अखिलेश बनाम राहुल

राहुल गांधी अखिलेश यादव से उम्र में तीन साल बड़े हैं,मगर अखिलेश उनसे चार साल पहले २००० में सांसद बन गए। तब अखिलेश की उम्र 27 साल थी और जब २००४ में राहुल गांधी पहली बार सांसद बने तो उनकी उम्र थी 34 । अखिलेश यादव तीसरी बार सांसद बने हैं और राहुल गांधी का यह दूसरा टर्म है। उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए अखिलेश ने अपनी क्रांति यात्रा की शुरूआत राहुल गांधी से दो महीने पहले बारह सितंबर को शुरू की। इस दिन का कोई विशेष महत्व नहीं है। राहुल गांधी ने चुनावी अभियान की शुरूआत के लिए १४ नवंबर यानी जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को चुना जब उन्होंने फूलपुर की रैली से ज़ोरदार भाषण दिया। पूरी मीडिया लाइव दिखा रही थी। अखिलेश की क्रांति यात्रा का सीधा प्रसारण कहीं हुआ भी होगा तो उस मात्रा में नहीं जिस तरह से राहुल गांधी की पहली रैली को मिला था।

ऐसी तुलनाएं एक हद तक ही राजनीतिक हो सकती हैं लेकिन उत्तर प्रदेश का चुनाव जिस मोड़ पर पहुंचा है वहां से दोनों की तुलनाएं शुरू होने जा रही हैं। याद कीजिए जब चुनाव शुरू हुए थे तभी से लोग इसे राहुल गांधी का चुनाव बताने लगे थे। अब तो कांग्रेस के नेता भी इस लाइन की दावेदारी छोड़ने लगे हैं। दिग्विजय सिंह भी औपचारिक बयान में कहने लगे हैं कि लड़ाई कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच हो गई है। तो क्या यह देखना दिलचस्प नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश की घाघ समझी जाने वाली राजनीति में दो युवा नेता कैसे टकरा रहे हैं। 38 साल के अखिलेश यादव और 42 साल के राहुल गांधी के बीच मुकाबला शुरू हो चुका है।

शुरूआत राहुल गांधी ने ही कर दी। अपने नेताओं के नाम वाला पर्चा फाड़ कर। जवाब में अखिलेश यादव ने मंजे हुए नेता की परिपक्वता दिखा दी। जब राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी विपक्ष में बैठेगी लेकिन किसी का समर्थन नहीं करेगी। बड़ी लड़ाई का योद्दा ऐसी बात कर जाता है लेकिन अखिलेश ने चतुराई दिखा दी और कह दिया कि राजनीति में घमंड नहीं कर सकते। समर्थन लेना देना पड़ता है। चुनाव के बाद नतीजे आने पर ही राहुल गांधी देश के बड़े नेता के रूप में स्थापित होंगे मगर चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने खुद को समाजवादी पार्टी और यूपी के भावी नेता के रूप में स्थापित कर दिया है। कोई इंकार नहीं कर सकता कि सपा को इस चुनावी लड़ाई में पहले नंबर पर पहुंचाने वाला अखिलेश यादव ही है। मायावती को भी अखिलेश यादव से ही लड़ना पड़ रहा है। मुलायम सिंह यादव तो कहने लगे हैं कि पहला चुनाव है कि दिन में दो ही सभाएं कर रहा हूं। अखिलेश ने मेरे लिए कुछ छोड़ा ही नहीं है।

ढाई सौ से अधिक रैलियां कर चुके राहुल गांधी ने भी सोनिया गांधी के लिए जगह नहीं छोड़ी होगी। नतीजे ख़राब आने के बाद भी कहना ही पड़ेगा की राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत की। भट्टा परसौल की घटना के बाद पदयात्रा से गंभीर नेता की छवि बनाई। अजित सिंह को केंद्र में मंत्री बनाकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपनी कमज़ोरी को भरने की कोशिश की। रशीद मसूद जैसे नेता को भी लिया। बेनी प्रसाद वर्मा को गुरु बता दिया। सैम पित्रोदा को बढ़ई के रूप में पेश किया गया। वो एक व्यावहारिक राजनीतिक ज़मीन पर पांव जमाने की कोशिश कर रहे थे। वो समझने लगे थे कि चुनाव मेहनत के साथ रणनीतियों का भी खेल है। समाजवादी पार्टी को अंग्रेजी विरोधी बताकर वो अपने विकास के मुद्दे को मज़बूत कर रहे थे। फूलपुर की पहली रैली में ज़रूर कहा था कि मुझे यूपी की हालत पर गुस्सा आता है। लेकिन भीख मांगने वाले बयान की आलोचना से तुरंत संभल भी गए और यह भी कहा कि वे मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का सम्मान करते हैं। तब ऐसा क्या हुआ कि राहुल गांधी एंग्री यंग मैन की भूमिका में उतर आए। लखनऊ की रैली में उनका गुस्सा क्यों फूटा?

क्या लखनऊ में राहुल के भड़कने से उनकी रणनीति की कमज़ोरी झलक गई? क्या रायबरेली,अमेठी में प्रियंका गांधी को उतार देने की रणनीति ने भी दूसरे चरण के चुनावों में उन्हें चर्चा से दूर किया। पूरी मीडिया अपने लाव लश्कर के साथ प्रियंका के पीछे हो गई। मीडिया के कवरेज़ से यही संदेश गया कि कांग्रेस रायबरेली और अमेठी में अपने गढ़ को बचाने में जुट गई है। मीडिया के लिए प्रियंका गांधी सुलभ रही हैं। राहुल गांधी ने कुछ जगहों पर पत्रकारों को बुलाकर खुलकर बात तो की मगर उसे निजी बताकर रिपोर्ट करने से मना कर दिया। वो सीधे जनता से बात करने की रणनीति पर चल रहे थे। कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। चार चरण के चुनाव बीत चुके हैं। राहुल गांधी ने एक ही प्रेस कांफ्रेंस की है। वाराणसी में पहले चरण के मतदान के पहले उनकी प्रेस वार्ता थी। उसके बाद से वो मायावती की ही तरह मंचों से ही मीडिया को नज़र आते हैं। लखनऊ में राहुल गांधी ने गुस्सा जताकर क्या हासिल किया इसका सही विश्लेषण तो चुनाव के नतीजों में झलकेगा लेकिन आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उन्होंने अपने सामने अखिलेश यादव को ला खड़ा कर दिया है।

राजनीति में कोई भी चुनाव किसी भी राजनेता के लिए अंतिम नहीं होता लेकिन राहुल गांधी यूपी में पहले हार देख चुके हैं, इस बार जीत की आशा में भागे जा रहे हैं। वो जनता के बीच जा तो रहे हैं मगर अखिलेश उनसे भी दो कदम आगे हैं। वो स्थानीय नेताओं को फोन कर दे रहे हैं। चाचा मामा बताकर साथ आने के लिए कह रहे हैं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अखिलेश को मुलायम सिंह यादव की बनी बनाई पार्टी का भी लाभ मिल रहा है। राहुल गांधी नए सिरे कांग्रेस के लिए नेता खोजने से लेकर संगठन खड़ा कर रहे हैं। अखिलेश की पार्टी पिछली विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी है और यूपी से लोकसभा में पहले नंबर की। राहुल गांधी की कांग्रेस यूपी की चौथे नंबर की पार्टी है। समाजवादी पार्टी में अखिलेश के पीछे उनके पिता, चाचा और चचेरे भाई सब जुटे हैं। लेकिन इसके अलावा आज़म ख़ान का अपना आधार है। अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की वेबसाइट पर पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ अपनी तस्वीर भी नहीं लगाई है। फिर भी वो हिम्मत कर सके कि एक ग़लत बयान पर मोहन सिंह जैसे सम्मानित समाजवादी पार्टी नेता को प्रवक्ता पद से हटा दिया। डीपी यादव को शामिल करने से मना कर दिया। राहुल गांधी बेनी प्रसाद वर्मा और सलमान खुर्शीद को रोक नहीं सके। अखिलेश मीडिया की नज़र से दूर हैं, राहुल हर दम कैमरे के क्लोज़ अप में होकर भी मीडिया से दूर हैं। जब भी कैमरे अखिलेश को ढूंढते हैं वो तुरंत हाज़िर हो जाते हैं।

ये दोनों नेता आमने सामने हो चुके हैं। अखिलेश यादव ने रायबरेली और अमेठी में रैलियां की हैं तो राहुल गांधी इटावा में। इस शनिवार को इटावा में राहुल की सभा में भीड़ भी आई। इटावा में राहुल गांधी ने अपने गुस्से वाली ग़लती से सबक सीख कर पहुंचे थे। लखनऊ में बढ़ी हुई दाढ़ी नदारद थी। ज़ाहिर है राहुल गांधी सीखते चल रहे हैं मगर उनके पास वक्त बहुत कम है। राजनीति सौ मीटर रेस के ट्रैक की तरह है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस नंबर से दौड़ रहे हैं। इस संदर्भ में कांग्रेस की युवा नेता नूरी ख़ान की एक बात याद आती है। इंदौर से दिल्ली के विमान में उस लड़की ने कहा था कि राजनीति तपस्या है। कोई खंभा नहीं कि दौड़ कर गए और छू कर आ गए। छह मार्च का इंतज़ार कीजिए। नतीजे तय करेंगे कि यूपी में कौन बड़ा युवा नेता है। राहुल गांधी या अखिलेश।

(published in dainik bhaskar last to last week.)

अखिलेश ही अखिलेश

शायद हम भारतीय मूलत उदास प्रवृत्ति के लोग हैं। दुख को नियमित समझ धीरज के साथ चरणों में काटते हैं और सुख को एकमुश्त उल्लास में खर्च कर देते हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की जीत के बाद के कवरेज और घोर उम्मीदीकरण का जो दौर की छपाई से ऐसा लगता है कि यूपी की जनता ने कोई क्रांतिकारी बदलाव के लिए जनादेश दे दिया हो। जबकि जनता ने नए कलेवर में पुराने ही विकल्प से बदलाव की उम्मीद भर की है। अमेरिका में बराक ओबामा की जीत पर कई महीने तक अति आशावाद की लहर दुनिया भर में फैला दी गई थी। पांच साल पहले मायावती जब प्रचंड बहुमत से आईं तो उन्हें भी भारत का ओबामा लम्हा बता दिया गया। नीतीश कुमार से लेकर ममता बनर्जी तक के विजय अभियान को ऐसे ही उम्मीदों से लबरेज़ किया जाता रहा है। अब हर तरफ अखिलेश ही अखिलेश हैं। टीपू बना सुल्तान से लेकर अखिलेश प्रदेश की उपमाओं के बीच राजनीतिक और प्रादेशिक यथार्थ वहीं के वहीं बने हुए हैं। संतुलन की गुंज़ाइश छोड़ सबकुछ अति के स्तर पर चला गया है।

अखिलेश एक अकल्पनीय छवियों के सांचे में ढाले जा रहे हैं। आई पैड और आई फोन सामान्य उपभोग की चीज़ें हैं। अभी तक अमेरिका में ही साबित नहीं हुआ है कि आई फोन या आई पैड का राजनीतिक सफलता से कोई नाता है लेकिन हिन्दुस्तान की मीडिया अखिलेश के हाथों में दिख रहे इन उत्पादों को उनके विजय से जोड़ रही है। यही कि अखिलेश दो दो ब्लैकबेरी फोन रखते हैं। आई पैड पर पार्टी के प्रचार अभियान का वीडियो देखते हैं। सत्तर के दशक के अंग्रेजी गाने सुनते हैं और ज़िंदगी मिलेगी न दोबारा जैसी फिल्में देखते हैं। हल्की फुल्की कन्नड बोल लेते हैं और धौलपुर के सैनिक स्कूल में मिली फुटबॉल खेलने की आदत को आज भी बरकरार रखे हुए हैं। पजेरो कार में रखी बीएमडब्ल्यू साइकिल चलाकर उम्मीद की साइकिल की नई छवि गढ़ते हैं। ऐसे तमाम प्रतीकों के बीच अखिलेश यादव के विजय अभियान की निरंतर खोज जारी है। उन्हें किस्से और मुहावरे में बदला जा रहा है। कैमरे खोज खोज कर ऐसी तस्वीरें ला रहे हैं जिसमें अखिलेश किसी रोबोट की तरह दिखने लगे। जीत ने यह काम आसान कर दिया है। यही सब उपकरण तो राहुल गांधी के पास भी थे। उन्हें जीत मिलती तो उनकी टीम और रणनीतियों के भी किस्से ख़ूब छपते। वोट देने से पहले उत्तर प्रदेश की जनता को अखिलेश यादव की इन खूबियों के बारे में कुछ नहीं मालूम था। उसे बस लगा कि उनके बीच कोई नेता आया है और गंभीर लग रहा है तो भरोसा करना चाहिए।

याद कीजिए पांच साल पहले मायावती को भी उम्मीदों की गगरी में उड़ेल दिया गया था। कहा जाने लगा कि मायावती की जीत हिन्दुस्तान का ओबामा लम्हा है। वो सारी उम्मीदें नए सिरे से अखिलेश यादव के कंधों पर हस्तांतरित हो चुकी हैं। यह जानते हुए कि राज्य का तंत्र एक स्थायी मानसिकता का शिकार हो चुका है। उसके लिए अखिलेश का शीर्ष पर आना एक अल्पविराम भर है। गनीमत है कि अभी तक अखिलेश यादव अपनी जीत की अतिरंजित व्याख्या में घोर रूप से सामान्य नज़र आ रहे हैं। वैसे ही जैसे विश्व कप जीतने के बाद महेंद्र सिंह धोनी सामान्य नज़र आ रहे थे। धोनी को मालूम रहा होगा कि विश्व विजेता होने का मतलब है जीत को निरंतरता में बदलना। मायावती के पास भी दो सौ से अधिक विधायक थे और वो भी दुनिया भर की पत्रिकाओं में सुपर वुमन से लेकर सौ शक्तिशाली महिलाओं में शुमार की जाने लगीं। अखिलेश यादव को समझना चाहिए कि ऐसी उपमाओं और अलंकारों का कोई मतलब नहीं होता। यह सब दीवाली के वक्त लगने वाले झालर हैं जो दीवाली बीत जाने के बाद दरवाज़ें पर मुरझाकर गिरने लगते हैं।

मैं सामान्य रहने में यकीन रखता हूं। समभाव ही बेहतर है। सत्ता के चरित्र ने मायावती को बदल दिया। ममता बनर्जी को बदल दिया। लालू यादव भी क्रांतिकारी परिवर्तन के प्रतीक बनकर उभरे थे। वो बदल गए। चुनाव बाद के विजेताओं को मिली सुर्खियों और पांच साल की उपलब्धियों में गहरा अंतर रह जाता है। टिकते हैं वहीं नेता तो सामान्य भाव से राज्य की बुनियादी समस्याओं का हल खोजते रहते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह से वे प्रचारों के दौरान स्टैंड ले रहे थे उसी तरह से प्रशासनिक फैसलों के समय भी स्टैंड लेगे। उन्हें उत्तर प्रदेश में अब तक सबसे ईमानदार प्रशासन देना है। उन्हें उस सामंतवादी मानसिकता से लड़कर दिखाना होगा जो जीत के नशे में किसी दलित का घर जलाने के लिए उकसाती है। यह कानून व्यवस्था के डर से दूर नहीं हो सकता। जब तक सम्मान की जगह नहीं बनेगी ज़मीन पर नया माहौल नहीं बनेगा। उनका बहुमत सभी जातियों का है। मायावती ने यही समझने में चूक कर दी। इसीलिए अखिलेश यादव को युवा नेतृत्व जैसे जुमलों की पैकेजिंग से सतर्क रहना होगा।

हमारे विचारक यहीं पर अखिलेश को समझने में चूक जाते हैं। यह जीत किसी रणनीति का परिणाम नहीं है। जनता के पास तो सिर्फ एक रणनीति थी। वोट उसको देना है जो बहुमत से सरकार बनाए। उसके पास एक ही विचारधारा और कार्यक्रमों वाले कई दल थे। यूपी की जनता ने उन तमाम दलों में से एक सपा को चुना। सपा की जीत यूपी की जनता की रणनीतिक जीत है न कि अखिलेश के हाई टेक आदतों की। अखिलेश यादव ने इसे समझ लिया था। इसलिए वो जनता से एस एम एस या ईमेल से संबंध नहीं बना रहे थे। उनके बीच जा रहे थे। नेता का सपर्क कार्यकर्ताओं से जितना बेहतर होगा उसकी योजनाएं सफल होती चली जाएंगी। यहां पर अखिलेश ने खुद को साबित किया है।


लोकतंत्र में नए दल बनते हैं और गायब हो जाते हैं। जनता दल अमीबा की तरह टूटा और बनता रहा। समाजवादी पार्टी को पुरातन कहा जाने लगा तो वो अखिलेश ने उसे आधुनिक बना दिया। पर पार्टी का ढांचा कितना आधुनिक हो गया होगा। हमारे देश में यह करिश्मा हर दौर में होता रहा है। शरद पवार भी सैंतीस साल की उम्र में महाराष्ट्र की राजनीति के करिश्मा थे। मायावती भी उनतालीस साल की उम्र में उत्तर प्रदेश की चमत्कार थीं। असम में प्रफुल्ल मंहत ने तो इन सबसे कम उम्र में जनमत के ज़रिये सत्ता हासिल की थी। अब कोई चमत्कार नहीं कहता। अगर सारा नमस्कार सत्ता के लिए ही है तो फिर अतिरंजित विश्लेषण क्यों? राष्ट्रीय नेता बनाम लोकल नेता के सवाल के जवाब में अखिलेश यादव ने जवाब दिया कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को ऐसे ही इंटरनेशल और नेशनल बताकर भरमाते रहते हैं। वो चाहते हैं कि उनकी तुलना उत्तर प्रदेश के अंदर हो। अखिलेश यादव को मालूम है कि पांच साल बाद उनकी तुलना होगी। उनकी राजनीति की राजधानी सैफई ज़रूर हो सकती है मगर याद रखना होगा कि राजधानी एक है। लखनऊ जहां से उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश के लिए काम करना है। अखिलेश ही अखिलेश जैसे अलंकरणों से बचकर प्रदेश ही प्रदेश जैसे यथार्थों में विचरना होगा।
(published in rajasthan patrika)

ख़बर तुम मालामाल हो 

ख़बर तुम साबुन हो
चीनी हो माचिस हो
बाज़ार में बिकती हो
सरकार में बनती हो
ख़बर तुम दुकान हो
दलिया हो बादाम हो
साहूकार की गिरवी हो
सरकार की जिगरी हो
ख़बर तुम धंधेबाज़ हो
दलालों की हलाल हो
हलालों का मलाल हो
ख़बर तुम मालामाल हो 

चांद तुम एक कर्मचारी हो.....

दफ्तर है आसमान, चांद तुम एक कर्मचारी हो।
पंद्रह दिनों तक कंटते छटते घटते रह जाते हो।
बाद पंद्रह दिनों के कृष्ण पक्ष में खो जाते हो ।
नौकरी के पहले दिन जैसे पूनम हो जाते हो।
वेतन के दिन जैसे चांदनी बिखराते निकलते हो।
चांद तुम एक कर्मचारी हो.....

रामधन एंड मूलधन इन यूपी इलेक्शन-पार्ट ३

मूलधन,खेत के मेड़ पर बैठा शून्यगामी प्रतीत हो रहा था। रामधन भैय्या खोजते धौगते चले आ रहे थे। अरे मूलधनवा उठ न रे। ग्रैभिटी फोर्स ज़ीरो हो गइल का रे। कौन कहीस है रामधन भैय्या। अरे गांव भर के लइकन सब कहत हैं कि मूलधनवा के ग्रैभिटी ज़ीरो हो गवा है। धरती छोड़ता है कि हवा में उड़ने लगता है। इ कौन बीमारी है रे यंगर ब्रदर। रामधन भय्या। अब मूलधन भोकार पार के रोने लगता है। हम मेड़ पर के घास छोड़त हईं त हवा में उड़त लागत हईं। बे हुआ का है,बतावेगा। भैय्या हम टीवी देख लीहलीं। ओकरा में बोकरात रभीसवा बोल रहिस था कि धर्म आ जाति से ऊपर उठकर कब वोट करेगा। बस हम कहली ए भौकालेंकर महोदय(एंकर का नया नाम) देख हम उठत जात हईं धर्म आ जाति से। बस भैय्या, हल्का हो गललीं। जैसे धर्म आ जात छोड़ दिहलीं, बुझाइल कि भूचाल आई गवा है। जे जे धर्म आ जाति के धइले रहल, उस सभन ज़मीन में आ हमहीं अकेले असमाने में उड़े लगनी। कुछऊ शरीरियां में बाकिये नइखे। अब बुझाता, धर्म आ जाति केतना ज़रूरी है। धरती पर रहने के लिए। ओकरा बिना ग्रेभिटी वाला थ्योरी है न न्यूटनिया के, बेकार है।

अरे काहे रे। पोलटिक्स में फिजिक्स पढ़ता है। दिमाग की बीमारी हो गएल ह तोहकें। बुझले मूलधनवा। तू भोटर है रे। बिना जात अ धर्म के भोटर होता है कहीं। देखा है दुनिया में। दुनिया में...अरे रामधन भैय्या हम त जिनगी भर सीतापुर से बाहरे न गइलीं। इ सीतापुर में तो कउनू भोटर नाहीं है, जाति धर्म के बिना। नहीं है न त तू काहे दुन्नों के बिना हो गया। बड़का भाई के विस्वास में काहे नहीं लिया रे। देख, धर्म आ जाति न रखबे, तो कौनो पव्वो न देवेगा इलेक्सन टाइम में। बेगार करबे का रे नेतवन के। कुछऊ हमरो त मिलेके चाहीं। एहीसे कहत हईं,ऊपर उठिये त एक्के बार। देखल जाइ तब कि जहन्नुम मिलल की जन्नत। का पता ऊपरों जाय के बेरा चुनाव हो जाए आ पार्टी वालन हमके तोहकें जन्नत भेज दे।

मेनिफेस्टों का कोई भरोसा है। कुछऊ लिख देवत हैं सन। ओकरा में देखत तू कि एक्को लाइन लिखलै हैं कोई,कि धर्म या जात के बिना वाले भोटरों के लिए इ करेंगे उ करेंगे। बाप रे बाप । मूलधनवा अनरथ कईले रहले तू त। मत छोड़। धइले रह जात आ धर्म के। भौकालेंकर लोग तो बकत रहलन रात भर। बके दे ओनकरा के। देख मूलधन। बिकास के मतलब बूझ। फ्री कपड़ा लत्ता,जूता,साइकिल। इहे कूली मिलतौ। खैरात में सरकार हज़ार पांच सौ रूपये देगी हमन सभी को। लेकिन कौनो सामान बिना जात धर्म वाले के लिए नहीं है। न गांव है न रोड है न स्कूल है। जात धर्म त भोटर के श्रृंगार है। सजनी बिन घूंघट के शोभत नाहीं रे। मेलवन के लौंडिया मत बन। उघार हो जइबे,जात धरम छोड़ले त। माफी दे द भैय्या। हम सोचली कि बिकास होई जाइ।

गांधी परिवार का मीडिया परिवार

जब से प्रियंका गांधी वाड्रा उतरीं हैं मैदान में,तब से लग रहा है कि यूपी में बाकी नेता प्रचार ही नहीं कर रहे हैं। वैसे प्रियंका ने सिर्फ रायबरेली और अमेठी का जिम्मा संभाला है फिर भी ऐसे बताया जा रहा है जैसे वो पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचार कर रही हैं। दिन भर कैमरे पीछा करते है,लाइव दिखाते हैं,फोकस में प्रियंका ही रहती हैं। एक भी कैमरा पैन होकर,लेफ्ट-राइट होकर अमेठी या रायबरेली नहीं दिखाता। उनकी हर बात बल्कि वही बात बार बार दिखाई जा रही है। अब प्रियंका गांधी ने तो नहीं कहा होगा कि आइये हमारे पीछे-पीछे चलिये। मीडिया खुद ही दरी बिछाकर लेटने के लिए तैयार है तो क्या किया जा सकता है। प्रियंका की राजनीतिक अहमियत तो समझ आती है मगर रॉबर्ट वाड्रा को भी कवरेज की कमी महसूस नहीं हुई होगी। राबर्ट वाड्रा पर मीडिया टूट और टूटा पड़ा रहा।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के बीच प्रियंका गांधी एक ख़बर ज़रूर हैं। लेकिन जब यह ज़रूरत निष्ठा में घुलने मिलने लगती है तब समस्या होती है। समस्या उन चिरकुट पत्रकारों को ही होती है जो सत्ता के साथ चुपचाप तालमेल बिठाकर नहीं रहना जानते। अगर आप टीवी पर कवरेज का प्रतिशत निकालें तो प्रियंका के आने के बाद से यह संतुलन गांधी परिवार के पक्ष में ही बैठता है। जितना राहुल को दिखाया जाता है उतना अखिलेश या मायावती को नहीं। मुलायम तो शायद ही कभी-कभी। अजित सिंह भी नज़र नहीं आते। अब इसके लिए गांधी परिवार को क्यों दोष दें? उन्होंने कोई सर्कुलर तो जारी नहीं किया होगा कि अरे भाई आओ,हमीं को दिखाओ। मीडिया सचमुच इस परिवार की सत्ता को सह्रदय स्वीकार करता है। इसलिए नहीं कि बाइट या इंटरव्यू मिलेगा। वो भी किसी को नहीं मिला है। एक्सक्लूसिव तो किसी को नहीं मिला। प्रियंका ने तो झुंड के बीच एकाध बाइट दे भी दिये हैं मगर राहुल गांधी तो हमेशा लांग शाट में ही नज़र आते हैं। इन दोनों में राबर्ट वाड्रा ही मीडिया चतुर निकले। कैमरे और माइक के बीच सहज नज़र आए। आराम से बात करते रहे। उन्हें राजनीति का यह रूट शायद पसंद हो। मगर राहुल गांधी तो बिल्कुल कैमरे वाला रूट पसंद नहीं करते। उन्हें मालूम है कि ये पीछे पीछे आयेंगे ही तो क्यों बुलायें। राहुल बुलाते भी हैं तो एक कमरे में मीडिया को बिठाकर बात करते हैं। खुलकर बात करते हैं। मगर यह भी कह देते हैं कि आपके लिए है,रिपोर्ट करने के लिए नहीं। वहां कैमरे और रिकार्डर नहीं होते हैं। यह अपने आप में मीडिया पर गंभीर टिप्पणी है। राहुल को भरोसा नहीं कि इस तरह की बातचीत को भाई लोग ज़रूरत से अधिक निष्ठा में कुछ का कुछ न बना कर परोस दें। बहुत अजीब लगता है कि जब किसी तिराहे पर ओबी वैन लगे हों और मीडिया प्रियंका के आने का इंतज़ार कर रही हो। वो वहां पांच सौ हज़ार लोगों से मिलकर चली जाती हैं। कैमरा दूसरे लोकेशन पर पहुंचने के लिए सामान समेटने लगता है।

मीडिया के लिए राहुल या प्रियंका को फॉलो करना ग़लत नहीं है। राजनीति के विद्यार्थी और पत्रकार के नाते मैं भी यही करता। लेकिन क्या सारा कैमरा इन पर ही रहेगा? जबकि खुद प्रियंका कह रही हैं कि रायबरेली और अमेठी का चुने हुए विधायकों ने विकास नहीं किया। तब भी कैमरे और रिपोर्टर इसे स्टोरी नहीं समझते। वो एक सस्ता काम करते हैं। दावे के साथ कह सकता हूं एक राजनेता के तौर पर राहुल गांधी जितनी मेहनत करते हैं वो खुद समझ जाते होंगे ऐसी मीडिया को देखकर। सवाल राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी के कवरेज में संतुलन का है। बाकी नेताओं के साथ ग़ैर गांधी परिवार या ग़ैर करिश्माई व्यवहार नहीं होना चाहिए। ऐसा करने वाले पत्रकार राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कम चाटुकारिता की तलाश वाले ज्यादा लगते हैं।


एक दिन यही राहुल गांधी कह देंगे कि मीडिया अपना काम ठीक से नहीं करता। उसे नेता की नहीं जनता की रिपोर्टिंग करनी चाहिए। देश की हालत दिखानी चाहिए। मीडिया नहीं दिखाता इसलिए उन्हें लोगों के घरों में जाना पड़ता है। क्यों नहीं मीडिया को अखिलेश,मायावती,अजित सिंह में करिश्मा नज़र आता है? क्या ये तीनों बिना करिश्मा के ही राजनीति में डटे हुए हैं? पत्रकारों से समझदार तो राहुल गांधी निकले जो मायावती और कांशीराम की तारीफ कर दी। शायद राहुल गांधी ने कांशीराम से ही सीखा हो कि गंभीर राजनीति करनी है तो ऐसी हल्की और बेपेंदी की मीडिया के भरोसे मत रहो। ज़मीन पर जाओ। धक्के खाओ। इंटरव्यू के चक्कर में मत पड़ो। चार संपादकों के चक्कर में पड़े रहने से अच्छा राहुल को लगता होगा कि बनारस के किसी रेस्त्रां या चाय की दुकान में चाय पी ली जाए। कम से कम उसके आस पास के लोग बात तो करेंगे कि यहां नेता जी आए थे। रही बात मीडिया की तो उन्हें मोबाइल में रिकार्ड कर फुटेज दे दो। एक्सक्लूसिव बनाकर दिखा देंगे। इतना वक्त और संसाधन लगाने के बाद भी एक भी जगह पर राहुल या प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति की बारीकियों को समझाने वाली रिपोर्ट नहीं दिखी। वो भी शाम को टीवी खोल कर बंद कर देते होंगे कि इतना घूमा मगर ये भाई लोग सिर्फ हमारे आकर्षण में ही खोए रहे।

इसीलिए टीवी के ज़रिये आपको चुनावों की समझ कभी नहीं मिलेगी। आपको कई चैनल और अखबार ढूंढने होंगे तब जाकर पांच से दस प्रतिशत की ही जानकारी मिलेगी। बाकी जो हो रहा है वो कैमरों के बाहर हो रहा है। प्रधानमंत्री कब बनेंगे और राजनीति में कब आयेंगे, पूछने के लिए यही दो सवाल हैं इनके पास। हद है। क्या प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में नहीं है? नहीं होतीं तो वो पिछले कई बार से चुनाव प्रचार का काम क्यों संभाल रही होतीं? क्या राहुल गांधी बता देंगे कि जी मैं परसों प्रधानमंत्री बनूंगा? वो लालू यादव नहीं हैं कि यह कह दें कि मैं बनना चाहता हूं। अफसोस यही है कि ये सारे चाटुकारिता करके भी राहुल गांधी के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। हर नेता चाहता है कि पत्रकार उसकी राजनीति को गंभीरता से ले। मीडिया के लिए राहुल गांधी बाइट प्रवक्ता बन कर रह गए हैं। रिपोर्टिंग की लाश पड़ी है। हम सब कुचल कर चले जा रहे हैं।

अंकिल टैम के आउटपुटियों का युवराज

अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि न्यूज़ चैनलों पर युवराज सिंह की श्रद्दांजलि लिखी जा रही है या जीवनी। ध्यान से देखने पर इन दोनों का मिश्रण दिखाई पड़ रहा है। वीर रस के भाव में सब कुछ कहा जाने लगा है। इसमें देशभक्ति के रस भी नज़र आते हैं। काल को हराकर नियतिवाद से होड़ भी है। युवराज सिंह की बीमारी ने क्रिकेट प्रेमियों को सन्न किया है। मगर न्यूज़ चैनल वाले ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे कैंसर युवराज को नहीं,उन्हें हो गया है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का वो दाद खाज खुजली जैसा चित्रण कर रहे हैं। सारे अस्पतालों के कैंसर और कीमो विशेषज्ञ बुला लिये गए हैं। जैसा कि गंभीर बीमारियों के समय सामान्य मरीज़ बर्ताव करता है उसी तरह से चैनलवाले भी कर रहे हैं। वैद्य,ओझा और बाबा रामदेव भी बाइट दे रहे हैं। एक आम मरीज़ भी यही करता है। अपोलो से दिखा कर सीधा वैध और होम्योपैथी के पास जाएगा। फिर किसी के कहने पर टोटका भी करेगा। युवराज सिंह पर जो रिपोर्टिंग हो रही है, इस तरह की पहले भी कई बार हो चुकी है। सोनिया गांधी के समय भी ग्राफिक्स और एनिमेशन के ज़रिये और स्थानीय डाक्टरों के अंदाज़ी टक्कर प्रवचनों के सहारे टीआरपी बटोर ली गई थी। अब युवराज के बहाने यही काम हो रहा है। कोई अपवाद नहीं है। सब एक ही तरह से रिपोर्ट कर रहे हैं। बैकग्राउंड स्कोर ऐसा है जैसे सिनेमा में नासिर हुसैन को हार्ट अटैक होने पर सुनाई पड़ता था। पता नहीं कोई मेडिकल का छात्र इस तरह की रिपोर्टिंग को कैसे देखता होगा। भावुक परन्तु चीखू मार्का वायस ओवर से हरारत तो उठने ही लगती होगी। कंठ दबोच के बोलने वाले फिर से लौट आए हैं। काल से होड़ कर रहा है फाइटर। जल्दी लौटेगा कैंसर को हराकर युवराज। बाप रे बाप।

अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों एक ही भाव से रिपोर्ट कर रहे हैं। बात ये है कि हम अंग्रेज़ी में हर चीज़ अच्छी मान लेते हैं। मगर वहां भी खिलाड़ी से लेकर डॉक्टर तक कैंसर पर बता रहे हैं। कैंसर अब पहले जैसे असाध्य नहीं रहा। मगर चर्चा होनी थी तो इस बात पर भी होती कि हमारे डाक्टरों का क्या हाल है। जब युवराज जैसी हस्ती की बीमारी का पता चलने में इतनी देर हो सकती है तो आम आदमी का कितना नुकसान होता होगा। चर्चा इस पर भी हो सकती थी कि कैंसर क्यों फैल रहा है? ऐसे मौके पर बहुत सारे नशेड़ी गंजेड़ी कहने लगते हैं कि देखिये युवराज तो नियम से रहता होगा,फिर भी कैंसर हो गया तो हम तंबाकु बीड़ी क्यों छोड़ दे। बहुत सारे लोग मिलते हैं जो कैंसर को लेकर काम करते हैं। अपना कार्ड देते हैं,कहते हैं कि भाई साहब कुछ कीजिए। जागरूकता के लिए। ऐसे कार्ड और मुद्दों की कोई पूछ नहीं रह गई है। अब तो वहीं मना कर देता हूं। बता देता हूं कि आप ही समझा दीजिए मुझे कि स्पीड न्यूज़ और डिबेट से कैसे जागरूकता फैलती है।

यह लेख दर्शकों से संवाद के लिए हैं। युवराज पर तमाम तरह के रसों में लिखने और स्पेशल बनाने वाले आउटपुटियों को हतोत्साहित करने के लिए नहीं हैं। जब भारत अंकल सैम के आगे नतमस्तक हो जाता है, तो मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले आउटपुटिये अंकल टैम( टैम मीटर) के आगे सलाम क्यों न बजाए। बल्कि उन्हें यह काम शान से करना चाहिए। जब हम सबकी प्रतिबद्धता रेटिंग ही है तो उसे लेकर शर्मिंदा कब तक रह सकते हैं? रेटिंग पर अब प्रबंधन बोले, बेऔकात पत्रकार क्यों स्टैंड लेता चले। अब काम से कोई मतलब नहीं है। काम वही है जो रेटिंग ला दे। जिनके घर अंकल टैम का मीटर नहीं है ऐसे दर्शकों को जल्दी भगाना शुरू कीजिए। कह दीजिए कि भाई जब आपके लिए हम काम ही नहीं करते हैं तो क्यों बकवास सुने। अगर कोई अंकल टैम का मीटर वाला भतीजा बोलेगा तो उसकी सुनेंगे। छक कर ऐसे प्रोग्राम बनाइये। जिसको हिन्दी चैनल ख़राब लगते हैं वो तमिल देख लें। अंग्रेज़ी के देख लें । कम से कम हिन्दी वाले ख़राबे में भी सृजनशील तो हैं ही। ग़ैरत मारकर रोते हुए आपके लिए ऐसे कार्यक्रम तो बना ही देते हैं जिन्हें देखकर आप हंस तो सकते ही हैं। मैं भी युवराज का फैन हूं। क्रिकेट नहीं देखता मगर यह कहीं नहीं लिखा है कि युवराज का फैन होने के लिए क्रिकेट देखना ही पड़ेगा। मैं भी चाहता हूं कि युवराज स्वस्थ्य हो जाएं। कैंसर जैसे काल से होड़ कर एक बार फिर से मैदान में आ जाए ये फाइटर। भारत मां का लाल, तुझे कुछ नहीं होगा। पूरा देश दुआएं भेज रहा है। तू लड़ेगा, तू जीतेगा, तू खेलेगा, तू दौड़ेगा, तू बनेगा सरताज,क्योंकि तू है युवराज। जय हिन्द।

खोड़ा ने बेइंतहा मोहब्बत का इनाम दिया है

खोड़ा से फोन आया था। वहां की रिपोर्टिंग के बाद से नहीं गया हूं। रवीश की रिपोर्ट भी बंद हो गई। मगर वहां से फोन आते रहते हैं। एक दिन किसी चाट की दुकान पर पापड़ी चाट खा रहा था। खाने के बाद जब पैसे दिये तो दुकानदार ने इंकार कर दिया। मैं गिड़गिड़ाने लगा कि लोग क्या सोचेंगे कि पत्रकार तीस रुपये की चीज़ भी फ्री में खाने लगे हैं। मंत्रियों की जूतियां उठाने के अलावा। मगर वो नहीं माना। कहने लगा कि मैं खोड़ा में रहता हूं। ये मेरी तरफ से इनाम है। साथ में घर के लिए भी पैक कर दिया हैं,लेते जाइयेगा। बार बार कहने पर भी कि तारीफ कर दी बहुत है। अब धंधे से समझौता मत करो। उसका यही जवाब था कि हमारी बात करने वाले कम हैं। यह हमारा तरीका है खुद को खुश करने का। इसी तरह ऑटो से स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला पहचान गया। नई दिल्ली पहुंच कर किराया लेने से इंकार कर दिया। बहुत मुश्किल हुई। समझाते रहा कि पैसे ले लो। बोला नहीं लेंगे। बल्कि आप कहिये तो आज पूरी दिल्ली फ्री में घुमायेंगे। आपने हमारी बात उठाई है। हम खोड़ा में नरक की ज़िंदगी जी रहे थे। मैंने कहा कि बात ही उठाई है,सरकार ने जो पैसे दिये हैं उससे भी कुछ नहीं होगा। ऑटो वाला नहीं माना। कहा जितना कर सकते थे आपने किया। हम आपसे किराया नहीं लेंगे। बस मोबाइल में एक फोटो हो जाए। दूसरे आटो वाले को बुलाया और उसने दोनों की तस्वीर क्लिक कर दी। आज फिर खोड़ा से फोन आया। पता दीजिए। मैंने पूछा क्यों? जवाब मिला कि हमने आपके लिए पांच फुट का पोस्टर बनवाया है। साईं का अलग से और कृष्ण का अलग से। हंसने लगा कि भाई धार्मिक प्राणी नहीं हैं। कहने लगा कि अरे ड्राइंग रूप में सजा दीजिए। मना करने पर वो मायूस हो गए। फिर फोन आया कि भाई साहब गांव ले जाकर पोस्टर लगा दीजिएगा। मुझसे इतना प्यार संभलता नहीं है।

हम सब रिपोर्टर को लगता है कि क्यों काम कर रहे हैं? दफ्तर में तो एंकर ही प्रमोट होता है। रागदरबार,शिखर और बाबा घोटूं ,घटिया और अनुप्रासिक हिन्दी लिखने वाला आउटपुट वाला ही मालिक बन जाता है। कभी कभी इस बेइंतहा मोहब्बत को देखकर कहने का मन करता है कि रिपोर्टर ठीक से काम करे तो उसे जो प्यार मिलेगा पब्लिक से,उसके लिए आउटपुट वाला और टिव और इंग पदनामानों वाला एडिटर तरस जाएगा। एक रिपोर्टर को यही ढाढस बंधाने की ज़रूरत है। बशर्ते उसे दफ्तर मौका दे। संपादक मौका दे। बिना मौका रिपोर्टर क्या कर सकता है? लेकिन वो अपनी तरफ से इतनी तैयारी तो रखे कि जब भी मौका मिले एक अच्छी कहानी की गुज़ाइश बना दे। खोड़ा के बाद एक मॉल में शर्ट खरीद रहा था। दुकानदार ने कहा कि बीस मिनट ठहर जाइये। देखा कि उसकी बेटी और बीबी भागे भागे आ रहे हैं। दोनों ने मेरे साथ तस्वीर खिंचाई। आप ही हैं जी जिसने खोड़ा पर रिपोर्ट बनाई थी। सही चीज़ थी सर। आपको डर नहीं लगता। मां बेटी इसी तरह की बातें करने लगीं। जब शर्ट लेकर काउंटर पर गया और डेबिट कार्ट दिया तो पर्ची पर पांच सौ रुपये लिखे थे। मैंने कहा कि ये तो कम है। दुकानदार ने कहा कि हमें मालूम है कि आप मुफ्तखोर पत्रकार नहीं हो इसीलिए पांच सौ रुपये लिये हैं। पर शर्ट तो मैंने दो हज़ार की खरीदी है। दो कमीज़ पांच सौ में पटरी पर भी नहीं मिलेगी। उसने पैसे नहीं लिये। कहा कि ये हमारा प्यार है। अगली बार से पूरे पैसे दीजिएगा मगर इस बार ये इनाम हमारी तरफ से। दिल्ली के अतिकुलीन खान मार्केट में ही ऐसा वाकया हुआ। पांच हज़ार की चीज़ ढाई हज़ार में दे दी। कहता रहा कि आप रिपोर्टर की आदत खराब करते हैं। उसने कहा कि मेरी दुकान पर आपकी कंपनी के बड़े बड़े लोग भी आते हैं। दो रुपये कम नहीं करता। आपने खोड़ा के लिए जो किया है उसके लिए इनाम समझिये इसे। उस करोड़पति दुकानदार ने मुझे अपने हाथ से काफी पिलाई। पानी मंगाकर दिया। अगर अब भी ऐसे प्यार को नहीं पाना चाहते हैं तो नुकसान हमारा है। नुकसान हमारे धंधे का है।

खोड़ा के बाद ऐसे कई वाकये हुए। टाटा कंपनी में काम करने वाले एक साधारण से कर्मचारी ने मेरे पड़ोसी के हाथों पांच किलो सत्तू और दो किलो चना भिजवा दिया। यह कहकर कि ओरिजनल आदमी है तो ओरिजनल चीज़ खाए। उसका बॉस जब सत्तू और चना लेकर दरवाज़े पर खड़ा था तो काफी शर्मसार था। पत्नी भी घबरा गई। बोली नहीं ले जाइये। वो भड़क जाएगा। फिर फोन किया कि क्या करना है। मैंने कहा रख लो। सत्तू और चना भिजवाने वाला मुझे क्या खरीदेगा। अपने हिस्से में से ही निकाल कर दे रहा है। खोड़ा की रिपोर्टिंग के बाद लोगों ने तरह तरह से शुक्रिया अदा किया। कोई बीच रास्ते से कार मोड़ कर आ गया तो किसी ने बीच रास्ते में ही कार रोक दी। एक मॉल में एक महिला ने अपने खड़ूस पति का हाथ छुड़ा लिया और दौड़ कर चली आई। बुलाती रही कि तुम आ जाओ, आया ही नहीं. लेकिन वो आई और शुक्रिया अदा कर गई। स्टेशन पर एक वृद्ध सज्जन मुझे देखकर भावुक हो गए। कहा कि ज़िंदा आदमी लगते हो। पत्रकारिता का यही मतलब होता है।

रवीश की रिपोर्ट को बंद हुए अब साल होने को आ रहा है। मगर आज भी लोग ट्वीट पर आते ही पहला सवाल यही करते हैं कि कब शुरू करेंगे। मैंने कुछ सोच कर तो शुरू नहीं किया था और न ही मैंने बंद किया। उस रिपोर्ट को जनता और रेटिंग दोनों ने काफी पसंद किया था। ज्यादातर रिपोर्ट रेटिंग चार्ट में हिट ही रही। दफ्तर की ज़रूरतें व्यक्ति की भूमिका और ज़रूरतों को परिभाषित करती रहती हैं। लेकिन उसकी वजह से लोगों का जो प्यार मिला,मेरा दिल अब भी कहता है कि ज़मीन से लाई गई बेहतरीन रिपोर्ट के लिए अब भी जनता भूखी है। वो अपना सबकुछ लुटाने के लिए तैयार है। वो अब एंकर और रिपोर्टर के बीच के फर्क को भी समझती है। हम बदलाव में छोटा सा योगदान तो कर ही सकते हैं। लेकिन अब तो जिससे मिलिये इस धंधे में या तो सरकार का दुलरूवा न पाने का अफसोस करता है या फिर कहीं सेटिंग में लगा हुआ है। रिपोर्टर और एंकर भयंकर अहंकार से भरे पड़े हैं। इतने अहंकारी पुरुषों और स्त्रियों से मैं भी टकराते टकराते बदलने लगा हूं। पता है कि सही नहीं है। मैं बदलूंगा भी नहीं लेकिन उस वक्त जब ऐसी नकारात्मक ऊर्जा निकलती हुई पास आती है तो मेरे कपार से भी भन्ना कर निकल जाती है। भायं भायं करने वाले ये भौकालेंकर( एंकर का नया नाम) ज़रा अहंकारों की दुनिया से निकले। अपने दफ्तरों में थोड़ी सी जगह मांगे मिट्टी की रिपोर्ट लाने की। जो जहां है और जितना भी मौका मिल सकता है, उसका सदुपयोग करे तो यह फील्ड वाकई मज़ेदार है। ठीक है कि कोई मंत्री नहीं बुलाता चाय पर मगर फ्री में कोई चाट खिलाने वाला तो है न। बस हम सब एक अच्छा रिपोर्टर बने रहे। मुझे पूरा यकीन है इस तरह के संस्मरण तमाम रिपोर्टरों के होंगे जिन्होंने कभी न कभी अच्छी रिपोर्टिंग की होगी या कर रहे होंगे। वर्ना प्रमोट तो कुत्ता भी अपनी गली में हो जाता है। प्रमोशन जीवन नहीं है। सेटिंग कर रोस्टर प्रभारी बन जाना पत्रकारिता नहीं है। ऐसे लोगों से पेशेवर संबंध इन्हीं कामों के लिए ही रखना चाहिए। लोगों के बीच घूमिये, देखिये और दिखाइये।

कहां गए अन्ना के लोग

रामलीला मैदान में जमा भीड़ को लेकर फासीवाद से लेकर सांप्रदायिकता के जितने भी ख़तरे बताये गए थे वो सब ग़ायब हो गए। इस भीड़ को लेकर जितनी भी उम्मीदें बताई गई थी वो भी हवा हो चुकी है। मोबाइल फोन में बहुत सारी तस्वीरें दुबकी हुई थीं। अन्ना के विभिन्न देवों अवतार से लेकर जूस के ठेले से लेकर झुर्रीदार गालों के ऊपर तिरंगे के कारोबार तक की तस्वीरें हैं। यह सब सिक्वेंस में सजा दी गईं हैं ताकि आप एक पुरानी शो रील की तरह देख सकें। समय एक भंडारा है। उसके भंडारे में जाने कितने अनाज समा कर खप गए पता नहीं। उम्मीद है आपको ये सिक्वेंसिंग पसंद आएगी।






















मयूर विहार में पत्रिका विहार



यमुनापार की सबसे बड़ी मैगज़ीन की दुकान है। जितने भी क्लियरिंग एंड फारवार्डिंग एजेंट हैं वो सब यहां अपनी पत्रिका दे जाते हैं। प्रदीप संकोच में बता रहा था। मैं अपने आई फोन से तस्वीरें उतारने और उसकी बातों को सुनने में लगा था। वो कुछ शक कर रहा था कि कहीं भाई साहब एमसीडी वाले तो नहीं हैं। टैक्सुआ अफसर तो नहीं हैं। घबराहट में वो कम बता रहा था। लिहाज़ा मैं देखने लगा और जो दिखा उसके बारे में पूछने लगा।



मयूर विहार के समाचार अपार्टमेंट के पास के मार्केट की पटरी पर पत्रिकाओं का अंबार आपको दिखेगा। ऐसी पटरियों में या तो चाय की दुकानें खुलते खुलते एक कड़ी में बन जाती हैं या फिर सिगरेट, ब्रेड,अंडा और चिप्स की दुकानें। मगर उसी पैटर्न पर मैगज़ीन की तीन तीन दुकानें आबाद हो जाए तो इलाकावार दुकानों के फलने-फुलने का ट्रेंड समझा जा सकता है। अठारह साल पहले प्रदीप बिहार से आया था। तब पत्रिकाओं की छोटी सी दुकान थी। पत्रिकाएं भी कम थीं। अब तीन दुकानें हैं। बीच में पान बीड़ी सिगरेट का स्टाल इस तरह से है जैसे पेमेंट काउंटर लगता है। मगर वो भी अपने आप में एक दुकान ही है।



इन पत्रिकाओं ने पटरी को काफी खूबसूरत बना दिया है। खंभे और पेड़ के तने पत्रिकाओं के पोस्टर में लिपटे नज़र आते हैं। प्रदीप ने कहा कि एक स्टाल पर तीन सौ से अधिक पत्रिकाएं हैं। हम योजना भी रखते हैं और इंपैक्ट भी। प्ले ब्वाय भी। मगर सबसे अधिक इंडिया टुडे बिकती है। हर हफ्ते पचास कापी तो निकल ही जाती है। समाचार अपार्टमेंट से ज़्यादातर पत्रकार रहते हैं। उसके आस पास भी पत्रकार भी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट से नज़दीकी के कारण मयूर विहार में बड़ी संख्या में वकील भी रहते हैं। मगर वकीलों की कोई भी पत्रिका नज़र नहीं आई। पूरे स्टाल को देखना कई तरह के कवर डिजाइनों से गुज़रना था। ऐसा लग रहा था कि कई स्टार मयूर विहार की इस पटरी पर अपनी नुमाइश कर रहे हैं। प्रदीप कह रहे थे कि सारी पत्रिकाएं बिकती हैं। धार्मिक भी और साहित्यिक भी। इसलिए हंस, समयांतर और नया ज्ञानोदय आदि आदि। आप पाठकों में से अगर कोई मयूर विहार वासी है तो अधिक जानकारी जुटाकर ज़रूर कमेंट छोड़ दे। आप यहां पत्रिकाओं की दुनिया में विहार कर सकते हैं। इस तरह की दुकान आपको दिल्ली के कुलीन खान मार्केट में ही दिखेगी। मगर यमुना पार के सबसे बड़े मैगज़ीन स्टाल होने की शेखी शायद कुछ और ही होगी। है न।