अचानक कोई लड़का कमरे में आ जाता था। पहचान तो रे। अरे..मूंछें कहां गई। पीछे से दूसरा लड़का अंदर आता था। पूछो न किसके लिए गई है। बस दरवाज़े पर ही गुत्मथ-गुत्थी हो जाती थी। अपनी खूबसूरती की तलाश में प्रवासी छात्रों ने सबसे पहले मूंछों को सज़ा दी। मूंछ मुंडा। अब फैशन स्टेटमेंट हो रहा था। शुरू शुरू में मूंछ मुंडाने के लिए समय का ख्याल रखा जाता था। पहली बार मूंछ त्याग यह सोच कर किया जाता था कि एक दो महीना अब पूर्वांचल की ट्रेन में नहीं लदायेंगे। इस दौरान मूंछ विहीन खूबसूरत बिहारी जवान लोगों की नज़रों में एडजस्ट होने का अभ्यास करते थे।
धीरे-धीरे पटना बिना मूंछ के ही जाने लगे। मां बाप सदमे में आने लगे। "अरे भाई जिसका बाप मर जाता है वो मूंछ नहीं रखता है। अभी तो हम ज़िंदा है। ई तो साला ऊहां जाकर मौज कर रहा है। आईएएस न बनबे का रे। देख फलनवां का बेटा। छह महीने तक दाढ़ी नहीं बनाइस। कलेक्टर बन गया है। तीन ट्रक दहेज का सामान मिला है।" अब कहने की बारी लड़के की होती थी। लड़का बाप को कम, मां और बहन को ज़्यादा सफाई देता था। बेटे के मन की बात इन्हीं चैनलों से बाप तक पहुंचती थी। आज भी पहुंचती है। मां-बाप ने अपने लाडलों का मुंडन न जाने किन-किन देवी-देवताओं के दरवाज़े पर करवाया होगा,हिसाब नहीं। विंध्याचल,पटनदेवी के मंदिर से लेकर सोनपुर और देवघर तक उनका मुंडन भखाया गया होगा। बिना मूंछ के देख मां-बाप को काफी दुख पहुंचा होगा। बेटा यही कहता रहता था कि दिल्ली बिहार नहीं है। वहां पर सब ऐसे ही रहते हैं।
हवा लगना एक सामाजिक रासायनिक प्रतिक्रिया है। दिल्ली का हवा लग गया का रे। हम सब शुरूआती दिनों में दिल्ली की आबो-हवा को बहुत बेकदरी से देखते थे। हवा न लग जाए इसके लिए सामाजिक मान्यताएं और बाप का भय हिमालय का काम करता था। हुलिया बदलते ही पहला सवाल यही होता था। तुमको भी हवा लग गया। हवानिरोधी क्षमता वाले छात्र किसी पुरातन की तरह सनातन बन कर घूमा करते थे। नैतिक सिपाही। ये टर्म तब नहीं था। रेट्रोस्पेक्ट में लिख रहे हैं। जिस राज्य में दाढ़ी नहीं बनाना काबिल छात्र की पहली निशानी थी,उस राज्य के लड़के बड़ी संख्या में मूंछ विहीन होने लगे। घरों में चर्चा तो होने ही थी।
लेकिन वन रूम सेट ऐसे बदलावों को स्वीकृति दे देता था। न जाने ऐसे कितने बदलाव खप गए। हम सब बदल रहे थे। सिर्फ एक कमी सबको मारती थी। अंग्रेजी की कमी। हिंदी राष्ट्रवाद को लतियाते गरियाते ये नौजवान अंग्रेजी के अभाव में न जाने कितनी प्रेम कहानियों से ग़ायब कर दिए गए,इसका कोई आंकड़ा नहीं मिलेगा। ज़्यादतर लड़कों ने डिक्शनरी खरीदी। उच्चारण सीखा। किसी लड़की से पहली बार अंग्रेजी बोलने का नाकाम अभ्यास रात भर वन रूम सेट को गुलज़ार किये रहता था। वो लड़का जब भी आईपी हॉस्टल जाता था,दरवाजे को देखते ही अंग्रेजी बड़बड़ाने लगता था।
ख़बरदार जो इसे बड़बड़ाना कहा। इसे गोला गिराना कहते थे। गोला एक किस्म का प्रवासी छात्रों का खोजा हुआ फार्मूला। गोला ज्ञान का देशज रूप। कई छात्र गोला ज्ञानी हो गए। भले पढ़ाई में ज़ीरो साबित हुए लेकिन गोला गिराना एक कामयाब फार्मूला था। इसकी पहली शर्त थी कि लड़कियां मूर्ख होती हैं। यह मानने के बाद ही गोला गिराना शुरू होता था। लड़के घंटों बैठकर लड़कियों को गोला ज्ञान देते थे। काश कोई लड़की ऐसे गोला गिरावक खूबसूरत जवानों के साथ अपने अनुभवों को यहां लिख जातीं। मैं जानना चाहता हूं कि क्या वे लड़कियां वाकई मूर्ख थीं? या फिर किस रणनीति के तहत वे गोला एक्सपर्ट के ज्ञान को झेला करती थीं? मुझे वो लड़का आज तक याद है। अच्छी अंग्रेजी आती थी। लेकिन उसके पास कोई लड़की नहीं आती थी।
वन रूम सेट के अंधेरे बंद कमरों ने गोला गिराने की ताकत से प्रवासी छात्रों को लैस कर दिया। अंग्रेज़ी विहीन ये लड़के गोला के दम ही पर निकल पड़े गर्ल्स होस्टलों की तरफ। टेन्स और प्रिपोज़िशन के आतंक से मुक्त। ग्रामर के कारण उनके अरबों अधूरे वाक्यों को कोईं संजो देता तो किसी कालजयी रचना के लेवल का उपन्यास बन जाता। वन रूम सेट का रोमांस जारी है।
दोस्त कहां कोई तुम सा....
हरियाणा की रुचिका गिरहोत्रा मामले का राज़ आज सबको पता नहीं होता अगर अराधना उसकी दोस्त न होती। उन्नीस साल तक अराधना अपनी दोस्त रुचिका के इंसाफ के लिए लड़ती रही। इस दौरान उसने अपनी दोस्त को भी खो दिया। एस पी एस राठौर पुलिस की ताकत का इस्तमाल करता रहा लेकिन अराधना हार नहीं मानी। अमन के साथ शादी के बाद अराधना का मुल्क बदल गया। वो आस्ट्रेलिया और सिंगापुर रहने लगी। इसके बाद भी अराधना अपनी बचपन की दोस्त रुचिका के साथ हुई नाइंसाफी को नहीं भूली। उसके इंसाफ के लिए लड़ती रही।
चौदह-पंद्रह साल की उम्र की यह दोस्ती। हम सब इस उम्र में दोस्तों को ढूंढते हैं। घर से बाहर निकलने की बेकरारी होती है। किसी और से जुड़ कर दुनिया और खुद को समझने की तड़प। उम्र के इस पड़ाव पर लगता है कि अगर दोस्त पक्का है तो जीवन में बहुत कुछ अच्छा है। हम सब के जीवन में इस उम्र के आस-पास बहुत सारे दोस्त बनते हैं और बदलते हैं क्योंकि सब एक दूसरे में सच्चा दोस्त ढूंढते हैं।
रुचिका ने अराधना में जो दोस्त ढूंढा, उसे अराधना ने साबित कर दिया। अपने मां-बाप से इस मामले को अदालत तक ले जाने की दरख्वास्त की। अराधना के पति ने बताया कि वो अपनी कंपनी से बहाने बनाकर ऑस्ट्रेलिया से चंडीगढ़ आते थे, ताकि मुकदमें की सुनवाई के वक्त मौजूद रहे। अराधना के जज़्बे को अमन ने भी समझा। अमन ने कभी अराधना को अकेले नहीं आने दिया। राठौड़ कुछ भी कर सकता था। यह पूरा मामला आज पूरी दुनिया के सामने है क्योंकि इसमें एक सच्चे दोस्त और अच्छे जीवनसाथी की बहुत ही सक्रिय भूमिका रही है।
यही मौका है एक बार फिर से समझने के लिए कि आम हिंदुस्तानी घरों में लड़कों से संस्कार की उम्मीद कम सफलता की ही आशा ज़्यादा की जाती है। उसे नहीं सिखाया जाता कि लड़कियों को किस नज़र से देखना है। सारी तालीम लड़कियों को दी जाती है कि लड़कों की नज़र से कैसे बचें। अगर लड़के को बचपन से ही यह सीखाया जाए कि लड़कियों के साथ सामान्य बर्ताव कैसे करें तो बड़े होने पर या सत्ता हासिल होने पर राठौर जैसे हिंसक और वहशी तत्व उसके भीतर पनप नहीं सकेंगे।
अपने दोस्तों के बीच इस मुद्दे को लेकर खुल कर बात करनी चाहिए। कब तक हमारे शहरों में लड़के छेड़खानी करने के लाइसेंस लिये घूमते रहेंगे। सोच कर डर लगता है कि राठौर के इस अपराध में कितने पुलिस वालों ने साथ दिया। राठौर की वकील पत्नी ने भी साथ दिया। वो लोग कैसे आज अपनी बेटियों का सामना कर रहे होंगे जिन्होंने राठौड़ की मदद की और रुचिका के पिता सुभाष गिरहोत्रा और उसके भाई को तड़पाया।
रुचिका की कहानी सामाजिक रिश्तों के दरकने और दोस्ती के बचे रह जाने की कहानी है। दोस्तों की कीमत समझने की कोशिश कीजिए। ये रिश्ता सिर्फ हंसी मज़ाक का नहीं है बल्कि उस बुरे दौर का भी बंधन है जब सारे लोग आपके खिलाफ हो जाते हैं। इसीलिए किशोरों पर दोस्तों का प्रभाव बहुत ज़्यादा होता है। अराधना ने एक बार फिर से इस दोस्ती को गौरवान्वित किया है।
फेसबुक में सैंकड़ों अनजाने लोगों से कनेक्ट होने से तो अच्छा है कि एक अराधना मिल जाए। वो कोई राहुल भी हो सकता है। इस उम्र में हम भी अपने दोस्तों की चीज़ों को अपना समझते थे। किसी की कमीज़ पहन लेते थे तो किसी को अपना जूता दे देते थे। साझा करने का आनंद दोस्त की तलाश पूरी करता है। अब लगता है कि दोस्तों के बीच भावनात्मक संबंध कमज़ोर पड़ रहे हैं। दफ्तरों की गलाकाट प्रतियोगिता दोस्तों को प्रतियोगी बना रही है। पुराने दोस्त या तो कहीं छूट गए या फिर भूल गए।
दोस्ताना,याराना,दोस्ती, दिल चाहता है जैसी फिल्मों को देखकर लगता रहा कि काश ऐसी दोस्ती हमारे हिस्से भी होती। पुरानी फिल्मों में दोस्त का किरदार एकदम भावुक होता था। उससे उम्मीदें होती थीं। उसकी बेरुखी दिल तोड़ देती थी। संगम फिल्म का गाना दोस्त दोस्त न रहा और दोस्ताना का गाना-मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया सुना है कि तू बेवफा हो गया,याराना का गाना- तेरे जैसा यार कहां...कहां ऐसा याराना,ऐसे गाने पीढ़ियों तक दोस्ती की छवि गढ़ते रहे। आजकल की फिल्मों के दोस्त मौज मस्ती के होते हैं। प्रैक्टिकल होते हैं। इसीलिए दिल चाहता है दोस्ती के संबंधों को आज के संदर्भ में देखने वाली आखिरी फिल्म थी। वैसे तो बाद में न्यूयार्क और दोस्ताना भी आई। लेकिन अराधना का असली किस्सा अब दोस्ती के किस्सों का सबसे बड़ा किरदार बन गया है। अपने आप से पूछिये क्या आपके पास अराधना जैसी दोस्त है।
चौदह-पंद्रह साल की उम्र की यह दोस्ती। हम सब इस उम्र में दोस्तों को ढूंढते हैं। घर से बाहर निकलने की बेकरारी होती है। किसी और से जुड़ कर दुनिया और खुद को समझने की तड़प। उम्र के इस पड़ाव पर लगता है कि अगर दोस्त पक्का है तो जीवन में बहुत कुछ अच्छा है। हम सब के जीवन में इस उम्र के आस-पास बहुत सारे दोस्त बनते हैं और बदलते हैं क्योंकि सब एक दूसरे में सच्चा दोस्त ढूंढते हैं।
रुचिका ने अराधना में जो दोस्त ढूंढा, उसे अराधना ने साबित कर दिया। अपने मां-बाप से इस मामले को अदालत तक ले जाने की दरख्वास्त की। अराधना के पति ने बताया कि वो अपनी कंपनी से बहाने बनाकर ऑस्ट्रेलिया से चंडीगढ़ आते थे, ताकि मुकदमें की सुनवाई के वक्त मौजूद रहे। अराधना के जज़्बे को अमन ने भी समझा। अमन ने कभी अराधना को अकेले नहीं आने दिया। राठौड़ कुछ भी कर सकता था। यह पूरा मामला आज पूरी दुनिया के सामने है क्योंकि इसमें एक सच्चे दोस्त और अच्छे जीवनसाथी की बहुत ही सक्रिय भूमिका रही है।
यही मौका है एक बार फिर से समझने के लिए कि आम हिंदुस्तानी घरों में लड़कों से संस्कार की उम्मीद कम सफलता की ही आशा ज़्यादा की जाती है। उसे नहीं सिखाया जाता कि लड़कियों को किस नज़र से देखना है। सारी तालीम लड़कियों को दी जाती है कि लड़कों की नज़र से कैसे बचें। अगर लड़के को बचपन से ही यह सीखाया जाए कि लड़कियों के साथ सामान्य बर्ताव कैसे करें तो बड़े होने पर या सत्ता हासिल होने पर राठौर जैसे हिंसक और वहशी तत्व उसके भीतर पनप नहीं सकेंगे।
अपने दोस्तों के बीच इस मुद्दे को लेकर खुल कर बात करनी चाहिए। कब तक हमारे शहरों में लड़के छेड़खानी करने के लाइसेंस लिये घूमते रहेंगे। सोच कर डर लगता है कि राठौर के इस अपराध में कितने पुलिस वालों ने साथ दिया। राठौर की वकील पत्नी ने भी साथ दिया। वो लोग कैसे आज अपनी बेटियों का सामना कर रहे होंगे जिन्होंने राठौड़ की मदद की और रुचिका के पिता सुभाष गिरहोत्रा और उसके भाई को तड़पाया।
रुचिका की कहानी सामाजिक रिश्तों के दरकने और दोस्ती के बचे रह जाने की कहानी है। दोस्तों की कीमत समझने की कोशिश कीजिए। ये रिश्ता सिर्फ हंसी मज़ाक का नहीं है बल्कि उस बुरे दौर का भी बंधन है जब सारे लोग आपके खिलाफ हो जाते हैं। इसीलिए किशोरों पर दोस्तों का प्रभाव बहुत ज़्यादा होता है। अराधना ने एक बार फिर से इस दोस्ती को गौरवान्वित किया है।
फेसबुक में सैंकड़ों अनजाने लोगों से कनेक्ट होने से तो अच्छा है कि एक अराधना मिल जाए। वो कोई राहुल भी हो सकता है। इस उम्र में हम भी अपने दोस्तों की चीज़ों को अपना समझते थे। किसी की कमीज़ पहन लेते थे तो किसी को अपना जूता दे देते थे। साझा करने का आनंद दोस्त की तलाश पूरी करता है। अब लगता है कि दोस्तों के बीच भावनात्मक संबंध कमज़ोर पड़ रहे हैं। दफ्तरों की गलाकाट प्रतियोगिता दोस्तों को प्रतियोगी बना रही है। पुराने दोस्त या तो कहीं छूट गए या फिर भूल गए।
दोस्ताना,याराना,दोस्ती, दिल चाहता है जैसी फिल्मों को देखकर लगता रहा कि काश ऐसी दोस्ती हमारे हिस्से भी होती। पुरानी फिल्मों में दोस्त का किरदार एकदम भावुक होता था। उससे उम्मीदें होती थीं। उसकी बेरुखी दिल तोड़ देती थी। संगम फिल्म का गाना दोस्त दोस्त न रहा और दोस्ताना का गाना-मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया सुना है कि तू बेवफा हो गया,याराना का गाना- तेरे जैसा यार कहां...कहां ऐसा याराना,ऐसे गाने पीढ़ियों तक दोस्ती की छवि गढ़ते रहे। आजकल की फिल्मों के दोस्त मौज मस्ती के होते हैं। प्रैक्टिकल होते हैं। इसीलिए दिल चाहता है दोस्ती के संबंधों को आज के संदर्भ में देखने वाली आखिरी फिल्म थी। वैसे तो बाद में न्यूयार्क और दोस्ताना भी आई। लेकिन अराधना का असली किस्सा अब दोस्ती के किस्सों का सबसे बड़ा किरदार बन गया है। अपने आप से पूछिये क्या आपके पास अराधना जैसी दोस्त है।
वन-रूम सेट का रोमांस- दिल्ली मेरी जान (6)
शहर बड़ा अजीब लगता था। आबादी को पचाने के लिए इसका पेट फैला जा रहा था। बेरसराय के सारे मकान ऊंचे होने लगे। गली-गली में वन रूम सेट के छोटे-छोटे पोस्टर लग गए। सफेद काग़ज़ पर काले काले मोटे अक्षर। कंप्यूटर के आने से पोस्टर लगाना आसान हो गया। मेस खुलने लगे। अंडा-पराठा और आचार-पराठा। मेस की मेज़ आचार और नमकदानी के साथ सिगरेटदानी से सजी होती थी। एक टीवी भी होता था। क्रिकेट मैच के दौरान पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक उफानों को राष्ट्रवादी मुलम्मों के साथ व्यक्त करने का मंच बनता जा रहा था। सईद अनवर के जमते ही सांसे पत्थर हो जाती थीं। वेंकटेश प्रसाद की उखड़ती गेंदों से जब विकेट चटकते थे तो जान में जान आ जाती थी। भोजन पूरा होता रहता था। प्रवासी छात्रों ने उधार की प्रक्रिया में हाथ जलाना शुरू कर दिया। एक सिगरेट को तीन लोग पीने लगे। सिगरेट छोड़ देने का साप्ताहिक प्रण लिया जाने लगा। तोड़ा जाने लगा।
जवाहर बुक डिपो के आस-पास मंडराने वाले महान भारत के भावी लोकसेवक। हर असली किताब का नकली प्रिंट। छापे पड़ते थे। दुकान फिर खुलती थी। हर किताब फार्मूला की तरह देखी जाती थी। चलता है या नहीं चलता है। राजीव भैया ने सूची जारी कर दी है। एकाध राजीव भैया टाइप लोग यूपीएससी की कामयाबी के चलते तमाम कमरों में किसी सचिन तेंदुलकर की तरह चर्चा में आ जाते थे। दूर दूर से वन रूम सेट के बाशिंदे निकल कर राजीव भैया के वन रूम सेट तक पहुंच जाते थे। यूपीएससी निकालना मज़ाक नहीं था। इसका हो गया रे...आयं रे, इ हो यूपीएससी कर गईस। बड़ा दहेज मिलेगा हो। मां-बाप का नाम रोशन कर दिहीस। हमारे बिहार के गांव-घरों में रौशनी इन्हीं सब कामयाबी की ख़बरों से होती है। दहेज के सामानों का भविष्य तय होता था। जवाहर बुक डिपो बिहार यूपी के गांव-घरों में शाहजहां रोड पर बने यूपीएससी के दफ्तर से ज़्यादा लोकप्रिय हो गया।
किशोर कुमार के गानों से किसी की कामयाबी से पैदा हुआ दर्द हल्का होता रहता था। शाहरूख़ ख़ान के निगेटिव रोल से दिल्ली की लड़कियों को तरसती निगाहों से देखने वाले गांव-घरों के राजकुमारों को सुकून पहुंच रहा था। कुछ लड़कों ने तैयारियों के सिलसिले में सांझा चूल्हा चालू कर लिया था। महान भारत के भावी सेवक खिचड़ी से लेकर मटन बनाने के विशेषज्ञ हो रहे थे। योजना पत्रिका के आंकड़ों को घोट रहे थे। रोज़गार समाचार और द हिंदू के संपादकीय। भारतीय दैनिक ज्ञान भंडार के मूल स्त्रोत। सफलता के कई ताबीज इनसे चुराई गई मंत्रों से बने थे। फ्रंटलाइन और इंडिया टुडे से निकली जानकारियां लोकसेवकों के ज्ञान चक्षु खोल रही थीं।
मनोज तिवारी का गाना इसी दौरान लांच हो गया था। गांव में किसी ने मज़ाक में पूछा था कि कब से दिल्ली में हैं। कब आइयेगा। अगले साल आईएएस हो जाएगा? संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो बोले कि मनोज तिवारी का गाना सुनले बानी जी। ना...कौन हवे इ। नचनिया-बजनिया के चक्कर में हम ना घूमी। चाचा जी ने कहा सुन लीह। निमन गवले बा। जब गाना सुना तो काठ मार गया। महान भारत के लोकसेवक बन कर दिल्ली से लौट आने के इंतज़ार में बैठे मां-बाप के भावों को मनोज तिवारी ने पकड़ लिया था और गा दिया था। इस गाने के कारण कामयाबी का इंतज़ार कर रहे कई भावी लोकसेवक गांव आने से डरने लगे। सुना है कि जुबली हॉल में भी ये गाना बजने लगा। पता चल गया कि चाचाजी ने इस गाने के ज़रिये औकात दिखाने की कोशिश की है। गांव-घरों में नाकाम लड़कों की सामाजिक हैसियत इन्हीं सब तंजो से तय होती है। उनका लड़का बनाम हमारा लड़का चलता रहता है। रिश्तेदारों का डायलॉग होता था- गईल रहले बबुआ। रोपया उड़ावत रहले। समझा समझा कर थक गया कि मैं लोकसेवक नहीं बनूंगा। कंपटीशन नहीं दूंगा। फिर भी तमाम महान नाकाम लोकसेवकों में गिना गया। मेरे पड़ोस के चाचाजी ने ऐसे नाकाम विद्यार्थियों के लिए जुमला निकाला था- बुरबक विद्यार्थी का बस्ता भारी।
मनोज तिवारी का गाना है- अस्सीये में ले के एडमिशन..कंपटीशन देता। ये गाना वन-रूम सेट में रह रहे प्रवासी छात्रों की दास्तान का एक लोक दस्तावेज़ है। गाने का भाव कुछ ऐसा है कि सन अस्सी से ही यूपीएससी दे रहा है। नहीं हो रहा है। मूंछ मुंडा ली है। मनोज का गाना चल रहा है। दिल्ली,इलाहाबाद और काशी के हॉस्टलों और वन-रूम सेटों से यथार्थ निकल कर लोकधुन में मन रमाने लगता है।
चानी पर के बार... चांनी पर के बार झरल....
मोछ के निशान नईखे
ओभर भइल एज बाकीर
तनिको गुमान नईखे
चानस भिड़ौले बाटे
चानस लहौले बाटे
दे के पटीशन
कंपटीशन देता
इस गाने की समीक्षा बाद में करूंगा। लेकिन यह गाना वन रूम सेट के बुढ़ाये बाबाओं की सामाजिक मानसिक कथाओं को कहता है। कंपटीशन देना अपने आप में आरंभिक योग्यता की निशानी है। शादी के लिए अगुआ यानी लड़की वाले आते हैं और पिता की अकड़ का गज़ब का विश्लेषण है। मंडल के बाद उम्र की सीमा बढ़ा दी गई थी। चांस भी बढ़ गए थे। कंपटीशन देना एक काम हो गया था। कंपटीशन भविष्य निर्माण का आंदोलन। वन रूम सेट के खोह में इस आंदोलन की व्यक्तिगत,सामूहिक रणनीति बनाई जाती थी।
कंपटीशन देना एक सनातन प्रक्रिया के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था। पटना से दिल्ली ड्राफ्ट आने लगे थे। पासबुक। कई वन रूम सेट में यूपीएससी देने वाले बाबा और देवता के रूप में पुकारे जाने लगे। कोई प्रीलिम्स निकाल कर क्वार्टर अफसर बन जाता था तो कोई मेन तक पहुंच कर आधा अफसर बन जाता था। जुबली हॉल में कई ऐसे प्रौढ़ प्रतियोगियों को बाबा पुकारे जाते हुए सुना था। बाल मुंडा कर मेन्स देने का कर्मकांड किस प्रतिभाशाली ब्राह्मण की देन है,पता लगाया जाना चाहिए। अजीब सा चलन था। वन-रूम सेट ऐसे बाबाओं के किस्सों से आबाद होने लगे। यूपीएससी के अस्थाई सलाहकार। अच्छे खासे जवान लड़के यूपीएससी के कारण बुढ़ा गए। बाबा कहलाने लगे। वन-रूम सेट का रोमांस जारी है।
जवाहर बुक डिपो के आस-पास मंडराने वाले महान भारत के भावी लोकसेवक। हर असली किताब का नकली प्रिंट। छापे पड़ते थे। दुकान फिर खुलती थी। हर किताब फार्मूला की तरह देखी जाती थी। चलता है या नहीं चलता है। राजीव भैया ने सूची जारी कर दी है। एकाध राजीव भैया टाइप लोग यूपीएससी की कामयाबी के चलते तमाम कमरों में किसी सचिन तेंदुलकर की तरह चर्चा में आ जाते थे। दूर दूर से वन रूम सेट के बाशिंदे निकल कर राजीव भैया के वन रूम सेट तक पहुंच जाते थे। यूपीएससी निकालना मज़ाक नहीं था। इसका हो गया रे...आयं रे, इ हो यूपीएससी कर गईस। बड़ा दहेज मिलेगा हो। मां-बाप का नाम रोशन कर दिहीस। हमारे बिहार के गांव-घरों में रौशनी इन्हीं सब कामयाबी की ख़बरों से होती है। दहेज के सामानों का भविष्य तय होता था। जवाहर बुक डिपो बिहार यूपी के गांव-घरों में शाहजहां रोड पर बने यूपीएससी के दफ्तर से ज़्यादा लोकप्रिय हो गया।
किशोर कुमार के गानों से किसी की कामयाबी से पैदा हुआ दर्द हल्का होता रहता था। शाहरूख़ ख़ान के निगेटिव रोल से दिल्ली की लड़कियों को तरसती निगाहों से देखने वाले गांव-घरों के राजकुमारों को सुकून पहुंच रहा था। कुछ लड़कों ने तैयारियों के सिलसिले में सांझा चूल्हा चालू कर लिया था। महान भारत के भावी सेवक खिचड़ी से लेकर मटन बनाने के विशेषज्ञ हो रहे थे। योजना पत्रिका के आंकड़ों को घोट रहे थे। रोज़गार समाचार और द हिंदू के संपादकीय। भारतीय दैनिक ज्ञान भंडार के मूल स्त्रोत। सफलता के कई ताबीज इनसे चुराई गई मंत्रों से बने थे। फ्रंटलाइन और इंडिया टुडे से निकली जानकारियां लोकसेवकों के ज्ञान चक्षु खोल रही थीं।
मनोज तिवारी का गाना इसी दौरान लांच हो गया था। गांव में किसी ने मज़ाक में पूछा था कि कब से दिल्ली में हैं। कब आइयेगा। अगले साल आईएएस हो जाएगा? संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो बोले कि मनोज तिवारी का गाना सुनले बानी जी। ना...कौन हवे इ। नचनिया-बजनिया के चक्कर में हम ना घूमी। चाचा जी ने कहा सुन लीह। निमन गवले बा। जब गाना सुना तो काठ मार गया। महान भारत के लोकसेवक बन कर दिल्ली से लौट आने के इंतज़ार में बैठे मां-बाप के भावों को मनोज तिवारी ने पकड़ लिया था और गा दिया था। इस गाने के कारण कामयाबी का इंतज़ार कर रहे कई भावी लोकसेवक गांव आने से डरने लगे। सुना है कि जुबली हॉल में भी ये गाना बजने लगा। पता चल गया कि चाचाजी ने इस गाने के ज़रिये औकात दिखाने की कोशिश की है। गांव-घरों में नाकाम लड़कों की सामाजिक हैसियत इन्हीं सब तंजो से तय होती है। उनका लड़का बनाम हमारा लड़का चलता रहता है। रिश्तेदारों का डायलॉग होता था- गईल रहले बबुआ। रोपया उड़ावत रहले। समझा समझा कर थक गया कि मैं लोकसेवक नहीं बनूंगा। कंपटीशन नहीं दूंगा। फिर भी तमाम महान नाकाम लोकसेवकों में गिना गया। मेरे पड़ोस के चाचाजी ने ऐसे नाकाम विद्यार्थियों के लिए जुमला निकाला था- बुरबक विद्यार्थी का बस्ता भारी।
मनोज तिवारी का गाना है- अस्सीये में ले के एडमिशन..कंपटीशन देता। ये गाना वन-रूम सेट में रह रहे प्रवासी छात्रों की दास्तान का एक लोक दस्तावेज़ है। गाने का भाव कुछ ऐसा है कि सन अस्सी से ही यूपीएससी दे रहा है। नहीं हो रहा है। मूंछ मुंडा ली है। मनोज का गाना चल रहा है। दिल्ली,इलाहाबाद और काशी के हॉस्टलों और वन-रूम सेटों से यथार्थ निकल कर लोकधुन में मन रमाने लगता है।
चानी पर के बार... चांनी पर के बार झरल....
मोछ के निशान नईखे
ओभर भइल एज बाकीर
तनिको गुमान नईखे
चानस भिड़ौले बाटे
चानस लहौले बाटे
दे के पटीशन
कंपटीशन देता
इस गाने की समीक्षा बाद में करूंगा। लेकिन यह गाना वन रूम सेट के बुढ़ाये बाबाओं की सामाजिक मानसिक कथाओं को कहता है। कंपटीशन देना अपने आप में आरंभिक योग्यता की निशानी है। शादी के लिए अगुआ यानी लड़की वाले आते हैं और पिता की अकड़ का गज़ब का विश्लेषण है। मंडल के बाद उम्र की सीमा बढ़ा दी गई थी। चांस भी बढ़ गए थे। कंपटीशन देना एक काम हो गया था। कंपटीशन भविष्य निर्माण का आंदोलन। वन रूम सेट के खोह में इस आंदोलन की व्यक्तिगत,सामूहिक रणनीति बनाई जाती थी।
कंपटीशन देना एक सनातन प्रक्रिया के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था। पटना से दिल्ली ड्राफ्ट आने लगे थे। पासबुक। कई वन रूम सेट में यूपीएससी देने वाले बाबा और देवता के रूप में पुकारे जाने लगे। कोई प्रीलिम्स निकाल कर क्वार्टर अफसर बन जाता था तो कोई मेन तक पहुंच कर आधा अफसर बन जाता था। जुबली हॉल में कई ऐसे प्रौढ़ प्रतियोगियों को बाबा पुकारे जाते हुए सुना था। बाल मुंडा कर मेन्स देने का कर्मकांड किस प्रतिभाशाली ब्राह्मण की देन है,पता लगाया जाना चाहिए। अजीब सा चलन था। वन-रूम सेट ऐसे बाबाओं के किस्सों से आबाद होने लगे। यूपीएससी के अस्थाई सलाहकार। अच्छे खासे जवान लड़के यूपीएससी के कारण बुढ़ा गए। बाबा कहलाने लगे। वन-रूम सेट का रोमांस जारी है।
कब कटेगी चौरासी- कब पढ़ेंगे आप

जरनैल सिंह ने चिदंबरम पर जूता फेंक कर सही किया। जूता नही फेंकता तो चौरासी के दंगों की ऐसी भयानक दास्तान किताब की शक्ल में नहीं आ पाती। हर पन्ने में हत्या,बलात्कार और निर्ममता के ऐसे वाकयात हैं जिन्हें पढ़ते हुए आंखें बंद हो जाती हैं। दिल्ली इतना ख़ून पी सकती है,पचा सकती है,जब इस किताब को खतम किया तो अहसास हुआ। तभी जाना कि उन्नीस साल गुज़ार देने के बाद भी शहर से रिश्ता क्यों नहीं बना। वैसे भी जिस जगह पर अलग अलग शहरों से आ कर लोग रोज़मर्रा संघर्ष में जुटे रहते हैं वहां सामाजिक संबंध कमज़ोर ही होते हैं। हर किसी की एक दूसरे से होड़ होती है। घातक। कस्बों और कम अवसर वाले शहरों में रिश्ते मज़बूत होते हैं। भावनात्मक लगाव बना रहता है। किसी बड़े शहर के हो जाने के बाद भी। लेकिन कब कटेगी चौरासी पढ़ते पढ़ते यही लगा कि कांग्रेस समर्थित दंगे का समर्थन लोग भी कर रहे थे। भीड़ सिर्फ कांग्रेसी नहीं थी। इस भीड़ में आम शहरी भी शामिल थे। जो चुप रह गए,वो भी शामिल थे। उनकी यादों में चौरासी कैसे पच गया होगा,अब यह जानने के लिए बेचैन हो गया हूं। जिन लोगों ने अपनी आंखों के सामने पड़ोसी की किसी सरबजीत कौर की अस्मत लूटते हुए और उसकी चीख सुनते हुए अपनी रातें चुप चाप काट ली होंगी,जरनैल तुम इन पड़ोसियों से भी बात करो। उन पर भी किताब लिखो। इस किताब में पड़ोसी के बर्ताव,भय और छोटी मोटी कोशिशों की भी चर्चा है। उस पड़ोसी की भी है जिसने बचाने की कोशिश की और जान दे दी। लेकिन अलग से किताब नहीं है।
‘त्रिलोकपुरी, ब्ल़ॉक-३२। सुबह आंखों के सामने अपने पति और परिवार के १० आदमियों को दंगाइयों के हाथों कटते-मरते देखा था और अब रात को यही कमीने हमारी इज़्ज़त लूटने आ गए थे।‘यह कहते हुए भागी कौर के अंदर मानो ज्वालामुखी धधकने लगता है। ‘दरिंदों ने सभी औरतों को नंगा कर दिया था। हम मजबूर,असहाय औरतों के साथ कितने लोगों ने बलात्कार किया,मुझे याद नहीं। मैं बेहोश हो चुकी थी। इन कमीनों ने किसी औरत तो रात भर कपड़ा तक पहनने नहीं दिया।‘
‘इतनी बेबस औऱ लाचार हो चुकी थीं कि चीख़ मारने की हिम्मत जवाब दे गई थी। जिस औरत ने हाथ-पैर जोड़ कर छोड़ देने की गुहार की तो उससे कहा आदमी तो रहे नहीं, अब किससे शर्म करती हो।‘
जरनैल ने व्यक्तिगत किस्सों से चौरासी का ऐसा मंज़र रचा है जिसके संदर्भ में मनमोहन सिंह की माफी बेहद नाटकीय लगती है। नेताओं को सज़ा नहीं मिली। वो भीड़ कहां भाग कर गई? वो पुलिस वाले कहां गए और वो प्रेस कहां गई। सब बच गए। प्रेस भी तो इस हत्या में शामिल थी। नहीं? मैं नहीं जानता लेकिन जरनैल के वृतांतों से पता चलता है कि चौरासी के दंगों में प्रेस भी शामिल थी।
जरनैल लिख रहे हैं। इतने बड़े ज़ुल्म के बाद भी आसपास मरघट जैसी शांति बनी रही, मानो कुछ हुआ ही नहीं। मीडिया मौन है और टीवी पर सिर्फ इंदिरा गांधी के मरने के शोक संदेश आ रहे हैं। तीन हज़ार निर्दोष सिख राजधानी में क़त्ल हो गए और कोई ख़बर तक नहीं। क्या लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ सत्ता का गुलाम हो गया था, या इसने भी मान लिया था कि सिखों के साथ सही हो रहा है? यह तो इंडियन एक्सप्रेस के राहुल बेदी संयोग से ३२ ब्लॉक त्रिलोकपुरी तक पहुंचे तो इस बारे में ख़बर आई।
ये है महान भारत की महान पत्रकारिता। हर बात में अपनी पीठ थपथपाने वाली पत्रकारिता। मनमोहन सिंह की तरह इसे भी माफी मांग कर नाटक करना चाहिए। कम से कम खाली स्पेस ही छोड़ देते। यह बताने के लिए कि पुलिस दंगा पीड़ित इलाकों में जाने नहीं दे रही इसलिए हम यह स्पेस छोड़ रहे हैं। इमरजेंसी के ऐसे प्रयासों को प्रेस आज तक गाती है। ८४ की चुप्पी पर रोती भी नहीं।
शुक्रिया पुण्य प्रसून वाजपेयी का। उन्हीं की समीक्षा के बाद जरनैल सिंह की किताब पढ़ने की बेकरारी पैदा हुई। सिख दंगों को देखते,भोगते हुए एक प्रतिभाशाली क्रिकेटर अच्छा हुआ पत्रकार बन गया। वर्ना ये बातें दफन ही रह जातीं। जिस लाजपत नगर में जरनैल सिंह रहते हैं, उसके एम ब्लॉक में अपना भी रहना हुआ है। दोस्तों के घर जाकर रहता था। कई साल तक। कभी अहसास ही नहीं हुआ कि यहां ज़ख्मों का ऐसा जख़ीरा पड़ा हुआ है। ये जगह चौरासी की सिसकियों को दबा कर नई ज़िंदगी रच रही है। हम सब प्रवासी छात्र लाजपतनगर के इन भुक्तभोगियों को कभी मकान मालिक से ज़्यादा समझ ही नहीं सके। दरअसल यही समस्या होती है। महानगरों की आबादी अपने आस पडोस को संबंधों के इन्हीं नज़रिये से देखती है। कई साल बाद जब तिलकविहार गया तो लगा कि सरकार ने दंगा पीड़ितों पर रसायन का लेप लगाकर इन्हें हमेशा के लिए बचा लिया है। तिलकविहार के कमरे,उनमें रहने वाले लोग इस तरह से लगे जैसे कोई हज़ार साल पहले मार दिये गए हों लेकिन मदद राशि की लेप से ज़िंदा लगते हों। ममी की तरह। त्रिलोकपुरी से रोज़ गुज़रता हूं। तिलकविहार की रहने वाली एक महिला ने कहा था कि वहां हमारा सब कुछ था। यहां कुछ नहीं है। हर दिन खुद से वादा करता हूं कि त्रिलोकपुरी जा कर देखना है। अब लगता है कि चिल्ला गांव जाना चाहिए। जहां से आई भीड़ ने त्रिलोकपुरी के महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। महसूस करना चाहता हूं कि यहां से आए वहशी कैसे अपने भीतर पूरे वाकये को ज़ब्त किये बैठे हैं। बिना पछतावे के। कैसे किसी एक ने भी अपने गुनाह नहीं कबूले। अगर पछतावे को लेकर कांग्रेस और मनमोहन सिंह इतने ही ईमानदार हैं तो त्रिलोकपुरी जाएं, तिलकविहार जायें और दंगा पीड़ितों से आंख मिलाकर माफी मांगे। संसद की कालीन ताकते हुए माफी का कोई मतलब नहीं होता।
ख़ैर। मैं इस किताब का प्रचारक बन गया हूं। इस शर्म के साथ मैंने उन पत्रकारों की बहस क्यों सुनी जिनसे आवाज़ आई कि जरनैल को अकाली दल से पैसा मिला है। जरनैल का पोलिटिक्स में कैरियर बन गया। शर्म आ रही है अपने आप पर। जरनैल ने जो किया सही किया। जो भी किया मर्यादा में किया। जरनैल के ही शब्दों में अभूतपूर्व अन्याय के ख़िलाफ अभूतपूर्व विरोध था। आप सबसे एक गुज़ारिश है। पेंग्विन प्रकाश से छपी निन्यानबे रुपये की इस किताब को ज़रूर पढ़ियेगा। त्रिलोकपुरी और तिलकविहार ज़रूर जाइयेगा और हां एक बात और,पढ़ने के बाद अपने अपने पूर्वाग्रहों से संवाद कीजिएगा।
पोपुलर प्रेस का आगमन
यूरोप की १८४८ की क्रांति पर एक किताब पढ़ रहा था। Jonathan Sperber की। इस किताब के एक हिस्से में पत्रकारिता पर भी चर्चा है। कैसे १८४८ की क्रांति के दौरान यूरोप के कई शहरों में अख़बारों की संख्या बढ़ती जाती है। उनका प्रसार बढ़ता है। प्रशिया के राइन प्रांत के तीन ज़िलों से निकलने वाले अख़बारों की संख्या सत्तर हो गई थी। इनमें से ३४ की स्थापना १८४८ की क्रांति के दौरान हुई। आस्ट्रिया साम्राज्य से उन्यासी अख़बार निकल रहे थे। सिर्फ उन्नीस को इजाज़त थी कि वे राजनीतिक मामलों की चर्चा कर सकते थे। सेंसर के तहत। ये सारे अख़बार जर्मन में थे।
अख़बारों की संख्या और प्रसार में वृद्धि के साथ पोपुलर प्रेस को लेकर बहस शुरू हो गई। क्या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ आए इस सवाल को लेकर जूझ रहे थे। स्पर्बर कहते हैं कि इस दौरान पत्रकारिता के भीतर कई तरह की स्टाइल का जन्म और विकास हुआ। पहली बार पोपुलर प्रेस की दिशा में प्रयास हुए। १८४८ के पहले के अख़बारों की ख़बरें और लेख ज्ञानपूर्ण हुआ करती थीं। अकादमिक शैली में। कम ही लोग समझ पाते थे और अनुसरण कर पाते थे। क्योंकि कम ही लोग बारहवीं तक पास थे। शिक्षा का प्रसार नहीं हुआ था। लेकिन अल्प साक्षर जनता राजनीति में काफी सक्रिय थी। क्रांति की घटनाओं ने आबादी के बड़े हिस्से को राजनीतिक रूप से सक्रिय कर दिया था। पत्रकारिता के सामने एक समस्या आई। संवाद की समस्या। साहित्यिक शैली के लेखों के पाठकों और ख़बरों के प्रति बेचैन आम जनता के बीच संवाद की भाषा क्या हो। ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक कैसे पहुंचे।
क्रांति के दौरान कई अख़बार पढ़े लिखे तबके के लिए छप रहे थे लेकिन कुछ अख़बारों ने लोकरूप धारण करने का रास्ता चुन लिया। एक अख़बार का नाम था- New Cologne News for Townfolk, Country People and Soldier। इसका संपादन एक महिला कर रही थी। यह अख़बार मार्क्स के संपादित अख़बार Neue Rheinische Zeitung से अलग था। दोनों के टोन अलग थे। मार्क्स की लिखावट क्लिष्ट थी। जिसे आम आदमी के लिए समझना मुश्किल हो रहा था। वहीं कुछ अख़बार ऐसे निकलने लगे जो सिर्फ किसानों को अपना पाठक मान कर चल रहे थे। हंगरी,फ्रांस और जर्मनी से निकलने वाले कई अखबारों के नाम The Village Sheet,The Village News थे। गांवों से शहर मज़दूरी करने आने वाले लोगों के बीच ये अख़बार बांटे जा रहे थे।
इस तरह से आम लोगों के बीच राजनीति की ख़बरें पहुंचने लगीं। इससे पहले उन तक संतों की कथाएं,पंचांग और कैलेंडर ही पहुंच रहे थे। एक पन्ने का अख़बार होता था। शब्द कम होते थे और चित्र ज़्यादा। ताकि लोग समझ सकें। राजनीतिक नारे,ख़बरें आदि छप रही थीं। तंज करने वाले कार्टून का भी आगमन हो चुका था। इससे पहले जो खबरें होती थीं वो अपराध और विचित्र किंतु सत्य कैटगरी की हुआ करती थीं।
स्पर्बर कहते हैं कि उस दौरान अख़बार व्यक्तिगत पठन के लिए नहीं थे। सामूहिक पाठ होता था। कॉफीशॉप चर्च और सियासी क्लबों में। ऊंची आवाज़ में पढ़े जाते थे। अपनी कॉपी होने का बोध और चलन शुरू नहीं हुआ था। एक आदमी पढ़ता था और कई लोग झुंड बनाकर सुनते थे। साथ-साथ प्रश्नोत्तरी भी चलते रहती थी। लोग बीच में टोक कर किसी हिस्से को समझाने के लिए कहते थे। पढ़ने वाला समझाता था कि मतलब क्या है।
अख़बारों की संख्या और प्रसार में वृद्धि के साथ पोपुलर प्रेस को लेकर बहस शुरू हो गई। क्या लिखा जाए जो आम आदमी को समझ आए इस सवाल को लेकर जूझ रहे थे। स्पर्बर कहते हैं कि इस दौरान पत्रकारिता के भीतर कई तरह की स्टाइल का जन्म और विकास हुआ। पहली बार पोपुलर प्रेस की दिशा में प्रयास हुए। १८४८ के पहले के अख़बारों की ख़बरें और लेख ज्ञानपूर्ण हुआ करती थीं। अकादमिक शैली में। कम ही लोग समझ पाते थे और अनुसरण कर पाते थे। क्योंकि कम ही लोग बारहवीं तक पास थे। शिक्षा का प्रसार नहीं हुआ था। लेकिन अल्प साक्षर जनता राजनीति में काफी सक्रिय थी। क्रांति की घटनाओं ने आबादी के बड़े हिस्से को राजनीतिक रूप से सक्रिय कर दिया था। पत्रकारिता के सामने एक समस्या आई। संवाद की समस्या। साहित्यिक शैली के लेखों के पाठकों और ख़बरों के प्रति बेचैन आम जनता के बीच संवाद की भाषा क्या हो। ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक कैसे पहुंचे।
क्रांति के दौरान कई अख़बार पढ़े लिखे तबके के लिए छप रहे थे लेकिन कुछ अख़बारों ने लोकरूप धारण करने का रास्ता चुन लिया। एक अख़बार का नाम था- New Cologne News for Townfolk, Country People and Soldier। इसका संपादन एक महिला कर रही थी। यह अख़बार मार्क्स के संपादित अख़बार Neue Rheinische Zeitung से अलग था। दोनों के टोन अलग थे। मार्क्स की लिखावट क्लिष्ट थी। जिसे आम आदमी के लिए समझना मुश्किल हो रहा था। वहीं कुछ अख़बार ऐसे निकलने लगे जो सिर्फ किसानों को अपना पाठक मान कर चल रहे थे। हंगरी,फ्रांस और जर्मनी से निकलने वाले कई अखबारों के नाम The Village Sheet,The Village News थे। गांवों से शहर मज़दूरी करने आने वाले लोगों के बीच ये अख़बार बांटे जा रहे थे।
इस तरह से आम लोगों के बीच राजनीति की ख़बरें पहुंचने लगीं। इससे पहले उन तक संतों की कथाएं,पंचांग और कैलेंडर ही पहुंच रहे थे। एक पन्ने का अख़बार होता था। शब्द कम होते थे और चित्र ज़्यादा। ताकि लोग समझ सकें। राजनीतिक नारे,ख़बरें आदि छप रही थीं। तंज करने वाले कार्टून का भी आगमन हो चुका था। इससे पहले जो खबरें होती थीं वो अपराध और विचित्र किंतु सत्य कैटगरी की हुआ करती थीं।
स्पर्बर कहते हैं कि उस दौरान अख़बार व्यक्तिगत पठन के लिए नहीं थे। सामूहिक पाठ होता था। कॉफीशॉप चर्च और सियासी क्लबों में। ऊंची आवाज़ में पढ़े जाते थे। अपनी कॉपी होने का बोध और चलन शुरू नहीं हुआ था। एक आदमी पढ़ता था और कई लोग झुंड बनाकर सुनते थे। साथ-साथ प्रश्नोत्तरी भी चलते रहती थी। लोग बीच में टोक कर किसी हिस्से को समझाने के लिए कहते थे। पढ़ने वाला समझाता था कि मतलब क्या है।
दिल्ली के आसमान में चांद
गोल ही अच्छा लगता है चांद
भोला सा
जैसे निकल आया हो मेरे गांव से
दिल्ली के आसमान में
बिना बताये
बाबूजी और मुखिया जी को
आवारा लग रहा था
दिल्ली के आसमान में
कैसे खा गया था रेड लाईट से चकमा
रूक रूक के निकलना पड़ा था चांद को
लौटने से पहले अपने गांव
घंटों फंसे रहना पड़ा था जाम में
मुंह चिढ़ा कर निकल गई थी मेट्रो
जिसने देखा भी उसने भी नहीं पहचाना
मेरे भोले चांद को
अनजाना,अकेला और अजीब लग रहा था
दिल्ली के आसमान में
जहां मोहब्बत की कसमें तरंगों में बदल कर
धड़कती रहीं चकोरों के फोन में
और ख़त्म हो चुका था चांद का इंतज़ार
दिल्ली के आसमान में
जहां तकियों के नीचे छुपाकर चेहरा
रची जाने लगी थीं इश्क की कल्पनाएं
आवारा लग रहा था चांद
दिल्ली के आसमान में
भोला सा
जैसे निकल आया हो मेरे गांव से
दिल्ली के आसमान में
बिना बताये
बाबूजी और मुखिया जी को
आवारा लग रहा था
दिल्ली के आसमान में
कैसे खा गया था रेड लाईट से चकमा
रूक रूक के निकलना पड़ा था चांद को
लौटने से पहले अपने गांव
घंटों फंसे रहना पड़ा था जाम में
मुंह चिढ़ा कर निकल गई थी मेट्रो
जिसने देखा भी उसने भी नहीं पहचाना
मेरे भोले चांद को
अनजाना,अकेला और अजीब लग रहा था
दिल्ली के आसमान में
जहां मोहब्बत की कसमें तरंगों में बदल कर
धड़कती रहीं चकोरों के फोन में
और ख़त्म हो चुका था चांद का इंतज़ार
दिल्ली के आसमान में
जहां तकियों के नीचे छुपाकर चेहरा
रची जाने लगी थीं इश्क की कल्पनाएं
आवारा लग रहा था चांद
दिल्ली के आसमान में
लाइब्रेरी
वो किताबें आज भी वहीं रखी होंगी
एक के ऊपर एक
किसी कोने में दबीं होंगी
जिनके पन्नों को पलट दिया था तुमने
शब्दों में गड़े इतिहास को ज़िंदा करने के लिए
उन पर पड़ती उंगलियां तुम्हारी
और उनसे टकराती उंगलियां मेरी
धड़कने लगा था इतिहास सारा
हम दोनों के उस एकांत में
मुग़लिया सल्तनत का विस्तार होने लगा था
और मेरे इतिहास बोध का
वो तुम्हारी बिंदी, जहां दिल था मेरी सल्तनत का
पीली तारों से बुनी तुम्हारी काली चादर
महफ़ूज़ कर रही थी मेरी क़ायनात को
छू जाता था जब तुम्हारे कंधे से मेरा कंधा
हलचल मच जाती थी पूरी सल्तनत में
सामंतवाद था या नहीं भारत में
राष्ट्रवाद की समझ कैसे पैदा होती है
उसके दो नागरिकों में
लाइब्रेरी के कोने में बैठे
किताबों के पन्नों से
गरम होतीं सांसों से पिघलता था
मजबूरियों का लोहा
मिलने की कसमें कितनी आज़ाद लगती थीं
जब तुम पलट देती थी फिर कोई नया पन्ना
मुर्दा किरदारों ने भी समझा तब
इतिहास दो ज़िंदा लोगों का होता है।
एक के ऊपर एक
किसी कोने में दबीं होंगी
जिनके पन्नों को पलट दिया था तुमने
शब्दों में गड़े इतिहास को ज़िंदा करने के लिए
उन पर पड़ती उंगलियां तुम्हारी
और उनसे टकराती उंगलियां मेरी
धड़कने लगा था इतिहास सारा
हम दोनों के उस एकांत में
मुग़लिया सल्तनत का विस्तार होने लगा था
और मेरे इतिहास बोध का
वो तुम्हारी बिंदी, जहां दिल था मेरी सल्तनत का
पीली तारों से बुनी तुम्हारी काली चादर
महफ़ूज़ कर रही थी मेरी क़ायनात को
छू जाता था जब तुम्हारे कंधे से मेरा कंधा
हलचल मच जाती थी पूरी सल्तनत में
सामंतवाद था या नहीं भारत में
राष्ट्रवाद की समझ कैसे पैदा होती है
उसके दो नागरिकों में
लाइब्रेरी के कोने में बैठे
किताबों के पन्नों से
गरम होतीं सांसों से पिघलता था
मजबूरियों का लोहा
मिलने की कसमें कितनी आज़ाद लगती थीं
जब तुम पलट देती थी फिर कोई नया पन्ना
मुर्दा किरदारों ने भी समझा तब
इतिहास दो ज़िंदा लोगों का होता है।
पा अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नहीं है
न औरो की है। असाधारण बीमारी को साधारण बनाकर यह फिल्म कुछ और हो जाती है। फ़िल्म के छोटे-छोटे किस्से अपनी मूल कहानी से छिटक कर अलग दुनिया रचते हैं। जो ज़्यादा गंभीर और असाधारण है। बहुत ज़्यादा इमोशनल लोड नहीं डालती है यह फ़िल्म। बल्कि गहन भावुक क्षणों में सामान्य होने की सीख देती है। साफ़-सुथरी फ़िल्म है पा। लेकिन सिर्फ पा की नहीं है।
किसी ने नोटिस क्यों नहीं किया। यह फ़िल्म राजनेता के छवि को बेहतर तरीके से गढ़ती है और राजनेता के ज़रिये मीडिया को आईना दिखलवाती है। अच्छा सा नेता। कांग्रेस के युवा ब्रिगेड की तरह खादी का कुर्ता-पायजामा पहनने वाला नेता,जो राजनीति में शतरंजी चाल की परवाह किये बिना काम करना चाहता है। इससे पहले की किस फ़िल्म ने राजनेताओं में इतना भरोसा पैदा करने की कोशिश की है,याद नहीं है। हो सकता है मुझसे छूट गई हो। एक ऐसा नेता जो सरकारी मीडिया पर भरोसा करता है। दूरदर्शन पर। उसका इस्तमाल करता है। दूरदर्शन के पहुंच का इस्तमाल करता है और हम प्राइवेट न्यूज़ चैनल के पत्रकारों के मुंह पर गोबर फेंक देता है। तभी किसी पत्रकार ने फ़िल्म के इस पहलु की चर्चा नहीं की,या फिर मुझी से वैसी समीक्षा छूट गई होगी।
अब वाकई डर लगता है। हमारी साख क्या इतनी खतम हो गई है कि कोई नेता हमारे घर अपने लोगों को भिजवा देगा और हमारे घरों पर धावा बोल दिया जाएगा। शैम्पेन के नशे में धुत पत्रकारों की लाइव तस्वीर दूरदर्शन से लाखों घरों में पहुंचेगी और फिर पत्रकारिता की तमाम बहसों के बीच हम भस्म कर दिये जायेंगे। मैं कांप रहा था। अब तक आदत पड़ जानी चाहिए थी। लेकिन मेरी आंखों के सामने दिवाली पर गिफ्ट लेने वाले और दलाली करने वाले पत्रकारों की शक्लें साबूत खड़ीं हो गईं। बहुत दिनों से इस तरह की छवियां कई फिल्मों में देख रहा था। किसी घटना के संदर्भ में मीडिया के आगमन को हास्यास्पद बनाने की कोशिश की जाने लगी है। हिंदुस्तान टाइम्स के विज्ञापन में 'कैसा लग रहा है' टाइप सवाल पूछती एक पत्रकार के सिर पर अखबार का बंडल फेंक दिया जाता है। पा में बाल्की जी ने तो ग़रीबों का हमला करवा दिया है पत्रकारों पर। एक टीवी चैनल के मालिक के घर में भी लोग धावा बोल देते हैं। दूरदर्शन और प्राइवेट न्यूज चैनलों के रिपोर्टर में बहस होती है। उसका लाइव प्रसारण होता है। दूरदर्शन के स्टुडियो से। जिसकी कमज़ोर साख के बदले प्राइवेट मीडिया का जन्म हुआ,आज प्राइवेट चैनलों की साख की ये हालत हो गई कि दूरदर्शन की साख बेहतर बताई जाने लगी है। जाने कितने पत्रकारों का पसीना पानी हो रहा है। मै भी कभी-कभार कहता रहता था कि एक दिन पब्लिक हमें मारेगी। लेकिन अंदाज़ा नहीं था कि हम इस तरह कहानियों के क्रूर पात्र हो जायेंगे। कुपात्र हो जायेंगे।
युवा नेता अभिषेक बच्चन। एक अच्छा सा नेता। इसके ज़रिये घटिया स्तर से नीचे चल रही मीडिया पर लात-जूते बरसवाती है ये फ़िल्म। बाहर की असली मीडिया में इस पर सन्नाटा। फ़िल्म की कहानी से घोर सहमति क्या बता रही है। हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाकाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार हैं। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी,लतखोर मीडिया की। फिल्म अभिषेक के बहाने राहुल गांधी को प्रतिष्ठित करती है। उन राजनेताओं को कोई पूछने वाला नहीं जो ईमानदार भी रहे और गंवई भी। मर गए लेकिन किसी ने फिल्म तक नहीं बनाई।
अब डरना चाहिए। इतनी बेबस मीडिया न तो पत्रकारों के लिए ठीक है न समाज के लिए। पत्रकारों के बिकने की खबर आउटलुक जैसी पत्रिका की कवर बनती है। प्रभाष जोशी अखबारों का नाम अपने कॉलम में लिख विदा हो गए। सन्नाटा। चुप्पी। अपने भीतर आंदोलन कैसे हो? चलो इग्नोर कर दो। इसमें कोई बुराई नहीं। बुराई तो इसमें है कि चुप्पी का फ़ायदा उठाकर फिर से वही करने लग जाते हैं। सुधरते नहीं हैं। टीवी की आलोचना अपने माध्यम के लोगों के साथ करना मुश्किल है। सब स्वार्थों से एक दूसरे पर साधने लगते हैं। बोलने का अधिकार सबको होना चाहिए। कैसे रोका जाए। लेकिन जो फिल्म जिसकी नहीं है,उसकी तो मत कहो। एक पुलिस अधीक्षक हाल ही में फोन कर रोने लगे कि स्ट्रिंगर लोग दारोगा की बदली के लिए दबाव डालते हैं। उनसे महीने की दलाली लेते हैं। इनसे कैसे निबटें। बहुत सुनने के बाद उनसे यही कहा कि अगर आप के पास सबूत है और यकीन है तो पकड़ कर टांग तोड़ दीजिए। क्या यही छवि है हमारी पब्लिक में। फिर हम किस पब्लिक के नाम पर दुनिया के खात्मे वाले कार्यक्रमों को संवारेंगे। एक दिन वो भी फेल कर जायेगा।
पा,अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नहीं है। एक अच्छे राजनेता की है। जो काम करते करते थका जा रहा है। जिसका कुर्ता सचिन पायलट से मिलता है। जो राहुल गांधी की तरह अंबेडकर बस्ती में जाकर हरिजनों को गंदगी से निजात दिलाने के लिए योजनाएं बनवाता है। सैंकड़ों लोगों के बीच आकर अपनी निजी ज़िंदगी की बात स्वीकार कर लेता है। 'हां उस रात मैंने कंडोम का इस्तमाल नहीं किया।' 'मैंने भी वही किया जो मेरी उम्र का लड़का कर जाता है।''लेकिन अच्छा हुआ कि उस रात कंडोम नहीं था।''वर्ना औरो जैसा बेटा कहां मिलता।'अमोल अर्ते की साफगोई ने सियासी साज़िशों को उलट दिया। वह एक ज़िम्मेदार नेता है। अपनी सुरक्षा को लेकर ज़िम्मेदार है। लोगों को सड़क पर पॉटी करते हुए नाराज़ होता है। कहता है सरकार ने शौचालय बनवा रखे हैं। अब यहां बाल्की को मीडिया की मदद लेनी चाहिए थी। जो दिखाता कि सरकारी शौचालयों की क्या हालत है। हम भी यही कर देते हैं कभी-कभी। इकतरफा हो जाते हैं।
लेकिन बाल्की ने फिल्म मीडिया की छवि बनाने के लिए नहीं बनाई है। बल्कि छवियों को गढ़ने वाली मीडिया को गर्त में फेंक देने के लिए बनाई है। दूरदर्शन की महिमा है। फिल्मकार की आलोचना सही है। लेकिन इकतरफा है। मीडिया की तरफ से वकालत करने का कोई फायदा नहीं है। हमारे इतिहास और वर्तमान में बहुत कुछ अच्छा है। बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है। लेकिन जो बुरा है वो ज़्यादा हो गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि न्यूज़ चैनलों को प्रोजेरिया हो गया है। इतने कम समय में इतनी तेज़ी से बढ़ गए कि हांफने लगे हैं। दम तोड़ते से लगते हैं। उन्हीं की इस बीमारी की कहानी है पा। कोई शोध करेगा कि इक्कीसवीं सदी की हिन्दी फिल्मों में मीडिया के फटीचर काल का चित्रण।
नोट- पा एक मां और उसकी अनब्याही बेटी की भी कहानी है जो मां बनना चाहती है। दोनों के रिश्तों में आज के समय के हालात की चुनौतियों को परिपक्वता से गढ़ने की कोशिश है। ये वो मां है जो अपनी अनब्याही बेटी के मां बनने पर उसे कलमुंही और कुलबोरनी नहीं कहती है। पूर्वजों को याद कर माथा नहीं पिटती कि इसने आपका सत्यानाश कर दिया है। बल्कि मां अपनी बेटी से सवाल करती है कि ये बच्चा चाहिए या नहीं। उसके बाद पूरी ज़िंदगी अपनी बेटी का साथ देती है। पा दो मांओं की भी कहानी है।
किसी ने नोटिस क्यों नहीं किया। यह फ़िल्म राजनेता के छवि को बेहतर तरीके से गढ़ती है और राजनेता के ज़रिये मीडिया को आईना दिखलवाती है। अच्छा सा नेता। कांग्रेस के युवा ब्रिगेड की तरह खादी का कुर्ता-पायजामा पहनने वाला नेता,जो राजनीति में शतरंजी चाल की परवाह किये बिना काम करना चाहता है। इससे पहले की किस फ़िल्म ने राजनेताओं में इतना भरोसा पैदा करने की कोशिश की है,याद नहीं है। हो सकता है मुझसे छूट गई हो। एक ऐसा नेता जो सरकारी मीडिया पर भरोसा करता है। दूरदर्शन पर। उसका इस्तमाल करता है। दूरदर्शन के पहुंच का इस्तमाल करता है और हम प्राइवेट न्यूज़ चैनल के पत्रकारों के मुंह पर गोबर फेंक देता है। तभी किसी पत्रकार ने फ़िल्म के इस पहलु की चर्चा नहीं की,या फिर मुझी से वैसी समीक्षा छूट गई होगी।
अब वाकई डर लगता है। हमारी साख क्या इतनी खतम हो गई है कि कोई नेता हमारे घर अपने लोगों को भिजवा देगा और हमारे घरों पर धावा बोल दिया जाएगा। शैम्पेन के नशे में धुत पत्रकारों की लाइव तस्वीर दूरदर्शन से लाखों घरों में पहुंचेगी और फिर पत्रकारिता की तमाम बहसों के बीच हम भस्म कर दिये जायेंगे। मैं कांप रहा था। अब तक आदत पड़ जानी चाहिए थी। लेकिन मेरी आंखों के सामने दिवाली पर गिफ्ट लेने वाले और दलाली करने वाले पत्रकारों की शक्लें साबूत खड़ीं हो गईं। बहुत दिनों से इस तरह की छवियां कई फिल्मों में देख रहा था। किसी घटना के संदर्भ में मीडिया के आगमन को हास्यास्पद बनाने की कोशिश की जाने लगी है। हिंदुस्तान टाइम्स के विज्ञापन में 'कैसा लग रहा है' टाइप सवाल पूछती एक पत्रकार के सिर पर अखबार का बंडल फेंक दिया जाता है। पा में बाल्की जी ने तो ग़रीबों का हमला करवा दिया है पत्रकारों पर। एक टीवी चैनल के मालिक के घर में भी लोग धावा बोल देते हैं। दूरदर्शन और प्राइवेट न्यूज चैनलों के रिपोर्टर में बहस होती है। उसका लाइव प्रसारण होता है। दूरदर्शन के स्टुडियो से। जिसकी कमज़ोर साख के बदले प्राइवेट मीडिया का जन्म हुआ,आज प्राइवेट चैनलों की साख की ये हालत हो गई कि दूरदर्शन की साख बेहतर बताई जाने लगी है। जाने कितने पत्रकारों का पसीना पानी हो रहा है। मै भी कभी-कभार कहता रहता था कि एक दिन पब्लिक हमें मारेगी। लेकिन अंदाज़ा नहीं था कि हम इस तरह कहानियों के क्रूर पात्र हो जायेंगे। कुपात्र हो जायेंगे।
युवा नेता अभिषेक बच्चन। एक अच्छा सा नेता। इसके ज़रिये घटिया स्तर से नीचे चल रही मीडिया पर लात-जूते बरसवाती है ये फ़िल्म। बाहर की असली मीडिया में इस पर सन्नाटा। फ़िल्म की कहानी से घोर सहमति क्या बता रही है। हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाकाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार हैं। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी,लतखोर मीडिया की। फिल्म अभिषेक के बहाने राहुल गांधी को प्रतिष्ठित करती है। उन राजनेताओं को कोई पूछने वाला नहीं जो ईमानदार भी रहे और गंवई भी। मर गए लेकिन किसी ने फिल्म तक नहीं बनाई।
अब डरना चाहिए। इतनी बेबस मीडिया न तो पत्रकारों के लिए ठीक है न समाज के लिए। पत्रकारों के बिकने की खबर आउटलुक जैसी पत्रिका की कवर बनती है। प्रभाष जोशी अखबारों का नाम अपने कॉलम में लिख विदा हो गए। सन्नाटा। चुप्पी। अपने भीतर आंदोलन कैसे हो? चलो इग्नोर कर दो। इसमें कोई बुराई नहीं। बुराई तो इसमें है कि चुप्पी का फ़ायदा उठाकर फिर से वही करने लग जाते हैं। सुधरते नहीं हैं। टीवी की आलोचना अपने माध्यम के लोगों के साथ करना मुश्किल है। सब स्वार्थों से एक दूसरे पर साधने लगते हैं। बोलने का अधिकार सबको होना चाहिए। कैसे रोका जाए। लेकिन जो फिल्म जिसकी नहीं है,उसकी तो मत कहो। एक पुलिस अधीक्षक हाल ही में फोन कर रोने लगे कि स्ट्रिंगर लोग दारोगा की बदली के लिए दबाव डालते हैं। उनसे महीने की दलाली लेते हैं। इनसे कैसे निबटें। बहुत सुनने के बाद उनसे यही कहा कि अगर आप के पास सबूत है और यकीन है तो पकड़ कर टांग तोड़ दीजिए। क्या यही छवि है हमारी पब्लिक में। फिर हम किस पब्लिक के नाम पर दुनिया के खात्मे वाले कार्यक्रमों को संवारेंगे। एक दिन वो भी फेल कर जायेगा।
पा,अमिताभ बच्चन की फ़िल्म नहीं है। एक अच्छे राजनेता की है। जो काम करते करते थका जा रहा है। जिसका कुर्ता सचिन पायलट से मिलता है। जो राहुल गांधी की तरह अंबेडकर बस्ती में जाकर हरिजनों को गंदगी से निजात दिलाने के लिए योजनाएं बनवाता है। सैंकड़ों लोगों के बीच आकर अपनी निजी ज़िंदगी की बात स्वीकार कर लेता है। 'हां उस रात मैंने कंडोम का इस्तमाल नहीं किया।' 'मैंने भी वही किया जो मेरी उम्र का लड़का कर जाता है।''लेकिन अच्छा हुआ कि उस रात कंडोम नहीं था।''वर्ना औरो जैसा बेटा कहां मिलता।'अमोल अर्ते की साफगोई ने सियासी साज़िशों को उलट दिया। वह एक ज़िम्मेदार नेता है। अपनी सुरक्षा को लेकर ज़िम्मेदार है। लोगों को सड़क पर पॉटी करते हुए नाराज़ होता है। कहता है सरकार ने शौचालय बनवा रखे हैं। अब यहां बाल्की को मीडिया की मदद लेनी चाहिए थी। जो दिखाता कि सरकारी शौचालयों की क्या हालत है। हम भी यही कर देते हैं कभी-कभी। इकतरफा हो जाते हैं।
लेकिन बाल्की ने फिल्म मीडिया की छवि बनाने के लिए नहीं बनाई है। बल्कि छवियों को गढ़ने वाली मीडिया को गर्त में फेंक देने के लिए बनाई है। दूरदर्शन की महिमा है। फिल्मकार की आलोचना सही है। लेकिन इकतरफा है। मीडिया की तरफ से वकालत करने का कोई फायदा नहीं है। हमारे इतिहास और वर्तमान में बहुत कुछ अच्छा है। बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है। लेकिन जो बुरा है वो ज़्यादा हो गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि न्यूज़ चैनलों को प्रोजेरिया हो गया है। इतने कम समय में इतनी तेज़ी से बढ़ गए कि हांफने लगे हैं। दम तोड़ते से लगते हैं। उन्हीं की इस बीमारी की कहानी है पा। कोई शोध करेगा कि इक्कीसवीं सदी की हिन्दी फिल्मों में मीडिया के फटीचर काल का चित्रण।
नोट- पा एक मां और उसकी अनब्याही बेटी की भी कहानी है जो मां बनना चाहती है। दोनों के रिश्तों में आज के समय के हालात की चुनौतियों को परिपक्वता से गढ़ने की कोशिश है। ये वो मां है जो अपनी अनब्याही बेटी के मां बनने पर उसे कलमुंही और कुलबोरनी नहीं कहती है। पूर्वजों को याद कर माथा नहीं पिटती कि इसने आपका सत्यानाश कर दिया है। बल्कि मां अपनी बेटी से सवाल करती है कि ये बच्चा चाहिए या नहीं। उसके बाद पूरी ज़िंदगी अपनी बेटी का साथ देती है। पा दो मांओं की भी कहानी है।
बोलना तो है लेकिन कैसे- पुस्तक समीक्षा
बोलना तो है। यह एक किताब का नाम है। बोलने के तौर-तरीकों को लेकर हिंदी में एक अच्छी किताब आई है। अपने मित्र दुर्गानाथ स्वर्णकार के हवाले से यह पुस्तक हाथ लग गई। न्यूज़ चैनलों के विस्तार ने बोले जाने को महत्वपूर्ण बनाया है। विविधता कायम की है लेकिन अभी बोले जाने को लेकर गंभीरता कम दिखती है। कैसे बोला जाए और कहां पर बलाघात का प्रयोग हो, इसकी विधिवत जानकारी कम लोगों को है। नतीजा खुशी और ग़म की ख़बरों का उतार-चढ़ाव एक सा लगता है। बहुत सारी विसंगतियां हैं। जिन्हें हम बोले जाने की विविधता के नाम पर स्वीकार या नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। यह समस्या तब और बड़ी हो जाती है जब समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा शब्द बोला गया और किस मतलब से बोला गया। पत्रकारिता की पढ़ाई में वॉयस ओवर की ट्रेनिंग निश्चित रूप से घटिया होती होगी तभी वहां से निकलने वाले छात्रों को इसका कुछ अता-पता नहीं होता। और जो पेशे में हैं उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि इसमें सुधार हो सकता है। हिंदी पत्रकारिता में पेशेवर प्रतिबद्धता का अभाव और पर्सनल जुगाड़ ही इस तरह की छूट देता है कि आप कैसे भी अपना काम चला लें। हमने कम लोगों को देखा है,जो वॉयस ओवर को लेकर चिंतित हों और उसे दूर करने का प्रयास किया हो।
बोलना तो है। पुस्तक का अच्छा नाम है। बोलना तो है लेकिन कैसे। यह किताब दावा करती है कि यह झूठ है कि बोलने का गुण नैसर्गिक है। अभ्यास और प्रशिक्षण के ज़रिये बोलने की क्षमता का विकास होता है। किसी में कम होता है तो किसी में ज़्यादा होता है लेकिन होता है। पचास हज़ार लोगों को बोलने की ट्रेनिंग देने वाले इंदौर के प्रोफेसर शीतला मिश्रा ने यह किताब लिखी है। जिसका संपादन किया है इंदौर के ही रवींद्र शाह ने। इंदौर में बोलने को लेकर वाग्मिता नाम की एक संस्था कई सालों से लोगों के बीच काम कर रही है। गृहणी से लेकर छात्रों तक को बोलने की कला का अभ्यास कराया जाता है।
शीतला मिश्रा लिखते हैं कि प्रभावशाली तरीके से बोलना चाहिए। बोलना एक महत्वपूर्ण क्रिया है। इसका असर लिखे हुए शब्दों से ज़्यादा होता है। किताब तकनीकी तौर पर लिखी गई है इसलिए बहुत धीरज चाहिए पढ़ने और समझने के लिए कि एक एक बात का मतलब है और वो कहां पर लागू होगा। कई तरह के फार्मूले इस शक्ल में लिखे गए हैं।
बचें वचन से
जो औसत बात करते हैं
जो ख़ूब-ख़ूब बोले जाते हैं
सोचना रोक देने वाले
जो किसी को न छूते हैं,न छेड़ते हैं
कितनी ही बार बोले जाएं
अनाकर्षक
चल-चल कर घिस-पिट गए,
मुड़े-तुड़े, चिपचिपे, मटमैले
करंसी नोटों जैसे।
आपको याद ही होगा टीवी पत्रकारों और एंकरों का सवाल- कैसा महसूस हो रहा है और पीटूसी के आखिर में कही जाने वाली सनातन पंक्त- अब देखना है कि आने वाले समय में सरकार....। एक ऐसे समय में जब विभत्स रस में वॉसर-ओवर किये जाने लगे हैं लोगों का ध्यान खींचने के लिए,यह किताब उपयोगी हो सकती है। जानने-समझने के लिए कि ध्यान खींचने के और भी बेहतर और रोचक तरीके हो सकते हैं। सायं-सायं और भायं-भायं ही अंतिम तरीका नहीं है। कई लोगों की अच्छी स्टोरी बोले जाने की कमी के कारण प्रभाव नहीं छोड़ पाती। कई एंकर सवाल( इसमें मैं भी शामिल हो सकता हूं) पूछते हैं तो जवाब लगता है। सवाल नहीं। कई एंकरों ने आज तक ज़िंदगी को जिदगी बोलने की ज़िद पाल रखी है। वो अपनी प्रतिष्ठा को पेशेवर विकास से ज़्यादा महत्व देते हैं। हिंदी फिल्मों से ज़्यादा बड़ा जनसंचार नहीं है। वहां भी किशोर कुमार ज़िंदगी गा कर गए हैं। जिंदगी कभी नहीं गाया। नुक्तों की लड़ाई में उच्चारण की बलि दे दी गई। बोलना प्रभावहीन हो गया। बिना इस समस्या का समाधान किये,एक रास्ता निकाल लिया गया। बुला लाओ,हुंकारे भरने वाली आवाज़ों को। चीख-चीख के बुलायेंगी दर्शकों को।
बोलने की गति पर भी विस्तार से लिखा गया है। मकसद यही है कि सुनने वाला बोलने वाले से ध्यान न हटा सके। अकेले भाषण से लेकर कई लोगों के बीच बोलने की प्रक्रिया के बारे में काफी जानकारी दी गई है। कई बार लगेगा कि इसमें खास क्या है। यह तो हम जानते हैं लेकिन पूरी किताब पढ़ने पर लगेगा कि हम टुकड़ों में तो कई बातें जानते थे लेकिन इनका इस्तमाल तब पता चलेगा जब समग्र का पता चलेगा। यह किताब पढ़ी जानी चाहिए। टीवी के पत्रकारों को खासकर से। राधाकृष्ण ने छापी है और कीमत १७५ रुपये है। बोलने की शैली पर और भी किताबें आनी चाहिए। टीवी की पढ़ाई में यह एक पेशेवर कोर्स की तरह होना चाहिए। अच्छे-अच्छे पत्रकारों को इस कमी के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। कोई बताने वाला नहीं है कि इस कमी को अभ्यास से दूर किया जा सकता है। यह किताब वाणी को महत्वपूर्ण मानती है। संयोग से मैंने भी अपने ब्लॉग पर लिखा है कि मैं बोलने को लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। कुछ साल पहले बातूनी इंडिया नाम की एक स्पेशल रिपोर्ट बनाई थी। देखने के लिए कि हमारा बोलना कैसे बदल गया। एक सेल कंपनी का विज्ञापन भी आता है...हिंदुस्तान बोल रहा है। लेकिन तरीके से बोले से असर ज़्यादा होगा। यही मकसद है इस पुस्तक है। मैं अब प्रोफेसर शीतला मिश्र के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहता हूं जो इतने बड़े काम में लगे हैं और पुस्तक में अपने बारे में कम से कम शब्दों में बताया। शायद उनका काम बोलता होगा। बहुत अच्छा प्रयास है। उम्मीद है बोलने पर और पुस्तकें आएंगी।
पुस्तक के आखिर तक नहीं पहुंच पाया हूं। आधा से ज़्यादा पार कर चुका हूं। उम्मीद करता हूं कि इस या अगली पुस्तक में बोलने की व्यक्तिगत कमज़ोरियों पर भी सामग्री होगी। मसलन कई लोग साफ शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाते, वो किस तरह का अभ्यास करें,कई श स की बीमारी से ग्रस्त हैं,उसे कैसे दूर करे और कई वाक्यों के समूह को कैसे पढ़ा जाए जिससे वायस ओवर बेहतर हो सके। नाक से निकलने वाली आवाज़ को कैसे भारी करें और सामंती किस्म की भारी आवाज़ को कैसे कर्णप्रिय किया जाए,अगर ये ध्यान में रखकर लिखा जाए तो पुस्तक टीवी पत्रकारों के सिरहाने हो सकती है।
दूसरा, किताब के कवर पर हिटलर का उदाहरण देखकर चौंक गया। बोलने की प्रभुता में हिटलर का यकीन था। उसी यकीन पर चलकर हमारे यहां कुछ लोग अयोध्या पहुंच गए। बेहद प्रभावशाली तरीके से बोलने की कला में पारंगत किन्तु सांप्रदायिक सत्य गढ़ने के खतरनाक खेल में शामिल। ऐसे उदाहरणों से बचना चाहिए। हमें यह भी सावधान करना चाहिए कि बोलने की उस कला में यकीन नहीं करना है जो बार बार बोलकर किसी झूठ को सत्य बना दे। इसे समझे होते तो आज बाबरी मस्जिद गिराने वाले नेता सत्रह साल बाद अपना बचाव करते हुए झूठे और कमज़ोर न लगते। उनका तेज चला गया है। क्योंकि वो अपने बोलने की प्रतिभा का इस्तमाल गलत मकसद के लिए कर रहे थे। शीतला मिश्र का मकसद ये तो नहीं होगा लेकिन हिटलर के मिसाल को ठिकाने लगा सकते थे। इस शख्स से कुछ भी सीखने लायक नहीं है।
बोलना तो है। पुस्तक का अच्छा नाम है। बोलना तो है लेकिन कैसे। यह किताब दावा करती है कि यह झूठ है कि बोलने का गुण नैसर्गिक है। अभ्यास और प्रशिक्षण के ज़रिये बोलने की क्षमता का विकास होता है। किसी में कम होता है तो किसी में ज़्यादा होता है लेकिन होता है। पचास हज़ार लोगों को बोलने की ट्रेनिंग देने वाले इंदौर के प्रोफेसर शीतला मिश्रा ने यह किताब लिखी है। जिसका संपादन किया है इंदौर के ही रवींद्र शाह ने। इंदौर में बोलने को लेकर वाग्मिता नाम की एक संस्था कई सालों से लोगों के बीच काम कर रही है। गृहणी से लेकर छात्रों तक को बोलने की कला का अभ्यास कराया जाता है।
शीतला मिश्रा लिखते हैं कि प्रभावशाली तरीके से बोलना चाहिए। बोलना एक महत्वपूर्ण क्रिया है। इसका असर लिखे हुए शब्दों से ज़्यादा होता है। किताब तकनीकी तौर पर लिखी गई है इसलिए बहुत धीरज चाहिए पढ़ने और समझने के लिए कि एक एक बात का मतलब है और वो कहां पर लागू होगा। कई तरह के फार्मूले इस शक्ल में लिखे गए हैं।
बचें वचन से
जो औसत बात करते हैं
जो ख़ूब-ख़ूब बोले जाते हैं
सोचना रोक देने वाले
जो किसी को न छूते हैं,न छेड़ते हैं
कितनी ही बार बोले जाएं
अनाकर्षक
चल-चल कर घिस-पिट गए,
मुड़े-तुड़े, चिपचिपे, मटमैले
करंसी नोटों जैसे।
आपको याद ही होगा टीवी पत्रकारों और एंकरों का सवाल- कैसा महसूस हो रहा है और पीटूसी के आखिर में कही जाने वाली सनातन पंक्त- अब देखना है कि आने वाले समय में सरकार....। एक ऐसे समय में जब विभत्स रस में वॉसर-ओवर किये जाने लगे हैं लोगों का ध्यान खींचने के लिए,यह किताब उपयोगी हो सकती है। जानने-समझने के लिए कि ध्यान खींचने के और भी बेहतर और रोचक तरीके हो सकते हैं। सायं-सायं और भायं-भायं ही अंतिम तरीका नहीं है। कई लोगों की अच्छी स्टोरी बोले जाने की कमी के कारण प्रभाव नहीं छोड़ पाती। कई एंकर सवाल( इसमें मैं भी शामिल हो सकता हूं) पूछते हैं तो जवाब लगता है। सवाल नहीं। कई एंकरों ने आज तक ज़िंदगी को जिदगी बोलने की ज़िद पाल रखी है। वो अपनी प्रतिष्ठा को पेशेवर विकास से ज़्यादा महत्व देते हैं। हिंदी फिल्मों से ज़्यादा बड़ा जनसंचार नहीं है। वहां भी किशोर कुमार ज़िंदगी गा कर गए हैं। जिंदगी कभी नहीं गाया। नुक्तों की लड़ाई में उच्चारण की बलि दे दी गई। बोलना प्रभावहीन हो गया। बिना इस समस्या का समाधान किये,एक रास्ता निकाल लिया गया। बुला लाओ,हुंकारे भरने वाली आवाज़ों को। चीख-चीख के बुलायेंगी दर्शकों को।
बोलने की गति पर भी विस्तार से लिखा गया है। मकसद यही है कि सुनने वाला बोलने वाले से ध्यान न हटा सके। अकेले भाषण से लेकर कई लोगों के बीच बोलने की प्रक्रिया के बारे में काफी जानकारी दी गई है। कई बार लगेगा कि इसमें खास क्या है। यह तो हम जानते हैं लेकिन पूरी किताब पढ़ने पर लगेगा कि हम टुकड़ों में तो कई बातें जानते थे लेकिन इनका इस्तमाल तब पता चलेगा जब समग्र का पता चलेगा। यह किताब पढ़ी जानी चाहिए। टीवी के पत्रकारों को खासकर से। राधाकृष्ण ने छापी है और कीमत १७५ रुपये है। बोलने की शैली पर और भी किताबें आनी चाहिए। टीवी की पढ़ाई में यह एक पेशेवर कोर्स की तरह होना चाहिए। अच्छे-अच्छे पत्रकारों को इस कमी के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। कोई बताने वाला नहीं है कि इस कमी को अभ्यास से दूर किया जा सकता है। यह किताब वाणी को महत्वपूर्ण मानती है। संयोग से मैंने भी अपने ब्लॉग पर लिखा है कि मैं बोलने को लिखने से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। कुछ साल पहले बातूनी इंडिया नाम की एक स्पेशल रिपोर्ट बनाई थी। देखने के लिए कि हमारा बोलना कैसे बदल गया। एक सेल कंपनी का विज्ञापन भी आता है...हिंदुस्तान बोल रहा है। लेकिन तरीके से बोले से असर ज़्यादा होगा। यही मकसद है इस पुस्तक है। मैं अब प्रोफेसर शीतला मिश्र के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहता हूं जो इतने बड़े काम में लगे हैं और पुस्तक में अपने बारे में कम से कम शब्दों में बताया। शायद उनका काम बोलता होगा। बहुत अच्छा प्रयास है। उम्मीद है बोलने पर और पुस्तकें आएंगी।
पुस्तक के आखिर तक नहीं पहुंच पाया हूं। आधा से ज़्यादा पार कर चुका हूं। उम्मीद करता हूं कि इस या अगली पुस्तक में बोलने की व्यक्तिगत कमज़ोरियों पर भी सामग्री होगी। मसलन कई लोग साफ शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाते, वो किस तरह का अभ्यास करें,कई श स की बीमारी से ग्रस्त हैं,उसे कैसे दूर करे और कई वाक्यों के समूह को कैसे पढ़ा जाए जिससे वायस ओवर बेहतर हो सके। नाक से निकलने वाली आवाज़ को कैसे भारी करें और सामंती किस्म की भारी आवाज़ को कैसे कर्णप्रिय किया जाए,अगर ये ध्यान में रखकर लिखा जाए तो पुस्तक टीवी पत्रकारों के सिरहाने हो सकती है।
दूसरा, किताब के कवर पर हिटलर का उदाहरण देखकर चौंक गया। बोलने की प्रभुता में हिटलर का यकीन था। उसी यकीन पर चलकर हमारे यहां कुछ लोग अयोध्या पहुंच गए। बेहद प्रभावशाली तरीके से बोलने की कला में पारंगत किन्तु सांप्रदायिक सत्य गढ़ने के खतरनाक खेल में शामिल। ऐसे उदाहरणों से बचना चाहिए। हमें यह भी सावधान करना चाहिए कि बोलने की उस कला में यकीन नहीं करना है जो बार बार बोलकर किसी झूठ को सत्य बना दे। इसे समझे होते तो आज बाबरी मस्जिद गिराने वाले नेता सत्रह साल बाद अपना बचाव करते हुए झूठे और कमज़ोर न लगते। उनका तेज चला गया है। क्योंकि वो अपने बोलने की प्रतिभा का इस्तमाल गलत मकसद के लिए कर रहे थे। शीतला मिश्र का मकसद ये तो नहीं होगा लेकिन हिटलर के मिसाल को ठिकाने लगा सकते थे। इस शख्स से कुछ भी सीखने लायक नहीं है।
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