क्या उनकी जान बच सकती थी?

१३ मार्च २००८। शाम के पांच बज रहे थे। बाबूजी का ऑपरेशन चल रहा था। डॉक्टर ने कहा था कि मामूली है। इसके बाद घर जा सकेंगे। दिल्ली से मेरी दोस्त का एसएमएस आ गया। ऑपरेशन थियेटर के बाहर बैठा मैं जवाब दे रहा था कि इसके बाद ठीक हो जाना चाहिए। रिप्लाई आया कि सब ठीक ही होगा। बीच बीच में मैं बाहर जाकर पानी ला रहा था। कई लीटर पानी का गैलन ले कर आया। आखिरी बार लेकर आ रहा था। निश्चिंत होने लगा था। इस आपरेशन के बाद घर ले जा सकूंगा।

तभी एक बार ध्यान हुआ कि बहुत देर हो गई है। ओटी का दरवाज़ा खुला नहीं है। थोड़ी देर बाद एक डॉक्टर निकला। चुपचाप। किसी पाकेटमार की तरह। जेब काट कर। मैंने पूछा कि क्या हुआ। कोई जवाब नहीं दिया। एक बार और पूछा कि बहुत लंबा चला ऑपरेशन। आपने तो कहा था कि मामूली है। डाक्टर अपनी कमीज़ पहन रहा था। इतना ही बोला कि नहीं सब नार्मल है।

थोड़ी देर बार ओटी का दरवाज़ा खुला। स्ट्रेचर पर बाबूजी। एक स्ट्रेचल को लिफ्ट तक ले जा रहा था। दूसरा पानी का बोतल हाथ में उठाये था। मेरी नज़र भी धोखा खा गई। दोनों ने कहा कि देख लीजिए। थोड़ी देर में होश आ जाएगा। मां ने देखते ही कहा सब खत्म। मैंने रोक दिया। बोला कि सब ठीक है। होश आएगा।

पंद्रह मिनट बाद अटेंडेंट चिल्ला रहा था। रवीश कुमार कौन है। मैं भाग कर पहुंचा। डॉक्टर ने कहा आपके फादर को कार्डियेक अरेस्ट हो गया है। हालत गंभीर हो गई है। बचाना मुश्किल है। मैं भाग कर बड़े भाई की तरफ आया। फिर आवाज़ लगी, रवीश कुमार। मैं फिर भागा। इस बार जवाब मिला,नहीं बचा सकते। जिनको बताना है इंफोर्म कर दीजिए। मैंने कहा क्या खत्म। तब बोला, नहीं। हम कोशिश कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद बोला। अब नहीं बचा सकते।

मेरे सामने सबसे पहले उस डॉक्टर की तस्वीर घूम गई। जो चुपचाप निकला था ओटी से। हाथों को पोछते हुए। एक चोर की तरह। फिर बाद में लिफ्ट तक स्ट्रेचर पर लेटे हुए बाबूजी। प्राण तो तभी उड़ गए थे। दांत जकड़ गए थे। आंखें पलट गईं थी। उनकी मौत तो ओटी में ही हो चुकी थी। कई लीटर गैलन पानी का क्या किया होगा उन लोगों ने। मैं किस लिए भाग भाग कर लाता रहा। तब क्यों नहीं बताया कि ऑपरेशन नाकाम रहा। कार्डियेक अरेस्ट का नाटक क्यों। हमें मौत का समय भी गलत बताया गया। शाम छह बजे का। मुझे लगता है जिस वक्त मैं अपनी दोस्त को एसएमएस कर रहा था, उसी वक्त मेरे बाबूजी हमसे बहुत दूर जा चुके थे। कोरी आशाओं और बेकार निराशाओं के झंझटों से निकल कर।

मेरे दिमाग में डॉ हेमन्त की आवाज़ गूंजने लगी। इन्हीं से बाबूजी इलाज करवा रहे थे। किडनी की बीमारी थी। बाबूजी भी लापरवाही बरतते थे। मगध अस्पताल में भर्ती कराया तो डॉ हेमन्त ने जाने से मना कर दिया। कई बार गिड़गिड़ाया कि आप लंदन से आए हैं। आपके लिए इगो प्रॉब्लम क्या। एक बार चल कर देख लीजिए कि इलाज ठीक हो रहा है कि नहीं। उन्होंने मना कर दिया। एक अहसान कर दिया कि अपने किसी जूनियर को फोन कर दिया। डॉ अमित। होंटा सिटी से आने वाला यह डॉक्टर पान पराग चबाता हुआ मेहनती लगता था।

१२ मार्च को मैं अपने बड़े भाई के साथ दस बजे रात को मिलने गया था। डॉ हेमन्त अपनी बात पर अड़े रहे। कहे कि अस्पताल से झगड़ा है। हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है। मगर उनकी बात आज तक रातों को जगा रही है। बात बात में उन्होंने पूछा कि ऑपरेशन कौन कर रहा है। हमने नाम बताया तो बोल बैठे कि प्रवीणवा....अरे...उ का करेगा..। मैंने पूछा कि क्या वो ठीक डॉक्टर नहीं हैं। तब तक डॉ हेमन्त ने अपनी बात बदल ली। कहा कि नहीं मेरा मतलब वो नहीं है। पटना में दो ही लोग तो करता ही है।


तेरह मार्च को जब ओटी से निकले तो डॉ प्रवीण सहमे हुए से क्यों थे। क्यों उन पर एक डॉक्टर का विश्वास नहीं झलक रहा था। क्या वो अपनी नाकामी पर लीपापोती करने के लिए मुझसे पानी के गैलन मंगाते रहे। मैं भी मूरख की तरह भाग भाग कर गैलन ला रहा था। बिल्कुल भूल गया कि बाबूजी के आपरेशन में इतनी देरी क्यों हो रही है। आंधा घंटा बोला था, तीन घंटा क्यों लगा। क्या इस बार भी प्रवीणवा ने वही किया जो डॉ हेमन्त कहते कहते रुक गए थे। डॉ हेमन्त ने क्यों नहीं कहा कि कुछ भी हो जाए इस डॉक्टर से ऑपरेशन मत कराना। क्या डॉक्टर के लिए किसी का मरना सिर्फ जैविक प्रक्रिया भर है। क्या उनका अपने मरीज़ों से कोई नाता नहीं बनता। पता नहीं।

मैं नहीं जानता कि मेरे पिताजी बच सकते थे या नहीं। पर पता नहीं क्यों बार बार लगता है बच सकते थे। पटना के इस मगध अस्पताल का अनुभव अच्छा नहीं रहा। बीस रुपये लेकर दरबान आईसीयू में लोगों को जाने देता था। लगता रहा कि कहां फंसा दिए अपने बाबूजी को। मगर बार बार मेरा शक इस विश्वास के आगे हार जाता था कि डॉक्टर तो भगवान ही होता है।

सड़क

लीक सी पतली थी जब तुम
सदियों तक कुछ लोग चलते रहे
लीक से हटकर
चौड़ी होती चली गई होगी
अपने आप
बहुत दूर दूर तक निकले होंगे
सफ़र पर, सड़क तुम्हारे साथ
कितने रिश्तों की तुम डोर बनी
गांवों को गांवों से जोड़ा तुमने
फिर मुल्कों के कब्ज़े की बागडोर बनी
बादशाहों के हुक्म से बनने के दौर में तुम
सत्ता और ताकत की छोर बनी
इसी बीच
कहारों के कंधे पर बैठी बेटियां
ससुराल जाने के रास्ते
भींगाती रही तुम्हें अपने आंसुओं से
याद है जब तुम
कब्ज़े में रहकर ज़मींदारों के
कितनों को आने जाने से रोका करती थी
कितनी लड़ाई लड़ी है सबने
कि तुम सबकी हो
दरअसल, तुम जब तक अपने आप बनी
तुम सड़क थी
जब से सत्ता तुम्हें बनाने लगी
हर लीक को मिटाने लगी
अब तुम उसी के कब्ज़े में हो सड़क
कितने नाम, हुक्मरानों ने दिये तुमको
जीटी रोड से जीबी रोड
सिंगल रोड
फिर
वन वे रोड
उसके बाद
टोल रोड
हर योजनाओं का हिस्सा बनी रही
तुम्हें बनाने के नाम पर
कितनों ने घूस खाये, पीडब्ल्यूडी में
तुम खाने कमाने के दौर में भी
फोर लेन से गोल्डन क्वाड्रेंगल होती रही
अब तो तुम बीआरटी कोरिडोर कहलाती हो
अंबेडकर नगर से आईटीओ पहुंचने के रास्ते में
डिफेंस कॉलनी फ्लाईओवर पर उड़ने लगती हो
ओबेराय होटल से पुराना किला होते हुए
प्रगति मैदान तक
तुम सिर्फ किसी की योजना का नमूना हो
गलियां भी साथ छोड़ गईं हैं तुम्हारा
जगदेव पथ से तुम केनिन लेन होने लगी हो
नाम तक तय करने का अधिकार नहीं तुमको
अकबर रोड,औरंगजेब रोड से होते हुए
रिंग रोड होने तक,तुम अंसारी और मेहता हो जाती हो
मरने वाले और नेताओं के नाम चढ़ेंगे तुम पर
तुम कौन हो सड़क
लीक से हटकर, क्या अब भी हो सड़क
तोड़ लिया है नाता तुमने
पगडंडियों औऱ फुटपाथों से
डिवाइडर से अपनी मांग बना ली है
बालों को संवारती ज़ेबरा क्रासिंग से
बिंदी सजती है माथे पर तुम्हारे
लाल,पीली बत्तियों से
नीचे भीख मांगते बच्चे
तुम्हारी औलाद लगते हैं
सड़क
तुम सरकारी योजनाओं से निकलना छोड़ दो
फिर से बनने लगो अपने आप
पहले लीक
फिर लीक से हटकर

भ्रूण हत्या

भ्रूण हत्या
कल तक जो ख़बर थी
उसी ख़बर की हो चुकी है
भ्रूण हत्या
चुपचाप किसी मां के अनचाहे गर्भ की तरह
पत्रकारों ने गर्भ गिरा दिया है
कुछ ने एक्स रे मशीन से ढूंढ कर
डॉक्टर और दाई से मिलकर किसी रात
पता लगा लिया है कुछ पैसे देकर
उस छोटे से भ्रूण को
जिसके बड़े होने के शुरूआती हफ्तों में
बेटी की तरह लगती है ख़बर
कहां से देंगे पढ़ाई का ख़र्चा
कहां से लायेंगे दहेज
और कहां कहां खोजेंगे दूल्हा
मार देना सबसे बेहतर विकल्प है
न्यूज़ चैनलों की दुनिया के लिंग अनुपात में बदलाव आ चुका है
एक हज़ार कूड़ा कड़कट के बीच
ख़बरों की संख्या दो रह गई है
भ्रूण हत्या करने वाले मां बाप
कभी रोते नहीं है उसके मार दिये जाने पर
बल्कि मार देने की योजना बनाते हैं
एक ऐसी मौत जिसके लिए
ब्राह्मणों ने भी श्राद्ध का प्रावधान जैसा
कोई कर्मकांड नहीं बताया है
न सर मुंडाया है न खिलाया है मोहपातर को
तसल्ली देने के लिए बाहर एक बोर्ड लगा है
हमारे यहां लिंग परीक्षण नहीं होता
भ्रूण हत्या कानूनी अपराध है

रिक्शेवाले का किराया

तुम्हारी पीठ दिखती रही
हांफते हुए
भागते हुए
कहां तो तुम जकड़े रहे
उसी सीट पर
हुमच हुमच कर
तुम्हारे पांव पैडल पर
दौड़ रहे थे
नीचे गुज़रती सदियां थी
दिन बदलने की आस में
आगे का पहिया निकला जा रहा था
पीछे का पहिया भागते हुए भी
इस दौड़ में छूटता जा रहा था
मंज़िल की तरफ....
पहुंच मैं रहा था
पहुंचा तुम रहे थे
इसी तरह पहुंचा है मानव
मानव की पीठ पर सवार होकर
कहीं राजा बन कर
कहीं घुड़सवार बन कर
कहीं हमलावर बन कर
कहीं कारोबारी बन कर
कहीं दिलदार बन कर
कहीं सेनापति बन कर
तुम्हारी भागती हुई पीठ
सिर्फ तुम्हारी नहीं है
रिक्शावाला
उन सबकी है
जिन्हें हर सवारी के बाद
दे दिया जाता है किराया
मंज़िल से लौट आने के लिए
हमारे पहुंच जाने के बाद

बातें बदल जाती हैं तुमसे मिलके

बहुत बातें अनकहीं रह गईं
दफ्तर से घर लौटते हुए
कहने का करते रहे अभ्यास
घर पहुंच कर बातें बदल गईं
उन बातों पर रोज़मर्रा एक चादर
चढ़ती चली गई, परतें मोटी हो गईं
कोई हवा आएगी एक दिन जब
उड़ा ले जाएगी उन चादरों को
बहुत सी बातें वहीं दबीं मिलेंगी
तब तुम पढ़ लेना, तफ्सील से
बहुत कुछ कहने की चाहत में
क्यों मैं हर दिन तरसता हुआ...
बातें बदलता रहता हूं तुमसे
बात चौदह फ़रवरी की नहीं है
बात है साल के उन हर दिनों की
कुछ कहने का अभ्यास करता हुआ
दफ्तर से जब भी घर आता हूं
बातें बदल जाती हैं तुमसे मिलके।

क्या ये जेंडर का प्रॉब्लम है?

मुंबई से मेरे एक मित्र के प्रोफेसर का फोन आया था। वो हिंदी न्यूज़ चैनलों की भाषा पर संवाद करना चाहते थे। बात तो हुई नहीं मगर उनकी बात को लेकर काफी परेशान रहा। वो जानना चाहते थे कि न्यूज़ चैनलों की भाषा उग्र क्यों होती जा रही है। हर लाइन पंच लाइन के नाम पर ऐसे लिखी या बोली जा रही है जैसे पेट में किसी ने चाकू मार दिया हो। आगे बात कहने से पहले ही लिख देना चाहता हूं कि यह दूसरों पर आरोप नहीं है। पूरी गुज़ाइश है कि मैं भी इस बीमारी का शिकार हो सकता हूं। ये इसलिए लिख रहा हूं कि ज़रा सी आलोचना कीजिए तो तीन लोग बंदूक लेकर आ जाते हैं कि आप कौन से दूध के धूले हैं। काम तो करते नहीं,भाषण देते हैं। हमारा समाज चूंकि मूलत एक बेईमान समाज है इसलिए ईमानदारी की एक पंक्ति की भी बात करें या आलोचना का एक सवाल भी उठाया नहीं कि कसौटी लेकर मुंह पर घिसने लगता है कि खुद तो कार पर चलते हैं और पर्यावरण और प्रदूषण पर बोलते हैं। ईमानदार होने की अग्नि परीक्षा हर बार जंगल में जाकर नक्सल होकर नहीं दी जा सकती।

हिंदी उग्र हो गई है। घुस कर मारो पाकिस्तान को। अबकी बार,आर या पार। संभल जाओ पाकिस्तान। ये उदाहरण इसलिए दे रहा हूं कि अभी इस्तमाल हो रहे हैं। इसी तर्ज पर और भी जुमले हम सबने बनाए और सुनाए हैं। बलाघात के नाम पर हम शब्दों पर ऐसा घात कर रहे हैं कि बल से ज़्यादा बलात मतलब निकल रहे हैं।

ख़ैर प्रोफेसर साहब का सवाल था कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसका जवाब तो नंबर भी है। जब चीखने से उत्तेजना पैदा हो और उत्तेजित दर्शक टीआरपी दे दे तो क्या हर्ज है। टीआरपी बुरी नहीं है। हम शायद टीआरपी का बुरा इस्तमाल करने लगे हैं। वैसे ही जैसे किसी गुरु ने कह दिया कि झूठ मत बोलो। किसी कीमत पर। जवाब में चेलों ने सच की ऐसी तस्वीर बनाई की गुरु का ही बंटाधार हो गया। हम सब टीआरपी के दायरे में काम करने वाले पत्रकार हैं। इससे बाहर कोई नहीं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि ज़्यादातर कापी लिखने वालों में सिर्फ लड़के होने की वजह से भाषा ऐसी हो रही है? मुझे ठीक ठीक ज्ञान नहीं है। पर लगता है कि हर चैनल में कॉपी लिखने की कमान लड़कियों के हाथ में नहीं हैं। होंगी भी तो एक या दो। हिंदी पत्रकारिता आज भी पुरुष प्रधान पत्रकारिता है। मुझे मालूम है कि एंकर में ज़्यादातर महिलाएं हैं। जब आप पुरुष प्रधान पत्रकारिता की बात करें तो तुरंत इसकी मिसाल दी जाने लगती है। लेकिन किसी और संदर्भ में बात करें तो इन्हीं महिला एंकरों और पत्रकारों के बारे में तमाम तरह की अपुष्ट कहानियां बनाईं जाने लगती हैं। ज़्यादातर झूठी होती हैं मगर इसलिए बनाई जाती हैं क्योंकि महिलाओं की हर नई जगह को अपनी(पुरुष) जगह पर अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है।

बहरहाल कहना यह चाह रहा हूं कि महिला एंकरों की भाषा भी उनकी नहीं है। कोई लिख देता है और उन्हें बोलना पड़ता होगा। चीख चीख कर। घुस कर मारो पाकिस्तान को,क्या कोई लड़की लिखती? हो सकता है मैं ग़लत हूं। लेकिन हमारी भाषा में उग्रता हम पुरुष प्रधान प्रत्रकारों की वजह से आ रही है। जिस दिन हिंदी पत्रकारिता में लड़कियों की संख्या ज़्यादा हो जाएगी और वो तय करने लगेंगी,उस दिन से भाषा में आ रहे मोहल्लेपन का असर कम हो सकता है। किसी भी चैनल को सुनिये, सुन कर यही लगेगा कि किसी मोहल्ले के छंटे हुए लड़के ने लिखी है। उसका गुस्सा,प्रतिकार हर पंक्ति में निकलता है। इस तरह से हम भी लिखने लगते हैं। पर क्यों लिखते हैं? ये कहां से आ रहा है?

क्या कभी हमने ध्यान दिया है कि उग्र भाषा लिखते वक्त हमारी मनस्थिति कैसी होती है? पाकिस्तान पर स्क्रिप्ट लिखते समय कौन से पूर्वाग्रह सामने आ जाते हैं? नफरत। और नफ़रत की बुनियाद में क्या क्या है? कहीं पाकिस्तान और उसके बहाने मुसलमानों के प्रति हिंसक सोच तो नहीं? मैं कोई निष्कर्ष पर नहीं पहुंच रहा? बस समझने की कोशिश कर रहा हूं। ख़ुद भी कभी कभी बोलने लगता हूं। हो सकता है अपनी तर्कबुद्धि से हम शालीन ही हों लेकिन गहरे अंतर्मन में बैठी हिंसक भावना ऐसी पंक्तियों से निकलने का रास्ता ढूंढ लेती हो।

यह सही है कि हर दौर में भाषा बदलती है। लिखने का अखबारी तरीका टीवी में बिल्कुल नहीं चलेगा। लेकिन क्या हमने सही विकल्प पा लिया है? पता नहीं। मैं यही सोच रहा हूं कि पाकिस्तान या तालिबान पर कोई भी स्क्रिप्ट कोई लड़की लिखती तो कैसे लिखती? क्या ये किसी स्त्री की भाषा हो सकती है? क्या कभी हमने सोचा है कि हमारे बोलने की शैली पर किसका असर ज़्यादा होता है? पिता की शैली का या फिर मां की शैली का?

मैं ख़ुद के बारे में कह सकता हूं। मेरे बोलने के अंदाज़ पर पिता का असर ज्यादा है। मेरी मां के बोलने का असर बिल्कुल नहीं हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरे तमाम भाई बहनों में से किसी के बोलने में मां के बोलने का असर नहीं है। हम सब बाबूजी की तरह बोलते हैं। उसमें उग्रता है। यह भी नहीं कहना चाहता कि पिताओं की बोली अक्सर उग्र ही होती है? मगर उनमें एक किस्म की अथॉरिटी तो होती ही है।

तो मैं प्रोफेसर साहब से यही कहना चाहता था हिंदी पत्रकारिता में जेंडर का प्रॉब्लम है। जितनी तरक्की हम लड़कों की होती है, उतनी लड़कियों की कम देखी है। आईआईएमसी गया था। मैं अपने भावी सहकर्मियों से सवाल पूछ रहा था,हमें अलग से क्यों लगता है कि कोई लड़की ज़्यादा तरक्की कर रही है? जवाब खुद ही देने लगा। दरअसल हम सबने यही देखा है कि मां मिठाई पहले मुझे यानी बेटों को देगी,फिर बेटियों को। हमारी सोशल कंडीशनिंग ऐसी है कि हम मान कर चलते हैं कि लड़कियों को बाद में मिलेगा। वही जब दफ्तर में पहले मिल जाता है तो हम हैरान हो जाते हैं। कहने लगते हैं किसी और वजह(सुंदरता) से आगे गई है। क्योंकि पुरुष अंहकार मान कर चलता है कि आगे जाने का हक उसी का है। इन्हीं सब कहानियों को आधार बनाकर लड़कियों को कम आंका जाता है।

ऐसा भी नहीं कि लड़कियों के लिए काम करने का माहौल नहीं है। कई जगहों पर बेहतर माहौल है। मगर निर्णय लेने और लिखने के अधिकार से वे अभी भी दूर नज़र आती है। हिंदी न्यूज़ फ्लोर पर एक किस्म का सांस्कृतिक सामाजिक टकराव चल रहा है। एक दिन हिंदी न्यूज़ चैनलों में काम कर रहीं लड़कियों को आगे आना ही होगा। दावा करना ही होगा। उन्हें लिखने के लिए कीबोर्ड पर जगह बनानी होगी। इतना आसान नहीं है,लेकिन यही एक रास्ता बचा है। वर्ना टीआरपी के नाम पर पुरुष प्रधान पत्रकारों की मनोग्रंथियों से निकलती भाषा तेजाब की तरह लगती रहेगी। मैं लड़कियों को शालीनता का दर्पण नहीं बनाना चाहता। न मानता हूं। मगर आज जो भाषा है उसमें उनका दखल कम दिखता है।

यह भी हो सकता है कि दो घंटे ट्राफिक जाम में फंसे रहने के बाद,कम सोकर दफ्तर में टाइम बिताने के कारण भी हमारी भाषा उग्र हो जाती हो। पत्रकार तनाव में तो है। तो क्या उसकी वजह से भाषा ऐसी हो रही है या ये जेंडर का प्रॉब्लम है।

मुझे सिर्फ एक दोस्त चाहिए

जब भी आप मिलते हैं किसी से

तो वाकई खुश होते हैं आप

या हंसना आ गया है आपको

हर किसी से मिलने के बाद

हाथ मिलाना आ गया है

दांत फाड़ कर और गोल कर

अपनी आंखें, जब मिलती है उससे

झूठी मुलाकात कितनी सच्ची लगती है

ऐसी तमाम मुलाकातों के बाद जब

एक भी मुलाकात बिस्तर पर याद नहीं आती

गहरी नींद के किसी कोने में देखे गए ख्वाब की तरह

जागने के बाद उसका चेहरा याद ही नहीं आता

ऐसे तमाम झूठे मुलाकातियों से हर रोज

हाथ मिलाने का मन नहीं करता

लगता है लात मार कर भगा दूं

और ढूंढ लाऊं अपने उन दोस्तों को

जो फिक्र करते थे कभी मेरी,

कभी मेरे लिए चाय बना देते थे

फिल्म जाने से पहले किचन में

छोड़ जाते थे तसले में थोड़ी सी खिचड़ी

सिर्फ मेरे लिए

अब नहीं है वे सब...

वे भी कहीं ढूंढते होंगे मुझको हर दिन

अपनी अपनी नौकरियों में मुलाकातियों से मिलने के बाद

गहरी नींद के किसी कोने में देखे गए ख्वाब की तरह

इमोशनल अत्याचार

तौबा तेरा जलवा, तौबा तेरा प्यार। इमोशनल अत्याचार। ठेठ बिहारी टच। इमोशनल अत्याचार के इस दौर में इमोशनल होना नेशनल होना हो गया है। अनुराग की नई फिल्म देव डी का यह गाना इमोशनल अत्याचार- देवदास के नाम पर लंपट बन रहे लैलाओं और आसिफों को लाइन पर लाने का उपचार है। डी यू के दिनों में कई ऐसे यौवनबहुल युवाओं को देखा है। सेंटी हो जाते थे किसी लड़की पर, उसके बाद सेंटिमेंटल होने लगते थे रात भर। उसके आने जाने का टाइम पता किया, घर का पता और उसे नोट्स देने का इंतज़ाम। बस शुरू हो जाता था इमोशनल अत्याचार।

इमोशनल अत्याचार खुद से अपने ऊपर किया जाने वाला अत्याचार है। जहां तक मुझे लगता है। कई लोग क्लास के बाद तब तक रूकते थे जब तक वो लड़की बस से घर न चली जाए। अगर कोई लड़की कार से आ गई तो पहले से ही उसकी अमीरी को लेकर खुद पर इमोशनल अत्याचार शुरू हो जाता था। यार कहां वो..कहां..मैं। औकात में रह बेटा। बस प्रेम का दि एंड।

प्रेम की तमाम निजी अभिव्यक्तियां फिल्मों की नौटंकी से मिलती जुलती हैं। आई लभ यू बोलने से लेकर डस्टबिन में फाड़ कर फेंके गए उन तमाम ख़तों की हर अदा हम अपनी जवानी में ओरिजीनल समझ कर लुटाते रहते हैं। लेकिन ये सब आता है फिल्मों से। बहुत कम प्रेमी होते हैं जो प्रेम में ओरिजीनल होते हैं और इमोशनल अत्याचार नहीं करते।

इस बेहतरीन गाने को सुनते हुए उन तमाम लंपट हरकतों की यादें ताजा हो गईं जिसमें एक लड़का और लड़की हर दिन एक दूसरे को बिना बताये चाहते रहते हैं। जब नहीं बोल पाते तो इमोशनल अत्याचार करने लगते हैं। मुझे वो लड़की क्यों याद आ गई जिसे कोई अच्छा लगता था मगर इतना बताने से पहले वो अपने भीतर हज़ार बार अपने पिता से ज़िरह करती, अपने रिश्तेदारों के डर से कांपती हुई हर दिन सौ मौतें मरती रहती। किसी को पसंद कर उसने जो इमोशनल अत्याचार किया वो सिर्फ इमोशनल लोग समझ सकते हैं। वो लड़का क्यों याद आ गया जो झूठी पट्टी बांध कर लड़कियों के बीच नाटक करता था कि गिटार बजाते हुए उसकी उंगलियां कट गईं। पटना का साला लंपू...बाप जनम में गिटार नहीं देखा लेकिन पट्टी बांध कर सेंटियाता रहता था।

सेंटी होना एक ऐसी सेंटिमेंटल सामाजिक प्रक्रिया है जो बिहार और यूपी के लड़कों को डी यू की खूबसूरत लड़कियों की परछाई के पीछे भागने के लिए मजबूर कर देती है। उसे आते देख सिगरेट जला लेना, किताब निकाल लेना और किसी निर्मल वर्मा की तरह सोचने लगना। और नहीं मिलने पर....शराब पीना। अक्सर हम सब के आस पास ऐसे लड़के होते ही हैं जो सामने वाली लड़की के शादी के दिन शराब पीते हैं। कि वो तो अब पराई हो गई। उसके घर जाकर कहने की हिम्मत नहीं होती लेकिन शराब पीकर शादी के दिन तमाम कल्पनाओं का रचनापाठ कर सेंटिमेंटल हो जाते हैं। अनुराग ने ऐसे तमाम कार्बनकौपी देवदासों को ठिकाने पर ला दिया है।

इमोशनल हुए बिना तो हम नेशनल भी नहीं होते। सेंटिमेंटल कैसे हो जायेंगे। सेंटी और मेंटल अलग अलग प्रक्रिया है। सेंटी होने तक तो आप कुछ काबू में रहते लेकिन मेंटल होने के बाद गॉन केस हो जाते हैं। रेशनल लोग वो होते हैं जो जाकर कह देते हैं कि गोरी सुनो न..आई लभ यू....। फिर किसी पार्क में घूमते हुए, ठीक पांच बजे घर से निकलते हुए और दरियागंज के गोलचा सिनेमा में फिल्में देखते हुए नज़र आते हैं।


गाना ज़बरदस्त है। अनुराग ने फिल्माया भी खूबसूरती से है। पूरा देसी टच। पटना में एल्विस को ले आये हैं। माइकल जैक्सन से लेकर एल्विस ने पटना में पैदा न होकर जो गंवाया है उसे कोई नहीं समझ सकता। हमारे यहां ऐसी वेराइटी को टिनहईया हीरो कहते हैं। भारत देश के तमाम सेंटिमेंटल प्रेमियों को ट्रिब्यूट है यह गाना- इमोशनल अत्याचार।

हम इंडियन लोग और अमेरिकन ओबामा

वर्तमान को इतिहास की तरह देखने की आदत के समय में बराक ओबामा का शपथ। ऐतिहासिक। ओबामामय अमेरिका। लाखों लोग सिर्फ शपथ ग्रहण देखने आए। काले लोगों के चेहरे पर बहती आंसू की धारा। भीतर जमी अपमान की बर्फ पिघल रही थी। बर्फ को पिघलाने में अमेरिका के सभी लोगों का हाथ। खुशी गोरों के चेहरे पर थी। पश्चाताप की खुशी मगर गौरव के चादर में लिपटी हुई। वाह।

मेरे गांव में भी लोग ओबामा को जानते हैं। अंबेडकर को तो जानते ही थे। बीच में ईंट पर राम लिख कर सिमेंट और बालू के लिए चंदा मांग रहे आडवाणी भी आए। इन दिनों ईंट फेंक आडवाणी एक करोड़ स्टिकर चस्पां कर रहे हैं। स्कूटर और पार्किंग में खड़ी कारों पर चुपके से लगा दिया जा रहा है।

आडवाणी को पीएम बनाओ। भगोड़ा हो गए कल्याण सिंह। राम मंदिर मुद्दे की ऐसी तैसी। क्या गरम खून होता था उस वक्त। इस वक्त आडवाणी को कम्पोज़िट कल्चर की बात समझ आ रही है। सभी धर्मों के साथ रहना चाहते हैं आडवाणी। तुष्टीकरण के तलवार के नीचे और मंदिर को राष्ट्रीय स्वाभिमान का रंग देकर हिंदू राष्ट्र का वह दिवास्वपन कभी उमा तो कभी कल्याण के आते जाते खत्म हो चुका है।

कांग्रेस अपने युवराज को राजा बनाने की ट्रेनिंग दे रही है। बीजेपी को अब गलत नहीं लगता। इनके यहां भी नेताओं के बच्चे बड़े हो गए हैं। वो अब युवराज बन रहे हैं। पंजाब में अकाली दल भी कांग्रेस हो चुकी है। सुखबीर बादल उपमुख्यमंत्री हो चुके हैं। कश्मीर में अब्दुल्ला शेख हैं। पिछड़ी राजनीति के नेता अब समाज के उस हाशिये की राजनीति नहीं करते बल्कि दलबदल और दलालों की राजनीति कर रहे हैं। पिछड़ावाद बेमौत मर गया है। एक दलित राजनीति से उम्मीद थी वो चंदा वसूली करने में फंस गई है। सामाजिक बदलाव का अभियान सत्ता पर कब्ज़ा करने के प्रयास में बदल चुका है।

भारत के लोकतंत्र में भी गौरव के कई लम्हे हैं। अंबेडकर, कलाम, नारायणन, मनमोहन,मायावती,लालू,मुलायम। अब इनमें से कई गौरवमय नेता फटीचर हो चुके हैं। वो अब उस सपने की नुमाइंदगी नहीं करते जिसे देखकर समाज का दबा कुचला तबका इनके पीछे हो लिया था। ओबामा की तरह इनकी भी कभी धूम थी। मगर चारा से लेकर चंदा और धंधा की सियासत ने घालमेल कर दिया। पिछड़ावाद और दलित राजनीति प्रोग्रेसिव नहीं हो सकी।

मायावती ने यूपी में ब्राह्मणो को मिलाकर एक बड़ी राजनीतिक घटना को जन्म दिया। पहले कभी नहीं हुआ कि दलित की बेटी के सत्तारोहण में ब्राह्मण सहायक बने। यह एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग था मगर विकास की राजनीति के साये में पल रहे दलालों की भेंट चढ़ गया। इस समीकरण में इतना दम था कि इसके सहारे मायावती आगे बढ़ सकती थीं। मगर सोच में वो मुलायम विरोधी राजनीति के आगे नहीं देख सकीं। कल को भारत इन्हें प्रधानमंत्री बना दे मगर ओबामा नहीं बन सकेंगी। बनने की ज़रूरत भी क्या है।

जो आज अमेरिका में हुआ है वो अपने यूपी में हो चुका है। खांटी सामंती और जातिवादी प्रदेश में एक दलित की बेटी चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी है। यूपी का साइज़ भी किसी देश से कम नहीं है। इधर भी मिलियन और बिलियन पिपुल लोग रहते हैं। एक दलित नेता कांशीराम ने सायकिल पर घूमकर बीएसपी को खड़ा कर दिया। खांटी लोकतांत्रिक तरीके से। लड़कर, भिड़कर और गिरकर। उसी का चरम था- दो साल पहले जो यूपी में हुआ। आज़ाद भारत की एक बड़ी राजनीतिक घटना। ब्राह्मण और दलित का संगम।

कांग्रेस में दलित सवर्ण के साथ रह चुके हैं। मगर पीछे पीछे। बीएसपी के दलितों का आत्मविश्वास था कि उन्होंने सवर्णो को कहा आइये हमसे हाथ मिलाइये। हम वहां ले चलेंगे आपको जहां हम पहुंचने का सपना देखते हैं। मगर भारत की लोकतांत्रिक स्थिति ने इस घटना को क्रांतिकारी नहीं बनने दिया। खुद नेता भी ज़िम्मेदार हैं। दलित नेता के नाम पर उन्हीं दलितों को आगे किया गया जो समाज का कुरुप(दलाल) चेहरा हैं। उन दलितों को मौका नहीं मिला जो भारत को एक नई सामाजिक सदी में ले जा सकते हैं। सिर्फ भावनाओं के सहारे किसी को भी नाव का खेवनहार बना दिया गया। यही वजह रही कि दलित राजनीति के क्रांतिकारी परिणामों के बाद आज एक भी क्रांतिकारी दलित नेता हमारे सामने नहीं है।


लालू मुलायम ने भी यही किया। खुद पिछड़ावाद के नेता बने। लेकिन कोई और न बन सके इसलिए पिछडी जाति के कुरुप( क्रिमिनल,दलाल)चेहरे को आगे किया। पढ़े लिखे यादव,कुर्मी,दलित आगे नहीं आ सके। वो एक नए भारत की नई राजनीतिक तस्वीर नहीं बन सके।

फिर भी भारतीय लोकतंत्र की कई महान उपलब्धियां हैं। हम भी गर्व कर सकते हैं। शायद इसलिए भी हमारी दिलचस्पी थी ओबामा के शपथ में। हम यह महसूस कर पा रहे थे जो आज अमेरिका महसूस कर रहा है। हमनें भी ऐसे लम्हे टुकड़ों टुकड़ों में भोगे हैं।

आउटलुक का सेक्स संस्करण

सेक्स पर सर्वे आया है। प्रिंट में है। आउटलुक पत्रिका में। तब तो यह माना ही जाए कि गंभीर अटेम्प्ट है। समाज में सेक्स को समझने के लिए। कौन सा तबका कितने बजे किन किन से, किस करवट सेक्स करता है। कुछ तस्वीरें भी हैं, सेक्स को समझाने के लिए। इन सेक्स पूर्व प्रतीकात्मक तस्वीरों से सेक्स हरकतों की झांकी मिलती है। और भी पत्रिकाएं और अखबार वाले सेक्स सर्वे कराते हैं। सेक्स सर्वे पत्रकारिता का पार्ट है। लेकिन क्या यह सिर्फ प्रिंट वालों का पार्ट है?

आउटलुक में गंभीरता के नाम पर क्या है। सर्वे और तस्वीरों के बाद एक डॉक्टर का इंटरव्यू है। जिन्हें पढ़कर सहज बुद्धि और सहज होती है कि समाज में लोग अब ओपन हो रहे हैं। सेक्स गोपन नहीं हैं। सब ओपन है। तो क्या इससे समाज को समझने का प्रयास पूरा हो जाता है?बीमार हैं तो जाएंगे कहां? डाक्टर के पास ही न?

यही सर्वे अगर हम टीवी पर कर दें तो क्या होगा? कोहराम मचा देंगे कि घर घर में पहुंच रहा है। सर्वे के नाम पर जो तस्वीरें हैं उनसे गंदगी फैल रही है। टीवी पत्रकारिता पतन में चली गई है। अगर टीवी पर कोई वॉयस ओवर यह सवाल पढ़ रहा होता कि सुबह के वक्त कितनी फीसदी स्त्रियां कितने फीसदी पुरुषों के ऊपर होती हैं। तो आलोचक लेखक लिखते कि चीख चीख कर बोल रहा था। जैसे लिखे हुए शब्द चीखते नहीं हैं।

मुझे आउटलुक के सर्वे में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा। किसी ने कहा कि अंग्रेजी में ये चीजे छपती हैं तो वैसे भी आपत्तिजनक नहीं लगतीं। इसकी जांच कर रहा हूं। लिखने का मकसद इतना ही है कि यह समझा जाए कि क्या टीवी और प्रिंट के लिए आलोचना के मानदंड(मुझे यह पूरा लफंदर शब्द लगता है)अलग होते हैं?मानदंड पाखंड होते जा रहे हैं? इसका मतलब यह भी नहीं कि टीवी की बुराइयों को इग्नोर कर रहा हूं।

वैसे आउटलुक के सेक्स सर्वे में गंभीर भी कुछ नहीं था। यह समझने की कोशिश कम थी कि सेक्स के ज़रिये स्त्री-पुरुष संबंध में कोई बदलाव आ रहा है या नहीं। क्या कोई सामाजिक वर्जनाएं टूट कर स्त्रियों को आज़ादी दे रही हैं या वही पुरुषवादी नैतिकता हावी है। दिन के किस वक्त सेक्स,और कितनी बार सेक्स। सेक्स की बारंबारता में कमी एक मेडिकल समस्या है। अव्वल तो इसके कारण में आतंकवाद से जुड़ी चिंताएं भी जोड़ दी गई हैं।

हंसी आ रही है कि आतंकवाद से चिंतित होकर लोगों की सेक्स बारंबारता( फ्रिक्वेंसी) कम हो गई है। मंदी में लोग सेक्स कम करते हैं। अजीब अजीब किस्म के कारण हैं। आतंकवादियों ने हमारी सेक्स लाइफ को भी डिस्टर्ब कर दिया है। धत्त तेरी की।

बहरहाल मुझे जवाब नहीं मिला कि कोई न्यूज़ चैनल सेक्स सर्वे करे ( वैसे करते ही हैं) तो क्या उसकी आलोचना नहीं होती? होती तो किस प्रकार की होती?