पेड विज़ुअल का आ गया ज़माना
कांग्रेस और बीजेपी की रैलियों के घनघोर कवरेज़ के बीच आपने ध्यान दिया ही होगा कि एक साल पहले तक न्यूज़ चैनलों पर छाये रहने वाले अरविंद केजरीवाल और आम आदमी की पार्टी कम नज़र आ रही है । अरविंद केजरीवाल अब रोज़ाना प्रेस कांफ्रेंस करते कम दिखते हैं और उनमें न्यूज़ चैनलों की वैसी दिलचस्पी भी नहीं रही जो लोकपाल आंदोलन के दौरान हुआ करती थी । क्या राजनीति में वही पार्टी दावेदार है जो टीवी में ज़्यादा दिखती है और क्या जनता बिल्कुल ही यह नहीं पूछती समझती होगी कि टीवी में दिखने और रामलीला की तरह होने वाली भव्य रैलियों का अर्थशास्त्र क्या है ? यह किसका पैसा है जिसके दम पर बड़ी पार्टियाँ दरिद्र नारायण के भाग्य पलटने का दावा करती हैं । जनता ज़रूर समझती होगी कि करोड़ों ख़र्च कर राजनीति में सादगी और ईमानदारी लाने का दावा फूहड़ है ।
2014 का चुनावा प्रचार माध्यमों के इस्तमाल का सबसे खर्चीला चुनाव होने जा रहा है । अरबों रुपये धूल की तरह झोंक दिये जायेंगे जिनका काग़ज़ पर कोई हिसाब नहीं मिलने वाला । सोशल मीडिया पर प्रायोजित तरीके से नारे फैलाये जा रहे हैं जिसके लिए महँगे दामों पर जनसंपर्क एजेंसियों को काम में लगाया गया है । इसके पीछे कितना ख़र्च हुआ पता नहीं चलेगा और सामने देखकर अंदाज़ा भी नहीं होगा कि यह किसी ख़र्चीले चुनावी रणनीति का हिस्सा है । आप ट्वीटर और फ़ेसबुक के स्टेटस को देखकर अंदाज़ा नहीं लगा सकेंगे कि यह आम जनता की सही प्रतिक्रिया है या किसी पार्टी की आनलाइन टीम के अनगिनत और अनाम कार्यकर्ताओं का कमाल है । मुझे नहीं मालूम कि चुनाव आयोग ब्रांडबैंड के इस्तमाल पर ख़र्च होने वाले करोड़ों रुपये का हिसाब कैसे लगायेगा और माँगेगा । क्योंकि पार्टियां कह देंगी कि फ़ेसबुक पर फलां विज्ञापन का पेज किसी चाहने वाले की रचनात्मकता की उपज है । जबकि आनलाइन कैंपन के लिए पेशेवर और क़ाबिल लोगों की टीम बनाई गई है जिस पर करोड़ो ख़र्च हो रहे हैं ।
इसीलिए आप देखेंगे कि तेज़ गति से कांग्रेस बीजेपी के समर्थकों ने प्रायोजित तरीके से सोशल मीडिया के स्पेस को क़ब्ज़े में ले लिया है । जबकि अरविंद केजरीवाल ने स्वाभाविक तरीके से इसके ज़रिये लोगों को घरों से बाहर निकाला था । अरविंद की टीम ने पहले अपने अभियान को सोशल मीडिया पर बनाया फिर उसे ज़मीन पर लाकर दिखाया कि उनके साथ इतने लोग हैं । मेरी समझ में नरेंद्र मोदी इस काम को ठीक उल्टा करते हैं । वे अपने संगठन और साधन के ज़रिये लोगों को जमा करते हैं , रैली के मंच को भव्यता और नाटकीयता प्रदान करने के लिए नक़ली लाल क़िला बनाने से लेकर वीडियो स्क्रीन लगाते है और मंच से हर भाषण में सोशल मीडिया का धन्यवाद कर इशारा करते हैं । वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि उनकी रैली की चर्चा उनके जाने के साथ समाप्त न हो जाए । रैली शुरू होने से पहले भी समर्थक के भेष में कार्यकर्ता, उनके वास्तविक समर्थक, पार्टी के छोटे बड़े नेता सोशल मीडिया पर चर्चाओं का समा ं बाँध देते हैं । इस मामले में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया है और अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति का रास्ता बदल कर सोशल मीडिया से छोटी छोटी सभाओं की तरफ़ मोड़ दिया है ।
कांग्रेस पीछे लग रही है मगर वो भी है नहीं । वो पीछे इसलिए लग रही है क्योंकि उसके नेता राहुल गांधी को इस बार भट्टा परसौल की पदयात्रा और यूपी चुनावों की तरह कवरेज़ नहीं मिल रही है । शायद वे दिन गए जब कैमरे राहुल का चप्पे चप्पे पर पीछा करते थे । मोदी की रैली का कवरेज उनके आने से कई घंटे पहले शुरू हो जाता है और पूरा भाषण लाइव प्रसारित होता है । एक कारण यह भी हो सकता है राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं को रणनीतिक और औपचारिक रूप नहीं दिया है । इस वक्त निष्कर्ष से पहले थोड़ा और इंतज़ार करना चाहिए कि इस बार मोदी का कवरेज ज़्यादा होता है या राहुल का या मीडिया दोनों में संतुल बनाता है । यह भी देखना होगा कि मीडिया सिर्फ मोदी और राहुल के बीत संतुलन बनाता है या अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, प्रकाश सिंह बादल, उद्धव ठाकरे को लेकर भी संतुलन बनाता है । लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि ये नेता बेचारे हैं । क्षेत्रीय दलों के पास भी मीडिया को अपने प्रभाव में लेने के कुछ कम साधन और हथकंडे नहीं होते ।
एक और बदलाव आप देखने जा रहे हैं । हालाँकि यह पहले भी होता था मगर इस बार बड़े पैमाने पर होने जा रहा है । रैलियों का कैसे प्रसारण होगा यह किसी चैनल के संपादक या रिपोर्टर तय नहीं करेंगे । रैली के आयोजक करेंगे । याद कीजिये कि दिल्ली में नरेंद्र मोदी की रैली की तस्वीरें सभी चैनलों पर एक सी थीं । एक ही तरह के कैमरा एंगल से ली गई तस्वीर सभी चैनल पर एक साथ दिखाई देती थी । रैली में रिपोर्टर भी गए थे मगर उनका मंच मुख्य मंच से इतनी दूर था कि कैमरे भी देखने में सक्षम नहीं थे । आयोजक क्रेन वाले कैमरे के सहारे भीड़ को ऊपरी एंगल से शूट कर रहे थे । क्रेन वाले कैमरे के ज़रिये बीस लोगों की भीड़ को सौ लोगों की तरह दिखने का असर पैदा किया जा सकता है । दिल्ली की रैली में खूब भीड़ आई थी मगर क्रेन से लगे आसमानी कैमरों ने आपके टीवी सेट पर उसका असर तीन गुना कर दिया था ।
यह दर्शकों के साथ किया गया एक विज़ुअल छल है । आपने जो भी तस्वीर देखी रैली के आयोजक की नज़र से देखी । इसलिए यह पेड न्यूज़ की तरह पेड विज़ुअल है । जिसके लिए पैसे का आदान प्रदान तो नहीं हुआ मगर आयोजकों ने अपने खर्चे पर सभी न्यूज़ चैनलों को वीडियो फ़ुटेज उपलब्ध कराई और आपने रैली को सिर्फ बीजेपी या कांग्रेस की नज़र से ही देखा । मुझे नहीं मालूम की चुनाव आयोग ने इस खर्चे को जोड़ने का कोई हिसाब निकाला है या नहीं । क्रेन वाले कैमरे लगाने और उनका फ़ीड सभी न्यूज़ चैनलों में पहुँचाने के खर्चे का हिसाब भी चुनावी खर्चे में शामिल होना चाहिए ।
इसलिए कहा कि इस बार का चुनाव प्रचार माध्यमों के इस्तमाल के लिहाज से बिल्कुल अलग होगा । दृश्यों को लेकर कलात्मक छल प्रपंच किये जायेंगे ताकि जनता को लहर नज़र आये । रैलियों में नारे लगाने के तरीके बदल जायेंगे । अब मंच से बड़े नेता के आने के पहले स्थानीय नेता राहुल राहुल या मोदी मोदी नहीं चिल्लायेंगे बल्कि कार्यकर्ताओं या किराये की टोली भीड़ में समा जाएगी और वहाँ मोदी मोदी या राहुल राहुल करने लगेगी जिससे आस पास के लोग भई जाप करने लगेंगे और लहर जैसा असर पैदा किया जा सकेगा । इन सबके खर्चे होते हैं जिसका पता चुनाव आएगा कैसे लगायेगा ।
बात शुरू हुई थी टीवी पर अरविंद केजरीवाल की सभाओं की गुमनामी से । अरविंद एक साल से । लगातार सभायें कर रहे हैं । जिसमें बड़ी संख्या में लोग भी आते हैं मगर कैमरे नहीं होते । अरविंद इसे लेकर शिकायत भी नहीं करते । जिस उत्साह से वे पहले रामलीला मैदान के मंच से हर दूसरी लाइन में मीडिया का आह्वान और धन्यवाद ज्ञापन किया करते थे अब उन्होंने टीवी और ट्वीटर का रास्ता देखना बंद तो नहीं किया मगर कम कर दिया है । वे जानते हैं कि लोगों के पास जाकर ही कांग्रेस बीजेपी का मुक़ाबला कर सकते हैं । सियासत को बदलने वाले लोग नुक्कड़ों और गलियों में मिलते हैं, ड्राइंग रूम में नहीं । उन्हें यह भी अहसास होगा कि जनता उन्हें दूसरा मौक़ा नहीं देगी । पहले प्रयास में इम्तिहान पास करना है तो पूरी किताब पढ़नी होगी । कुंजी से काम नहीं चलेगा । किताब के हर पन्ने को पलटना होगा और हर घर में जाना होगा ।आम आदमी पार्टी यही कर रही है । राजनीति में टीवी और ट्विटर कुंजी हैं । किताब नहीं ।
( आज के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित)
मेरठ मानसिकता और आसाराम
आज शाम एक साथ कई चैनलों को पलटा तो ज़्यादातर जगहों पर आसाराम को लेकर कार्यक्रम चल रहे थे और कुछ जगहों पर आने की सूचना फ़्लैश हो रही थी । लगता है दीपक चौरसिया ने रेटिंग के मामले में स्थापित चैनलों को डरा दिया है । रेटिंग का खेल कितना आसान है । इसका सिम्पल फ़ार्मूला यह है कि जो भी दूसरा चैनल दिखा रहा है उसकी नक़ल करो । कोशिश करो कि उसी वक्त दिखाओ । जैसे रिन साबुन की नक़ल पर बाज़ार में नीले रंग के साबुन कई तरह के समानार्थी नाम से लौंच हो गया था । लोग रिम को रिन समझ कर ख़रीद लेते हैं । मेरे साथ भी हादसा हो चुका है । तब तक साबुन तो बिक ही चुका था । एनडीटीवी इंडिया, इंडिया टीवी, लाइव इंडिया, इंडिया न्यूज़ । क्या बात है भाई । राजस्थान में कोई फ़र्स्ट इंडिया नाम का न्यूज़ चैनल लाँच हुआ है । इंडिया ही इंडिया । कौन रिन है कौन रिम ये कौन तय करेगा । वैसे हिन्दी नाम वाला एक ही चैनल है आज तक । सहारा समय भी गिन सकते हैं ।
रेटिंग का गणित यह है कि अगर आपके घर में मीटर है और आप किसी चैनल पर एक मिनट से ज़्यादा रूकते हैं तो रेटिंग मिल जाती है । फिर आप फ़ेसबुक पर चाहें जितना गरिया लें चैनलों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता । जब से आसाराम को लेकर इंडिया न्यूज़ की रेटिंग आई है तब से सब दीपक सुनामी से बचने के नाम पर बाकी चैनल फिर से आसाराम आसाराम जप रहे हैं । मैं यहाँ पत्रकारिता और गुणवत्ता की बात नहीं कर रहा । हिन्दी न्यूज़ चैनल आईपीएल के पैटर्न पर चलते हैं । जहाँ टेस्ट मैच के नियमों को लेकर भावुक होने का मतलब नहीं । सभी चैनलों की टीम आईपीएल की तर्ज़ पर ही गठित है । दीपक इस खेल के पोलार्ड ( क्रिकेट कम देखता हूँ , मक़सद धुआँधार बल्लेबाज़ी करने वाले से है ) साबित हुए हैं । दे दनादन । नीम हकीम ख़तरा ए आसाराम, आसाराम की आशिक़ी, आसाराम का अश्लील दवाखाना, आसाराम का मैटरनिटी हास्पिटल । ये तीन विज्ञापन है जो इस वक्त इंडिया न्यूज़ पर दिखाये गए । जो साढ़े नौ बजे से शुरू होकर एक के बाद एक आयेंगे । देखना है दीपक कितना टिकते हैं और सर्वदा नंबर वन आज तक की देहरी पार कर पाते हैं कि नहीं ।
फिर क्या था मैंने आज रात नौ बजे रिमोट लेकर चैनलों को पलटना शुरू कर दिया । हर जगह आसाराम ही आसाराम । इंडिया टीवी भी अधर्म गुरु जन्म से जेल तक कार्यक्रम दिखा रहा है । एबीपी न्यूज़ पर भी आसाराम पर एक न्यूज़ आ रहा है । नारायण साईं पर रेप का आरोप लगा है । आज तक पर भी एक शो आ रहा है जिसका नाम है आसाराम की डर्टी पिक्चर । न्यूज़ 24 चैनल पर कार्यक्रम आ रहा है जिसका स्लग है पापा के महापाप में बेटा भी पा्टनर । शो का नाम है नारायण नारायण । आई बीएन सेवन पर भी आसाराम के बेटे की ख़बर है । लेकिन वहाँ बाकी ख़बरें भी हैं । ज़ी न्यूज़ और लाइव इंडिया पर बाकी ख़बरें भी हैं । न्यूज़ नेशन पर राजनीतिक चर्चा चल रही है और न्यूज़ एक्सप्रेस पर यूपी की लैपटॉप वाली ख़बर है । ये मैं नौ बजे के प्राइम टाइम का आँखों देखा हाल बता रहा हूँ । नीचे के चैनल रेटिंग को लेकर कम परेशान हैं शायद !
मतलब साफ़ है दीपक ने चोटी के तीन चैनलों को डरा दिया है । टीआरपी की दुनिया दिलचस्प होती है । यहाँ नियम नहीं चलते । इनके अपने नियम होते हैं । कभी रेटिंग के नियमों के तहत इन चैनलोंं का मूल्याँकन किया जाना चाहिए । शीर्षासन करके भी देखिये नज़रिया अलग हो जाता है । ( यह पंक्ति फ़ेसबुक पर एक स्टेटस से प्रेरित है ) इस भयानक कंपटीशन में आज तक कैसे नंबर वन बना रह जाता है । यह कमाल है । इन सब चैनलों को चलाने वाले सम्पादक अधिकारी कभी न कभी एक दूसरे के साथ, एक दूसरे के आमने सामने, एक दूसरे के मातहत काम कर चुके हैं । यह भी एक दिलचस्प अध्याय है जिस पर इन्हीं में से कोई लिखे तो पढ़ने को रोचक चीज़ें मिलेंगी । रेटिंग के तनाव को झेलना आसान नहीं होता होगा । हर दिन एक फ़ार्मूला खोजना चुनौती भरा काम है । रोज़ ही इन्हें अपने साथी, पूर्व सहयोगी, पूर्व सम्पादक से लड़ना होता है । मैं इस तरह के अनुभव और दबाव से दूर रहा हूँ इसलिए बाहर से नैतिक टिप्पणी नहीं करूँगा ।
फिर न्यूज़ 24 को आसाराम का लाभ क्यों नहीं मिला । वहाँ भी कम बहस नहीं हुई है । ऐसा ही नज़ारा दर्शक निर्मल बाबा के वक्त देख चुके हैं । लगता है कि हमें कोई न कोई ग़ुबार निकालने के लिए चाहिए । जिसका प्रतीक कभी निर्मल बाबा तो कभी आसाराम बन जाते हैं । ग़ुबार निकलने के बाद न चैनल को निर्मल बाबा से दिक्क्त होती है न दर्शक को । कुछ लोग फ़ेसबुक पर इसे उजागर भी करते रहते हैं मगर इन पर कोई असर नहीं होता । अन्ना हज़ारों के वक्त भी यही हुआ था । लाइव इंडिया ने अन्ना को बिठाकर एक घंटे का कार्यक्रम किया । उसे कई बार दिखाया गया । जब रेटिंग आई तो लाइव इंडिया उछला हुआ था । बस सारे चैनल अन्ना को स्टुडियो बुलाने लगे । रेटिंग ही रेटिंग । एबीवीपी ने प्रधानमंत्री शुरू किया तो आजतक ने वंदे मातरम बना दिया । एक ने स्पीड न्यूज़ शुरू किया तो सबने चालू कर दिया । ज़ी ने कौटिल्य को पहले दिखाया (शायद) तो दीपक ने उसे लपक लिया और केबीसी में बदल दिया । उसी तरह डिबेट ही डिबेट शुरू हुआ । पहली बार अंग्रेज़ी का आइडिया हिन्दी में आया । ये अर्णब गोस्वामी का हिन्दी चैनलों की दुनिया में योगदान है ।
एक तरह से हर हिन्दी चैनल दूसरे की नक़ल कर चुका है । यानी सब एक दूसरे के अहसानमंद हैं । कोई कोलंबस कोलंबस नहीं चिल्लाता । सब कोलंबस का नक़्शा मार कर अपनी कोलोनी काटने निकल पड़ते हैं । प्लाट ही प्लाट । रेटिंग की दुनिया का एक औसत नियम नज़र आता है । कुछ भी अलग मत करो । जो एक कर रहा है उसी को अलग अलग तरीके से करो । स्लग की भाषा सबकी एक जैसी, नरेटी दाब कर नाक से बोलने वाला वायस ओवर, जैसे वीओ करने वाले को वायस ओवर ख़त्म कर तुरंत फ़ारिग़ होने भागना हो । सब चैनल पर नकबज्जा वीओ सुनाई देगा । जैसे पटना में कभी क़ब्ज़ दूर करने की दवा बेचने वाला पपीन पपीन बोलता था । सारी रचनात्मकता शो के नाम को लेकर निकाली जाती है । नीम हकीम ख़तरा ए आसाराम । वाह ।
हिन्दी चैनलों को पत्रकारिता के टेस्ट मैच के नियमों से हम कब तक देखते रहेंगे । कोई तो होगा जो इन्हें देख रहा होगा या फिर मीटर वालों की दुनिया के बाहर कोई नहीं देखता होगा । इसे मानने का आधार क्या है । दर्शक तो होंगे ही इनके पास । यहाँ निरर्थकता में ही सार्थकता है । इनके खाते में अच्छे काम भी है जिनका इस्तमाल आलोचना के वक्त किया जाता है । कुछ शानदार काम भी हैं । सब नैतिक रूप से यह तो कह ही सकते हैं कि उन्होंने एक ठग साधु के कारनामे दुनिया के सामने उजागर कर दिये । स्ट्रींगर रिपोर्टर मिलकर आसाराम का खेत खलिहान तक खोद लाये हैं । सत्यता और तरीके पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ । मैं कौन होता हूँ करने वाला । आसाराम पर बने तमाम कार्यक्रमों की भाषा और कंटेंट का गहन विश्लेषण होना चाहिए । पता नहीं क्यों गुप्त रोग दूर करने वाली तड़प भी दिखाई दी ।
कभी यह भी तो सोचिये आसाराम अंग्रेज़ी चैनलों में क्यों नहीं हैं । क्या पत्रकारिता वर्ग के हिसाब से नहीं होती । दूसरा मेरठ से छपने वाली पत्रिकाओं ने हिन्दी साहित्य और पाठकों की दुनिया में जो भूचाल पैदा किया उसने लोकप्रियता के लिए तड़प रहे हिन्दी के चैनलों को भी लपेट लिया । मेरठ ज़िंदाबाद । कभी मेरठ से कोई चैनल लाँच हो जाए तब देखेंगे सत्यकथाओं की जननी मेरठ के क़लमकार उनकी नक़ल मार रहे चैनलों को कैसी चुनौती देते हैं । मैं मेरठ को ब्रांड नहीं कर रहा । मुझे वो शहर बेहद पसंद है । तब तक रेटिंग की दुनिया का मज़ा लीजिये ।
आज जमाने बाद न्यूज़ चैनलों को देर तक देखा । अच्छा लगा यह देखकर कि कुछ भी नहीं बदला है ।
कोई है !
+355 66 917 0460 दो दिनों से मुझे इस नंबर से फोन आ रहे हैं । बाहर के मुल्कों से फ़ोन कम ही आते हैं मगर आते ही आशंका क्यों होती है । ये कोड अल्बानिया नामक मुल्क का है । गूगल ने बताया । मिस्ड काल आता है और उठाने से पहले कट जाता है । एक बार काल बैंक भी किया मगर कोई जवाब नहीं मिला । +35 कोड डाला तो गूगल ने बताया कि यह कोड छोटे यूरोपीय देशों के लिए इस्तमाल होता है इसके आगे का नंबर देश का होता है ।
कौन होगा जो मुझसे बात करना चाहता होगा । अल्बानिया में मेरा कौन हो सकता है । आशंकित भी होता हूँ और रोमांचित भी । कोई बात करना चाहता होगा और नंबर मिलाकर काट देता होगा । पर कौन होगा । गिनती के चार पाँच मित्र ही बाहर हैं । बहरहाल एक बेकार दोपहर को बेकार विषय पर लिख रहा हूँ । कोई है ! अल्बानिया में कोई है ! हिन्दी में पढ़ सकता है क्या ! अजीब है न । हो सकता है कि फोन आ जाए और कोई परिचित ही निकल आए । तब ऊपर की सारी बातें बेकार ।
रेल की भी ज़रूरत है
सिर्फ शौचालय ही नहीं रेल की भी ज़रूरत है । यह तस्वीर पिछले साल छठ के मौक़े पर बिहार जानो वाली रेल गाड़ी में खिंची थी । सोचिये यह यात्री शौचालय में यात्रा करने को मजबूर है । बाक़ी यात्रियों के बारे में भी सोचिये जो इस ट्रेन में यात्रा कर रहे थे । उन्हें तो शौचालय जाने का मौक़ा भी नहीं मिला होगा ।
खुले से कमोड तक, शौचनीय है यह मसला
देखो गधा मूत रहा है । यहाँ पेशाब करना मना है । तुम्हारा बाप पेशाब कर रहा है । पेशाब करने पर जुर्माना । हिन्दुस्तान के किसी भी शहर के दर ओ दीवार को देखिये शौचालय की कमी से जूझते ऐसे नारे मिल जायेंगे । हम खुले में शौच करते हैं । जहाँ भी खुला देखते हैं शौच करते हैं । बर्फ़ी फ़िल्म का नायक जब पेशाब कर रहा होता है तब सामने के खेत में काम कर रहे मज़दूर अचानक खड़े हो जाते हैं और बर्फ़ी हड़बड़ा कर चेन बंद करता है । जाली एल एल बी में जब अरशद वारसी परेशान होकर दिल्ली की एक फुटपाथ पर पेशाब करने वाला होता है तो पीछे से एक आवाज़ आती है साहब यहाँ हमारा पूरा परिवार सोता है आप पेशाब आगे जाकर कर लो । ऐसे कई प्रसंग आपको हिन्दी सिनेमा में भी दिख जायेंगे ।
खुले में शौच करना शहरों के विस्तार के साथ साथ एक समस्या के रूप में देखा जाने लगा है । इससे होने वाली बीमारियों और मौत को लेकर जागरूकता फैलाई जा रही है । आज भी आधा हिन्दुस्तान खुले में शौच करता है । हमारी भी यात्रा खुले में शौच करने से बंद बाथरूम की रही है । बचपन में खेलते खेलते जब छत पर पहुँच जाते थे तो छत पर इंगलिस लैंट्रीन का सामान पड़ा देख हैरानी होती थी । बाद में यही इंगलिस इंडियन स्टाइल के नाम से मशहूर हुआ ।मेरे गाँव में भी किसी सरकारी योजना के तहत इंगलिस लैट्रीन अवतरित हुआ था । लोगों ने बहुत दिनों तक शौचालय ही नहीं बनवाया । कई प्रसंग याद हैं । गाँव के लोगों के । गाँव के लोग जब पटना आते तो शौचालय जाने की बजाय गंगा किनारे तरफ़ चले जाते थे । फ़्लश चलाने के लिए भयानक ट्रेनिंग होती थी । बाल्टी लेकर ज़ोर से पानी मारने का प्रसंग याद है । मैंने ऐसा शौचालय भी इस्तमाल किया है जिसे सर पर मैला ढोने वाले साफ़ किया करते थे । तब इसे लेकर किसी भी प्रकार की संवेदनशीलता नहीं थी । कई साल बाद बिंदेश्वर पाठक ने मैला ढोने वाली महिलाओं पर एक किताब छापी अलवर की राजकुमारियाँ । इसके लिए एक महिला से बात कर उस पर लिखने का मौक़ा मिला । खुद अपराधी जैसा महसूस कर रहा था उनकी बात सुनकर ।
फिर एक दौर आया कमोड से टकराने का । एक गेस्ट हाउस में मेरे दो रिश्तेदार अंदर जाकर लौट आए । बाहर आकर पिताजी से कहा भाई जी पाल्ला ( ठंड) मार दिया, उतरा ही नहीं । दोनों ही बारी बारी से असफल होकर बाहर आ गए थे । कहा कि कमोड पर बैठते ही अइसा ठंडा लगा कि सिकुड़ गया । पिताजी ने सबको अंदर ले जाकर समझाया था कि कैसे इस्तमाल करना है । मैं खुद एक रिश्तेदारी में गया था । कमोड पर बैठने की कला मालूम नहीं थी । जूता पहने उस पर ऐसे बैठ गए जैसे खेत में बैठते थे । कमोड की सीट टूट गई । बड़ी शर्म आई । चोट लगी सो अलग ।
भारतीय रेल इस बात का गवाह है कि हम शौच करने के मामले में एक असफल राष्ट्र हैं । फ्लश दबायें इसका भी निर्देश लिखा होता है । तब भी कई लोग फ़्लश भूल जाते हैं । निर्देश न हो तो आधे लोग शौच के बाद फ़्लश दबाना भूल जायें । मग को चेन से बाँध कर रखना पड़ता है कि कही कोई वहाँ से निकाल कर चाय न पीने लगे । यही नहीं रेल में शौचालय की दो राष्ट्रीयता होती है । एक इंडियन और एक इंगलिस । इसी बीच एक बड़ा बदलाव आया है । कमोड का मध्य वर्गीय जीवन में खूब विस्तार हुआ है । अब अपार्टमेंट में इंडियन शैली का शौचालय नहीं होता है । कमोड ही कमोड । टीसू पेपर पर नहीं लिखना चाहता । हाल ही में एक मित्र ने बताया कि कमोड की सीट को गिरा कर रखा जाता है , उठा कर नहीं ।
तो जनाब एक राष्ट्र के रूप में हमें शौचालय का इस्तमाल करने की व्यापक ट्रेनिंग दी गई जो अभी तक जारी है । हम खुले में स्वाभाविक हैं बंद कमरे में थोड़ा कम । हाँ पुरुषों के खुले में शौच की मानसिकता को मर्दवादी बनावट के तहत भी देखना चाहिए । देर तक रोकने की ट्रेनिंग का सम्बंध इस बात से भी है कि समाज लिंग के मसले को कैसे नियंत्रित करता है । मर्द इस दुनिया को अपने लिंग के अधीन समझता है इसलिए जहाँ तहाँ चालू हो जाता है । दिल्ली जैसे बड़े शहर मे अब कामगार औरतों को मर्दों की तरह फ़ारिग़ होते देखने लगा हूँ । महिलाओं के लिए शौचालय ही नहीं है । घर और कहीं पहुँचने की दूरी से रोकने की सामाजिक और सांस्कृतिक नियंत्रण की ट्रेनिंग कब तक टिकेगी । गाँवों में बरसात के वक्त अंधेरे में शौच के लिए जाती औरतों को सर्प दंश से लेकर बलात्कार और गुज़रती गाड़ियों के हेडलाइट का सितम झेलना पड़ता है । आज भी ।
इस बीच मूत्र विसर्जन की बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए छोटी छोटी टाइलों की खोज की गई जिस पर देवी देवताओं की तस्वीर होती है ताकि लोग जहाँ तहाँ पेशाब करना छोड़ दें । तब किसी की धार्मिक भावना आहत नहीं होती । तब वीएचपी और बीजेपी को नहीं दिखता । आपको इसी दिल्ली के कई अपार्टमेंट के बाहर की दीवार पर ऐसी टाइलें मिल जायेंगी । कई दफ़्तरों में सीढ़ियों के कोने में देवी देवता वाली टाइल मिलेगी जो थूकने से लेकर मूतने तक को रोकने के लिए लगाईं गईं हैं । कई अपार्टमेंट में स्टडी से जुड़े शौचालय को देवालय में बदल दिया जाता है । किसी को दिक्कत नहीं होती ।
शौचालय को लेकर हम साम्प्रदायिक जातिवादी और अंध राष्ट्रवादी भी हैं । अंबेडकर ने सही कहा कि यह सिस्टम अछूतों से हिंदुओं की गंदगी और मल उठवाता है । कई लोग शौचालय को पाकिस्तान कहते हैं । फ्रांस और ब्रिटेन के बीच जब साहित्यिक सर्वोच्चता को लेकर दावेदारी होती थी तो फ़्रेंच ने कमोड की सीट की जगह शेक्सपीयर की किताब बना दी थी यानी वे शेक्सपीयर को पखाना करने लायक समझते हैं । पहले अंग्रेज़ी अख़बारों का सप्लिमेंट शौचालय में पढ़ा जाता था आजकल आईपैड भी जाता है । लोग वहाँ से भी ट्वीट करते हैं । दिल्ली में बिंदेश्वर पाठक ने शौचालय म्यूज़ियम बनाया है कभी वहाँ जाकर देखियेगा ।
जैसे जैसे शहरीकरण का विस्तार होगा शौच की समस्या उग्रतर होती जाएगी । हो रही है । अब इसे शर्म के रूप में देखा जा रहा है । पहले जब बंद कमरे में शौच नहीं था तब यह शर्मनाक नहीं था । शौचालय और देवालय के विवाद में पहले बीजेपी ने मूर्खता की और अब मोदी के बयान के बाद की चुप्पी उसी मूर्खता का विस्तार भर है । बेवजह दोनों पक्ष बयान की कापी निकाल कर पढ़ रहे हैं । कांग्रेस हो या बीजेपी सबकी सरकारों का रिकार्ड ख़राब है इस मामले में । एक अच्छी शुरूआत हो रही थी मगर व्यक्तिवादी राजनीति के चरित्र ने उसका गला घोंट दिया । यह मुद्दा ज़रूरी है । इसमें जयराम या मोदी ने धार्मिक भावना को आहत नहीं किया है । हाँ दोनों तरफ़ के मूर्ख आहत हो गए हैं । इनके लिए आहतालय बनवा दिये जायें ।
नज़फगढ़ नेशनलिज्म !
दौड़ेगा नज़फगढ़ बदलेगा नज़फगढ़ । आज के दैनिक भास्कर में इस विज्ञापन को देखा तो लगा कि दिल्ली महानगर के भीतर इलाकाई अस्मिता के बीज अंकुरित होने लगे हैं । यह हमारा स्वभाव भी है । हम बहुत दिनों तक एक पहचान को नहीं लाद सकते । होगी दिल्ली दिल्ली लेकिन नज़फगढ़ भी तो है । नज़फगढ़ क्यों दिल्ली की दुशाला ओढ़े रहे ।
यह क्रास कंट्री दौड़ वोट डालने और पानी के हक़ के लिए हो रही है । आयोजक का नाम है श्री राम चंद्र गहलोत चैरिटेबल ट्रस्ट है । विज्ञापन में जिन धावकों की तस्वीर है मुझे शक है कि कहीं अपना उसने बोल्ट न हो । अगर स्थानीय पहचान का ही मामला होता तो वीरेंद्र सहवाग की तस्वीर तो हो ही सकती थी । बहरहाल ट्रस्ट की राजनीतिक गतिविधि की जानकारी नहीं है । इतना बड़ा विज्ञापन दिया है तो पैसे वाला ट्रस्ट होगा ही । इरादा और नारा दिलचस्प लगा । आइये मिल कर दौड़िए हमारे साथ और बदलिए नज़फगढ़ । दौड़ छह अक्तूबर को है ।
बेवफ़ा इस्तीफ़ा
प्रिय इस्तीफ़ा,
तुम कहाँ हो प्यारे । लोग तुम्हें पुकार रहे हैं और तुम आ ही नहीं रहे हो । अनसुना कर दे रहे हो । आख़िर कब तक ऐसा होगा । कब तुम तभी दिये जाओगे जब तुम माँगे जाओगे । वे भी क्या दिन थे जब तुम अपने आप दिये जाते थे । नैतिकता के तक़ाज़े पर तो कभी अंतरात्मा की आवाज़ पर ही तुम दे दिये जाते थे । आज तरह तरह की आवाज़ें हो गई है मगर तुम नहीं दिये जा रहे हो । टीवी की आवाज़, ट्वीटर की आवाज़, बीजेपी की आवाज़, एंकर की आवाज़, लेफ़्ट की आवाज़ । आवाज़ ही आवाज़ । तुम को माँगने वाला और तुमको देने वाला, कौन है भाग्य विधाता । एक पार्टी जाने कब से तुम्हें मांग रही है, दूसरी पार्टी कब से तुम्हें नहीं देने दे रही है । देखना इस खींचतान में तुम्हें कोई फाड़ न दे । ख्याल रखना अपना ।
तुम्हारी लाइन क्या है । क्या तुम कभी माँगे जाने से दिये गए हो । कुछ चाहते हैं कि तुम दे दिये जाओ । कुछ चाहते हैं कि तुम्हें लिखवा दिया जाए । अच्छा है तुम नहीं दिये जा रहे हो । रोज़ रोज़ माँगने से भगवान भी भक्तों को नहीं देता है । माँगने दो जो मांग रहे हैं । इन्हें मांग कर खाने की आदत है । खुद देते नहीं और दूसरे से माँगते हैं । प्रिय इस्तीफ़ा तुम्हारी पोलिटिक्स सही है । तुम्हें माँगने के लिए कोई धरना देता है,कोई राष्ट्रपति के पास जाता है तो कोई अपने अपने परिवारों के मुखिया के पास जाता है । कई लोग ऐसे हैं जो तुम्हें जेब में रख कर चलते हैं । एक फ़िल्म में राजकुमार कलेक्टर बने थे । पूरी फ़िल्म में यही बोलते थे कि मैं अपना इस्तीफ़ा जेब में लेकर चलता हूँ । कभी तुम एक लाइन के होते हो तो कभी भर भर पेज । कभी तुम राजनीतिक कारण से होते हो तो कभी स्वास्थ्य के कारण से । कभी सलाह से तो कभी जनदबाव से । इसीलिए मैं तुम पर एक फ़िल्म बना रहा हूँ जिसका नाम होगा- तेरी मांग इस्तीफ़े से भर दूँ !
तुम्हारा, तुम्हें कभी न दे सकने वाला,
रवीश कुमार ' एंकर '
यस वी कैन वाले ओबामा जी
आदरणीय ओबामा जी,
हिन्दी का पत्रकार अंतर्राष्ट्रीय नहीं हो सकता लेकिन मेरठ से सोनीपत के ब्रह्मांड की रपट लिखते लिखते थोड़ा ग्लोबल हो जाता है क्योंकि इन जगहों पर आपकी कंपनियों के माल सेल पर मिलते हैं । हिन्दी तो पढ़ नहीं पायेंगे फिर भी । अंग्रेज़ी ही जानकर आपने क्या कर लिया ।
तो महामहीम ग्लोबल राम रहीम ओबामा जी, इनदिनों आपको देखता हूँ तो मनमोहन सिंह याद आते हैं । आपकी रंगभेद, ग़रीबी और परवरिश के हालात वाली किताब खूब बिकी है । वैसे आपके कपड़े लत्ते तो कभी ग़रीब वाले नहीं दिखे । जिन दिनों आप अपनी ग़रीबी बेच रहे थे उन दिनों आप तो भरे पूरे संपन्न टक्सिडो सूट में दिख रहे थे । आपकी या आपके ऊपर लिखी किताब को हिन्दी में भी शायद प्रभात प्रकाशन ने छापा है । आजकल इंडिया में भी एक चाय वाला पंद्रह साल मुख्यमंत्री रहने के बाद अपनी ग़रीबी बेच रहा है । वो भी लाखों रुपये के मंच से । जो कहता है कि भारत के कुछ लोग यहाँ की ग़रीबी विदेशों में बेचकर अवार्ड ले आते हैं । मगर जनाब खुद अपनी ग़रीबी के अतीत को भुना गए । उसी मंच से । खैर अंकल न आप पहले थे न हमारे मोदी जी पहले हैं । सब अपने मौक़े के अनुसार अपनी ग़रीबी को चुन लेते हैं महान बनाने को । गाय भैंस चराने वाले लालू भी पंद्रह साल तक इन ख़ूबियों के कारण राज करते हुए जेल गए हैं । एक ऐसे ही ग़रीब को जब राष्ट्रपति बना दिया गया था तब न जाने क्या क्या बातें कहीं गईं थी । एक पहलवान और टीचर सीएम बना बाद में उनका बेटा आस्ट्रेलिया से पढ़कर सीएम बन गया । सब प्रतीक ।
ओबामा जी मैं यह ख़त इंडिया की पोलिटिक्स के ऊपर नहीं लिख रहा हूँ । आपको देखकर मनमोहन सिंह की याद आती है इस पर लिख रहा हूँ । आपका भी दूसरा कार्यकाल म मो जैसा है । जैसे नरेंद्र मोदी नमो हैं वैसे मनमोहन सिंह ममो हैं । मोमो मत पढ़ लीजियेगा । आप बहुओ हैं । बराक हुसैन ओबामा । बहुओ । केवल ओ पर अनुस्वार मत लाइयेगा वर्ना आप साँस बहू वाली लाइन में आ जायेंगे । आप फ़ेल हो गए हैं । चौपट अर्थव्यवस्था । चौपट ग्लोबल कूटनीति सब । इंडिया और अमरीका कई मामलों में एक हो रहे हैं ।
आज जब ख़बर आई कि अमरीकी सरकार बंद हो गई है तो मुझे बेहद खुशी हुई । काश इस ऐतिहासिक मौक़े पर आपकी सरकार का कर्मचारी होता तो ऐश करता । सात लाख लोग छुट्टी पर । काम नहीं करना पड़ता । ओबामाकेयर को लेकर रिपब्लिकन वाले ने आपको नचा रखा है । जैसे खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर बीजेपी ने सरकार और संसद को नचा रखा था । सरकार बंद हो जाए इससे अच्छी बात क्या है । काश ममो की सरकार भी बंद हो जाती । आपने अमरीका की दुकान बंद करवा कर जो काम किया है वो अगर भारत में होता तो देखते आप । क्या आपने दुनिया में ब्रांड अमरीका की भद पिटवा दी ? मैं मित्रों से कहता हूँ आपने सरकार की दुकान बंद करवाई है, कोई भद नहीं पिटवाई है ।
अब आपकी तरह यहाँ भी 'कैन' और 'होप' बेचा जा रहा है । दरअसल सर ऐसे नारे सिर्फ एक चाल होते हैं जो विरोधी के मुक़ाबले अंतर पैदा करने के लिए गढ़े जाते हैं । आपने ऐसा कुछ नहीं किया जो आपके उदय से उभरी उम्मीदों को उचित ठहराते हों । आपके ये नारे पिट गए हैं । आप न कैन कर पाए न होप कर पाए । लेकिन आपका हर पिटा हुआ माल इंडिया में बिक जाता है । यक़ीन नहीं तो आप आकर देख लो । आपके प्रचार पंडाल की बाँस बल्लियाँ इंडिया की चुनावी सभाओं में लगने लगी है । इतिहास का सबक़ है कि जो लहर पैदा करता है वो उसी में बह जाता है । भारत में सत्तहत्तर की लहर पैदा करने वाले घोटाले में डूब गए फिर भी उस लहर की याद ऐसे करते हैं इस उम्मीद में कि लौटती हुई लहर सत्ता की नाव को किनारे लगा दें । सत्तहत्तर का एक इतिहास यह भी है सर ।
ओबामा जी आप लोकतंत्र में वोटर को झुंड में बदल कर झुमाने की कला में माहिर हैं । आपने नए नए माध्यमों का इस्तमाल किया है । आपके रहते चीन आगे निकल गया या एतना आगे आ गया । आप सिर्फ एक आदमी को वीज़ा न देने वाला कंट्री बनकर रह गए हो जो हर दूसरे दिन आपके यहाँ वीडियो कांफ्रेंसिंग करते रहते हैं । वो वहाँ है मगर आ नहीं सकता । ओबामा वीज़ा वाले । मेरठ में दुकानों के नाम होंगे एक दिन ।
मगर आपकी नाकामी के बाद से ज़्यादा उत्साही और प्रबंधन के चमत्कार से किसी उम्मीद का प्रतीक बनने वाले नेताओं से डर लगता है । विकल्प क्या है । जो अच्छा था वो भी फ़ेल था जो प्रचारित है वो भी फ़ेल है । बस न वहाँ पब्लिक को दिखता है न यहाँ । आपके प्रचार से पैदा हुआ जुनून आज फुस्स हो गया । यही वजह है कि सत्ता वही की वही रहती है बस चलाने वाला कहीं से आ जाता है । ग़रीबी से, जाति से, अल्पसंख्यक से, नस्ल भेद की पीड़ा से, चारागाह चाय की दुकान से, राज परिवार से, संघ परिवार से , जाने कहाँ कहाँ से । सत्ता का चरित्र कोई नहीं बदल पाता । उम्मीद की राजनीति फ़र्ज़ी है । आप उम्मीद बन कर आए थे अब लीद बन चुके हैं । राजनीति तभी बदलाव लाती है जब वो मुद्दों को लेकर व्यापक समझ पैदा करती है न कि प्रचार से यस वी कैन । ढैंन ढैंन ढैंन ं ।
आपका अमरीका यात्रा से वंचित पत्रकार ,
रवीश कुमार' एंकर'
राम की गंगा
पिछले साल जिम कार्बेट से ऊपर राम की गंगा गया था । शायद यह रिसार्ट का ही नाम है । एक तरफ़ घने पहाड़, उसके नीचे ये रिसार्ट, स्वींमिंग पुल, सामने नदी और फिर नदी के पार पहाड़ । अद्भुत जगह । मोबाइल फ़ोन से खींची इन तस्वीरों को मिटा रहा था सोचा लगा देता हूँ । स्वींमिंग पुल के नीले रंग को पहाड़ नदी और आसमान के नीचे देखना , सिर्फ देखना ही पैसा वसूल है । ख़ासकर यहाँ मोबाइल नेटवर्क कमज़ोर है । हर वक्त गुज़रती नदी अपनी हड़हड़ाहट से बात करती रहती है । नदी से पैदा होने वाली ध्वनि आपके ख़ालीपन को भर्ती रहती है ।
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