धान के नाम

दफ़्तर से लौटकर माँ से धान के बारे में बात करने लगा । माँ अपने मायके और ससुराल के धान से जुड़े किस्से सुनाने लगी । कैसे जब यूपी के पडरौना के एक गाँव से आईं तो ससुराल और मायके में चावल को लेकर ऊँच नीच के किस्से सुनने सुनाने को मिलते थे । एक बार बाबूजी बेढ़ी से धान निकाल कर देख रहे थे तो नानी ने टोक दिया । कहने लगी कि धान देख रहे हैं । बाबूजी बोले कि अरे नहीं गमछा गिर गया था । नानी बोली हम समझ गए हैं । ये मत समझिये कि हमलोगों के यहाँ धान नहीं होता है । मां जब बाबूजी का क़िस्सा बता रही थी तो उनके चेहरे पर बाबूजी दिख रहे थे । जैसे कह रहे हों कि मत बताओ इसको । ये लिख देगा । माँ कहने लगी कि 'पहले का लोग' धान को लेकर गर्व करता था । हमारे यहाँ ये धान होता है तो हमारे यहाँ ये । तब लोग एक दूसरे को खेत और अनाज के ज़रिये भी जाना करते थे । मोटा चावल खुद खाते थे मगर मेहमान को महीन चावल खिलाते थे । 

माँ के पास अथाह क़िस्से हैं । चौदह पंद्रह साल की उम्र में शादी हो गई थी । समंदर सा धीरज है । जब से दिल्ली आई हैं एक एक पल साथ रहने के लिए बेचैन रहता हूँ । बाबूजी के जाने के बाद उन्हें ज़्यादा समझने का मौक़ा मिला है । वो अब भी नाना नानी को वैसे ही याद करती हैं जैसे मैं अपने बाबूजी को । माँ ने अपने पूरे जीवनकाल में साड़ी के अलावा कुछ पहना ही नहीं । बचपन से लेकर आज तक सिर्फ साड़ी । कभी इस तरह से जाना ही नहीं माँ को । मेरी भतीजी ने वादा किया है कि इंजीनियर बनने के बाद पहली कमाई से दादी को जीन्स पहनाने वाली है । माँ और जीन्स में । अद्भुत क्षण होगा वो । मैं भी अपनी माँ को जीन्स में देखना चाहता हूँ । भतीजी ने पहले दावा न कर दिया होता तो तुरंत एक जीन्स ले आता । क्या भव्य रूपांतरण होगा । समय और पहचान का । 

बहरहाल लाल क़िला, इंडिया गेट ब्रांड नाम से चावल खाने वाली आज की पीढ़ी के लिए चावल की क़िस्मों के यही नाम है । आज गाँवों में भी धान की क़िस्में ख़त्म हो गईं हैं । माँ ने जो नाम बताये वो इस तरह है-
सीता, मनेसरा, कतकी( कार्तिक) मंसूरी, भनली,( दशहरा के पहले कट जाए) अगहनी, दूधराज, ललदेइया, भैंसालोटन धान , काला नमक, कलमदान,कनकजीर, गुरदी और बासमती । आप भी इस सूची में धान की क़िस्में जोड़ सकते हैं । 

कमेंट से कुछ नाम उठाकर यहाँ डाल रहा हूँ ताकि सब पढ़ सकें । विष्णुपराग, मोगरा, कालीमूंछ, दुबार, तिबार, जीरामन, सरजू-बावन, कतरनी, सोनबरसा,साठी,गम्हड़ी, विष्णुभोग, गुरमटिया, सफरी,राजभोग, पसेरी, काली कमोद, श्याम ज़ीरा, शुक्ला फूल, सकर चीनी ।

ऊँ नमो नमाय:

विजय जौली बीजेपी के महत्वपूर्ण नेता है । उनका ईमेल आया है कि हांगकांग में नमो रेस्त्रां खुल गया है जिसका उद्घाटन किसी और काम से संक्षिप्त दौरे पर गए डा हर्षवर्धन और जौली ने किया । नमो टी स्टाल के बाद नमो रेस्त्रां । ई मेलानुसार उद्घाटन का अनुरोध सुनकर दोनों चकित रह गए ।


 मैं इस तस्वीर को देख रहा था तो चुटकी लेने का मन कर गया । चाय से दारू की दुकान । वाह । पता चलेगा कि ये दोनों शाकाहारी सिर्फ पानी और दुग्ध पेय पीने वाले मोदी के नाम पर दारू वाली रेस्त्रां का उद्घाटन कर आये हैं तो वे क्या कहेंगे ! मोदी जी ख़ुश भी तो हो सकते हैं । अगले चुनाव में नमो टी की जगह नमो वाइन ! शुभ शुभ बोलो । इनकी लोकप्रियता से क्यों जलते हो रवीश कुमार ! फ़िलहाल इस रेस्त्रां में जाइये और ईट ड्रींक और चिल्ल कर आइये । चाय में क्या मज़ा है ।

होली आ गई क्या

वैशाली सेक्टर चार के मार्केट में पिचकारियां बिकनी शुरू हो गईं हैं । कोई नया माडल नहीं दिखा मगर रंग आख़िर रंग होता है मन खिल जाता है । 



गया गुज़रा ग़ाज़ियाबाद


इनदिनों ग़ाज़ियाबाद में राजनाथ सिंह और सपा नेता सुधन रावत के बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं । अचानक एक दिन देखा कि ग़ाज़ियाबाद के वैशाली तक मौजूद मेट्रो के आगे के विस्तार का श्रेय दोनों ले रहे हैं । पहले राजनाथ की होर्डिंग लगी । ग़ाज़ियाबाद में मेट्रो लाने का श्रेय लेते हुए । कई नेताओं के भी चेहरों के साथ । उसके कुछ दिन बाद सपा नेता ने अपनी होर्डिंग लगा दी । इस होर्डिंग में इतने नेताओं की तस्वीर है कि पूरी मेट्रो भर जाए । 



ग़ाज़ियाबाद का नाम घटियाबाद भी होना चाहिए । आप किसी भी तरफ़ गाड़ी ले जाइये घोर अव्यवस्था मिलेगी । ट्रैफ़िक का कोई इंतज़ाम नहीं, सड़कें टूटी मिलेंगी । कचरे का ढेर चारों तरफ़ पसरा मिलेगा । इंदिरापुरम का हिस्सा छोड़ दें तो ग़ाज़ियाबाद की हालत बेहद ख़राब है । आज से नहीं । सरकार से लेकर सांसद सब बदल जाते हैं मगर इसकी हालत जस की तस रहती है । कल राजनगर एक्सटेंशन की सड़क से जाना हुआ । सड़क टूट गई है । किनारे पानी जमा है । वहाँ से हापुड़ रोड पर निकला संजयनगर की तरफ़ तो सड़ांध देखकर दिमाग़ ख़राब हो गया । बस लोग रह रहे हैं । जब राजनाथ सिंह मेट्रो लाने का दावा कर सकते हैं तो बाक़ी शहर की हालत का हिसाब भी दे सकते हैं । उसी तरह मेट्रो लाने का दावा करने वाले सपा नेता भी बता तो सकते हैं कि शहर में इतनी गंदगी क्यों हैं । कुछ मुख्य सड़कों को छोड़ दें तो बाकी भीतरी सड़कें सड़क में ही घुस गईं हैं । आज ही एक महिला ने पकड़ लिया और कहने लगीं कि देखिये सेक्टर चार का बाज़ार कितना गंदा है । आप कुछ कीजिये । मैंने कहा कि आप उनसे क्यों नहीं पूछतीं जिसे वोट दिया था । आसमान ताकने लगीं ।

यह एक वीआईपी सीट है क्योंकि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह यहीं से सांसद हैं । उन्होंने इस क्षेत्र के लिए क्या किया है इसकी अधिकृत जानकारी तो नहीं है मगर इन्हीं के संसदीय क्षेत्र में पड़ता है खोड़ा जिसकी हालत इतनी दयनीय है । शहर की हालत के लिए अकेले वे ज़िम्मेदार नहीं ठहरा़यें जा सकते । विधायक पार्षद सब हैं । राज्य सरकार है । लेकिन एक सांसद को कोई क्षेत्र क्यों चुनता है । क्षेत्र में उसके कार्य का मूल्याँकन कैसे किया जाए । सुन रहा हूँ कि वे लखनऊ जा रहे हैं । लोगों को उनसे पूछना चाहिए कि सर जाते जाते ये तो बताते जाइये कि यहाँ क्या क्या किया । हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस ने अमेठी का फोटो प्रोफ़ाइल किया था । दो पन्ने का । एक असलीयत सामने आई कि राहुल गांधी ने अपने क्षेत्र के लिए क्या किया । तस्वीरें काफी कुछ बोल रही थीं । कई बार लगता है कि नेता इसीलिए लहर बनाते हैं ताकि उनके काम का कोई हिसाब न माँगे । नेताओं के हसीन पोस्टरों से पटा यह शहर जर्जर लगता है । कहीं इसीलिए राजनाथ सिंह सीट तो नहीं बदल रहे । लोगों को उन पर यहीं से लड़ने का दबाव डालना चाहिए कि हिसाब भी दीजिये और बताइये कि मोदी सरकार में मंत्री बनने के बाद क्या क्या करेंगे । इस शहर में मेरे जैसे कितने बेकार पत्रकार रहते हैं मगर हमें भी तो नहीं दिखता । 


मोड़ माड़ के छतरी बन जायेंगी अटैची

मोहल्ले में एक शौक़ीन चायवाले हैं । मिट्टी के ख़ूबसूरत ग्लास में चाय पिलाते हैं । चाय भी बेहद लगाव से बनाते हैं । मिट्टी के बने लाल ग्लास बेहद ख़ूबसूरत लगते हैं । आज उन्होंने बताया कि बिल्कुल नई छतरी लाया हूँ बैठने के लिए । आप उद्घाटन कर दीजिये । 


दाम तो नहीं बता सके लेकिन कहा कि इस छतरी को आप समेट कर अटैची में बदल सकते हैं । फिर होल्डर पकड़ कर उठा लीजिये और घर ले जाइये । चारों सीटें छोटी हैं मगर फ़ोल्ड हो जाती हैं । 

मैं इस ब्लाग पर वैशाली का प्रोफ़ाइल करते रहता हूँ । कभी सेक्टर चार आयें तो इनकी दुकान पर चाय पीते जाइयेगा । यह भी देखिये कि कोई कैसे आवश्यकताओं को समझ रहा है । पटरीवालों के पास जगह नहीं होती । ये फोल्डिंग छतरी बहुत काम आएगी । 

संविधान और सत्यमेव जयते

अर्से बाद किसी बच्चे सी बेक़रारी से टीवी देख रहा हूँ । दस से ग्यारह राज्य सभा टीवी पर और ग्यारह से बारह स्टार टीवी पर सत्यमेव जयते । ज़माने बाद हमारा रविवार सार्थक सा लग रहा है ।मैंने न्यूज़
चैनल देखना छोड़ दिया था । बल्कि गंभीरता से लोगों से कहता हूँ कि वे इन्हें न देखें । बहुत कुछ अच्छाइयों और संभावनाओं के बाद भी चैनलों को तमाशाई में बदलता देख मेरे पास कुछ करने का यही रास्ता बचा था कि देखूँ ही ना । जब कुछ कर नहीं सकता तो क्यों देखें । मैंने देख है न्यूज़ चैनल लाखों रुपये बेमतलब के कार्यक्रमों में बर्बाद कर देते हैं मगर अच्छे प्रतिभाशाली लोगों को मौक़ा नहीं देस।  और न ही अच्छा कार्यक्रम बनाने के लिए वक्त देते हैं । इसीलिए ये भी नहीं कहता कि आप मेरा शो भी देखिये । 

आप मेरी इस हताशा को नहीं समझेंगे । आपकी प्रतिक्रिया में भी वही घिसापिटी प्रतिक्रिया है । मेरी हताशा इसी बहाने एक और बार निकली है और कई बार निकलेगी । हमने एक बेहद प्रभावशाली माध्यम को निरर्थक बना दिया । मुझे तो देखने वालों की बुद्धि पर भी तरस आता है जो इनदिनों टीवी की बेतुकी बहसों में ख़ुद को उलझा पाते हैं । कई बार सोचता हूँ कि इनमें ऐसा क्या है । क्यों देखते हैं । खैर दर्शक को कैसे दोषी ठहरा सकता हूँ । ख़ुद को क्यों नहीं । स्पीड न्यूज़ देखते वक्त एक दर्शक अपना टीवी क्यों नहीं तोड़ देता । मैं क्यों हताश हूँ । मुझे तो मौक़े भी मिले हैं लेकिन मैं अपने लिए हताश नहीं हूँ । वैसे ख़ुद के लिए भी हूँ ।

राज्य सभा टीवी को संविधान के लिए बधाई । देखने लगा । देखते देखते गला भर आया और आँखें भींग गईं । उसमें रूलाने जैसा कुछ नहीं था फिर भी मैं रोने जैसा रो रहा था । श्याम बेनेगल ने अच्छी शुरूआत की है । संविधान की कथा को एक किस्से में बदला है । उनके पात्रों को देखते सुनते लगा कि इनके सामने कोई देश नहीं था मगर इन सबके दिलो दिमाग़ में एक देश है । आज की सियासत किस निर्लज्जता से किस्से ढूँढ ढ़ूंढ कर हिन्दू मुस्लिम करती है। हर किस्से को झूठ में बदलकर राजनीति करती है । तब तो जिन्ना एक था आज कई जिन्ना खुलेआम घूम रहे हैं । उस जिन्ना का नाम लेकर मुस्लिम जिन्ना पैदा हो रहे हैं और हिन्दू जिन्ना भी । आशा है संविधान की इस कथा में आज का दर्शक उस विमर्श को समग्रता में देखेगा और हिन्दुस्तान के बनने के भाव को आत्मसात करेगा जो हमारे सामने एक किताब के रूप में है । स्वरा ने एंकर का काम एंकरों से भी अच्छा किया है ।

स्टार पर सत्यमेव जयते की शुरूआत में बने मेंटांज के लिए आमिर प्रोडक्शन ने ख़ूब मेहनत की है । देश को जोड़ा है । पूर्वोत्तर के भी शाट्स हैं और लद्दाख के भी । आमिर अपनी हैसियत का लाभ उठाकर उन मुद्दों को अपना कान देकर आवाज़ दे रहे हैं जिन्हें चैनल भी दिखाने की गंभीरता और औपचारिकता दोनों निभाकर छोड़ देते हैं । आमिर इन्हें अपने तरीके से दर्शकों के दिलों दिमाग़ में उतरते हैं । पहले एपिसोड में झकझोरने जैसी बात तो नहीं है मगर किसी जानी हुई बात को फिर से सुनें जाने की ज़िद और गंभीरता दोनों हैं ।

एक दर्शक के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है । रविवार को दो घंटे न्यूज़ चैनलों की सड़ांघ से दूर रहने का मौक़ा मिलेगा । अपने बच्चों को ये दोनों ज़रूर देखने के लिए कहिये । बच्चों से ज़्यादा ज़रूरी है आप ख़ुद देखिये । हमारे देश में दहेज़ लेकर शादी और नौकरी के बाद कई लोग पढ़ना छोड़
देते हैं । देखना भी बंद कर देते हैं । सिर्फ सुनते हैं । सुनकर कुछ भी धारणा बना लेते हैं । अच्छा टीवी देखेंगे तो आपको फायदा होगा । न्यूज़ चैनल तो कब भी नहीं बदलने वाले । 

मस्ती की पाठशाला- राहुल की बाड़शाला

देखने में जो नया लगता है दरअसल वो होता नहीं है । जो राहुल गांधी इनदिनों कर रहे हैं वो अमरीका में नेता करते रहे हैं । जो मोदी ने प्रचार का तरीक़ा अपनाया है वो भी ओबामा की प्रचार रणनीति से टीपा गया है । उसी तकनीक के कुछ बचे हिस्से को राहुल अपनाने चले हैं । एकतरह से दोनों ही रूपों में ओबामा चुनाव लड़ रहे हैं । राहुल गांधी ने बाड़ बनाकर किसानों, कुलियों, महिलाओं और रिक्शेवालों की पाठशाला लगाना शुरू कर दिया है । ये राहुल की बाड़शाला है । इसमें वहाँ मौजूद लोग नेता को तो देख लेते हैं, अपने बीच का भी समझ लेते होंगे मगर चर्चा लायक लेकर लौटते होंगे मुझे़ नहीं लगता । पब्लिक नेता से यह सुनने जाती है कि वह मेरी बात जानता है या नहीं । अपनी सुनाने नहीं जाती ।

इनदिनों ऐसी बाड़शाला की चंंद मिनटों की क्लिपिंग आपने चैनलों पर देखी होगी । राहुल गांधी एक बाड़े के भीतर काॅलर माइक पहने लोगों से घिरे होते हैं । बाड़े में सुरक्षा जाँच के बाद कुछ लोगों को सटा-सटा के बिठाया जाता है । राहुल इनके बीच होते हैं और इनसे सवाल करते हैं । कुछ लोग खड़े होते हैं और सवाल करते हैं । कई बार उल्टे पड़ने वाले सवाल भी और कई बार बचकाने । खुद राहुल वाराणसी रेलवे स्टेशन के बाहर रिक्शेवालों से बचकाने सवाल करते हैं । आप कितने घंटे काम करते हैं । जब बीमार पड़ते हैं तो क्या होता है । ख़र्चा कहाँ से आता है । कोई रिक्शावाला कहता है कि हमारा स्टैंड अलग होना चाहिए । जैसे प्र म बनने के बाद वे स्टैंड भी बनवाने जा रहे हैं । अव्वल तो यह काम नगरपालिका का है लेकिन अच्छा ही है कोई नेता समस्याओं को समझ रहा है ।

मैंने पूरी चर्चा कभी नहीं देखी । जो टीवी में आया उसका थोड़ा अंश था । देखने की नज़र से तो लगता है कि एक नेता लोगों के बीच खड़ा होकर सुन रहा है । सीख रहा है । कितने लोग सीखने का ही दंभ भरते हैं । यह ठीक है कि राहुल लोगों के बीच चले जाते हैं । सुरक्षा का ख़तरा उन्हें भी किसी नेता से कम नहीं है । दिल्ली में जब पूर्वोत्तर के छात्र प्रदर्शन कर रहे थे तब उनके बीच राहुल और केजरीवाल दोनों गए थे । लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन छात्रों को अपने पास बुलाया । वे उनके बीच नहीं गए । एक बड़े से हाल में उन्हें मेज़ कुर्सी पर बिठाया और खुद को उनसे दूरी बनाते हुए । यह दो नेताओं की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति बताता है । लेकिन सारा फ़र्क इसी आधार पर थोड़े न होगा । विश्वसनीयता, अनुभव, उम्मीद और आरोपों के संदर्भ में ही सबकुछ देखा जायेगा । इस प्रयास में उनका नेक इरादा झलक सकता है लेकिन इसका राजनीतिक असर क्या है ।

राहुल की इस बाड़शाला को चैनल वाले शाम को दिखा तो देते हैं मगर जल्दी उतार भी देते हैं ।  संतुलन का लिहाज़ न होता तो इसमें दिखाने लायक कुछ भी नहीं क्योंकि मीडिया मोदी की भी न दिखाने लायक बैठकों को दिखाता है ।  मोदी के प्रति उदार मीडिया छोटे व्यापारियों की बैठकें भी लाइव करता है । अगले दिन उसी दिल्ली में और उसी बैठक में दूसरे नेता भी बोले । शरद यादव कपिल सिब्बल । चेक कीजियेगा । कहीं छपा भी है या नहीं । ख़ैर । संतुलन के लिहाज़ से राहुल की इस बैठक को जगह तो मिल जाती है मगर इसमें कोई टांकिंग प्वाइंट नहीं होता । कोई राजनीतिक संदेश नहीं होता । शायद राहुल के रणनीतिकार इसके ज़रिये टीवी के स्पेस में एक नया नेता लाँच करना चाहते हैं । इससे वे अपने वोटर और कार्यकर्ता दोनों को ही कंफ्यूज़ कर रहे हैं । उनके कपड़ों में भी मोदी के कुर्ते की रंगीनीयत और ताज़गी नहीं है और सादगी को कांग्रेसी संदेश में नहीं बदल पाते । इससे जनता को कोई फ़र्क नहीं पड़ता । जनता को फ़र्क पड़ता है राजनीतिक बात से । 

इसीलिए राहुल की यह क़वायद अच्छी होते हुए भी बेकार है । यही तरीक़ा चुनाव से कई महीने पहले चल सकता था । चुनाव के आख़िरी दो महीने में यह थसक गया है । इसका एक कारण राहुल ख़ुद हैं । अगर मोदी ये करते तो रिक्शेवालें के बीच प्रोफेसर बनकर जाते । सारी जानकारी जमा करते और उनको उन्हीं की बात बता कर चकित कर जाते । छोटी बैठक का भी ऐसा राजनीतिक इस्तमाल करते कि दो दिनों तक हेडलाइन होती । बहस होती । कुछ चीन और अमरीका भी मिला देते। कह देते कि सबको एटीएम कार्ड मिलना चाहिए । एटीएम कार्ड में ही ब्लड ग्रुप लिखा होगा ताकि कोई मोटरवाला मारकर चला जाए तो जान बच सके । उसी में बीमा होगा और वही आधार । वे काल्पनिक कहानियाँ बना देते । जबकि ऐसा भी नहीं है कि ये सब मुमकिन नहीं है । राहुल हर मौक़ा गँवा देते हैं मोदी हर मौक़े का लाभ उठाते हैं ।

राहुल बाड़े में लाए लोगों से बेहद बुनियादी सवाल कर रहे हैं । उनके रोज़मर्रा के सवाल जिनसे कोई राजनीतिक भाषा नहीं बनती । मौजूदा राजनीतिक विमर्श में हस्तक्षेप नहीं होता । उल्टा असर ये बनता है कि देखो इसे ये भी नहीं मालूम । कोई पंच नहीं है । आख़िर इस बाड़-बैठक ( एनक्रोचमेंट मीटिंग) का कुछ राजनीतिक मतलब तो होना चाहिए । यह बैठक किसी लायक नहीं है क्योंकि करने वाले में दम नहीं है । इस वक्त जब एक एक मिनट क़ीमती है राहुल अपना वक्त जाया कर रहे हैं । ल्युटियन दिल्ली के अंग्रेज़ी अख़बार के सम्पादकों की तरह चुनाव के समय इंडिया को समझने निकले हैं । 

पहले भी कह चुका हूँ कि राहुल गांधी यह चुनाव लड़ ही नहीं रहे हैं । ठीक है कि हार तय है और इसकी एक वजह वे ख़ुद हैं( मनमोहन के अलावा) । लेकिन ये सब आप तब करते हैं जब आपके पास पर्याप्त समय है । वे सेमिनार कर रहे हैं । अच्छा लगता है कि नेता जनता के बीच है । मगर बीच में होने के प्रचलित साइकिल यात्रा, पदयात्रा और रोड शो से क्या अलग है । देखियेगा बीजेपी उनकी इस क़वायद को भी धो देगी । इंतज़ार कीजिये मोदी क्या बोलते हैं । राहुल ने जब कालेजों में जाना शुरू किया, दलितों के घर खाने से लेकर ट्रेन में चलना शुरू किया तो बीजेपी ने उसी पे हमला कर दिया । इतना हमला किया कि राहुल ने उसे छोड़ ही दिया । राहुल को भगाकर बीजेपी खुद करने लगी । शिवराज दलित घर में खाते हुए फोटू खिंचाने लगे तो वसुंधरा ट्रेन के सेकेंड क्लास डिब्बे में सवार होकर फोटू खिंचाने लगीं । मोदी ख़ुद राहुल की तरह देश के कालेजों में घूमने लगे । इतना घूमे कि अब लगता है कि ये आइडिया मोदी का ही था ।  दरअसल मनोवैज्ञानिक युद्ध में बीजेपी राहुल को जब चाहती है तब हरा देती है । वे हार जाते हैं । 

इसीलिए राहुल गांधी को इस चुनाव में प्रचार छोड़ देना चाहिए । किसी टीवी चैनल में रिपोर्टर बनकर मोदी की रैली कवर करनी चाहिए । सीखना चाहिए । राजनीति में स्टंट ज़रूरी है । ये सब बेकार की बातें हैं कि उनकी रैलियों में इतने महीनों में कितने ख़र्च हो गए होंगे । क्या कोई यह जानकर वोट देने का मत बदलता है । क्या कांग्रेस की रैलियां फ़्री में होती है । पैसे सब ख़र्च करते हैं और कांग्रेस बीजेपी दोनों अपने खर्चे का सोर्स नहीं बताते हैं । दोनों एक हैं तो एक जैसा करने में शर्म काहे । कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस के कार्यकर्ता भी भाग गए हैं और राहुल के पास बाड़शाला लगाने का ही विकल्प बचा है ।

मोदी मनोवैज्ञानिक असर डालने में लखनऊ में कितनी बड़ी रैली कर रहे हैं । इसका उद्देश्य है कि सबसे बड़ी रैली करो ताकि सबको दिखे कि यूपी में भाजपा कितनी बड़ी हो गई है और कांग्रेस इतनी छोटी कि राहुल को बाड़े में बुलाकर भाषण देना पड़ रहा है । मोदी के नेता टीवी पर खुलकर बोल रहे हैं कि मायावती की रैली के लिए उन्नीस ट्रेनें बुक हुई थीं। हमने उससे दस ज़्यादा ट्रेनें बुक की हैं । 15 जनवरी को लखनऊ में मायावती ने बड़ी और भव्य रैली की थी मगर मीडिया ने उसे छोटी रैली की तरह छापा और दिखाया । देखियेगा मोदी की रैली की भीड़ पर कितनी बातें होंगी । ये है मोदी का चुनावी मनोवैज्ञानिक मीडिया मैनेजमेंट । 

मोदी जी को बधाई । उन्होंने मनोवैज्ञानिक तरीके से कांग्रेस और राहुल को तोड़ दिया है । इतना तोड़ दिया है कि राहुल छोटे छोटे समूहों में बुलाकर रैली की जगह स्कूल जाने जैसा काम कर रहे हैं जबकि मोदी की रैलियों में लोग एक ऐसे नेता को सुनने के लिए आ रहे हैं या लाये जा रहे हैं जो कालेज में टाप करके ज़िले में घूम घूम कर भाषण दे रहा हो । मैं हार स्वीकार लेने की राहुल की ईमानदारी की भी सराहना भी करता हूँ । दस साल बाद यही सब उनके  राजनीतिक बा़योडेटा को मज़बूत करेगा तब जब मोदी उन्हें इस लायक छोड़ेंगे । इसीलिए आलोचना हो या सराहना सब मोदी की तरफ़ है । इसीलिए मैं भी मोदी को ट्रैक करता हूँ । राहुल गांधी आउट आफ़ दि ट्रैक हैं । 

राजनीति में ब्रांड एंडोर्समेंट

मैं पी टी उषा बोल रही हूँ । अजय माकन ने खेल और मेरी अकादमी के लिए बहुत कुछ किया है । माकन के कामों का विवरण देती हुई पी टी उषा कहती हैं कि मैं अजय माकन को सलाम और सपोर्ट करती हूँ । अच्छा बंदा है ।

आज शाम रेडियो एफ एम 98:30 पर पी टी उषा की आवाज़ सुनकर लगा कि वे अजय माकन को वैसे ही सपोर्ट कर रही हैं जैसे उनके जैसी कोई हस्ती साबुन सर्फ़ और मंजन के ब्रांड में अपनी आस्था जाता है । जिससे लोगों को लगे कि अगर तेंदुलकर पेप्सी को और पी टी उषा माकन को सपोर्ट कर रही हैं तो आज़मा कर देखना चाहिए । अभी तक सेलिब्रेटी सामानों का ब्रांड एंडोर्समेंट करते रहे हैं । एक इंसान दूसरे इंसान का समर्थन करता ही होगा मगर अगर हम पहली बार का तमग़ा लगाने से बचे तो ये इस बार हो रहा है। 

अगर सुनने में कोई कमी रह गईं हो तो अलग बात है मगर पी टी उषा ने अजय माकन के सा़थ कांग्रेस का नाम नहीं लिया । अजय माकन ने सिर्फ अपने कामों के ज़रिये अपनी तारीफ़ करवाई । अगर ये चल गया तो बहुत से पुराने सेलिब्रेटी को अच्छा काम मिल सकता है । इससे पहले आप लोगों ने देखा होगा कि राहुल गांधी के विज्ञापन में युवा कार्यकर्ता अपने नेता के लिए ब्रांड एंडोर्समेंट कर रहे थे । मैं हसीबा अमीन या मैं गिरी । अपनी ही पार्टी का कार्यकर्ता अपने नेता की ब्रांड पोजिशनिंग कर रहा है । 

आमतौर पर ऐसे चुनावी विज्ञापनों में अनजान लोग इस्तमाल किये जाते थे । लेकिन अब इन चेहरों की पहचान दी जा रही है । मीडिया युग में नेता एक ब्रांड की तरह है । उत्पाद है । वो अब खुद नहीं बिकेगा । किसी न किसी को बेचना पड़ेगा। हसीबा अमीन को या पी टी उषा को ।

दूसरी तरफ़ मोदी अपने काम को खुद ही बेच रहे हैं । उनका ब्रांड में रूपांतरण हो चुका है । इसलिये वे अब शिव खेड़ा की तरह ज्ञान और विचार बेच रहे हैं । कहते हैं हमें शहरीकरण को चुनौती की तरह नहीं देखना चाहिए । संभावना की तरह देखना चाहिए । उनकी नज़र में  चुनौती और संभावना में ऐसा फ़र्क तो है ही जो हम नहीं समझ पाते । क्या चुनौती की तरह से देखने में संभावना शामिल नहीं है । क्या चुनौती की नज़र का ये मतलब होता है कि सब बुरा है । संभावना की नज़र से देखने में चुनौती नहीं होती । बस जुमला गढ़ देना है । कोई खुद को ब्रांड बनाकर सामान बेच रहा है तो किसी का सामान नहीं बिकने पर खुद को ब्रांड बनवा रहा है । एंडोर्समेंट करवा रहा है । 

मोहल्ले के पोस्टर: नई जगह में पुरानी पहचान

विरासत की राख़ के ढेर पर

आदरणीय मनमोहन जी,

इस चुनाव में एक अदना सा रिपोर्टर भी चुनावी शोरशराबे से परेशान है । कभी मोदी से तो कभी केजरी और कभी उससे जिसके नेतृत्व में आप काम करने को तैयार थे जिसे आपने किसी काम लायक न छोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी । एक ही शख़्स है जो न तो ख़ुद परेशान है और न जिसे लेकर कोई और परेशान है । उसका नाम ग़ज़ब तरीके से आपसे मिलता है । आप ही हो । ऐसा चुनावी एकांत तो आडवाणी को भी नसीब नहीं । गाहे बगाहे उनका भी नाम आ जाता है । वे कहीं शिलान्यास लोकार्पण करते दिख जाते हैं । पर आप तो ।

एक आइटम होता है जिसे सत्ता खा जाती है पर आप वो हो जो सत्ता को खा जाए । एक एक दिन गिनकर खाते रहे और अब लगता है चुपचाप अंत अंत तक खाने में मगन हैं । एक नेता वो होता है जो सत्ता के लिए संघर्ष करता है । एक नेता वो होता है जो सत्ता के लिए सहता है । आपने सहने और भोगने की जो मिसाल पेश की है उसका मनवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाना चाहिए । आप क्या हो । जानना ज़रूरी है ।

दस साल का ऐसा रिकार्ड पेश किया है जिसे ठीक तरीके से समझने के लिए आपसे उम्र में आधे आपके नेता को आपकी उम्र तक चलते रहना होगा । एक ऐसा नेता जो एक साथ अपनी सरकार और पार्टी को ख़त्म कर दे और उसकी कुर्सी हिले भी नहीं , ऐसे नेता का विशेष मूल्याँकन करना चाहिए । मैं उस अदृश्य शक्ति का शुक्रगुज़ार हूँ जिसने आपको बनाये रखा । बल्कि मेरी नरेंद्र मोदी से एक राजनीतिक शिकायत यह भी है कि वे कांग्रेस को ख़त्म करने का श्रेय आपको नहीं देते । आपका वाजिब हक़ तो बनता है । आख़िर कोई सत्ता में क्यों रहना चाहेगा और रहेगा तो कुछ करने के लिए या सिर्फ रहने के लिए । नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा कि जब मक़सद पूरा न हो तो सत्ता में रहना क्यों ज़रूरी है । छोड़ दो भाई ।

तब से मैं सोच रहा हूँ िक पराजय मुख पर खड़ी कांग्रेस ने भी कभी मनमोहन सिंह से ये नहीं कहा । सोनिया और मनमोहन के बीच तनाव की ख़बरें भी आईं । राहुल गांधी ने अध्यादेश तक फाड़ दिया मगर आप नहीं हिले । एक बार भी नहीं कहा कि इस्तीफ़ा दे रहा हूँ । प्रणब दादा आपकी कुर्सी तक पहुँचने की सारी उम्मीदें छोड़ दूसरी कुर्सी के लिए चले गए । आप कांग्रेस और सरकार के बीच सत्ता के पहले केंद्र बने रहे । एक ऐसी सरकार चलाई जिससे जनता बाग़ी हो गई । फिर भी कांग्रेस आपको ढोती रही । जानते हुए कि आपको ढोने का मतलब बनवास है । सब इतनी खुशी से आपको सहते रहे और आप सत्ता को । 

आप ठीक कहते हैं आपका मूल्याँकन इतिहास ही कर सकता । वर्तमान में लोग आपको हटाने के जुनून में इस कदर 'अगिया बैताल' हैं कि मेरे अलावा किसी के पास आपके मूल्याँकन का वक्त तक नहीं । आपने अपने हटने का वक्त ख़ुद तय किया है । कोई हटा नहीं रहा है । आपकी ईमानदारी इंकम टैक्स रिटर्न पेपर में नहीं है । वो कहीं और है । 

काश कि कोई बता पाता कि कहीं आप उसी अदृश्य शक्ति के कृपा पात्र तो नहीं जो अ से शुरू होती है । राजनीति बिना साज़िश प्रमेय के होती नहीं है । आप या तो किसी की साज़िश का हिस्सा हो या कोई आपकी साज़िश का नतीजा है । क्या सरकार चलाई है आपने । कल को कोई जैसी भी चलाये आपसे बेहतर चलायेगा । कांग्रेस को ख़त्म करने का श्रेय आपको इतिहास ही देगा । एक ऐसा नेता जिससे सुनने के लिए किसी रैली में दो हज़ार लोग भी नहीं आए वो दस साल प्रधानमंत्री बनकर जा रहा है । आप ज़रूर नरेंद्र मोदी को देखकर हैरान होते होंगे । कभी उनसे कहियेगा भाई नरेन्द्र मुझे तो पता ही नहीं था कि प्र म बनने के लिए इतनी रैलियाँ करनी होती हैं, रैलियों में इतना बोलना या फेंकना पड़ता है , इतने तरह के कुर्ते और पगड़ी पहननी पड़ती है, रोज़ विज्ञापन देना होता है, किताब लिखना और लिखवाना होता है, रोज़ ट्वीट करना होता है । अगर मुझे ये पता होता कि प्र म बनने के लिए इतना कुछ करना होता है तो कभी न बनता ! सही में आपको हटाने के लिए आडवाणी बर्बाद हो गए । नरेद्र मोदी हर सीट पर जाकर लड़ रहे हैं । आप हो कि अपनी सीट पर बैठे रह गए । 

कोई तो वजह है जो कांग्रेस ने आपको मंज़ूर किया या आपने करवा दिया । इतिहास में आपकी बारी देर से आएगी । अभी तो राजीव गांधी, अटल जी, गुजराल और नरसिम्हा राव तक का मूल्याँकन शुरू नहीं हुआ । शायद इसीलिए वर्तमान इतना उतावला है । आप न होते तो नरेंद्र मोदी इतनी आसानी ( मेहनत पढ़ें) से न जीतते । आप अपने वर्तमान को भी इतिहास की तरह जीते हैं । 

कमाल हो सर । बस इतिहास के लिए बता देते कि क्यों टिके रहे कुर्सी पर । अ से शुरू होने वाली अदृश्य शक्ति है या वो शक्ति म से ही शुरू होती है । और हाँ आप जिनके नेतृत्व में काम करने जा रहे हैं काश वो आपके नेतृत्व में कुछ दिन काम कर पाते । जाने दीजिये । इस देश में अकेला मैं हूँ जो आपकी तारीफ़ करता हूँ । ऐसा नेता नहीं देखा जो अपनी विरासत की राख़ पर बैठा हो । मेरी दिक्क्त है कि मेरी व्यंग्यात्मक ख़त को कोई पढ़ता नहीं । पर लिख तो सकता हूँ न । 

आपका 

रवीश कुमार