एक रिश्वतदाता का समाजशास्त्र

दिल्ली से इंदौर जा रहा था। जेट लाईट की फ्लाईट में विंडो सीट मिल गई थी। बगल में एक मोटा सा शख्स आ कर अपने आप को कुर्सी के बीच में ठूंस दिया। थोड़ी देर बर्दाश्त किया फिर मुझसे कहने लगा कि आप ज़िन्दगी में थोड़े समझौते कर लो। पैसा बरस जाएगा। मन नहीं था लेकिन बात करने लगा कि आपको कैसे पता कि मैं समझौते नहीं करता। नौकरी करने वाला कोई भी शख्स यह बोले कि समझौता नहीं करता तो वो नब्बे फीसदी से ज्यादा झूठ बोलता है। मोटा आदमी हंसने लगा और मेरी हथेली से पवन वर्मा की किताब भारतीयता की ओर निकाल कर रेखाओं को बांचने लगा। कहा कि ये सब पढ़कर क्या होगा।

जब तक बातचीत औपचारिक से अनौपचारिक होती उससे पहले ही वो अपनी अंगूठे के नाखून से हथेली की रेखाओं को खुरचने लगा। बोला ये देखिये फेट लाइन यहां से मुड़़ कर यहां जुड़ गई और यहां से मुड़ रही थी तो आपने ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मौका गंवा दिया। मैं सोचने लगा कि वो कौन सा मौका होगा। फिर देखा कि मोटा आदमी हथेली को रगड़ ही रहा है। रहा नहीं गया तो बोल दिया कि लगता है आप आज किस्मत खोद कर निकाल ही लेंगे। वो हंसने लगा। हंसमुख था। बोला कि आदर्श एक बेवकूफी है। आप बिजनेस करो। सब समझ में आ जाएगा। मोटा आदमी खुद को हस्तरेखा विशेषज्ञ बताने लगा और कहा कि देखिये मेरी हथेली। बाप ने कहा कि खोटा सिक्का है लेकिन मैं साल में पंद्रह करोड़ कमाता हूं। दस से बीस करोड़ रुपये तक रिश्वत देता हूं। उत्तर भारत के सभी राज्यों के अफसरों और नेताओं को घूस खिलाई है। बस इस स्वीकृति से उससे दोस्ती जम गई। ऐसी आत्मकथा पहली बार सुन रहा था। वैसे एक शख्स को जानता हूं जो हर दिन तीन हज़ार रुपये रिश्वत देते हैं और देने के बाद उसके दफ्तर में आरटीआई लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई भी करवाते हैं। खैर, मोटे आदमी को मालूम नहीं था कि मैं न्यूज़ रिपोर्टर हूं। वो टीवी और अखबार में अपना टाइम बर्बाद नहीं करता। उसका मानना था कि मीडिया से कुछ नहीं होता। रिश्वत ही जड़ है और रिश्वत ही परिवर्तन है।

रिश्वत की खूबी बताते हुए मोटा आदमी मेरी हथेली को थामे रखा। फिर कहने लगा कि फलां मुख्यमंत्री के भाई को चार करोड़ दी। उन्होंने चालीस करोड़ का काम दे दिया। फलां अफसर का तीन करोड़ फंसा था तो मैंने दे दिया। बस मुझे सौ करोड़ का काम मिल गया। मेरे पास साल का सात सौ करोड़ का काम है। मैं साल में कई करोड़ तो रिश्वत देता हूं। तीन-चार करोड़ रुपये तो लोग मेरा मार लेते हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता जी। मैंने पूछा कि आप मुझसे ये सब क्यों कह रहे हैं? तो उसने ऊर्जा समन्वय समझाना शुरू कर दिया जैसे मैं किसी भगवान का अवतार हूं। कहा कि आपको देख ही लगा कि एनर्जी मैच करती है। फिर उसने कहा कि देखिये सुबह कानपुर से चला हूं। कार से। इस फ्लाईट से इंदौर जा रहा हूं। वहां से टैक्सी लेकर तीन चार घंटे चलकर औरंगाबाद जाऊंगा। वहां सुबह दस बजे की मीटिंग है। वहां एक अफसर को पांच करोड़ रुपये रिश्वत दूंगा और पचास करोड़ के काम लूंगा। फिर लौट कर इंदौर आऊंगा और इसी जहाज से वापस दिल्ली और दिल्ली से सुबह की फ्लाईट लेकर गुवाहाटी। वहां तीन दिन रहना है। तीन करोड़ फंसा हुआ है। वो लेकर कानपुर आऊंगा और एक पार्टी को दे दूंगा। जब वो अगले दिन रात को इंदौर एयरपोर्ट पर मिला तो उसके हाथ में गुवाहाटी का टिकट था। कहा कि मैं साल में तीन सौ विमान यात्राएं करता हूं।

खैर वापसी में वो मेरे बगल में नहीं बैठा था। मगर दिल्ली से इंदौर जाने के रास्ते में वो बकता ही रहा। जब फिर से रहा नहीं गया तो कह दिया कि आप ये सब एक पत्रकार को क्यों बता रहे हैं? थोड़ी देर रूका और फिर कहा कि मैंने बोला न कि आप सही आदमी मालूम पड़ते हो। एनर्जी मैच करती है। कहता ही जा रहा था, बीच-बीच में मेरी हथेली खुरच कर बोले जा रहा था कि उम्र नब्बे साल की होगी। जीवन में शोहरत नहीं है। संघर्ष है। जिद्दी न बनें। दफ्तर में शत्रु है जो एक दिन पराजित हो जाएंगे। मगर नए शत्रु आ जायेंगे। संपर्क में रहिए। लोगों से मिलिए। पैसा आएगा। रिस्क लीजिए। पत्रकारिता में क्या रखा है?
मोटा आदमी कई आईएएस अफसरों के बारे में बता रहा था। कई नेताओं के बारे में बताया। बोला कि देने और लेने में संकोच मत करो। मैंने कहा कि आपको डर नहीं लगता। बोला कि देखिये मैं पकड़ा भी गया तो रिश्वतखोरी बंद नहीं होगी। मेरी जगह कोई और आ जाएगा। जब तक मैं पकड़ा नहीं जाता हूं तब तक कमा लेने में हर्ज क्या है। मेरे पिताजी रामायण का पाठ करते हैं। रिटायर करने के बाद पेंशन नहीं ली। ऐसी बात नहीं है कि हम ईमानदार लोग नहीं है। मगर हम प्रैक्टिकल लोग है। धर्म और फर्ज का तेल हो रहा था और मेरे दिमाग का भुर्ता। इंदौर एयरपोर्ट पर उसने कहा कि आपने मेरे चेहरे पर थकान देखी। मैंने कहा नहीं। बोला कि कभी नहीं देखेंगे। पैसा मिलता है तो थकान नहीं होती। आप मेरे संपर्क में रहा करो। मुझे पूरा यकीन है कि एक दिन मैं आपके काम आऊंगा। तब से मेरी नींद उड़ी जा रही है। क्योंकि उसने कहा कि डेस्टनी में लिखा है कि हम और आप फिर मिलेंगे। हे भगवान अगर कहीं हो तो मुझे महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनवा दो लेकिन उस आदमी से मत मिलवाना। हंसमुख रिश्वतवादा से। थोड़ी देर बाद किनारे बैठे शख्स परेशान हो उठे थे। मोटा आदमी उनकी हथेली खुरचने लगा था।

हिन्दी न्यूज़ चैनलों की घड़ी ठीक हो गई क्या?

आज तक से मिलाइये घड़ी। 6 बजे की खबरें ठीक 6 बजे। देखिए आज शाम ठीक 6 बजे। दोपहर में भी चल रहा था कि 2 बजे की ख़बरें 2 बजे। आज बहुत दिनों बाद इस तरह का फ्लैश देखा तो मन गदागद हो गया। कोई अगर तीन महीने बाद अमरीका से लौटा हो और हिन्दी न्यूज चैनल देख रहा हो तो चकरा जाएगा। एक चैनल कहता है कि 2 बजे की ख़बरें 1:57 पर देखिये। कोई चैनल यह कह रहा है कि 2 बजे की ख़बरें 2 बजे देखिये। पूछेगा ही कि हो क्या रहा है। 2 बजे की खबर 2 बजे नहीं देखते हैं तो कब देखते हैं और अब क्यों कह रहे हैं कि इस बजे की ख़बर इसी बजे देखिये। पता नहीं हिन्दी न्यूज चैनलों के इस टाइम ज़ोन को बदलने की शुरूआत किस चैनल ने की, इसकी सूचना नहीं है। मगर लोग कहते हैं कि तीन मिनट पहले खिसकाने की शुरूआत आज तक ने ही की थी। शुरू में 9 बजे की ख़बरें एक मिनट पहले आने लगी। फिर धीरे-धीरे टीआरपी पंडितों ने कहीं से फार्मूला निकाला कि हम दो मिनट पहले ही शुरू कर देते हैं तो इस खेल में और इसकी चपेट में सारे चैनल आ गए। मुझे भी अपनी रिपोर्ट का वक्त बताने में तकलीफ होती है। लोगों को 9:28 बजे का समय बोध कराते यानी रटाते-रटाते थक गया हूं। अगर आज तक के इस प्रभाव में ये तकलीफ दूर हो जाए तो खुशी होगी। वर्ना मैंने तो इस उम्मीद में इसी ब्लॉग पर लेख दिया था कि जल्दी ही 2 बजे की ख़बरें 1:30 बजे होने लगेंगी। पर हिन्दी न्यूज़ चैनलों की एक सबसे बड़ी ख़ूबी पर किसी की नज़र नहीं गई है। वो ख़ूबी यह है कि यहां हर बुराई अस्थाई है। अस्थाई बुराइयों का ऐसा सिलसिला है जो टूटता नहीं बल्कि स्वरूप बदलता रहता है।

तो आज तक पर नज़र पड़ते ही मुझे दो,तीन और चार बजे जैसे समय बोध की सम्मान वापसी पर खुशी हुई। किसी ने बताया कि आज तक ने यह भी कहा कि सोच कर देखिये कि अगर दो बजे की फ्लाईट तीन मिनट पहले उड़ जाए तो क्या हो। अगर वाकई ऐसा चला है तो इस आइडिया के अन्वेषक को बधाई। काश पहले ही सोच कर सोच लिया गया होता। ट्रको पर लिखा होता है सोच कर सोचो साथ क्या जाएगा। चलिये अब ख़बरों की उड़ान तीन मिनट पहले शुरू नहीं होगी। यह सब बदलाव साबित करते हैं कि टीआरपी और उसका अध्ययन-विश्लेषण पूरा फ्राड मामला है। एक्ज़िट पोल की तरह। काश इसे कोई चुनाव आयोग टाइप की संस्था बंद करवा देती। वैसे स्वीस कंपनी के साथ मिलकर एक नई घड़ी बनानी की मेरी योजना पर पानी फेर दिया है आज तक ने। मैं एक ऐसी घड़ी बनवा रहा था जिसमें 12 की जगह 11:57 और 9 की जगह 8:57 लिखा होता। दुनिया की पहली घड़ी होती तो हिन्दी न्यूज़ चैनलों के हिसाब से होती। ख़ैर। कोई पहली बार नहीं है जब कोई सपना टूटा हो।

उम्मीद की जानी चाहिए कि परम अनुकरणीय आज तक की इस पहल का सब अनुकरण करेंगे। उसका असर मेरी रिपोर्ट के समय पर भी होगा। IBN-7 पर तो एक विज्ञापन भी देखा। न धोनी न सहवाग। देखिये शाम 6:30 बजे। मेरी खुशी और दुगनी हो गई। IBN-7 ने यह नहीं कहा कि देखिये शाम 6:27 बजे। लेकिन स्क्रोल के स्पेस पर चल रहा था नो एंट्री-6:27 बजे। मेरी खुशी उतर गई। थोड़ा तो वक्त लगेगा वक्त को सुधरने में। इंतज़ार कर लेंगे। इंडिया टीवी पर लेख लिखे जाने के वक्त फ्लैश आ रहा था-गंभीर बेच रहे हैं-7बजे। पता नहीं तीन मिनट पहले ही बेचने लगे या फिर ठीक सात बजे से बेचने लगे। देख नहीं सका। वैसे हिन्दी चैनलों के बीच नकल को लेकर हमेशा से स्वस्थ प्रतियोगिता रही है। मैंने कभी नहीं सुना कि कोई चैनल दूसरे चैनल को डांट रहा हो कि स्पीड न्यूज़ मैंने शुरू की तो आपने नकल क्यों की? बल्कि सब इस बात में खुशी होते हैं कि देखा नकल हो रही है,मेरा आइडिया सही था। इसीलिए हम अलग उत्पाद की खोज सिर्फ अपने लिए नहीं करते,औरों के लिए भी करते हैं। किसी बिजनेस में आपने ऐसी स्वस्थ प्रतियोगिता देखी है?

जल्दी ही मैं एनबीए नाम की संस्था से मांग करने वाला हूं कि न्यूज़ चैनलों को ट्रैफिक रेगुलेटर की भी ज़रूरत है। कुछ ख़बरों की रफ्तार इतनी तेज हो चुकी है कि चेतना के स्तर पर दुर्घटना होने का ख़तरा है। स्पीड न्यूज़ की रफ्तार तय होनी चाहिए। जब कारों के लिए स्पीड ब्रेकर है तो न्यूज़ के लिए क्यों न हो। निर्बाध गति से खबरों की रफ्तार नहीं होनी चाहिए। स्पीड न्यूज़ में लगने वाले क्लच ब्रेक और रगड़ खाते चक्कों की आवाज़ से उत्तेजना फैलती है। स्पीड न्यूज़ देखने के बाद हो सकता है कि कोई अपनी कार की रफ्तार तीन गुनी तेज़ कर दे। सारी दूरियां तीन मिनट में तय कर लेने के लिए। संपादक योग शक्ति से अपनी क्षमता का विकास कर लें। तीन मिनट में तीन सौ खबरों पर फैसला देने का। उप संपादक और संवाददाता तीन सेकेंड में तीस ख़बरों के निर्देश सुनने और समझने की क्षमता का विकास कर लें। नहीं कर सकते हैं तो मुझसे कहिए। मैं आईआईटी रूड़की जाकर लिप्स्टिक से एक न्यूज़ मानव तैयार करता हूं। जो फिजिक्स को भी बदल देगा कि खबरों की रफ्तार प्रकाश और ध्वनि से भी तेज़ होती है। क्या करें? हिन्दी न्यूज़ चैनलों के पास वक्त कम है। धीरज भी कम है। उन्हें सुपर सोनिक स्पीड की तलाश है ताकि तीन हज़ार ख़बरें एक ही मिनट में निपटा कर स्वर्ग और सेक्स जैसे विषयों में वक्त लगा सकें। इसके लिए टाइम और स्पीड दोनों ज़रूरी हैं। वैसे मैं 2010 को हिन्दी न्यूज़ चैनलों के सुपर-सोनिक वर्ष के रूप में मनाना चाहता हूं।

(लिप्स्टिक का संदर्भ यह है कि रूड़की में एक प्रतियोगिता हो गई। लड़कों ने लड़कियों के होठों पर अपने दांतों के बीच दबी लिप्स्टिक लगा दी,न्यूज़ चैनलों ने मार कर दिया,कालेज प्रशासन ने लिप्स्टिक रोगन प्रतियोगिता में शामिल अधर-द्वय को सस्पेंड कर दिया,बहुत नाइंसाफी है)

सिन्दूर के तीस रंग



मध्यप्रदेश के ओरछा में राम राजा मंदिर के बाहर बिक रही सिन्दूर की कठौतियों की तस्वीर है। दुकानदार ने बताया कि पिछले दो दशकों से देहात की औरतें साड़ी के रंग से मिलान करके सिन्दूर लगाने लगी हैं। ये रंगोली बनाने के लिए अबीर-गुलाल नहीं हैं बल्कि सिन्दूर ही हैं। ओरछा के राम राजा मंदिर में देहातों से महिलाएं आती हैं। अपने साथ ग्रे, ब्लू, बैंगनी और गुलाबी रंग के सिन्दूर खरीद कर ले जाती हैं। सिन्दूर का लाल रंग भी कई वेरायटी में मिलता है। कत्थई से लेकर सुरमई और गाढ़ा लाला। तीस से अधिक प्रकार के रंग दिखे। पता करने की कोशिश की कि कहीं सीरीयलों का असर तो नहीं हैं लेकिन यहां बिजली की कमी और भयंकर गरीबी के कारण कई घरों में टीवी नहीं है।

राजशाही चूल्हा



उत्तरप्रदेश के मुज़फ्फरनगर के मोहम्मदपुर जाट गांव गया था। बीस बीघे के जोतदार एक मुस्लिम परिवार का चूल्हा है। चूल्हे की बनावट मुगलकालीन महलों से मिलती है। बीच के खंभे की शक्ल महलों के खंभे से मिलती है। चूल्हे की एक छत है जिस पर बर्तन रखे गए हैं। छत पर छज्जे भी बने हैं। पूरी तरह से एक किले का रूप झलकता है। राजशाही चूल्हा लगता है। इन चूल्हे में रात भर उपले की हल्की आंच में दूध रख दिया जाता है। जिससे घी और मलाई बनती है। छाछ भी सुबह सुबह तैयार हो जाती है। रसोई के आस-पास का माहौल गोबर से लीप कर साफ कर दिया गया है। बाकी भोजन बगल के छोटे चूल्हे में तैयार होता होगा।

एक कमरा हो सपनों का











मुज़फ़्फ़रनगर के मालेरी गांव गया था। वहां एक दलित परिवार की बेटी मोनिका से मिलना था। मोनिका के पिता ट्रक से सामान उतारने की मज़दूरी करते हैं। एक कमरे में छह वयस्कों का परिवार रहता है। मगर कमरे की सजावट बता रही थी कि अपने घर को सुन्दर रखने की जिज्ञासा कितना कलात्मक बना देती है। दस बाई दस फुट के इस कमरे की सजावट देखने लायक थी। हर कोना साफ। एक छोटा सा पंखा लटका था उसे भी पुरानी साड़ी से लपेट दिया गया था। कमरे की छत खराब थी। इसलिए उसे छुपाने के लिए पुरानी साड़ी का इस्तमाल किया गया है। जैसे शामियाने में करते हैं। छत की सुन्दरता देखने लायक रही। अंबेडकर,करीना,कृष्णा और कैटरीना सबकी तस्वीर थी। घड़ी भी है। टीवी और डीवीडी प्लेयर भी। मोनिका कहती है कि वो और उसके भाई चाहते हैं कि घर हमेशा साफ-सुथरा रहे। हालांकि गांव में व्यापक स्तर पर गंदगी का राज हो गया है। इसका कारण यह है कि गांव-गांव में पक्के मकान बिना योजना के बनने लगे हैं। नाली के पानी की निकासी का सार्वजनिक इंतज़ाम नहीं है। प्लास्टिक के टेट्रापैक औऱ गुटका के पाउच से कचरे का ढेर जमा हो रहा है।

खोमचाप्लेक्स- सिनेमा का नया अड्डा



पूरे देश में खोमचाप्लेक्स की मौजूदगी पर किसी की निगाह नहीं गई। खोमचाप्लेक्स मल्टीप्लेक्स के बरक्स गली-गली में पसर गया है। पान,बीड़ी,गुटका,चिप्स,बिसलरी,माचिस,बिस्कुट जैसी तमाम एफएमसीजी उत्पादों को बेचने वाले खोमचे सिनेमा हॉल का काम कर रहे हैं। बीच में टीवी रखा होता है जिसमें केबल या डीवीडी के ज़रिये या तो कोई फिल्म चल रही होती है। जब फिल्म नहीं चल रही होती है तो कोई म्यूज़िक वीडियो या फिर रामायण महाभारत का प्रसारण चल रहा होता है। पान खाने आए या बेकार घूम रहे लोग पांच-दस मिनट के लिए खड़े हो जाते हैं और संवाद में ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि होश ही न रहे कि घर भी जाना है। ये लोग मुफ्त का सिनेमा देखने का कोई मौका नहीं छोड़ते। पता नहीं अभी तक किसी खोमचेवाले को ये आइडिया क्यों नहीं आया कि वो एक या दो रुपये की उगाही भी कर ले। मध्यप्रदेश के ओरछा में जिस भी दुकान पर गया वहां टीवी लगा देखा। आठ-दस लोगों से गुमटी घिरी रहती थी। लोग तल्लीन होकर सिनेमा देख रहे थे। पूरी फिल्म देखने का सब्र भले ही इक्का दुक्का में हो लेकिन दर्शकों का एक तबका इस तरह से भी सिनेमा देख रहा है।

मोहल्ला,जनतंत्र और यात्रा द्वारा प्रायोजित बहसतलब में अनुराग कश्यप ने कहा था कि फिल्म मेकिंग की एक बड़ी प्रोब्लम है, इंटरवल। ताकि इंटरवल के दौरान एफएमसीजी उत्पादों की बिक्री हो सके। दर्शक टिकट के साथ पॉपकार्न और कोक पर भी खर्च करे। अब तो कई हॉल में चिकन नगेट्स भी मिलने लगे हैं। टिकट चेक करने वाला सीट पर ही मेन्यू लेकर आ जाता है और डिलिवरी कर देता है। खोमचाप्लेक्स में ऐसा नहीं है। सामान के बिकने के लिए इंटरवल की ज़रूरत ही नही हैं। फिल्म देखते हुए सामान खरीद सकते हैं या फिर सामान खरीदते हुए फिल्म देख सकते हैं। खोमचाप्लेक्स ज्यादा लचीला है। आप कभी भी किसी भी प्वाइंट से सिनेमा देख सकते हैं और बिना बताये एक्ज़िट मार सकते हैं।

खोमचाप्लेक्स ज्यादातर बी और सी ग्रेड शहरों में लोकप्रिय हो रहे हैं। चौराहों की रौनक अब इन्हीं से गुलज़ार होती है। कुछ खोमचे में व्यक्तिगत दर्शन के लिए टीवी या डीवीडी का इंतज़ाम होता है जबकि ज्यादातर खोमचे सार्वजनिक मनोरंजन के हिसाब से बने होते हैं। इनमें टीवी इस तरह से रखा होता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग देख सकें। लगे कि दुकान के सामने भीड़ है। लोगों को सुनाई दे इसके लिए बड़े-बड़े स्पीकर भी लगे होते हैं। सबसे अधिक भीड़ गीत या मार-पीट या फिर क्लामेक्स के दृश्यों के वक्त होती है। समाजशास्त्री अध्ययन भी कर सकते हैं कि किस तरह के सीन में घुमंतू दर्शक ज्यादा देर तक अटकता है।



ग़ाज़ियाबाद के वैशाली मोहल्ले में भी कई खोमचे या गुमटी में लैपटॉप की साइज़ का डीवीटी प्लेयर रखा देखा। जिसमें केबल टीवी से कनेक्शन भी जुड़ जाता है। लाजपतराय मार्केट से चार से पांच हज़ार रुपये के चाइनीज़ लैपटॉप ने कमाल कर रखा है। इसके ज़रिये दुकानदार सामान बेचते हुए सिनेमा का लुत्फ उठा रहा है। पांच हज़ार रुपये में लैपटॉप की शक्ल का टीवी वो भी डीवीडी युक्त। जो लोग सिनेमा के बाज़ार को खोज रहे हैं उन्हें इन दुकानों के ज़रिये सिनेमा के प्रसारण का सामाजिक अध्ययन करना चाहिए। कम से कम सिनेमा की भूख का लाभ उठा कर कोई चाइनीज़ कंपनी डीवीडी प्लेयर का नया वेराइटी उतारकर पैसा तो बना ही रही है। सिनेमा या सीरीयल की भूख मिटाने के लिए बाज़ार इंतज़ार नहीं करता। वो सामान ले आता है।

दर्शकों के बीच नेता, नेताओं के बीच खेल

राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान स्टेडियम में दर्शकों के बीच सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मौजूदगी की तस्वीरें आपने देंखी होंगी। भारत पाकिस्तान के बीच हुए हॉकी मैच में सोनिया गांधी ताली बजा रही हैं। जीत पर दोनों हाथ उठा कर जश्न में शामिल हो रही हैं। आम तौर पर सार्वजनिक जीवन में अति-गंभीर दिखने वाली सोनिया की यह तस्वीर थोड़ी अलग है। राजनीति में सांकेतिक कार्यों का अपना महत्व है। सवा सौ साल की बूढ़ी कांग्रेस अपने इन्हीं सांकेतिक प्रतीकों के सहारे अचानक जवान लगने लगती है। जबकि कई नौजवान पार्टियों के नेता ऐसे आयोजनों में दिखाई नहीं देते है। उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि जब भी जनता के बीच जायें गंभीरता का लबादा ओढ़ना ज़रूरी है।

शायद यही प्रवृत्ति राजनीति को जीवन से दूर कर देती है। पहलवानी से जीवन शुरू करने वाले मुलायम सिंह यादव भी सुशील कुमार की शानदार कुश्ती देखने जा सकते थे। दर्शकों के बीच बैठकर जब हर दांव पर दाद देते और उन्हें समझाते तो अलग ही माहौल बनता। किताबों में खोये रहने वाले प्रकाश करात अगर किसी दर्शक दीर्घा में होते तो मार्क्सवाद का नुकसान नहीं हो जाता। मायावती अगर महिला तीरंदाजी का मैच ही देख आती तों कम से कम लाखों दलितों में एक नया संदेश तो जाता ही। समाज के विकास के कई मानक हैं। खेल भी एक मानक है। उमर अब्दुल्ला अगर किसी मैच में ताली बजा रहे होते तो पता चलता कि विलय पर सवाल उठा कर वो एक देश के जश्न से बाहर होने का कितना बड़ा मौका खोने जा रहे थे। मध्यप्रदेश में कुपोषण के शिकार बच्चों को अंडा न देने पर अड़े शिवराज सिंह चौहान अगर उन्हें अंडा भी खिला देते और मध्यप्रदेश के खिलाड़ियों के मैच में आकर हौसला भी बढ़ा देते तो राज्य में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता। जनता को प्रोटीन चाहिए। प्रोटीन चाहे दाल से मिले या अंडा से।

आखिर खेलों के दौरान राहुल सोनिया,शीला,भूप्रेंद्र सिंह हुड्डा ही क्यों देखने आए? क्या यह आयोजन कांग्रेस नीत सरकार का था इसलिए? फिल्मों में रुचि रखने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को भी अपनी पूरी पार्टी के नेताओं के साथ किसी स्टेडियम में होना चाहिए था। कम से कम आडवाणी तो ऐसे मौके पर राजनेता की एकरंगी छवि को तोड़ने की कोशिश करते हैं। उन्हें इस बात से झिझक नहीं होती कि कंगना रानाऊत के साथ तस्वीर खिंच जाने पर जनता क्या कहेगी। किताबों और सितारों के आसानी से रिश्ता बना लेने वाला आडवाणी खिलाड़ियों के बीच भी कम जवान नहीं लगते। शुभारंभ समारोह में आडवाणी की मौजूदगी औपराचिक थी। लेकिन अगर वो किसी सामान्य मैच में ताली बजा रहे होते और दोनों उठाकर झूम रहे होते तो खेलों को सही मायने में सार्वजनिक होने का मौका मिलता। अरुण जेटली के अलावा बीजेपी के बड़े नेताओं को भी खेलों में दिलचस्पी दिखानी चाहिए।

ठीक है कि सोनिया और राहुल गांधी ने खेलों के लिए कुछ भी ऐसा बड़ा काम नहीं किया है जिससे स्टेडियम में उनकी मौजूदगी को एक हद से आगे सराहा जाए। सुरेश कलमाडी उसी कांग्रेस की देन है जिनका नाम आजकल राष्ट्रीय अनादर के संदर्भ में लिया जा रहा है। मणिशंकर अय्यर उसी कांग्रेस की पैदाइश रहे हैं जो राष्ट्रमंडल खेलों में हज़ारों करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोप लगा रहे हैं। इसके बाद भी सोनिया राहुल ने दर्शक बन कर खेलों का लुत्फ उठाने का प्रयास किया है तो दोनों की तस्वीर अखबारों में छपने लायक बन ही जाती है। दोनों समझते हैं कि खेल भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं।

राजनेताओं ने खेल को कुछ नहीं दिया। बड़े खेलों के आयोजन के अलावा। हरियाणा के भिवानी के बारे में लोगों को तब पता चला जब यहां के बॉक्सरों ने बीजिंग ओलम्पिक में तहलका मचा दिया। भिवानी के गांव-गांव में बिना सोनिया-राहुल के ही खेल संस्कार पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी को भिवानी जाकर देखना चाहिए कि किस तरह से यहां बॉक्सिंग ही नहीं कई तरह के खेलों को बढ़ावा मिल रहा है। इसमें भारतीय खेल प्राधिकरण की भूमिका को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर राहुल अपनी दिलचस्पी को तस्वीरों से आगे ले जाना चाहते हैं तो उन्हें भिवानी जाकर समझना चाहिए कि सिस्टम बेहतर होता तो भारत का प्रदर्शन कितना अच्छा होता। हम अजीब देश है,मामूली उपलब्धियों पर भी गौरव का ढिंढ़ोरा पीटने लगते हैं।

खेलों की तमाम तैयारियों को देंखें तो बड़े शहरों में केंद्रित हैं। जबकि कामयाब खिलाड़ी महानगरों से बाहर के हैं। हमारी सरकारों ने इनाम में दरियादिली तो खूब दिखाई है। हरियाणा से लेकर मध्यप्रदेश तक सब लाखों रुपये दे रहे हैं। मगर सिर्फ विजेता खिलाड़ी और कोच के लिए हैं। खिलाड़ी के लिए नहीं। जो हार गया है उसका हौसला बढ़ाने के लिए कुछ नहीं। दिल्ली के अखाड़ों की हालत देख आइये। हरियाणा के अखाड़ों की भी हालत खराब मिलेगी। गनीमत है कि हरियाणा के ग्रामीण पहलवानी को सम्मान देते हैं। गांव में चाचा-ताऊ बीस-बीस किलोमीटर अपने बेटे-भतीजे के लिए दूध लेकर जाते हैं। मध्यमवर्ग भी कम ढोंगी नहीं है। कोई अपने बेटे को पहलवानी में नहीं भेजेगा। हज़ारों रुपये लगाकर जिम में ज़रूर भेज देगा। हमारा मध्यमवर्ग सिर्फ ताली बजाकर देशभक्त होना चाहता है। राजनीति भी मध्यमवर्ग की तरह प्रतीकात्मक होती जा रही है।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में छपा है)

राम अब लीगल हो गए हैं।

कोई भी फ़ैसला मुकम्मल नहीं हो सकता न ही कोई समीक्षा हो सकती है। परिवार में भाइयों के बीच जिस तरह ज़मीन का बंटवारा होता है,उसी तरह का बंटवारा है। बेहतर है तीनों छिट-पुट मनमुटावों के साथ-साथ एक व्यापक सहमति के साथ जीना सीख लें। उसी तरह जैसे गांव में बंटवारे के बाद भी तीनों भाई एक ही साथ अपने बच्चे का रिश्ता करने जाते हैं। उन्हें मालूम होता है कि तीनों भाइयों में दामाद को लेकर एक किस्म की प्रतिस्पर्धा होती है,फिर भी वो एक चौकी पर बैठे होते हैं, बताने के लिए कि हमारा परिवार कितना महान है। यह सब कुछ सिर्फ नौटंकी नहीं होती। कुछ रिश्ते तो फिर भी बचे ही रह जाते हैं जिसके नाम पर हम चाचा को प्रणाम करते हैं और बड़ी मां का दिया हुआ खा लेते हैं। जानते हुए कि बंटवारे के वक्त ज़मीन के एक कतरे को लेकर किस तरह से नरक रच दिया गया था। हिन्दुस्तान में हर दिन किसी न किसी का परिवार ज़मीन के टुकड़ों में बंटता है। फिर भी रिश्ते बचे रह जाते हैं। झगड़े चलते रहते हैं। यह हिन्दुओं में भी होता है और मुसलमानों में भी।

यह फ़ैसला इसी नज़ीर को आगे बढ़ाता है। ज़मीन तो सबको मिलेगी। कोई इसे पंचायत का फैसला बता कर खारिज कर सकता है। इसका फैसला पंचायती शक्ल में ही हो सकता था। कोई इसे यह कह कर भी खारिज कर सकता है कि आस्था पर अदालत का फैसला आया है। इसके परिणाम ज़रूर अच्छे नहीं होंगे। मगर इस फैसले को इसी मुकदमे के संदर्भ में रखकर सोचा जाना चाहिए। क्या हम यह मानकर चलते हैं कि अदालतें नास्तिक हैं। वो सिर्फ कानून पर चलती हैं। कानून कैसे बनता है? परंपराओं और परंपरा विरोधी दलीलों के बीच चलने वाले द्वंद से। जिसमें दोनों का पलड़ा भारी होता रहता है। यही हुआ। सेवानिवृत जस्टिस शर्मा ने अपनी ब्राह्मणवादी व्याख्या में पूरी ज़मीन राम को देने की बात लिखी है। मगर मानी नहीं गई। अगर उनके अनुसार फैसला आता तो मैं भी ब्रह्मा का बालसखा बनकर पूरी कायनात या नहीं तो कम से कम भारत पर दावा कर देता कि ये मुल्क किसी और का नहीं सिर्फ और सिर्फ ब्रह्मा का है। जो सृष्टि के रचयिता हैं। मैं उसी ब्रह्मा का मित्र हूं। ये और बात है कि कोई सृष्टि के रचयिता को पूछता तक नहीं। सब उनकी सृष्टि को टुकड़ों-टुकड़ों में बांट कर अपने-अपने हिस्से करने में लगे हैं। फिर भी एक बार सोचकर खुश हो गया कि वाह पूरा भारत मेरा। एक किसिम की ईस्ट इंडिया कंपनी बन जाता है। पोप्रटी डीलरों और बिल्डरों की एक नई सेना बनाकर उसका सुप्रीम कमांडर बन जाता। पूरे भारत में मेरी होर्डिंग लगी होती। ब्रह्मा सखा रवीश कुमार के मुल्क में एक घर आपका भी हो सकता है। टू बीएचके,थ्री बीएचके। इस फैसले के बाद मैं राम रूट बनवाना चाहता हूं। अयोध्या से श्रीलंका तक का एक्सप्रेस वे।

मुद्दे की आलोचनाओं से यह कहां साबित होता है कि पदों पर बैठे लोग धार्मिक नहीं हैं। उनकी सोच धार्मिक तत्वों से भी प्रभावित होती हैं। हमने ऐसा समाज तो रचा ही नहीं है। जब तक ऐसा समाज नहीं बनेगा तब तक मान्यताएं हमें अब अदालत की दहलीज़ से भी आदेश लेकर मनवाती रहेंगी। हमें जल्दी से याद भी कर लेना चाहिए कि यहीं वो अदालतें भी हैं जो कई बार मान्यताओं के ख़िलाफ़ भी खड़ी होती रही हैं। ईश्वर का वजूद शायद पहली बार किसी अदालत से तय हुआ होगा। यह चौरासी हज़ार देवी-देवताओं के लिए राहत की बात है। जल्दी से इनकी भी जनगणना कराकर एक सूची जारी कर देनी चाहिए ताकि हम बाद में पैदा होने वाले भगवानों को खारिज करते रहे। तीनों जजों ने राम की लाज रख ली। अब यह तय हो गया था कि भगवान राम एक जगह पर पैदा हुए थे। राम का वजूद लीगल हो गया। संघ परिवार कह सकता है कि राम सांस्कृतिक प्रतीक तो हैं ही,कानूनी भी हैं। जल्दी से अदालत सरकार से यह भी करे कि वो पूरी अयोध्या में खुदाई कर पता लगाए कि राम कहां-कहां खेले, स्वंयवर कहां हुआ और दशरथ ने दम कहां तोड़ा। इन सब का मंदिरनुमा स्मारक बनना चाहिए। पहली बार कोई भगवान लीगल हुए है तो जश्न में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।

कहीं हम यह मान कर तो नहीं चल रहे थे कि फैसला एक तरफा आयेगा। हिन्दुओं की तरफ या मुसलमानों की तरफ। क़ब्ज़ा मुखालिफ़त का कानून तो पहले से विराजमान है। तमाम तरह के लोग मकान मालिकों के घरों में इसी दलील के दम पर घुसे पड़े हैं और पांच- पांच रुपये में रह रहे हैं। हिन्दू भी और मुसलमान भी। जब हम आस्था के नाम पर सरकार से साल में दस-दस छुट्टियां ले सकते हैं तो सरकार उसके नाम पर फैसला भी करवा सकती है। समाज खुद को भी तो इस किस्म के दोहरेपन से मुक्त करें। ठीक है कि साफ नहीं कि मुसलमानों को किस हिस्से की ज़मीन मिलेगी लेकिन जो भी ज़मीन मिलेगी वो होगी तो वहीं की और उन्हीं की। कोई सोने का मंदिर बना ले और चाहे तो कोई हीरे की मस्जिद।

बीजेपी यह राजनीति ज़रूर कर रही है कि मुसलमान सहयोग करें। भई अब मुसलमान क्या सहयोग करे। आपको ज़मीन मिली है और आप अपनी ज़मीन पर बनाइये। दूसरे की ज़मीन की बात क्यों कर रहे हैं। सहयोग की राजनीति के बहाने क्या आप यह कह रहे हैं कि मुसलमान अपना दावा छोड़ दें। वो दावा छोड़ेगा तभी राष्ट्रीय एकता का पुनर्निमाण होगा। इस देश में धर्मनिरपेक्षता का इम्तहान मुसलमान ही क्यों दे? बीजेपी क्यों नहीं ज़मीन दान कर देती है कि लो भाई तुम दुखी हो तो हमारे राम को ले लो। खुश रहो। बीजेपी किस दलील के दम पर कह रही हैं कि मंदिर के निर्माण से राष्ट्रीय एकता का पुनर्निमाण होगा। आप क्या हमें यह बता रहें हैं कि तीस सितंबर से पहले हम किसी किस्म के राष्ट्रीय एकता के माहौल में जी ही नहीं रहे थे। जो एकता अभी है उसके पुनर्निमाण की ज़रूरत क्या है। मंदिर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक कैसे हो सकता है? अव्वल तो बीजेपी को फैसले की शाम बैठकर प्रतिक्रिया ही नहीं देनी चाहिए थी। रविशंकर प्रसाद छद्म धर्मनिरपेक्षों को गरियाने लगे। अरे भाई आप भी तो छद्म राष्ट्रवादी हैं। आपकी पार्टी में जब रेड्डी बंधु जैसे देशभक्त हैं तो फिर छद्म धर्मनिरपेक्षों को क्यों गरिया रहे हैं। रेड्डियों और मुंडाओं और सोरेने से कर लीजिए न राष्ट्रीय एकता का पुनर्निमाण।

नरेंद्र दामोदर मोदी तो गुजरात की जनता को शांति के लिए धन्यवाद देने लगे। उसी शाम को धन्यवाद देना था इनको। आकर यूपी में देख लेते। प्रशासन की सख्ती के आगे किसी भी जनता की हिम्मत नहीं हुई कि बाहर निकर आ जाएं। मायावती के अफसर देर रात तक अपने अपने विभागों की लाल बत्ती वाली गाड़ियां लेकर घूमते रहे। ठीक है कि कुछ हिन्दू जनता को लगा कि चलो उनकी आस्था की बात रह गई लेकिन आप देखेंगे कि आम हिन्दू(सवर्ण) भी उत्तेजित नहीं है। वो अपने घरों में ही रहा। वर्ना कर्फ्यू को तोड़ने के लिए पब्लिक सड़क पर तो निकल ही आती है न। वो भी जानती है कि ये मुद्दा मंदिर भर तक है। बीजेपी और संघ परिवार ने अयोध्या मुद्दे की एटीएम मशीन से नगद पहले ही निकाल कर खर्च कर लिया है। इसी तरह की प्रतिक्रिया मुस्लिम इलाकों में भी है। उन्हें दुख ज़रूर पहुंचा है मगर कोई पहाड़ नहीं टूटा है। फैसले से पहले पंद्रह दिनों तक पुरानी दिल्ली में टहलता रहा। सब यही कहते थे कि क्या फैसले से पहले वहां अस्पताल नहीं बन सकता। स्कूल बनवा दीजिए। उनकी भी लिस्ट में मस्जिद नहीं थी। फैसले के बाद मौलाना देहलवी ने फोन कर कहा कि भाई अब इस मुद्दे को छोड़ देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट नहीं जाना चाहिए। फैसले के अगले दिन लखनऊ एयरपोर्ट पर जेद्दा की फ्लाईट लेने के लिए बड़ी संख्या में मस्लिम परिवार आए थे। सब एक दूसरे को बिछड़ने के गम के साथ विदा कर रहे थे। कोई फैसले की बात नहीं कर रहे थे। एक सज्जन से पूछा तो मेरा सवाल रोक कर शमशाद को कहने लगे कि पासपोर्ट बनवा लेना। पलट कर कहा कि भाई अदालत का फैसला है। हम मानेंगे। हमें मंजूर नहीं हो तब भी मानेंगे। वाकई यह एक परिपक्व दौर है।

हाशिम अंसारी की प्रतिक्रिया के बराबर क्या किसी बीजेपी नेता की प्रतिक्रिया आपने सुनी? एक सदी के लगभग उनकी उम्र होने को आई। यह मुकदमा उनसे सिर्फ पैंतालीस साल ही तो छोटा है। फैसले के दिन पूरी मीडिया ने कटियार,आदित्यनाथ और कल्याण सिंह जैसे नेताओं पर रोक लगा रखी थी। इनको किसी ने पूछा ही नहीं। वो भी समझ गए हैं कि मंदिर मुद्दा नहीं है। अठारह साल पहले ही यह मुद्दा ध्वस्त हो गया था। बस कहने के लिए एक मुद्दा मिल रहा है कि देखो हम ठीक कहते थे। हमारी लड़ाई अदालत से साबित हुई है। कुछ चिरकुट लोग यह भी बता रहे थे कि भारत आगे बढ़ना चाहता है। वो ऐसे मुद्दों के भंवर में नहीं फंसेगा। ये लोग भारत को नहीं जानते। भारत जब 92 के बाद हुए दंगों और गुजरात के भयावह दंगों के बाद भी आगे बढ़ सकता है तो किसी फैसले से उसके आगे बढ़ने के टाइप्ड ड्रीम पर असर नहीं पड़ने वाला था।

अगर आप यह बतानें लगें कि भारत ब्राह्मणवादी नहीं रहा है तो नहीं मानूंगा। इस फैसले ने भी साबित किया है कि धर्म की व्याख्या इस देश में ब्राह्मणवादी ही होगी। गनीमत है कि राजनीतिक रूप से नहीं हो सकती वर्ना दलितो का उभार ठीक उसी वक्त नहीं होता जब देश में राम भक्तों का सियासी जलवा कायम हो रहा था। बेहतर है इस फैसले की संयमित राजनीतिक प्रतिक्रिया हो। उत्तेजित नहीं। दरअसल बात सिर्फ बीजेपी की नहीं है। सभी दलों में ऐसे कमज़ोर पक्ष हैं। उन्हें मालूम है कि कुछ कमज़ोरी और गलतियों के बाद भी उनका वजूद बना हुआ है। कांग्रेस हो या बीजेपी या फिर कोई भी सियासी दल,ये सब राष्ट्रीय एकता के कब ठेकेदार बन जाते हैं और कब धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण के वकील सबको मालूम है।

न धर्मनिरपेक्षता कमज़ोर हुई है न सांप्रदायिकता। इस गफ़लत में न रहें तो अच्छा होगा। देखना है तो हिन्दी के अखबारों की हेडलाइन्स देख लीजिए। नई दुनिया ने लाल लाल हेंडिंग लगाई और लिखा कि- वहीं रहेंगे रहेंगे रामलला। दैनिक जागरण ने लिखा- विराजमान रहेंगे रामलला। अमर उजाला- रामलला विराजमान रहेंगे। दैनिक भास्कर- भगवान को मिली भूमि। हिन्दुस्तान- मूर्तियां नहीं हटेंगी, ज़मीन बटेंगी। राष्ट्रीय सहारा- तीन हिस्सों में बांटी जाएगी ज़मीन। नवभारत टाइम्स ने लिखा- किसी एक की नहीं अयोध्या। राजस्थान पत्रिका की हेडिंग सबसे अच्छी थी-राम वहीं,पास में रहीम। छाती पीटने की ज़रूरत नहीं हैं। जैसा कि मैंने कहा कि कोई भी फैसला मुकम्मल नहीं होता और न ही उसकी समीक्षा। मुग़ल-ए-आज़म का डॉयलॉग याद आ गया- शहंशाहों के इंसाफ और ज़ुल्म में कितना कम फर्क होता है। टेंशन मत लीजिए।

ख़बरों की अधर्मिता बनाम चैनलों की प्रयोगधर्मिता

हिन्दी न्यूज़ टेलीविजन में प्रयोगों को सक्रियता देखने लायक है। हिन्दी में फार्मेट को लेकर प्रयोग अंग्रेजी से पहले होने लगे हैं। पहले अंग्रेजी से शुरूआत होती थी और फिर हिन्दी में पहुंचती थी। अब हिन्दी न्यूज़ चैनल फार्मेट के मामले में अंग्रेजी को भी अनुसरण करने पर मजबूर कर रहे हैं। फटाफट हो या सटासट। कभी न्यूज़ बुलेटिन के आखिर में आने वाला न्यूज़ रैप को शुरूआत में सरकाने का श्रेय हिन्दी न्यूज़ चैनलों को जाता है। स्पीड न्यूज के कई वेरायटी आपको मिल जायेंगी। वॉयस ओवर को लेकर भी कई तरह के बदलाव किये जा रहे हैं। कंटेंट को लेकर इनकी सराहना-आलोचना अलग मसला है पहले यही नोटिस में लिया जाना चाहिए कि फार्मेट कैसे और कितनी तेजी से बदले जा रहे हैं। गनीमत है कि फार्मेट ही बदल रहे हैं,ख़बरें नहीं। फार्मेट को आप कनस्तर से तुलना कर सकते हैं। इसमें आटा ही भरा जा रहा है। कोई कनस्तर को पीट-पीट को ठूंस रहा है तो कोई हिला-हिला कर।

आज सुबह हेडलाइनन्स टुडे देख रहा था। बहुत ज़माने बाद फिर से न्यूज चैनलों को देखने की कोशिश की है। हेडलाइन्स टुडे में स्क्रोल्स जिसे आप हिन्दी में सरकत पट्टिका कह सकते हैं,स्क्रीन के ऊपरी हिस्से में चल रहा था। उसके ऊपर एक ठहरा हुआ ट़ॉप बैंड भी था। आमतौर पर ऊपर दो बैंड नहीं होते हैं। हिन्दी न्यूज चैनलों में सरकत पट्टिका नीचे आई थी। आई तो अंग्रेजी से ही थी लेकिन इसमें मौलिक बदलाव हिन्दी न्यूज़ चैनलों में ज्यादा हुआ। पहले ये सरकत पट्टियां बेनामी चला करती थीं अब सबके नाम हैं। न्यूज़ टॉप टेन या फटाफट जैसे नाम हैं। सबसे पहले हिन्दी चैनलों ने ही ऊपर और नीचे एक साथ यानी टॉप एंड बॉडम बैंड शुरू किया था। कई तरह की पट्टियां हैं। अलग-अलग साइज़ की।

न्यूज़ चैनलों के डेस्क पर जो लोग काम करते हैं उन्हें कम से कम पचास एलिमेंट याद रखने पड़ते हैं। मसलन टॉप बैंड का नंबर अलग है तो बॉटम बैंड का अलग। हर खांचे का एक नंबर होता है जिससे याद रखना होता है। खबरों के बीच में वाइप चलता है उसका अलग नंबर होता है। वाइप शब्द कार के शीशे पर लगे वाइपर से आया है। जैसे बारिश के वक्त वाइपर स्क्रीन को साफ करता है और चला जाता है उसी तरह स्क्रीन पर वाइप ख़बरों की बारिश को साफ करता रहता है। वाइप जिस पर फटाफट या स्पीड न्यूज़ लिखा होता है। जो किसी भी ख़बर में मच्छरों की भनभनाहट सी आवाज़ लिये चला आता है और गायब हो जाता है। जब तक आपको लगता है कि चला गया कमबख्त,वो वापस आ जाता है और कान के नीचे भन्नाते मच्छर जैसी आवाज़ निकालने लगता है। ये आवाज़ गाड़ियों की भागती आवाज़ से भी मिलती जुलती है। हमारे पास स्पीड की प्रतिनिधि ध्वनि यही है।

इतना ही नहीं इन खांचों में शब्द अंटाने में काफी मेहनत लगती है। आउटपुट एडिटर लघुतम शब्दों को खोजता रहता है। स्पेस बार की मदद से शब्दों के भीतर वर्णों को सटाते रहता है ताकि एक शब्द औऱ अंट जाए। हिन्दी में एब्रीविएशेन का कल्चर नहीं है। इसलिए लघुत्तम शब्दों को खोजना चुनौती भरा काम हो जाता है। पता नहीं अभी तक न्यूज़ चैनलों में अनुप्रास संपादक भर्ती क्यों नहीं हुए जो अ से शुरू होने वाले समानार्थी शब्दों की खोज कर इन खांचों में भर देगा। वैसे जो लिखा जा रहा है वो भी इस अंदाज़ में कि कोई चुनौती दे रहा है कि का रे..पढ़ा कि नहीं..अंखवे फोड़ देंगे। व्याकरण की तो कब की तेरहवीं हो चुकी है।

जब आजतक ने ट्रेन दुर्घटनाओं की बनी-बनाई एनिमेशन दिखाना शुरू किया तब लोग हंसते थे। ये वो लोग हैं जो अंग्रेजी में काम करते रहे हैं और उनके अनुसार तब तक कोई सम्मानित प्रयोग नहीं हो सकता जब तक वो अंग्रेजी न करें। आज सभी अंग्रेजी चैनलों में दुर्घटना के वक्त बनी-बनाई एनिमेशन ग्राफिक्स का इस्तमाल होता है। एक और प्रयोग हुआ है, घेरा बनाकर तीर से दिखाने का। इंडिया टीवी ने इसका खूब इस्तमाल किया है। कैमरे में कैद किसी छोटी सी चीज़ को लाल डोरे से घेर दिया और तीर मार-मार कर दिखाना शुरू कर दिया। पहले इस तरह के लाल डोरे सिर्फ बदचरित्रों के गर्दन के आस-पास बनाये जाते थे। टाइम्स नाऊ ने एक बदलाव किया। जिस तरह से हम फेसबुक या इंटरनेट पर भेजी गई तस्वीरों को क्लिक करते हैं तो नाम भी उभर आता है,उसी तरह टाइम्स नाऊ ने वीडियो में दर्ज तमाम लोगों के नाम लिखने की शुरूआत की। यह दावे के साथ नहीं कह सकता कि टाइम्स नाऊ ने ही की। लेकिन उसके तुरंत बाद कुछ अंग्रेजी चैनलों को भी नकल करते देखा।इंडिया टीवी ने ओवर दि सोल्डर शॉट को भी एनिमेटेड कर दिया है। आदमखोर चमगादड़ में पूरी स्क्रीन पर चमगादड़ उड़ रहे हैं। खटिया पर एक आदमी घायलावस्था में पड़ा है। उसके ऊपर से खून के धब्बे उड़ रहे हैं। कई चैनल इस तरह का एनिमेशन इस्तमाल करते हैं।

बहुत पहले मैंने अपने ब्लॉग कस्बा पर लिखा था कि टीवी अख़बार हो रहा है। लेकिन ध्यान से देखें तो अखबार भी इतना क्लटर या बजबजाया हुआ नहीं लगता। हिन्दी टेलीविजन अपना ही रूप गढ़ रहे हैं। जिस तरह से बाज़ार फ्लेक्स होर्डिंग से भरे दिखते हैं वैसे ही अब न्यूज़ चैनल नज़र आने लगे हैं। समझ नहीं आता कि उसी तीस सेकेंड में पढ़ें,देखें या सुनें। दर्शक को तीन क्रियाएं एक साथ करनी पड़ती हैं। जब दर्शक के पास वक्त कम है तो उसे एक साथ तीन काम करने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है। यह एक सवाल है। लेकिन यह बदलाव आ चुका है और इसे सभी ने स्वीकार भी किया है।

इंग्लिश न्यूज चैनलों में भी आप स्पीड न्यूज़ का जलवा देखेंगे। मैं नहीं मानता कि हिन्दी न्यूज़ चैनलों में सारे बदलाव नकल से हो रहे हैं। बहुत कुछ मौलिक हैं। वो भद्दे हैं या नहीं,यह दर्शक,आलोचक तय करेंगे। वैसे ज़्यादर आलोचकों को टीवी की तमीज़ भी नहीं। समझ नहीं आता कि वो ख़बरों की साहित्यिक समीक्षा कर रहे हैं या टीवी के फार्मेट की। उनकी समीक्षा ख़बरों के सरोकार टाइप के पुरातन फार्मेट से आगे नहीं बढ़ पाती। हालांकि वो भी एक गंभीर और ज़रूरी काम है। ख़ैर,टाइम्स नाऊ में कश्मीर की खबर आ रही है। सात तरह की सूचनाएं स्क्रीनपर हैं। बायीं ओर के ऊपरी कोने में कश्मीर क्राइसीस का लोगो है जो स्क्रीन बदलते ही ऊपर नीचे होते रहता है। जब रिपोर्टर का चेहरा आता है तो कश्मीर क्राइसीस का बैंड ऊपर कोने में होता है। जब कोई ग्राफिक्स प्लेट आती है तो नीचे आ जाता है। बंदर की तरह बेचैन लगता है। कभीं खंभे के ऊपर होता है तो कभी खंभे के नीचे। इसके अलावा रिपोर्टर जितना बोल रहा है उससे ज्यादा लिखा हुआ आ रहा है। ये सब स्क्रीन को ऊर्जावान बनाने के लिए किया जा रहा है। टाइम्स नाऊ ने संप्रेषण के क्षेत्र में कई प्रयोग किये हैं। कई चीज़े पहली बार पेश की हैं। पहले ब्रांड का 'लोगो' होता था अब हर ख़बर में एक 'लोगो' लगता है। 'लोगो' को 'लोगीकरण' हो गया है।

आप ध्यान से देखिये तो पायेंगे कि ब्रेकिंग न्यूज़ के सुपर बैंड किसी सामंत या गुंडे से कम नहीं हैं। इनके आते ही बाकी सारी सरकत पट्टिकाएं कहीं कोने में दब जाती हैं तो कुछ गायब भी हो जाती हैं। ब्रेकिंग न्यूज़ का लाल आतंक सबको खदेड़ देता है। ब्रेक में भी ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी चलती रहती है। बचपन में एक पेंसिल देखी थी। एक तरफ ब्लू और दूसरी तरफ लाल। ऐसी ही पेसिंल से मिलती जुलती है आईबीएन सेवन की पट्टी। नीले में नक्सली लिखा होता है और लाल में हमला। टीवी के प्रोड्यूसर और ग्राफिक्स डिज़ाइनरों के हुनर को सम्मानित करने का वक्त आ गया है। आईबीएन सेवन लिखता है कि पांच मिनट में आपके काम की पंद्रह ख़बरें। एक्सप्रेस न्यूज़ नौ बज कर सत्ताईस मिनट पर। हिन्दी चैनलों ने ही सबसे पहले न्यूज देखने के वक्त की कल्पना बदल ली। ठीक सात बजे या ठीक नौ बजे जैसे जुमले गायब हो गए। छह सत्ताईस या छह उनसठ जैसे जुमले आ गए। इंडिया टीवी पर सरकत पट्टी बता रही है कि 9:30 की 5 हेडलाइन 9:27 पर। समय को भी हिन्दी न्यूज़ चैनलों ने पुनर्परिभाषित किया है। जल्दी ही लोग अपनी घड़ी में अलार्म हिन्दी चैनलों के गढ़े इस समय बोध के अनुसार लगायेंगे। वो अब सवा पांच बजे का अलार्म नहीं बल्कि 5:16 मिनट का लगाया करेंगे।

इंडिया टीवी ने जितने फार्मेट में बदलाव किये हैं उतने किसी चैनल ने नहीं किये हैं। इंडिया टीवी की निरंतर आलोचना में उसके इस योगदान पर किसी का ध्यान नहीं जाता। इंडिया टीवी के कैमरा वर्क को भी कभी ध्यान से देखियेगा। उसके शॉट अलग होते हैं। अमूमन कई हिन्दी चैनलों के कैमरा कार्य में कई बदलाव आ रहे हैं। शॉट इस तरह से लिये जा रहे हैं जैसे कैमरा से टकरा कर ऑबजेक्ट टूटने ही वाला हो। इस तरह के बदलाव टाइम्स नाऊ में देखियेगा। तभी कभी-कभी लोग यह भी कहते हैं कि टाइम्स नाऊ अंग्रेज़ी का हिन्दी चैनल है। ग्राफिक्स टेक्सट और विजुअल का मिक्सचर बनाकर नया माल परोसने में इंडिया टीवी का जवाब नहीं। स्टार न्यूज़ ने 24 घंटे 24 रिपोर्टर में नया फार्मेट लाया था। रिपोर्टर की पीटूसी से खबर शुरू होती थी और उस खबर की विजुअल चलती थी। एक तरह से रिपोर्टर मैदान से एंकर की तरह दिखने लगा। बाद में इस फार्मेट की अनुसरण आईबीएन सेवन और इंडिया टीवी ने भी किया। सब एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं। अब यह भी एक मान्य फार्मूला हो गया है। हैरान हूं कि अभी तक इंडिया टीवी या स्टार ने यह प्रोमो क्यों नहीं चलाया कि देखो देखो हमारी स्पीड न्यूज का कर रहे हैं सब नकल। ओरिजनल हैं हम। देखो देखो नकलची है वो। ठीक उसी तरह से जैसे इंडिया टीवी नंबर वन होने पर बाकी चैनलों की भी टीआरपी दिखा देता है। एक जनाब ने सूरत से फोन किया और कहा कि एनडीटीवी इंडिया की टीआरपी कम हो गई है क्या। मैंने कहा आपको कैसे मालूम। तो जवाब मिला कि इंडिया टीवी दिखा रहा है। हद है भाई। ये कैसा टॉपर है जो फेलियर का भी रिज़ल्ट लेकर मार्केट में उधम मचा रहा है। फेल होने वाले को मुंह छुपाने का वक्त और जगह की गुज़ाइश भी नहीं छोड़ता। बड़ा निर्दयी है मुआ। इससे पहले कि आप फेल होकर मोहल्ले में पहुंचे,बचते-बचाते,इंडिया टीवी हल्ला कर चुका होता है। बाप रे। आज तक पर क्या गुजरी होगी। वैसे गुज़रती तो हम पर भी है। इसीलिए तीन-तीन घंटे लगाता हूं फेसबुक पर। ऐ भाई,मेरी रिपोर्ट देख लेना। ऐ भइया...देखे कि नहीं। नहीं देखे तो देख लो न। जवाब मिलता है अरे आप और टीआरपी। लगता है उनका कपार फोड़ दें।

कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की तरह बात करते हैं टीआरपी के विरोधी। इंडिया में रहकर संविधान का पालन तो करना ही होगा। टीआरपी टीवी का संविधान है,जिसका असफल विरोध सिर्फ अलगाववादी पत्रकार कर रहे हैं। टीआरपी का विरोध एम्पलॉयर नहीं करते हैं। अफसोस इसी बात का रह गया कि तथाकथित अच्छे पत्रकारों ने टीआरपी से लड़ने के लिए श्रम नहीं किया। वो लेख ही लिखते रहे और अपनी नैतिकता को इंडिया टीवी,आजतक,न्यूजड 24 और आईबीएन सेवन से श्रेष्ठ बताते रहे। जब एक मीटर पर खराब रिपोर्ट को अच्छी रेटिंग मिल रही है तो अच्छी रिपोर्ट को क्यों नहीं मिलेगी। क्या तथाकथित अच्छी रिपोर्ट के लिखने और पेश करने में कमी नहीं होती होगी? क्या अच्छी रिपोर्ट के समर्थन में कोई कारगर फार्मेट की खोज नहीं की जा सकती है? क्या अच्छी ख़बरों के नाम पर लोकार्पण की खबरें आप देखना चाहेंगे? उसमें भी तो सरोकार होता है। तथाकथित आलसी परन्तु अच्छे पत्रकारों ने बिना लड़े ही लड़ाई का मैदान छोड़ दिया। हिन्दी पत्रकारिता का संकट तथाकथित अच्छे पत्रकारों के नकारेपन का संकट है। जब अच्छे लोग घर बैठ जाएंगे तो बंदर और भूतों का कब्जा किसी भी हवेली पर हो ही जाएगा। आलोचकों की माने तो सारे प्रयोग तथाकथित पत्रकारिता के बदनाम करने वालों की गली में ही क्यों हो रहे हैं? शरीफों के मोहल्ले में भी तो कुछ होना चाहिए। हर क्लासिकल गीत सुनने लायक तो नहीं होता न। कोई तो नुसरत अली बनकर ज्यादा लोगों तक पहुंचाएगा या फिर तार पर रेगियाने या टुनटुनाने से ही काम चल जाएगा।

हिन्दी न्यूज़ चैनलों में बदलाव का कोई अलग सा दौर नहीं चल रहा है। बल्कि हर दिन और हर सेकेंड बदलाव हो रहे हैं। अब आप देखेंगे कि पहले शाम के वक्त सभी न्यूज बुलेटिन में तैयार रिपोर्ट हुआ करती थी। विज़ुअल,वीओ,बाइट,विजुअल,वीओ और फिर बाइट और उसके बाद सार स्वरूप दो तीन पंक्तिया लिखकर पीटूसी। जिसे रिपोर्टर ग्राउंड जीरों से अपनी टिप्पणी के रूप में पेश करता है। इसे वीडियो ऑन टेप यानी वीटी कहते हैं। अब वीटी का चलन खत्म हो गया और अगर कहीं है भी तो कम से कम मात्रा में। इसके लिए जिम्मेदार रिपोर्टर ही हैं। उन्हें तस्वीर और शब्द के इस्तमाल से कथा कहने का सलीका ही नहीं आया। न ही उनमें से किसी ने सीखने की कोशिश नहीं की। लिहाज़ा सचमुच कई रिपोर्ट बोरियत सी भरी लगती थी। धीरे-धीरे इस तरह की रिपोर्ट को डीडी टाइप कहा जाने लगा। इसकी एक वजह यह भी है कि टीवी में वो लोग लिए गए जिनको लिखने और बोलने और पेश करने की कला मालूम नहीं थी। आखिर आप भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर में हिन्दी के साहित्यकार को कैसे नौकरी दे सकते हैं। वो वहां क्या करेगा। टेलीविजन की दुनिया ऐसे अनमने से रिपोर्टरों को देखती रही। रिपोर्टर पान चबाते हुए आते रहे। जर्दा खाते रहे। लिखने का मन नहीं किया। पीटूसी की इस लाइन से आगे नहीं बढ़ सके कि आने वाला वक्त ही बताएगा कि आगे क्या होगा। आज भी बड़ी तादाद में रिपोर्टर अपनी पीटूसी नहीं लिख पाते हैं। लिहाज़ा कई चैनलो में डेस्क से लोग रिपोर्टर को पीटूसी लिखाते हैं। हद है जिस काम के लिए आप आए हैं वही नहीं मालूम।

यही कारण है कि आप ज्यादातर प्रयोग डेस्क से देखेंगे। मैदान में गया रिपोर्टर अपनी तस्वीरों और तत्वों से प्रयोग नहीं करता। वो कथा कहने की नई तरकीबें नहीं ढूंढ रहा है। कुछ रिपोर्टर हैं लेकिन सौ में नब्बे खराब हों तो दस की बात क्या मतलब रह जाता है। तो मैं कह रहा था कि रिपोर्टर की छाप वाली रिपोर्ट की अब मौत हो चुकी है। सारी खबरे विज़ुअल और एंकर वीओ के साथ चल रही है। एंकर वीओ भी गायब हो चुका है। वॉयस ओवर करने वाला वीओ कर देता है। स्पीड न्यूज़ ने एंकर को भी बेकार कर दिया है। वो सिर्फ इसलिए खड़े रहते हैं कि लिंक टूटने पर रूकावट के लिए खेद है का बोर्ड न लगाना पड़े। इसलिए आप देखेंगे कि पहले की तरह आप कम ही एंकरों को नाम से जानते होंगे। उनका चेहरा जब तक आता है तब तक चला भी जाता है। इंडिया टीवी और आजतक ने तो एंकर को स्क्रीन के कोने में खड़ा कर दिया जहां से उनका चेहरा भी नज़र नहीं आता था। फिर एंकरों से स्टैंड अप कहा गया। स्टार न्यूज़ ने न्यूज़ रूम में स्काई टीवी की तर्ज में दौड़ने का मैदान बनाया। एनडीटीवी इंडिया पर भी न्यूज़ रूम से एंकरिंग शुरू हुई। कई इंग्लिश चैनलों में भी शुरूआत हुई। स्टार ने एंकर को लेकर फिर एक कोशिश की है। टाइट क्लोज़ अप में उनका चेहरा आता है। कभी-कभी तो इतना टाइट होता है कि मेरी आंखों पर ज़ोर पड़ने लगता है। इस तरह के फ्रेम कई बार सीएनएन या फ‍ॉक्स पर किये जाते रहे हैं।

दर्शक का ध्यान अब विकेंद्रित हो चुका है। इसे केंद्रित करने के लिए सारे प्रयोग हो रहे हैं। रविवार को जब कॉमनवेल्थ गांव में कोबरा जी आ गए तो स्टार न्यूज ने कलमाडी को सपेरा बना दिया। आम तौर पर इस तरह की चीज़ को बग कहा जाता है। जो स्क्रीन के एक कोने में पड़ा रहता है। ध्यानाकर्षण के लिए। स्टार ने सपेरे कलमाडी के बग को स्क्रीन पर घुमाना शुरू कर दिया ताकि चैनल बदलने वाले एक मिनट के लिए रूक जायें। अगर कोई रूक गया तो टीआरपी दर्ज हो जाती है। टीआरपी दर्ज कराने के लिए एक मिनट तक रोकना ज़रूरी है। इस तरह के प्रयोग पहले भी हो चुके हैं। ज्यादातर प्रयोग स्क्रीन पर लिखे गए शब्दों की प्रस्तुति और वीडियो से बनाए गए स्टिल्स के मैनुपुलेशन को लेकर हो रहे हैं। विज़ुअल कैसे ली जाए, कैसे शाट बेहतर हों इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।

हाल ही में मोहल्ला, जनतंत्र और यात्रा ने सिनेमा पर बहसतलब का आयोजन किया था। अनुराग कश्यप ने कहा कि उन्हें मोबाइल के लिए तीन मिनट की फिल्म बनाने के ऑफर मिले। तीन मिनट की दो फिल्में बनाकर उन्होंने अपनी कुल फीचर फिल्मों से ज्यादा कमाई की है। अब आप सोचिये। तीन मिनट की फिल्में बन रही हैं तो तीन मिनट की रिपोर्ट मर रही है। कोई फार्म खत्म नहीं होता। एक जगह से भगाया जाता है तो दूसरी जगह रूप बदल कर अपना रास्ता बना लेता है। जब फिल्म मोबाइल फोन के लिए बनेगी तो रिपोर्ट भी बनेगी। लेकिन दो मिनट वाली लंबी रिपोर्ट का क्या भविष्य होगा कहना मुश्किल है। लेकिन यह तो कह ही सकते हैं कि हिन्दी के पत्रकारों ने अपने कौशल को दिखाने का एक मौका गंवा दिया। उन्हें यह मौका दस साल तक मिलता रहा। वो अपनी दो मिनट की रिपोर्ट को कूड़े जैसा बनाते रहे। जब अनुराग कश्यप इसी तीन मिनट में रोचक फिल्म बना सकते हैं तो क्या रिपोर्ट नहीं बन सकती थी। इसी नाकामी की ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ रिपोर्टरों की है। वो बंदिशों को बहाना बनाकर पानपराग खाते रहे। चेक शर्ट पहनते रहे। किसी भी ट्रेनिंग में यही सीखाया जाता है कि न्यूज रिपोर्टिंग में चेक शर्ट से बचिये। आप हिन्दी के पत्रकारों की कमीज़ देखिये। इसमें उनकी ग़रीबी नहीं बल्कि लापरवाह नज़रिया दिखता है अपने माध्यम को लेकर। मैंने एनडीटीवी इंडिया के बारे में नहीं लिखा है। कोई और लिखे तो बेहतर है। वैसे कई चैनलों के बारे में नहीं लिखा है। इस लेख का मकसद आलोचना नहीं है,बल्कि फार्मेट में आ रहे बदलावों को नोटिस में लेना भर है। कंटेंट की आलोचना हम अलग से करते ही रहते हैं। बहरहाल हिन्दी चैनलों की प्रयोगधर्मिता पर भी बात होनी चाहिए। उनके ख़बरों की अधर्मिता पर तो हो ही रही है। जिसका कोई नतीजा आज तक नहीं निकल सका।

देखते जाइए : बदलेगा बाजार, सिनेमा बदलेगा

बीस से पचीस रुपये की इन सीडी के टाइटल आपको अच्छे न लगें, लेकिन करोड़ों घरों में मौजूद हैं। रेट बोल जवानी के, किस देबू का हो से लेकर धाकड़ छोरा। हरियाणा में लड़के अपने मोबाइल में रागिनी अपलोड कर सुन रहे हैं। दिल्ली के कापसहेड़ा में काम करने वाले प्रवासी मजदूर के मोबाइल में किसी भोजपुरी फिल्म का वीडियो क्लिप अपलोड था। हर शादी-ब्याह में अब लोकल सिनेमा के गाने बजने लगे हैं। इनके कलाकारों के पास पैसा भले इफरात में न आया हो, लेकिन शोहरत आ गयी है, जो बता रहा है कि हिंदी सिनेमा के बाहर दर्शकों का एक समाज तो बन ही गया है।

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