पर्यावरण नारीवाद

बहुत गप्प कर लिए । सोचा लिखने की आदत का कुछ अच्छा इस्तमाल करुं । दिशा दे दूं । लेखन को दिशा । मैं जानबूझ कर दिशा देना चाहता हूं । दिशा न दिया तो लिखा क्या । खैर पर्यावरण पर अब हिंदी में भी काम हो रहा है । अच्छी बात है । क्योंकि धरती धंसेगी तो हिंदी वाले भी मरेंगे । इसलिए इस विषय पर कहीं कहीं से टिप कर अनुवाद करता रहूंगा । मुझे मौलिक लेखों से सख्त घृणा है । इसलिए मैं अंग्रेजी से अनुवाद करूंगा । इससे हिंदी में मौलिक काम करने की सोचने वाले की एनर्जी बच जाएगी । बहरहाल अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बीना अग्रवाल का लेख अनुवाद कर रहा हूं । पूरा नहीं हुआ है । क्रमों में जारी रहेगा । यह लेख महेश रंगराजन संपादित किताब से लिया गया है । लौंगमैंन ने छापा है । नाम है एनवायरमेंटल इश्यू इन इंडिया ए रीडर । ज़रा एक नज़र डाल लीजिए । उस धरती की खैर मनाइये जिसे हम मां कहते हैं । बकवास ।

महिलाओं का पर्यावरण से क्या संबंध हो सकता है ? क्या यह संबंध पुरुषों से अलग होता है ? यूरोप में बढ़ते पर्यावरण नारीवाद खासकर अमरीका में इस पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है । विकासशील देशों में अस्तित्व के लिए हो रहे संघर्षों से महिला और पर्यावरण के संबंध का भौतिक आधार तो मिलता है और एक पर्यावरण नारीवाद के लिए वैकल्पिक पृष्ठभूमि भी । मैं इसे नारीवादी पर्यावरणवाद कहती हूं ।

इस लेख में मेरा यह तर्क है कि ग्रामीण भारत की औरतें पर्यावरण में हो रहे क्षरण के कारण परेशानियों का सामना कर रही हैं । यह परेशानिया खासतौर से लिंग आधारित हैं । दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण और पुनर्उत्पाद से जुड़े आंदोलनों में महिलाओं की खूब सक्रिय भागीदारी देखने को मिलती है । इसे देखकर हमें पर्यावरण के मुद्दों को अलग से देखने का मौका मिलता है । इस चर्चा को धारणा के स्तर पर ले जाने के लिए और यह देखने के लिए पर्यावरण के मामले में औरत को कितना भुगतना पड़ता है और वो खुद इसके नुकसान में कितना भागीदार है । मैं भारत के संदर्भों में ही इसे देखने की कोशिश करुंगी । यह मुद्दा तीसरी दुनिया के अन्य देशों के लिए भी प्रासंगिक है । मैंने इस चर्चा को पांच भागों में बांटा है । पहले हिस्से में अमरीका में चल रहे पर्यावरण नारीवाद को लेकर हो रही बहस पर चर्चा होगी और इसका भारतीय दर्शन क्या है और यह भी देखेंगे कि वैकल्पिक धारणा क्या है ।
बाकी तीन सेक्शन में हम ग्रामीण भारत में पर्यावरण के क्षरण के कारणों और प्रकृति का पता लगायेंगे । देखेंगे कि इसके वर्ग और लिंग चरित्र क्या हैं । और इस मामले में ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और सरकार का क्या रवैया रहता है । आखिर के सेक्शन में बहस होगी कि विकास का वैकल्पिक रुपांतरकारी नज़रिया क्या है ।



कुछ अवधारणात्मक मुद्दे


पर्यावरण नारीवाद


पर्यावरण नारीवाद में विमर्शों की कई धारायें आकर मिलती हैं । इनमें से कई विमर्श ऐसे हैं जिन्हें अभी ठीक तरह से समझा जाना बाकी है । साफ है पश्चिमी नारीवादी आंदोलनों में इसे लेकर अलग अलग नज़रिया अपनाया जाता रहा है । इसीलिए एक धारणा के रुप में पर्यावरण नारीवाद का अभी पूर्ण विकास नहीं हुआ है बल्कि हो रहा है । हां लेकिन इससे हम मुहं भी नहीं मोड़ सकते । मेरा उद्देश्य यह नहीं कि मैं पर्यावरण नारीवाद के विमर्श की बारीक आलोचना पेश करुं बल्कि मैं यह चाहती हूं कि इसके कुछ महत्वपूर्ण लक्ष्णों पर ध्यान दिया जाए और यह भी देखा जाए कि जेंडर और पर्यावरण पर तीसरी दुनिया के नज़रिये में इसे क्यों और कैसे शामिल किया जा सकता है । पूरे विमर्श की कई धाराओं से हम पर्यावरण नारीवाद के तर्कों के बारे मोटी तस्वीर कुछ ऐसे देख सकते हैं । (क) प्रकृति पर प्रभुत्व और शोषण के बीच महत्वपूर्ण संबंध है । (ख) सरसरी तौर पर औरतों को पर्यावरण के करीब और मर्द को संस्कृति के करीब माना गया है । प्रकृति को संस्कृति से कमतर देखा गया है । इसीलिए औरतों को मर्दों से कमतर माना गया है । (ग) क्योंकि औरतों और प्रकृति का प्रभुत्व साथ साथ आया है इसलिए प्रकृति के खत्म होते प्रभुत्व में औरतों का खास स्टेक है । (घ) पर्यावरण और नारीवादी आंदोलन दोनों समानतावाद की वकालत करते हैं जिसमें कोई बड़ा या छोटा नहीं है । लिहाज़ा दोनों की मंज़िल एक है इसलिए ज़रुरत है कि दोनों साथ मिलकर एक समान परिप्रेक्ष्य, थ्योरी और आचरण का विकास करें ।
इसीलिए पर्यावरण नारीवाद के तर्क में औरतों और प्रकृति के प्रभुत्व के बीच के संबंध को वैचारिक स्तर पर देखा जाता है । यह आप सभी तरह के विचारों, मूल्यों मान्यताओं में पाएंगे कि औरतों और गैर मानवीय जगत को मर्दों से कमतर माना गया है । यह मांग करता है कि औरत और मर्द अपने बारे में फिर से विचार करें । यह पुनर्मूल्यांकन ऐसे संदर्भ में हो जिसमें बराबरी की बात हो ।
फिर शायद हम पूछ सकते हैं- प्रकृति और औरतों के बीच के संबंधों की जड़ कहां है ? शेरी ओर्टनर ने समकालीन नारीवादी दृष्टिकोण में इस बात को शामिल किया है कि औरतें मर्दों से ज़्यादा प्रकृति के करीब हैं ।

शेरी के शुरुआती तर्कों में औरत और प्रकृति के संबंधों की जड़ पुनर्उत्पादन की जैविक प्रक्रियाओं में है । लेकिन तब भी ओर्टनर ने यह बात मानी थी कि मर्दों की तरह औरतें भी प्रकृति और संस्कृति में हिस्सा लेती हैं । मध्यस्थता करती हैं ।
तब से ओर्टनर ने अपना नज़रिया थोड़ा बदला भी है जिसकी अन्य ने आलोचना की है । खासकर सामाजिक नृतत्वादी लोगों ने आलोचना की है । क्योंकि प्रकृति और संस्कृति में अंतर सार्वभौम नहीं है । सभी संस्कृतियों में यह बात लागू नहीं होती । न हीं औरत, मर्द, संस्कृति और प्रकृति के मायनों में कोई सार्वभौम समानता है । फिर भी कुछ पर्यावरण नारीवादी जैविक धारणा को मानते हैं और अलग अलग तरह से दोहराते रहते हैं । एरियल के सल्लेह तो इस धारणा को एक और छोर पर ले जाती हैं । उनका कहना है कि -
औरतों का माहवारी चक्र, गर्भ की पीड़ा, मां बनना, बच्चे को पालने का आनंद..ये वो चीजें हैं जो औरतों की चेतना को प्रकृति से जुड़े ज्ञान के करीब ले आती हैं । हो सकता है कि औरतें इसके बारे सचेत न हों मगर यह जीवन का एक सत्य है ।
येनेस्ट्रा किंग और कारोलिन मर्चेंट का तर्क है कि प्रकृति और संस्कृति का अंतर ग़लत है । यह सब एक तरह पितृसत्तात्मक विचारधारा की देन है जो एक समय में लिंग आधारित प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए इस्तमाल हो रहा था ।लेकिन दोनों यह भी मानते हैं कि औरतों को उनकी बायॉलजी के कारण वैचारिक रुप से प्रकृति के करीब माना गया है ।

मर्चेंट अपने ऐतिहासिक विश्लेषण में दिखाते हैं कि पूर्व आधुनिक यूरोप में औरत और प्रकृति के संबंधों की धारणा दो तरह की छवियों पर आधारित है। एक छवि है प्रकृति को नष्ट होने से रोकने की और दूसरी नष्ट होने देने की । दोनों में प्रकृति को औरतों से जोड़ा गया है । पहली छवि, जो काफी प्रभावशाली थी, में धरती को मां माना गया और फिर संस्कृतियों में यह भी जुड़ता गया कि इस धरती मां के साथ क्या और कैसा बर्ताव किया जाए । कोई मां का शोषण नहीं करता । उसकी हत्या नहीं करता । इसके उलट छवि थी कि प्रकृति हिंसक है, आंधी तूफान, सूखा और अराजकता लाती है । फिर संस्कृतियों में यह शामिल हो गया कि प्रकृति पर काबू पाना चाहिए । इस पर इंसान का प्रभुत्व होना चाहिए।...अनुवाद अभी जारी है ।

आय से अधिक संपत्ति प्रदेश

क्या आपके पास आय से अधिक संपत्ति है ? नहीं है । किया क्या ? आय न संपत्ति । कहीं आप ग़रीबी रेखा से नीचे तो नहीं रह गए । ग़रीबों के लिए लड़े ही होते तो आज आय से अधिक संपत्ति होती । मौका गंवा दिया । भला हो साज़िश का जिनके तहत मुलायम मायावती की संपत्ति का पता चला है । अच्छी बात है । उत्तर प्रदेश में कोई आय के एक ही स्त्रोत तो नहीं हैं न । आदमी कहीं से कमाये । बस ये ध्यान रखे कि आय से अधिक न हो । अब आय कितनी हो । ये किसने कहा है कि आय वही है जो वेतन है । जो घोषित है । ग़लत । सरकार चाहती है कि हम सब बतायें । अपने मां बाप को आप सब बता देते हैं ? सरकार कौन है ? आय के कई स्त्रोत हो सकते हैं । ग़रीब आदमी भी हेराफेरी कर सकता है । रिश्वत पर ग़रीब परिवारों से आए नेताओं का भी अधिकार है । क्या सिर्फ राजपरिवारों से आए नेता ही रिश्वत लेंगे । ताकि वो कितने अमीर हुए पता न चले । ग़रीब नेताओं की आय से अधिक संपत्ति से कई बातें सामने आ जाती हैं। जब यह फटीचर इतना कमा सकता है तो रजवाड़ें के बचे खुचे यानी पूर्व महाराजा के पास कितना जमा हो गया होगा । आय से अधिक संपत्ति का होना देश में ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करेगा । क्योंकि राजनीति से सिर्फ ग़रीबो की ग़रीबी दूर नहीं होती । अपनी भी होती है । राजनीति घाटे का सौदा नहीं है । राजनीति में सेवा से कम से कम एक दो की ग़रीबी तो दूर हो ही जाती है ।

उत्तर प्रदेश में साज़िश हो रही है । मुलायम और मायावती ही क्यों पकड़े जा रहे हैं ? बिल्कुल ठीक । क्या औऱ किसी नेताओं के पास आय से अधिक संपत्ति नहीं है ? सुप्रीम कोर्ट ने सबकी जांच क्यों नहीं करवाई ? क्या बाकी नेताओं के पास आय से कम संपत्ति है ? बुरा हो इस साज़िश का जिसका दायरा सिर्फ दो नेताओं तक सीमित है । हम ऐसी सीमित साज़िश का विरोध करते हैं । हम मुलायम मायावती का समर्थन करते हैं । उनके पास आय से अधिक संपत्ति होनी ही चाहिए । आय के भरोसे रहे तो दिन का खाना भी न खा सकें । आय होती ही कितनी है ? कभी न बढ़ने वाले वेतन से संपत्ति बनेगी क्या ? बेवकूफ समझते हैं । मौलिक अधिकार होना चाहिए कि आप आय से अधिक संपत्ति जमा करें । वर्ना बचेगा क्या ? अधिक होगा तभी तो ।

उत्तर प्रदेश को औपचारिक रुप से आय से अधिक संपत्ति प्रदेश का नाम दे देना चाहिए । जिनके पास अधिक होगा उन्हीं के पास तो आय होगा । वर्ना कैसे होगी आय से अधिक संपत्ति । संपत्ति की पाठशाला होनी चाहिए । यही तो कारोबार है आय को दुगना करना । मुलायम मायावती करें तो क्या गुनाह । कारोबार ही तो है । हम साज़िश का विरोध करते हैं । रिश्वत साज़िश नहीं । सच है । सरकार है । संभावना है । आय से अधिक संपत्ति का ।

अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन प्रबंधन संस्थान

इन दिनों प्रदर्शनों का स्तर गिर गया है। कारण कई हैं । मैं और क्रांति संभव इससे खासे नाराज़ हैं । क्रांति संभव ऑटोमोबिल जगत से जुड़ी जानकारियां अपने कार्यक्रम रफ्तार में देते हैं। उनकी दुनिया में प्रदर्शन तो होता है मगर विरोध प्रदर्शन नहीं । मगर वो चाहते हैं कि विरोध प्रदर्शन या तो स्थगित कर दिये जाएं या फिर इनका तरीका बदले। हमारे पास कुछ सुझाव है । आप लोगों का आइडिया भी चलेगा ।

पहली समस्या- हर मुद्दे पर बार बार एक ही जगह पर जाकर नारेबाज़ी न करें । मसलन जंतर मंतर, पटना में हड़ताली चौक, विधानसभा आदि आदि । एक ही जगह पर बार बार मटकी फोड़ने से मीडिया की दिलचस्पी कम हो जाती है । रोज़ का नाटक समझ लिया जाता है ।

तो क्या करें
हमारा सुझाव- मुद्दों के हिसाब से जगह का चुनाव होना चाहिए । महंगाई का विरोध जंतर मंतर पर क्यों ? कौन सुन रहा है ? इसलिए आप ग्रेटर कैलाश के एम ब्लाक मार्केट में प्रदर्शन करें जिन्हें महंगाई से फर्क नहीं पड़ता । यहां आप इसलिए हैं कि ताकि अमीरों को अहसास दिला सकें कि बेचारे ग़रीबों के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा । सरकार चुप रहेगी तो महंगाई से गरीब हुए लोग आपसे ही भीख मांगेंगे। प्रति व्यक्ति भीख देयता बढ़ जाएगी । एम ब्लाक मार्केट के अलावा आप किसी शादी के पंडाल में महंगाई विरोधी मोर्चा लेकर जा सकते हैं । ऐसी शादी में जहां विधायक, मंत्री आमंत्रित हों । इससे मेहमानों के बीच मंत्री का अपमान होगा । और आपका ज्ञापन स्वीकार करेगा ।
उसी तरह से महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर फिर जंतर मंतर क्यों । जंतर मंतर का महिला विकास से क्या लेना देना । आइडिया ये है कि महिलाएं जानें । तो आप महिला कालेज जाएं । कालेज के गेट पर गले फाड़ फाड़ कर चिल्लायें । देखों तुम्हारा ही मुद्दा है । और लड़ हम रहे हैं । जागो ।
नोट- इससे नेता परेशान होगा । अगर आप खुद वोटर के बीच जाएंगे तो मीडिया भी आएगा और नेता भी । अगर आप जंतर मंतर जाएंगे तो वोटर को पता भी नहीं चलेगा और मीडिया नेता तो दूर ही रहेंगे ।

विरोध प्रदर्शन का समय

ये बहुत इंपोर्टेंट मसला है । हर विरोध प्रदर्शन बारह से तीन बजे यानी लंच आवर के बीच ही क्यों होता है ? यह एक गलत परंपरा है । विरोध का फिक्स टाइम नहीं होना चाहिए । आप किसी दिन रेल भवन के सामने दिन के दस बजे विरोध करके देखिये । हंगामा मच जाएगा । कि ये सुबह सुबह क्यों आ गए । किसने बुलाया है इनको । जल्दी से इनका ज्ञापन ले लो औऱ टाटा करो। मंत्री जी आने वाले हैं । मीडिया को भी लगेगा कि इतनी सुबह विरोध कर रहे हैं ज़रुर कोई बात है। क्लिक करो औऱ शाट लो । कुछ प्रदर्शन शाम के वक्त भी हो सकते हैं । दिल्ली के आश्रम चौक पर सात से आठ के बीच जाम में फंसे लोग अपनी कारों में बोर हो रहे होते हैं तो वहां नारे लगने चाहिए । हर गुज़रता हुआ निराश नागरिक आपके नारे से सहानुभूति जताएगा । आपके नारे सुनेगा । घर जाकर पत्नी को बताएगा । इससे आपके विरोध का प्रसार ज़्यादा होगा ।

नोट- इसमें मीडिया की दिलचस्पी होगी । उन्हें लगेगा कि ज़रुर इसमें कोई स्टोरी है। इसलिए कवर करेंगे । मेट्रो आजतक, दिल्ली आजतक, मेट्रो दिल्ली में दिखाया जाएगा ।

नारे हैं नारों का क्या

हाय हाय, मुर्दाबाद, नहीं चलेगी नहीं चलेगी, वापस जाआ वापस जाओ। ये सब बोरिंग और कान फाड़ू नारे हैं। इनमें नया नहीं है। मसलन महंगाई पर आप क्या नारे लगा सकते हैं।
यूपीए सरकार मुर्दाबाद की जगह ये बोल कर देखिये
सोनिया जी तुम दाम बढ़ाओ हम तुम्हारे साथ हैं
मनमोहन जी तुम टैक्स बढ़ाओ हम तुम्हारे साथ हैं

इससे उनको पता नहीं चलेगा कि आप कांग्रेस के हैं या बीजेपी के और मीडिया को स्टोरी मिलेगी

पुतला फूंको नहीं बना दो
पुआल के बने पुतले एक होते हैं। मनमोहन से लेकर आडवानी तक के पुतले । इन्हें फूंक कर आप कोई बड़ा काम नहीं करते । बल्कि अगर आप फूंकने की बजाए इनका एक पुतला बनवाकर लगवा दें तो प्रोब्लम होने लगेगी । लोग कहेंगे भई ये आइडिया है। पुतले के नीचे लिख दीजिए । ये पुतला फलां मुद्दे पर विरोध करते हुए लगाया गया है। जिसका पुतला है उसे विरोध से फर्क नहीं पड़ता । हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी याद रखे कि फलां नेता जी को इन मुद्दों पर हुए विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता था। इसलिए उनका पुतला लगा कर स्थायी कर दिया गया है।

वैसे हमारी कंपनी ने एक पार्क में सभी दलों के अध्यक्षों का पुतला लगाया है। आप चाहें तो सौ रुपये की फीस देकर पुतले को चप्पलों की माला पहना कर विरोध कर सकते हैं । चप्पल मारने की फीस तीन सौ रुपये होगी । नारे बाज़ी की फीस ४०० रुपये । यहां पर आप मनमोहन का विरोध करने के साथ आडवानी का स्वागत कर सकते हैं । ऐसा करेंगे तो मनमोहन को लगेगा कि वोटर हाथ का हाथ शिफ्ट हो रहा है। तो परेशान होंगे । पहले मनमोहन के पुतले के सामने नारे लगाइये। फिर आडवानी के पुतले के पास जाइये कहिये अब आपका ही आसरा है । हमनें पिछली बार आपको चप्पलों की माला पहनाकर अच्छा नहीं किया था । हम फूलों का माला पहना रहे हैं । बस कैमरे क्लिक होने लगेंगे । अगले दिन फोटो फ्रंट पर । मगर इसका डबल चार्ज लगेगा । ६०० रुपये ।

विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग-

ये बहुत ज़रुरी है । गरीबी के मुद्दे पर प्रदर्शन के लिए हम बीपीएल कार्ड वाले लोगों की ही सप्लाई करते हैं। चूंकि वो गरीब होते हैं इसलिए ज़ोर ज़ोर से नारे लगाते हैं । महिलाओं के मुद्दे के लिए हम कालेज की स्मार्ट लड़कियों की टीम भेजते हैं । वो ४०७ में नहीं आतीं । अपनी अपनी बाइक या कार से आएंगी । नारे लगाते वक्त ग्लैमर का भी ज़ोर मीडिया को बुलाएगा । गांव की औरतों को हम महिलाओं के मुद्दे पर नारेबाज़ी के लिए नहीं भेजते ।


इसके अलावा हमारी कंपनी में विरोध प्रदर्शन के और भी नए नए तरकीबें हैं । मगर ब्रोशर में सब कुछ नहीं बताया जा सकता है । इसलिए आपको हमारे अवैतनिक प्रदर्शन प्लानर से मिलकर चर्चा करनी होगी । क्रांति संभव इसके लिए उपयुक्त हैं । प्रदर्शन प्रबंधन के लिए आप मुझसे मिलिये । नारे वारे के लिए आप मोहल्ला वाले अविनाश से मिलें। कंपनी का आईपीओ भी आने वाला है । उसका इंतज़ार कीजिए । किसी भी मुद्दे को लेकर निराश न हों हमसे संपर्क करें हम प्रदर्शन करवा देंगे ।

प्रदर्शन प्रवर्तक
रवीश कुमार
२६, मोर्चा मार्ग,
नई दिल्ली

रिटेलसाहू

खसखस और हींग बेच बेच कर लोदीपुर का राजा बन गया था सेठ हज़ारी साहू । उसकी परचून की दुकान में निरमा साबुन का गत्ता अभी पहुंचा ही था । ब्लैक एंड व्हाईट टीवी पर कल रात ही हज़ारीसाहू ने उस फ्राक वाली लड़की को नाचते देखा था । वही साबुन देख कर धनिये की गंध से भरी दुकान में ताजी हवा कहीं से गुज़र गई । तभी कलंदर केडिया तेल का गत्ता निरमा साबुन के गत्ते के ऊपर लाकर रख देता है । हज़ारी साहू का गुस्सा सातवें आसमान पर । तुमने निरमा गर्ल को नहीं देखा । उस पर तेल रख दिया । साले अठन्नी काट लूंगा ।
कलंदर घबरा गया । हज़ारीसाहू और परचून की दुकान को देखने लगा । चार साल पुराना कृष्ण जी वाला कैलेंडर वहीं था । बांसुरी बजाते हुए कन्हैया । इस दुकान में वक्त कभी कभी कैलेंडर के साथ ही बदलता था । कैलेंडर नहीं बदला मतलब वक्त नहीं बदला । कलंदर को लगा शायद ये साल कैलेंडर बदलने का है ।
गुस्से के बाद हज़ारीसाहू शांत हो गए । रूहआफ़ज़ा की शीशी पर हाथ फेरते हुए ठंढक महसूस करने लगे । पास में चल रही आटा चक्की से उड़ कर आ रही गेंहूं की गंध मोगरे की अगरबत्ती की महक में घुलकर मदहोश कर रही थी । हज़ारी साहू एक सपने में खो गए ।
दुनिया बदल गई है । परचून की दुकान से आटा चक्की गायब है । आटे प्लास्टिक की रंगीन बोरियों में बंद हैं । स्लीवलेस ब्लाउज़ में ललिता जी लाल बैग लिये खड़ी हैं । हंसते हुए बोलती हैं हज़ारी जी डिपार्टमेंटल स्टोर में क्या क्या है । हज़ारीसाहू फ्रीज़र से गर्दन निकालते हुए खड़े होते हैं । कहते हैं क्या नहीं है। जो नहीं है उसका होम डिलिवरी है। बस आर्डर कीजिए हम घर भी आएंगे । तभी ललिता जी के पीछे के रेक से सामानों के बीच आज की नारी को लगे न भारी वाले विज्ञापन की मॉडल सनसिल्क के शैम्पू उठाते दिख गई थी । फोन घनघना रहे थे। पुरानी परचून की दुकान में यह सुख कभी नहीं मिला करता था । आने वाले उधार लेकर जाते थे । बजाज स्कूटर से आते या रिक्शे पर सामान लाद कर ले जाते । औरतें तो कभी कभार ही आतीं थीं । भला हो निरमा साबुन और मैगी टू मिनट्स का। लड़कियां दुकानों पर आने लगी हैं । उनकी बेनूर दुकानदारी में रंग भर आए हैं । मोटे पेट वाले शर्मा, वर्मा जी की ड्यूटी आवर बढ़ गई है । वो अब दुकानों पर नहीं आते। फोन करते हैं । होम डिलिवरी के लिए । ललिता जी ने खुद ही बात कह दी । वक्त कितना बदल गया है । हज़ारी साहू कहते हैं आपके आने के बाद से ही वक्त बदला है । वर्ना हम तो हज़ार रुपये का सामान बेचकर ही हज़ारी हो गए । अपने नए डिपार्टमेंटल स्टोर में इस पुराने नाम से बोर हो गया हूं । ललिता जी कहती हैं हाऊ फनी ।


हज़ारी साहू और ललिता जी के इस संवाद में वक्त बदलता है । इस बार पूरी दुकान रिटेल हो जाती है । बाहर को बोर्ड बदल जाता है । बिग हज़ारी बाज़ार । कई मंजिला दुकान हो जाती है । रूह आफज़ा, हींग, हुर हुर्रे गायब हैं । मैगी, निरमा भी नए सामान नहीं है । अब तो आईएफबी का वाशिंग मशीन है । फर्नीचर है। तौलिया है । नीचे बेसमेंट में राशन का सामान है । फुल्के के बर्तन की जगह बोनचाइना के सस्ते नमूने हैं । ऊपर की मंज़िल में टोपी और बैगी पैंट्स मिलते हैं । खिलौने भी । औरते के लिए साड़ी और लहंगे भी । हज़ारी साहू ने अपना नाम भी पटियाला हाऊस में अर्जी देकर बदलवा लिया है । वो अब रिटेल साहू हो गए हैं । वो अब उधार नहीं देते । बल्कि उनके बहीखाते में उनके नाम हैं जो उन्हें उधार देते हैं । इनका एक कोड वर्ड है । एफडीआई। रिटेल साहू ने अपने बाल रंग लिये हैं । वजन कम करने के बाद वो जवान हो गए हैं । धोती की जगह सूट ने उम्र बढ़ा दी है । कलंदर केडी हो गया है । एसी कमरे में बैठकर सीसीटीवी पर लोगों को देख रहा है । निरमा की फ्राक वाली लड़कियां गार्नियर के शैम्पू में अपने बालों को धोकर लहराते हुए उड़ती चली जा रही हैं । केडी को भी सपने आने लगे हैं । क्रेडिट कार्ड के ज़माने में अठन्नी के काटे जाने का डर नहीं । केडिया तेल की जगह निविया डेओड्रेंट की हल्की महक बिग हज़ारी बाज़ार में दोपहर के वक्त आने वाली महिलाओं को कुछ देर तक दुकान में रुकने के लिए मजबूर करती हैं ।

तभी माइक पर रिटेल साहू की आवाज़ आती है । लेडिज़ एंड जेंटलमैन । इस साल परचून के दुकानदारों का आखिरी साल है । उन्हें बदलते वक्त के साथ बदलना होगा । अपनी यादों को साहित्यकारों के हवाले कर खुद को ज़िंदगी के हवाले करना होगा । रिटेल होना होगा । एक ही छत के नीचे सारा बाज़ार होगा । कई छतों के नीचे बाज़ार नहीं होगा। बेचने वाला एक होगा । अब फिर कोई हज़ारी साहू नहीं होगा । हम उधार देने के लिए पैदा नहीं हुए हैं । इंफ्लेशन बढ़े हमें क्या है । दस साल से वेतन वृद्धि की मांग करने वाले सरकारी कर्मचारियों को हम उधार पर सामान देकर उन्हें ज़िंदा रखने की कोशिश नहीं करेंगे । इससे उल्टा सरकार पर बोझ बढ़ता है । अब किसी की शादी में उधार पर बासमती चावल नहीं देंगे । संजना की शादी में लोगों ने कितना ऐश किया था । हम वो लोग थे जो वेतन मिलने से पहले कस्टमर को उधार दे देते थे । सामान दे देते थे । अब नहीं होगा । हम सूद नहीं डिस्काउंट रेट पर सामान बेचना चाहते हैं । शर्मा जी का नया नाम कंज्यूमर हैं । हमारा मकसद उन्हें फायदा पहुंचाना है । हमें किसी ने खरीद लिया है । ग़लत । सिर्फ चेन में बांधा है । रिटेल चेन में । हम अब सामानों को कतारों में सजाते हैं । निरमा साबुन के ऊपर केडिया तेल नहीं रखते हैं । परचून की दुकान पर बनने वाले चेन तोड़ दिए गए हैं । हम घरेलु समस्याओं के निदान के केंद्र नहीं बल्कि घर के कामकाज से बोर हो चुकी महिलाओं और कालेज से भागे लड़के लड़कियों के मनोरंजन केंद्र हैं । सामान भी बेचते हैं । किसी को कोई कंफ्यूजन हो तो वो मेरे मैनेजर केडी से मिल सकता है ।

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने संसद में घोषणा कर दी है। वालमार्ट आएगा । हज़ारी साहू जाएगा। परचून की दुकानों में लगे लकड़ी के दरवाज़े वालमार्ट के गोदामें में नहीं बल्कि कूड़ेदान में फेंक दिये जाएंगे । संपादक अखबार में लिख रहा है । रिटेल इज़ फ्यूचर ऑफ इंडिया । क्रिटिकल होकर भी लिखता है । इट्स सैड दैट देअर विल बी नो हज़ारी साहू । वामदलों का विरोध वाला प्रेस विज्ञप्ति से सबएडीटर विविध कालम में एक खबर डाल रहा है । इससे लाखों लोगों को वेतन मिलने से पहले मिलने वाले सामानों की सुविधा बंद हो जाएगी । बेरोजगारी बढ़ेगी । शट अप । रिटेल साहू अखबार पढ़ कर कहता है । हू केयर्स ।
कहानी जारी रहेगी । रवीश कुमार

ब्लागमुग्धता

ये आत्ममुग्धता का नया संस्करण है। जब से लिखने लगा हूं लगता है मुक्तिबोध या मोहन राकेश हो गया हूं। पता नहीं कहां से आ रही है यह ब्लागमुग्धता। एक चाहत सी उमड़ रही है कि मेरा लिखा अजर अमर होने वाला है। कहीं कोई आलोचक इनकी समीक्षा कर रहा होगा। किसी विश्वविद्यालय में कोई पीएचडी कर रहा होगा। विषय रवीश कुमार का ब्लागमन। क्या ब्लागमुग्धता से आप भी ग्रसित हो रहे हैं। मनोविज्ञान में इसका निदान अभी नहीं है। होम्योपैथी मे पता किया है। कोई ठीक जवाब नहीं दे रहा है। एक सुबह लगा कि काश अखबार निकलना बंद हो जाए और लोग सुबह उठ कर मेरा ही ब्लाग पढ़े। संसद में मेरे ब्लाग पर चर्चा हो। और चुनाव में मेरे ब्लाग को बजट में एलोकेशन देने का वादा हो। क्या मैं निरंकुश होने वाला हूं? क्या ब्लाग पर लिखना बंद कर दूं? ऐसा क्यों हो रहा है? मैं इनदिनों हर काम छोड़ कर ब्लाग पर लगा रहता हूं?

क्या आत्ममुग्धता और ब्लागमुग्धता किसी भी लिखने वालों के स्वाभाविक लक्षण हैं? क्या राही मासूम रज़ा को भी लगता होगा कि लोग कुछ न पढ़े सिर्फ आधा गांव पढ़ते रहें? कहीं श्रीलाल शुक्ल यह तो नहीं कहते होंगे कि आज की पीढ़ी नालायक है । ये लोग रागदरबारी तो पढ़ते नहीं पूरी ज़िंदगी एनसीईआरटी पढ़ने में लगा देते हैं। वैसे मैं बहुत खुश हं। ब्लाग पर लिखने से। इसका कागज़ खत्म नहीं होता। स्याही सूखती नहीं। क्या आपको भी ऐसा हो रहा है। ईमानदारी से बताइयेगा तो पता चल पाएगा। नहीं तो मैं क्यों हर ब्लाग के बाद अपने दोस्तों को बता रहा हूं कि भई पढ़ें। एसएमएस कर रहा हूं। ईमेल भेज रहा हूं कि मेरा एक ब्लाग है पढ़ना। और सुखी रहना। हर लेख के बाद मोहल्ला के अविनाश को फोन करता हूं। पढ़ा क्या। मुझे लगता है कि वो दफ्तर में काम क्यों कर रहे हैं। मेरा ब्लाग क्यों नहीं पढ़ रहे हैं। दोस्तों आप सच कहेंगे तो मैं सनकने से बच जाऊंगा।

चुनाव

चुनाव में वादा करना तुम भी ज़रुर
सच बोलोगो तो चुनाव हार जाओगे
अपनी जात खुद से मत कहना तुम
जात छुपाओगे तो चुनाव हार जाओगे
आयोग को पैसे का हिसाब देना ज़रुर
सब दिखाओगे तो चुनाव हार जाओगे
घर घर शीश नवाना तुम भी ज़रुर
सर उठाओगे तो चुनाव हार जाओगे

सच का झूठ

मैं इनदिनों बहुत सच बोल रहा हूं
कसम झूठ की नहीं बोल रहा हूं
चुप रह कर मैं सच को तोल रहा हूं
कसम चुप की मैं सच बोल रहा हूं

जन हित

इन दिनों यही एक हित है
हर लूटेरा अब जनहित है
लूटना अब उसका पेशा है
ठगा जाना जनता का हित है

बोर

अब वो बहुत बोर हो गए हैं
बिना बात के शोर हो गए हैं

वादा

चुनावों के मौसम में झूठे वादों की बरसात है।
फर्क सिर्फ इतना है कि कोई भींगता नहीं।