से ध्यान जाता तो ज़्यादा विविधता पैदा होती । सेना का जनसंपर्क अच्छा है इसमें कोई शक नहीं पर क्या हम ज़रूरत से ज़्यादा सेना सेना नहीं कर रहे हैं । एक अंग्रेज़ी के रिपोर्टर ने किसी पायलट से पूछा तो उनका टका सा जवाब था इसी की तो हमें ट्रेनिंग मिली है । लीजिये । लगाइये और सोर्टीज़ । पैराग्राफ़ मत बदलो लाइफ़ में । न ही लाइन । जो सब कर रहे हैं वही करो । वर्ना लिखोगे पागलनामा । सोर्टीज़ ले लो । सोर्टीज़ गिन लो । सुबह से लेकर रात तक सोर्टीज़ । माथा ख़राब कर दिया है सब । हेलीकाप्टर है त उड़बे न करेगा जी । उड़ेगा त सोर्टीज़वा होबे न करेगा रे । 

सिनेमा का एक पर्दा

सिनेमा का एक पर्दा 
सत्तर एम एम का 
बिल्कुल मोना सिनेमा सा 
पटना का 
थरथराता है मेरे भीतर डोल्बी साउंड से 
कि मेरी एक कहानी होगी कभी 
पर्दे पर टुकड़े टुकड़े में 
मेरे भीतर दबे तमाम किस्से 
जब भर जायेंगे रंगों से 
वाइड लैंस का कैमरा झांकेंगा जिसमें 
दौड़ती मचलती मेरी कहानियाँ 
रूलाती हंसाती और भगाती 
जैसी छोटी लाइन की रेलगाड़ियाँ 
छुक छुक छुक छुक
एक पर्दा है 
सिमटता खुलता रहता है 
सत्तर एम एम का
बंद बक्से में सालों से रहता है 
ख़्वाबों के शहर में
अधूरा सा 
पूरा होते होते सो जाता है 
टन टन भाजा पोटैटो चिप्स 
की लोरी सुनते सुनते 
घर आ जाता है 

पागलनामा- पार्ट फ़ोर

फ़ेसबुक पर न्यूज़ चैनलों की रिपोर्टिंग को लेकर प्रतिक्रियाएँ पढ़ रहा हूँ । अब इतना कम टीवी देखता हूँ कि पढ़ते हुए लगा कि लोग क्यों देख रहे हैं । ये बातें कहीं दस साल पहले तो नहीं पढ़ीं । जब चैनल उनकी अपेक्षाओं पर खरे ही नहीं उतर रहे, उल्टा उनके भीतर चिढ़ पैदा कर रहे हैं तो उन्हें बंद कर मेरी तरह अख़बार का इंतज़ार करना चाहिए । अख़बार में भी कोई स्वर्ण युग नहीं है । फिर भी हर घटना में चैनलों का आपको बेवकूफ बनाना, आपका चैनलों के संग बेवकूफ बनना 'लव हेट ' रिलेशनशिप बन गया है । चैनल ऐसे ही रहेंगे । जो अपवाद हैं वो इस गंध में इधर उधर से निकल कर आते रहेंगे । एकाध छक्का तो हरभजन भी मार देता है । हम पहले पहुँचे, हमारी तस्वीर पहली है, हमने ही पहले बताया था । एक अंग्रेज़ी का रिपोर्टर यह बोल रहा था कि उसके सूत्रों ने बताया है कि आने वाले पलों में बारिश होगी । मुझे तो लगा कि इंद्र के दरबार में भी सूत्र है । सही है कि हमारी भाषा संरचना में चमत्कार और दैवी कृपा ऐसे ठूँसे पड़े हैं कि उन्हें जब सामान्य दिनों में निकाल नहीं पाते तो केदारनाथ को देखकर कैसे निकालेंगे । क्या पता कि अख़बार वाला भी इसी भाषा में लिख रहा हो । कितने रिपोर्टर गाँव गाँव भटक रहे हैं । टीवी के रिपोर्टर का पहुँचना ही घटना है । दिखाने की सुविधा होने के कारण वो खुद को घटना बनाता है ताकि पहले से घट चुकी घटना की भयावह़ता का वो हिस्सा बनकर नायक हो जाए । इसका कुछ नहीं किया जा सकता । केदारनाथ के ढहने पर चैनलों का टी सीरीज़ में बदल जाना मुझे हैरान नहीं करता । टीका अँगूठी ताबीज़ पहने ये रिपोर्टर ऐसी भाषा में नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा । क्या ये केदारनाथ की वेदपाठी की परंपरा के विस्तार नहीं है? बिल्कुल ये रिपोर्टर उम्मीदों पर खरे उतरे हैं ।  जो भी टीवी में काम करने आ रहा है वो इसी तरह की भाषा और शैली का अनुसरण करे । आलोचक आपके संपादक नहीं हैं । गंध में गंध की तरह रहो । कीचड़ में कमल खिल जाने से कीचड़ की नियति नहीं बदलती । कमल व्यक्तिगत है । उस पर भी तोहमत है कि कीचड़ में ही खिला है । खुलकर गंध कीजिये । इससे नवोदित पत्रकार शुरू से ही सिस्टम के अनुकूल रहेंगे और कैरियर कम तनाव में गुज़रेगा । ज़्यादा पत्रकारिता के मानक सीखने में समय न लगायें । एडजस्ट कीजिये । जिसको देखने में तकलीफ़ हो रही है उसकी चिंता मत कीजिये । वो खाली बैठा है टीवी के सामने । दस साल के अनुभव से बता रहा हूँ । एक आलोचना का असर होते नहीं देखा है । जब आपके बड़े भी यही मिसाल छोड़ गए हैं तो खुलकर बिना किसी नैतिक संकट के करो । बल्कि केदारनाथ से हिन्दू संकट का एलान कर दो । दहाड़ मार कर रोना शुरू कर दो कि शिव का मंदिर बच गया है । इस ज्योतिर्लिंग में शक्ति है । आइये फिर से नई आस्था के साथ माँगने चढ़ाने आ जाइये । तमाशा है टीवी तो तमाशबीन है दर्शक । खुद घर में कंठी पहनकर बैठा होगा और आपसे कहेगा कि आप मंदिर के चमत्कार में न बहो । अपनी सेटिंग संपादक और शंकर से रखो । दर्शक क्या होता है । इससे पहले की कौन सी ऐसी घटना थी जिसमें टीवी ने ऐसी हरकत नहीं की थी । वो ऐसे ही करेगा । इसीलिए इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी मैं बीस मिनट भी टीवी नहीं देखा । हल्का फुल्का देखकर उसके बाद एम टीवी । अब अगर ये पता नहीं है कि नौटंकी होगी तो इसका मतलब लोगों को टीवी देखना नहीं आता । साल भर तमाशा देखो और एक दिन चाहो कि संवेदना और ज़िम्मेदारी से भरपूर वाला हो जाए तो हद ही है न । कई बार लगता है कि लोग फ़ेसबुक पर स्टेटस लिखने के लिए पाँच मिनट चैनल देखते हैं । पता चलता है कि ये भी गंध ढूंढ रहे हैं लिखने के लिए । अपना कान खुजाकर सूंघने वाले हैं ये । हालाँकि बातें इन्हीं की ठीक लगती हैं पर जिन बातों का कोई असर न हो उनका रास्ता छोड़ देना चाहिए । गटरकाल है पत्रकारिता का । गटर की गंध का अपमान मत करो । आपदा आई है । टीवी का प्रदर्शित दुख अपने आप में एक आपदा है । सब रिपोर्टर ऐसे बोल रहे हैं जैसे यही शुभचिंतक ठहरे । सर पीटो, माथा फोड़ लो बात एक ही है । कुछ सही में जवाबदेही से बोलते होंगे । पर क्या करना है । क़समें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या । रेटिंग आ जाएगी सब धुल जायेगा । अगले हफ्ते प्रोमो चलेगा कि इस घटना के कवरेज ने सबसे ज्यादा हम पर भरोसा किया । अभी एक महीना और एक साल की बरसी बाकी है । चैनल बदल कर करोगे क्या । हर तरफ अब यही अफसाने हैं । हम तो तेरी आंखों के दीवाने हैं । लाइफ़ और लेखन में पैराग्राफ़ मत बदलो । 

फ़िल्म देखते हुए

रति अग्निहोत्री और मिथुन की एक पुरानी फ़िल्म देख रहा हूँ । केबल पर आ रही है । पसंद अपनी अपनी । मिथुन एक सीन में रति के भाई को पार्कर पेन दे रहे है । उससे पहले के एक सीन में जब वे दर्ज़ी से मिलने जाते हैं तो थम्स अप का बोर्ड रखा है । विज्ञापन ने सिनेमा के प्रसंगों में इसी तरह से दस्तक दी होगी । रति पतली दुबली लग रही हैं । तब शायद कृशकायी अभिनेत्रियों को साइज़ ज़ीरो नहीं कहा जाता था । रति की चप्पल टूटने का एक सीन है । छोटा भाई कहता है कि दीदी कील ठोंक देता हूँ । लकड़ी के सोल वाले चप्पलों से फ़ीता ऐसे ही निकल जाता था । 
मदन मंजरी नाम का नाटक है या शायद नाटक कंपनी । इस फ़िल्म में एक फ़िल्म पत्रकार भी है । जो रति के कमरे पर दस्तक देता है । जी मैं फ़िल्म पत्रकार हूँ और गीता जी से मिलना चाहता हूँ । मिथुन मना कर देते हैं । जब पत्रकार साहब पूछते हैं कि आप कौन है तो मिथुन अपना नाम बताते हैं संदीप आनंद । शहर के बड़े उद्योगपति का बेटा का ना है संदीप आनंद । नाम सुनकर ही पत्रकार का चेहरा खिल उठता है जैसे उसे कोई स्कूप मिल गया हो । फ़िल्म सचमुच दस्तावेज़ है । न्यूज़ से दिल भर गया है । हर वो चीज़ जो चैनलों की दुनिया से अलग है आकर्षित करती है । बिना पैराग्राफ़ बदले लिखने का जुनूँ शायद उसी विरक्ति से पैदा होती है । मिथुन और गीता वुडलैंड गार्डन कैफ़े से निकलते हुए पकड़े जाते हैं । अशोक कुमार एंबेसडर से उतरते हैं । तब के उद्योगपतियों की बड़ी कार । रति भोली भाली अभिनेत्री हैं । मशाल में पसंद आईं थीं । पहले की फ़िल्मों के हीरो जब अमीर बाप के बेटे बनते थे तब शाटन की नाइट शूट ज़रूर पहनते थे । समझ नहीं आया कि ये नाइट शूट ज़िंदगी में कब पहनना था जो नहीं पहन सके । चलता हूँ । चलते रहने के लिए चलते रहना ज़रूरी है । बारिश के बाद का आज का दिन अक्तूबर की किसी दुपहर जैसा है । 

पागलनामा- पार्ट थ्री

कुछ दिल ने कहा 
कुछ भी नहीं 
ऐसी भी बातें होती हैं 
लेता है दिल अंगड़ाइयां
इस दिल को समझाये कोई 

रात ऐसी ही होती है । विविध भारती के जैसी । धीरे धीरे आवाज़ साफ होती सी । सिरहाने के क़रीब रखा रेडियो चुपचाप गाये जा रहा है । तारों से भरा रात का आसमान थिरक रहा है । जो भी है बस यही इक पल है । पाँव बिस्तर के बाहर झूल रहे हैं । इन गानों की सोहबत में रात दोस्त की तरह बात करती है । सारे राज़ के वेवलेंथ पकड़ लेती है । हौले हौले बातों से अच्छा करती जाती है । टेबल फ़ैन की हल्की हवा का शोर गुम हुआ जाता है । रेडियो है कि गाता है । 

"अनजाने सायों का राहों में डेरा है 
अनदेखी बाहों ने हम सबको घेरा है । 
जीने वाले सोच ले यही वक्त है 
कर ले पूरी आरज़ू "

वायलीन जैसा कुछ बज रहा है । माउथ आर्गन है क्या । मालूम नहीं । कौन है उस तरफ़ जानता नहीं । गानों में कौन है जो किसी से मिलता जुलता है । जीवन में कौन है जो गानों सा लगता है । मैं हूँ तो भी नहीं हूँ । पैराग्राफ़ बदलना गुनाह लगता है । लिखना बादल के फटने जैसा है । सब कुछ बह जाता है । जो होता है वो भी और जो नहीं होता है वो भी । लिखी हुई बातों से मन दूर निकल आता है । पागलनामा क्यों लिख रहा हूँ । क्यों जाग रहा हूँ । नींद किस शहर से आती है । वो ग़ाज़ियाबाद नहीं आती क्या । पतंग की कटी डोर पकड़ने सा मंज़र है । बचपन में डोर के पीछे दूर तक भागना नींद के पीछे दौड़ना जैसा है । क्या है जो सोने नहीं देता । क्या है जो जागने से मिल जाएगा । क़ानून बनाओ । क़ानून बनाओ । हर ख़्वाब को जुर्म में बदल दो । सलाखों  के पीछे मिलेंगे सपने और जेलर बना जाग रहा होऊँगा मैं आपका रवीश कुमार । कोई परेशानी तो है नहीं फिर परेशान कैसा । केदारनाथ सिंह को पढ़ूँ क्या, लेकिन काशीनाथ सिंह से शांति नहीं मिली । मंगलेश की कविता ठीक रहेगी । नहीं न्यूज़ चैनल देख लूँ । नहीं नहीं । नहीं देखनी । मैं तो पागल हूँ । न्यूज़ तो समझदार देखते हैं । पागल तो जागता है । नींद नहीं आती । अरे अरे फिर कोई गाना आ गया । 
दुनिया में लोगों को 
धोखा कभी हो जाता है 
आँखो ही आँखों में 
यारों का दिल खो जाता है । 

विजेता कहीं भी सो लेता है । करवट नहीं बदलता है । ग़ाज़ियाबाद हारे हुए लोगों का शहर है । हिन्दी कविता पढ़ने वालों की दुनिया । जो अपना पैसा देकर संग्रह छपवाते हैं कवि कहलाने के लिए । तुम सोते हो कि नहीं ।