धनेश टी स्टाल

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ये तस्वीर मनेसर के पास मंगलवार को ली । गाँव में बचपन में ठीक ऐसे ही खिलौने से खेला है । निरंतरता का कमाल देखिये कि कोई तीस साल बाद ये फिर दिखता है । बिहार में नहीं हरियाणा में । क्या कहते हो इसे ? शर्मा कर जवाब देता है गाड़ी । 


यह तस्वीर वैशाली की है जहाँ रहता हूँ । गणित भी एक आइटम है इस देश में । इसे पढ़ाने वाला किसी कंपनी से कम नहीं । यह विषय पीढ़ियों से भयादोहन कर रहा है । नया तरीक़ा लगा सो क्लिक कर लिया । 

यह तस्वीर भी मनेसर की है । भण्डार में क्या क्या न आ जाए । बर्गर वहाँ है जहाँ खेलने का आइटम तीस साल पुराना । छोले भटूरे को ठेल कर जगह बना ली है बर्गर ने । 

राष्ट्रीय मोर्चा के नाम से सरकार बनी थी इधर तो उमेंद्र भाई ने पार्टी ही बना ली । वाह । क्या दूसरों से टिकट माँगना, अपनी पार्टी बनाओ और उम्मीदवार बन जाओ । मेरी शुभकामनायें । 

मोदी मतलब बीजेपी बीजेपी मतलब मोदी

क्या सचमुच बीजेपी कम सीटें आने पर नरेंद्र मोदी को पीछे कर देगी । यह चर्चा मैं तब से सुन रहा हूँ जबसे मोदी ने अपनी दावेदारी की पेशकश की । मोदी तब से अपने भाषणों में कह रहे हैं कि मुझे प्रधानमंत्री बनाओ । कभी प्रधानमंत्री के पद को सेवक कहा तो कभी चौकीदार । ग़नीमत है अगर यही बात मनमोहन सिंह ने कहीं होती तो बीजेपी या मोदी आरोप लगा रहे होते कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा की ये हालत कर दी है कांग्रेस में । मोदी प्रधानमंत्री पद को सीईओ कहें या सेनापति कहें या मज़बूत नेतृत्व लेकिन बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री का मतलब सिर्फ और सिर्फ मोदी हैं । 

इस चुनाव में जो भी जनता बीजेपी को वोट देगी या दे रही है वो मोदी को दे रही है । बीजेपी भी  वोट मोदी के नाम पर माँग रही है । बीजेपी के एजेंडे का कम गुजरात के काम काज का विज्ञापन ही टीवी में आ रहा है । अलग अलग राज्यों के अख़बारों में गुजरात का ही विज्ञापन छप रहा है । मोदी के भाषणों का कई भाषाओं में अनुवाद हो रहा है और डबिंग हो रही है । राजनाथ सिंह या आडवाणी के भाषणों की नहीं हो रही है । दो साल से बीजेपी का मतलब मोदी है । यह बात आर एस एस को भी मालूम है । संघ ने जानबूझ कर अनुमति दी या सत्ता के लिए बर्दाश्त किया, इस पर अटकलें लगाई जा सकती हैं । संघ के लिए भी मोदी हैं । ( अगर कहा हो तो क्योंकि खंडन हो गया है) हमारी प्राथमिकता किसे लाना है नहीं है बल्कि इस सरकार को हटाना है । सिर्फ इतना कह देने से संघ मोदी का विरोधी हो गया अजीब है । जिसने मोदी को मनोनित किया है उसकी ये बात मोदी के लिए नहीं तो किसके लिए है ।


हर हर मोदी घर घर मोदी का नारा तो कब से चल रहा है । रैलियों में मोदी मोदी का नारा लगवाया जाता है । पूर्णिया रैली में मंच पर भीमकाय फोंट में लिखा था- हर हर मोदी । हर हर गंगे और ऊँ नमो शिवा़य पर भी अब मोदी क़ायम हो चुके हैं । दिल्ली शहर में चारों तरफ़ मोदी के नए होर्डिंग लगे हैं । बड़ी सी होर्डिंग में सिर्फ मोदी का चेहरा है । नारा लिखा है अबकी बार मोदी सरकार । बीजेपी सरकार भी नहीं । मोदी सरकार । बीजेपी का चुनाव चिन्ह होर्डिंग के एक कोने में हैं । जिसके नीचे छोटे फोंट में लिखा है भाजपा को वोट दें । 


क्या आपको लगता है कि मोदी के नाम पर बीजेपी चुनाव लड़े और मोदी को ही प्रधानमंत्री न बनाए । ऐसे ख़्वाब देखने वाले नेताओं को आम आदमी पार्टी में चले जाना चाहिए या फिर ऐसी ख़बरों में यक़ीन करने वाले रिपोर्टरों को उन नेताओं के जनसंपर्क का काम संभाल लेना चाहिए जिनसे ऐसी ख़बरों की लीड मिलती हैं । आज टाइम्स आफ़ इंडिया में ख़बर छपी है कि मधु किश्वर ने ट्वीट किया है कि बीजेपी के नेता पार्टी को हरवा रहे हैं । उनका प्रयास है कि बीजेपी 160 सीटों तक सिमट जायें और मोदी की जगह राजनाथ या आडवाणी प्रधानमंत्री बन जायें । मधु ने इसे 160 क्लब का नाम दिया है । 


जिस मोदी का चयन आर एस एस ने किया है क्या उसके पास ऐसा करने का विकल्प होगा । तब क्या बीजेपी के सत्ता संघर्ष में आर एस एस एक बाॅस की जगह पार्टी नहीं बन जाएगा । बीजेपी के जो कार्यकर्ता संघ में निष्ठा रखते हैं क्या वे संघ को साज़िशकर्ता के रूप में नहीं देखेंगे । कार्यकर्ताओं को ही जो सदमा लगेगा उसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता । फिर क्या ये बीजेपी को वोट देने वालों से छल नहीं होगा । किस मुँह से बीजेपी आगे के चुनावों में अपना प्रधानमंत्री का दावेदार लेकर जाएगी । पब्लिक और विरोधी सब कहेंगे कि असली वाला बताओ । हालाँकि ऐसा होगा नहीं पर एक पल के लिए मान लीजिये कि बीजेपी को एक सौ साठ सीटें नहीं आईं । तब क्या ये बीजेपी की जीत होगी ? क्या ये मोदी और बीजेपी की हार नहीं होगी । 2009 में बीजेपी को 112 सीटें मिली थीं । क्या 48 सीटें ज़्यादा जीतकर बीजेपी विजयी होने का दावा कर सकती है । फिर मोदी लहर का क्या होगा और अगर बीजेपी को एक सौ साठ सीटें आईं तो इसका मतलब है कि क्षेत्रीय दलों की संख्या ज़्यादा होगी । कांग्रेस भी उतनी कमज़ोर नहीं होगी । क्या ये दल सिर्फ मोदी को माइनस कर बीजेपी के किसी भी नेता के साथ आ जायेंगे । इतना आसान होता तो हर बार गठबंधन की सरकार बीजेपी की ही बनती ।

राजनीति को एक तरफ़ से नहीं देखना चाहिए । मोदी की सरकार नहीं बनेगी तो पूरी संभावना है कि बीजेपी की सरकार नहीं बनेगी । सब कुछ कुंडली देखकर तय नहीं होता । ग़ाज़ियाबाद में एक पत्रकार मित्र से पूछा कि राजनाथ की क्या स्थिति है तो उन्होंने कहा कि इस बार नब्बे हज़ार से भी ज़्यादा वोटों से जीतेंगे । ग़ाज़ियाबाद ठाकुर बहुल क्षेत्र हैं । यहाँ ठाकुरों के गाँवों की एक पूरी पट्टी है जिसे साठा चौरासी कहते हैं । जहाँ तोमर और सिसोदिया राजपूतों का वर्चस्व है । इन गाँवों में लोग मानते हैं कि इस बार मोदी की वजह से बीजेपी बड़े दल के रूप में उभरेगी और राजनाथ प्रधानमंत्री होंगे । यही राजनीति है । जिस धारणा का मज़ाक़ उड़ाने के लिए मैं यह लेख लिख रहा था और यक़ीन मानिये आख़िरी दो पैरा लिखने से पहले उस पत्रकार को फ़ोन किया तो उसकी बातों से वही आवाज़ सुनाई दी । राजनाथ इस बार ज़्यादा मतों से जीतेंगे । कमाल है । 

फिर भी मैं मानता हूँ कि अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी टूट जाएगी । पूरे साल अकेले घूम घूम कर इतनी मेहनत करने वाले मोदी को धकियाना अब मुमकिन नहीं है । मधु किश्वर मोदी के प्रति अपनी निष्ठा के प्रदर्शन में भले ही बचकानी असुरक्षा ज़ाहिर कर रही हों मगर दम नहीं है । उन्हें मोदी सरकार में ही जगह की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए और ख़ुश रहना चाहिए कि उनके मोदी जी के साथ ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है । टू लेट । या तो बीजेपी जीतेगी या हार जाएगी । बीजेपी के भीतर मोदी नहीं हारने वाले । पिछले एक साल में आम आदमी पार्टी के समर्थकों के अलावा मुझे एक भी ऐसा आदमी या औरत या युवा नहीं मिला है जिसने कहा हो कि वो मोदी को वोट नहीं करेगा । इन्हीं में से एक ने भी ये नहीं कहा कि वे मोदी को नहीं बीजेपी को वोट दे रहे हैं । अत: राजनीति और जीवन में सब कुछ तात्कालिक होते हुए भी औकात बोध का ध्यान रखना चाहिए । जोशी जी और टंडन जी की नाराज़गी में इतना ही दम है तो ये दोनों अपनी बगल की सीट पर बीजेपी को जीता दें । प्लीज़ अब ये वाली बकवास बंद कर दीजिये ।

एक कविता वाया व्हाट्स अप

सुख का दुःख

जिन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है, 
इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है, 
क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ, 
बड़े सुख आ जाएं घर में 
तो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूं। 

यहां एक बात 
इससॆ भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि, 
बड़े सुखों को देखकर 
मेरे बच्चे सहम जाते हैं, 
मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हें 
सिखा दूं कि सुख कोई डरने की चीज नहीं है। 

मगर नहीं 
मैंने देखा है कि जब कभी 
कोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते में 
बाजार में या किसी के घर, 
तो उनकी आँखों में खुशी की झलक तो आई है, 
किंतु साथ साथ डर भी आ गया है। 

बल्कि कहना चाहिये 
खुशी झलकी है, डर छा गया है, 
उनका उठना उनका बैठना 
कुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता, 
और मुझे इतना दु:ख होता है देख कर 
कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता। 

मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है, 
इससे डरो मत बल्कि बेफिक्री से बढ़ कर इसे छू लो। 
इस झूले के पेंग निराले हैं 
बेशक इस पर झूलो, 
मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़ते 
खड़े खड़े ताकते हैं, 
अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ। 

तो चीख मार कर भागते हैं, 
बड़े बड़े सुखों की इच्छा 
इसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है, 
कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया था 
अब मैंने उन्हें फोड़ दी है। 

भवानीप्रसाद मिश्र

बारिश की एक रात

मौसम किसी अजनबी की तरह दस्तक देता है तो डर लगता है । ऐसे लगता है जैसे हमारी सारी आशंकाएँ सच होने वाली हो । ऐसा लगता है जैसे हवाओं के बीच झगड़ा हो गया हो । वे आपस में बिखर कर चारों तरफ़ दीवारों से अपना सर टकरा रही हैं । रूदाली की तरह चित्कार सुनाई पड़ रही है । इनकी रफ़्तार में बेबसी लगती है । झाड़ झंखड़ों को हिला कर ये मदद मांग रही हैं । 

आसमान रो रहा है । हमारे भीतर के आसमान की तरह । आज की रात सचमुच किसी काली रात की तरह लग रही है । ऐसा लगता है मिथकों से कोई दानव निकल कर तमाम कमज़ोरों को रगेद रहा हो । जिससे बचने के लिए सब भाग रहे हैं । बारिश की बूँदों की आवाज़ दसवीं मंज़िल तक उठ कर आ रही है । इतनी शोर में अजीब सी ख़ामोशी है ।

होली के समय ये सावन की फुहारें नहीं हैं । किसी के ख़ून के आँसू हैं । कोई डर है जो बरस रहा है । ़अचनाक से निहत्था कर देने वाली बारिश हैं । हर कोई हर किसी का भेदिया बन गया है । भरोसा करने वालों से भरोसा उठ गया है । क्यों लगा कि उनका भी भरोसा कभी नहीं था । हम सब अपने अपने अंधेरे के गिरफ़्त लोग हैं । सब शक की नज़र से मुझे देखते हैं और मैं उन्हें । भीतरघात और विश्वासघात के फ़िराक़ में ये हवायें यहाँ वहाँ दौड़ लगा रही है । हर कोई अपना बनाया भरोसा ख़ुद तोड़ने की जल्दी में हैं । ऐसी बारिश और चाहिए । मार्च से लेकर मई तक । ताकि सारे कीचड़ में सन जायें । कोई एक सूखा रह जाएगा जो विजेता बनेगा । 

आज की बारिश से हाड़ नहीं काँप रहा । सूख गया है । कोई अफ़सोस नहीं है । अकेले होना बहुत ज़रूरी है । भीतरघात से बचने के लिए । जैसे ये मौसम अकेले आ गया है । चीख़ने चिल्लाने के इस मौसम में ये बारिश तेज़ हवाओं से लिपट कर अपना रोना सुनाने आई है । कौन सुन रहा है इस आधी रात को । सबने सबसे भरोसा उठा लिया है । सबने सबपे शक कर लिया है । पराजित से पराजित हो कर सब किसी की जीत का रास्ता बना रहे हैं । कितना कमज़ोर समय है । कितने कमज़ोर रिश्ते हैं । इन्हें ख़ुद ख़त्म करने का वक्त आ गया है । ऐसे रिश्तों को टूटने के लिए भरोसे के टूटने का इंतज़ार क्यों करे । बिजली क्यों तेज़ ग़रज़ रही है । अब इसे क्या हो गया । कुछ होने वाला है क्या । होना ही चाहिए जो होना चाहिए । 

बिहारियत वाया अंग्रेज़ीयत- दास्ताने सिंगल मैन

"The imposition of emergency had beckoned a new genre of books into the room, studies of Adolf hitler and nazism-William L Shirer's The rise and fall of the Third Reich, Albert sower's Inside the Third Reich, Joachim C Fest's biography of Hitler, the diaries of Joseph Goebbels, Men Kampf. Indira Gandhi was being studied as a symptom of fascism "

संकर्षण ठाकुर की क़लम इतिहास पर साहित्य की तरह चलती है । उनकी अंग्रेज़ी में कोई आक्सफोर्ड वाला बिहारी मानस की आहट सुनते हुए इस उलझन में पड़ सकता है कि क्या बिहार को भी अंग्रेज़ी में बयां किया जा सकता है । मैं ख़ुद मानता रहा हूँ कि बिहारियत अंग्रेज़ी में नहीं कहीं जा सकती । कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जिनके बिना आप बात तो कह सकते हैं मगर बिहारी मानस की परतों को नहीं खोल सकते । संकर्षण की अंग्रेज़ीयत बिहारियत को दोनों विलियमों शेक्सपीयर और वर्डस्वर्थ के अंदाज़ में पेश करती है । वर्डस्वर्थ और शेक्यपीयर को 1985 और 1986 के साल में पढ़ा था । जब मैं नौवीं दसवीं में था । वो भी जब हमारी टीचर इंदिरा शांडील्य ने अंग्रेजी में पढ़ाने की ज़िद की तो हम हिन्दी मीडियम वाले गिड़गिड़ाने लगे कि कुछ्छो नहीं बुझाता है । के के पांडे भी तंग आ जाते थे अंग्रेज़ी को हिन्दी पढ़ाने में । मैंने शेक्सपीयर को हिन्दी में पढ़ा है । यहाँ यह बताना ज़रूरी था ताकि आप मेरे बारे में भ्रम न पाल लें कि मैं कहीं शेक्सपीयर और वर्डस्वर्थ की भाषा का ज्ञाता तो नहीं जो अंग्रेज़ी अख़बार द टेलिग्राफ़ के बंजारा संपादक ( रोविंग एडिटर) संकर्षण की बिहारियत वाया अंग्रेजीयत को बांच रहा हूँ ।

सिंगल मैन - द लाइफ़ एंड टाइम्स आफ़ नीतीश कुमार । जिस तरह से हार्पर कोलिन्स ने किताब के कवर पर सिंगल मैन को बड़ा छापा है उससे लगता है कि यह नीतीश कुमार की कोई जीवनी है । लेकिन यह किताब पूरी तरह से वो कहती है जिसे प्रकाशक ने छोटे हर्फो में छापा है । द लाइफ़ एंड टाइम्स आफ़ नीतीश कुमार ।

इस किताब में ख़ुद संकर्षण आपातकाल और जयप्रकाश आंदोलन के दौर को याद करते हुए बड़े हो रहे हैं । वो दौर लेखक के बचपन का था । उनके पिता जनार्दन ठाकुर सम्मानित और बारीक पत्रकार थे । नीतीश के बिहार को समझने को समझने के लिए बिहार को जानना ज़रूरी है । लेखक नीतीश के बिहार को लेकर शुरू के साठ पन्नों में कोई ख़ास उत्साहित नहीं हैं मगर वे 'बिहार ना सुधरी' से 'बदल गया बिहार' के बीच यहाँ के मानस की मनोवैज्ञानिक सहूलियतों को पकड़ रहे हैं । आँध्र प्रदेश में तीन सौ इंजीनियरिंग कालेज हैं मगर बिहार में दस । कुछ दंबगों के किस्से हैं जो बिहार के इस दौर में जीवाश्म में बदल रहे हैं । एक सज्जन कहते हैं कि हमारे ये गार्ड लालू के समय की निरंतरता हैं मगर अब कोई इनके साथ मुझे देखता है तो हैरान हो जाता है कि जब ज़रूरत नहीं तो क्यों रखे हैं ।

संकर्षण ने नीतीश को एक अणे मार्ग में रहने वाले नीतीश में नहीं ढूँढा है । बल्कि ख़ुद के साथ उन गाँवों क़स्बों और ज़िलों में देखा है जहाँ कई तरह के बिहार हैं जिन्हें आप सिर्फ बदलाव और यथास्थिति के खाँचे में बाँट कर नहीं देख सकते । नया बिहार या बिहारी पहचान में राजनीतिक गर्व का भाव भरने वाले नीतीश की उम्मीदों को आशंका की नज़र से देखते हुए संकर्षण शायद उन परकोटों को ढूँढ रहे हैं जहाँ से कोई कूद कर इस बिहारी पहचान को फिर से अलग अलग जाति की पहचान से बाँट सकता है । अपर कास्ट नीतीश के अगेंस्ट चला गया है , मैं जब भी पटना फ़ोन करता हूँ ये लाइन सुनाई देती है ।संकर्षण कहते हैं कि यह बँटवारा तो नीतीश ने भी किया । पसमांदा मुसलमान, अति पिछड़ा और अति दलित । इस सवाल के जवाब में नीतीश कहते हैं कि विकास और पहचान की राजनीति में कोई अंतर्विरोध नहीं होता है । 

इस किताब का पहला चैप्टर मेरा प्रिय है । जब संकर्षण लोहिया और जेपी के बारे में किसी सिनेमा के इंट्रोडक्शन की तरह लिखते हैं । सत्तर का दशक जाने बिना तो आप बिहार का प्राचीन इतिहास भी नहीं जान सकते । पटना जाता हूँ तो मुझे ये बात बेहद हैरान और रोमांचित करती है । बिहार में सत्तर के आंदेलन का अवशेष लिये कई लोग मिल जाते हैं मगर आज़ादी की लड़ाई का इतना शानदार इतिहास होते हुए भी कोई बात नहीं करता । जो सत्तर नहीं समझेगा वो उसके बाद का बिहार नहीं समझ सकता । सत्तर का दशक बिहार के इतिहास में पर्दे पर किसी सलीम जावेद की कहानी की तरह बच्चन जैसे महानायकों के उभरने का दशक है । फ्लाप हिट होते होते कभी लालू चल जाते हैं तो कभी नीतीश ।

ख़ूबसूरत वर्णन है पटना के काफी हाउस का । रेणु, दिनकर,बाबा नागार्जुन इन सबसे उनकी बिहारियत के साथ मुलाक़ात होती है । पढ़ते पढ़ते लगा कि मैंने भी दिनकर को देख चिल्ला दिया हो- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । बाबा नागार्जुन का रात में अंडा लेकर आना और संकर्षण के साथ मिलकर कड़ुआ तेल में पकाना । अच्छी अंग्रेजी में बिहार मिल जाए तो समझिये कि आक्सफोर्ड में दो बिहारी मिल गए । कहीं कहीं रूपक नुमा शब्द यह भी बता रहे हैं कि नेसफिल्ड और रेन एंड मार्टिन पढ़ कर सीखें हैं तो ऐतना तो बनता है । संस्कार हिन्दी का और अभिव्यक्ति अंग्रेज़ी की । इसीलिए इस लिहाज़ से भी किताब को पढ़ना दिलचस्प अनुभव है । 

बहरहाल आज का बिहार फासीवाद की वो समझ नहीं रखता जो सत्तर के दशक के बिहार में बना रहा था । उन किताबों और बहसों के ज़रिये फासीवाद को समझ रहा था । किताबें ख़रीद रहा था । किताबें पढ़ रहा था । वो लड़ाई कमज़ोर हो चुकी है । सलीम जावेद की फ़िल्म का ये वो सीन है जहाँ एक नायक घायल पड़ा है । मंदिर की घंटियाँ बज रही हैं । बेतहाशा शोर में भगवान के चेहरे पर ग़ज़ब की ख़ामोशी पसरी है । नायक बिल्कुल सिंगल मैन की तरह आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है । क्या होगा पता नहीं । क्लाइमैक्स का सीन है । सीन में कोई और नहीं । सिर्फ एक सिंगल मैन है ।

मैं इस पुस्तक को पढ़ रहा हूँ । पढ़ते हुए देखना सबसे अच्छा तरीक़ा है पढ़ने का । लेखक और उसके पात्र की जीवनी बन पड़ी है । और दोनों के बीच का समय  इतिहास । पढ़ियेगा । पाँच सौ निन्यानबे दाम है । बाटा कंपनी का यह निन्यानबे छाप गया नहीं । जाएगा भी नहीं । खुदरा लेकर जाइयेगा । 

चश्मेवाली और सैंडलवाली

झटके से लौट आई । फोटो खिंचनी हैं तो खिंच लो । तब तक कैमरा तैयार हो चुका था । पल भर में वो एक ज़िंदादिल तस्वीर में बदल गई । हुआ यूँ कि दिल्ली के कड़कड़डूमा चौराहे पर फ़्लाइओवर के नीचे वो अचानक आ गई । उँगलियों से कुछ पंप सा दबाया और चश्मे से पानी की धार कार के शीशे पर । बस तुरंत मोबाइल निकाला और फ़्रेम बनाने का प्रयास किया तब तक वो गुज़र गई । फ़िलहाल ये तस्वीर आपके लिए । इसे कहते हैं आत्मविश्वास । महिला दिवस के दिन इससे अच्छी तस्वीर क्या हो सकती है ।

और ये तस्वीर रश्मि जी ने भेजी । महिला दिवस पर । देख कर लगा कि किसी ने अच्छे से सैंडिलिया दिया है । जूतियाने की तर्ज़ पर । 

ठंड रख भाई

अच्छा तो नहीं हुआ । तथ्यों की अपनी अपनी व्याख्या से सच बड़ा नहीं हो जाता । गुजरात में पुलिस ने औपचारिकता निभाई या अति सक्रियता । जब कोई किसी दौरे पर हो और उसी बीच आचार संहिता लागू हो जाए तो क्या करना चाहिए इसकी व्यावहारिक समझ तो नेताओं में होनी ही चाहिए । गुजरात प्रशासन और पुलिस को जब लगा कि अरविंद ने संहिता का उल्लंघन किया है और थाने बुलाना ज़रूरी है या मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अरविंद ने अनुमति पत्र माँगने पर कहा कि नहीं है हमें गिरफ़्तार कीजिये तो पुलिस को बताना चाहिए कि थाने बुलाकर छोड़ा क्यों ? क्या अरविंद को छोड़ने से पहले पुलिस ने उनसे अनुमति पत्र के लिए आवेदन लिखवाया फिर छोड़ा या आचार संहिता के बारे में अरविंद से समझने के लिए बुलाया था । मैंने टीवी पर चल रहे सारे फ़ुटेज तो नहीं देखे मगर एक क्लिप में अरविंद यह कहते हुए थाने से निकले कि समझा दिया आचार संहिता क्या है । ये मोदी ने करवाया है । पाटन के कलेक्टर ने कहा कि कोई उल्लंघन नहीं हुआ है । फिर क्यों थाने बुलाया था ।  यह भी सच नहीं है कि प्रशासन संहिता लागू होने के बाद निराकार भाव से निरपेक्ष ही हो जाता है । रैलियों में बहुत नियम टूटते हैं किसी बड़े नेता को थाने नहीं बुलाया जाता । कई वीडियो फ़ुटेज में बीजेपी दफ़्तर के भीतर से कुर्सी और ढेले फेके गए । बीजेपी के लोग भी लाठी लेकर आप कार्यकर्ताओं को रगेद रहे हैं ।

कल जैसे ही टीवी पर यह समाचार फ़्लैश हुआ अरविंद के समर्थक मोदी की तानाशाही की निंदा करने लगे और बीजेपी के नेता क़ानून बताने लगे कि उनके पास अनुमति नहीं थी । आचार संहिता का उल्लंघन किया है । लागू हो चुकी है । इसलिए पुलिस ने बुलाया और संहिता लागू होने के बाद पुलिस मुख्यमंत्री के नियंत्रण में नहीं रहती । बीजेपी के तमाम बड़े नेता क़ानूनी बयान देने लगे । उस वक्त सारे तथ्य सामने आए होते तो बात कुछ और होती । सबने बिना तथ्य जाने अपने अपने समर्थकों के साथ फ़ुटबॉल खेलना शुरू कर दिया । एक ने थाने बुलाने को राजनीतिक मोड़ दिया और दूसरा यह मानकर कूद गया कि उल्लंघन हुआ है तो पुलिस ने उचित ही कार्रवाई की ।  जबकि उल्लंघन नहीं हुआ था । कोई मोदी की आलोचना कैसे कर सकता है । इतना भी क्या भावुक होना । 

मीडिया ने भी तथ्यों पर नियंत्रण छोड़ कर मैच में बदल चुके इस प्रसंग को स्क्रीन पर पसरने के लिए छोड़ दिया । यह कितना ख़तरनाक होता जा रहा है । दोनों के समर्थक ट्वीटर पर भिड़ गए । हवा में एक से एक मज़बूत दलीलें गढ़ दी गई । अगर फ़ुटेज से हटकर सिर्फ रिपोर्टिंग होती तो मामले की हवा निकल जाती । मगर इस घटना को फ़ुटेज और मनमर्ज़ी बयानों के भरोसे छोड़ दिया गया । इंडियन  एक्सप्रेस की तस्वीर में आप समर्थकों के हाथ में पत्थर है और वे चलाते हुए दिख रहे हैं । लेकिन सड़क पर गिरे और बिखरे ईंट को टुकड़े कहाँ से आये इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है । उसी एक्सप्रेस के न्यूज़ लाइन में एक सिपाही किसी ढेले से बचने का प्रयास करता हुआ सिकुड़ा हुआ है । तस्वीर की दिशा बता रही है कि ढेला बीजेपी की तरफ़ से चला है ।


अब आइये बीजेपी दफ्तर । किसने पहले पत्थर और कुर्सियाँ फेंकी यह शोध का विषय है । आप किसी फ़ुटेज से यह तो जान सकते हैं कि कुर्सी बीजेपी दफ़्तर से फेंकी गई या आप वालों ने पत्थर फेंका । पहले कौन फेंका जानना मुश्किल है क्योंकि कई फ़ुटेज में अलग अलग संदर्भ और प्रसंग दिखते हैं । बहरहाल इसे लेकर दोनों तरफ़ से भरमाने का खेल चल रहा है । भारतीय राजनीति का यह पुराना ज़रिया है कि भीड़ बनकर किसी घटना पर इतना झांव झांव कर दो कि सब भरमा जाए । तथ्य है कि पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार आप के तेरह और बीजेपी के दस कार्यकर्ता घायल हुए हैं । पुलिस ने बीस आप कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है । रही बात पहले किसने चलाया तो यह बात सच है कि दोनों तरफ़ से जवाबी कार्रवाई हुई है । शर्मनाक है । नई राजनीति का दावा करने वाली आप को ज़्यादा संयम बरतना चाहिए था ।

किरण बेदी ने ट्वीट किया है कि प्रदर्शन के लिए किसी के दफ़्तर जाने का मतलब ही है टकराव को उकसाना । क्या यही अंतिम मत है ? अगर है तो घेराव क्या उकसाना है । जो पी आंदोलन और उससे पहले से दफ़्तरों का घेराव होता है । इस देश में रोज़ कहीं न कहीं लोग अपनी माँगों को लेकर दफ़्तरों का घेराव करते रहे हैं । विजय जाली भी तहलका की शोमा चौधरी के घर नेम प्लेट पर कालिख पोतने गए थे जिसकी बीजेपी के सभी बड़े नेताओं ने निंदा की थी । मोदी समर्थकों ने आडवाणी का भी घर घेर लिया था । कांग्रेस के लोग आए दिन बीजेपी दफ़्तर का घेराव करते रहते हैं । बीजेपी के लोग भी यही करते हैं । आप ने ग़लती की होगी मगर यह दलील भी हिंसा से भरी हुई है कि किसी के दफ़्तर जाना उसे उकसाना है और कोई पत्थर चला सकता है । 

यहाँ भी न्यूज़ चैनलों ने इन तस्वीरों को यूँ ही स्क्रीन पर छोड़ दिया । चैनलों के स्क्रीन आग उगलने लगे ।  ख़बरें ऐसे फ़्लैश होने लगी जैसे किसी आख़िरी ओवर में रन बनने या न बन पाने के तनाव को बढ़ाने वाला माहौल हो । तथ्य होते हुए भी उन तस्वीरों की 'भव्यता' के आगे बौने हो गए । बीजेपी एस एम एस दिखाने लगी जिसमें आप ने समर्थकों को बीजेपी दफ़्तर बुलाया था । बीजेपी कहती है कि आचार संहिता लागू होने के बाद पुलिस से अनुमति नहीं ली गई । एक ठोस दलील है जिसका जवाब मिलना चाहिए । मगर बात अनुमति की ही नहीं है यह भी है कि आप और बीजेपी के बीच लोकतांत्रिक सहनशीलता कमज़ोर पड़ती जा रही है । समाप्त हो गई है । वर्ना गुजरात में वे कौन लोग थे जो अरविंद का घेराव कर रहे थे, नारेबाज़ी कर रहे थे, उनकी कार का शीशा भी चटका दिया और ये भी कहते रहे कि बीजेपी के नहीं । हम किसान हैं किसान । दूसरी तरफ़ अरविंद ने जो तस्वीरें ट्वीट की वो किसी भी शहर के कोने में मिल जाती हैं । बहुत भरोसेमंद तस्वीर नहीं थी । उन्हें साबरमती रिवर फ़्रंट पर भी जाकर तस्वीर खींचनी चाहिए जिसे टेम्स बनाने का दावा मोदी करते हैं । कांग्रेस ने भी गुजरात में विकास खोजों यात्रा निकाली थी मगर इतना कवरेज नहीं मिला । 

टीवीखोर सब हैं । आप भी है बीजेपी भी है और कांग्रेस भी । इसलिए किसी पर यह आरोप अब बेतुका लगता है कि टीवी पर आने के लिए किया गया ।टीवी पर आज भी बीजेपी और कांग्रेस ज़्यादा आते हैं । इन्हीं दो को कवरेज मिलता है । इनकी सारी रणनीतियाँ टीवी पर आने को लेकर ही होती हैं और इसमें कुछ ग़लत नहीं है । स्वाभाविक है । इसलिए ये दल किसी और के टीवी पर आ जाने से जागीरदार की भाषा न बोलें । किसी ग़ैर भाजपा राज्य में अगर पुलिस नरेंद्र मोदी को चाय पे ही सही थाने बुला ले तो बीजेपी की प्रतिक्रिया का अंदाज़ा कर सकते हैं । अरविंद केजरीवाल और राजनाथ सिंह दोनों ने शांति की अपील की है । राजनीति हो जाने के बाद अपील ही की जाती है । सारी महानता अपील में नहीं होती, आचरण में भी कुछ होती होगी ।

क़ायदा दोनों तरफ़ से टूटा है । पहले किसने तोड़ा अगर इसी के नाम पर सब जायज़ है तो राजनीतिक दलों की असुरक्षा भावना से सहानुभूति रखते हुए सतर्क रहा जाना चाहिए । हाँ पहले किसने मारा इसकी जाँच ज़रूरी है । आप सही ग़लत के निष्कर्षों पर पहुँचने से पहले अलग अलग अख़बारों और चैनलों से तथ्यों को जमा कीजिये । सारे बयानों को सुनिये । अपना विचार खुद बनाइये । हिंसा से बचिये । चाहें आप आप हों या भाजपा । मीडिया को राम भरोसे छोड़ दीजिये । अगर मीडिया फ़ुटेज छोड़कर तथ्यों को ज़्यादा से ज़्यादा मज़बूती से रखता तो तनाव पसरता ही नहीं । बहरहाल दोनों तरफ़ से सत्यवादी दलीलों का मज़ा लीजिये । 

अण्णा- गांधी से गन्ना तक

आदरणीय अण्णा,

मैं कल्पना करना चाहता हूँ पर कर नहीं पा रहा हूँ । यही कि मोहन दास करमचंद गांधी किसी पार्टी का विज्ञापन कर रहे हैं । कैमरे के सामने टेक रीटेक दे रहे हैं । आप गांधी के बाद लगभग गांधी बनने वाले शख़्स तो बन ही गए थे । मीडिया हमने सबने आपमें गांधी देखा था । आपको भी लगा कि गांधी की तरह आश्रम में रहना चाहिए । आपने राजनीति से दूरी बनाये रखने के असंख्य बयान दिये । कहा कि राजनीति में नहीं जायेंगे । आपके आस पास ऐसे लोग जमा हुए जिन पर आपने यक़ीन किया कि ये भी राजनीति में नहीं जायेंगे । आप राजनीति की तरफ़ गए अरविंद से दूरी बनाते रहे और छकाते रहे । गांधी की हैसियत से सर्टिफ़िकेट जारी करते रहे । 

आज वी के सिंह बीजेपी में जा चुके हैं । किरण बेदी रोज़ मोदी का प्रचार करती हैं । आपके बाक़ी सदस्य क्या कर रहे हैं पता नहीं लेकिन आप तृणमूल कांग्रेस का प्रचार कर रहे हैं । आपको कौन मैनेज कर सकता है । यह ज़रूर है कि आपको मैनेज करने वालों को कोई और मैनेज कर रहा था । आपने वी के सिंह और किरण बेदी को कभी ख़त लिखकर सवाल नहीं पूछा । जनलोकपाल के बदले रूप को जब कांग्रेस बीजेपी अपनी विश्वसनीयता का हथियार बनाने के लिए पास कर रही थीं तब आपके साथ किरण बेदी थीं । आज उसी लोकपाल के लिए बनी सर्च कमेटी को लेकर विवाद हो रहा है । जो आपको नहीं दिखा कि सर्च कमेटी का क्या मतलब है जब सलेक्शन कमेटी मानने को बाध्य नहीं । इसी बिन्दु पर जस्टिस थामस ने सर्च कमेटी के प्रमुख का पद छोड़ दिया । उनका सवाल सर्च कमेटी की प्रासंगिकता को लेकर था मगर बीजेपी ने इसे सरकार की नाकामी बता दी । बीजेपी ने थामस के सवालों का जवाब नहीं दिया । उन्होंने सर्च कमेटी की क्षमता के प्रति अविश्वास व्यक्त किया जिसे कांग्रेस बीजेपी ने मिलकर पास किया था । सरकार और विपक्ष दोनों का गुमान है कि सच वही बोलते हैं । 

आप भी इस विवाद से दूर हैं । चुप हैं । आप अब अण्णा नहीं रहे । बारी बारी से कांग्रेस बीजेपी के काम आने के बाद ममता के कार्यकर्ता बन गए हैं । आपने ख़ुद मैं ही अण्णा तू भी अण्णा के नारे को ख़त्म कर दिया । आप मैं ही अण्णा मैं ही अण्णा जपने लगे हैं । यह भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में आप अजित सिंह की पार्टी रालोद या चौटाला की पार्टी इनेलो के लिए भी प्रचार करते नज़र आयेंगे ।

अण्णा आपने गांधी को निराश किया है । आपने जेपी को निराश किया है । उनलोगों  को सही साबित किया है जो आपके अनशनों और भाषणों के वक्त हँसा करते थे । आप किस प्रोजेक्ट के तहत तृणमूल के लिए प्रचार कर रहे हैं । आम आदमी पार्टी के आधार में कंफ्यूजन फैलाने का नया मंच है या दिल्ली में प्रचार कर तृणमूल को लिए कुछ वोट बटोरने का प्रयास कर रहे हैं ताकि उसे राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए पर्याप्त वोट मिल जाये या आप ममता के बहाने आप का वोट काट कर मोदी का भला कर रहे हैं । जैसे आप पर आरोप लगता है कि यह बीजेपी को हराने का कांग्रेस का प्रोजेक्ट है वैसे ही कहीं आप आप को हराने के लिए बीजेपी का प्रोजेक्ट तो नहीं । 

वैसे अण्णा आप गांधी से गन्ना बन चुके हैं । सब चूस रहे हैं आपको । चूस चुके हैं । आपको एक सुझाव देता हूँ । आप एक आत्मकथा लिखिये जिसमें सच बोलने का प्रयास कीजिये कि आप कैसे कैसे मैनेज होते रहे । उसका नाम रखिये- गांधी से गन्ना तक । कोई अचानक ब्लागर बनकर मैनेज करता है तो कोई सीडी रिकार्ड करता है । आपने अपना सबसे अचूक हथियार गँवा दिया है। नैतिकता का अधिकार । आपकी टोपी पर सब अपना नाम लिख चुके हैं । किसी रैली में ममता आपकी टोपी उतारकर अपनी टोपी पहना देंगी जिस पर लिखा होगा मैं भी ममता तू भी ममता । टीवी पर आप जिस ममता को अपना आशीर्वाद दे रहे हैं आप चाहें तो वी के सिंह को भी दे सकते हैं । वे बीजेपी में ही गए हैं । आपके हिसाब से तो अच्छे उम्मीदवार है हीं । बाकी त जो है सो हइये है ।

भवदीय,

रवीश कुमार एंकर 


छूटी हुईं साइकिलें



कोई बड़ा हो गया होगा इसे चलाते चलाते और यह साइकिल छोटी ही रह गई होगी । अपने अपार्टमेंट में जहाँ तहाँ रखी ऐसी छूटी साइकिलों को देखकर बचपन के बीत जाने का अहसास होता है । सीढ़ी के नीचे, पेड़ के सहारे टिका कर छोड़ दी गई साइकिलें कविता की पुरानी किताब लगती हैं जिसकी ज़िल्द उतर गई हो । ऐसी साइकिलें महीनों पड़ी रहती हैं । बच्चों की और बड़ी साइकिल आ जाती है । किसा का दिल आया तो काम करने वाली को दे दिया । इसलिए आप किसी अपार्टमेंट के बाहर कपड़े प्रेस करने वाली झुग्गियों के बाहर ऐसी साइकिलें पड़ी रहती है । कुछ चलती हैं तो कुछ चलने लायक नहीं रहतीं । कबाड़ी की दुकान में भी ऐसी साइकिलें मिलेंगी जिन्हें लोग बेच गए होते हैं । यह वही साइकिल है जिसे ख़रीद कर लाने के दिन का उत्साह, बच्चे की आँखों की चमक किसी को याद नहीं रहती । जीवन ही चलता चलता आगे बढ़ जाता है । साइकिल रूकी रह जाती है ।