ना भाई ना

लिख चुके हैं फिर भी हमारी बिरादरी से कोई दाँत चियारते हुए फ़ोन करता है कि आप आदमी पार्टी में जा रहे हैं तो लगता है कि इस मूर्ख से बात क्यों कर रहा हूँ । अव्वल तो शर्म आनी चाहिए कि आप किसी को बिना वजह किसी दल से जोड़ दे रहे हैं या इसी बहाने ख़ुद जोड़ कर देखे जाने की ख़्वाहिश को हवा दे रहे हैं । 

राजनीतिक दलों से जुड़े लोग भी एक रणनीति के तहत हवा दे रहे हैं ताकि आम आदमी पार्टी के कवरेज को प्रोपैगैंडा क़रार दिया जाए । ताकि वे लोगों के सामने गिड़गिड़ा सकें कि टीवी वाले हमें नहीं दिखाते थे । फ़ुटेज नपवाइये तो ज़रा कि इस देश में किन दलों को ज़्यादा कवरेज मिलता रहा है । झूठ की भी हद होती है । देश में अनेक दल हैं । उनको टीवी ने कब दिखाया । कितना दिखाया और कैसे दिखाया । बड़े दलों को लगता है कि मीडिया उनकी ज़मींदारी का बेगार हैं । अब उनका खेत भूमिहीन कैसे जोत रहा है । मीडिया कोरपोरेट तो उनके क़रीबी हैं । उनके मालिकों को राज्य सभा सांसद बनवाते रहे हैं । 

बड़े दल के कुछ चिरकुट टाइप के लोगों को इसमें मज़ा आ रहा है । कुछ नेताओं की दुकान ही चलती है दूसरे की साख मिटा कर । लेफ़्ट,बीएसपी, कांग्रेस, आप भी बीजेपी !, और अब आप । इतने दलों का मैं समय समय बताया गया हूँ । हद है यार । जब मन करता है कांग्रेसी जब मन किया आपाई भाजपाई बसपाई । 

सोशल मीडिया पर चार तस्वीर डाल कर कितना ब्लैकमेल कीजियेगा । बाहुबली पैदा करने की नई मशीन है क्या ये । रिलैक्स कीजिये । मैं कहीं नहीं जानेवाला कितनी बार कहें भाई । ढेर तेला-बेला मत करअ लोग । आप के कवरेज से टेंशन हो गया तो अपना दर्द कहिये । जब एक मुख्यमंत्री अपनी चुनावी सभी में एक अख़बार प्रमोट कर रहे थे तब किसने सवाल किया था ।चुनावों में जब पेड मीडिया उभरा तो क्या आपने उस पार्टी का झोला ढोना बंद किया जो पैसे के दम पर ख़बरें ख़रीद रही थी । कितने ऐसे अख़बारों को पढ़ना बंद किया आपने । ड्रामेबाज़ अफ़वाही कहीं के । जब कांग्रेस बीजेपी में पत्रकार राज्य सभा के ज़रिये घुस रहे थे तब भी अरविंद केजरीवाल ही थे क्या । वाजपेयी जी तो खुद वीर अर्जुन से आए । हज़ार नेता अख़बार से राजनीति में गए हैं । 

कौन किस संदर्भ में राजनीति में प्रवेश कर रहा है इसमें फ़र्क करेंगे या सब धान बाइस पसेरी । इतना क्या बवाल है । आप में पत्रकार का जाना ग़लत है तो कांग्रेस बीजेपी अपने यहाँ के पत्रकारों को निकाल देगी क्या या दोनों का मूल्याँकन उनके जीवन के अलग अलग हिस्सों के आधार पर करेंगे । गए वो हैं और सफ़ाई मैं दे रहा हूँ । आप के कवरेज से इतना भी टेंशन मत खा जाइयेगा कि अपनी पार्टी का सिंबल बदल कर अलग अलग रंग का झाड़ू ही करने लगें । अरे राजनीति कीजिये । अफ़वाह मत उड़ाइये । भरोसा रखिये खुद में और अपनी पार्टियों में । अब फ़ोन मत कीजियेगा । चिल्ल यार ! 

पोस्टर दर पोस्टर


















मोदी गुजरात और राज मराठा !

किरण बेदी ने अपने गुप्त मतदान को उजागर कर सिर्फ अपनी पसंद ज़ाहिर नहीं की है बल्कि टीवी की बहस में छाये केजरीवाल को रोक कर मोदी और उनके विकल्प को चर्चा के केंद्र में ला दिया है । बेदी पर नाहक हमले किये जा रहे हैं । उन्हें अपने वक्त से अपनी पसंद बताने का पूरा हक़ है । बल्कि इससे पहले भी वे नमो की ट्टीटर पर तारीफ़ कर चुकी है । इस बार की स्वीकृति उस रणनीति का भी हिस्सा है जिसके तहत ये संदेश दिया जा रहा है कि अच्छे लोग सिर्फ आम आदमी पार्टी से ही नहीं जुड़ रहे हैं । वैसे मोदी को चर्चा में लाने के लिए बेदी की ज़रूरत नहीं है लेकिन चुनावी रणनीतियों के तहत ये सब होते रहता है । क्या आपने यह सोचा कि राज ठाकरे ने अचानक मोदी को नसीहत रूपी चुनौती क्यों दे दी । नसीहत रूपी चुनौती इसलिए क्योंकि उन्होंने कहा कि मैं मोदी के काम की तारीफ़ करता रहा हूँ । अब भी करता हूँ और आगे भी करता रहा हूँ । 

इस सवाल को लेकर मैंने अपने सहयोगी प्रसाद काथे से बात की और फिर गूगल सर्च किया । प्रसाद ने कहा कि मुंबई में मोदी की रैली महाराष्ट्र के इतिहास की बड़ी रैलियों में एक तो गिनी ही जाएगी । राजनाथ सिंह ने तो बाल ठाकरे का नाम भी लिया मगर मोदी ने एक बार भी नहीं । तो मैंने कहा कि ठीक है शिवसेना सहयोगी है लेकिन रैली तो बीजेपी की थी । फिर ध्यान आया कि तब राजनाथ सिंह ने नाम क्यों लिया और मोदी ने क्यों नहीं । ( मैंने मुंबई रैली का भाषण नहीं सुना है) गूगल बताता है कि अगले दिन शिव सेना के अख़बार सामना में उद्धव ठाकरे ने तंज किया कि रैली को लेकर मुंबई के गुजराती और हिन्दुत्ववादी काफी उत्साहित थे जिन्हें आकर्षित करने के लिए राजधानी भर में महँगे और अच्छे होर्डिंग लगाये गए थे ।

हिन्दुत्ववादी को ध्यान में रखियेगा । पहले देखते हैं कि मोदी ने क्या कहा । मुंबई गुजरातियों का दूसरा घर है । उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा सौराष्ट्र कच्छ और सूरत के विकास में लगा है । ( पहली बार मोदी ने माना कि गुजरात में दूसरे राज्यों का भी ख़ून पसीना लगा है ! ) मोदी ने कहा कि विकास में गुजरात को गोल्ड मेडल मिला है और महाराष्ट्र काफी पीछे रह गया है । वे जब सरकार में आयेंगे तो ब्लैक मनी वापस लायेंगे । उम्मीद है कुछ अपवाद को छोड़ उस सूची में मराठियों का नाम नहीं होगा । मराठी ईमानदार होते हैं ।( चलिये काले धन की सूची से मराठी बाहर हो गए, तो क्या बिहारी यूपी गुजराती !?)  मोदी ने निश्चित रूप से महाराष्ट्र के बहाने वहाँ की कांग्रेस एनसीपी सरकार की आलोचना की लेकिन दोनों ठाकरे ने महाराष्ट्र के एंगल से उनकी बात को दिल पे क्यों ले लिया । 

सहयोगी का मतलब यह नहीं कि अपनी राजनीतिक ज़मीन किसी को सौंप देना । उद्धव ने रैली में गुजराती और हिन्दुत्ववादियों के होने को क्यों रेखांकित किया ? गुजराती और हिन्दुत्ववादी में फ़र्क क्यों क्या ? क्या हिन्दुत्ववादी में मराठी नहीं थे क्या गुजराती नहीं होंगे । जवाब आसान है । कर्नाटक चुनाव के वक्त सामना ने मोदी के बारे में लिखा था कि वे हिन्दुत्व से भटक रहे हैं । मोदी के पैकेज में हिन्दुत्व, विकास, मज़बूत नेतृत्व सब है जिसका ब्रांड नाम वन इंडिया है । शिव सेना को लगता है कि मोदी उग्र हिन्दुत्ववादी नहीं है शिव सेना है । क्या उद्धव ये कहना चाहते थे कि मोदी की रैली में उनके समर्थक गए ।

रैली तो बड़ी थी । ज़ाहिर है शिव सेना और मनसे को अपना आधार मोदी के पीछे जाते लग रहा है । मनसे को लग रहा है कि इस चुनाव में भी अगर लोक सभा की एक सीट न मिली तो लोग सवाल करेंगे । विधानसभा में उसके तेरह विधायक तो है हीं । इसलिए महाराष्ट्र के भीतर हिन्दुत्व के स्पेस में मोदी के सबसे बड़े दावेदार के रूप में उभरने के संदर्भ में राज और उद्धव के बयानों को देखा जाना चाहिए । जिस नाशिक से राज ने बयान दिया वहाँ बीजेपी के समर्थन से मनसे का मेयर है । बीजेपी की स्थानीय ईकाई ने समर्थन वापसी की चेतावनी दी है । महाराष्ट्र में मनसे के पास एक ही मेयर है । 

नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल होने वाले राज ने ऐसा सवाल दागा कि बीजेपी चुप है । जिस दिन मोदी को पीएम का उम्मीदवार घोषित किया गया उसी दिन उन्हें सीएम पद छोड़ देना चाहिए था । बात तो क़ायदे की लगती है मगर क्या राज मोदी को इतना मासूम समझते हैं । ठीक है कि उन्हें भरोसा है कि वे पीएम बन रहे हैं । अपने भाषणों में भी वे खुद को पीएम मान कर ही चलते हैं लेकिन सीएम पद क्यों छोड़े भाई ? गुजरात चल रहा है न । किसी गुजराती ने को नहीं कहा कि मोदी इतना बाहर रहते हैं कि राज्य नहीं चल रहा ! 

ठाकरे बंधु एक हद से ज़्यादा मोदी के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते । राज को ज़रूर चिंता होगी या लग रहा होगा कि मोदी उनके साथ समझौता नहीं करेंगे । सीधे तौर पर तो बिल्कुल नहीं । एकाध सीट छोड़ दें अलग बात है । जब मोदी के राजकीय अतिथि बनकर वे चर्चा में आ रहे थे तब क्या वाक़ई राज को नहीं लगा होगा कि मोदी महाराष्ट्र में दोनों बंधुओं की ज़मीन पर भी पसर सकते हैं । क्यों राज को कहना पड़ा कि पीएम उम्मीदवार के तौर पर मोदी को सभी राज्यों के साथ समान बर्ताव करना चाहिए । गुजरात गुजरात नहीं करना चाहिए । मोदी ने तो अन्य राज्यों में भी गुजरात गुजरात किया है । राज ने कहा कि महाराष्ट्र में आकर मोदी ने गुजरात और सरदार पटेल के बारे में बोला । शिवाजी महाराज के बारे में बोलते तो उचित रहता । वैसे पाँच जनवरी के इकोनोमिक्स टाइम्स में ख़बर छपी है कि मोदी ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में कहा है कि "शिवाजी ने सूरत को नहीं लूटा था । सूरत में औरंगज़ेब के ख़ज़ाने को लूटा था । शिवाजी महाराज सिर्फ योद्धा ही नहीं अच्छे प्रशासक थे जो आज भी प्रासंगिक है । शिवाजी महाराज के इस पहलु को नज़रअंदाज़ किया गया है ।" राज ठाकरे की प्रेस कांफ्रेंस आठ जनवरी को हुई है । 

ज़ाहिर है हिन्दुत्व के स्पेस में यह की दावेदारों का झगड़ा है जिसमें से दो एक ही घर से आए हैं और तीसरा बाहर से आ गया है । राज ने मोदी को चुनौती देकर मराठी अस्मिता को उभारने का प्रयास किया है जिसके इतिहास में साठ के दशक का संयुक्त महाराष्ट्र अभियान का वो दर्द भी है जिसमें गुजराती मूल के मेरारजी देसाई के गोली चलाने के आदेश से हुई एक सौ पाँच लोगों की मौत शामिल है । मुंबई में इन शहीदों की याद में एक हुतात्मा चौक भी है । हमारी सहयोगी शिखर त्रिवेदी ने किसी और प्रसंग में कहा था कि कोई भी राजनीति अपने राज्य के इतिहास को नहीं भूलती है । जब महाराष्ट्र गठन का पचास साल हुआ था तब गणपति के पंडालों में उस दौर से संघर्षों की चित्रावलियां बनाईं गईं थीं । बात कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है । अभी अभी एक टिप्पणी आई है जिसे मैं इस लेख में जोड़ रहा हूँ । मोरारजी देसाई ने गोली चलाने के आदेश दिये तो उसमें गुजराती छात्र मारे गए और पूरे गुजरात में उनके ख़िलाफ़ आंदोलन भड़क गया था । मोदी से उनके अपने भी लड़ रहे हैं !

क्या मैं भी

पिछले कुछ दिनों से अपने बारे में चर्चा सुन रहा हूँ । आस पास के लोगों का मज़ाक़ भी बढ़ गया है । क्या तुम भी 'आप' हो रहे हो । आशुतोष ने तो इस्तीफ़ा दे दिया । तुम्हारा भी नाम सुन रहे हैं । एक पार्टी के बड़े नेता ने तो फ़ोन ही कर दिया । बोले कि सीधे तुमसे ही पूछ लेते हैं । किसी ने कहा कि फ़लाँ नेता के लंच में चर्चा चल रही थी कि तुम 'आप' होने वाले हो । साथी सहयोगी भी कंधा धकिया देते हैं कि अरे कूद जाओ । 

मैं थोड़ा असहज होने लगा हूँ । शुरू में हंस के तो टाल दिया मगर बाद में जवाब देने की मुद्रा में इंकार करने लगा । राजनीति से अच्छी चीज़ कुछ नहीं । पर सब राजनेता बनकर ही अच्छे हो जायें यह भी ज़रूरी नहीं है । ऐसा लगा कि मेरी सारी रिपोर्ट संदिग्ध होने लगी है । लगा कि कोई पलट कर उनमें कुछ ढूँढेगा । हमारा काम रोज़ ही दर्शकों के आपरेशन टेबल पर होता है । इस बात के बावजूद कि हम दिनोंदिन अपने काम में औसत की तरफ़ लुढ़कते चले जा रहे हैं, उसमें संदिग्धता की ज़रा भी गुज़ाइश अभी भी बेचैन करती है । उन निगाहों के प्रति जवाबदेही से चूक जाने का डर तो रहता ही जिसने जाने अनजाने में मुझे तटस्थ समझा या जाना । कई लोगों ने कहा कि सही 'मौक़ा' है । तो सही 'मौक़ा' ले उड़ा जाए ! दिमाग़ में कैलकुलेटर होता तो कितना अच्छा होता । चंद दोस्तों की नज़र में मैं भी कुछ लोकप्रिय (?) हो गया हूँ और यही सही मौक़ा है । क्योंकि उनके अनुसार एक दो साल में जब मेरी चमक उतर जाएगी तब बहुत अफ़सोस होगा । मेरा ही संस्थान नहीं पूछेगा । मुझे पत्रकारिता में कोई नहीं पूछेगा । लोग नहीं पहचानेंगे । मेरे भीतर एक डर पैदा करने लगे ताकि मैं एक 'मौके' को हथिया सकूँ । तो बेटा आप से टिकट मांग कर चुनाव लड़ लो । हमारे पेशे में कुछ लोगों का ऐसा कहना अनुचित भी नहीं लगता । हम चुनें हुए प्रतिनिधियों के संगत में रहते रहते खुद को उनके स्वाभाविक विस्तार के रूप में देखने और देखे जाने लगते हैं । यह भ्रम उम्र के साथ साथ बड़ा होने लगता है । कई वरिष्ठ पत्रकार तो मुझे राज्य सभा सांसद की तरह चलते दिखाई देते हैं । तो मैं भी ! हँसी आती है । मुझे यह मुग़ालता है कि इस भ्रम जाल में नहीं फँसा हूँ और चमक उतर जाने का भय कभी सताता भी नहीं । जो जाएगा वो जाएगा । इसलिए जो आया है उसे लेकर कोई बहुत गदगद नहीं रहता । न हीं कोई काम यह सोच कर करता हूँ िक तथाकथित लोकप्रियता चली जाएगी । जाये भाड़ में ये लोकप्रियता । 

इसका मतलब यह नहीं कि राजनीति को किसी और निगाह से देखता हूँ । इसका मतलब यह भी नहीं कि हम पत्रकारिता ही कर रहे हैं । पत्रकारिता तो कब की प्रदर्शनकारिता हो गई है । जब से टीवी ने चंद पत्रकारों के नाम को नामचीन बनाकर फ़्लाइओवर के नीचे उनकी होर्डिंग लगाई है, भारत बदलने वाले उत्प्रेरक तत्व( कैटलिस्ट) के रूप में, तब से हम अपने पेशे के भीतर और कुछ दर्शकों की नज़र में टीवी सीरीयल के कलाकारों से कुछ लोकप्रिय समझे जाने लगे हैं । नाम वालों का नामचीन होना कुछ और नहीं बल्कि समाप्त प्राय: टीवी पत्रकारिता की पुनर्ब्रांडिंग है । इसलिए कोई पत्रकार टीवी छोड़ दे तो बहुत अफ़सोस नहीं किया जाना चाहिए । राजनीति असीम संभावनाओं का क्षेत्र है । टीआरपी की दासी है पत्रकारिता । बीच बीच में शास्त्रीय नृत्य कर अपनी प्रासंगिकता साबित करती हुई आइटम सांग करने लगती है । 

अच्छे लोगों को राजनीति में प्रतिनिधि और कार्यकर्ता दोनों ही बनने के लिए आना चाहिए । आम आदमी पार्टी के बारे में पहले भी लिखा है कि इसके कारण राजनीति में कई प्रकार के नए नए तत्व लोकतंत्र का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं । समय समय पर यह काम नई पार्टियों के उदय के साथ होता रहा है । मगर जिस स्तर पर आम आदमी पार्टी ने किया है वैसा कभी पहली बार कांग्रेस बन रही कांग्रेस ने किया होगा । मेरी सोसायटी के बच्चे भी लिफ़्ट में कहते हैं कि अंकल प्लीज़ अरविंद केजरीवाल से मिला दो न । मेरी बेटी कहती है कि सामने मिलकर सच्ची में आटोग्राफ लेना है । अरविंद को सतर्क रहना चाहिए कि उन्हें इन उम्मीदों को कैसे संभालना है । अरविंद ने राजनीति को सम्मानजनक कार्य तो बना ही दिया है । इसलिए उन पर हमले हो रहे हैं और हमले करने वाले उनके नोट्स की फोटोकापी करा रहे हैं । सस्ते में नंबर लाने के लिए । 


जहाँ तक मेरा ताल्लुक़ है मैं उस बचे खुचे काम को जिसे बाज़ार के लिए पत्रकारिता कहते हैं अंत अंत तक करना चाहता हूँ ताकि राजनीति का विद्यार्थी होने का सुख प्राप्त करता रहूँ । टीवी में महीने में भी एक मौक़ा मिल जाता है तो असीम संभावनाओं से भर जाता हूँ । कभी तो जो कर रहा हूँ उससे थोड़ा अच्छा करूँगा । राजनीति जुनून है तो संचार की कला का दीवानापन भी किसी से कम नहीं । हर किसी की अपनी फ़ितरत होती है । राजनीति को आलोचनात्मक नज़र से देखने के सुख को तब भी बचाकर रखना चाहता हूँ जब दर्शकों की नज़र से मैं 
उतार दिया जाऊँगा । 

मैं वर्तमान का कमेंटेटर हूँ, नियति का नहीं और वर्तमान का आंखो देखा हाल ही बता रहा हूँ । मैंने कभी आम आदमी पार्टी की रिपोर्टिंग इस लिहाज़ से नहीं की कि इसमें मेरे लिए भी कोई संभावना है । बल्कि मैंने इसमें राजनीति के प्रति व्यापक और आलोचनात्मक संभावनाए टटोली है । इस लिहाज़ से किसी दल की रिपोर्टिंग नहीं की । मेरे मास्टर ने कहा था कि बेटा बकरी पाल लेना मुग़ालता मत पालना । बकरी पालोगे तो दूध पी सकते हो, खस्सी बियाएगी तो पैसा कमाओगे, कुछ मटन भी उड़ाओगे । मुग़ालता पालोगे तो कुछ नहीं मिलेगा । 

इसका मतलब यह नहीं कि आशुतोष ने ग़लत फ़ैसला लिया है बल्कि बहुत सही किया है । पत्रकार पहले भी राजनीति में जाते रहे हैं । बीजेपी कांग्रेस लेफ़्ट सबमें गए हैं । आशुतोष का जाना उसी सिलसिले का विस्तार है या नहीं इस पर विद्वान बहस करते रहेंगे । उन्होंने एक साहस भरा फ़ैसला लिया है । इससे राजनीति के प्रति सकारात्मकता बढ़ेगी । वो अब अंतर्विरोधों की दुनिया से बचते बचाते निकल आएं और समाज का कुछ भला कर सकें इसके लिए मेरी शुभकामनायें ( हालाँकि पेशे में उनका कनिष्ठ हूँ ) । अब वो राजनीतिक हमलों के लिए खुद को तैयार कर लें । खाल तो मोटी चाहिए भाई । और आप लोग मुझे हैरत भरी निगाहों से न देखें । कुर्ता पजामा पहनने का शौक़ तो है कुर्ता पजामा वाला बनने की तमन्ना नहीं है । एक दिन बड़ा होकर पत्रकार ही बनना है ! पत्रकार बने रहना कम जोखिम का काम नहीं है भाई ! बाक़ी तो जो है सो हइये है ! 

 

तो मेरे गाँव में बिजली आ रही है !

यक़ीन नहीं हो रहा है पर यक़ीन सा हो रहा है । मेरे गाँव में बिजली आने की संभावना प्रबल हो गई है । खम्भे लगने शुरू हो गए हैं । इससे यक़ीन गहरा गया है कि बिजली आ जाएगी । किसी को लग रहा है कि मेरे यहाँ आएगी की नहीं । मुझे भी लग रहा है कि मेरा यहाँ लगेगी कि मेरे यहाँ । मेरा घर तो नहीं छूट जायेगा । या सिर्फ पत्रकार के ही घर लगेगी । जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार ट्रांसफ़ॉर्मर  लगने के बाद कैम्प लगेगा । क्षमता के अनुसार सबसे आवेदन लिये जायेंगे ।ट्रांसफ़ॉर्मर कहाँ लगेगा इस बात को लेकर भी चर्चा है और लँगड़ी मार राजनीति । जो लोग अभी तक सोये रहे सब जाग गए हैं । किसी को लग रहा है कि मेरे गाँव में आ ही रही है तो पास के टोले में भी आ जाए । सबकी चिन्ता स्वाभाविक है । सबके यहाँ जानी चाहिए । पर आ रही है ंयही सुनकर गुदगुदी हो रही है । 

शायद २००५ का साल था । बिहार में चुनाव हो रहे थे । अपने ही गाँव से रिपोर्ट कर दिया । मेरे गाँव में बिजली कब आएगी । पर कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि देश के लाखों गाँव में बिजली नहीं है । उस रिपोर्ट के उत्साह में सुशील मोदी जीत के दिन पटना दफ़्तर आए थे । खुद से कह दिया कि आपके गाँव में भी बिजली आएगी । भूलने की शिकायत नहीं है । नीतीश श्रेय लें या मोदी लेकिन सच यही है कि बिहार के कई गाँवों में बिजली तो आई ही । मेरे गाँव के आस पास के गाँवों में भी बिजली आ गई है । वहाँ का जीवन काफी बदला है । बिजली की उपलब्धता में भी लगातार सुधार है । ज़िला मुख्यालयों में भी लोग बता रहे हैं िबदली रहने लगी है । वर्ना तो उसकी बात आने जाने के संदर्भ में ही होती थी । कब आती है कब जाती पता नहीं चलता । अब लोग कहते हैं कि बिजली रहती है । इस सुख को गुजरात पंजाब वाले नहीं समझेंगे ! उन्हें तो बिजली काफी समय से मिल रही है । अगर नीतीश कुमार और उनके बिजली मंत्री ने गाँव गाँव बिजली दे दी तो यह उनकी तरफ़ से बड़ा योगदान हो जायेगा । बाक़ी तो जो है सो हइये है ।

कुछ जानकारियाँ मिली हैं कि बिहार सरकार ने पिछले नवंबर को केंद्र के पास एक एक टोला और मोहल्ला में बिजली पहुँचाने के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट भेजा था । इस रिपोर्ट को तैयार करने को लिए जीपीएस का इस्तमाल किया गया है । एक महीने के भीतर केंद्र ने मंज़ूरी दे दी है । शायद नौ हज़ार करोड़ रुपया बिहार को मिलेगा । बिहार सरकार का बिजली मंत्रालय दिन रात इस बात में लगा है कि फ़रवरी तक काम के आदेश जारी कर दिये जायें ताकि एक साल के भीतर बिहार के हर गाँव और टोले में बिजली चली जाए । 

मेरे पिताजी तो बिना बिजली का स्वागत किये ही दुनिया से चले गए । पंद्रह सोलह साल पहले घर में वायरिंग करा दिया था कि बिजली तो बस आने वाला है । हर महीने साल बिजली के आने की बात करते थे । तरह तरह की योजनाएँ बनाते थे । फिर पुराना टीवी सेट ले गए और मेज़ पर सज़ा कर दिखा कि बिजली आएगी । बाद में टीवी बैटरी से चलने लगा और जनरेटर से । पाँच साल पहले जब नीतीश कुमार से मुलाक़ात हुई थी तब कहा था कि सर क्या मेरे गाँव में बिजली आ सकती है । उन्होंने कहा कि जब सबके यहाँ आएगी तो आपके यहाँ भी आ जाएगी । बीच बीच में कुछ अफ़सरों से ज़रूर कहा । अन्य लोगों ने भी अर्ज़ी पर्ची लगाई । सबके प्रयास से बिजली आने की संभावना निकट है । धीरज रखना पड़ता है । बिजली को लेकर हम इतने सामान्य होते जा रहे हैं कि इस उत्सुकता को कोई दर्ज ही नहीं कर रहा । कोई अख़बार भी नहीं लिख रहा है कि किसी गाँव में पहली बार बिजली पहुँची तो वहाँ क्या हुआ । दिल्ली में माता जी ख़बर सुनकर ही खिल जाती हैं । वहाँ फिर से रहने की योजना बना रही हैं । बिहार सरकार का शुक्रिया । आस पास के टोलों में भी पहुँच जाए तो क्या बात । इस खुशी में वहाँ काम कर रहे बिजली विभाग के अफ़सरों का भी शुक्रिया । अगली बार गाँव गया तो सबके पास गुलाब का फूल लेकर जाऊंगा । थैक्यूं कहने । सरकारी अधिकारी भी हमारे अपने ही हैं । 


इस खुशी को आप नहीं समझेंगे । बिजली आ रही है भाई । अंजोर ! अन्हार भाग जाईं । गाँव में वक़ील साहब रात को मुक़दमे की फ़ाइल पढ़ सकेंगे । मोबाइल चार्ज हो जाएगा । टीवी चलेगा । टार्च और डिजिटल लाइट को रेस्ट मिलेगा । बच्चे होमवर्क करेंगे । टीवी के चक्कर में लोग देर रात जागेंगे । अगर गाँव की लँगड़ी मार राजनीति का बुरा अनुभव रहा तब तो सलाम नमस्ते वर्ना अब दूसरी प्राथमिकता गाँव का स्कूल है । प्रस्ताव बना रहा हूँ । टीचर अच्छे ही होंगे । उन्हें प्रोत्साहन और सुविधायें दी जायें तो क्या नहीं कर सकते हैं । छात्र कितनी इज़्ज़त करते हैं उनकी । एक टीचर ह्रदय कुमार के साथ घूम रहा था । खेत खलिहान से गुज़रने वाला हर बच्चा परनाम माट साब कहता है । तो दोस्तों दुआ कीजिये कि बिजली का आगमन हो जाए । दायें बायें करने की स्थानीय राजनीति से भी निपट लिया जाएगा । पहले बिजली आ तो जाय ।  अब तो कोई नहीं कहेगा न कि क्या तुम्हारे गाँव में बिजली नहीं है ! 

वैशाली वसुंधरा के पोस्टर




युवा प्रवक्ता

बड़े दलों के युवा प्रवक्ताओं के फ़ोन आते रहते हैं । टीवी की बहस में कैसे भाग लेना चाहिए । क्या सुधार करना चाहिए । हर दल के प्रवक्ताओं को फ़ीडबैक देता रहता हूँ । इन सबकी चिन्ता यह है कि कैसे वे जेटली या थरूर टाइप के प्रवक्ताओं से बेहतर कर सकें । पार्टी का नाम नहीं ले रहा मगर फटने करने वाले प्रवक्ताओं में दो दलों के तो है हीं ।ये प्रवक्ता पहनावे से लेकर शैली तक की बात करते हैं । पार्टी के अंतर्विरोधों का कैसे सामना करें इसे लेकर काफी परेशान रहते हैं । कई बार जब कोई पार्टी किसी मुद्दे को लेकर फँस जाती है तो युवा प्रवक्ताओं को भेज दिया जाता है । उनकी अक्सर यही प्रतिक्रिया होती है "ग़लत तो हुआ है पर हमें कुछ न कुछ तो डिफ़ेंड करना था इसीलिए आज मैं चुप ही रहा "। येदुरप्पा दुरागमन या लालू गठबंधन ऐसे ही मुश्किल मुद्दे हैं जो युवा प्रवक्ताओं को डराते हैं । अच्छा है कि वे सीखना चाहते हैं । फ़ीडबैक माँगते हैं । युवा प्रवक्ता तैयारी भी करते हैं । अक्सर इनके हाथ में प्रिंट आउट होते हैं । ब्रेक के दौरान सैमसंग और आईफ़ोन में गूगल करते हैं । इस बात को लेकर भी चितिंत रहते हैं कि अगला इतना नौटंकी करता है तो क्या उन्हें भी करनी चाहिए । हा हा । मैं सबको उनकी पार्टी के हिसाब से पढ़ने के लिए बोल देता हूँ । मगर इनमें भी वही घाघपन आ गया है जो इनके बड़े नेताओं में होता है । कोई एकांत में नहीं पनपता । हर पौधे में खाद पानी की ज़रूरत होती है । हमारे में भी किसी न किसी ने डाला ही था । 

कुछ लोग टिकट की चाह में फ़ोन कर देते हैं ं । प्लीज़ ये मत कीजिये । राजनीति का अध्ययन करना और किसी पार्टी की प्रक्रिया संचालन में हस्तक्षेप करना दोनों अलग बात है । मैं दूसरे कार्य योग्य नहीं हूँ । 

हम आपके हैं कौन !

आज सुबह दफ़्तर में एक फ़ोन आया । फ़ोन रखते ही मैं एक अनजान वृद्ध महिला के एकांत से घिर गया । दिल्ली के नीतिबाग में रहने वाली ये महिला किसी बड़े अफ़सर की पत्नी हैं । पहले तो अपनी कविता सुनाई । फिर कहने लगी तुम इतना बीमार क्यों रहते हो । मैंने मज़ाक़ में कह दिया कि छुट्टी मिलती है । वो रोने लगी । कहने लगीं कि मैं माँ हूँ । तुम मेरे बेटे हो । मैं रोज़ रात को नौ बजे तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ । तुम नहीं आते हो तो अच्छा नहीं लगता है । वो अब फूट फूट कर रोने लगी थीं । कह रही थीं कि जहाँ पैदा हुए वहाँ का सब छूट गया । तुम मेरी पुरानी भाषा के शब्द दोहराते हो तो सब लौट आता है । नहीं आंटी ऐसा क्यों कहती हैं । आप प्लीज़ मत रोइये । मैं तुम्हारी आंटी नहीं हूँ । माँ हूँ । तो ठीक है आशीर्वाद दीजियेगा । मैं दूसरी तरफ़ चुप और वो उस तरफ़ रोये जा रही थीं । रोते रहीं किसी तरह फ़ोन रख दिया । पहले भी बात हुई थी । तब क्या झटाकेदार अंग्रेज़ी में अधिकार से फ़ोन किया था । नंबर सेव कर लिया था । ( मैं यह अपनी तारीफ़ और शो के प्रचार में नहीं लिख रहा ) मुझे उनका वो आलीशान घर खंडहर की तरह नज़र आने लगा ( जिसे देखा भी नहीं बताया था कि बड़ा घर है ) और उसमें इस शहर में भटकती रूह की चित्कार । हम किस किस के घर में किस किस रूप में उतरते हैं अंदाज़ा नहीं कर सकते । मगर उनका रोना काट रहा है । घर जाने का वादा तो कर दिया मगर उस घर में कैसे जायें जहाँ कोई सब कुछ पाकर एकांत के मातम से घिरा हुआ है । लेकिन जाऊँगा । कितना भयानक अलगाव है ये ।


हम सिर्फ ख़बर या बहस लेकर आपके ड्राइंग रूम में नहीं आते हैं । हम आपकी गुदगुदी बेचैनियां और ग़ुस्से का भी हिस्सा हैं । आप दर्शकों की ज़िंदगी की किस तकलीफ़ में हम मरहम की तरह काम कर जाते हैं ये लिखना आसान तो हैं मगर समझना बहुत मुश्किल । पहले भी रिपोर्टर एंकर की इन अनाम और अनगिनत रिश्तेदारियों पर लिख चुका हूँ । हमारे ख़ून के रिश्ते तो ख़ून के प्यासे रहते हैं , नहीं निभता फिर भी निभाते रहते हैं । ये वो लोग हैं जो ख़ून के रिश्तेदार नहीं हैं । काम में ईमानदारी और बेहतर प्रस्तुति के अलावा कोई ज़रिया भी इन रिश्तों को निभाने के लिए । कई लोगों से मिल लेते हैं । घर भी गया हूँ । एक के बारात में चला गया था । बाज़ार में रोज़ अपने देखने वालों से मिलता हूँ । उनके साथ फोटो भी खिंचा लेता हूँ । मगर इस भीड़ में ख़ुद के अकेलेपन की प्रक्रिया भी चलती रहती है । खुद के लिए भी किसी को ढूँढता रहता हूँ । माता जी की व्यथा को समझ सकता हूँ । आगरा में एक किराने की दुकान चलाने वाले इक़बाल भाई को भी समझ सकता हूँ जिन्हें फ़ोन किया तो कहा कि दो मिनट होल्ड कीजिये । कार में बैठ लूँ । फिर इक़बाल भाई रोने लगे कि हमें क्यों नहीं अपना समझा जाता है । हम क्यों किसी हिन्दू मुस्लिम डिबेट में बाहरी की तरह दिखाये जाते हैं । रोते ही रहे । अकेलापन कितने स्तरों पर आदमी की पहचान का पीछा करता है । आज रात नौ बजे क्यों नहीं आए , जब भी ऐसा एस एम एस आता है , यह बात खटक जाती है कि आज कोई अकेला रह गया होगा । 


चलते चलते:  एनडीटीवी में एक मित्र हैं पीटर । आफिस की कार चलाते हैं । पीटर चुप रहते हैं । बहुत साल पहले एक शूट के दौरान पीटर ने कहा कि केक खायेंगे । किसी का इंतज़ार लम्बा हो रहा था । उस केक पर झूम गया । पीटर ने कहा कि ये रम केक है । क्रिसमस में बनता है । पहली बार रम केक खाया था । पीटर हर साल क्रिसमस का रम केक मेरे लिए बना कर लाते हैं । शानदार । गले मिलते हैं और केक पकड़ा देते हैं । आज भी केक पकड़ा गए । कहा कि कब से इंतज़ार कर रहा था । रोज़ ला रहा था पर आज मिले ।