कभी आपने इस सवाल का जवाब दिया है। कभी आपसे किसी ने ऐसा सवाल किया है। आए दिन होता रहता है। ठीक ठाक कपड़ों में और अच्छी खासी कार से भी उतरें तो पूछने वाला एक बार भरोसा कर लेना चाहता है कि दक्षिण दिल्ली के हैं या नहीं। अखबारों ने एक भ्रम फैला रखा है कालोनियों को लेकर। पॉश कालोनी लिख लिख कर दिमाग खराब कर दिया है। जो है जहां है के आधार पर अपनी कालोनी को पॉश कालोनी घोषित करने के चक्कर में रहता है।
मुझसे अक्सर लोग यह सवाल करते हैं। जवाब जैसे ही मिलता है कि गाज़ीपुर बार्डर से दो किमी आगे डाबर मोड़ से दायें मुड़ते ही वैशाली के सेक्टर पांच में रहता हूं। पता पूरा भी नहीं कर पाता सामने वाले की मुझमें दिलचस्पी खत्म हो जाती है। सहानुभूति के स्वर में कहा जाता ओह...इतनी दूर बाप रे। तुम इधर यानी दक्षिण दिल्ली में क्यों नहीं रह लेते। वहां का माहौल तो बहुत खराब होगा। मैं चाहता हूं कि जिन जिन लोगों ने मुझसे कहा है वो ये लेख पढें।
उत्तर और दक्षिण दिल्ली में क्या फर्क है। रिंग रोड दोनों ही तरफ बहती है। एटीएम और अग्रवाल स्विट्स पूरी दिल्ली में हैं। पीवीआर का ग्राम्यकरण पूरी दिल्ली में हो चुका है। सिर्फ दक्षिण दिल्ली में पीवीआर नहीं है। पैसे वाले यहां वहां सब जगह रहते हैं। दक्षिण दिल्ली में चिराग दिल्ली, कटवारिया, ओखला गांव, मदनपुर खादर, मदनगीर, अंबेडकरनगर, मुनिरका गांव हैं। आम लोगों की आबादी ज़्यादा है। कड़ी मेहनत लेकिन फिर भी दो पैसा कम कमाने वालों की आबादी फ्रैंड्स और ग्रेटर कैलाश से अधिक है। दक्षिण दिल्ली मूलत एक मेहनतकश और मध्यमवर्गीय लोगों का इलाका है। इसका मतलब यह नहीं कि मैं वैशाली का टाइकून हूं। पहले भी मुनिरका, चिराग दिल्ली और गोविंदपुरी में रह चुका हूं।
हुआ यूं कि गोविंदपुरी, डीडीए कालकाजी, शेखसराय, खिड़की एक्सटेंशन, आश्रम, भोगल मुनिरका, अंबेडकरनगर, कृषि विहार, मदनपुर खादर, गढ़ी में आम लोगों रहते थे। दक्षिण दिल्ली की आबादी में अस्सी फीसदी हिस्सा इनका है। फ्रैड्स कालोनी, जंगपुरा, डिफेंस कालोनी, साउथ एक्स, ग्रेटर कैलाश। यहां चंद अमीर लोग रहते हैं। गरीबों की झोपड़ी के बीच अमीरों की कोठी दूर से ही ऊंची दिखती है। अगर दक्षिण दिल्ली की पहचान ही बननी है तो इनसे नहीं बनती। दक्षिण दिल्ली कहीं से भी पॉश नहीं है। होती तो कैलाश कालोनी, फ्रैड्स कालोनी में साप्ताहिक बाज़ार नहीं लगते। यहां के मैक्स और फोर्टिस से आज भी एम्स और सफदरजंग की ज़्यादा तूती बोलती है।
कहीं मैं अपना फ्रस्टेशन तो नहीं निकाल रहा दक्षिण दिल्ली की अवधारणा पर। जब मैं मुनिरका गांव में रहता था तब मेरे दक्षिण दिल्ली के तथाकथित कुलीन दोस्त कहते थे कि कहां गांव में रहते हो। जब मैं वैशाली के ठीठ ठाक अपार्टमेंट में रहता हूं तो ऐसे बात करते हैं जैसे मैं उत्तरी ध्रुव में रहता हूं। बहुत छोटा नक्शा होता है दक्षिण दिल्ली वालों के दिमाग में। इतना छोटा कि पड़ोस के मेहनतकशों को भी शामिल नहीं करते। रहते तो वे भी हैं दक्षिण दिल्ली में। इसके बाद भी जब भी पता पूछते हैं और जवाब मिलता है उनके चेहरे का रंग बदल जाता है। बीच में क्लास आ जाती है। इसीलिए कहता हूं दक्षिण दिल्ली को आबाद मेहनतकशों ने किया है लेकिन मलाई हमेशा की तरह दो चार कालोनियां वाले खा रहे हैं।
बरहम बाबा
ब्रह्म बाबा अपभ्रंश होकर बरहम बाबा हो गए थे। भोजपुरी में हर शब्द की अपनी तरह से ओवरहाउलिंग की जाती है। ज्यों का त्यों वाला सिस्टम नहीं हैं। गांव में बरगद और पीपल के संगम से बने थे बरहम बाबा। विशाल और कई पीढ़ियों से विराजमान। मेरे गांव में कोई बड़ा हो जाए और बरहम बाबा की डालों पर दौड़ा न हो मुमकिन नहीं। गंडक नदी और घर के बीच एक पड़ाव की तरह मौजूद बरहम बाबा किसी स्मृति चिन्ह की तरह विराजमान रहे।
बहुत पहले गिर गए बरहम बाबा। बूढ़े हो गए थे। किसी शाम की तेज आंधी ने बरहम बाबा को गिरा दिया। बाबूजी ने जब बताया तो ऐसे बता रहे थे जैसे उनके भीतर का एक बड़ा हिस्सा ढह गया हो। थोड़ा सा कह कर चुप हो गए। बाकी अपने भीतर ही कहने लगे। एक पेड़ के गिरने का नितांत व्यक्तिगत और सार्वजनिक दुख। बाप का ज़्यादा और बेटे का थोड़ा कम। लेकिन दोनों का साझा अनुभव था बरहम बाबा की मोटी मोटी डालो पर दौड़ना। डोला पांती खेलना। भारत के राष्ट्रीय खेलों की सूची में डोला पांती का भले कहीं नाम न हो लेकिन ग्रामीण अंचल कि स्मृतियों में यह खेल अब भी बचा हुआ है। नहीं मालूम कि अब कोई पेड़ की डाल पर दौड़ने और पकड़ने का खेल खेलता है या नहीं।
तेज दुपहरी में कहीं छांव की गारंटी होती थी तो विशाल बरहम बाबा के नीचे। सुबह सुबह गांव की भक्तिमय औरतें यहां जल चढ़ा जाती थी। दस बजते ही लोग अपनी गायों को इसके नीचे बांध देते। दोपहर होते ही सारे बच्चे इसकी डालों पर अपना ठिकाना बना लेते थे। शुरु हो जाता था दौड़ना। कुछ लड़के इतनी तेजी से इस डाल से उस डाल पर भागते कि लगता था कि कार्ल लुइस का जन्म मेरे गांव में क्यों नहीं हुआ। हम सबको मालूम था कि कौन सा घोंसला तोता का है और कौन सा मैना का। किस घोसलें में अंडा है और किस में नहीं। गांव में बहुत लोग मिलते थे जिनकी कमर से लेकर टांग की हड्डी डोला पांती खेलते वक्त गिरने से टूटी थी। पुरानी पीढ़ि के लोग नई पीढ़ि को शान से दिखाते। कहते कि देख हमरो टांग टूटल बा। मामूली खेलने बानी हम। तहनी के का खेल ब जा लोग।
बरहम बाबा का नहीं रहना बॉटनी के किसी विशेषज्ञ का दुख नहीं हो सकता। ये उन बेटियों का दुख है जो मायके आते वक्त सबसे पहले बरहम बाबा को देखती थी। तसल्ली के लिए और पुरानी बातों को याद करने के लिए। शादी के बाद विदाई के वक्त बहने डोली से झांक लिया करती थीं बरहम बाबा की तरफ। बेटियां जब लौटती थीं तो सामान रखते ही एक बार घर का मुआयना ज़रूर करती थीं। क्या बदला है और क्या नहीं का मुआयना। घर आंगने देखने के बाद अगला पड़ाव होता था छत पर जाने का। और छत पर जाने का एक ही मकसद होता था..बरहम बाबा को देखना। और खुद से कहना कि आज भी बच्चे खेल रहे हैं इस पेड़ के नीचे।
मेरे भीतर भी यह पेड़ बहुत दिनों तक खड़ा रहा। आज भी दिल्ली में रहते हुए याद आ जाता है। दफ्तर में काम करते हुए या गहरी नींद के बाद जब आँखें खुलती हैं तो एक झलक बरहम बा की गुज़र जाती है। सबके साथ होता होगा ऐसा। मुझे इस तरह के साक्षात्कार बहुत होते हैं। अचानक नोएडा मोड़ से गुज़रते हुए गांव के उस मोड़ पर अपनी कार मोड़ते हुए पाता हूं जहां से मेरा घर दिखने लगता था।
लेकिन किसी अफसोस के साथ नहीं। मैं यहां क्यों हूं और वहां क्यों नहीं। यह मेरा फैसला नहीं था। समाज और परिवार ने तय किया है कि बड़ा होकर कुछ करना है। कुछ करने के लिए कई प्रकार के खांचे बने हुए हैं। हम सब अपने आप को उन खांचों में फिट कर लेते हैं। एक खांचे से दूसरे खांचे में लौटकर मन बदल जाता होगा। हासिल वही होता है जो पहले खांचे में करने की कोशिश कर रहे होते हैं।
मगर बरहम बाबा की याद आती है। बरहम बाबा होते तब भी मुझे वापस आने के लिए नहीं कहते। न मैं वापस जाता। उन्होंने हमसे कभी कोई अपेक्षा की ही नहीं। अपने आप को सौंप दिया कि आओ मेरी छांव और डालों पर खेलो कूदो और चले जाओ। ये तो हम हैं कि उन्हें भूल नहीं पाते। आज सुबह बस एक पेड़ की याद आई है। बरहम बाबा की याद आई है। शायद इसलिए कि दिल्ली में दोस्त बने न किसी पेड़ से कोई रिश्ता कायम हो सका। ये शहर सिर्फ दफ्तर का पता भर है मेरे लिए। परमानेंट अड्रेस।
बहुत पहले गिर गए बरहम बाबा। बूढ़े हो गए थे। किसी शाम की तेज आंधी ने बरहम बाबा को गिरा दिया। बाबूजी ने जब बताया तो ऐसे बता रहे थे जैसे उनके भीतर का एक बड़ा हिस्सा ढह गया हो। थोड़ा सा कह कर चुप हो गए। बाकी अपने भीतर ही कहने लगे। एक पेड़ के गिरने का नितांत व्यक्तिगत और सार्वजनिक दुख। बाप का ज़्यादा और बेटे का थोड़ा कम। लेकिन दोनों का साझा अनुभव था बरहम बाबा की मोटी मोटी डालो पर दौड़ना। डोला पांती खेलना। भारत के राष्ट्रीय खेलों की सूची में डोला पांती का भले कहीं नाम न हो लेकिन ग्रामीण अंचल कि स्मृतियों में यह खेल अब भी बचा हुआ है। नहीं मालूम कि अब कोई पेड़ की डाल पर दौड़ने और पकड़ने का खेल खेलता है या नहीं।
तेज दुपहरी में कहीं छांव की गारंटी होती थी तो विशाल बरहम बाबा के नीचे। सुबह सुबह गांव की भक्तिमय औरतें यहां जल चढ़ा जाती थी। दस बजते ही लोग अपनी गायों को इसके नीचे बांध देते। दोपहर होते ही सारे बच्चे इसकी डालों पर अपना ठिकाना बना लेते थे। शुरु हो जाता था दौड़ना। कुछ लड़के इतनी तेजी से इस डाल से उस डाल पर भागते कि लगता था कि कार्ल लुइस का जन्म मेरे गांव में क्यों नहीं हुआ। हम सबको मालूम था कि कौन सा घोंसला तोता का है और कौन सा मैना का। किस घोसलें में अंडा है और किस में नहीं। गांव में बहुत लोग मिलते थे जिनकी कमर से लेकर टांग की हड्डी डोला पांती खेलते वक्त गिरने से टूटी थी। पुरानी पीढ़ि के लोग नई पीढ़ि को शान से दिखाते। कहते कि देख हमरो टांग टूटल बा। मामूली खेलने बानी हम। तहनी के का खेल ब जा लोग।
बरहम बाबा का नहीं रहना बॉटनी के किसी विशेषज्ञ का दुख नहीं हो सकता। ये उन बेटियों का दुख है जो मायके आते वक्त सबसे पहले बरहम बाबा को देखती थी। तसल्ली के लिए और पुरानी बातों को याद करने के लिए। शादी के बाद विदाई के वक्त बहने डोली से झांक लिया करती थीं बरहम बाबा की तरफ। बेटियां जब लौटती थीं तो सामान रखते ही एक बार घर का मुआयना ज़रूर करती थीं। क्या बदला है और क्या नहीं का मुआयना। घर आंगने देखने के बाद अगला पड़ाव होता था छत पर जाने का। और छत पर जाने का एक ही मकसद होता था..बरहम बाबा को देखना। और खुद से कहना कि आज भी बच्चे खेल रहे हैं इस पेड़ के नीचे।
मेरे भीतर भी यह पेड़ बहुत दिनों तक खड़ा रहा। आज भी दिल्ली में रहते हुए याद आ जाता है। दफ्तर में काम करते हुए या गहरी नींद के बाद जब आँखें खुलती हैं तो एक झलक बरहम बा की गुज़र जाती है। सबके साथ होता होगा ऐसा। मुझे इस तरह के साक्षात्कार बहुत होते हैं। अचानक नोएडा मोड़ से गुज़रते हुए गांव के उस मोड़ पर अपनी कार मोड़ते हुए पाता हूं जहां से मेरा घर दिखने लगता था।
लेकिन किसी अफसोस के साथ नहीं। मैं यहां क्यों हूं और वहां क्यों नहीं। यह मेरा फैसला नहीं था। समाज और परिवार ने तय किया है कि बड़ा होकर कुछ करना है। कुछ करने के लिए कई प्रकार के खांचे बने हुए हैं। हम सब अपने आप को उन खांचों में फिट कर लेते हैं। एक खांचे से दूसरे खांचे में लौटकर मन बदल जाता होगा। हासिल वही होता है जो पहले खांचे में करने की कोशिश कर रहे होते हैं।
मगर बरहम बाबा की याद आती है। बरहम बाबा होते तब भी मुझे वापस आने के लिए नहीं कहते। न मैं वापस जाता। उन्होंने हमसे कभी कोई अपेक्षा की ही नहीं। अपने आप को सौंप दिया कि आओ मेरी छांव और डालों पर खेलो कूदो और चले जाओ। ये तो हम हैं कि उन्हें भूल नहीं पाते। आज सुबह बस एक पेड़ की याद आई है। बरहम बाबा की याद आई है। शायद इसलिए कि दिल्ली में दोस्त बने न किसी पेड़ से कोई रिश्ता कायम हो सका। ये शहर सिर्फ दफ्तर का पता भर है मेरे लिए। परमानेंट अड्रेस।
नेताओं के साथ खड़े लोगों से पूछो साधो
नेता को नहीं गरियाना चाहिए। कुछ लोग लोकतंत्र के नाम पर कहने लगे हैं। तो क्या मुंबई धमाकों से पहले नेताओं की आलोचना नहीं हो रही थी? गेटवे पर लाख लोगों की भीड़ क्या सिर्फ भीड़ है? क्या ये भीड़ सिर्फ फाइव स्टार में लोगों के मारे जाने से बेचैन है? क्या भीड़ की इस बेचैनी से लोकतंत्र नहीं बचेगा क्योंकि नेताओं को गरिआया जा रहा है? क्या हम ठीक ठीक जानते हैं कि यह भीड़ लोकतंत्र के खिलाफ है? या फिर लोकतंत्र का फायदा उठा कर नेताओं को गरिया रही है। उन पर दबाव बढ़ा रही है।
कुछ दल खास कर बीजेपी के नेताओं को इसकी बेचैनी हो रही है। क्योंकि इस हमले में उन्हें आतंकवाद पर ठेकेदारी करने का मौका नहीं मिला। बीजेपी ने दिल्ली में मतदान से एक दिन पहले अखबारों में विज्ञापन भी दिया कि आतंक के नाम पर हमें वोट दें। हम मज़बूत सरकार चलाते हैं। हम समझौता नहीं करते। झुकते नहीं आदि आदि। ठीक इसी वक्त ताज होटल में आपरेशन चल रहा था।
नेताओं को गरिआने से लोकतंत्र किस तरह खतरे में पड़ गया है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। क्या हम चुनावों में एक सेट नेताओं को बदल नहीं देते। जिसको बदलते हैं उसे गरियाते नहीं क्या। गरियाने का मतलब जनमत का दबाव और आलोचना है। तो क्या उसके बाद लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है।
राजनीति की ओलाचना राजनीति के खिलाफ नहीं होती। उसे चलाने वालों और नीतियों के खिलाफ होती है। राजनीति की धारणा के खिलाफ नहीं। नेताओं के करीब बैठे लोग इस तरह के बकवास करने लगे हैं। जनता को अधिकार है कि वो बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ हो जाए। दोनों को रिजेक्ट कर दे। अगर कर सके तो। इससे लोकतंत्र का घंटा कुछ नहीं बिगड़ेगा।
लोकतंत्र में स्थायी जनता है। जनता ही लोकतंत्र को चलाने के लिए नेता चुनती है। नेता कोई अहसान नहीं होता। लोकतंत्र में नेता भिखारी होता है और जनता दाता। बाबा साहेब आंबेडकर की किताब में सब बराबर बताये गए हैं। अमीर गरीब सब। सबको एक समान मतदान का अधिकार दिया गया है। अमीरों के विरोध को सम्मान से देखा जाना चाहिए। इनकी गोलबंदी का मज़ाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए। कुछ लोग कह रहे हैं कि फिल्म स्टार तभी निकले हैं जब फाइव स्टार वाले मरे हैं। सतही बाते हैं।
सुनामी के समय मैंने खुद राहुल बोस को मीलों पैदल चलते देखा था। साहित्यकार अमिताव घोष को अंडमान की गलियों में चुपचाप खड़े होकर नोट्स लेते देखा था। हिंदी के संस्मरण छाप साहित्यकार नहीं दिखे थे जो हमेशा गरीबों के लिए लिखते हैं। उस दिन लगा था कि हिंदी के साहित्यकार फटीचर होते हैं। आखिर कोई क्यों नहीं अमिताव घोष की तरह इस मानवीय त्रासदी को करीब से देखने समझने की कोशिश कर रहा है। कोई कहेगा अमिताव को लाखों की रायल्टी मिलती है। मैं नहीं मानता कि हिंदी के सारे साहित्यकार दरिद्र ही हैं।
कोसी ने बीस लाख लोगों को ठेल दिया। हिंदी में विस्थापित कर दिया। कौन रोया। कौन निकला। मोमबत्तियां लेकर। इस तरह की बातें करने से उन लाखों लोगों का अनादर हो जाता है जो कोसी के पीड़ितों के लिए कुछ करने के लिए बेचैन हो गए। बिहार सरकार ने कोई रास्ता नहीं दिखाया। कई लोगों के फोन आए कि वे मुझे लाखों रुपये दे देंगे मगर सरकार को नहीं देंगे। सरकार वाले खा जायेंगे।
तो क्या इस अविश्वास के बाद लोगों ने लोकतंत्र में यकीन छोड़ दिया। तो क्या बिहार में लोकतंत्र मर गया? हम सब नेताओं से नफरत करते हैं लेकिन जो भी उनके करीब जाते हैं बहुत कम होते हैं जो उनसे चिढ़ते हैं। हो सकता है मैं भी इसमें शामिल हूं। पत्रकार नेताओं से नफरत नहीं करता है। सोहबत की तलाश कर लेता है। इस सच को बोल देने से क्या मुझे फांसी पर लटका देंगे और क्या उसके बाद लोकतंत्र को बचा लेंगे।
कुछ दल खास कर बीजेपी के नेताओं को इसकी बेचैनी हो रही है। क्योंकि इस हमले में उन्हें आतंकवाद पर ठेकेदारी करने का मौका नहीं मिला। बीजेपी ने दिल्ली में मतदान से एक दिन पहले अखबारों में विज्ञापन भी दिया कि आतंक के नाम पर हमें वोट दें। हम मज़बूत सरकार चलाते हैं। हम समझौता नहीं करते। झुकते नहीं आदि आदि। ठीक इसी वक्त ताज होटल में आपरेशन चल रहा था।
नेताओं को गरिआने से लोकतंत्र किस तरह खतरे में पड़ गया है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। क्या हम चुनावों में एक सेट नेताओं को बदल नहीं देते। जिसको बदलते हैं उसे गरियाते नहीं क्या। गरियाने का मतलब जनमत का दबाव और आलोचना है। तो क्या उसके बाद लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है।
राजनीति की ओलाचना राजनीति के खिलाफ नहीं होती। उसे चलाने वालों और नीतियों के खिलाफ होती है। राजनीति की धारणा के खिलाफ नहीं। नेताओं के करीब बैठे लोग इस तरह के बकवास करने लगे हैं। जनता को अधिकार है कि वो बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ हो जाए। दोनों को रिजेक्ट कर दे। अगर कर सके तो। इससे लोकतंत्र का घंटा कुछ नहीं बिगड़ेगा।
लोकतंत्र में स्थायी जनता है। जनता ही लोकतंत्र को चलाने के लिए नेता चुनती है। नेता कोई अहसान नहीं होता। लोकतंत्र में नेता भिखारी होता है और जनता दाता। बाबा साहेब आंबेडकर की किताब में सब बराबर बताये गए हैं। अमीर गरीब सब। सबको एक समान मतदान का अधिकार दिया गया है। अमीरों के विरोध को सम्मान से देखा जाना चाहिए। इनकी गोलबंदी का मज़ाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए। कुछ लोग कह रहे हैं कि फिल्म स्टार तभी निकले हैं जब फाइव स्टार वाले मरे हैं। सतही बाते हैं।
सुनामी के समय मैंने खुद राहुल बोस को मीलों पैदल चलते देखा था। साहित्यकार अमिताव घोष को अंडमान की गलियों में चुपचाप खड़े होकर नोट्स लेते देखा था। हिंदी के संस्मरण छाप साहित्यकार नहीं दिखे थे जो हमेशा गरीबों के लिए लिखते हैं। उस दिन लगा था कि हिंदी के साहित्यकार फटीचर होते हैं। आखिर कोई क्यों नहीं अमिताव घोष की तरह इस मानवीय त्रासदी को करीब से देखने समझने की कोशिश कर रहा है। कोई कहेगा अमिताव को लाखों की रायल्टी मिलती है। मैं नहीं मानता कि हिंदी के सारे साहित्यकार दरिद्र ही हैं।
कोसी ने बीस लाख लोगों को ठेल दिया। हिंदी में विस्थापित कर दिया। कौन रोया। कौन निकला। मोमबत्तियां लेकर। इस तरह की बातें करने से उन लाखों लोगों का अनादर हो जाता है जो कोसी के पीड़ितों के लिए कुछ करने के लिए बेचैन हो गए। बिहार सरकार ने कोई रास्ता नहीं दिखाया। कई लोगों के फोन आए कि वे मुझे लाखों रुपये दे देंगे मगर सरकार को नहीं देंगे। सरकार वाले खा जायेंगे।
तो क्या इस अविश्वास के बाद लोगों ने लोकतंत्र में यकीन छोड़ दिया। तो क्या बिहार में लोकतंत्र मर गया? हम सब नेताओं से नफरत करते हैं लेकिन जो भी उनके करीब जाते हैं बहुत कम होते हैं जो उनसे चिढ़ते हैं। हो सकता है मैं भी इसमें शामिल हूं। पत्रकार नेताओं से नफरत नहीं करता है। सोहबत की तलाश कर लेता है। इस सच को बोल देने से क्या मुझे फांसी पर लटका देंगे और क्या उसके बाद लोकतंत्र को बचा लेंगे।
घेर कर मार दिये जाने के बाद
मुझे अब डर नहीं लगता है
घेर कर मार दिये जाने से
देखते देखते कितने मर गए
अपनी ही आंखों के सामने
जानता हूं मार दिए जाने के बाद
आना जाना होगा कुछ नेताओं का
कुछ कहानियां मेरे बारे में छप जाएंगी
मुआवज़ों की राशि कोई बढ़ा जाएगा
मेरे दोस्तों को बहुत गुस्सा आएगा
आतंकवाद और राजनेताओं की करतूत पर
मैं आराम से पड़ा रहूंगा कहीं पर
किसी स्टेशन या किसी मॉल के बीचों बीच
ख़ून से लथपथ, आंखें बाहर निकलीं होंगी
पर्स में अपनों की तस्वीरों के नीचे
दोस्तों के पते मिलेंगे और सरकारी नोट
एटीएम की दो चार रसीदें होंगी और
साथ में थैला,जिसमें होगा वो खिलौना
जो मैंने खरीदे हैं अपनी बेटी के लिए
मोबाइल फोन में आया वो आखिरी एसएमएस
मेरे दोस्तों का, तुम कहां हो, जल्दी बताना
मेरी बीबी का मिस्ड कॉल
दो लोग उठा कर रख देंगे मुझे
स्ट्रेचर पर और अपडेट कर देंगे
मरने वालों की संख्या और सूची
भेजा जाऊंगा पोस्टमार्टम के लिए
कितनी लगीं गोलियां और कितने बजे
पता लगा लिया जाएगा ठीक ठीक
मैं रवीश कुमार,दिल्ली के एक मॉल में
घेर का मार दिया गया आतंकवादी हमले में
घेर कर मार दिये जाने से
देखते देखते कितने मर गए
अपनी ही आंखों के सामने
जानता हूं मार दिए जाने के बाद
आना जाना होगा कुछ नेताओं का
कुछ कहानियां मेरे बारे में छप जाएंगी
मुआवज़ों की राशि कोई बढ़ा जाएगा
मेरे दोस्तों को बहुत गुस्सा आएगा
आतंकवाद और राजनेताओं की करतूत पर
मैं आराम से पड़ा रहूंगा कहीं पर
किसी स्टेशन या किसी मॉल के बीचों बीच
ख़ून से लथपथ, आंखें बाहर निकलीं होंगी
पर्स में अपनों की तस्वीरों के नीचे
दोस्तों के पते मिलेंगे और सरकारी नोट
एटीएम की दो चार रसीदें होंगी और
साथ में थैला,जिसमें होगा वो खिलौना
जो मैंने खरीदे हैं अपनी बेटी के लिए
मोबाइल फोन में आया वो आखिरी एसएमएस
मेरे दोस्तों का, तुम कहां हो, जल्दी बताना
मेरी बीबी का मिस्ड कॉल
दो लोग उठा कर रख देंगे मुझे
स्ट्रेचर पर और अपडेट कर देंगे
मरने वालों की संख्या और सूची
भेजा जाऊंगा पोस्टमार्टम के लिए
कितनी लगीं गोलियां और कितने बजे
पता लगा लिया जाएगा ठीक ठीक
मैं रवीश कुमार,दिल्ली के एक मॉल में
घेर का मार दिया गया आतंकवादी हमले में
तुम तो काम से गए नेता जी
आतंकवाद पर अनगिनत शब्द लिखे जा चुके हैं। अनगिनत नेताओं को गरियाया जा चुका है। आतंकवाद से हारने वाले मुल्क के तौर पर हम खुद को देखने लगे हैं। अभी तक आतंकवाद के नाम पर अपनी अपनी पसंद की पार्टियों को वोट देते थे। लगता है इस बार वो पसंद भी जाती रही। एक मामूली साध्वी के बचाव में राजनाथ सिंह से लेकर आडवाणी तक बावले हो गए थे। दिल्ली के विजय कुमार मल्होत्रा एटीएस के अफसरों का नार्को टेस्ट कराना चाहते थे। उसी एटीएस के अफसरों ने गोली खा ली। ज़ाहिर है आतंकवाद को वो भुगतते थे और वही कीमत भी चुका गए। बयान देने के लिए बच गए हमारे ओरिजिनल लौह पुरुष सरदार पटेल की फोटोकापी आडवाणी और मोदी। और एक खराब ज़ेरॉक्स पेपर की तरह बचाव के लिए बच गए मनमोहन सिंह। विलासराव देशमुख और आर आर पाटिल जोकर लग रहे थे।
आतंकवाद की राजनीति में इस बार नेता नंगा हो गया। टीवी चैनल और अखबारों में आ रही प्रतिक्रिया से लगने लगा कि इस हमले का सबसे अधिक शिकार इस बार नेता हुआ है। जिस वक्त नरेंद्र मोदी केंद्र के पांच लाख रुपये के मुआवज़े को एक करोड़ की राशि से छोटा बता रहे थे उसी समय आतंकवाद और राष्ट्र्वाद के महाप्रतीक इस महापुरुष को स्वर्गीय हेमंत करकरे की पत्नी अपने घर आने से मना कर रही थीं। मना कर चुकी थीं फिर भी मोदी पहुंचे। राज ठाकरे करकरे के अंतिम संस्कार की तस्वीरों में दिखे। कहीं कोने में दुबके हुए। बंगलौर में मेजर उन्नीकृष्णन के पिता ने केरल के मुख्यमंत्री को दरवाज़े से लौटा दिया। दिल्ली में महेश चंद्र शर्मा की पत्नी से बीजेपी के टिकट दिए जाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
हमारे नेताओं के लिए यह सबसे मुश्किल वक्त है। इस बार के हमले में किसी नेता को टीवी स्टुडियो में आकर भाषण देने का मौका नहीं मिला। वोट चाहिए था कि इसलिए जिस वक्त एनएसजी के जवान ताज होटल के अंदर लड़ रहे थे उसी वक्त दिल्ली में बीजेपी के रणनीतिकार स्लोगन रच रहे थे। दिल्ली के तमाम अखबारों में मतदान से एक दिन पहले छपा भी। भाजपा को वोट दो। वसुंधरा राजे ने आतंकवाद पर अपने विज्ञापन की बारंबारता बढ़ा दी। हमारा नेता सिर्फ वोट ही मांग सकता है। थोड़ा तो बता देती कि वसुंधरा ने आतंकवाद से लड़ने के लिए क्या किया है? क्या राज्य में पुलिस को अलग ट्रेनिंग दी है? क्या नए संसाधन जुटाये हैं? इत्तफाक और संयोग पर हमले की दुकानदारी चल निकली थी। बीजेपी को वोट मिल जाएंगे।
शिवराज पाटिल अब कभी अपनी कार से उतर कर पान नहीं खरीद सकेंगे। अगर खाते हो तों। एक सबक भी मिला है। साईं कृपा से मठों की दुकानदारी चलती है। तकदीर और तदबीर नहीं बदलती। शिवराज को जाना पड़ गया। विलासराव देशमुख रात भर फोन करते रहे टीवी चैनलों को। रामगोपाल वर्मा को साथ लेकर ताज भ्रमण पर निकले देशमुख। कांग्रेस आतंकवाद से निपटने में एकदम फटीचर पार्टी निकली।
ज़ाहिर है अभी तक यही हो रहा था कि हर आतंकवादी हमले पर देश की एकता और अखंडता पर भाषण दिया जा रहा था। हम एक हैं। हम एक रहेंगे। लेकिन मरते रहेंगे। अभी तक लोग यही समझ रहे थे कि ये नेता ठीक नहीं।उस दल का नेता ठीक है। सख्त है। सख्त की परिभाषा यह थी कि उस दल वाले मुसलमानों के खिलाफ सख्त हैं। जब तक मुसलमान आतंकवादी है देश को पोटा चाहिए। जब साधु या साध्वी पकड़े जाएंगे उनके लिए यही नेता बचाव करेंगे। मुशीरुल हसन और लाल कृष्ण आडवाणी में यही फर्क है कि मुशीरुल पुलिस पर सवाल नहीं उठा रहे थे, सिर्फ बेकसूर साबित होने का एक और मौका देना चाहते थे।आडवाणी जी( या उनकी पार्टी) तो न्याय से लेकर एटीएस तक को नेस्तानाबूद करने में लगे थे। साध्वी हिंदू प्रतीक है। हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता। कह रहे थे कि इसे हिंदू आतंकवाद का नाम मत दो। बतायें तो वे साध्वी का बचाव किस लिए कर रहे थे। क्या इसलिए कि वो इस देश की नागरिक है या फिर इसलिए कि वो हिंदू है। इससे पहले भी पुलिस ने कई बेकसूर मुसलमानों को फंसाया। क्या उनके बचाव में आडवाणी कभी उतरे। कभी नहीं उतरेंगे। बाटला हाउस के बाद जिसतरह अमर सिंह लग रहे थे उसी तरह साध्वी का बचाव करने के कारण बीजेपी मुंबई हमले के बाद लग रही थी। किसी में कोई फर्क नहीं।
जब तक इस देश में मज़हब के हिसाब से राजनीति तय होगी हमारी दलीलें पुरानी पड़ेंगी। पब्लिक जान गई है मैं नहीं मानता। फिर भी मुंबई हमले की तुरंत प्रतिक्रिया से तो यही लगता है कि इस बार नेताओं की साख गिरी है। टीवी पर अरुण जेटली की बौखलाहट दिख रही थी।कह रहे थे कि आप ठीक नहीं कर रहे हैं। नेताओं के खिलाफ नैराश्य फैलाकर। जेटली त़ड़प रहे थे कि इस बार उनके सामने माइक इसलिए नहीं लग रहे थे कि वे नैतिक मास्टर की तरह आतंकवाद पर लेक्चर दें। इसलिए लग रहे थे कि वे नेता होने पर सफाई दें।
इस बार राजनीति का यह आइडिया पिट गया। आतंकवादी एक बार फिर कामयाब हो कर चले गए। नेताओं की दुकानदारी अभी बंद नहीं हुई है। लोकतंत्र में बंद भी नहीं होनी चाहिए। नेता एक ज़रूरी अंग है। सिर्फ खराब नेताओं और राजनीति की दुकान बंद कर एक नया शापिंग सेंटर बनाने की ज़रूरत है। जहां कुछ नया माल बिके। नई दुकान दिखे।
आतंकवाद की राजनीति में इस बार नेता नंगा हो गया। टीवी चैनल और अखबारों में आ रही प्रतिक्रिया से लगने लगा कि इस हमले का सबसे अधिक शिकार इस बार नेता हुआ है। जिस वक्त नरेंद्र मोदी केंद्र के पांच लाख रुपये के मुआवज़े को एक करोड़ की राशि से छोटा बता रहे थे उसी समय आतंकवाद और राष्ट्र्वाद के महाप्रतीक इस महापुरुष को स्वर्गीय हेमंत करकरे की पत्नी अपने घर आने से मना कर रही थीं। मना कर चुकी थीं फिर भी मोदी पहुंचे। राज ठाकरे करकरे के अंतिम संस्कार की तस्वीरों में दिखे। कहीं कोने में दुबके हुए। बंगलौर में मेजर उन्नीकृष्णन के पिता ने केरल के मुख्यमंत्री को दरवाज़े से लौटा दिया। दिल्ली में महेश चंद्र शर्मा की पत्नी से बीजेपी के टिकट दिए जाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
हमारे नेताओं के लिए यह सबसे मुश्किल वक्त है। इस बार के हमले में किसी नेता को टीवी स्टुडियो में आकर भाषण देने का मौका नहीं मिला। वोट चाहिए था कि इसलिए जिस वक्त एनएसजी के जवान ताज होटल के अंदर लड़ रहे थे उसी वक्त दिल्ली में बीजेपी के रणनीतिकार स्लोगन रच रहे थे। दिल्ली के तमाम अखबारों में मतदान से एक दिन पहले छपा भी। भाजपा को वोट दो। वसुंधरा राजे ने आतंकवाद पर अपने विज्ञापन की बारंबारता बढ़ा दी। हमारा नेता सिर्फ वोट ही मांग सकता है। थोड़ा तो बता देती कि वसुंधरा ने आतंकवाद से लड़ने के लिए क्या किया है? क्या राज्य में पुलिस को अलग ट्रेनिंग दी है? क्या नए संसाधन जुटाये हैं? इत्तफाक और संयोग पर हमले की दुकानदारी चल निकली थी। बीजेपी को वोट मिल जाएंगे।
शिवराज पाटिल अब कभी अपनी कार से उतर कर पान नहीं खरीद सकेंगे। अगर खाते हो तों। एक सबक भी मिला है। साईं कृपा से मठों की दुकानदारी चलती है। तकदीर और तदबीर नहीं बदलती। शिवराज को जाना पड़ गया। विलासराव देशमुख रात भर फोन करते रहे टीवी चैनलों को। रामगोपाल वर्मा को साथ लेकर ताज भ्रमण पर निकले देशमुख। कांग्रेस आतंकवाद से निपटने में एकदम फटीचर पार्टी निकली।
ज़ाहिर है अभी तक यही हो रहा था कि हर आतंकवादी हमले पर देश की एकता और अखंडता पर भाषण दिया जा रहा था। हम एक हैं। हम एक रहेंगे। लेकिन मरते रहेंगे। अभी तक लोग यही समझ रहे थे कि ये नेता ठीक नहीं।उस दल का नेता ठीक है। सख्त है। सख्त की परिभाषा यह थी कि उस दल वाले मुसलमानों के खिलाफ सख्त हैं। जब तक मुसलमान आतंकवादी है देश को पोटा चाहिए। जब साधु या साध्वी पकड़े जाएंगे उनके लिए यही नेता बचाव करेंगे। मुशीरुल हसन और लाल कृष्ण आडवाणी में यही फर्क है कि मुशीरुल पुलिस पर सवाल नहीं उठा रहे थे, सिर्फ बेकसूर साबित होने का एक और मौका देना चाहते थे।आडवाणी जी( या उनकी पार्टी) तो न्याय से लेकर एटीएस तक को नेस्तानाबूद करने में लगे थे। साध्वी हिंदू प्रतीक है। हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता। कह रहे थे कि इसे हिंदू आतंकवाद का नाम मत दो। बतायें तो वे साध्वी का बचाव किस लिए कर रहे थे। क्या इसलिए कि वो इस देश की नागरिक है या फिर इसलिए कि वो हिंदू है। इससे पहले भी पुलिस ने कई बेकसूर मुसलमानों को फंसाया। क्या उनके बचाव में आडवाणी कभी उतरे। कभी नहीं उतरेंगे। बाटला हाउस के बाद जिसतरह अमर सिंह लग रहे थे उसी तरह साध्वी का बचाव करने के कारण बीजेपी मुंबई हमले के बाद लग रही थी। किसी में कोई फर्क नहीं।
जब तक इस देश में मज़हब के हिसाब से राजनीति तय होगी हमारी दलीलें पुरानी पड़ेंगी। पब्लिक जान गई है मैं नहीं मानता। फिर भी मुंबई हमले की तुरंत प्रतिक्रिया से तो यही लगता है कि इस बार नेताओं की साख गिरी है। टीवी पर अरुण जेटली की बौखलाहट दिख रही थी।कह रहे थे कि आप ठीक नहीं कर रहे हैं। नेताओं के खिलाफ नैराश्य फैलाकर। जेटली त़ड़प रहे थे कि इस बार उनके सामने माइक इसलिए नहीं लग रहे थे कि वे नैतिक मास्टर की तरह आतंकवाद पर लेक्चर दें। इसलिए लग रहे थे कि वे नेता होने पर सफाई दें।
इस बार राजनीति का यह आइडिया पिट गया। आतंकवादी एक बार फिर कामयाब हो कर चले गए। नेताओं की दुकानदारी अभी बंद नहीं हुई है। लोकतंत्र में बंद भी नहीं होनी चाहिए। नेता एक ज़रूरी अंग है। सिर्फ खराब नेताओं और राजनीति की दुकान बंद कर एक नया शापिंग सेंटर बनाने की ज़रूरत है। जहां कुछ नया माल बिके। नई दुकान दिखे।
एक ख़ूबसूरत लड़की

डेसी इंद्रयाणी। इंडोनेशिया की एक मुस्लिम लड़की। ख़ूबसूरत....शायद हां। जितनी मेरी नज़र से नहीं उससे कहीं ज़्यादा ख़ुद की नज़र में ख़ूबसूरत है डेसी इंद्रयाणी। क्वालालंपुर के क्लास रुम में अचानक नज़र पड़ गई। अपने कैमरे से डेसी खुद की तस्वीर उतार रही थी। मेरे ग्रुप में होने के कारण जब भी साथ बाहर गए अचानक लगा कि डेसी साथ नहीं है। मुड़ कर देखा तो अपनी तस्वीर खुद खींच रही है। कम और बहुत धीरे बोलने वाली डेसी से कहा भी कि आपकी तस्वीर मैं ले लेता हूं। उसने अपना कैमरा दिया भी। लेकिन उसके बाद भी वो खुद की तस्वीर उतारने में मशगूल हो गई।
ख़ूबसूरती बीमारी होती है। बचपन में एक लड़की की याद आ गई। हर वक्त बेसन पोते रहती थी। और अधिक गोरी होने की चाह में। पहली बार चेहरे पर खाने पीने का सामान बेसन, खीरा कद्दू मैंने उसी के चेहरे पर देखा था। वो भी बार बार अपने को देखती थी। डेसी की भी यही आदत। जब टोका कि डेसी ये क्या करती हो। हल्के से मुस्कुराया मगर फिर वही कोशिश। एक हाथ में कैमरा और स्माइल। क्लिक। डेसी नहीं मानी।

बाद में डेसी के कैमरे की तस्वीरों को देखने लगा। सैंकड़ों तस्वीरें उसी की। उसी की खिंची हुई। अलग अलग पोज़ में। चेहरे में कुछ तो जादू था कि उसकी तस्वीर उससे भी खूबसूरत लगने लगती थी। वो कभी भी खुद को निहारते हुए नहीं थकती है। उसे अच्छा लगता है खुद को देखना। डेसी इंद्रयाणी इंडोनेशिया के सरकारी टीवी टीवीआरआई की एंकर हैं। फिल्मों, फैशन मैगज़ीन और मॉडल्स की तस्वीरों ने मिल कर डेसी की नज़र बदल गई है। हम सब खुद को निहारते हैं मगर बीमारी की हद तक नहीं।
पर शायद यह सब उसके लिए था। अपनी ख़ूबसूरती को लेकर अहंकार नहीं था। बस एक खुशफ़हमी थी। ख़ूबसूरत होने का अहसास किसी को भी और खूबसूरत बना सकता है।
मैंने कई लड़कियों को देखा है खूबसूरत लड़कियों को निहारते हुए। उनकी नज़रें भी ठीक वैसे ही ऊपर नीचे होती हैं जैसे हम पुरुषों की नज़र। मर्दों की नज़र तो विकसित ही कुछ इस तरह की गई है कि कोशिश करनी पड़ती है कि हम लड़कियों को ऐसे न देखें। इस एक पुरुषोचित आदत से मुक्ति पाने के लिए न जाने कितना संघर्ष करना पड़ा। जब सहज हुए तो लड़कियों के साथ दोस्ती स्वाभाविक लगने लगी। वो दोस्त बनने लगीं। देखे जा सकने वाली ऑबजेक्ट से निकल कर। सिमोन दा बोउआर की किताब पढ़ते वक्त रातों की नींद उड़ गई थी। खुद पर शर्म आने लगी थी। मर्दों की उठती गिरती नज़रों पर पहले से ज़्यादा नज़र पड़ जाती है। राखी सावंत का वो बेहूदा मगर असली गाना...देखता है तू क्या...कई बारों कानों के पास आता है तो मर्दों की उन आंखों की बेचैनी की तस्वीर उभरने लगती है। इस बात का डेसी की बात से कोई लेना देना नहीं। बस ढूंढ रहा था कि कहीं डेसी की नज़र भी तो इन्हीं नज़रों से नहीं बनी।
( मैंने डेसी को कहा था कि तुम्हारे बारे में अपने ब्लॉग पर लिखने वाला हूं। तस्वीर में जो लंबी है वही डेसी है)
सफ़दर अली ख़ान लौटना चाहते हैं
सेवा में,
सचिव,
कार्मिक विभाग
भारत सरकार,
(सितंबर १९४७)
मैं,सफ़दर अली ख़ान भारत की सेवा करना चाहता हूं। मैंने पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया था क्योंकि मेरे दोस्तों और सह कर्मचारियों ने दबाव डाला था लेकिन अब मुझे अपने फ़ैसले पर अफ़सोस हो रहा है। मेरी बूढ़ी मां बहुत बीमार है। वह भी मुझे पाकिस्तान जाने नहीं देना चाहती। मैंने पाकिस्तान का पक्ष लेकर एक बड़ी भूल की है। मैं सच कह रहा हूं। मेरा अपना फ़ैसला नहीं था। दबाव में फ़ैसला किया था। मैं पहले भारतीय हूं और आखिर में भी भारतीय हूं। मैं भारत में रहना चाहता हूं।भारत में ही मरना चाहता हूं। इसलिए मुझे अनुमति दी जाए कि भारत में रहूं।
मुरादाबाद में तैनात गार्ड सफ़दर अली ख़ान भारत में रहना चाहते थे। उनकी इस चिट्ठी की सिफ़ारिश शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद ने की थी। मगर गृह मंत्रालय ने कलाम की इस चिट्ठी को अस्वीकार कर दिया। जवाब मिला कि पार्टिश काउंसिल का फ़ैसला है कि जब एक बार फ़ैसला कर लिया तो उस पर कायम रहना चाहिए। गृहमंत्री सरदार पटेल आज़ाद को लिखते हैं कि आपने जिसकी व्यक्ति की बात की है, मुझे नहीं लगता है कि उसे फैसला बदलने की अनुमति मिल पाएगी।
नवंबर १९४७। ठीक ऐसा ही मौसम रहा होगा। थोड़ी सर्दी अधिक होगी। सफ़दर अली ख़ान उन पांच हज़ार रेलवे कर्मचारियों में शामिल थे,जिन्होंने पाकिस्तान जाने का अपना फ़ैसला बदल दिया था। वो अब वहीं रहना चाहते थे जहां वो रहते आए थे। लेकिन सांप्रदायिक हो रही राजनीति ने इन पर पाकिस्तान के एजेंट होने का लेबल लगा दिया। लखनऊ रेलवे स्टेशन पर हिंदू कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दे दी। कहा कि अगर इन्हें अब भारत में रहने दिया गया तो ठीक नहीं होगा। नतीजा रेलवे के अफसर भी इन कर्मचारियों पर दबाव डालने लगे कि वो पाकिस्तान जाने का अपना फ़ैसला न बदलें।
फॉल्टलाइन्स ऑफ नेशनहुड (रोली बुक्स)। इस किताब में विभाजन और राष्ट्रवाद पर शोध करने वाले इतिहासकार प्रोफेसर ज्ञानेंद्र पांडे सफ़दर अली ख़ान की इस कहानी के बहाने बता रहे हैं कि कैसे एक भ्रम की स्थिति बन गई थी। हर कोई एक दूसरे को हम और वो की ज़ुबान में पुकारने लगा था। यहां तक कि नेहरू भी कहते हैं कि सिर्फ उन्हीं हिंदू मुसलमान को यहां रहना चाहिए जो इसे अपना मुल्क समझते हैं। पांडे बता रहे हैं कि कैसे हिंदू और मुसलमान होने को राष्ट्रवाद की कैटगरी से जोड़ दिया जाने लगता है।
जब दिल्ली में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने कहा कि हर पाकिस्तानी में थोड़ा हिंदुस्तानी रहता है तो मुझे सफ़दर अली की बहुत याद आई। सोचता रहा कि कितना बेमन से सफ़दर पाकिस्तान गए होंगे। कितना रोया होगा। कितना कोसा होगा खुद को। क्यों किया दोस्तों के दबाव में पाकिस्तान जाने का फ़ैसला। कितना दिल टूटा होगा उस भारत सरकार से जिसने सफ़दर को उसके पुराने मोहल्ले में रहने का मौका नहीं दिया। कहीं सफ़दर अली ख़ान और आसिफ़ अली ज़रदारी के बीच कोई रिश्ता तो नहीं है। वो एक दूसरे को जानते तो नहीं होंगे। उम्र का काफी फ़ासला रहा होगा। फिर भी क्या पता सफ़दर के मोहल्ले में ही आसिफ ने अपना बचपन बिताया हो और सफ़दर की बातें उसके दिलों में उतर गईं हों।
नवंबर की इस सर्दी में सफ़दर अली ख़ान, गार्ड मुरादाबाद, की बहुत याद आ रही है। मज़हब के चश्मे से राष्ट्रवाद को देखते देखते हमने शक की तमाम इमारतें खड़ी की हैँ। जहां एक साधु स्वाभाविक रुप से राष्ट्रभक्त होता है और एक मुसलमान देशद्रोही हो जाता है। सुदर्शन कहते हैं आतंकवाद का मज़हब नहीं होता, तो फिर आडवाणी क्यों विदिशा की रैली में कहते हैं कि साध्वी को फंसाया जा रहा है। पुलिस सबको फंसाती है। आडवाणी जानते हैं। कश्मीर टाइम्स के पत्रकार गिलानी को भी आतंकवादी बना दिया गया था। मेरे शो में जेल ले जाते हुए अपनी पुरानी तस्वीर देख कर गिलानी की आंखें भर आईं थीं। तब आडवाणी ने क्यों नहीं कहा था कि गिलानी को फंसाया जा रहा है। वो गृहमंत्री थे।
बहरहाल आप प्रोफेसर ज्ञानेंद्र पांडे की इस किताब को ज़रूर पढ़ियेगा। दस्तावेज़ों के साथ पांडे बताते हैं कि कैसे पाकिस्तान का मतलब कोई मुल्क नहीं था। सभी तरफ एक भ्रम की स्थिति थी। अलग पाकिस्तान को अलग मुल्क समझा गया। पंजाब और बंगाल में लीग के कई समर्थकों और नेताओं में इस बात को लेकर आपत्ति थी कि पूरे महाद्वीप के हिंदुओं और मुसलमानों को अलग कर दिया जाएगा। बंगाल मुस्लिम लीग के सचिव अबुल हाशिम कहते हैं कि आज़ाद भारत में यहां रह रहे सभी मुल्कों को रहने की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। अप्रैल १९४७ में जिन्ना ने माउंटबेटन से गुज़ारिश की थी कि बंगाल और पंजाब की एकता से खिलवाड़ मत कीजिए। इनका चरित्र,संस्कृति सब साझा है। बंगाल मुस्लिम लीग के नेता हुसैन सुहरावर्दी ने वायसराय ने कहा था कि वो नवंबर १९४७ तक विभाजन के फैसले को रोक दें। फ़ज़्लुल हक़ ने १९४० में लाहौर में पाकिस्तान घोषणा पढ़ा था। फ़ज़्लुल हक़ ने भी कहा था कि देश को बांटने से तो अच्छा है कि अंग्रेज़ थोड़ा और रुक जाएं।
नवंबर में ही आसिफ अली ज़रदारी ने क्यों कहा कि हर पाकिस्तानी में थोड़ा हिंदुस्तानी और हर हिंदुस्तानी में थोड़ा पाकिस्तानी रहता है। क्यों मुस्लिम लीग के नेता नवंबर तक ठहरने की बात कर रहे थे। क्यों रेलवे के पांच हज़ार लोग नवंबर में ही पाकिस्तान जाने के फ़ैसले को बदलना चाहते थे। क्यों हिंदू कर्मचारी इनके रुकने के फ़ैसले का विरोध करने लगे। आडवाणी, सुदर्शन और प्रज्ञा का राष्ट्रवाद धर्म की इन गलियों से क्यों गुज़रता है? गेरुआ राष्ट्रवाद गेरुआ आतंकवाद का विरोध क्यों कर रहा है? एक बेकसूर साध्वी का बचाव हो रहा है या फिर किसी सफ़दर अली ख़ान को धमकाया जा रहा है।
सफ़दर अली ख़ान। अपनी कब्र में न जाने किस मुल्क में होने का ख़्वाब देखते होंगे। ऐसे बहुत से सफ़दर थे जो डर से, दबाव में इधर से उधर हो गए। सफ़दर अली ख़ान को कोई लौटा लाता। मुरादाबाद के उस घर में...जहां वो अपनी बूढ़ी मां की तीमारदारी कर लेता और दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ियों को हरी झंडी दिखा देता। कोई है हिंदुस्तान में जो उठ कर कह दे कि मेरे भीतर भी थोड़ा पाकिस्तानी रहता है। सुना है सिंध से आए हैं आडवाणी जी।
सचिव,
कार्मिक विभाग
भारत सरकार,
(सितंबर १९४७)
मैं,सफ़दर अली ख़ान भारत की सेवा करना चाहता हूं। मैंने पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया था क्योंकि मेरे दोस्तों और सह कर्मचारियों ने दबाव डाला था लेकिन अब मुझे अपने फ़ैसले पर अफ़सोस हो रहा है। मेरी बूढ़ी मां बहुत बीमार है। वह भी मुझे पाकिस्तान जाने नहीं देना चाहती। मैंने पाकिस्तान का पक्ष लेकर एक बड़ी भूल की है। मैं सच कह रहा हूं। मेरा अपना फ़ैसला नहीं था। दबाव में फ़ैसला किया था। मैं पहले भारतीय हूं और आखिर में भी भारतीय हूं। मैं भारत में रहना चाहता हूं।भारत में ही मरना चाहता हूं। इसलिए मुझे अनुमति दी जाए कि भारत में रहूं।
मुरादाबाद में तैनात गार्ड सफ़दर अली ख़ान भारत में रहना चाहते थे। उनकी इस चिट्ठी की सिफ़ारिश शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद ने की थी। मगर गृह मंत्रालय ने कलाम की इस चिट्ठी को अस्वीकार कर दिया। जवाब मिला कि पार्टिश काउंसिल का फ़ैसला है कि जब एक बार फ़ैसला कर लिया तो उस पर कायम रहना चाहिए। गृहमंत्री सरदार पटेल आज़ाद को लिखते हैं कि आपने जिसकी व्यक्ति की बात की है, मुझे नहीं लगता है कि उसे फैसला बदलने की अनुमति मिल पाएगी।
नवंबर १९४७। ठीक ऐसा ही मौसम रहा होगा। थोड़ी सर्दी अधिक होगी। सफ़दर अली ख़ान उन पांच हज़ार रेलवे कर्मचारियों में शामिल थे,जिन्होंने पाकिस्तान जाने का अपना फ़ैसला बदल दिया था। वो अब वहीं रहना चाहते थे जहां वो रहते आए थे। लेकिन सांप्रदायिक हो रही राजनीति ने इन पर पाकिस्तान के एजेंट होने का लेबल लगा दिया। लखनऊ रेलवे स्टेशन पर हिंदू कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दे दी। कहा कि अगर इन्हें अब भारत में रहने दिया गया तो ठीक नहीं होगा। नतीजा रेलवे के अफसर भी इन कर्मचारियों पर दबाव डालने लगे कि वो पाकिस्तान जाने का अपना फ़ैसला न बदलें।
फॉल्टलाइन्स ऑफ नेशनहुड (रोली बुक्स)। इस किताब में विभाजन और राष्ट्रवाद पर शोध करने वाले इतिहासकार प्रोफेसर ज्ञानेंद्र पांडे सफ़दर अली ख़ान की इस कहानी के बहाने बता रहे हैं कि कैसे एक भ्रम की स्थिति बन गई थी। हर कोई एक दूसरे को हम और वो की ज़ुबान में पुकारने लगा था। यहां तक कि नेहरू भी कहते हैं कि सिर्फ उन्हीं हिंदू मुसलमान को यहां रहना चाहिए जो इसे अपना मुल्क समझते हैं। पांडे बता रहे हैं कि कैसे हिंदू और मुसलमान होने को राष्ट्रवाद की कैटगरी से जोड़ दिया जाने लगता है।
जब दिल्ली में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने कहा कि हर पाकिस्तानी में थोड़ा हिंदुस्तानी रहता है तो मुझे सफ़दर अली की बहुत याद आई। सोचता रहा कि कितना बेमन से सफ़दर पाकिस्तान गए होंगे। कितना रोया होगा। कितना कोसा होगा खुद को। क्यों किया दोस्तों के दबाव में पाकिस्तान जाने का फ़ैसला। कितना दिल टूटा होगा उस भारत सरकार से जिसने सफ़दर को उसके पुराने मोहल्ले में रहने का मौका नहीं दिया। कहीं सफ़दर अली ख़ान और आसिफ़ अली ज़रदारी के बीच कोई रिश्ता तो नहीं है। वो एक दूसरे को जानते तो नहीं होंगे। उम्र का काफी फ़ासला रहा होगा। फिर भी क्या पता सफ़दर के मोहल्ले में ही आसिफ ने अपना बचपन बिताया हो और सफ़दर की बातें उसके दिलों में उतर गईं हों।
नवंबर की इस सर्दी में सफ़दर अली ख़ान, गार्ड मुरादाबाद, की बहुत याद आ रही है। मज़हब के चश्मे से राष्ट्रवाद को देखते देखते हमने शक की तमाम इमारतें खड़ी की हैँ। जहां एक साधु स्वाभाविक रुप से राष्ट्रभक्त होता है और एक मुसलमान देशद्रोही हो जाता है। सुदर्शन कहते हैं आतंकवाद का मज़हब नहीं होता, तो फिर आडवाणी क्यों विदिशा की रैली में कहते हैं कि साध्वी को फंसाया जा रहा है। पुलिस सबको फंसाती है। आडवाणी जानते हैं। कश्मीर टाइम्स के पत्रकार गिलानी को भी आतंकवादी बना दिया गया था। मेरे शो में जेल ले जाते हुए अपनी पुरानी तस्वीर देख कर गिलानी की आंखें भर आईं थीं। तब आडवाणी ने क्यों नहीं कहा था कि गिलानी को फंसाया जा रहा है। वो गृहमंत्री थे।
बहरहाल आप प्रोफेसर ज्ञानेंद्र पांडे की इस किताब को ज़रूर पढ़ियेगा। दस्तावेज़ों के साथ पांडे बताते हैं कि कैसे पाकिस्तान का मतलब कोई मुल्क नहीं था। सभी तरफ एक भ्रम की स्थिति थी। अलग पाकिस्तान को अलग मुल्क समझा गया। पंजाब और बंगाल में लीग के कई समर्थकों और नेताओं में इस बात को लेकर आपत्ति थी कि पूरे महाद्वीप के हिंदुओं और मुसलमानों को अलग कर दिया जाएगा। बंगाल मुस्लिम लीग के सचिव अबुल हाशिम कहते हैं कि आज़ाद भारत में यहां रह रहे सभी मुल्कों को रहने की पूरी आज़ादी मिलनी चाहिए। अप्रैल १९४७ में जिन्ना ने माउंटबेटन से गुज़ारिश की थी कि बंगाल और पंजाब की एकता से खिलवाड़ मत कीजिए। इनका चरित्र,संस्कृति सब साझा है। बंगाल मुस्लिम लीग के नेता हुसैन सुहरावर्दी ने वायसराय ने कहा था कि वो नवंबर १९४७ तक विभाजन के फैसले को रोक दें। फ़ज़्लुल हक़ ने १९४० में लाहौर में पाकिस्तान घोषणा पढ़ा था। फ़ज़्लुल हक़ ने भी कहा था कि देश को बांटने से तो अच्छा है कि अंग्रेज़ थोड़ा और रुक जाएं।
नवंबर में ही आसिफ अली ज़रदारी ने क्यों कहा कि हर पाकिस्तानी में थोड़ा हिंदुस्तानी और हर हिंदुस्तानी में थोड़ा पाकिस्तानी रहता है। क्यों मुस्लिम लीग के नेता नवंबर तक ठहरने की बात कर रहे थे। क्यों रेलवे के पांच हज़ार लोग नवंबर में ही पाकिस्तान जाने के फ़ैसले को बदलना चाहते थे। क्यों हिंदू कर्मचारी इनके रुकने के फ़ैसले का विरोध करने लगे। आडवाणी, सुदर्शन और प्रज्ञा का राष्ट्रवाद धर्म की इन गलियों से क्यों गुज़रता है? गेरुआ राष्ट्रवाद गेरुआ आतंकवाद का विरोध क्यों कर रहा है? एक बेकसूर साध्वी का बचाव हो रहा है या फिर किसी सफ़दर अली ख़ान को धमकाया जा रहा है।
सफ़दर अली ख़ान। अपनी कब्र में न जाने किस मुल्क में होने का ख़्वाब देखते होंगे। ऐसे बहुत से सफ़दर थे जो डर से, दबाव में इधर से उधर हो गए। सफ़दर अली ख़ान को कोई लौटा लाता। मुरादाबाद के उस घर में...जहां वो अपनी बूढ़ी मां की तीमारदारी कर लेता और दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ियों को हरी झंडी दिखा देता। कोई है हिंदुस्तान में जो उठ कर कह दे कि मेरे भीतर भी थोड़ा पाकिस्तानी रहता है। सुना है सिंध से आए हैं आडवाणी जी।
मां क्यों नहीं देख पाती बेटी का घर
बहुत सारी मांओं ने अपनी बेटी का घर नहीं देखा होगा। अपनी लाडली का ससुराल कैसा है बहुत मांओं ने नहीं देखा है। बेटी का नहीं खाते हैं, इस बेहूदा सामाजिक वर्जना के अलावा कई अन्य कारण भी रहे होंगे जिनके कारण मांओं ने अपनी ब्याहता बेटियों का घर नहीं देखा होगा।
बिमला देवी से मिलते ही अपने गांव की तमाम मांओं का चेहरा सामने घूम गया। गांव में अपने घर की छत पर खड़ी होकर मैंने कई मांओं को दूर से आती बेटी की बैलगाड़ी, टांगा और अब कार या बस को निहारते देखा है। तब समझ नहीं पाता था कि ये आज क्यों रास्ता देख रही हैं। बिमला देवी से मिलने के बाद पता चला कि मांएं अपने बेटियों का हर दिन रास्ता देखती हैं।
मलेशिया एयरलाइंस की सीट नंबर १४ के बगल में बिमला देवी। १९३४ की पैदाइश। दस्तखत करना जानती थीं। मिलते ही कहा मदद कर देना बेटा। हां कहने के बाद किताब पढ़ने लगा। बिमला देवी खुद से बोलने लगीं। पहली बार बेटी का घर देखा है।
मेरी बेटी बहुत अमीर है। सोलह साल हो गए शादी के। लगता था कि किस घर में ब्याही है। ठीक है या नहीं। अब सकून हो गया है। सब ठीक है। सारी मौज है। सिर्फ बच्चा नहीं हुआ है। शादी के अगले ही दिन मेरी बेटी मलेशिया चली गई। वही आती जाती रही। शादी के बाद बेटी और उसका सूटकेस ही दिखाई दिया। घर नहीं देखा था। अब देख लिया है।
सुनते ही मैं सन्न रह गया। १६ साल तक इस मां ने बेटी के घर की क्या कल्पना की होगी? क्या सोचती होगी कि मेरी बेटी का घर कैसा है? फिर ख्याल आया कि बिमला देवी अकेली नहीं हैं। मेरी मां ने भी अपनी बेटियों का घर नहीं देखा। बड़ी दीदी की शादी के बाद वो कभी गाज़िपुर नहीं जा सकीं। पता नहीं किसी ने बुलाया या नहीं। बेटियों का वही घर देखा जहां उनके पति काम करते हैं। पुश्तैनी घर नहीं देख पाई। मेरी चाचियों ने तो इतना भी नहीं देखा।
इसे हम बाप या पुरुष कम समझेंगे। मांओं का बड़ा गहरा रिश्ता होता है बेटियों से। हर मां के भीतर एक बेटी होती है। जो अपना घर छोड़ कर आई होती है। शादी होते ही उसका घर मायका कहलाने लगता है। पता नहीं अपने पुरानी घर की यादों के बीच कैसे कोई लड़की, कोई मां और कोई बेटी नए और अनजाने घर को सजाने में लग जाती है। अपना बनाने में लग जाती है।
इन सब सवालों के जवाब ढूंढने का वक्त किसके पास है। सामाजिक संरचना में विकल्पों के लिए जगह कम होते हैं। बिमला देवी एयर होस्टेस को देख कर कहने लगी..बिचारी इसकी मां कितनी फिकर करती होगी। बिल्कुल बारात में जैसे स्वागत करते हैं, हंस हंस के खिलाते हैं, वैसे ये हम सब की खातिरदारी कर रही है।बिमला देवी को लगा कि यह मेरी ही बेटी है। रोकते रोकते उस खूबसूरत एयर होस्टेस को कह दिया कि बेटी तुम भी आराम कर लो। कुछ खा लो। केवल हमारा ही ख्याल कर रही हो। एयर होस्टेस की उस मुस्कान में अचानक अपनापन दिखा। वर्ना मुस्कुराना तो उनका काम ही है।
बिमला देवी से मिलते ही अपने गांव की तमाम मांओं का चेहरा सामने घूम गया। गांव में अपने घर की छत पर खड़ी होकर मैंने कई मांओं को दूर से आती बेटी की बैलगाड़ी, टांगा और अब कार या बस को निहारते देखा है। तब समझ नहीं पाता था कि ये आज क्यों रास्ता देख रही हैं। बिमला देवी से मिलने के बाद पता चला कि मांएं अपने बेटियों का हर दिन रास्ता देखती हैं।
मलेशिया एयरलाइंस की सीट नंबर १४ के बगल में बिमला देवी। १९३४ की पैदाइश। दस्तखत करना जानती थीं। मिलते ही कहा मदद कर देना बेटा। हां कहने के बाद किताब पढ़ने लगा। बिमला देवी खुद से बोलने लगीं। पहली बार बेटी का घर देखा है।
मेरी बेटी बहुत अमीर है। सोलह साल हो गए शादी के। लगता था कि किस घर में ब्याही है। ठीक है या नहीं। अब सकून हो गया है। सब ठीक है। सारी मौज है। सिर्फ बच्चा नहीं हुआ है। शादी के अगले ही दिन मेरी बेटी मलेशिया चली गई। वही आती जाती रही। शादी के बाद बेटी और उसका सूटकेस ही दिखाई दिया। घर नहीं देखा था। अब देख लिया है।
सुनते ही मैं सन्न रह गया। १६ साल तक इस मां ने बेटी के घर की क्या कल्पना की होगी? क्या सोचती होगी कि मेरी बेटी का घर कैसा है? फिर ख्याल आया कि बिमला देवी अकेली नहीं हैं। मेरी मां ने भी अपनी बेटियों का घर नहीं देखा। बड़ी दीदी की शादी के बाद वो कभी गाज़िपुर नहीं जा सकीं। पता नहीं किसी ने बुलाया या नहीं। बेटियों का वही घर देखा जहां उनके पति काम करते हैं। पुश्तैनी घर नहीं देख पाई। मेरी चाचियों ने तो इतना भी नहीं देखा।
इसे हम बाप या पुरुष कम समझेंगे। मांओं का बड़ा गहरा रिश्ता होता है बेटियों से। हर मां के भीतर एक बेटी होती है। जो अपना घर छोड़ कर आई होती है। शादी होते ही उसका घर मायका कहलाने लगता है। पता नहीं अपने पुरानी घर की यादों के बीच कैसे कोई लड़की, कोई मां और कोई बेटी नए और अनजाने घर को सजाने में लग जाती है। अपना बनाने में लग जाती है।
इन सब सवालों के जवाब ढूंढने का वक्त किसके पास है। सामाजिक संरचना में विकल्पों के लिए जगह कम होते हैं। बिमला देवी एयर होस्टेस को देख कर कहने लगी..बिचारी इसकी मां कितनी फिकर करती होगी। बिल्कुल बारात में जैसे स्वागत करते हैं, हंस हंस के खिलाते हैं, वैसे ये हम सब की खातिरदारी कर रही है।बिमला देवी को लगा कि यह मेरी ही बेटी है। रोकते रोकते उस खूबसूरत एयर होस्टेस को कह दिया कि बेटी तुम भी आराम कर लो। कुछ खा लो। केवल हमारा ही ख्याल कर रही हो। एयर होस्टेस की उस मुस्कान में अचानक अपनापन दिखा। वर्ना मुस्कुराना तो उनका काम ही है।
सर्दी के साथ क्यों आती है
हिमालय से उतर कर आती हवाओं में
पुरानी बातों का जैसे कोई बिस्तर बिछा हो
किसी बर्फ सी जमी परतों के भीतर
जैसे पुरानी यादें धीरे धीरे पिघल रही हों
बढ़ने लगता है अकेलापन सर्दी के आते ही
जैसे गरम होने लगता है कोई चादरों में लिपट कर
कभी बाबूजी का मफलर लपेटना
कभी उनकी खनकती आवाज़ का डर
शाम को घर लौटने से पहले आमलेट खाना
घर के बंद होते दरवाज़ें,खिड़कियां
बाहर से आने वाली हवाओं को रोक कर
अंदर बची हवाओं से टकराती नई हवायें
बहुत तेजी से उठती हैं भीतर कोई हूक
पुरानी बातें याद आने लगती है
बहुत बाद में पता चलता है
सर्दी आ गई है,यादों को लेकर
पुरानी बातों का जैसे कोई बिस्तर बिछा हो
किसी बर्फ सी जमी परतों के भीतर
जैसे पुरानी यादें धीरे धीरे पिघल रही हों
बढ़ने लगता है अकेलापन सर्दी के आते ही
जैसे गरम होने लगता है कोई चादरों में लिपट कर
कभी बाबूजी का मफलर लपेटना
कभी उनकी खनकती आवाज़ का डर
शाम को घर लौटने से पहले आमलेट खाना
घर के बंद होते दरवाज़ें,खिड़कियां
बाहर से आने वाली हवाओं को रोक कर
अंदर बची हवाओं से टकराती नई हवायें
बहुत तेजी से उठती हैं भीतर कोई हूक
पुरानी बातें याद आने लगती है
बहुत बाद में पता चलता है
सर्दी आ गई है,यादों को लेकर
सिटी ऑफ सीमेंट
क्वालालंपुर से लौटा हूं।सीमेंट और स्टील की जोड़ी ने हवाई अड्डे को किसी शापिंग मॉल का चमकदार बाथरूम जैसा बना दिया है। हर चीज़ चमकती हुई। स्टील के खंभे और लकड़ी जैसी किसी चीज़ की छत। एयरपोर्ट से लेकर शहर की हर सार्वजनिक इमारतों से लगभग सीढ़ियों को ग़ायब कर दिया गया है। एस्कलेटर। भारत के माल में भी एस्कलेटर पुराना हो चुका है। मगर हम भूल गए हैं कि इस एस्कलेटर ने पेट पर बल महसूस करते हुए ऊपर चढ़ने का अनुभव खत्म कर दिया है। बल्कि समतल सतह पर भी एस्कलेटर की पट्टियां दौड़ती हैं। जो अनावश्यक विस्तार लिये एयरपोर्ट में एक काउंटर से दूसरे काउंटर के बीच की दूरी को तय करने में मदद करती हैं।
एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही स्टील पीछे छूटता है और सीमेंट दिखने लगता है। हर सड़क एक दूसरे के ऊपर से गुज़र रही है। दो सड़कों के बीच से रेल गुज़र रही है। रेल के ऊपर से कार और कार के ऊपर से मोनो रेल। हर कोई गुज़र रहा है। सीमेंट की मौजूदगी से आंखें पथरीली होने लगती हैं। बस और रेल को रंग कर बच्चों के खिलौने जैसा बना दिया गया है। हर कुछ रंगीन। क्वालालंपुर के पास पुराना कुछ नहीं बचा है। सब सीमेंट का बना है। पहली नज़र में लगा कि यहां के कमीशनखोर भारत के घूसखोरों से ईमानदार हैं। मगर अख़बारों से पता चल गया कि भ्रष्टाचार मलेशिया के लिए नया नहीं है।
शहर ने सैलानियों को बुलाने के लिए हर पुरानी इमारत को तोड़ दिया है। इन्हीं सब के बीच एक इमारत पर नज़र गई। १९०४ की बनी हुई एक इमारत। लिखा था विवेकानंद आश्रम। हवाई यात्राओं के पहले के दौर में कौन गया होगा विवेकानंद का नाम लेकर। सोचता रहा। अचानक ध्यान गया कि यह इमारत कैसे बची रह गई। किसने बचा लिया इसे। इसे भी तो तोड़ कर सौ मंज़िल की इमारत बन सकती थी।
दस दस मंज़िल की इमारत में मॉल है। मॉल को मेट्रो और मोनो रेल के स्टेशन से जोड़ दिया है। मोनो रेल से उतर कर सीधे माल में। बाज़ार का नामो निशान मिटा दिया गया है। हाट के अवशेष गायब हैं। क्वालालंपुर उन सैलानियों का शहर है जो सीमेंट का कमाल देखना चाहते हैं। देखना चाहते हैं कि कोई शहर बिना ऐतिहासिक इमारतों के भी लोगों को बुला सकता है। शहर बच्चों का खिलौना घर है और आदमी सीमेंट कृतियों को देखने के लिए बौराया हुआ लगता है।
लेकिन आंखों का किसी ने नहीं सोचा। कितने दिन तक ईंट पत्थर की ये इमारतें आकर्षित कर सकती हैं। वैसे भी जब से दिल्ली में मॉल, फ्लाई ओवर और मेट्रो देखा है विदेश जाने का आकर्षण खत्म हो गया है। पहले सुन कर उत्सुकता होती थी कि कोई विदेश गया है। वहां की कई चीज़ें यहां नहीं होती थीं। अब तो यहां वहां में कोई फर्क नहीं है। इसलिए विदेश यात्रा का कस्बाई रोमांच अब खत्म हो चुका है। सीमेंट और स्टील से बने इस शहर में आपका स्वागत है। इससे पहले कि आप यहां की नगर योजनाओं के कायल हो जाएं, बता दूं कि तमाम स्तरों और प्रकारों के फ्लाई ओवर और मोनो रेल के बाद भी सड़क पर कारें सरकती हैं। क्वालालंपुर सीमेंटनुमा नगर योजनाओं की नाकामी का शहर है। फिर भी अगर आप बिल्डर हैं तो यह आपकी पसंद का शहर हो सकता है। आते जाते रहियेगा। मुझे मत कहियेगा दुबारा जाने के लिए।
एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही स्टील पीछे छूटता है और सीमेंट दिखने लगता है। हर सड़क एक दूसरे के ऊपर से गुज़र रही है। दो सड़कों के बीच से रेल गुज़र रही है। रेल के ऊपर से कार और कार के ऊपर से मोनो रेल। हर कोई गुज़र रहा है। सीमेंट की मौजूदगी से आंखें पथरीली होने लगती हैं। बस और रेल को रंग कर बच्चों के खिलौने जैसा बना दिया गया है। हर कुछ रंगीन। क्वालालंपुर के पास पुराना कुछ नहीं बचा है। सब सीमेंट का बना है। पहली नज़र में लगा कि यहां के कमीशनखोर भारत के घूसखोरों से ईमानदार हैं। मगर अख़बारों से पता चल गया कि भ्रष्टाचार मलेशिया के लिए नया नहीं है।
शहर ने सैलानियों को बुलाने के लिए हर पुरानी इमारत को तोड़ दिया है। इन्हीं सब के बीच एक इमारत पर नज़र गई। १९०४ की बनी हुई एक इमारत। लिखा था विवेकानंद आश्रम। हवाई यात्राओं के पहले के दौर में कौन गया होगा विवेकानंद का नाम लेकर। सोचता रहा। अचानक ध्यान गया कि यह इमारत कैसे बची रह गई। किसने बचा लिया इसे। इसे भी तो तोड़ कर सौ मंज़िल की इमारत बन सकती थी।
दस दस मंज़िल की इमारत में मॉल है। मॉल को मेट्रो और मोनो रेल के स्टेशन से जोड़ दिया है। मोनो रेल से उतर कर सीधे माल में। बाज़ार का नामो निशान मिटा दिया गया है। हाट के अवशेष गायब हैं। क्वालालंपुर उन सैलानियों का शहर है जो सीमेंट का कमाल देखना चाहते हैं। देखना चाहते हैं कि कोई शहर बिना ऐतिहासिक इमारतों के भी लोगों को बुला सकता है। शहर बच्चों का खिलौना घर है और आदमी सीमेंट कृतियों को देखने के लिए बौराया हुआ लगता है।
लेकिन आंखों का किसी ने नहीं सोचा। कितने दिन तक ईंट पत्थर की ये इमारतें आकर्षित कर सकती हैं। वैसे भी जब से दिल्ली में मॉल, फ्लाई ओवर और मेट्रो देखा है विदेश जाने का आकर्षण खत्म हो गया है। पहले सुन कर उत्सुकता होती थी कि कोई विदेश गया है। वहां की कई चीज़ें यहां नहीं होती थीं। अब तो यहां वहां में कोई फर्क नहीं है। इसलिए विदेश यात्रा का कस्बाई रोमांच अब खत्म हो चुका है। सीमेंट और स्टील से बने इस शहर में आपका स्वागत है। इससे पहले कि आप यहां की नगर योजनाओं के कायल हो जाएं, बता दूं कि तमाम स्तरों और प्रकारों के फ्लाई ओवर और मोनो रेल के बाद भी सड़क पर कारें सरकती हैं। क्वालालंपुर सीमेंटनुमा नगर योजनाओं की नाकामी का शहर है। फिर भी अगर आप बिल्डर हैं तो यह आपकी पसंद का शहर हो सकता है। आते जाते रहियेगा। मुझे मत कहियेगा दुबारा जाने के लिए।
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